सा विद्या या विमुक्तये
– रवि कुमार
बालक के सर्वांगीण विकास की दृष्टि से करणों का विकास महत्त्वपूर्ण है । करण दो प्रकार के हैं – एक अन्तःकरण तथा दूसरा बहिकरण । मन, बुद्धि, अंहकार और चित्त मिलकर अन्तःकरण चतुष्टय कहा जाता है । मन भावना प्रधान रहता है । बुद्धि तर्क करती है । चित्त में सभी प्रकार के संस्कारों का संग्रह होता हैं । अहंकार में ‘मैं, मेरा, मेरे लिए’ का भाव रहता है । अहंकार बढ़ा तो घमंड बढ़ता है अहंकार घटता है तो आत्महीनता आती है तथा संतुलित रहता है तो स्वाभिमान जागृत होता है । पांच ज्ञानेन्द्रियां और पांच कर्मेन्द्रियां यह बहिकरण है । आंख, नाक, कान, जिह्वा व त्वचा ये पांच ज्ञानेन्द्रिया हैं । हाथ, पैर, मुख, उपस्थ (मूत्रद्वार) एवं गुदा (मलद्वार) ये पांच कर्मेन्द्रियां हैं । अन्तःकरण चतुष्टय, पांच ज्ञानेन्द्रियां व पांच कर्मेन्द्रियां इन चौदह का विकास यानि करणों का विकास । शिक्षण पद्धति व शिक्षण व्यवस्था इस प्रकार की चाहिए कि करणों का विकास सहजता से हो ।
शिक्षा जगत में उपकरणों के विकास की चर्चा सर्वत्र है । आँख करण है, दृष्टि कमजोर हुई तो चश्में की आवश्यकता होती है । चश्मा उपकरण है । कान से सुनते है, सुनने की क्षमता कम होने पर मशीन का प्रयोग करते है । मशीन उपकरण है । टांगे व पैर कमजोर होने पर बैसाखी का सहारा लेते है । चश्मा, सुनने की मशीन व बैसाखी अच्छी गुणवत्ता की हो इसकी बजाय आँख, कान व पैरों को उपकरणों की आवश्यकता ही न पड़े ऐसा प्रयास हो । कक्षा कक्ष, श्यामपट्ट, पुस्तक, कॉपी, लेखनी, दृश्य-श्रव्य सामग्री आदि उपकरण अच्छे होने के साथ-साथ जिन करणों से ज्ञानार्जन करना है उसे विकसित करने का उद्यम किया जाए ।
प्राथमिक शिक्षा में करणों को सक्षम बनाने और करणों का उपयोग कैसे करना यह सिखाने की योजना होनी चाहिए । मनुष्य के जीवन की विभिन्न अवस्थाएं होती हैं । जैसे – शिशु, बाल, युवा एवं वृद्धा अवस्था । विभिन्न अवस्थाओं में ज्ञानार्जन के लिए विभिन्न करणों की मुख्यता रहती है । बाल्यावस्था में कर्मेन्द्रियां, ज्ञानेन्द्रियां और मन की मुख्यता है । मन के भी दो पक्ष होते हैं । एक भावना पक्ष, दूसरा विचार पक्ष । बाल अवस्था में मन की भावना पक्ष की मुख्यता है । इसलिए बाल अवस्था की शिक्षा कर्मेन्द्रियों और मन के भावना पक्ष के आस-पास रची जानी चाहिए ।
करणों के विकास की दृष्टि से शिक्षा को चार प्रकार से विभाजित कर सकते हैं :
क्रिया आधारित शिक्षा : कर्मेन्द्रियां विभिन्न क्रियाएं करती हैं । सीखने में जिनकी महत्त्वपूर्ण भूमिका है वे हैं – हाथ, पैर और वाणी । हाथ से सारे काम किए जाते हैं । लिखना, चित्र बनाना, कढ़ाई करना, वस्तु पकड़ना, फेंकना, दबाना, उठाना, एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाना, रखना आदि अनेक कार्य हाथ से किए जाते हैं । हाथ क्या-क्या काम करता है इसकी यदि हम सूची बनाएं तो इतनी लम्बी बनेगी कि हम आश्चर्यचकित हो जाएंगे । इसी आधार पैर चलने का, दौड़ने का, कूदने का, नृत्य करने का काम करते हैं । वाणी बोलती है, गाती है, विभिन्न प्रकार की ध्वनियां निकालती हैं । कर्मेन्द्रियों को ये सारे कार्य अच्छी तरह से करना सिखाना यह प्रथम कार्य है । कर्मेन्द्रियों की कुशलता बढ़ाना सीखने की क्षमता बढ़ाना है । सीखने की क्षमता बढ़ने से अच्छा और अधिक सीखा जा सकता है । विभिन्न विषय सीखने की विभिन्न पद्धतियाँ होती हैं । गिनते-गिनते गिनना सीखा जाता है, बोलते-बोलते बोलना, गाते-गाते गाना सीखा जाता है । अतः क्रिया करना महत्त्वपूर्ण होता है । उदाहरण के लिए 1 से 9 तक ही गिनती सीखने के लिए गिनने की क्रिया और अभ्यास सबसे अधिक आवश्यक है । दिशाओं का ज्ञान भूगोल की पुस्तकों से नहीं होता, मैदान में जाकर प्रत्यक्ष दिशाओं को देखने से और उनका आपस में सम्बन्ध समझने से होता है । प्राथमिक शिक्षा को मुख्य रूप से क्रिया और क्रियाकलाप आधारित बनाना चाहिए ।
स्वामी विवेकानंद जी ने कहा है, “शिक्षा केवल सूचनाओं के एकत्रीकरण का केंद्र नहीं है बल्कि यह तो जीवन का गहन प्रशिक्षण है ।”
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