ज्ञान की बात 44 (संस्कार – प्रक्रिया)

 – वासदेव प्रजापति

संस्कार परम्परा के अन्तर्गत अब तक हमने मनोवैज्ञानिक सन्दर्भ में, सामाजिक व सांस्कृतिक सन्दर्भ में तथा पारम्परिक कर्मकांड के सन्दर्भ के संस्कारों को जाना। आज हम ये सभी संस्कार होते कैसे हैं? अथवा संस्कार करने की प्रक्रिया क्या होती है? यह समझने का प्रयत्न करेंगे। किन्तु उससे पूर्व एक संस्कार-कथा का रसपान कर लेते हैं –

संस्कारों से बना भगवान का भक्त

भगवान के अनेक भक्त हैं। ऐसे भक्तों में एक परमभक्त हुआ है, प्रह्लाद। प्रह्लाद की जीवन कथा अनूठी है। सामान्य सिद्धांत यही है कि दैत्यों के घर दैत्य संतान और देवों के घर देव संतान होती आई है। परन्तु प्रह्लाद के सम्बन्ध में ऐसा नहीं है। प्रह्लाद दैत्य राजा हिरण्यकशिपु का पुत्र था। उसके घर में उसके परम शत्रु भगवान विष्णु के भक्त का जन्म होना निश्चय ही घोर आश्चर्य का विषय है। ऐसी अनहोनी आखिर हुई कैसे? यह जानने के लिए प्रह्लाद के जन्म की कथा जाननी होगी।

प्रह्लाद के चाचा थे हिरण्याक्ष, उनकी मृत्यु भगवान विष्णु के हाथों हुई थीं। भाई की मृत्यु का बदला लेने तथा स्वयं अमर बनने के लिए हिरण्यकशिपु ने तपस्या करने का निश्चय किया और मन्दराचल पर चला गया। पीछे देवताओं ने सुअवसर जान दैत्यपुरी पर आक्रमण कर दिया। दैत्य अपने राजा के अभाव में पराजित हो गए और अपने स्त्री-पुत्रों को छोड़कर प्राण बचाने के लिए इधर-उधर भाग गए।

देवराज इन्द्र को ज्ञात हुआ कि हिरण्यकशिपु की पत्नी कयाधु गर्भवती है और इस समय अकेली है। वे कयाधु को ले आए और अपने साथ अमरावती ले जाने लगे। मार्ग में उन्हें महर्षि नारद मिले, नारदजी ने इन्द्र से पूछा आप इस साध्वी स्त्री को कहाँ ले जा रहे हैं? इन्द्र ने बताया, यह स्त्री हमारे शत्रु हिरण्यकशिपु की पत्नी है और गर्भवती हैं। इसके जो पुत्र होगा, वह भी दैत्य होगा और हमारा शत्रु होगा। इसलिए मैं उसे मारकर दैत्य वंश ही समाप्त कर दूंगा। नारद जी ने इन्द्र को डाँटते हुए कहा, आपको क्या पता कि इसकी कोख में पलने वाला बालक कौन है? मैं बताता हूँ यह बालक भगवान का परमभक्त होगा, इसलिए तुम कयाधु को छोड़ दो। इन्द्र ने नारदजी के कहने पर कयाधु को छोड़ दिया।

तब नारदजी ने उससे कहा- बेटी कयाधु! अब तुम अकेली कहाँ रहोगी? ऐसा करो जब तक तुम्हारे पति लौटकर नहीं आ जाते तब तक तुम मेरे आश्रम में रहो। कयाधु नारदजी के साथ उनके आश्रम आ गई और वहीं रहने लगीं। नारद जी तो त्रिकालदर्शी थे, वे तो कयाधु की कोख में पल रहे बालक का भूत-भविष्य सब जानते थे। वे यह भी जानते थे कि गर्भावस्था में माँ को दिए गए संस्कार बालक को प्राप्त होते हैं और स्थायी रहते हैं। उन्हें तो बालक को भगवान का परम भक्त बनाना है, अतः नारदजी ने कयाधु के माध्यम से उस बालक में भगवद्भक्ति के संस्कार भरने प्रारम्भ किए।

नारदजी का आश्रम प्रकृति की गोद में बसा था, वृक्ष, लताओं व पुष्पों की छटाएँ निराली थीं। पक्षियों की कलरव, मयूरों के नृत्य और हरिण व खरगोश की उछल-कूद मन को मोह लेती थीं। ब्रह्मचारियों का इधर-उधर आना-जाना, वेद मंत्रों का पाठ,नित्य हवन-यज्ञ से सुरभित संस्कारक्षम वातावरण जैसा यहाँ था, वैसा राज महल में कहाँ? इसलिए कयाधु का मन इस सुरम्य आश्रम में लग गया और वे आनन्दपूर्वक अपना समय बिताने लगीं। ऐसे आनन्दमय वातावरण में नारद जी प्रतिदिन कयाधु को भगवद्भक्ति का उपदेश करते। शेष समय में कयाधु आश्रम के अन्य साधुओं की सेवा-सुश्रूषा में लगी रहतीं।

आश्रम के संस्कारमय वातावरण में बालक प्रह्लाद का जन्म हुआ। जन्म से ही उसे भगवद्भक्ति का वातावरण मिला। प्रसन्नमना माता की ममता की छाँव तथा देवर्षि नारद के संरक्षण में प्रह्लाद बड़ा हुआ और भगवान का प्रिय भक्त बना। उसकी माँ कयाधु को गर्भावस्था में मिले दृढ़ संस्कारों के परिणामस्वरूप ही भक्त प्रह्लाद अपने पिता के द्वारा दिए गए सब प्रकार के कष्टों को झेलता हुआ प्रभु सत्ता को स्थापित करने में सफल हुआ।

शिशु अवस्था में अधिक संस्कार

एक शिशु अपने जन्म से पूर्व गर्भावस्था में ही संस्कार ग्रहण करने लग जाता है। संस्कार ग्रहण करने की क्षमता पांच वर्ष की आयु तक सर्वाधिक होती है। संस्कार ग्रहण करने के सम्बन्ध में दूसरी विशेष बात यह कि जितनी कम आयु ग्रहणशीलता उतनी अधिक होती है। उदाहरण के लिए चार वर्ष का शिशु जितनी तीव्रता के साथ संस्कार ग्रहण करता है, उसकी तुलना में दो वर्ष का शिशु अधिक तीव्रता से और दस दिन का शिशु उससे भी तीव्र गति से तथा गर्भावस्था में सर्वाधिक तीव्र गति से संस्कार ग्रहण करता है। इसलिए गर्भावस्था के संस्कारों की कथाएँ, जैसे – अभिमन्यु, अष्टावक्र और प्रह्लाद इसके श्रेष्ठ उदाहरण हैं।

गर्भावस्था में संस्कार

भारतीय मनीषियों की मान्यता है कि जब पति-पत्नी के मन में संतान की इच्छा जाग्रत होती है, तब से ही उस संतान के चरित्र का गठन शुरू हो जाता है। भावी माता-पिता की भावनाएँ, विचार, महत्त्वाकाक्षाएं आदि उस संतान के चरित्र का आधार बनते हैं।

सबसे प्रमुख बात यह है कि वासना और उत्तेजना के वशीभूत होकर अनायास गर्भाधान हो जाता है, अथवा संतान चाहिए इस भावना से प्रेरित होकर सम्पूर्ण मनोयोग पूर्वक संस्कारात्मक पूर्व तैयारी के साथ गर्भाधान किया जाता है। इन दोनों बातों का भावी संतान के चरित्र गठन पर प्रभाव होता है। भारतीय परम्परा में विवाह एक संस्कार है। विवाह मात्र काम-वासना की पूर्ति हेतु नहीं होता, अपितु संतान प्राप्ति हेतु, पितृ ऋण से उऋण होने हेतु तथा वंश परम्परा को आगे बढ़ाने के लिए होता है। इस मानसिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक पृष्ठभूमि में जब गर्भाधान होता है, तब संतान के सम्पूर्ण जीवन की नींव सही बनती है।

बालक जब माँ की कोख में होता है, तब वह माता के माध्यम से ही खाना-पीना व संस्कार ग्रहण करता है। इस अवस्था में माता क्या खाती है, कितनी व कैसी निद्रा लेती है, टीवी पर कैसे दृश्य देखती है, आने वाली संतान के विषय में क्या सोचती है, उसके साथ कैसा वार्तालाप करती है तथा माता की रुचि-प्रवृत्ति कैसी है? इन सभी बातों का कोख में पल रही संतान पर सीधा-सीधा प्रभाव होता है। उदाहरण के लिए यदि माता तामसी भोजन करती है तो वह संतान भी तामसी प्रकृति की होती है। यदि माता अच्छे ग्रंथ पढ़ती है, अच्छे विचार करती है, सत्संग व सेवा करती है तो उसकी संतान सात्त्विक और तेजस्वी होती है। आज इस तथ्य की घोर उपेक्षा की जा रही है, जबकि आवश्यकता इस तथ्य को स्वीकार कर तदनुसार चलने की है।

शिशु के जन्म के समय वातावरण शान्त, सुन्दर व पवित्र होना चाहिए। सबसे पहले शिशु को कौन स्पर्श करता है, उसे कैसी ध्वनि सुनने को मिलती है, उसे क्या दिखलाई पड़ता है और कौन सा स्वाद चखाया जाता है? इन सभी बातों का बहुत महत्त्व है। इस समय उसकी ज्ञानेन्द्रियाँ स्वतन्त्र रूप से प्रथम अनुभव प्राप्त कर रही होती हैं। यह प्रथम अनुभव बहुत गहरे संस्कार करता है। यह न केवल अन्धश्रद्धा या कर्मकांड है अपितु पूर्णतया वैज्ञानिक व मनोवैज्ञानिक हैं।

निद्रा व जागरण के संस्कार

यह मनोवैज्ञानिक सत्य है कि शिशु रात्रि में जैसे वातावरण में, जो-जो देखते व सुनते हुए होता है, वैसे ही उसे स्वप्न आते हैं, उसके भाव और विचार बनते हैं। टीवी की तीखी आवाज, तेज रोशनी, भड़कीले रंग और उत्तेजनापूर्ण दृश्यों से उस पर विपरीत संस्कार बनते हैं। इसके स्थान पर शांत वातावरण, मंद प्रकाश, माता का प्रेमपूर्ण स्पर्श, मधुर स्वर और संस्कारयुक्त लोरी अथवा कहानी अनुकूल संस्कार डालते हैं।

इसी प्रकार प्रात:काल जगाते समय प्रभाती के स्वर, माता का स्नेहमयी स्पर्श मिलता है तो शिशु का मन प्रसन्न रहता है। संसार के अनेक महापुरुषों ने अपने अनुभव बताएं हैं कि उनकी अनपढ़ किन्तु सात्विक प्रकृति वाली माँ ने शैशवास्था में भजन, कहानी, स्तोत्र व लोरी आदि सुनाकर हमारा चरित्र गढ़ा है। सोते समय की अशांति और जागने के समय की हड़बड़ी शिशु के चित्त पर बहुत ही विपरीत प्रभाव डालती है।

मातृहस्तेन भोजनं के संस्कार

छोटों को ही नहीं, बड़ों को भी अपनी माता के हाथ का भोजन अत्यधिक प्रिय होता है। क्योंकि यह भोजन शरीर को पुष्ट व मन को तुष्ट करने वाला होता है। भोजन बनाते समय बनाने वाले के मन के भाव और विचार के अनुसार खाने वाले पर भोजन के संस्कार होते हैं। इसलिए अच्छे मन से बनाना और प्रेमपूर्वक खिलाना संसार का सबसे महत्त्वपूर्ण कार्य है और यह कार्य माँ से बढ़कर और कोई नहीं कर सकता। अतः मातृहस्तेन भोजनं का संस्कार रोपण में महत्त्वपूर्ण भाग होता है। आज दुनिया की सभी माताओं को इसका महत्त्व जानने व समझने की आवश्यकता है।

पंचमहाभूतों के संस्कार

शिशु का शरीर पंचमहाभूतों का बना है। यह शरीर अपने आपको अभिव्यक्त करने का माध्यम है। हम इस शरीर से ही सब प्रकार के कार्य-व्यवहार पूर्ण करते हैं। इसलिए हमारे पूर्वजों ने कहा है – शरीरमाद्यं खलु धर्मसाधनं। प्रत्येक शिशु में इन पंचमहाभूतों के निकट सम्पर्क में रहने की स्वाभाविक इच्छा होती है। उसे मिट्टी व पानी में खेलना अच्छा लगता है, उसे खुले में रहना पसन्द है। यही कारण है कि प्राकृतिक वातावरण में हवा, पानी, मिट्टी तथा सूर्य प्रकाश के सीधे सम्पर्क में रहने से उसका चित्त सन्तुलित वह प्रसन्न रहता है। उसके व्यक्तित्व का समुचित विकास होता है। आज के शिक्षित अभिभावकों को भय लगता है कि शिशु गंदा हो जायेगा, बीमार पड़ जायेगा अथवा उसे विषाणु लग जायेंगे। आवश्यकता केवल सावधानी रखने व भय दूर करने की है, शिशु को रोकने की नहीं।

यह हमारी संस्कार प्रक्रिया है, ये संस्कारों के कारक तत्त्व हैं। हम जानते हैं कि संस्कार निर्माण का प्रमुख केन्द्र घर है। संस्कार बालक के माता-पिता एवं परिजनों के माध्यम से होते हैं। अतः घर ही सर्वश्रेष्ठ संस्कार केन्द्र है और माता-पिता ही श्रेष्ठ संस्कारकर्ता हैं। पहले शिशु को पांच या छः वर्ष की आयु होने तक विद्यालय नहीं भेजते थे, घर पर ही रखकर उन्हें संस्कारित करते थे। आज यह ज्ञान और उसका भान खण्डित हो गया, इसलिए संस्कार दिए ही नहीं जाते। यह आज की पीढ़ी की बहुत बड़ी समस्या है। इसे दूर करने के लिए संस्कार-शास्त्र को शिक्षा के माध्यम से प्रचलित करने की महती आवश्यकता है।

(लेखक शिक्षाविद् है, भारतीय शिक्षा ग्रन्थमाला के सह संपादक है और विद्या भारती संस्कृति शिक्षा संस्थान के सह सचिव है।)

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