– डॉ. अखिलेश कृतज्ञ
भारतीय परिवार की संरचना में त्याग की अद्भुत भूमिका है। मनुष्य त्याग से देवता बन सकता है। जिस घर में त्याग का भाव समाहित होता है, वह घर मंदिर बन जाता है। त्यागशील मनुष्य प्रेरणा-स्रोत बन जाता है। समाज का पथ प्रदर्शक भी। गोस्वामी तुलसीदास कृत ‘रामचरितमानस’ पारिवारिक मूल्यों की अनमोल थाती है। राम का राज्याभिषेक होने वाला है। मन्थरा कैकेयी की बुद्धि फेर देती है। रानी कैकेयी राजा दशरथ से अपने दो वर (पूर्व में दिए गए) माँगती हैं –
“सुनहु प्रानप्रिय भावत जी का। देहु एक बर भरतहि टीका।।
मागउँ दूसर बर कर जोरी। पुरवहु नाथ मनोरथ मोरी।।
तापस वेष बिसेषि उदासी। चौदह बरिस रामु बनबासी।।
सुनि मृदु बचन भूप हियँ सोकू। ससि कर छुअत बिकल जिमि कोकू।।”
‘भरत का राजतिलक और राम को चौदह वर्ष का वनवास’ की बात सुनकर राजा दशरथ अवाक रह गए। सहम गए। कुछ कहते नहीं बना। कहाँ तो अगले दिन ज्येष्ठ पुत्र राम का राज्याभिषेक और कहाँ अब चौदह वर्ष का वनवास! मंगल समाचार के बीच अमंगल बात! पूरी अयोध्या में खुशी के मंगल गीत गाए जा रहे हैं, उसी के बीच कैकेयी के वर, विशेषकर राम को चौदह वर्ष का वनवास, सभी को व्याकुल कर देता है। सभी के मुख दु:ख के इस समाचार से सूख जाते हैं। पर, राम के मुख पर दु:ख की छाया तक नहीं। प्रसन्नवदन हैं राम। यह राम की त्यागशीलता का उदाहरण है। अपने परिवार की प्रतिष्ठा के लिए। अपने पिता की वचन प्रतिज्ञा के लिए। ऐसा नहीं है कि वे अपने छोटे भाई भरत के स्वभाव और आचरण को नहीं जानते हैं। जानते हैं। बखूबी पहचानते भी हैं। उन्हें पता है कि किसी भी क़ीमत पर भरत राज्याभिषेक को नहीं स्वीकारेंगे। पर, उन्हें अपने पिता द्वारा दिया गया माता कैकेयी का वचन निभाना है। वचन पालन का मूल्य समाज में प्रतिष्ठित करना है। इसके लिए राम अपने जीवन का बड़े-से-बड़ा त्याग कर सकते हैं। प्रसन्नचित्त होकर राम माता कैकेयी से कहते हैं –
“सुनु जननि सोइ सुतु बड़भागी। जो पितु मातु बचन अनुरागी।।
तनय मातु पितु तोषनिहारा। दुर्लभ जननि सकल संसारा।।”
तुलसी के राम तनिक भी व्याकुल नहीं हैं। वे अपने माता-पिता के वचनों की पालना में स्वयं को सौभाग्यशाली मानते हैं। वे अपने छोटे भाई के राजतिलक से उल्लसित हैं, ख़ुश हैं, प्रसन्न हैं। आज के समय में ऐसा उदाहरण दुर्लभ है। आज के भौतिक युग में कई स्थानों पर आपस में भाई-भाई एक दूसरे की परवाह करने से पल्ला झाड़ लेते हैं। सुख-दु:ख में सहभागी होने के लिए मान-मनौव्वल जारी है। पैतृक संपति से बँटवारे के नाम पर कई बार तलवारें खींच जाती हैं। बोलचाल बंद हो जाती है। आँगन में दीवार खड़ी हो जाती है। बने-बनाये मकान की दीवार टूट जाती है। जिस पर अपनी संपत्ति में से हिस्सा देना, पूरी सत्ता सौंप देना, पूरा राजपाट सौंप देना, वर्तमान में दुर्लभ है, लेकिन असंभव नहीं है।
भारतीय समाज त्यागशील समाज है। परिवार इसके केंद्र में है। पारिवारिक मूल्य और संस्कार मनुष्य निर्माण में महत्त्वपूर्ण भूमिका का निर्वहन करते हैं। राम त्याग का अद्भुत उदाहरण प्रस्तुत करते हैं। परिवार की एकता के लिए। परिवार में प्रेम और भाईचारे को बनाये रखने के लिए। एक बड़े भाई द्वारा अपने छोटे भाई के लिए अपनी सम्पूर्ण पैतृक सम्पत्ति का परित्याग। राजपाट से मुक्ति। अपने छोटे भाई को राजकाज सौंपना। बिना किसी लाभ-लालच-स्वार्थ के। वचन पालन की मर्यादा। यह त्याग और वचन पालन आज प्रासंगिक है। राम माता कैकेयी के वर की पालना करते हुए अपने छोटे भाई भरत के लिए ख़ुशी-ख़ुशी राज्य सौंपने की घोषणा करते हैं –
“भरतु प्रानप्रिय पावहिं राजू। बिधि सब बिधि मोहि सनमुख आजू।।
जौं न जाऊँ बन ऐसेहु काजा। प्रथम गनिअ मोहि मूढ़ समाजा।।”
यह त्याग भारतीय परंपरा और साधना का हिस्सा है। माता-पिता की आज्ञा राम के लिए सर्वोपरि है। राम को वनवास मिल गया। किंचित मात्र भी दुखी नहीं हैं। जो भी मिला, उसमें श्रेष्ठतम तलाशने का भाव राम सिखाते हैं। यह भाव जब मनुष्य मात्र में उत्पन्न या समाहित होता है तो वह किसी भी परिस्थिति में दुखी नहीं होता है। देखिए, राम को मिला है वनवास और उसे वे किस तरह लेते हैं। दुःख को सुख में ढालने की कला। दुःख में सुख खोजने की दृष्टि। यह भारत की परंपरा में है। राम वन जाने से पूर्व अपनी माता कौसल्या से आज्ञा लेने जाते हैं और कहते हैं कि पिताजी ने मुझे वन का राज्य दिया है। भाव यह है कि मुझे कोई बड़ा कार्य करने के लिए अयोध्या से भी बड़े (क्षेत्रफल के आधार पर) वन राज्य का राजा बना दिया है –
“धरम धुरीन धरम गति जानी। कहेउ मातु सन अति मृदु बानी।।
पिता दीन्ह मोहि कानन राजू। जहँ सब भाँति मोर बड़ काजू।।”
दुनिया के इतिहास में सम्भवतः ऐसा कोई उदाहरण नहीं मिलता कि कल जिस व्यक्ति का राज्याभिषेक होने वाला है, उसे चौदह वर्ष का वनवास मिल जाए। उसके बाद भी वह व्यक्ति उस वनवास को सहर्ष स्वीकार ले। यह भारत के समाज की त्यागशीलता है। जो परिवार के संस्कार से व्यक्ति-व्यक्ति में अपना स्थान बनाती है।
राम, सीता और लक्ष्मण वन को चले गए। भरत अयोध्या लौटते हैं। पूरा प्रकरण भरत को पता चलता है। वे अधीर हो जाते हैं। स्वयं को और अपनी माता कैकेयी को खूब कोसते हैं। गुरु वशिष्ठ की आज्ञानुसार अपने पिता दशरथ की अंत्येष्टि क्रिया को संपन्न करते हैं। इसके पश्चात् जब अपने पिता के वचनस्वरूप राजतिलक को ग्रहण करने की बारी आई। तब गुरु वशिष्ठ के वचन, मंत्रियों के अनुमोदन और माता कौसल्या की कोमल वाणी को सुनकर भरत विनती करते हुए कहते हैं कि मुझे श्रीराम जी के पास जाने की आज्ञा दीजिए, इसी में मेरा हित है। इसके अलावा मुझे कुछ नहीं चाहिए –
“जाऊँ राम पहिं आयसु देहु। एकहिं आँक मोर हित एहू।।
मोहि नृप करि भल आपन चहहु। सोउ सनेह जड़ता बस कहहू।।”
अद्भुत है यह भातृप्रेम। राम का भरत के प्रति। भरत का राम के प्रति। त्याग की भावना से यह प्रेम अपने निश्छल स्वरूप में प्रकाशित होता है। भरत अपने बड़े भाई श्रीराम जी को अयोध्या लाने के लिए चित्रकूट जाने की तैयारी करते हैं। अयोध्यावासियों सहित गुरु वशिष्ठ, माता कौसल्या, कैकेयी, शत्रुध्न आदि के साथ वन गमन करते हैं। वन जाते समय ही भरत के मन में अपने बड़े भाई राम का राजतिलक करने की भावना प्रबल रहती है। भरत अपने मंत्रियों से कहते हैं –
“कहेहु लेहु सबु तिलक समाजू। बनहिं देब मुनि रामहि राजू।।
बेगि चलहु सुनि सचिव जोहरे। तुरत तुरग रथ नाग सँवारे।।”
ऐसी त्यागशीलता और भातृप्रेम के संस्कार परिवार के माध्यम से समाज में पल्लवित-पुष्पित होते हैं, तो भारत का परिवार बोध और अधिक गहरा होता जाता है। वन मार्ग में भरत नंगे पैर चल रहे हैं। अपने बड़े भाई राम के बिना अयोध्या सूनी है। राम बिना कैसा राज और कैसी अयोध्या? राजतिलक की बात तो सोच ही नहीं सकते भरत। रास्ते में स्त्री-पुरुष भरत को देख रहे हैं। मार्ग में एक स्त्री भरत के शील, स्नेह और स्वभाव की सराहना करते हुए कहती है –
“चलत पयादे खात फल पिता दीन्ह तजि राजु।
जात मनावन रघुबरहि भरत सरिस को आजु।।”
राम भी अपने छोटे भाई भरत पर गर्व करते हैं। उनकी त्यागशीलता से परिचित हैं। उनका भातृप्रेम विशाल है। राम कहते हैं कि भरत को कभी भी राजमद (सत्ता का अहंकार) हो ही नहीं सकता। अपने छोटे भाई पर इतना अटूट विश्वास आज प्रासंगिक है। यह विश्वास पूरे परिवार को जोड़े रखता है –
“भरतहि होइ न राजमदु बिधि हरि हर पद पाइ।
कबहुँ कि काँजी सीकरनि छीरसिंधु बिनसाइ।।”
चित्रकूट में भरत-राम मिलाप होता है। गुरु वशिष्ठ राम के राज्याभिषेक को सभी के लिए सुखदायक बताते हैं। उसके लिए उपाय भी सुझाते हैं – भरत-शत्रुघ्न वन में रहें और राम, लक्ष्मण और सीता अयोध्या लौट आएँ। भरत का भातृप्रेम देखिए, त्याग देखिए। गुरु वशिष्ठ के इस सुझाव पर वे जन्मभर वन में वास करने को तैयार हैं। बस, बड़े भाई राम अयोध्या लौट जाएँ। इससे बड़ा सुख उन्हें अपने जीवन में और कुछ नहीं लगता –
“कहहिं भरतु मुनि कहा सो कीन्हे। फलु जग जीवन्ह अभिमत दीन्हे।।
कानन करऊँ जनम भरि बासू। एहि तें अधिक न मोर सुपासु।।”
भरत के लिए जीवन का एक ही सुख। बड़े भाई राम का अयोध्या वापस लौट आना। राम द्वारा अयोध्या का राजकाज संभालना। बड़े भाई राम का राजा बनना। उसके लिए वह स्वयं आजीवन वन में रहने को तैयार। परिवार की एकता व ख़ुशी के लिए अपने जीवन की सम्पूर्ण सुख-सुविधाओं का परित्याग करना पड़े, तो उसके लिए भी तत्पर हैं भरत। भातृप्रेम में सबकुछ न्यौछावर करने की ज़िद और भावना के अद्भुत उदाहरण हैं भरत। ‘रामचरितमानस’ में माता कैकेयी ने दो वचन माँगे थे- राम को चौदह वर्ष वनवास और भरत को राजगद्दी। भरत इन दोनों वचनों के लिए स्वयं को दोषी मानते हैं और इस दोष से मुक्ति के लिए बड़ा-से-बड़ा त्याग करने को तैयार हैं। इसके लिए उन्हें प्रत्येक शर्त मंजूर है। अपने बड़े भाई राम के राजतिलक के लिए, अयोध्या वापसी के लिए भरत पूरा जीवन वन में रहने को तैयार हैं – ‘कानन करऊँ जनम भरि बासू।’
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(लेखक मिजोरम विश्वविद्यालय आइजोल में हिंदी विभाग में सहायक आचार्य है।)