वन्देमातरम् का 150वां जयन्ती वर्ष – भाग दो

– वासुदेव प्रजापति

कांग्रेस अधिवेशनों में वन्देमातरम् गान

यह बात सबके ध्यान में रखने योग्य है कि आनंदमठ के प्रकाशन के पूर्व ही संपूर्ण बंगाल में वंदे मातरम् गीत का प्रचार हो चुका था। इस गीत को प्रथम स्वर दिया था रविंद्र नाथ ठाकुर के संगीत शिक्षक श्री यदु भट्ट ने। इसी धुन पर  स्वयं बंकिम बाबू और उनके मित्र यह गीत गाया करते थे। तत्पश्चात सन 1886 में ठाकुर परिवार की ‘बालक पत्रिका’ में श्रीमती प्रभा सुंदरी देवी रचित स्वरलिपि प्रकाशित हुई थी। सन् 1889 में कलकत्ता में हुए कांग्रेस अधिवेशन में बंकिम के साथी कवि हेमचन्द्र ने अपनी कविता ‘राखी’ में वन्देमातरम् का कुछ भाग जोड़कर गाया था। स्वयं कविगुरु रवींद्रनाथ ने 1896 में कांग्रेस अधिवेशन में वंदेमातरम् अपनी ही स्वरलिपि में गया था। सन् 1901 के बाद तो नियमित रूप से कांग्रेस के अधिवेशन में पूरा वंदेमातरम् गाया जाता रहा। पहली बार सन 1923 के काकीनाड़ा अधिवेशन में अध्यक्ष मौलाना मोहम्मद अली ने आपत्ति की। अध्यक्ष की आपत्ति के पश्चात भी देशभक्त पंडित विष्णु दिगंबर पलुस्कर ने पूरा वंदेमातरम् उल्लास पूर्वक गाया था। अध्यक्ष मोहम्मदअली वंदेमातरम् गान के शुरु होते ही उठकर पंडाल से बाहर चले गए और जब गान पूरा हुआ, तब आकर पुनः अध्यक्ष की कुर्सी पर बैठ गए। उपस्थित किसी भी व्यक्ति ने अध्यक्ष के इस अशोभनीय आचरण के लिए नहीं टोका। सभी लोग स्तब्ध तो थे, अध्यक्ष की इस आपत्ति ने भारत के मुसलमानों में राष्ट्रीय धारा से अलग होने के भाव का बीजारोपण कर दिया था। सन 1937 में ही प्रान्तीय विधानसभाओं के चुनावों में कांग्रेस भारी बहुमत से जीती थी और विधानसभाओं की कार्यवाही वन्देमातरम् गान से आरम्भ की जाने लगी। इससे मुस्लिम लीग बौखला गई और मुस्लिम विधायक आपत्ति स्वरूप विधानसभाओं का बहिष्कार करने लगे। वही मनोवृत्ति आज भी चल रही है, जो देश विघातक है।

वन्देमातरम् का अंगभंग किया जाना

सन् 1937 में मुस्लिम लीग ने अपना पृथक अधिवेशन कोलकाता में किया था। उस अधिवेशन में एक प्रस्ताव पास करके वंदेमातरम् को राष्ट्रगान बनाना मुसलमानों की धार्मिक भावनाओं का निरादर करना तथा उनके हितों के विरुद्ध साजिश रचना बताया था। मुस्लिम विधायकों द्वारा वंदेमातरम् गाए जाने पर नित्य नए-नए विवाद उत्पन्न किए जाने के कारण कांग्रेस उनके दबाव में आ गई। अतः दि. 26 से 31 अक्टूबर सन 1937 के कांग्रेस कार्यकारिणी एवं अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी में वंदेमातरम् का अंग-भंग करके उसे सर्वजनग्राह्य बनाया जा सकता है या नहीं, इस बात पर निर्णय होना था। उन्हीं दिनों सुभाष चंद्र बोस विदेश से लौट कर आए थे और कर्सियांग में स्वास्थ्य लाभ कर रहे थे। वे वंदेमातरम् के विवाद से अत्यधिक दुखी थे। सुभाष बाबू ने 16 अक्टूबर को कविगुरु रवीन्द्रनाथ को वन्देमातरम् विवाद के सम्बन्ध में एक मार्मिक पत्र लिखा। किन्तु उस समय कविगुरु गंभीर अस्वस्थता की दशा में चिकित्सालय में भर्ती थे। दूसरा पत्र उन्होंने ‘मॉडर्न रिव्यू’ और ‘प्रवासी’ के संपादक रामानंद चट्टोपाध्याय को लिखकर, उन्हें यह विषय महात्मा गांधी को लिखने का अनुरोध किया था। संयोग से गांधी जी भी उस समय अस्वस्थ थे, इसलिए गांधी जी तक सुभाष बाबू का वह संदेश नहीं पहुँच पाया। इस स्थिति में वह संदेश मॉडर्न रिव्यू और प्रवासी में छापकर प्रचारित किया गया था।

इस अधिवेशन से ठीक एक दिन पहले 25 अक्टूबर को जवाहरलाल नेहरू कविगुरु रवीन्द्रनाथ जी से एकांत में मिलकर आ गए थे। इसलिए कविगुरु ने अधिवेशन के दिन 26 अक्टूबर को एक विस्तृत पत्र कांग्रेस सभापति जवाहर लाल जी को अपने अभिमत सहित लिखा। उस पत्र का सार यह था –

“निस्संदेह वन्देमातरम् एक अत्यन्त सुन्दर स्वदेश प्रेम की प्रेरणा देने वाला गान है। इसी वन्देमातरम् गान ने बंग-भंग आन्दोलन को अपनी अन्तर्निहित शक्ति के द्वारा सफल बनाया था। परन्तु पूरा वन्देमातरम् मुसलमानों की भावनाओं को आहत कर सकता है, उसके प्रथम दो स्तवक निर्विवाद रूप से राष्ट्रगान होने योग्य हैं। उनमें आपत्तिजनक कुछ भी नहीं हैं।”  रवीन्द्रनाथजी के इस समर्थन से उत्साहित होकर कांग्रेस कार्यकारिणी ने अध्यक्ष जवाहरलाल नेहरु द्वारा प्रस्तुत राष्ट्रगान सम्बन्धित एक प्रस्ताव पारित किया, उसका सार निम्नलिखित है –

“वन्देमातरम् विगत 32 वर्षों से देशभक्तों को स्वाधीनता संग्राम में ब्रिटिश साम्राज्यवाद के विरुद्ध अपनी लड़ाई में अमानुषिक अत्याचारों को सहते हुए अपना सर्वस्व यहाँ तक की प्राणों का बलिदान देने के लिए प्रेरित करता आया है। हमारे राष्ट्रीय संग्राम का यह जीवंत एवं अभिन्न अंग है और हमारे श्रद्धा व प्रेम का पूर्ण अधिकारी है। अतः इसके प्रथम दो स्तवक राष्ट्रीय सम्मेलनों में गाए जाते रहेंगे, कारण कि इनमें ऐसा कुछ भी नहीं है जिस पर कोई आपत्ति उठा सके। हमारे मुस्लिम बंधुओं द्वारा इस गान के कुछ अंशों पर आपत्ति उठाने के कारण ही यह निर्णय लिया गया है।”

तत्कालीन कांग्रेस नेतृत्व इस महान स्वदेश गान का केवल ऊपरी रूप ही देख पाया। इसके भावार्थ में प्रवेश न कर पाने के कारण गान के मूल आशय को समझ नहीं पाया। दूसरा कारण भारत के अहिन्दू सम्प्रदायों के प्रति अतिरिक्त उदारता ने उन्हें यह करने हेतु प्रेरित किया और तीसरा कारण शायद कांग्रेस यह प्रमाणित करना चाहती थी कि वह साम्प्रदायिक नहीं है। इन्हीं कारणों से कांग्रेस ने वन्देमातरम् का अंगभंग कर दिया। वास्तविक अर्थ में वन्देमातरम् का यह अंगभंग ही देश विभाजन की पूर्व सूचना थी। अन्यथा राष्ट्रगान और राष्ट्रध्वज तो राष्ट्र के प्रतीक होते हैं, उनका अंगभंग नहीं किया जाता। यह स्पष्ट है कि उन्होंने देश के साथ छलावा किया। उन्होंने अपने प्रस्ताव में कहा था कि “इन दो स्तवकों में किसी के द्वारा भी आपत्ति योग्य कुछ भी नहीं है। तथा यह हमारे राष्ट्रीय संग्राम का अविच्छेद्य अंग है।” यदि ये दोनों वाक्य निष्कपट होते तो वन्देमातरम् के स्थान पर अन्य गान के गाये जाने का प्रश्न ही पैदा नहीं होता। मुस्लिम तुष्टिकरण के लिए कांग्रेस नेतृत्व विभ्रांत होकर इस परम सत्य को ही भूल गया कि राष्ट्रगान देशवासियों के अन्त:करण में देशप्रेम और देशहित जीवन उत्सर्ग की प्रेरक ज्वाला की सहज अभिव्यक्ति होता है। यह बात कांग्रेसी नेता उस दिन भूल गए थे। उन्हें यदि फ्रांस के राष्ट्रगान ‘मार्सिलेज’ का इतिहास ज्ञात होता तो यह बात अवश्य समझ में आ जाती कि “राष्ट्रगान ऐसा होना चाहिए जिसके श्रवण मात्र से देशवासियों की धमनियों में खून खौलने लगे।” हमारा वन्देमातरम् इस कसौटी पर खरा उतरता है, फिर भी इसको काट दिया गया, क्यों?

प्रबुद्धजनों द्वारा वन्देमातरम् की प्रशंसा

उस समय के सभी प्रमुख लोग वन्देमातरम् का यशोगान करते थे और चाहते थे कि वन्देमातरम् ही भारतराष्ट्र का राष्ट्रगान होना चाहिए। प्रशंसा करने वालों में प्रमुख थे, महात्मा गांधी। गांधीजी ने अपने पत्र ‘हरिजन’ में सन् 1939 की एक जुलाई के दिन लिखा था, “मैंने जब पहली बार वन्देमातरम् को गाए जाते हुए सुना तो मैं आत्मविभोर हो गया, उसका मुझ पर जादू सा असर हुआ था। हमारा झण्डा और यह गीत तब तक जिन्दा रहेंगे जब तक यह राष्ट्र जिन्दा है।” देश की आजादी के लगभग एक सप्ताह बाद 23 व 29 अगस्त 1947 को गांधीजी ने कलकत्ता की सभा में, वह भी सुहारावर्दी की उपस्थिति में वन्देमातरम् गाया था। उस सभा में गांधीजी ने इस गान को देशमाता की अति सुन्दर वन्दना बताते हुए मुस्लिमलीगियों से अपना दुराग्रह त्यागने का आग्रह किया था। उन्होंने इस तथ्य को फिर दोहराया कि “रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने भी राष्ट्रगान के रूप में वन्देमातरम् के पक्ष में अपना मत दिया है।”

यशस्वी पत्रकार श्री रामानन्द चट्टोपाध्याय का स्पष्ट मत था कि सरसरी दृष्टि से देखने पर वन्देमातरम् प्रतिमाव्यंजक लग सकता है, किन्तु असल में ऐसा नहीं है। वन्देमातरम् गान में कहीं भी मुस्लिम विद्वेष नहीं है, यहाँ तक कि इसमें मुसलमानों का उल्लेख तक नहीं है। इसमें जो ‘रिपुदल वारिणीम्’ पद आया है, उसमें रिपुदल का अर्थ मुसलमानों से नहीं अंग्रेजों से है। आनन्दमठ में वर्णित युद्ध मुसलमानों से नहीं था अपितु संन्यासियों का अंग्रेज सेनापतियों के विरुद्ध हुआ युद्ध था। अतः मुसलमानों को कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए।

उधर विपिनचन्द्र पाल ने सन् 1919 में ही वन्देमातरम् का अपूर्व और दीर्घ विश्लेषण कर दिया था, जो महर्षि अरविन्द घोष की ‘धर्म पत्रिका’ में छपा था। उसका सार यही था कि, “वन्देमातरम् में स्वदेश मातृका का स्थूल, सूक्ष्म और कारण रूप में समग्र प्रकटीकरण हुआ है।”

मौलाना रेजाउल करीम तो वन्देमातरम् के अंगभंग से बहुत दुखी हुए थे। उन्होंने अपने ग्रंथ ‘बंकिम ओ मुसलमान समाज’ में निर्भीकतापूर्वक इस गान के विरोधियों की धज्जियाँ उड़ाई थीं। मातृभूमि को नमस्कार करना इस्लाम विरोधी नहीं है। क्या मुसलमान अपने मुल्ला-मौलवियों को, अपने आकाओं को झुककर सलाम नहीं करते? यदि कांग्रेस जिन्नापंथियों को खुश करने के लिए वन्देमातरम् को पूर्णतः हटा भी देती है, तब भी उनमें से एक भी मुसलमान कांग्रेस में शामिल नहीं होगा। क्योंकि उनका असली उद्देश्य वन्देमातरम् को हटाना नहीं है, अपितु अंग्रेज प्रेरित देश विभाजन के षडयंत्र को सफल बनाने का एक बहाना मात्र है। अन्यथा ‘वन्देमातरम्’ भी वैसा ही शब्द है, जैसा ‘मादरे वतन’। जो वन्देमातरम् का अर्थ है, वही अर्थ मादरे वतन का है, मैं अपने वतन को सलाम करता हूँ। अतः किसी भी इस्लामी आदर्श के तहत इसमें आपत्ति जनक कुछ भी नहीं है।

मौलाना अकरम खाँ ने अरब देश का भौगोलिक वर्णन करते हुए लिखा है, “हे अरब मानवेर आदि मातृभूमि” कवि ने अरब को माँ कहकर पुकारा है। जब अरब को मानव की आदि मातृभूमि स्वीकार करने वाले मुसलमान भारत में बस गए, तब भारत को माँ कहने में इस्लाम क्यों आड़े आता है? अतः सत्य यही है कि वन्देमातरम् का विरोध करना तो मात्र एक बहाना मात्र था। वास्तविकता यही है कि कांग्रेस ने मुसलमानों के तुष्टिकरण का आत्मघाती मार्ग अपनाकर भारत विभाजन का बीजारोपण कर दिया था। कांग्रेस देश की आजादी तक इसी मार्ग पर चलती रही। मुस्लिमलीग के द्विराष्ट्र सिद्धांत को नाम मात्र का अमान्य करते हुए भी उसके घातक परिणाम कांग्रेस ने मान लिए। वन्देमातरम् का अंगभंग जैसी घुटनाटेक पराजयवृत्ति को भाँपकर लीग ने सत्तालोलुप बूढ़े कांग्रेसी नेताओं को देश का विभाजन स्वीकार करने के लिए बाध्य कर दिया था। फलतः वन्देमातरम् के अंगभंग के मात्र दस वर्ष बाद ही सन 1947 में कृतघ्न कांग्रेसियों ने भारत माता को भी अंगभंग कर दिया।

वन्देमातरम् को पदच्युत करना

जिस दिन वन्देमातरम् को पदच्युत करने का षडयंत्र रचा गया वह दिन था, 24 जनवरी 1950 का। और उपलक्ष्य था, उस दिन स्वतंत्र भारत के नव-निर्मित संविधान पर संविधान-निर्मात्री सभा के सदस्यों के हस्ताक्षर करने का। सभा की कार्यवाही शुरू हुई। सभी सदस्यों ने हस्ताक्षर किए, अन्य औपचारिक कार्य भी सम्पन्न कर लिए गए। जब सभा समाप्त होने वाली थी, तब अचानक सभापति बाबू राजेन्द्र प्रसाद ने खड़े होकर राष्ट्रगान के सम्बन्ध में एक घोषणा की। उस घोषणा का सार था कि “वैसे तो निश्चय यही किया गया था कि राष्ट्रगान के बारे में संविधान सभा में एक प्रस्ताव द्वारा निर्णय किया जायेगा, परन्तु यह निर्णय करना छूट गया। आज ही यह बिन्दु याद आया, परन्तु अब प्रस्ताव द्वारा निर्णय लेने का समय नहीं रहा। अतः उचित यही समझा गया कि इस विषय पर मैं एक घोषणा कर दूँ। अब से ‘जन गण मन अधिनायक’ को राष्ट्रगान एवं ‘वन्देमातरम्’ को राष्ट्रगीत के रूप में स्वीकार किया जाता है। दोनों को बराबर सम्मान प्राप्त होगा। आशा है इससे सभी सदस्य सहमत होंगे।”

इस असंवैधानिक निर्णय को सुनकर वन्देमातरम् के सभी भक्त अवाक् रह गए। राजर्षि पुरुषोत्तम दास टंडन तो इतने दुखी हुए कि उन्होंने कांग्रेस के अध्यक्ष पद से ही त्यागपत्र दे दिया। क्योंकि इस घोषणा का समय अत्यन्त चालाकी से चुना गया था, और अब बोलने का कोई अर्थ ही नहीं रह गया था। इस अप्रत्याशित निर्णय के फलस्वरूप जो वन्देमातरम् फाँसी के तख्ते पर झूलने वाले शहीदों के कंठों से गर्व के साथ गूँजा था, जो जयघोष पूरे स्वाधीनता संग्राम में देशभक्तों की प्रेरणा एवं श्रद्धा का प्रतीक बना रहा था, उसे सत्तालोलुपों की साजिश से तिरस्कृत होकर नीचे गिरना पड़ा। यह एक ऐसी कटु सत्यकथा है, जिसमें खून से की गई मातृभूमि की वंदना को स्याही से मिटा देने का षडयंत्र दिखाई देता है।

सम्पूर्ण भारत में नेहरु की तीखी आलोचना

उपर्युक्त असंवैधानिक व अप्रत्याशित निर्णय पर सभी इसलिए आश्चर्यचकित थे कि इस दिन भी सभा के प्रारम्भ में सभापति के आदेश से लक्ष्मीकांत मैत्र ने वन्देमातरम् गाया था। सभी देशभक्त यह मानते थे कि राष्ट्रगान तो वन्देमातरम् ही होगा। इससे पूर्व भी 14 अगस्त 1947 की मध्य रात्रि में जब देश को आजादी मिली थी, उस समय भी स्वतंत्रता के स्वागत में श्रीमती सुचेता कृपलानी ने वन्देमातरम् गाया था। दूसरे दिन 15 अगस्त को प्रातःकाल आकाशवाणी से भारत के महान गायक पंडित ओंकारनाथ ठाकुर ने पूरा वन्देमातरम् गान अपने हृदयद्रावी रोमांचक स्वर में भारतीय स्वतंत्रता के स्वर्णिम विहान में मुक्त विहंग की भाँति पूरे उल्लास के साथ गाया था। यहाँ यह बात भी स्मरण रखने योग्य है कि पं.ओंकारनाथ ठाकुर बड़े स्वाभिमानी थे। जब 1937 में कांग्रेस ने वन्देमातरम् गान का अंगभंग किया था, वह इन्हें मान्य नहीं था। इसलिए जब इन्हें हरिपुरा कांग्रेस अधिवेशन में वन्देमातरम् गाने के लिए बुलाया गया तो इन्होंने खंडित वन्देमातरम् गाने से स्पष्ट मना कर दिया और पूरा वन्देमातरम् गाकर ही माने थे। इसलिए वे उप प्रधानमंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल से पूरा वन्देमातरम् गाने का पक्का आश्वासन लेकर ही मद्रास से दिल्ली आए थे और 15 अगस्त की प्रातः आकाशवाणी पर पूरा वन्देमातरम् गाया था। अतः सब देशभक्त यही आशा लगाए बैठे थे कि वन्देमातरम् ही राष्ट्रगान होगा। जब-जब भी संविधान सभा में राष्ट्रगान के विषय को लाने का प्रयत्न किया गया, तब-तब ही इस पर प्रस्ताव लाने को स्थगित किया गया था। इस सारे षडयंत्र के पीछे नेहरु स्वयं थे, इसलिए पूरे भारत में नेहरु की तीखी आलोचना हुई थी।

और पढ़े: वन्देमातरम् का 150वां जयन्ती वर्ष – भाग एक

(लेखक शिक्षाविद् है, भारतीय शिक्षा ग्रन्थमाला के सह संपादक है और विद्या भारती संस्कृति शिक्षा संस्थान के पूर्व सचिव है।)

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *