शिक्षक की सामाजिक प्रतिष्ठा

– दिलीप बेतकेकर

कुछ वर्ष पूर्व की घटना है। किसी कार्यक्रम में मेरा एक पूर्व-परिचित सामाजिक कार्यकर्ता लम्बे समय पश्चात मिला। पूर्व में वह कार्यकर्ता एक महाविद्यालय में प्राध्यापक था। उसने पूछा, “आजकल क्या कर रहे हो तुम?” उस समय मैं एक विद्यालय में शिक्षक पद पर पदारूढ़ हुआ ही था।

तुरन्त उत्तर दिया – “मास्टरी कर रहा हूँ, और क्या!”

मेरे मज़ाकिया उत्तर का असंतुष्ट भाव शायद वह समझ गया और एकदम गंभीर हो गया। मैं समझ ही न पाया। कुछ ही क्षणों में उसका हाथ मेरे कंधे पर था। उसने कहा – “देख, शिक्षक बना तो एक अत्यन्त पवित्र कार्य कर रहा है तू! ऐसे “मास्टरी, और क्या” कहकर निराश नहीं होना”- कहकर वह तुरंत निकल गया।

मैं विचारमग्न हुआ सोचता रहा – ‘मैंने ऐसा क्या और क्यों कह दिया? नम्रता दिखाने को कहा अथवा वास्तव में शिक्षक का पेशा निम्न स्तर का समझ कर ऐसा कहा? क्या एक प्रकार की हीनता की भावना मन में रही थी?’

दीपावली अवकाश में एक कार्यशाला में सहभागी हुआ। एक शिक्षक विचार व्यक्त कर रहा था, ‘वर्तमान समाज में शिक्षक के लिये सम्मान नहीं है, प्रतिष्ठा नहीं है। जिसके पास पैसा है, उसे ही सम्मान, प्रतिष्ठा मिलती है। हम पढ़े-लिखे, शिक्षित, सीख देने वाले हैं किन्तु आमजन में कदर नहीं। हमारी अपेक्षाकृत आर.टी.ओ., हवलदार को अधिक सम्मान और प्रतिष्ठा मिलती है।”

इस पर कार्यशाला में पधारे वरिष्ठ अधिकारी – मार्गदर्शक तुरंत बोले – “आपको यदि उस प्रकार की प्रतिष्ठा चाहिये तो आप हवलदार अथवा इन्सपेक्टर आदि क्यों नहीं बने? और हां! क्या गलत मार्ग से पैसा कमाकर जनसामान्य से आप सम्मान, प्रतिष्ठा प्राप्त कर सकते हो? क्या यही सही प्रतिष्ठा होगी?”

वह शिक्षक हक्का-बक्का सा देखता रहा। हम कितनी अविचारी मनःस्थिति में हैं, ऐसा आभास उसे हुआ, और मुझे भी।

जब कोई शिक्षक कहता है कि शिक्षक को समाज में मान-प्रतिष्ठा नहीं है तब लगता है शिक्षक के मन में स्वयं का ही आत्मसम्मान नहीं होता। स्वयं को ही वह कमतर मानता है, एक प्रकार की हीनता मन में रहती है। ‘मैं एक पवित्र कार्य कर रहा हूँ’ ऐसा वह स्वयं विश्वास नहीं करता। ‘शिक्षक’ रहते हुए उसे स्वयं इस पेशे से शर्म सी लगती है।

एक शिक्षक ने एक बार कहा था, ‘पूर्व जन्म में किया पाप, मास्टर बना अपने आप।’ उसे अपने शिक्षक होने पर और शिक्षक पेशे पर शर्म आती थी। हम शिक्षक ही यदि अपने कर्तव्य को ऐसी दृष्टि से देखेंगे तब हम समाज से मान-प्रतिष्ठा मिलने की अपेक्षा क्यों करें?

वर्तमान समाज में शिक्षक की प्रतिष्ठा कम हुई है यह मानने में दुःख अवश्य होता है किन्तु प्रत्यक्ष व्यवहार में यह सत्य प्रतीत होता है। शिक्षक को गाली देना, उससे मारपीट करना, शिक्षक के लिये दीवारों पर अथवा रास्ते पर अपमानजनक शब्द लिखना, उसकी प्रताड़ना करना इत्यादि, इस प्रकार के अनेक उदाहरण दिखाई देते हैं। समाज की कुछ बुराइयों के कारण यह घटित होता है यह सच है फिर भी इसके लिये कुछ हद तक शिक्षक स्वयं भी जिम्मेदार हैं, यह बात अस्वीकार नहीं कर सकते।

एक शिक्षक विद्यार्थियों के साथ शैक्षिक भ्रमण के लिये गया। वहां पर शराब पीकर नशे में धुत होकर पड़ा रहा। विद्यार्थियों ने उसे उठाकर गाड़ी में चढ़ाया। कितनी शर्म की बात है?

एक बार एक गांव में गया था। मैं कुछ चर्चा कर रहा था। निकट कुछ युवा बैठे थे। उनमें एक व्यक्ति शराब पीकर बैठा था। जोर-जोर से बड़बड़ा रहा था। कार्यक्रम समाप्त होने पर उस शराबी के बारे में पूछने पर साथी शिक्षक ने बताया कि वह भी शिक्षक ही है। सुनकर विश्वास न हुआ।

ऐसे अनेक उदाहरण दिखाई देते हैं। ये देखकर ऐसे शिक्षक को कौन सम्मान देगा? पैसा ही सब कुछ है मानकर चलने वाला और उसी के दम पर कुछ भी अनैतिक करने वाले शिक्षक के प्रति कौन आदरभाव दिखायेगा? कक्षा में पढ़ाई का पीरियड समाप्त होते ही विद्यार्थियों की ओर एक नज़र भी न डालने वाले शिक्षक के लिये कौन विद्यार्थी अथवा पालक किसी गाड़ी में स्वयं उठकर उसे बैठने को कहेगा?

विद्यार्थी (Hero worshippers) होते हैं। विद्यालय में वे शिक्षक की हर छोटी से छोटी गतिविधि को पैनी दृष्टि से देखते हैं। शिक्षक ही उनका ‘हीरो’ होता है। उनका अनुकरण करने का वे प्रयास करते हैं। किसी शिक्षक को उचित सम्मान देना अथवा नहीं, ये बात विद्यार्थी शिक्षक के चाल-चलन, व्यवहार से तय करते हैं। कक्षा में, अथवा कक्षा के बाहर, शिक्षक विद्यार्थियों से सम्मानजनक व्यवहार करें तो वे भी शिक्षक को उचित सम्मान देते हैं। छात्रों के प्रति यदि शिक्षक मनःपूर्वक अपनत्व और प्रेम रखें तो अनजाने ही छात्रों का व्यवहार भी शिक्षक के प्रति अपनत्वभरा रहेगा। ऐसे शिक्षक के प्रति केवल छात्रों या पालकों का ही नहीं वरन् समाज के व्यक्तियों का भी दृष्टिकोण सम्मानजनक हो जाता है।

जो शिक्षक केवल ‘कक्षा में पढ़ाई’, यही एकमेव कर्तव्य न मानकर उससे अधिक कार्य करता है, छात्रों की भावनाओं से एकरूप होता है, उस शिक्षक का स्थान केवल छात्रा ही नहीं, उनके पालक, परिवार में भी अलग ही प्रकार से निर्मित होता है। शिक्षक केवल छात्रों को ही नहीं, समाज में भी आदरणीय हो जाता है, वंदनीय हो जाता है। यह केवल काल्पनिक नहीं, सत्य है।

हाल ही की एक घटना है – एक शिक्षक गत छः वर्षों से एक विद्यालय में मुख्याध्यापक पद पर कार्यरत है। उसे अनेक उच्च पदों पर जाने का अवसर मिला है। वह जाने को उत्सुक भी है। किन्तु गांव के लोगों को शिक्षक के व्यवहार के कारण उसके गांव से विदा होने की कल्पना तक रास नहीं आई। अतः गांव वाले उस शिक्षक के पास आकर हाथ जोड़कर विनती करने लगे कि वे गांव छोड़कर न जायें, गांव में ही मुख्याध्यापक पद पर कार्य करते रहें। यह उदाहरण एक सत्य घटना है, अतिशयोक्ति नहीं।

इस प्रकार के शिक्षक के प्रति प्रेम को उसकी प्रतिष्ठा, उसका सम्मान ही मानना होगा न?

एक अन्य परिचित शिक्षक हैं। वे भी मुख्याध्यापक हैं। विद्यार्थी, विद्यालय, इनके अतिरिक्त उनके दिमाग में अन्य कुछ भी विषय नहीं रहता। पूरा समय विद्यालय और विद्यार्थियों के लिए समर्पित है। “Work is Worship” मानने वाले शिक्षक हैं वे। प्रत्येक व्यक्ति का उनके प्रति आदरभाव ही है।

स्वामी विवेकानन्द के अनुसार “The teacher must not teach with any ulterior selfish motive, for money, name or fame, His work must be simply out of love, out of pure love for mankind at large.” इस विशुद्ध भावना से कर्तव्य करने वाले शिक्षक के लिये बिगड़े समाज के द्वारा भी प्रतिष्ठा और सम्मान मिलते हैं।

शिक्षक की सामाजिक प्रतिष्ठा

विद्यालय-महाविद्यालय में उद्दण्ड दिखने वाला विद्यार्थी अपने घर पर अलग व्यवहार करता है। अपने पुत्र-पुत्रियों का शिक्षक, अपने बच्चों के लिए परिश्रम करने वाला, उनसे अपनत्व रखने वाला शिक्षक सभी का ध्यान आकर्षित करता है और वह पालकगणों के आदर का पात्र बन जाता है। विद्यार्थी के घर जाने पर मेरे से वरिष्ठ होते हुए भी, आदरभाव से बात करने वाले अनेक पालकगण मेरे संपर्क में आये। पालकों के अतिरिक्त भी लोग मुझे अत्यंत आदरयुक्त भाव से मिले। ये केवल ईमानदारी और कर्तव्यनिष्ठा का ही प्रतिपफल है। मैंने स्वयं इसका अनुभव किया है। अनेक बार तो मुझे ऐसा लगा कि मैं इस आदर के लिए पात्र हूँ भी या नहीं? ये केवल विनय ही नहीं, वस्तुस्थिति है। इसी कारण शिक्षक को समाज में प्रतिष्ठा, सम्मान नहीं, यह बात नागवार लगती है।

प्रतिष्ठा के सम्बन्ध में प्रत्येक की कल्पनाएं भिन्न रहती हैं। सामाजिक कार्यक्रमों में सबसे आगे की पंक्ति में बैठने को स्थान मिलने को कोई प्रतिष्ठा मानता है, तो किसी को किसी गरीब व्यक्ति के झोपड़ी में टाट पर बैठकर दूध रहित चाय उसके साथ पीने में आनंद अनुभव होता है।

हम शिक्षक अनेक बार कहते हैं कि मान-सम्मान मांगकर मिलने वाली चीज़ नहीं है। फिर ‘हमें समाज में प्रतिष्ठा नहीं’ ऐसा कहना बेमतलब है। हमारे अधिकारों को हम जानते हैं। अधिकार प्राप्ति के लिये शिक्षक संघों द्वारा आन्दोलन किये जाते हैं, किन्तु शैक्षणिक प्रश्नों को (शिक्षकों के नहीं) हल करने हेतु कितने आंदोलन हुए? इस सवाल का जवाब मिलना कठिन है!

ऐसी स्थिति में समाज द्वारा हम शिक्षकों को विशिष्ट दृष्टिकोण से देखना चाहिये, ऐसी अपेक्षा करना कहां तक न्यायोचित है?

एक महत्त्वपूर्ण बात यह भी कि स्वीकार किया हुआ शिक्षण कार्य उच्च स्तर का कार्य है, ऐसा हम समझते हैं या नहीं? यदि हम ऐसा समझते भी हैं तो क्या अन्य लोगों को भी ऐसा समझ लेना आवश्यक है? लोग हमें उच्च दर्जे वाला समझें, यह आग्रह भी आवश्यक क्यों?

स्वामी विवेकानन्द द्वारा शिक्षकों के लिये दिया गया संदेश ध्यान में रखें, यही पर्याप्त है। उनके अनुसार-

“Never vaunt of your gifts to the poor or expect their gratitude but rather be grateful to them for giving you the occasion of practicing charity to them.”

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(लेखक शिक्षाविद, स्वतंत्र लेखक, चिन्तक व विचारक है।)

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