– गोपाल माहेश्वरी
रघुवीर के विद्यालय में दशहरा अवकाश आरंभ होने के पूर्व शिक्षिका ने कुछ गृहकार्य करने के लिए दिए। इस वर्ष दशहरा और दीपावली एक ही माह में आने वाले थे और इसके बाद एक माह छोड़कर ही तो अर्धवार्षिक परीक्षाएं होने वाली हैं यह समझते हुए शिक्षिका चाहती थीं कि पाठ्यक्रम समय पर पूरा हो जाए और बच्चों को पढ़ने समझने का समय भी मिल सके।
घर आते ही रघुवीर ने बस्ता पटका और मित्रों के साथ रावण का पुतला बनाने चल पड़ा। माधुरी स्वयं भी एक शिक्षिका थीं बेटे को पुकार कर पूछा “रघू! विद्यालय से आते ही खेल में लग गए?”
“माँ! चार दिन अवकाश है अब।”
“कुछ गृहकार्य नहीं मिला विद्यालय से?” माधुरी ने अपने अनुभव के आधार पर पूछा।
“कुछ दिया तो है पर अभी चार दिन है माँ! कर लूँगा।” रघुवीर ने ठुनकते हुए कहा और रावण बनाने की जुगाड़ में लग गया। माधुरी उस समय चुप रह गई।
एक घंटे बाद उसने बेटे से पूछा “एक कहानी सुनोगे रघू!”
रघुवीर ने कहा “हाँ पर एक नई कहानी सुनाना।”
“कहानी तो पुरानी है पर तुमने नहीं सुनी होगी इससे तुम्हारे लिए नई है। सुनोगे?”
रघुवीर पास आकर बैठ गया। माधुरी ने शाम के भोजन के लिए तरकारी काटते हुए कहना प्रारंभ किया “कहानी उसी रावण की है जिसका पुतला दशहरे के दिन जलाया जाएगा। हुआ यों कि जब रामचंद्र जी ने रावण को इकतीस बाण एक-साथ मारकर गिरा दिया तब उसकी कुछ सांसें शेष रहते ही रामचंद्र जी ने अपने छोटे भाई लक्ष्मण से कहा कि लक्ष्मण! आज राजनीति का महापंडित रावण यमलोक जाने को तैयार है जाओ इससे कुछ नीति उपदेश ले लो। फिर कौन जाने ऐसा विद्वान संसार में कब जन्म लेगा।
भाई की आज्ञा मानकर लक्ष्मण रावण के पास पहुँचे और हाथ जोड़कर नीति उपदेश देने की प्रार्थना की।
रावण बोला “बहुत विलंब हुआ है लक्ष्मण, अब मेरे जीवन की कुछ ही घड़ियां शेष हैं, अब उपदेश का समय कहाँ है?”
“लेकिन भैया राम ने भेजा है मुझे तो कृपया कुछ तो उपदेश दीजिए, उनकी आज्ञा का पालन कर पाऊंगा।”
रावण ने पीड़ा से कराहते हुए कहा “लक्ष्मण! मेरी संपूर्ण विद्वत्ता और अनुभव का सार है कि आज का कम कल पर मत छोड़ो। मैंने तीन बड़े काम करने का विचार किया था। पहला अग्नि में से धुआं समाप्त कर दूंगा, देख रहे हो मेरी सोने की चमचमाती लंका कैसी काली पड़ गई है। दूसरा मैंने सोचा था समुद्र का पानी मीठा बना दूंगा। इसके खारे जल से मेरे घावों में कितनी पीड़ा हो रही है। तीसरा काम था स्वर्ग तक सीढियाँ बना दूंगा, काश आज इस तरह छटपटाते हुए देह छोड़कर स्वर्ग नहीं जाना पड़ता। तीनों काम मैं आसानी से कर सकता था। मेरे बल, बुद्धि, प्रभाव सब इसके लिए सक्षम थे, पर मैंने सोचा कर लूँगा, कल कर लूँगा और तुम देख ही रहे हो वह कल नहीं आया, आज काल ही आ गया। इसलिए आज का काम कल पर न छोड़ो यही मेरा उपदेश है।”
माधुरी कहानी पूरी कर मौन हो गई। उसने देखा रघुवीर अपना बस्ते से कापी निकाल रहा है अपना गृहकार्य पूरा करने के लिए।
माधुरी मुस्कुराते हुए उसकी दृढ़ता परखने के लिए बोली “कुछ ही देर में रात होने वाली है गृहकार्य कल कर लेना।”
“नहीं माँ, मुझे रावण नहीं बनना है।”
माँ-बेटे खिलखिलाकर हँस पड़े। अचानक रघुवीर को लगा जमीन पर पड़ा अधबना रावण का पुतला भी मुस्कुरा रहा है शायद।
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(लेखक इंदौर से प्रकाशित ‘देवपुत्र’ बाल मासिक पत्रिका के संपादक है।)