– गोपाल माहेश्वरी

विद्यार्थी पाठक सरस्वती विद्या मंदिर से आचार्य के रूप में सेवा निवृत्त हुए एक वर्ष ही बीता था कि एक दिन उनके पुत्र प्रियदर्शन ने देखा कि बाबूजी की चाय की प्याली भरी की भरी मेज पर ही रखी ठंडी हो चुकी है और बाबूजी अपनी छाती पर अपनी ही कहानियों की खुली पुस्तक टिकाए कब से आँखें मूंदे आराम कुर्सी पर बैठे हैं। वैसे यह कोई चौंकाने वाला दृश्य था भी नहीं।
सेवा निवृत्त होने के बाद भी सुबह चार बजे जाग जाना नित्यकर्म से निवृत्त हो इसी प्रकार स्वाध्याय की शांत एकांत साधना में किसी योगी की भांति डूबे रहना। इन दिनों वे प्रायः विद्यार्थी उपनाम से कहानी-कविताएं लिखते थे। साहित्य जगत में उनकी प्रसिद्धि तो इतनी न थी पर सिद्धि बड़ी थी। उनकी रचनाएँ बच्चों के मन पर अमिट छाप छोड़ने वाली होतीं थीं। लेकिन सेवानिवृत्त होने पर उनका नियमित कक्षाओं से नाता क्या टूटा, मानो उनकी कलम ने भी सेवानिवृत्ति ले ली थी। बस वे अपनी ही कविता कहानियों को पढ़ते रहते।
प्रियदर्शन ने एक बार पूछा भी “पिताजी! आप बार-बार अपनी ही रचनाओं में क्या पढ़ते रहते हैं! इनका अक्षर-अक्षर आपका पढ़ा हुआ और शब्द-शब्द आपका ही तो गढ़ा हुआ है। इससे तो अब आप कुछ नया लिख लिया कीजिए, अब आपको कौन-सा विद्यालय की घंटियों से नपा जीवन जीना है।” उसने अपने कार्यालय से मिली एक नई डायरी और कलम मेज पर रख दिए थे, लेकिन कुछ दिनों वह कोरी ही रही तो उसे उठाकर रख देना पड़ा।
प्रियदर्शन की दो संतानें थीं, बेटा सुदर्शन और बेटी दर्शना। सुदर्शन इस आषाढ़ में दस वर्ष का हुआ और दर्शना कार्तिक में सात पूरे करेगी। बस, ये दोनों बच्चे छ:-साढ़े छः बजे जागते तब तक ही विद्यार्थी जी की स्वाध्याय समाधि स्थिर रहती। पोते-पोती जागे नहीं कि दादाजी इन जीवित पुस्तकों में खो जाते जब तक कि वे आठ बजे तक अपनी-अपनी शाला न चलें जाएं फिर वे घंटाभर अपने घर की बगिया के पेड़ पौधों से बिना बोले सुनाई जा रही कविताएं पढ़ते। उनकी हर सुबह ऐसे ही होती बीच में नहाना, भोजन, समाचार दर्शन, विश्राम और सायंकाल पास के शाला मैदान पर खेलते बच्चों को देखते हुए बिताते।
लेकिन आज उनकी दिनचर्या ने स्थायी विराम ले लिया था। आज वे पोते-पोती की हलचल से नहीं जागे। बच्चों के चरण-स्पर्श करने पर उन्हें गोद में भी नहीं उठाया। बच्चे चौंके। बच्चों की घबराहट भरी टेर सुनकर उनके माता-पिता दौड़े पर शीघ्र ही यह निश्चित हो गया कि विद्यार्थी जी अब नहीं जागेंगे।
इस घटना को एक सप्ताह से अधिक समय बीत रहा था। परिवार की वाटिका मुरझाई-सी थी। बड़े तो अपना शोक छुपा भी लेते पर बच्चे तो यह नहीं कर सकते थे। अपने प्यारे दादाजी का चले जाना बच्चों के लिए सब कुछ लुट जाने जैसा ही था। सब बहुत समझाते, मन बहलाने का प्रयास करते पर कोई सफलता नहीं मिल रही थी। आखिर दसवें ग्यारहवें और बारहवें दिन की दिवंगत पिता के निमित्त विशेष पूजा पिंड, तर्पण आदि क्रियाएँ सम्पन्न हुईं।
“भुआ यह सब क्या हो रहा है?” दर्शना ने बड़े भोलेपन से पूछा।
“बेटी! आपके दादाजी भगवान जी के पास चले गए हैं न, उनको कोई तकलीफ न हो इसलिए यह पूजा कर रहे हैं हम लोग।” भुआ ने अचानक पूछे प्रश्न का जैसा बन पड़ा फुसफुसाते हुए उत्तर देने का प्रयत्न किया। बच्ची के आंसू टपकने लगे। यह देख सुदर्शन भी फफक कर रो पड़ा।
पंडित जी ने कहा “श्राद्ध के समय रोना नहीं इससे दिवंगत प्राणी को कष्ट होता है।” लेकिन बच्चों का मानस शास्त्र पंडित जी के बताए इस शास्त्र वचन को स्वीकार नहीं पा रहा था। सुदर्शन ने दर्शना का हाथ पकड़ा और बगिया में ले चला। बड़ों ने भी रोका टोका नहीं।
वे उदास बैठे आंसुओं की अविरल धारा बहा रहे थे। तभी अंदर से पंडित जी का स्वर सुनाई दिया “यजमान! अपने पिताजी को जल अर्पण करो। इससे वे तृप्त होंगे।”
सुदर्शन ने बहिन से कहा “दर्शना! सुना तूने पानी देने से दादाजी तृप्त होंगे, उनकी प्यास बुझेगी।” दर्शना चुप थी। वही बोला “हम भी पानी दें?”
“कैसे? कहाँ? उसने भोलेपन से पूछा।

“आ, मेरे साथ।” भाई ने बहिन का हाथ पकड़ कर उठाया। बगिया के एक कोने में नल था। उससे पानी का मग भर-भर कर वे बगिया के हर पौधे को सींचने लगे जिसे उनके दादाजी विद्यार्थी जी प्रतिदिन सींचा करते थे। थोड़ी देर में मुरझा रहे पौधे मानो मुस्कुराने लगे। बच्चे भी मुस्कुरा दिए।
“अब से हम प्रतिदिन यह काम करेंगे” सुदर्शन ने हाथ फैलाकर कहा तो दर्शना का छोटा हाथ उस पर आ गया।
“हाँ भैया! दादाजी इसी से तृपत होंगे। है न?” वह तृप्त को तृपत बोल पार ही थी। उच्चारण अशुद्ध था पर भाव कितना निर्मल निर्दोष।
बच्चों के इस अनूठे नित्य श्राद्ध के संकल्प से विद्यार्थी जी की आत्मा सचमुच तृप्त हो रही थी कि प्रियदर्शन तर्पण का जल सींचने बगिया में आए। बच्चों का संकल्प ने उन्हें भी प्रेरित किया। संध्या को पत्नी से बोले आज से पिताजी की पुस्तकों की रखरखाव का दायित्व मेरा। वह पुस्तकों की धूल झाड़ने लगे। उनकी पत्नी सुभाषिणी ने एक अनूठा संकल्प लिया अब से दुपहर में उनका आँगन वाचनालय का रूप लेने लगा। धीरे-धीरे छोटे बड़े पाठक आने लगे। पुस्तकें अलमारी से मुक्त हुईं। उधर विद्यार्थी जी की आत्मा मुक्ति का आनंद ले रही थी।
(लेखक इंदौर से प्रकाशित ‘देवपुत्र’ बाल मासिक पत्रिका के कार्यकारी संपादक है।)
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अच्छी कहानी है। संदेशप्रद है, नैतिक है। हमारे समय का दुर्भाग्य देखें कि इन रचनाओं को पाठ्यक्रम समिति के सदस्यगण यह कहकर ठुकरा देते हैं कि नैतिकता रचनाओं को बोझिल बनाती हैं, थोपी हुई लगती हैं। धरातल की गहरी समझ नहीं होने या वैचारिक संकीर्णता के कारण उन्हें इसका बोध नहीं कि भारतीय मानस ऐसी ही रचनाओं को पसंद करता है। लेखक को साधुवाद, संदेशप्रद कहानी है।
प्रणय कुमार
शिक्षक