– डॉ. शिवानी कटारा

भारत एक बहुभाषी और बहुसांस्कृतिक राष्ट्र है, जहाँ शिक्षा के क्षेत्र में भाषा का प्रश्न सदैव महत्त्वपूर्ण रहा है। स्वतंत्रता प्राप्ति के उपरांत उच्च शिक्षा का ढाँचा मुख्यतः अंग्रेज़ी पर आधारित रहा, जिसके परिणामस्वरूप विश्वविद्यालयों, तकनीकी संस्थानों और चिकित्सा महाविद्यालयों में अंग्रेज़ी ही प्रमुख शिक्षण-माध्यम के रूप में स्थापित हो गई। इस दीर्घकालिक प्रभुत्व ने धीरे-धीरे मातृभाषा, विशेषकर हिन्दी, में उच्च शिक्षा की प्रासंगिकता और आवश्यकता को अधिक गहन रूप से अनुभव कराना प्रारंभ किया। उल्लेख आता है कि, “भाषासु मुख्या मधुरा दिव्या गीर्वाणभारती। तस्माद्देवी विशेषेण मातृभाषा प्रकीर्तिता॥” अर्थात्, सभी भाषाओं में संस्कृत को मधुर और दिव्य माना गया है, परंतु मनुष्य की मातृभाषा को सबसे श्रेष्ठ और प्रिय माना गया है। मातृभाषा आत्म-अभिव्यक्ति का सबसे सहज और सशक्त माध्यम है। यही कारण है कि मातृभाषा में शिक्षा को एक प्रभावी और व्यवहारिक विकल्प के रूप में देखा जाने लगा है।
इस दृष्टि से राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 ने एक महत्त्वपूर्ण पहल करते हुए उच्च शिक्षा में भारतीय भाषाओं के उपयोग को प्रोत्साहन दिया। इसी क्रम में भारत सरकार ने “भारतीय भाषाओं में चिकित्सा शिक्षा परियोजना” आरंभ की। इस परियोजना के अंतर्गत वर्ष 2022 में मध्यप्रदेश में पहली बार हिन्दी माध्यम से एमबीबीएस की पढ़ाई शुरू हुई। इसके पश्चात उत्तरप्रदेश, राजस्थान, महाराष्ट्र, तमिलनाडु और कर्नाटक में भी पायलट परियोजनाएँ लागू की गईं। इस पहल को सफल बनाने के लिए राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग और अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद सक्रिय रूप से कार्यरत हैं।
विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार, स्वास्थ्य मात्र रोग की अनुपस्थिति नहीं बल्कि शारीरिक, मानसिक, सामाजिक और आध्यात्मिक संतुलन की स्थिति है। इस परिप्रेक्ष्य से चिकित्सा केवल रोग-निवारण का साधन न होकर समग्र मानवीय कल्याण की प्रक्रिया है। चिकित्सक का कार्य दवा देने तक सीमित नहीं होता; उसे रोगी की भावनाओं, पीड़ा और सामाजिक-परिवारिक संदर्भों को भी समझना आवश्यक है। सहानुभूति, करुणा और सम्मान जैसे मूल्य चिकित्सा को मानवीय गहराई प्रदान करते हैं। साथ ही स्वास्थ्यकर्मी टीकाकरण, पोषण, स्वच्छता और ग्रामीण स्वास्थ्य अभियानों द्वारा सामाजिक उत्तरदायित्व भी निभाते हैं।
इस संदर्भ में भाषा केवल संचार का उपकरण नहीं, बल्कि भावनाओं और अनुभवों की अभिव्यक्ति का माध्यम भी है। हिन्दी/मातृभाषा का प्रयोग चिकित्सक और रोगी के बीच संवाद को सहज और सटीक बनाता है। रोगी अपने लक्षण और समस्याएँ खुलकर बता पाता है, जिससे गलतफहमियों और अधूरी जानकारी की समस्या दूर होती है। चिकित्सकीय निर्देश मातृभाषा में अधिक प्रभावी सिद्ध होते हैं और उपचार की सफलता की संभावना बढ़ जाती है। उदाहरणस्वरूप “Hypertension” शब्द आमजन के लिए जटिल हो सकता है, किंतु जब इसे “उच्च रक्तचाप” के रूप में समझाया जाता है तो उसका अर्थ तुरंत स्पष्ट हो जाता है। यही मातृभाषा की शक्ति है – ज्ञान को सुलभ और आत्मीय बनाना।
शिक्षा जब मातृभाषा में दी जाती है तो वह अधिक सरल, आत्मसात करने योग्य और सृजनात्मक हो जाती है। वैज्ञानिक अवधारणाएँ मातृभाषा में शीघ्र समझ आती हैं, मस्तिष्क में गहराई से अंकित होती हैं और दीर्घकाल तक स्मरण रहती हैं। इससे विद्यार्थी अधिक रचनात्मक और शोधोन्मुख बनते हैं। मातृभाषा में शोध से स्थानीय बीमारियों और जनस्वास्थ्य समस्याओं के समाधान खोजने की संभावनाएँ बढ़ती हैं। चीन ने अपनी पारंपरिक चिकित्सा को वैश्विक पहचान दिलाई; उसी प्रकार भारत भी आयुर्वेद और आधुनिक चिकित्सा को भारतीय भाषाओं में पढ़ाकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर महत्त्वपूर्ण योगदान दे सकता है।
भारतीय भाषाओं में विज्ञान और चिकित्सा का साहित्य विकसित होने से सांस्कृतिक आत्मनिर्भरता को प्रोत्साहन मिलेगा और ज्ञान का लोकतंत्रीकरण संभव होगा। इससे चिकित्सा शिक्षा केवल अंग्रेज़ी जानने वालों तक सीमित न रहकर ग्रामीण और ग़ैर-अंग्रेज़ी पृष्ठभूमि से आने वाले विद्यार्थियों तक भी पहुँचेगी। यह भाषाई सहजता चिकित्सा शिक्षा को अधिक समावेशी बनाएगी और विद्यार्थियों के आत्मविश्वास को बढ़ाएगी। अंग्रेज़ी में कमजोर विद्यार्थी भी अपनी पूर्ण क्षमता का उपयोग कर सकेंगे और समाज को बेहतर स्वास्थ्य सेवाएँ दे पाएंगे।
हालाँकि भारतीय भाषाओं में चिकित्सा शिक्षा के कार्यान्वयन में कई चुनौतियाँ भी सामने आती हैं। सबसे बड़ी समस्या यह है कि अधिकांश मानक चिकित्सा साहित्य अंग्रेज़ी में उपलब्ध है, जबकि हिन्दी में गुणवत्तापूर्ण और अद्यतन सामग्री का अभाव है। अंग्रेज़ी माध्यम से पढ़े हुए कई शिक्षक हिन्दी व अन्य भारतीय भाषाओं में अध्यापन करने में संकोच और असुविधा अनुभव करते हैं। छात्रों में भी यह धारणा है कि हिन्दी या अपनी मातृभाषा का माध्यम चुनने से उनके अंतरराष्ट्रीय शोध और करियर अवसर प्रभावित हो सकते हैं। फिर भी तकनीकी प्रगति ने इन बाधाओं को काफी हद तक कम कर दिया है। अनुवाद उपकरण, चिकित्सा शब्दकोश और डिजिटल संसाधन अब इतनी सहजता से उपलब्ध हैं कि किसी भी वैज्ञानिक अवधारणा को मातृभाषा में समझना कठिन नहीं रहा। यद्यपि आधुनिक चिकित्सा की अधिकांश शब्दावली लैटिन पर आधारित है, यह कोई दुर्निवार समस्या नहीं है। यदि उपयुक्त भारतीय पर्याय उपलब्ध नहीं हैं, तो मूल शब्दों को उसी प्रकार आत्मसात किया जा सकता है, जैसे अंग्रेज़ी ने किया है। भाषाएँ सदैव विदेशी शब्दों को ग्रहण कर समृद्ध होती रही हैं। हिन्दी/ भारतीय भाषाओं में ढलने पर ये शब्द स्वाभाविक प्रतीत होंगे। चिकित्सकों, विद्वानों और अनुवादकों के सामूहिक प्रयास से एक मानकीकृत शब्दावली तैयार करना पूरी तरह संभव है।
इस दिशा में कई व्यावहारिक उदाहरण सामने आए हैं। दिल्ली स्थित सफदरजंग अस्पताल के प्रसिद्ध हृदयरोग विशेषज्ञ डॉ. फणिभूषण दास ने हिन्दी में स्वास्थ्य संबंधी अनेक ग्रंथ लिखकर यह सिद्ध किया है कि मातृभाषा में चिकित्सा शिक्षा को सफलतापूर्वक विकसित किया जा सकता है। उनकी पुस्तकें, जैसे हृदय और हृदयावरण, चिकित्सा विद्यार्थियों के साथ-साथ स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं और आमजन के लिए भी सरल और उपयोगी साबित हुई हैं। इससे यह भी स्पष्ट होता है कि समस्या शब्दावली की नहीं, बल्कि निष्ठा और समर्पण की है। मातृभाषा में लिखी पुस्तकें आशा और आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं, नर्सों और फार्मासिस्टों के लिए विशेष रूप से सहायक हैं क्योंकि इनमें रोगों के लक्षण और रोकथाम के सरल विवरण व चित्र उपलब्ध होते हैं। इसके अतिरिक्त, सस्ता साहित्य मंडल जैसी संस्थाओं द्वारा प्रकाशित ग्रंथ स्वास्थ्य कर्मियों को कम कीमत पर उपलब्ध हैं, जिससे वे प्रशिक्षण और निरंतर शिक्षा दोनों में सहायक बनते हैं। इस प्रकार हिन्दी माध्यम और अन्य भारतीय भाषाओं में चिकित्सा शिक्षा को मानवीय और रोगी-केंद्रित बनाने का सशक्त साधन सिद्ध हो सकती है।
भारतीय भाषाओं में उपलब्ध चिकित्सा साहित्य दीर्घकाल तक स्वास्थ्य शिक्षा का स्थायी स्रोत बनेगा। इससे आने वाली पीढ़ियों के स्वास्थ्य कार्यकर्ता, नर्सिंग छात्र और मेडिकल विद्यार्थी निरंतर लाभान्वित होंगे। अंग्रेज़ी पाठ्य पुस्तकों की तुलना में हिन्दी पुस्तकें अधिक किफ़ायती और सुलभ हैं, जिससे उच्चस्तरीय ज्ञान आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों तक भी पहुँच सकेगा। यह साहित्य चिकित्सकों तक सीमित न रहकर शिक्षकों, समाजसेवियों, पत्रकारों और परिवारों तक स्वास्थ्य ज्ञान का विस्तार करेगा तथा विशेषज्ञता को सामाजिक संपदा में बदलकर जन-जागरूकता और स्वास्थ्य-सुरक्षा को सुदृढ़ बनाएगा।
नीति-निर्माण के स्तर पर भी मातृभाषा आधारित चिकित्सा शिक्षा का प्रभाव गहरा है। जब ज्ञान स्थानीय भाषाओं में उपलब्ध होता है तो सरकार और संस्थाएँ स्वास्थ्य योजनाओं को अधिक समावेशी और जनोन्मुख बनाने के लिए प्रेरित होती हैं। अंग्रेज़ी-आधारित साहित्य नीति-निर्माताओं और स्थानीय कार्यकर्ताओं के बीच दूरी उत्पन्न करता है, जबकि मातृभाषा में साहित्य नीति-निर्माताओं को यह विश्वास दिलाता है कि संदेश सीधे जनता तक पहुँच सकते हैं। इससे जन-जागरूकता अभियानों की सामग्री भी स्थानीय भाषाओं में उपलब्ध कराई जा सकती है, और नीति केवल शीर्ष-से-नीचे लागू न रहकर “जन-जन के संवाद” का स्वरूप ग्रहण कर सकती है।

अंतरराष्ट्रीय अनुभव भी इस दिशा में प्रेरणादायक हैं। जर्मनी, फ्रांस, रूस, स्पेन, जापान, चीन, कोरिया, ब्राज़ील और अर्जेंटीना जैसे देशों में चिकित्सा शिक्षा उनकी अपनी भाषाओं में दी जाती है। इन देशों के चिकित्सक वैश्विक स्तर पर प्रतिष्ठित हैं, जिससे यह सिद्ध होता है कि मातृभाषा आधारित शिक्षा उच्च गुणवत्ता बनाए रख सकती है। अंग्रेज़ी भले ही अनुसंधान और अंतरराष्ट्रीय सहयोग की भाषा बनी हुई हो, किंतु मूल शिक्षा मातृभाषा में देने की वैश्विक प्रवृत्ति स्थापित हो चुकी है, जो भारत के लिए अनुकरणीय है।
भारत के लिए आगे का रास्ता द्विभाषी शिक्षा प्रणाली हो सकता है। प्रारंभिक वर्षों में भारतीय भाषा और अंग्रेज़ी दोनों भाषाओं का समानांतर प्रयोग छात्रों को मातृभाषा में गहन समझ प्रदान करेगा और उन्हें अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रतिस्पर्धी भी बनाए रखेगा। इसके लिए एक राष्ट्रीय चिकित्सा शब्दावली आयोग की स्थापना आवश्यक है, जो सभी विषयों हेतु मानकीकृत हिन्दी शब्दावली तैयार करे। डिजिटल साधनों के प्रयोग से इस दिशा में उच्च गुणवत्ता वाले अनुवाद, डिजिटल सामग्री और स्पीच-टू-टेक्स्ट जैसे उपकरण विकसित किए जा सकते हैं। साथ ही अंग्रेज़ी में प्रकाशित शोध का नियमित हिन्दी व अन्य भारतीय भाषाओं में अनुवाद ‘ज्ञान के लोकतंत्रीकरण’ और ‘स्वास्थ्य के विकेन्द्रकरण’ की दिशा में महत्त्वपूर्ण होगा।
अंततः, यह स्पष्ट है कि तकनीक ने मातृभाषा आधारित चिकित्सा शिक्षा की राह में उपस्थित बाधाओं को काफी हद तक समाप्त कर दिया है। अब यह अवधारणा केवल एक आदर्श न रहकर व्यावहारिक यथार्थ बन चुकी है। मातृभाषा चिकित्सा शिक्षा को अधिक मानवीय संवेदना से जोड़ती है, चिकित्सक को रोगी के सामाजिक एवं सांस्कृतिक संदर्भों को समझने की क्षमता प्रदान करती है और समाज में स्वास्थ्य सेवा को अधिक समावेशी और प्रभावी बनाती है। यही प्रक्रिया भारत को आत्मनिर्भरता और वैज्ञानिक सशक्तिकरण की ओर अग्रसर करती हुई “अमृतकाल का आत्मनिर्भर भारत” के लक्ष्य को साकार करने में सहायक हो सकती है।
(लेखिका दंत चिकित्सक हैं तथा दिल्ली स्कूल ऑफ़ इकोनॉमिक्स से पीएच.डी. हैं। चिकित्सा और शिक्षा के क्षेत्र के साथ-साथ वे सामाजिक कार्यों में भी सक्रिय हैं)