1857 के स्वातंत्र्य समर में दिल्ली लड़ती है – 2

 – रवि कुमार

जून से सितम्बर 1857 दिल्ली का संघर्ष शायद ही कोई जानता हो, शायद  ही किसी पाठ्य पुस्तक में पढ़ाया गया हो और यह भी कहना ठीक होगा कि दिल्ली के वासियों को भी शायद ही पता हो। इन चार मास के समर में असंख्य वीरों ने अपनी आहुति दे दी और इन वीरों ने मात्र आहुति ही नहीं दी, अधिक मात्रा में शत्रु को भी हानि पहुँचाई, साथ ही वीरता और शौर्य-पराक्रम का एक प्रतिमान भी खड़ा किया।

‘दिल्ली का घेरा’ नाम की एक प्रसिद्ध पुस्तक में लेखक कहता है- “हमारे शिविर में एक यूरोपियन के पीछे दस स्थानीय (नेटिव) थे। जितने यूरोपीयन तोपखाने पर होते उससे चौगुने स्थानीय (नेटिव) लोग और एक घोड़े के पीछे दो स्थानीय (नेटिव) घुड़सवार थे। स्थानीय (नेटिव) की भर्ती के सिवाय एक कदम भी आगे रखना संभव नहीं”। देश के एक भाग की चेतना को देश के दूसरे भाग की अचेतना ने मार गिराया। ऐसी स्थिति में भारतीय क्रांतिकारियों ने अगस्त समाप्त होने तक भी अंग्रेजों को स्वयं पर मार करने का अवसर नहीं दिया। अभी तक अघातक पद्धति का अवलंबन करके वे ब्रिटिश शिविरों पर अखंड उत्साह से हमले कर ही रहे थे। यह उनकी ध्येय निष्ठा की विशेष पहचान थी।

दिल्ली का घेरा बढ़ता जा रहा था और दिल्ली के अंदर निराशा की छाया पड़ने लगी। नीमच और बरेली की भारतीय सेना एक-दूसरे के सर निराशा का ठीकरा फोड़ने लगी। बख्तर खान जो कि उस समय दिल्ली में भारतीय क्रांतिकारियों का सेनापति था, ने बादशाह की इच्छा से सारे नेताओं, सारी सेना के प्रमुखों एवं चुने हुए नागरिकों को बुलाकर प्रश्न किया- “लड़ाई चालू रखनी है या बंद करनी है?” आकाश फट जाए, इतने जोर की गर्जना कर सभी ने उत्तर दिया- “लड़ाई, लड़ाई, लड़ाई!” दिल्ली का यह अटल निश्चय देखकर सभी में जोश दिखा। नीमच और बरेली की भारतीय सेना नजफगढ़ की ओर बढ़ी।

अनुशासनहीनता हानि पहुंचाती है और कभी-कभी घातक होती है। बरेली ब्रिगेड ने जहां डेरा डाला, नीमच की सेना ने वहां डेरा न डालकर और बख्तर खान का आदेश न मानकर एक गांव में डेरा डाला। अंग्रेजी सेना ने उन पर अचानक आक्रमण किया। अचानक हुए इस आक्रमण में नीमच की सेना को संभलने का अवसर नहीं दिया। इस युद्ध में क्रांतिकारियों की दुर्दशा शेष नहीं रही। बेशक वे बड़ी बहादुरी से लड़े, शत्रु भी स्तुति करें – इतनी शूरता से लड़े। पर वह शूरता निष्फल! नीमच की पूरी सेना उस दिन नष्ट हो गई। अधिकारियों का उचित सम्मान और आदेश के शब्दों के प्रति आदर, यह अनुशासन का मुख्य बीज है। पर दिल्ली में इस बीज को पैरों तले रौंदा जा रहा था। और इधर पंजाब व जींद रियासत से आई ग्यारह हजार से अधिक सेना के आने से दिल्ली का घेरा बढ़ता जा रहा था।

दिल्ली के बाहर दवाब बढ़ता जा रहा था और दिल्ली के अंदर उत्साह रूपी सूर्य अस्त होता जा रहा था- इन दोनों का अंत करने के लिए 14 सितम्बर का दिन उदय हुआ। अंग्रेजी सेना के चार विभाग कर उसमें से तीन विभाग निकलसन के अधीन कश्मीरी दरवाजे से घुसने के लिए भेजे गए और चौथा भाग मेजर रीड के अधीन काबुल दरवाजे से घुसने के लिए भेजा गया। 16 मई के बाद निरन्तर असफल प्रयास करते हुए 14 सितम्बर को अंग्रेजी सेना को सफलता मिली और वह दिल्ली में घुसी। एक ही दिन में दिल्ली जीत लेंगे, ऐसा कहने वाली अंग्रेजी सेना को बड़ी हानि के बावजूद दिल्ली में प्रवेश करने के लिए 120 दिन लगे, यह बात भारतीय क्रांतिकारियों की वीरता और पराक्रम को प्रकट करती है।

14 सितम्बर को हुआ भयंकर युद्ध, रक्तपात, मृत्यु का नाच! अंग्रेजी सेना के हाथ क्या लगा? हिंदुस्थान में ऐसा भयंकर दिवस अंग्रेजी शासन में कभी उदय नहीं हुआ था। अंग्रेजी सेना के चार भागों में से तीन भागों के प्रमुख कमांडर घायल हुए, स्वयं निकलसन घायल हुआ, छियासठ अधिकारी समरांगण में गिरे, एक हजार एक सौ चार लोग मरे। इस विलक्षण मृत्यु संख्या से क्या मिला- दिल्ली के एक परकोटे का एक चौथाई भाग अंग्रेजों के हाथ में आ पाया। भय, चिंता और निराशा से पागल हुआ अंग्रेज कमांडर जनरल विल्सन बोला- “दिल्ली छोड़कर तत्काल पीछे हट जाना चाहिए। सारा शहर अभी अविजित ही बना हुआ है। मेरे अधीनस्थ शूर लोगों की एक गली ने रक्षा की और जो मुट्ठी भर लोग अभी जीवित हैं उन्हें हजारों विद्रोही हर घर से आगे आने को बड़ी शान से बुला रहे हैं। ऐसी स्थिति में सारे के सारे मर जाये या पीछे लौटने का अपयश स्वीकार करें”।

दिल्ली में अधिक देर न लड़ते हुए हम बाहर के प्रदेशों में युद्ध करने निकल पड़े, ऐसा एक पक्ष का विचार बना। और दूसरे पक्ष का विचार था कि मृत्यु-पर्यंत दिल्ली समर्पण न करें। बहुमत का सम्मान कर सहमति बनाकर अंत में भिन्नता को एक वाक्य कर लेने का अमूल्य सद्गुण का अभाव क्रांतिकारियों की टोली में था। इस कारण दोनों पक्ष एक दिशा में न जाकर अलग-अलग रास्तों पर निकल पड़े। जो पक्ष दिल्ली रह गया, 15 से 24 सितम्बर तक इसी ने युद्ध किया। इस पक्ष ने युद्ध भी इतने निश्चय, शौर्य और दृढ़ता से किया कि राजमहल में जब अंग्रेजी सेना घुस रही थी तब उस सारी सेना के सामने एक एक रखवाला ही बंदूक हाथ में लिए खड़ा मिला। अंग्रेज इतिहासकार इसके बारे में लिखते हैं- “जिस शत्रु से आज तीन माह तक बड़ी दृढ़ता से उन्होंने संघर्ष किया उन फिरंगियों से उनकी शत्रुता जीवन के अंतिम क्षण तक भी ढीली नहीं पड़ी थी, यह सिद्ध करने के लिए वे सिपाही विजय की रत्ती भर परवाह किए बिना अद्भुत कर्मी लोग हमें चिढ़ाते अचल खड़े थे”।

नमन है ऐसे वीरों की ध्येय निष्ठा को, शौर्य-पराक्रम को, राष्ट्र  भक्ति को… और धन्य है दिल्ली जो अंतिम क्षण तक लड़ती है, लड़ती है, लड़ती है!

(लेखक विद्या भारती दिल्ली प्रान्त के संगठन मंत्री है और विद्या भारती प्रचार विभाग की केन्द्रीय टोली के सदस्य है।)

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