पाठ्यक्रम-परिवर्तन की दिशा में ठोस पहल व प्रयास

 – प्रणय कुमार

किसी भी उदार, जीवंत, गतिशील एवं लोकतांत्रिक समाज में वांछित एवं युगीन परिवर्तन की प्रक्रिया सतत चलती रहती है। जड़ता एवं यथास्थितिवाद को बनाए रखने के आग्रह-आंदोलन वास्तव में विकास-विरोधी एवं प्रतिगामी विचार हैं। सच्ची प्रगतिशीलता का तो अर्थ ही समय, परिस्थिति, परिवेश एवं युगीन आवश्यकता के अनुरूप अपेक्षित एवं समाजोपयोगी परिवर्तन को स्वीकार करना है। परंतु दुर्भाग्य से कथित प्रगतिशीलता का दंभ भरने व दावा करने वाली सत्ताओं ने ही शिक्षा में परिवर्तन की हर पहल व पदचाप पर अनावश्यक विरोध जतलाया। जबकि शिक्षा तो परिवर्तन की सहज संवाहिका होनी चाहिए। शिक्षा के माध्यम से ही कोई भी राष्ट्र या समाज अपने आदर्शों-आकांक्षाओं, स्वप्नों-संकल्पों को मूर्त एवं साकार करता है। राष्ट्रीय हितों एवं युगीन सरोकारों की पूर्ति का सबसे समर्थ व सशक्त माध्यम ही शिक्षा है।

इसे शिक्षा-जगत की विडंबना ही कहेंगें कि कांग्रेस एवं वामपंथ पोषित शासन-व्यवस्था में शिक्षण संस्थाओं एवं विश्वविद्यालयों के शीर्ष पदों पर निष्पक्ष, योग्य एवं अनुभवी विद्वानों-विशेषज्ञों के स्थान पर दल एवं विचारधारा-विशेष के प्रति झुकाव एवं प्रतिबद्धता रखने वालों को अधिकाधिक वरीयता दी गई, परिणामतः संपूर्ण शिक्षा, कला एवं साहित्य जगत ही वैचारिक ख़ेमेबाजी एवं पृष्ठ-पोषित पूर्वाग्रहों का अड्डा बना रहा। इतिहास, सामाजिक विज्ञान एवं साहित्य की पाठ्य-पुस्तकों एवं पाठ्यक्रमों में चुन-चुनकर ऐसी विषय-सामग्री संकलित की गईं, जो हीनता की ग्रंथियाँ अधिक विकसित करती थीं तथा स्वत्व औ स्वाभिमान की भावना कम। इतिहास-लेखन एवं सामग्रियों के संकलन में पारंपरिक स्रोतों, प्राचीन शास्त्रों – वेदों-पुराणों-महाकाव्यों, उत्खनन से प्राप्त साक्ष्यों-सामग्रियों तथा तमाम तथ्यों की घनघोर उपेक्षा की गई। लोक-साहित्य, लोक-स्मृतियों एवं लोक-मान्यताओं को ताक पर रख दिया गया। विदेशी आक्रांताओं या उनके आश्रय में रहे व्यक्तियों-यात्रियों द्वारा लिखे गए विवरणों को ही इतिहास का सबसे प्रामाणिक स्रोत या आधार मानकर मिथ्या विमर्श गढ़े गए, मनमानी व्याख्याएँ की गईं, मनचाही स्थापनाएँ दी गईं। तर्कशुद्ध-तटस्थ चिंतन एवं वस्तुपरक विवेचन के स्थान पर पूर्व धारणाओं व मनगढ़ंत मान्यताओं को इतिहास की सच्ची घटनाओं की तरह प्रस्तुत एवं महिमा मंडित किया गया।

विचारणीय है कि सामाजिक विज्ञान, इतिहास, भाषा एवं साहित्य या अन्य कोई भी पाठ्य-पुस्तक कोई ‘आसमानी क़िताब’ अथवा समाज एवं राष्ट्र से नितांत निरपेक्ष या पृथक विषयवस्तु तो है नहीं कि उनमें कोई तथ्याधारित परिवर्तन संभव नहीं। हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि अध्ययन-अध्यापन को रोचक, व्यावहारिक, रोजगारपरक, प्रासंगिक एवं जीवनोपयोगी बनाए रखने की दृष्टि से भी पाठ्यक्रम में परिवर्तन की माँग वर्षों नहीं, दशकों से की जाती रही है। विद्यार्थियों एवं युवा वर्ग में स्वत्व-बोध, राष्ट्रबोध, नागरिक-बोध एवं कर्त्तव्य-बोध जागृत करने तथा प्रकृति, परिवेश, पर्यावरण, समाज एवं राष्ट्र के प्रति लगाव विकसित करने की आवश्यकता एवं महत्ता को भला कोई प्रबुद्ध व्यक्ति कैसे विस्मृत कर सकता है? बल्कि इतनी जागृति तो सर्वसाधारण समाज में भी रही है।

क्या इसमें भी कोई दो राय हो सकती है कि भाषा, साहित्य, इतिहास, राजनीति शास्त्र, दर्शन जैसे मानविकी के विभिन्न विषयों की पाठ्य-पुस्तकों के माध्यम से सांस्कृतिक एकता एवं अखंडता को मजबूती मिलनी चाहिए, भारतीय ज्ञान-परंपरा को पोषण मिलना चाहिए, अस्तित्ववादी विमर्श एवं विभाजनकारी प्रवृत्तियों पर विराम लगना चाहिए, सहयोग, समन्वय, संतुलन, सामाजिकता, संवेदनशीलता एवं देशभक्ति जैसे मूल्यों को प्रश्रय एवं प्रोत्साहन मिलना चाहिए, भारतीय संस्कृति में व्याप्त बहुलता, शांति एवं सह-अस्तित्व के मूल स्रोत की खोज व पहचान की जानी चाहिए। कैसी विचित्र विडंबना है कि हमारे बौद्धिक-राजनीतिक-अकादमिक विमर्श में ‘भारत वर्ष में व्याप्त विविधता में एकता’ का उल्लेख तो भरपूर किया जाता है, पर उस एकत्व को पोषण देने वाले मूल्यों, मान्यताओं, परंपराओं, प्रमुख घटकों, मंदिरों, मठों, तीर्थों, त्योहारों आदि की कोई चर्चा नहीं होती? क्या पाठ्यक्रम में इन्हें यथोचित स्थान नहीं मिलना चाहिए? कौन नहीं जानता कि इतिहास की हमारी पाठ्य पुस्तकों में विदेशी आक्रांताओं की अतिरंजित विवेचना की गई, सनातन भारत के साहस, संघर्ष एवं प्रतिरोध को अपेक्षाकृत कम महत्त्व दिया गया, संपूर्ण देश के वैशिष्ट्य एवं गौरवशाली अध्यायों की अपेक्षा केवल दिल्ली-केंद्रित इतिहास को केंद्र में रखा गया तथा देश के अमर सपूतों, बलिदानी धर्मरक्षकों, महान संतों, समन्वयवादी समाज-सुधारकों, साहसी क्रांतिकारियों, राष्ट्रनिष्ठ स्वतंत्रता सेनानियों को नेपथ्य में रख, दो-चार का महिमामंडन किया गया! क्या यह सत्य नहीं कि हमारी शिक्षा-व्यवस्था व पाठ्य-सामग्रियों में आलोचनात्मक विश्लेषण के नाम पर श्रद्धा, आस्था एवं विश्वास की तुलना में संदेह, अनास्था एवं अविश्वास को वरीयता दी गई? उसमें अधिकार भाव की प्रबलता रही, जबकि कर्त्तव्य-भाव गौण रहा। नैतिक मूल्यों एवं संस्कारों की उपेक्षा की गई तथा येन-केन-प्रकारेण अर्जित की जाने वाली सफलता को सर्वोच्च प्राथमिकता दी गई। परस्पर सहयोगी भावना विकसित करने के स्थान पर विद्यार्थियों में अंधी प्रतिस्पर्द्धा विकसित की गई। औपनिवेशिक मानसिकता, अस्मितावादी विमर्श एवं वर्गीय चेतना के प्रश्रय एवं प्रभाव में हीन भावनाओं, अलगाववादी वृत्तियों तथा पारस्परिक मतभेदों-असहमतियों-संघर्षों आदि को शिक्षा के माध्यम से दशकों तक पाला, पोसा व परवान चढ़ाया गया। मूल बनाम बाहरी, उत्तरी बनाम दक्षिणी, आर्य बनाम द्रविड़, राष्ट्रभाषा बनाम क्षेत्रीय भाषा, स्त्री बनाम पुरुष, व्यक्ति बनाम समाज, वर्गीय/जातीय/पांथिक अस्मिता बनाम राष्ट्रीय अस्मिता, परंपरा बनाम आधुनिकता, नगरीय बनाम ग्रामीण, मजदूर बनाम किसान, गरीब बनाम अमीर, उपभोक्ता बनाम उत्पादक, उद्योगपति बनाम सर्वहारा, मनुष्य बनाम प्रकृति, विकास बनाम पर्यावरण जैसी मिथ्या एवं कृत्रिम लड़ाइयाँ शिक्षा, साहित्य, कला व संस्कृति के माध्यम से खड़ी की गईं। परिवार, समाज एवं राष्ट्र की विभिन्न इकाइयों को परस्पर विरोधी मानने वाली ऐसी खंडित एवं विभेदकारी दृष्टि के स्थान पर, क्या शिक्षा-व्यवस्था में समन्वय और समग्रता पर आधारित भारतीय दृष्टि को स्थान नहीं मिलना चाहिए?

सच तो यह है कि हमारी पूरी शिक्षा-व्यवस्था व दशकों तक पढ़ाई जाती रही पाठ्य-सामग्रियों में जोड़ने वाले तत्त्वों का अभाव रहा और तोड़ने वाले तर्कों, कारकों, धारणाओं, पूर्वाग्रहों का प्रभाव रहा। इतना ही नहीं, अंग्रेजों के जाने के पश्चात भी हमें यही पढ़ाया जाता रहा कि रामायण-महाभारत गल्प हैं, वेद-वेदांग-गीता-उपनिषद-षड्दर्शन वायवीय एवं पारलौकिक हैं, भारत विभिन्न राष्ट्रीयताओं एवं अनेक संस्कृतियों का गठजोड़ है। अब कोई बताए कि ऐसे पाठ्यक्रमों को पढ़कर कैसे नागरिक, कैसे मतदाता, कैसे नौकरशाह, कैसे राजनेता, कैसे न्यायाधीश तैयार होते होंगें? पराए राग-रंग व सोच में आकंठ डूबे लोगों से स्व के साक्षात्कार व भारत के बोध की भला क्या और कितनी अपेक्षा की जा सकती है?

प्रश्न यह है कि क्या स्वतंत्र भारत की गौरवशाली यात्रा एवं उपलब्धियों को पाठ्यक्रम में सम्मिलित नहीं किया जाना चाहिए? क्या भारत की सफल लोकतांत्रिक यात्रा के क्रमिक सोपानों का उल्लेख पाठ्यक्रम में नहीं होना चाहिए? क्या आपातकाल के दौरान सर्वसाधारण एवं प्रबुद्ध नागरिकों द्वारा किए गए संघर्ष व झेली गई यातनाओं की व्यथा-कथा पढ़कर लोकतंत्र के प्रति भावी पीढ़ी की आस्था मजबूत नहीं होगी? क्या चंद्रयान, मंगलयान की सफलता की गाथा नहीं पढ़ाई जानी चाहिए? क्या उपग्रह, प्रक्षेपास्त्र, तकनीक, प्रौद्योगिकी, संचार, सैन्य एवं आर्थिक क्षेत्र की भारत की नित-नवीन उपलब्धियाँ वर्तमान के लिए प्रेरणादायी नहीं सिद्ध होंगीं? दुर्भाग्यपूर्ण है कि प्रयोग, अनुसंधान व व्यवहार की कसौटी पर कसे जाने वाले गणित और विज्ञान जैसे विषयों में भी बीते कई दशकों से परिवर्तन नहीं किए गए। हर दस-पंद्रह वर्ष में पीढ़ियाँ बदल जाती हैं, उसकी रुचि, सोच, स्वप्न, सरोकार व प्रेरणाएँ बदल जाती हैं तो क्या पाठ्यक्रम नहीं बदला जाना चाहिए? क्या पाठ्यक्रम एवं पाठ्यपुस्तकों का निर्माण करते समय युवा वर्ग की अभिरुचियों, अपेक्षाओं, आवश्यकताओं का ध्यान नहीं रखा जाना चाहिए?

विलंब से ही सही, पर अब जब एनसीईआरटी शिक्षा में वांछित सुधारों तथा पाठ्यक्रम एवं पाठ्य-पुस्तकों में अपेक्षित बदलावों को गति प्रदान करने का प्रयत्न कर रही है तो प्रतिगामी, जड़तावादी, वामपंथी एवं क्षद्म पंथनिरपेक्षतावादी शक्तियाँ अनावश्यक विरोध व विवाद पैदा कर रही हैं। सुखद है कि एनसीईआरटी ने सकारात्मक पहल करते हुए 7वीं कक्षा की इतिहास की पुस्तक से मुगलों और दिल्ली सल्तनत से जुड़े सभी संदर्भ हटाकर, उनकी जगह भारतीय परंपराओं, मगध, मौर्य, शुंग और सात वाहन जैसे प्राचीन भारतीय राजवंशों, पवित्र भूगोल, मेक इन इंडिया, महाकुंभ मेला, बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ जैसी सरकारी पहलों व अटल सुरंग जैसी सरकारी योजनाओं को शामिल किया है। यह पहल व परिवर्तन राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 एवं राष्ट्रीय पाठ्यचर्या रूपरेखा (एनसीएफ) की संस्तुति पर किया गया है।

इससे पूर्व कक्षा 10वीं, 11वीं और 12वीं के इतिहास एवं राजनीतिशास्त्र के पाठ्यक्रम से गुटनिरपेक्ष आंदोलन, शीतयुद्ध काल, विश्व राजनीति में अमेरिकी आधिपत्य, लोकतंत्र व विविधता, लोकतंत्र की चुनौतियाँ, मशहूर संघर्ष व आंदोलन, संस्कृतियों का टकराव, सेंट्रल इस्लामिक लैंड्स, अफ्रीकी-एशियाई देशों में इस्लामिक साम्राज्य की स्थापना, उदय एवं विस्तार, मुग़ल दरबारों का इतिहास और औद्योगिक क्रांति से जुड़े कतिपय अध्यायों को हटाकर कुछ अध्याय जोड़े गए थे। जोड़े गए अध्यायों के अंतर्गत 11वीं के इतिहास के पाठ्यक्रम में घुमंतु या खानाबदोश साम्राज्य (नोमेडिक एंपायर), 12वीं में ‘यात्रियों की नजरों से’ तथा ‘किसान, जमींदार और राज्य : कृषि समाज और मुगल साम्राज्य’ नामक अध्याय तथा राजनीतिशास्त्र में “समकालीन विश्व में सुरक्षा” नामक अध्याय के अंतर्गत “सुरक्षा : अर्थ और प्रकार, आतंकवाद”, “पर्यावरण और प्राकृतिक संसाधन” अध्याय के अंतर्गत ‘पर्यावरण आंदोलन, ग्लोबल वार्मिंग और जलवायु परिवर्तन, प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण” तथा “क्षेत्रीय आकांक्षाएँ” अध्याय के अंतर्गत ‘क्षेत्रीय दलों का उदय, पंजाब संकट, कश्मीर मुद्दा, स्वायत्तता के लिए आंदोलन’ जैसे शीर्षक (टॉपिक्स) सम्मिलित थे। वहीं 10वीं कक्षा में ‘खाद्य सुरक्षा’ पाठ के अंतर्गत पढ़ाया जा रहा पाठ “कृषि पर वैश्वीकरण के प्रभाव” तथा “धर्म, सांप्रदायिकता और राजनीति सांप्रदायिकता, धर्मनिरपेक्ष राज्य’ से फैज अहमद फैज की उर्दू में लिखी दो नज़्में भी हटाई गई थीं। गणित एवं विज्ञान के पाठ्यक्रम में से भी कुछ अध्याय हटाए गए थे और कुछ जोड़े गए थे। स्मरण रहे कि राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद (एनसीईआरटी) पाठ्यक्रम को रोचक, रचनात्मक, युक्तिसंगत, ज्ञानवर्धक, बोधगम्य, प्रासंगिक, समाजोपयोगी एवं युगानुकूल बनाने की दृष्टि से समय-समय पर उसमें वांछित परिवर्तन और संशोधन करती रही है। कई बार उसका उद्देश्य विद्यार्थियों पर से पाठ्यपुस्तकों का बोझ कम करना अथवा पाठ्यक्रम को अद्यतन बनाना भी होता है।

परंतु सेकुलरिज्म के झंडाबरदारों को समस्या केवल दिल्ली सल्तनत और मुगलों का पाठ हटाए जाने से है। कोई इनसे पूछे कि क्यों इतिहास की पाठ्यपुस्तकें इस ढ़ंग से लिखी गईं कि एक ओर जहाँ विद्यार्थियों को दिल्ली सल्तनत और मुगलों की पूरी-की-पूरी वंशावली याद रह जाती हैं, वहीं दूसरी ओर उनमें भारतीय राजवंशों एवं ज्ञान-परंपराओं के संदर्भ में सामान्य जानकारियों का भी अभाव देखने को मिलता है? वस्तुतः मध्यकालीन एवं आधुनिक भारत के इतिहास का पूरा-का-पूरा पाठ्यक्रम दिल्ली सल्तनत, मुगल वंश, ईस्ट इंडिया कंपनी, अंग्रेज शासकों-लॉर्डों-सेनानायकों एवं स्वतंत्रता-आंदोलन के नाम पर चंद नेताओं-परिवारों तक सीमित रखा गया।

देश केवल राज्य, राजधानी और उस पर आरूढ़ सुल्तानों-सत्ताधीशों एवं चंद चेहरों-परिवारों तक सीमित नहीं होता। उसमें और उससे संबंधित इतिहास में भूमि, नदी, पर्वत, वन, उपवन और उन सबसे अधिक सर्व साधारण जन और उनके संघर्ष, जय-पराजय, मान-अपमान के अनुभव, साझे सुख-दुःख आदि सम्मिलित होते हैं। परंतु सर्वसाधारण के दुःख-सुख और जन-गण-मन की बात तो दूर, हमारी पाठ्यपुस्तकों में प्रमुख व प्रभावशाली भारतीय राज्यों व राजवंशों, मसलन – मगध, मौर्य, गुप्त, चोल, चालुक्य, पाल, प्रतिहार, पल्लव, परमार, वाकाटक, विजयनगर, कार्कोट, कलिंग, काकतीय,  मैत्रक, मैसूर के ओडेयर, असम के अहोम, नागा, सिख, राष्ट्रकूट, शुंग, सातवाहन आदि की चर्चा भी बहुधा कम या नहीं के बराबर मिलती है। जबकि इनके सुदीर्घ शासन-काल में कला, साहित्य, संस्कृति का अभूतपूर्व विकास हुआ, अनेकानेक सुनियोजित नगर बसाए गए, यातायात को सुलभ बनाने की दृष्टि से लंबी-चौड़ी सड़कों के निर्माण कराए गए, दुनिया के अन्य देशों के साथ व्यापारिक-सांस्कृतिक संबंध विकसित हुए, सुविख्यात शिक्षण-केंद्र स्थापित किए गए, कला एवं स्थापत्य की उत्कृष्टता की दृष्टि से एक-से-बढ़कर-एक किले-मठ-मंदिर आदि निर्मित कराए गए। क्या इन सांस्कृतिक धरोहरों की जानकारी युवा पीढ़ी को नहीं दी जानी चाहिए?

यहाँ यह भी ध्यान रहे कि यूरोपीय दृष्टिकोण से लिखे गए इतिहास में राजाओं-सामंतों-आक्रांताओं को विशेष महत्त्व दिया जाता रहा है, जबकि भारत की दृष्टि तो सदा से ही आध्यात्मिक एवं सांस्कृतिक रही है। यहाँ लिखे गए पुराणों-महाकाव्यों से लेकर ऐतिहासिक महत्त्व के अन्य ग्रंथों एवं साहित्य आदि को पढ़कर कोई भी सहज ही यह अनुमान लगा सकता है कि इनका मूल उद्देश्य युद्धों-आक्रमणों आदि की अतिरंजित विवेचना न होकर, पाप-पुण्य, धर्म-अधर्म, सत्य-असत्य एवं करणीय-अकरणीय जैसे गूढ़ एवं जटिल प्रश्नों के उत्तर प्रस्तुत करना तथा परस्पर विरोधी प्रवृत्तियों की विवेचना कर, व्यक्ति-मन को अकर्मण्यता, द्वंद्व एवं शंकाओं से मुक्त करना है। हमारी इतिहास की पाठ्यपुस्तकों में इस भारतीय दृष्टि का भी अभाव परिलक्षित होता है।

प्रश्न यह भी महत्त्वपूर्ण है कि आख़िर मुगलों का महिमामंडन या उनसे संबंधित चयनित विषयवस्तुओं का ही पठन-पाठन क्यों आवश्यक होना चाहिए? क्या इसमें भी कोई दो मत हो सकता है कि मुग़ल विदेशी आक्रांता थे और उन्होंने सदैव भारत से विलग अपनी पृथक पहचान को न केवल जीवित रखा, अपितु बढ़ा-चढ़ाकर उसे प्रस्तुत भी किया? उनका हृदय भारत और भारतीयों से अधिक, जहाँ से वे आए थे, वहाँ के लिए धड़कता था। उन्होंने भारत से लूटे गए धन का बड़ा हिस्सा समरकंद, खुरासान, दमिश्क, बगदाद, मक्का, मदीना जैसे शहरों एवं वहाँ के विभिन्न घरानों एवं इस्लामिक ख़लीफ़ा आदि पर खर्च किया। वे स्वयं को तैमूरी या गुरकानी राजवंश से जोड़कर देखते थे। जिस तैमूर ने तत्कालीन विश्व की लगभग 5 प्रतिशत आबादी का कत्लेआम किया, जिसने दिल्ली में लाखों निर्दोष हिंदुओं का अकारण ख़ून बहाया, वे उससे जुड़ा होने में गौरव का अनुभव करते थे। भारत आने के पीछे भी उनका कोई महान उद्देश्य न होकर लूट-खसोट की भावना ही प्रबल थी। यहाँ बसने के पीछे भी उनका मक़सद ऐशो-आराम एवं शानो-शौक़त की ज़िंदगी बसर करना और अपना तिज़ोरी भरना ही रहा, न कि कतिपय बुद्धिजीवियों-इतिहासकारों-फिल्मकारों के शब्दों में कथित तौर पर भारत का निर्माण करना। बल्कि सच्चाई तो यह है कि बाबर भारत और भारतीयों से इतनी घृणा करता था कि मरने के बाद उसने स्वयं को भारत से बाहर दफ़नाए जाने की इच्छा प्रकट की थी। अधिकांश मुगल बादशाह अत्यंत व्यसनी, विलासी एवं मदांध थे। नैतिकता, चारित्रिक शुचिता एवं आदर्श जीवन-मूल्यों के पालन आदि की कसौटी पर वे भारत के परंपरागत राजाओं की तुलना में पासंग बराबर भी नहीं ठहरते। राजकाज, सुशासन एवं सुव्यवस्था से अधिक वे अपने अजब-गज़ब फैसलों एवं तानाशाही फ़रमानों के लिए याद किए जाते हैं। उनमें से कइयों ने अकारण अपनी राजधानी बदली, उसकी प्रसिद्धि एवं भव्यता के लिए पानी की तरह पैसा बहाया।

बहादुरशाह जफ़र जैसे चंद अपवादों को छोड़कर अधिकांश मुग़ल बादशाह मज़हबी कट्टरता में आकंठ डूबे रहे। बहुसंख्यकों पर उन्होंने बहुत ज़ुल्म ढाए। उनके शासन-काल में मठों एवं मंदिरों का ध्वंस किया गया, भगवान के विग्रह तोड़े गए, पुस्तकालयें जलाईं गईं। मुगलों ने ताक़त एवं भय के बल पर हिंदुओं का बड़े पैमाने पर ज़बरन मतांतरण कराया। सिख गुरुओं, गुरु-पुत्रों एवं तमाम जैन-बौद्ध व हिंदू संतों के विरुद्ध तो उन्होंने हिंसा एवं बर्बरता की सारी सीमाएँ पार कर दीं। मुग़ल-काल में हिंदुओं को स्वधर्म का पालन करने एवं तीर्थयात्राओं आदि के लिए भी भारी कर चुकाना पड़ता था, जिसे हम जज़िया कर के रूप में जानते-पढ़ते हैं। कुल मिलाकर एक भी मुग़ल बादशाह ने प्रजा-हित या लोक-कल्याण की भावना से राज-काज चलाया हो, इतिहास में इसका दृष्टांत लगभग नगण्य है।

कथित गंगा-जमुनी तहज़ीब के पैरोकार एवं पंथनिरपेक्षता के झंडाबरदार अकबर को महानतम शासक बताते नहीं थकते, पर वे यह नहीं बताते कि उसने चितौड़ का दुर्ग जीतने के बाद वहाँ उपस्थित 40,000 निःशस्त्र एवं निर्दोष हिंदुओं को मौत के घाट उतरवा दिया था। अकबर, जहाँगीर एवं शाहजहाँ आदि को इतिहास से लेकर साहित्य और सिनेमा में भी आदर्श प्रेमी की तरह प्रस्तुत किया जाता है, जबकि सच्चाई यह है कि उनके हरम में हजारों स्त्रियाँ बंदी बनाकर या जबरन लाई जाती थीं और वे असहनीय यातनाएँ एवं कलहपूर्ण स्थितियाँ झेलने को अभिशप्त होती थीं। अबुल फजल के मुताबिक अकेले अकबर के हरम में 5000 औरतें थीं, जिनमें से अधिकांश राजनीतिक संधियों या युद्ध में जीत के बाद उसे उपहार स्वरूप मिली थीं।

मुगलों के काल में कला, वास्तु, स्थापत्य, भवन-निर्माण आदि के विकास का यशोगायन करते समय इस तथ्य की नितांत उपेक्षा कर दी जाती है कि जहाँ से वे आए थे, उन क्षेत्रों में कला या निर्माण के ऐसे एक भी तत्कालीन नमूने या उदाहरण देखने को नहीं मिलते। क्या यह इस बात का प्रमाण नहीं कि जिन्हें हम मुगलों की देन कहते नहीं थकते, दरअसल वे भारत के शिल्पकारों, वास्तुविदों, कारीगरों, कलाकारों की पारंपरिक एवं मौलिक दृष्टि, खोज व कुशलता के परिणाम हैं? ऐसा भी नहीं कि मुग़ल सदा अपराजेय रहे या संपूर्ण भारतवर्ष पर ही उनका आधिपत्य रहा। उन्हें अनेक युद्धों में हार या असफलता मिली। उन्हें निरंतर विरोध झेलना पड़ा। प्रभाव, विस्तार एवं शासनावधि की दृष्टि से भी अनेक भारतीय राजवंश उनसे कहीं आगे हैं।

निष्कर्षतः यह कहा जा सकता है कि केवल दिल्ली सल्तनत या मुग़ल केंद्रित ही नहीं, अपितु सच्चा समग्र, संतुलित और संपूर्ण भारतवर्ष का इतिहास पढ़ाना समय व समाज की माँग है। एक ऐसा इतिहास जिसे पढ़कर नई पीढ़ी को स्व, स्वत्व व स्वाभिमान की प्रेरणा मिले। इस दिशा में किए जाने वाले एनसीईआरटी के सभी प्रयासों का मुक्त हृदय से स्वागत किया जाना चाहिए।

(लेखक शिक्षाविद एवं वरिष्ठ स्तंभकार है।)

और पढ़ें : पाठ्यपुस्तकों में अप्रकट सच्चे भारतीय राष्ट्रनायक 

One thought on “पाठ्यक्रम-परिवर्तन की दिशा में ठोस पहल व प्रयास

  1. सारगर्भित, विवेक पूर्ण लेख
    पाठ्यक्रम,पुस्तकें ऐसे लेखों के अमृत मंथन से पुष्ट हों‌
    ऐसा होना अवश्यंभावी है

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