॥ॐ॥
नमो देव्यै महादेव्यै शिवायै सततं नमः।
नम: प्रकृत्यै भद्रायै नियता: प्रणता: स्म ताम्
(श्रीदुर्गासप्तशती ५/९)
माँ भगवती के श्रीचरणों में नमन करते हुए शारदेय नवरात्र के अंतिम नौवें दिन सभी स्नेही मित्रों, ज्ञानसाधक बन्धु-बहनों को नमस्कार।
विश्व के आदि ग्रंथ ऋग्वेद के ज्ञानसूक्त में कहा गया, “प्रारंभिक स्थिति में पदार्थों के नाम रखे गए। यह ज्ञान का प्रथम चरण था। दोषरहित ज्ञान, पदार्थों का गुण -धर्म अनुभूति की कंदरा में आवेष्टित था जो अंत: प्रेरणा से प्रकट हुआ।”
कहा गया, “ऋषय: मन्त्रदृष्टार:”। अर्थात् ऋषियों ने मंत्रों के दर्शन किए। तो मंत्र कोई मनुष्य थे क्या? समाधि की परमावस्था में जब ऋषियों की चेतना विश्व चैतन्य से एकाकार हो जाती थी, उस समय जिन तत्त्वों की आंतरिक अनुभूति उन्हें हुई, उस तत्त्व चिंतन को ही दर्शन कहा गया। इस प्रकार की पारलौकिक क्षमता सभी में नहीं थी, इसलिए सबके कल्याण के निमित्त उन ऋषियों ने उन आधिदैविक अनुभूतियों का संकलन और लेखन किया जिसे कालांतर में ‘वेद’ संज्ञा दी गई। इसीलिए वेदों को ‘अपौरुषेय’ कहा गया अर्थात् जिनका मूल स्रोत कोई व्यक्ति नहीं है। यह संकलित ज्ञान अव्यवस्थित स्वरूप में था जिसे विषयानुसार वर्गीकृत एवं क्रमबद्ध किया अनेक शताब्दियों बाद कृष्ण द्वैपायन नामक ऋषि ने, जिन्हें इसी कारण ‘वेदव्यास’ कहा गया क्योंकि उन्होंने इस संकलित ज्ञान को विभाजित कर उसको अपने चार अलग-अलग शिष्यों को एक-एक वेद के विषय में पारंगत होने और उसे अपने-अपने शिष्यों को अध्ययन-अभ्यास कराने की प्रेरणा दी। इस प्रकार वेदों की शाखाएं बनीं।
वेदों के उच्च स्तरीय ज्ञान और भाषा को समझना सामान्य जन के स्तर से ऊपर था। अगली पीढ़ी को सुलभ कराने और अन्तर्निहित ज्ञान को विस्तार देने के उद्देश्य से परवर्ती ऋषियों ने उनके भाष्य लिखे, व्याख्याएं कीं। उत्तर-वैदिक काल में उपनिषद् रचना हुई। षड्दर्शन में जिज्ञासा और तर्क को स्थान दिया गया।
कालान्तर में इसी के विकास क्रम में ज्ञान की विभिन्न शाखाओं और विधाओं का जन्म हुआ। पाणिनि का व्याकरण शास्त्र और पिंगल का छन्दशास्त्र रचा गया। पतञ्जलि ने योगसूत्र और भाषा-अनुशासन दिया। भरत मुनि का नाट्यशास्त्र, वात्स्यायन का कामसूत्र, चरक-सुश्रुत-वाग्भट की आयुर्विज्ञान संहिताएं और कौटिल्य का अर्थशास्त्र – इन सबकी रचना के काल खण्ड अलग-अलग, पहले-बाद में हो सकते हैं परन्तु सभी भारतीय ज्ञान परम्परा की विविध शाखाएं हैं।
ऋग्वेद में सृष्टि रचना प्रक्रिया का उल्लेख है। यजुर्वेद में यज्ञ विधान, ज्यामिति और छंद विधान है। सामवेद वेदमन्त्र गायन की विधि बताता है, सप्त स्वर का वर्णन करता है। ‘कमलपत्र पर वर्षा की बूंदें गिरने की ध्वनि सुन कर तालवाद्यों के निर्माण की कल्पना आई। माता सरस्वती और देवर्षि नारद की वीणा का वर्णन हम सुनते-पढ़ते हैं। अथर्ववेद का अर्थ है दोषरहित ज्ञान। मीमांसा – ब्राह्मण ग्रन्थ – आरण्यक की रचना ज्ञान परम्परा को सुगम बनाने के लिए हुई। स्मृतियां आचरण संहिताओं के रूप में लिखी गईं, इसीलिए देश-काल-परिस्थिति के अनुरूप उनकी विषयवस्तु में अलग-अलग विधान हैं। जो विषय मनुस्मृति में हैं, वे पराशर, याज्ञवल्क्य, कात्यायन अथवा देवल स्मृति में नहीं हैं।
वाल्मीकि रामायण में किष्किंधा नगरी में नृत्य-संगीत का उल्लेख है। महाभारत में अर्जुन अज्ञातवास में नृत्य-संगीत सीखते हैं। भगवान सदाशिव के ताण्डव नृत्य और श्रीकृष्ण की नृत्य प्रियता से अपने ग्रंथ भरे हुए हैं।
यूरोप में लोकतंत्र में किए गए प्रयासों से हजारों वर्ष पूर्व भारत में राज्य व्यवस्था, सभा-समितियों और उनके लिए चयन-निर्वाचन के उल्लेख मिलते हैं। ‘राष्ट्र’ शब्द का कहीं उल्लेख नहीं मिलता, ऐसा कहने वाले पाश्चात्य लेखन से प्रभावित विद्वान ‘श्री देवीअथर्वशीर्षम्’ (७) में माँ भगवती की घोषणा देख सकते हैं – “अहं राष्ट्री सङ्ममनी वसूनां चिकितुषी प्रथमा यज्ञियानाम्।”
श्रीमद्भगवद्गीता के महत्व का वर्णन करते हुए कहा गया – “सर्वोपनिषदो गावो, दोग्धा गोपाल – नन्दन:। पार्थो वत्स: सुधीर्भोक्ता, दुग्धं गीतामृतं महत्॥ – सब उपनिषद् गाय हैं, उनको दुह कर गोपालनन्दन श्रीकृष्ण ने गीतामृत रूपी दूध निकाला जिसे अर्जुन रूपी बछड़े ने पिया और सुधीजन जिसके भोक्ता हैं।” ऐसे गीता ज्ञान का उल्लेख किए बिना भारत की ज्ञान परम्परा की चर्चा अपूर्ण है। श्रीमद्भगवद्गीता के चतुर्थ अध्याय के प्रारंभ में श्रीकृष्ण कहते हैं –
इमं विवस्वते योगं प्रोक्तवानहमव्ययम्।
विवस्वान् मनवे प्राह मनुरिक्ष्वाकवेऽब्रवीत्॥४/१॥
एवं परम्पराप्राप्तमिमं राजर्षयो विदु:।
से कालेनेह महता योगो नष्ट: परन्तप॥४/२॥
– हे परन्तप ! सृष्टि के आदिकाल में यह ज्ञान मैंने सूर्य को दिया था, उन्होंने अपने पुत्र मनु और मनु ने इक्ष्वाकु को, परम्परा से प्राप्त इसे राजर्षियों ने जाना परन्तु कालान्तर में यह लुप्त हो गया।
अर्जुन को यह बात नहीं जंचती – “अपरं भवतो जन्म परं जन्म विवस्वत:। कथमेतद्विजानीयां त्वमादौ प्रोक्तवानिति॥४/४॥ – सूर्य के जन्म के बाद आपका जन्म हुआ फिर कल्प के आदिकाल में आपने सूर्य को बताया, यह मैं कैसे जान सकता हूँ?”
उत्तर में श्रीकृष्ण कहते हैं – “बहूनि मे व्यतीतानि जन्मानि तव चार्जुन। तान्यहं वेद सर्वाणि न त्वं वेत्थ परन्तप॥”(४/५)
मेरे और तेरे अनेक जन्म हो चुके हैं, उनका तुझे स्मरण नहीं है परन्तु मैं जानता हूँ।”
द्वितीय श्लोक में आया ‘एवं परम्पराप्राप्तमिमं’ अंश हम ज्ञानसाधकों के लिए महत्वपूर्ण है। भारतीय तत्व चिंतन की विस्तीर्ण परम्परा आदिकाल से चली आ रही है, कोई आधुनिक विद्वानों ने नहीं रची। दूसरी बात, भारतीय संस्कृति में स्थापित कर्मफल और तदनुसार पुनर्जन्म अथवा मोक्ष की संकल्पना केवल ‘वासांसि जीर्णानि यथा विहाय’ अर्थात् देह परिवर्तन की प्रकृति प्रदत्त व्यवस्था नहीं है। अपने लिए इसका अर्थ है कि ज्ञानार्जन प्रक्रिया एक जन्म में पूर्ण नहीं होती। जितना इस जन्म में अर्जित हो सका, उससे आगे अगले जन्म में होगा परन्तु पिछले जन्म में जहां तक पहुंच गये थे, उस क्रम को इस जन्म में जारी रखना है।
अन्ततः, “वयं राष्ट्रे जागृयाम् पुरोहिता:” के संकल्प के लिए प्रतिबद्ध हम ज्ञान साधकों को विदेशी दासता से प्राप्त औपनिवेशिक दास्यभाव से मुक्त होकर पुनः भारत को विश्वगुरु के स्थान पर आसीन करना है। ऐसी सामर्थ्य देने वाली माँ भगवती के श्रीचरणों में विनयपूर्वक प्रणाम और क्षमायाचना सहित यह नव-दिवसीय ज्ञानदीप माला को पूर्ण करता हूँ –
अज्ञानाद्विस्मृतेर्भ्रान्त्या यन्यूनमधिकं कृतम्।
तत्सर्वं क्षम्यतां देवि प्रसीद परमेश्वरि॥
– अज्ञान से, भूल से या बुद्धि की भ्रान्ति के कारण मैंने (इस ज्ञान दीपमाला में) जो न्यूनता या अधिकता की हो, उसे क्षमा करें और प्रसन्न होकर कृपा बनाए रखें, क्योंकि –
पृथिव्यां पुत्रास्ते जननि बहव: सन्ति सरला:,
परं तेषां मध्ये विरलतरलोऽहं तव सुत:।
मदीयोऽयं त्याग: समुचितमिदं नो तव शिवे,
कुपुत्रो जायेत क्वचिदपि कुमाता न भवति॥
– धरती पर अनेक सीधे-सादे तुम्हारे पुत्रों में मैं अधिक चपल हूँ, तो भी हे शिवे! मुझे त्यागना समुचित नहीं है क्योंकि संसार में कुपुत्र तो हैं परन्तु कुमाता नहीं हो सकती।
इस ज्ञानयात्रा को विराम देते हुए सभी को नमस्कार करता हूँ। ‘कल्याणै प्रणतां, विष्णुमायेति शब्दिता’ उन महामाया की कृपा सबको प्राप्त हो, इसी मंगलकामना सहित,
सहयात्री रहा,
– अवनीश भटनागर
(लेखक विद्या भारती के अखिल भारतीय उपाध्यक्ष है।)