भारतीय शिक्षा – ज्ञान की बात 58 (सांस्कृतिक अर्थशास्त्र, भाग-1)

 – वासुदेव प्रजापति

आज का युग आर्थिक युग है, यह सभी मानने लगे हैं। जीवन अर्थनिष्ठ बन गया है और अर्थ ने जीवन में केन्द्रवर्ती स्थान ग्रहण कर लिया है। हमारे देश में जीवन का केन्द्र अर्थ नहीं रहा, जीवन का केन्द्र सदैव धर्म रहा है। इस सन्दर्भ में सांस्कृतिक अर्थशास्त्र का विचार किया जाना आवश्यक है।

अर्थ, स्वरूप एवं व्याप्ति

सांस्कृतिक अर्थशास्त्र को समझना है तो इसे आज का ‘इकोनोमिक्स’ मानना उचित नहीं होगा। भारतीय विचार में ‘पुरुषार्थ चतुष्टय’ की संकल्पना है। चार में से एक पुरुषार्थ ‘अर्थ’ है। उस अर्थ पुरुषार्थ के प्रकाश में अर्थशास्त्र का विचार करने पर अर्थ, अर्थ का स्वरूप, अर्थ की व्याप्ति तथा अर्थ की परिभाषाएँ बदलेंगी। तभी भारतीय मानस के अनुसार व्यवहार होगा और व्यवहार को सुगम बनाने के लिए बनी व्यवस्थाओं के साथ जनमानस समरस होगा। तब अर्थशास्त्र आज का इकोनोमिक्स न रहकर सही अर्थ में सांस्कृतिक अर्थशास्त्र बनेगा, और तभी भारत समृद्ध होगा। समृद्ध भारत ही विश्व का कल्याण कर पाएगा।

पुरुषार्थ चतुष्टय

धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष ये चार पुरुषार्थ हैं। इन्हें दो भागों में बांटा गया है। एक है, त्रिवर्ग और दूसरा है, अपवर्ग। धर्म, अर्थ व काम इन तीनों को त्रिवर्ग कहा गया और मोक्ष को अपवर्ग। त्रिवर्ग का सम्बन्ध मनुष्य के जीवन व्यवहार के साथ है और अपवर्ग का सम्बन्ध जीवन मुक्ति के साथ है। त्रिवर्ग साधन है और अपवर्ग साध्य है। व्यवहार में साध्य को ठीक करने की आवश्यकता नहीं होती, साधन को ही ठीक करना होता है।

त्रिवर्ग के पुरुषार्थों में परस्पर समायोजन है। ‘काम’ मनुष्य की जन्मजात प्राकृत प्रवृत्ति है। काम का अर्थ है- कामना। कामना अर्थात् इच्छा। इच्छा करना मन का स्वभाव है। इच्छाएँ अनन्त व असीम हैं। इच्छाओं को कभी संतुष्ट नहीं किया जा सकता। इस सन्दर्भ में महाभारत का यह श्लोक मननीय है।

न जातुकाम: कामानाम् उपभोगेन शाम्यते।

हविषा  कृष्णवर्त्मेव  भूय   एवाभिवर्धते।।

अर्थात् जिस प्रकार अग्नि में हवि डालने से अग्नि शांत होने के स्थान पर और अधिक प्रज्वलित होती है, उसी प्रकार व्यक्ति की कामनाओं की शांति (तृप्ति) उपभोग करने से बढ़ती है। अर्थात् कामनाओं की कभी पूर्ति नहीं होती।

यह काम मनुष्य की जन्मजात प्रकृति है और उसकी पूर्ति करना, जन्मजात प्रवृत्ति है। ऐसे काम को त्रिवर्ग का एक पुरुषार्थ माना है। कामना पूर्ति के लिए किए गए प्रयास और जुटाए गए संसाधन अर्थ है। अर्थ प्राप्ति हेतु किए गए प्रयत्न आर्थिक व्यवहार कहलाता है। अतः संसाधन, संसाधनों की प्राप्ति व संसाधनों का विनियोग, में तीनों मिलकर अर्थ पुरुषार्थ कहलाता है।

तीसरा पुरुषार्थ है- धर्म। कामना पूर्ति के लिए संसाधनों की प्राप्ति को सर्वजनहिताय और सर्वजनसुखाय बनाने के लिए तथा मोक्ष प्राप्ति के अनुकूल बनाने के लिए जो सार्वभौमिक नियम व व्यवस्था है, उसे धर्म पुरुषार्थ कहा है। अतः अर्थ और काम धर्म के अनुकूल हों, धर्म के अविरोधी हों यह अनिवार्य सिद्धांत है। इसलिए अर्थशास्त्र का धर्माधारित होना अनिवार्य है।

इच्छाएँ और आवश्यकताएँ

काम पुरुषार्थ में हमने जाना कि भोगों को भोगने से कामनाओं की सन्तुष्टि नहीं होती। इसलिए सबसे पहले हमें इच्छाओं के सन्दर्भ को ठीक करना होगा। अर्थात् हमें इच्छा और आवश्यकता का अन्तर समझना होगा।

इच्छा का सम्बन्ध मन से है, जबकि आवश्यकता का सम्बन्ध शरीर व प्राण से है। आहार, निद्रा, विश्राम, आश्रय, सुरक्षा ये शरीर व प्राण की आवश्यकताएँ हैं। परन्तु विलास, संग्रह, परिग्रह और स्वामित्व ये मन की इच्छाएँ हैं। इसी तरह अन्न, वस्त्र, निवास ( रोटी, कपड़ा व मकान) आदि प्राण रक्षा के जितने भी साधन हैं, वे आवश्यकताएँ हैं, परन्तु विविध प्रकार के वस्त्र, स्वादिष्ट पकवान, शोभायमान वस्तुएँ, आभूषण, वाहन और धन सम्पत्ति आदि ये सब इच्छाएँ हैं।

आवश्यकताएँ सीमित होती है, जबकि इच्छाएँ असीमित होती हैं। जैसे आवश्यकताओं की पूर्ति होना प्रत्येक व्यक्ति का जन्मसिद्ध अधिकार है। वैसे ही इच्छाओं के अधीन नहीं होना, इच्छाओं को संयमित और नियंत्रित रखना प्रत्येक व्यक्ति का कर्तव्य है।

इच्छाएँ कभी पूरी नहीं होती, इस आशय की एक कथा –

निन्याणवे का फेर

एक धनि व्यक्ति दिन-रात अपने व्यापार को बढ़ाने में लगा रहता था। उसके पास अपने बच्चों व पत्नी से बात करने की भी फुर्सत नहीं थी। उसके पड़ौस में एक मजदूर रहता था, जो एक रुपया रोज कमाकर लाता और उसी में अपने परिवार को पालता था। रात को वह अपने बच्चों व पत्नी के साथ खूब हँसी-मजाक करता और चैन से रहता था। सेठ की पत्नी यह सब देखती और मन ही मन बड़ी दुखी होती कि हमसे तो यह गरीब मजदूर ही अच्छा है, जो गरीबी में भी अपनी गृहस्थी आनन्द पूर्वक चला रहा है।

एक दिन उसने हिम्मत करके अपना यह महादुख सेठ को कह डाला। हमारी ढेर सारी दौलत का क्या फायदा? इसमें फँसे रहने से सब आनन्द ही छूट गए हैं। तुम कहती तो ठीक हो, परन्तु धन बढ़ाने की इच्छा ही ऐसी है कि जो एक बार इस लोभ में फँस जाता है, वह हमेशा निन्याणवे के फेर पड़ जाता है। तुम इस मजदूर की बात करती हो, यह इसलिए सुखी है कि इसने अपनी इच्छाओं को सीमित कर रखा है। यह मजदूर भी निन्याणवे के फेर में पड़ जाय तो इसकी ज़िन्दगी भी मेरी जैसी नीरस हो जाएगी।

सेठानी ने इस बात को परखने की योजना बनाई। उसने रुपयों से भरी एक पोटली रात में उस मजदूर के घर में फेंक दी। सवेरे मजदूर उठा तो देखा कि आंगन में एक पोटली पड़ी है। पोटली को उठाया और खोलकर देखा तो उसमें रुपए दिखे। वह बहुत खुश हुआ, पत्नी को बुलाया और रुपए गिने। पूरे निन्याणवे रुपए निकले। दोनों को लगा कि हमें निन्याणवे रुपए तो मिल गए, क्यों न हम इन्हें बढाएं और एक दिन हम भी सेठ बन जायें। अब वे पैसे बढ़ाने में लगे गए। रोज का एक रुपया कमाते, उसमें से आठ आने खाते और आठ आने बचाते। अब उन्हें और अधिक रुपए बढ़ाने का चस्का लग गया। वे कम खाते, रात में भी काम करते ताकि रुपए बढ़ते चले जाय।

उधर सेठानी ऊपर से उस मजदूर के हालचाल देखती रहती। उस मजदूर का परिवार जो गरीब होने पर भी आनन्दमय जीवन बिताता था, वह थोड़े ही दिनों के बाद निन्याणवे के फेर में पड़कर अपना सारा सुख-चैन खो बैठा। वह दिन-रात पैसों की हाय-हाय में चिन्तित रहने लगा। तब सेठ ने सेठानी को बताया कि धन बढ़ाने और जमा करने की इच्छाएँ ही ऐसी पिशाचिनी है जो अमीर या गरीब किसी की भी जिंदगी को नरक बना देती है। अर्थात् इच्छायें कभी पूरी नहीं होती।

आवश्यकताओं की पूर्ति होनी चाहिए

आवश्यकताओं को हम अधिकार के रूप में ले सकते हैं, परन्तु इच्छाओं को सर्वजनसुखाय और सर्वजनहिताय रूपी धर्म के द्वारा नियंत्रित करके ही पूरी कर सकते हैं। श्रीमद्भगवद्गीता में श्रीकृष्ण कहते हैं –

धर्माविरुद्धो भूतेषु कामोऽस्मि भरतर्षभ।

अर्थात् सर्व प्राणियों में धर्म के अविरुद्ध जो काम है, वह मैं हूँ। यह कहकर काम को भी महत्त्वपूर्ण स्थान दिया गया है। अतः अर्थ-पुरुषार्थ का और अर्थशास्त्र का विचार आवश्यकता पूर्ति के सन्दर्भ में करना चाहिए, इच्छापूर्ति के सन्दर्भ में नहीं।

यह संभव है कि एक ही पदार्थ या एक ही क्रिया किसी एक सन्दर्भ में इच्छा और दूसरे सन्दर्भ में आवश्यकता हो सकती है। इसलिए आवश्यकता और इच्छा में विवेक पूर्वक निर्णय करना चाहिए। इसके साथ ही अर्थशास्त्र का जीवन शास्त्र के सन्दर्भ में विचार करना चाहिए। जीवन शास्त्र के विविध पहलुओं से सम्बन्धित जो जो शास्त्र हैं, उनके साथ अर्थशास्त्र का समायोजन होना चाहिए। जैसे- समाजशास्त्र, पर्यावरण, तकनीकी, मनोविज्ञान, नीतिशास्त्र या धर्मशास्त्र के साथ अर्थशास्त्र का अनुकूल सम्बन्ध होना चाहिए। अर्थशास्त्र की सार्थकता और उपादेयता हेतु ऐसा होना आवश्यक है।

  1. प्रभूत उत्पादन होना चाहिए

सर्वजन की आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु संसाधन चाहिए। संसाधनों की उपलब्धता उत्पादन पर निर्भर होती है। अतः उत्पादन प्रभूत मात्रा में होना चाहिए। प्रभूत उत्पादन के लिए तीन बातों की आवश्यकता होती है।

  • प्राकृतिक स्रोत – भूमि की उर्वरता, अनुकूल जलवायु, खनिज, वनस्पति और समुद्र से प्राप्त रत्न।
  • मानवीय कौशल – मनुष्य की बुद्धि और हाथ की निर्माण क्षमता।
  • विनियोग का विवेक – उत्पादित सामग्री का वितरण, रख-रखाव, गुणवत्ता व उपभोग की समझ।

इन तीनों बातों के साथ यह प्रमुख बात भी ध्यान में रखनी चाहिए कि प्रभूतता का विचार आवश्यकताओं के सन्दर्भ में ही करना चाहिए, इच्छाओं के सन्दर्भ में नहीं।

वर्तमान का अर्थशास्त्र अभाव का अर्थशास्त्र (Economy of want) है। वही बाजार को चालना देता है, उत्पादन को प्रभावित करता है, वितरण को नियंत्रित करता है और कीमतों का निर्धारण करता है। जबकि भारतीय अर्थव्यवस्था हमें ‘प्रभूतता का अर्थशास्त्र’ (Economy of abundance) की संकल्पना को प्रस्थापित और प्रतिष्ठित करने की बात बताता है। अतः अर्थव्यवस्था के लिए मन का संयम बहुत बड़ा सहायक व प्रेरक तत्त्व है।

  1. उत्पादन, व्यवसाय और अर्थार्जन

वस्तुओं के उत्पादन हेतु अनेक व्यवसाय शुरू होते हैं। उत्पादन के साथ मनुष्यों का सम्बन्ध है। अतः प्रत्येक व्यक्ति का उत्पादन में सहभाग होना आवश्यक है। उत्पादन उपभोग के लिए होता है। इसलिए समाज की आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु उत्पादन का निर्धारण व नियमन करना चाहिए।

यह समझना भी आवश्यक है कि उत्पादन अर्थार्जन के लिए करना चाहिए अथवा आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए करना चाहिए? यदि उत्पादन अर्थार्जन के लिए होगा तो जो आवश्यक नहीं है, ऐसा उत्पादन भी होगा। ऐसी वस्तुओं को लेने वाले नहीं होंगे तो उत्पादन व्यर्थ जाएगा, फलत: अर्थार्जन भी नहीं होगा। इसलिए उस वस्तु के लिए विज्ञापन द्वारा कृत्रिम आवश्यकता निर्माण की जाएगी। परिणाम स्वरूप समाज में अनवस्था निर्माण होगी। आज यही सबकुछ हो रहा है। उत्पादक अर्थार्जन हेतु ग्राहक को येनकेन प्रकारेण उस वस्तु को खरीदने हेतु विवश करता है।

इस दृष्टि से अधोलिखित बिन्दुओं का विचार करना चाहिए।

  • उत्पादन में प्रत्येक व्यक्ति की सहभागिता होनी चाहिए।
  • उत्पादन में सहभागिता हेतु व्यक्ति स्वयं क्षमतावान होना चाहिए।
  • व्यक्ति को उत्पादन में सहभागी होने के लिए क्षमतावान बनाने की समाज द्वारा व्यवस्था होनी चाहिए।
  • उत्पादन में सहभागी होने के फलस्वरूप उसे कम से कम उतना धन तो प्राप्त होना ही चाहिए, जितना उसके योगक्षेम के लिए आवश्यक है।

इस प्रकार समाज की आवश्यकता, यह प्रारम्भ बिन्दु बनना चाहिए। यदि इसे बदलकर अर्थार्जन की प्रवृत्ति को प्रारम्भ बिन्दु बनाया जाता है तो सर्वजनहिताय व सर्वजनसुखाय का उद्देश्य कभी सिद्ध नहीं होगा।

(लेखक शिक्षाविद् है, भारतीय शिक्षा ग्रन्थमाला के सह संपादक है और विद्या भारती संस्कृति शिक्षा संस्थान के सह सचिव है।)

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