सा विद्या या विमुक्तये
– नम्रता दत्त
हम जानते हैं कि आहार से स्वास्थ्य बनता है और आहार को ग्रहण करने की विधि भी एक संस्कार है। शिशु अवस्था संस्कार निर्माण के लिए नींव की अवस्था है। अतः शिशु को क्या, कैसे, कब, क्यों खिलाना? – इन सब विषयों का ज्ञान माता-पिता एवं परिवार को अवश्य ही होना चाहिए। इस अवस्था की खान पान की आदतें ही आजीवन के संस्कार बन जाती हैं।
कोरोना काल में जब परिवार, घर में राशन एवं सब्जी आदि एकत्र करने की चिन्ता कर रहे थे, उस समय उनके राशन थैले में दाल-मसाले कम और बङी मात्रा में चिप्स, चाकलेट, मैगी, न्युडलस, पास्ता, बिस्किट, कोल्ड ड्रिंकस, सेरेलक (शिशु का रेडीमेड आहार) आदि भरे दिखाई देते थे। ऐसा करना उनके लिए जरूरी भी था क्योंकि ऐसे संकट के समय में परिवार के बङे सदस्य तो एक समय बिना भोजन के भी रह सकते थे, परन्तु छोटे बच्चों का ध्यान तो प्राथमिकता पर रखना ही था। यही सब तो उनके बच्चे खाते हैं। इससे आधुनिक समय में माता-पिता की अज्ञानता का पता चलता है। इसमें बच्चे की कोई भी गलती नहीं है क्योंकि उसको तो जो प्रारम्भ में खिलाएंगे वही खाएगा।
एक से तीन वर्ष की आयु में शिशु के दांत निकलने लगते हैं। वह क्षीरादावस्था (दूध पीने की अवस्था) से क्षीरान्नादावस्था (दूध और अन्न खाने की अवस्था) की ओर बढने लगता है। एक से दो वर्ष की अवस्था में दूध अधिक और अन्न कम मात्रा में लेता है परन्तु दो वर्ष से तीन वर्ष की अवस्था में अन्न अधिक और दूध की मात्रा कम होती जाती है। यह उसकी बढती हुई अवस्था है और विकास के लिए उसे अधिक पोषण की आवश्यकता होती है। शारीरिक वृद्धि के साथ साथ उसके अन्य विकास में भी अत्यधिक ऊर्जा की आवश्यकता होती है। सक्रिय रहना उसकी स्वाभाविक विशेषता है इसलिए कर्मेन्द्रियों की कुशलता के लिए वह स्वप्रेरणा से ही अधिक सक्रिय रहता है। ऐसे परिश्रम के कारण उसे अधिक भूख लगती है और भूख की पूर्ति के लिए अब मात्र माता का दूध पर्याप्त नहीं है। यही सही समय है जब उसकी स्वादेन्द्रिय को जैसे स्वाद का अनुभव करायेंगे उसको उसी की आदत हो जाएगी। इसी समय में उसे दाल-चावल, रोटी-सब्जी, खिचङी, दलिया और हलवा आदि (स्थानीय परम्परा अनुसार) घर में पके हुए भोजन को खिलाने की आदत डालनी चाहिए।
भोजन करने के अच्छे संस्कारों को डालने का भी यही सही समय है –
धीरे-धीरे उसे कुछ ऐसे संस्कार भी समयानुसार डालने चाहिए जैसे-
बढती आयु के साथ साथ संस्कार देते जाना चाहिए। इन संस्कारों से उसका चरित्र निर्माण होगा।
अन्न ब्रह्म है। शास्त्रीय उक्ति है- ‘मातृ हस्तेन भोजनम्’। माता के हाथ का पका घर का भोजन उसे स्वस्थ रखता है क्योंकि बच्चे के सुस्वस्थता की माता की भावनाएं उससे जुङी हुई होती हैं।
पैकेट और सील बन्द खाने में प्रीजरवेटिव होते हैं। माता बच्चे को चिप्स घर में तलकर दे सकतीं हैं। सेरेलक के स्थान पर सूजी की खीर/हलवा ताजा बनाकर खिलाएं। कोल्ड ड्रिंक आदि के कितने दुष्परिणाम हम सोशल मीडिया पर देखते हैं। उसके स्थान पर ताजा फलों का रस और नींबू पानी आदि पिला सकते हैं। मैदा का भोजन (नूडल्स और पास्ता) तो बड़ों को भी नुकसान देता है तो छोटे बच्चे के कोमल पाचन तंत्र को तो यह निश्चित ही हानि पहुंचाते हैं।
भोजन को रूचि से पकाएं और रूचि से ही बालक को खिलाएं। जोर जबरदस्ती से खिलाया गया भोजन बच्चे के विकास में सहायक नहीं होगा। उसे भोजन के प्रति अरूचि भी हो सकती है।
भोजन केवल तन के लिए नहीं है अपितु हमने सुना है कि जैसा खाओ अन्न वैसा हो जाए मन। अतः स्पष्ट है कि इसका प्रभाव मन अर्थात विचारों पर भी पङता है।
माता-पिता को यह समझना होगा कि अन्न केवल पेट भरने के लिए नहीं है। इसका प्रभाव मन पर भी पङता है। यह एक संस्कार है जिससे भावी चरित्र बनता है। अतः स्वयं का आचरण भी ठीक रखें और बच्चे को भी सही आचरण करना सीखाएं। बच्चे के रोल मॉडल माता-पिता ही होते हैं।
(लेखिका शिशु शिक्षा विशेषज्ञ है और विद्या भारती शिशुवाटिका विभाग की अखिल भारतीय सह संयोजिका है।)
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