कैसे अंग्रेजों ने ध्वस्त की भारत की विकसित शिक्षा प्रणाली : आओ जाने – 2

– प्रशांत पोळ

ऑस्ट्रिया के एक मिशनरी, जॉन फिलिप वेस्डिन, अठारहवीं शताब्दी के अंत में केरल के मलाबार में काम कर रहे थे। । वर्ष 1776 से 1789 तक वह केरल में थे। उन्होंने यूरोप में वापस जा कर, वर्ष 1793 में, रोम में अपना लेख (जिसे उन्होंने account कहा है) प्रकाशित किया। इसमें लिखते हैं, “The education of youth in India is much simpler, and not near so expensive as in Europe. The method of teaching writing was introduced into India, two hundred years before the birth of Christ, according to the testimony of Megasthenes, and still continued to be practiced.”

मिशनरी बनने के बाद लिये हुए Fra Paolino Da Bartolomeo इस नाम से लिखे आलेख में आगे कहते हैं कि इन कक्षाओं के शिक्षक, छोटी कहानियां और श्लोकों के माध्यम से नैतिक और सदाचार पूर्ण शिक्षा देते हैं। इन्होंने उन सभी विषयों की सूची दी है, जो पाठशालाओं में पढ़ाए जाते हैं। ये विषय हैं – कविता, वनस्पति शास्त्र, चिकित्सा शास्त्र, नौकायन शास्त्र, तर्कशास्त्र, न्याय शास्त्र, खगोलशास्त्र, निःयुद्ध (मार्शल आर्ट), मौन, स्वाध्याय आदि… वे कहते हैं, भारतीयों की इस शिक्षा पद्धति से विद्यार्थियों का व्यावसायिक ज्ञान मजबूत और उन्नत होता है”। यह सब लिखते हुए वह डिडोरस सिकुलस, स्ट्राबो, आरियन आदि ग्रीक (यूनानी) विद्वानों के संदर्भ देते हैं।

यह सब लिखने के बाद, फ्रा पाओलिनो दा बार्टोलोमीओ (पहले का नाम – जॉन फिलिप वेस्डिन) लिखते हैं, “Indian do not follow that general and superficial method of education, by which children are treated as if they were all intended for the same condition and for discharging the same duties.”

इन्होंने आगे लिखा है, “By the time of Alexander the Great, the Indian had acquired such skill in the mechanical arts, that Nearchus, the commander of Alexander’s fleet, was much amazed at the dexterity (निपुणता / कौशल) with which they (Indians) imitated the accoutrements of the Grecian soldiers।” आगे लिखा है, “It however cannot be denied that the arts and sciences in India have greatly declined since the foreign conquerors expelled the native kings, by which several have been laid extremely waste and the cast confounded with each other.”

यह भी माना जाता है कि अंग्रेज़ आने से पहले, शिक्षा पर ब्राह्मणों का ही एकाधिकार था। किंतु अंग्रेजों ने, उन्होंने प्रारंभिक काल में, देश के विभिन्न हिस्सों में जो सर्वेक्षण किए, उनमें मिला डेटा इस मिथक को पूरी तरह ध्वस्त करता है। यह झूठ, अंग्रेजी शासन के प्रारंभिक दिनों में ईसाई मिशनरी और शिक्षा विभाग में काम कर रहे अंग्रेज़ अफसरों ने फैलाया है।

सर्वेक्षणों से प्राप्त डेटा के अनुसार वर्ष 1825 के आस पास, शाला में जाने वाले विद्यार्थियों की संख्या थी 1,75,089। इनमें मात्र 42,502 ब्राह्मण विद्यार्थी थे (अर्थात 24-25%)। ब्राह्मणों के अलावा अन्य सवर्ण जातियों के विद्यार्थियों की संख्या थी 19,669 (11%)। बचे हुए लोगों में 85,400 यह शूद्र तथा अन्य पिछड़ी जाति के थे। (अंग्रेजी आंकड़े और नामों के अनुसार)। मुस्लिम विद्यार्थियों की संख्या 7% थी। मद्रास प्रेसीडेंसी के अंतर्गत मलाबार के जो आंकड़े दिये गए हैं, उनके अनुसार, धर्मशास्त्र, खगोलशास्त्र, तर्कशास्त्र, चिकित्सा शास्त्र आदि विषयों में कुल 1,588 विद्यार्थी थे, उनमें ब्राह्मणों की संख्या थी 639। अंग्रेजों के अनुसार ‘शूद्र’ इस संज्ञा के अंतर्गत 254 विद्यार्थी थे। अन्य पिछड़ी जाति के विद्यार्थी 672 थे। चिकित्सा शास्त्र के 190 विद्यार्थियों में ब्राह्मण विद्यार्थियों की संख्या मात्र 31 है।

अंग्रेजों के सर्वेक्षणों में, पूरे देश के किसी भी हिस्से का डेटा लिया, तो भी यही निष्कर्ष निकलते हैं। अर्थात, अंग्रेज़ आने से पहले हमारी शिक्षा व्यवस्था सब के लिए खुली थी, मुक्त थी।

John Malcolm Ludlow यह एंग्लो – ब्रिटिश बैरिस्टर थे, जिनका जन्म 1821 में मध्यप्रदेश के नीमच में हुआ था। इनके पिताजी ईस्ट इंडिया कंपनी में अधिकारी थे। बाद में John Malcolm इंग्लैंड गए और वहां ‘वर्किंग मेंस कॉलेज’ की स्थापना की। इस कॉलेज के विद्यार्थियों को समय-समय पर भारत के बारे में जो व्याख्यान (लैक्चर) उन्होंने दिये, उनका संकलन ‘ब्रिटिश इंडिया’ शीर्षक से हुआ। यह संकलन 3 भागों (volumes) में उपलब्ध है। इस ‘ब्रिटिश इंडिया’ में जॉन माल्कम लुड़लो कहते हैं, “In every Hindu village, which has retained anything of its form, the rudiments of knowledge are sought to be imparted, there is not a child, who is not able to read, to write, to cipher in the last branch of learning they are confessedly most proficient.”

इसी ‘ब्रिटिश इंडिया’ में आगे लिखा है, “Where the village system has been swept away by us (Britishers), as in Bengal, here the school system has equally disappeared!”

संक्षेप में, अंग्रेज़ जब भारत में सत्ता के आसपास पहुंच रहे थे, तब भारत की शिक्षा व्यवस्था विकेंद्रित थी। लगभग सभी गावों में पाठशालाएं थी। गांवों द्वारा इन पाठशालाओं की आर्थिक व्यवस्था देखी जाती थी। शिक्षकों को अच्छा वेतन था। इन पाठशालाओं का स्तर अच्छा था (लेटनर तो कहता हैं, इनका स्तर, केंब्रिज और ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालयों के बराबर था)। एक सुव्यवस्थित शिक्षा पद्धति भारत में कार्यरत थी।

इसी समय इंग्लैंड में शिक्षा व्यवस्था की क्या स्थिति थी?

एलेक्जेंडर वॉकर ने ‘भारतीय शिक्षा’ पर जो पुस्तक लिखी है, उसमें इसका वर्णन है। वॉकर लिखता है, ‘इंग्लैंड में सत्रहवीं-अठारहवीं शताब्दी में औद्योगीकरण का उछाल (boom) आया था। यह औद्योगीकरण, विद्यार्थियों की तरुणाई को खाए जा रहा था। बच्चों को इन उद्योगों में, कठिन परिस्थिति में, काम में झोंक दिया जाता था। बाल श्रमिकों के विरोध में कोई कानून नहीं था।

इंग्लैंड में ऑक्सफोर्ड, केंब्रिज, एडिनबर्ग आदि विश्वविद्यालय तेरहवीं-चौदहवीं शताब्दी से थे। अठारहवीं शताब्दी तक इंग्लैंड में 500 ‘ग्रामर स्कूल्स’ थे। किन्तु इनकी पहुंच जनसामान्य तक नहीं थी। शिक्षा महंगी थी और समाज का आभिजात्य वर्ग ही उसे ग्रहण कर सकता था। वर्ष 1792 में, पूरे इंग्लैंड की शालाओं में विद्यार्थियों की संख्या मात्र 40,000 थी! सामान्य वर्ग के लिए, ‘बच्चे को बाइबल पढ़ते आया, अर्थात अच्छी शिक्षा मिल गई’, ऐसा माना जाता था।

ऐसी पृष्ठभूमि में, एंड्रयू बेल नामक शिक्षाविद ने सन 1802 के आसपास, भारतीय शिक्षा व्यवस्था का अध्ययन कर इंग्लैंड की शालाओं के लिए एक प्रणाली विकसित की, जो आज भी ‘मोनिटोरियल सिस्टम’ या ‘मद्रास सिस्टम’ के नाम से जानी जाती है। ‘मद्रास सिस्टम’ इसलिए, क्योंकि एंड्रयू बेल और जोसफ लंकास्टर ने मद्रास इलाके के एगमोर में शालाओं का अध्ययन करके, यह प्रणाली विकसित की।

इस पद्धति में शिक्षा सस्ती थी। एक ही शिक्षक, विद्यार्थियों के बड़े समूह को सिखाता था। वह कक्षा के ‘कक्षा नायकों’ (मोनिटर्स-monitors) की मदद लेता था। यह ‘कक्षा नायक’, उन विद्यार्थियों में से ही होते थे, जो थोड़े तेज रहते थे। यह बच्चे (मोनिटर्स), अपने समूह के बच्चों को नियंत्रित करते थे। इसे ही ‘मोनिटोरियल सिस्टम’ या ‘मद्रास सिस्टम’ कहा गया।

एंड्रयू बेल, एक निजी शिक्षक (प्राइवेट ट्यूटर) के रूप में अपना करियर बनाना चाह रहे थे। फरवरी 1787 में वे भारत के दक्षिण-पूर्वी किनारे, मद्रास में पहुंचे। मद्रास प्रेसीडेंसी में वे दस वर्ष रहे। इन्होंने केरल में देखा कि कुछ विद्यार्थी, अपने ही साथ के विद्यार्थियों को पढ़ा रहे हैं। बाद में, इस व्यवस्था की और अधिक जानकारी लेने के बाद, एंड्रयू बेल के दिमाग में ‘मोनिटोरियल शिक्षा पद्धति’ की कल्पना साकार हुई। उन्होंने इंग्लैंड जाकर, जोसेफ लंकेस्टर के साथ मिल कर इस प्रणाली की पाठशालाएं प्रारंभ की, जिन्हें जबरदस्त समर्थन मिला। और इस प्रकार भारतीय शिक्षा पद्धति पर आधारित शालाएं इंग्लैंड में चलने लगीं।

और हमें पढ़ाया जाता रहा कि भारत की शिक्षा पद्धति, अंग्रेजों ने खड़ी की..!

भारत में ईस्ट इंडिया कंपनी के व्यापार को ज्यादा मजबूत बनाने के लिए, ब्रिटन की संसद ने एक ‘चार्टर अधिनियम’ पारित किया। ‘1813 का चार्टर अधिनियम’ इस नाम से यह प्रसिद्ध है। इस अधिनियम के अनुसार, भारत में ईस्ट इंडिया कंपनी के शासन को जारी रखा गया। अर्थात इसके अंतर्गत, भारत पर ब्रिटन के राजा की संप्रभुता साबित की गई। चार्टर अधिनियम में, मिशनरियों को भारत में जाकर ईसाई धर्म का प्रचार-प्रसार करने की अनुमति दी गई थी।

लोकतंत्र के प्रति अपना प्रेम दिखाने के लिये, ब्रिटन की संसद ने, इस अधिनियम के अंतर्गत यह कहा कि ‘भारत को शिक्षित करना ब्रिटन का दायित्व है’ (अधिनियम के इस एक वाक्य से अंग्रेजों ने यह साबित करने का पूरा प्रयास किया कि अंग्रेजों के आने से पहले का भारत गंवार और अनपढ़ था)। अर्थात ईस्ट इंडिया कंपनी को कहा गया कि वे शिक्षा पर ज्यादा पैसा खर्च करे तथा इन नेटिवों को (भारतीयों को) ‘ठीक से’ शिक्षित करे। अब मुद्दा उठा कि शिक्षा किसे देनी हैं? कौन सी भाषा में देनी है? और कौन सी रचना से (कौन से सिस्टम से, कौन से विभाग से) देनी है?

भाषा के मामले में अंग्रेजों में ही दो मत थे। एक मत के समर्थक कह रहे थे कि भारतीय भाषाओं में, विशेषकर संस्कृत में, भारतीयों को शिक्षा देना चाहिए। इस मत के लोगों ने भारतीय ज्ञान का वैभव देखा था। उन्हें यह मालूम था कि भारतीय ज्ञान परंपरा यह इंग्लैंड की ज्ञान परंपरा से कहीं अधिक प्राचीन और समृद्ध है।

किंतु इस ‘ओरिएंटलिस्ट विचारधारा’ के समर्थक अत्यंत अल्पमत में थे। अधिकतर अंग्रेजों को लगता था कि भारतीय लोगों की स्वतः की कोई शिक्षा पद्धति नहीं है। ये तो दक़ियानूसी और पिछड़े लोग हैं। इन्हें अंग्रेजी में ही शिक्षित करना चाहिए।

इसी बीच, वर्ष 1818 में ईस्ट इंडिया कंपनी ने मराठों को हराकर, लगभग पूरे देश पर अपना अधिकार जमा लिया था। अब तो इस शिक्षा व्यवस्था को, रियासतों को छोड़कर, बचे हुए ‘ब्रिटिश इंडिया’ में लागू करना सरल था। युद्ध का वातावरण भी नहीं के बराबर था। इसलिए ईस्ट इंडिया कंपनी, इस व्यवस्था के कार्यान्वयन पर जुट गई।

उन दिनों लॉर्ड विलियम बेंटिक भारत के गवर्नर जनरल थे। 4 जुलाई, 1828 से 20 मार्च 1835 तक उनका कार्यकाल रहा। उन्होंने ब्रिटिश पार्लियामेंट से English Education Act 1835 पारित कराया। उन दिनों न्यायालयों में चलने वाली फारसी भाषा के स्थान पर अंग्रेजी की प्रतिस्थापना की।

और उसके बाद, भारत की शिक्षा पद्धति का एकमात्र उद्देश्य, भारतीयों को अंग्रेजी मानस में ढालना, इतना ही रह गया..!

वर्ष 1844 में हेनरी हार्डिंग्स भारत के गवर्नर जनरल बने। ये सेनानी थे। फील्ड मार्शल रह चुके थे। फर्स्ट वायकाउंट हार्डिंग यह उनकी उपाधि थी। यह जब भारत के गवर्नर जनरल बनाए गए, तब ब्रिटिश सेना, उत्तर-पश्चिमी भाग में सिक्खों से लड़ रही थी।

हेनरी हार्डिंग्स ने गवर्नर जनरल का पदभार सभालने के तुरंत बाद घोषणा की, कि ‘जिन लोगों ने अंग्रेजी शालाओं से अपना पाठ्यक्रम पूरा किया है, उन सभी को सरकारी नौकरियों में प्राथमिकता दी जाएगी’।

इसके दस वर्ष के अंदर ही, अर्थात वर्ष 1854 में, सर चार्ल्स वुड ने भारत के तत्कालीन गवर्नर जनरल लॉर्ड डलहौजी को एक पत्र लिखा, जिसे ‘वुड्स डिस्पेच’ या ‘वुड का घोषणापत्र’ कहा जाता है। इसे ‘भारत में अंग्रेजी शिक्षा का मैंग्ना कार्टा’ भी कहा जाता है। (‘मैग्ना कार्टा’ या ‘ग्रेट चार्टर’, यह एक दस्तावेज़ है, जो 15 जून 1215 को थेम्स नदी के किनारे किंग जॉन, इंग्लैंड में राजनैतिक स्वतंत्रता के संदर्भ में हस्ताक्षर कर जारी किया था)।

सर चार्ल्स वुड (1800-1885), ब्रिटिश पार्लियामेंट के सदस्य थे। वे 1852 से 1855 तक, ‘बोर्ड ऑफ कंट्रोल’ के अध्यक्ष भी थे। अपने घोषणापत्र में उन्होंने भारत में अंग्रेजी शिक्षा के महत्व पर ज़ोर दिया। भारत में अंग्रेजी सत्ता ठीक से स्थापित होने में उनका सबसे बड़ा योगदान यह था, कि उन्होंने भारतीयों के बीच एक ‘अंग्रेजी वर्ग’ (इंग्लिश क्लास – पूर्णतः अंग्रेजी मानसिकता का भारतीय वर्ग) का निर्माण किया, जो अंग्रेज़ों और अंग्रेजी शासन के प्रति अत्यधिक वफादार था।

इन सब के चलते अंग्रेजी भाषा, अंग्रेजी साहित्य का प्राबल्य हुआ। पुरानी चलती आ रही भारतीय शिक्षा पद्धति को दकियानूसी माना जाने लगा। धीरे-धीरे थोड़ी बहुत बची हुई गुरुकुल परंपरा समाप्त होती गई। अत्यंत सुंदर विकेंद्रित व्यवस्था के अंतर्गत, गांवों में चलाई हुई पाठशालाएं बंद होती गईं और उनके स्थान पर अंग्रेजी शालाएं खुलती गईं..!

अर्थात भारत में स्वतंत्र विकसित, प्राथमिक शिक्षा की प्रणाली, इंग्लैंड ने अपनाई, और हमारी विकेंद्रित शिक्षा पद्धति को नष्ट करके हम पर अंग्रेजी शिक्षा प्रणाली थोप दी…!

संदर्भ –

  1. The British System of Education – Joseph Lancaster (1778 – 1838)
  2. The Practical Parts of Lancaster’s improvements and Bell’s experiments – Joseph Lancaster and Andrew Bell। Edited by David Salmon (1932)
  3. Improvement in Education, as it respects the Industrious Classes of the Community – Joseph Lancaster
  4. Cambridge Essay’s on Education – Arthur Christopher Benson (1919)
  5. The Beautiful Tree: Indigenous Indian Education in the Eighteenth Century – Dharmpal
  6. Education System in Pre-British India – Ram Swarup
  7. A Report on the State of Education in Bengal – William Adam
  8. Alternate Perceptions of India: Arguing for a Counter Narrative – Dr। Anirban Ganguly (VIF)
  9. British India, its races and its history, considered with reference to mutinies of 1857 – John Malcom Ludlow
  10. Background of Macaulay’s Minute – Elmer H. Cutts (Published in American Historical Review – Vol 58, No 4, July 1953)
  11. Missionaries in India – Arun Shourie
  12. Impact of British Raj on the Education System in India: The Process of Modernization in the Princely States of India – The case of Mohindra College, Patiala – Kanika Bansal (2017)
  13. The Tormented Indian Spirit: Redemption or Regression – Bhagini Nivedita
  14. The History of British India – James Mill (1848)
  15. Sir John Malcolm and the Creation of British India – Jack Harrington (2011)

और पढ़ें : https://rashtriyashiksha.com/how-britishers-demolished-developed-education-system-of-bharat-lets-know-1/

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