॥ श्री महादेव्या: प्रसादत:॥
मन्त्राणां मातृका देवी शब्दानां ज्ञानरूपिणी।
ज्ञानानां चिन्मयातीता शून्यानां शून्यसाक्षिणी॥
( श्रीदेवी अथर्वशीर्षम् /२४)
जो मंत्रों में मातृका अर्थात् मूलाक्षर रूप में, शब्दों में ज्ञान (अर्थ) रूप में, ज्ञान में चिन्मयातीत (विशुद्ध चेतना से परे – beyond pure consciousness) तथा शून्य में शून्यसाक्षिणी (प्रलयकाल में जब सृष्टि समाप्त हो जाने पर सब कुछ ‘शून्य’ हो जाता है, उसे भी जो साक्षी भाव से देखती हैं) रूप में स्थित हैं, उन भगवती दुर्गा को प्रणाम करता हूँ।
मंत्र रचना मूलाक्षरों से, उन शब्दों के अर्थ से प्राप्त ज्ञान, ज्ञान की परमोच्च अवस्था चिन्मयातीत और सर्वत्र शून्य की साक्षी… यह भारतीय तत्व चिंतन में ज्ञान के क्रमिक विकास का स्वरूप है। गोस्वामी तुलसीदास जी भी श्रीरामचरितमानस का प्रारंभ करते हैं –
वर्णानां अर्थसंघानां रसानां छन्दसामपि।
वर्ण (अक्षर), उनसे मिलने पर बने शब्दों में वर्णित अर्थ समूह और उससे नि:सृत रसानुभूति और फिर छन्दरचना, इस मंगलकारी वाणी-विनायक स्वरूप की वन्दना।
“स्मृति चन्द्रिका” में ज्ञानार्जन के क्रमिक अंगों का वर्णन इस प्रकार है –
शुश्रूषा श्रवणं चैव ग्रहणं धारणं तथा।
ऊहापोहार्थविज्ञानं तत्त्वज्ञानं च धीगुणा:॥
गुरु की सेवा, उनके शब्दों का श्रवण, उनका अर्थ ग्रहण कर मन में धारण, स्वयं खोजना और अन्य से जिज्ञासा समाधान कर तत्त्वज्ञान की पूर्णता।
बृहदारण्यक उपनिषद् में ज्ञानार्जन की श्रवण-मनन-निदिध्यासन प्रक्रिया का उल्लेख है अर्थात् शब्द सुनकर मनन द्वारा बौद्धिक परिग्रहण और निदिध्यासन द्वारा आत्मानुभूतिजन्य ग्राह्यता।
छान्दोग्योपनिषद् में श्वेतकेतु नामक युवक और उसके पिता ऋषि आरुणि के मध्य हुए संवाद के माध्यम से इस प्रक्रिया को विविध प्रयोगों तथा उदाहरणों द्वारा स्पष्ट किया गया है, जैसे,”मन अन्नमय है, प्राण जलमय है तथा वाणी तेजोमय है” के शब्दों के वास्तविक अर्थ को समझाने के लिए पिता उसे एक पक्ष (१५ दिन) केवल जल पीकर रहने का निर्देश देते हैं। इसी प्रकार देह और आत्मा के बीच सम्बन्ध स्पष्ट करने के लिए वटवृक्ष के फल को तोड़ कर उसके निरीक्षण-परीक्षण द्वारा सामने खड़ा वटवृक्ष कहां से आया, इस प्रश्न का उत्तर खोजने के माध्यम से आत्मतत्व की व्यापकता समझाते हैं।
श्रीमद्भगवद्गीता (४/३४) में श्रीकृष्ण कहते हैं –
तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया।
उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानं ज्ञानिस्तत्त्वदर्शिन:॥
तत्त्वज्ञान से युक्त मनीषियों को भली-भांति प्रणाम कर, उनकी सेवा कर और निष्कपट भाव से किए गए प्रश्नों द्वारा उनके उपदेश से ज्ञान प्राप्त कर।
प्रश्नोत्तर, कथा कथन, दृष्टांत, जीवनवृत्त वर्णन आदि शिक्षण शैली ही आजकल परिचर्चा, परिसंवाद (seminar) आदि में प्रचलित है। महाभारत युद्ध के बाद उत्पन्न परिस्थितियों में समाज व्यवस्था को पुनर्स्थापित करने के लिए नैमिषारण्य में आयोजित 88 हजार ऋषि-मुनियों के परिसंवाद का वर्णन स्कंद पुराण के रेवाखण्ड में आता है। समाज की परिस्थितियों पर विचार कर दिशा निर्देश करने के लिए समाज के नीति निर्धारकों ने निश्चित अंतराल पर देश के चार स्थानों – हरिद्वार, प्रयागराज, उज्जयिनी तथा नासिक में कुम्भ मेला क्षेत्र में विद्वत् संसद की परम्परा इसी विचार-विमर्श के लिए प्रारंभ की थी।
ये सब उदाहरण तत्वचिंतन को एक पीढ़ी से अगली पीढ़ी को हस्तांतरण करने, ज्ञान को संक्रमित करने की प्रक्रिया थी जिससे ज्ञान परम्परा सतत, सबल और समृद्ध होती गई।
वेद- उनके उपवेद – वेदांत अर्थात् उपनिषद – षड्दर्शन – मीमांसा – ब्राह्मण ग्रन्थ – आरण्यक – पुराणेतिहास आदि की रचना इसी ज्ञान परम्परा के स्रोत हैं। प्रायः ये सभी ग्रंथ संवाद शैली में रचित हैं। भारत में ग्रंथ लेखन पाठ्य-पुस्तकों (textbook) के स्वरूप में नहीं किया गया, संवाद – प्रश्नोत्तर – कथोपकथन – जिज्ञासा समाधान की शैली में हुआ इसलिए पाश्चात्य विद्वानों को यह कहना सर्वथा सरल हो गया कि भारत में शिक्षा प्रसार या ज्ञानार्जन की कोई परम्परा थी ही नहीं।
अपनी अगली पीढ़ियों को भारत के ज्ञान भण्डार को हस्तांतरित कर उनके मन में अपने ज्ञानवान् पूर्वजों के प्रति गौरव भाव जाग्रत करना, इसके लिए शिक्षा क्षेत्र से जुड़े हुए हम साधकों को ही दायित्व लेना होगा। इस दायित्व के निर्वहन में हम सफल हों, यही प्रार्थना ‘वाणी विद्यादायिनी’ से।
ज्ञान पथ पर आपका सहयात्री,
– अवनीश भटनागर
(लेखक विद्या भारती के अखिल भारतीय उपाध्यक्ष है।)