॥ शरण्यां शिवदां शिवाम् ॥
या श्री: स्वयं सुकृतिनां भवनेष्वलक्ष्मी:,
पापात्मनां कृतधियां हृदयेषु बुद्धि:।
श्रद्धा सतां कुलजनप्रभवस्य लज्जा,
त्वां त्वां नता: स्म परिपालय देवि विश्वम्॥
(श्री दुर्गा सप्तशती ४/५)
जो सुकृत्य करने वालों के घर में लक्ष्मी रूप में, पापात्मा के घर दरिद्रता रूप में, शुद्ध अंतःकरण वालों के हृदय में विवेकयुक्त बुद्धि रूप में, सज्जनों में श्रद्धा रूप में तथा कुलीनजनों में लज्जा रूप में विराजमान हैं, ऐसी देवी भगवती को प्रणाम है। हे देवि! आप सम्पूर्ण विश्व का परिपालन कीजिए।
कहां और किस स्वरूप में निवास करती हैं भगवती, इस श्लोक में वर्णन किया गया है। वह सब व्यक्तिगत गुणों पर आधारित है। परन्तु अंत में, ‘त्वां त्वां नता: स्म’ में नमन करने तक तो ठीक, ‘परिपालय देवि विश्वम्’ क्यों जोड़ना? मेरे घर में इस रूप में रहो, यह इच्छा रखना तो सही है किन्तु विश्व का परिपालन? यह किसी साधक की चिंता का विषय क्यों होना चाहिए ?
भारत में ज्ञान का उद्देश्य तीन स्तरों पर कहा गया है। सबसे ऊपरी स्तर है, विश्व का कल्याण। शिक्षा की व्यवस्था ज्ञानार्जन प्रक्रिया में सहायक है। हम सुनते हैं कि शिक्षा रोजगारपरक होनी चाहिए अर्थात् जीविका उपार्जन और परिवार के पालन-पोषण और वित्तीय आवश्यकताओं की पूर्ति करने में सहायक। कहा गया,”विद्या अर्थकरी यश: सुखकरी”! परन्तु क्या शिक्षा द्वारा अर्जित ज्ञान का एकमात्र उद्देश्य पेट पालने योग्य बन जाने तक सीमित है? भारतीय तत्व चिंतन में ज्ञान के इस प्रथम लक्ष्य को अत्यंत व्यापक स्वरूप में वर्णित किया गया है – विश्व का कल्याण।
आज का विद्यार्थी विश्व का कल्याण करने में सक्षम कैसे हो सकता है? ‘उद्देश्य’ का शाब्दिक अर्थ है ‘उच्च दिशा की ओर संकेत’। यह आज ही पूरा हो जाएगा, आवश्यक नहीं परन्तु आज के विद्यार्थी की मानसिक सिद्धता कि उसे विश्व का कल्याण करने में सक्षम बनना है, के लिए आज से यह लक्ष्य उसके सम्मुख प्रस्तुत करना होगा।
मोहल्ले-बस्ती के मंदिर में या घर-परिवार में सुबह-शाम होने वाली नियमित-नैमित्तिक पूजा की प्रक्रिया में अंत में नैवेद्य और आरती का क्रम आता है। आरती के बाद जयघोष होता है। परमात्मा के विभिन्न स्वरूपों और देवी-देवताओं की जय-जयकार की पूर्णता होती है चार स्थायी जयघोषों से – “धर्म की जय हो। अधर्म का नाश हो। प्राणियों में सद्भावना हो। विश्व का कल्याण हो!
जयकारा बुलवाने वाले पुरोहित जी और प्रत्युत्तर देने वाले उपस्थित भक्तों ने शिक्षाशास्त्र नहीं पढ़ा-पढ़ाया होगा, वेद-उपनिषद के अध्येता नहीं होंगे, बड़े ज्ञानी-विज्ञानी, संत-महात्मा नहीं होंगे, फिर भी उनके मानस पटल पर प्रतिदिन एक संस्कार अंकित हो रहा है – विश्व का कल्याण हो। यह केवल शब्द का संस्कार नहीं, साथ में इसके उपाय और हमारी भूमिका के संकल्प के रूप में, विश्व के कल्याण की पूर्व – शर्त के रूप में बताया जाता है – प्राणियों में सद्भावना हो।
प्राणियों के बीच सद्भावना के बिना विश्व कल्याण की कल्पना करना संभव है क्या? देशों – प्रदेशों – सभ्यताओं – जातियों – संप्रदायों – भाषाओं – लिंगों – परिवारों के मध्य यदि विभेद हैं, विरोध है, शत्रुभाव है, प्रतिशोध के प्रयास हैं अथवा ‘मेरे विचार के अनुरूप चलो तो ठीक अन्यथा तुम्हें जीवित रहने का अधिकार नहीं’… यदि ऐसा वातावरण होगा तो विश्व कल्याण का उद्देश्य सफल हो सकता है क्या? वैमनस्य, हिंसा, विद्वेष से कल्याण या विकास संभव नहीं हो सकता।
विश्व कल्याण के उच्चतम लक्ष्य और उसकी प्राथमिक शर्त प्राणियों में सद्भावना से जुड़ा है, भारतीय ऋषि – मनीषियों द्वारा बताया गया ज्ञान का दूसरा उद्देश्य – राष्ट्र की उन्नति। भारतीय मनीषा ने राष्ट्र को भौगोलिक क्षेत्र या राजनीतिक इकाई, भूखण्ड मात्र नहीं माना। “माताभूमि: पुत्रोऽहं पृथिव्या:” ( अथर्ववेद) की भावना के अनुसार यह मातृभूमि जीवंत सांस्कृतिक इकाई है। पश्चिम से प्राप्त राष्ट्र-राज्य सिद्धांत (Nation – State Theory) के अनुसार जो राज्य है, वही राष्ट्र है, यह अवधारणा भारत में स्वीकार्य नहीं है। पिछले लगभग एक हजार वर्षों में अनेक आक्रांता आए, कुछ केवल लूट-पाट करके चले गए, कुछ ने किसी क्षेत्र में सत्ता भी स्थापित कर ली। अंग्रेजी राज्य प्रायः दो सौ वर्ष रहा परन्तु राष्ट्र तो भारत ही था, राज्य भले ही ब्रिटिश रहा हो।
यह राष्ट्र मेरा है, इसके प्रति मेरा कर्तव्य है, इसकी सुरक्षा तथा प्रगति में योगदान करने का दायित्व मेरा है, इस प्रकार का भाव जागरण करना, शिक्षा का उद्देश्य है। इस राष्ट्र का भविष्य ही मेरा भविष्य है, इसकी आर्थिक-सामाजिक स्थिति में प्रगति से ही मेरी प्रगति है, इस धारणा को पुष्ट करने वाली शिक्षा की आवश्यकता है। एक सुरक्षित – समृद्ध – समरस – सर्वांग सुन्दर – आत्मनिर्भर राष्ट्र के रूप में विकसित करने में मेरी भूमिका क्या रहेगी, इसकी स्पष्ट संकल्पना देने वाली शिक्षा ही वास्तविक स्वरूप है शिक्षा का।
पहले दोनों उद्देश्य, अर्थात् विश्व का कल्याण तथा राष्ट्र की उन्नति के लिए जो आवश्यकता है, वही भारत के चिंतन के अनुसार शिक्षा का तीसरा उद्देश्य है, इस सोपान की सबसे निचली सीढ़ी है और जिसके माध्यम से ये दोनों उद्देश्य पूर्ण होने हैं, वह है, ‘राष्ट्र के नागरिकों के व्यक्तित्व का सर्वांगीण और समग्र विकास।’
यहां दो शब्दों का उल्लेख है – ‘सर्वांगीण’ और ‘समग्र’। भारतीय तत्व चिंतन में सर्वाङ्गीण विकास की संकल्पना पंचकोशात्मक विकास के रूप में बताई गयी है – अन्नमयकोश (शरीर), प्राणमयकोश ( प्राणशक्ति ), मनोमयकोश (मन), विज्ञानमयकोश ( बुद्धि) तथा आनन्दमयकोश (आत्मशक्ति)। इन सबका समेकित विकास ही व्यक्ति के व्यक्तित्व का सर्वाङ्गीण विकास है।
यह एक व्यक्ति का व्यक्तिगत विकास तो हुआ किन्तु इससे अन्य सबका क्या सम्बन्ध? इस व्यापक दृष्टिकोण के साथ समग्र विकास की संकल्पना जुड़ी – व्यष्टिगत – समष्टिगत – सृष्टिगत – परमेष्ठीगत विकास अर्थात् व्यष्टि (व्यक्ति) के स्वयं के व्यक्तित्व का विकास एकांगी नहीं हो सकता, वह फलीभूत होना चाहिए अर्थात् उसके माध्यम से उसके परिवार, समष्टि (समाज), संपूर्ण चराचर सृष्टि – जीव-जगत , वृक्ष -वनस्पति, वायु- जलस्रोत, पर्यावरण आदि का संरक्षण – संवर्द्धन हो और अंततः परमेष्ठि के समरूप बनने यानी दैवीय गुणों का विकास करने में सक्षम हो। यह ज्ञान अर्जन के माध्यम से समग्र विकास की प्रक्रिया है।
तैत्तिरीय उपनिषद् (१/३) में कहा गया –
“सह नौ यश:। सह नौ ब्रह्मवर्चसम्।” अर्थात् हम दोनों (गुरु-शिष्य) का यश एक साथ बढ़े। हम दोनों का ब्राह्मतेज एक साथ बढ़े। विद्या के साधक हम सबके अध्ययन-अभ्यास से हमारा यश और ब्रह्मवर्चस में अभिवृद्धि हो, यही प्रार्थना उस ‘सर्वमंत्रमयी सत्ता सत्यानंदस्वरूपिणी’ के श्रीचरणों में।
ज्ञान मार्ग में आपका सहयात्री,
– अवनीश भटनागर
(लेखक विद्या भारती के अखिल भारतीय उपाध्यक्ष है।)