– गोपाल माहेश्वरी
पूरा पूजा घर मोगरे के ताजे फूलों की सुगन्ध से महक रहा था। एक सुंदर सिंहासन पर शिव, विष्णु, गणेश, सूर्य और देवी की उज्ज्वल प्रतिमाएँ विराजमान थी। पं.अभिनव शुक्ल मंद्र गंभीर स्वरों में मंत्रोच्चारण कर रहे थे। उनका व्यक्तित्व बड़ा ही प्रभावशाली था। ऊँची-पूरी सुगठित गौरांग देह जिस पर सफेद धोती और वैसा ही उत्तरीय ओढ़े वक्ष पर रुद्राक्ष माला धारण किए शुभ्र चमकदार दाढ़ी-मूंछों और कांधे तक लंबे बाल एक अद्भुत आकर्षण रखते थे। मस्तक पर सुंदर सा भस्म त्रिपुण्ड्र उनमें किसी प्राचीन ऋषि जैसी आभा प्रकट कर रहा था। इस समय उन्हें देखकर कौन कह सकता था कि वे पर्यावरण विषय के जाने-माने प्राध्यापक हैं।
ग्रीष्मावकाश होने से उनकी नातिन पल्लवी और नाती सौरभ भी आए हुए थे। अपने ममेरे भाई बहिन साधना, लता और पुष्प से उनकी जोड़ी खूब बैठती थी। पूजा घर से आरती की घंटी बज उठी तो घर के सभी सदस्य अपने हाथों के काम तत्काल छोड़कर पूजा घर की ओर चल पड़े। अभिनव जी की पत्नी तुलजा अपनी पंचानवे वर्षीय बूढ़ी सास को व्हीलचेयर पर ले आई।
सभी ने ताली बजाते हुए आरती गाई, पुष्पांजलि अर्पित की और प्रसाद के लिए हथेली फैला दीं। प्रसाद लेकर अभिनव जी ने अपनी माँ के चरण छुए फिर सब छोटों ने अपने से बड़ों के चरण छुए। समवयस्क बच्चों में आपस में पैर छूने छुलवाने का यह संस्कार बड़ा विनोद उत्पन्न करता था।
अब सभी एक साथ अल्पाहार करने बैठे। यह समय एक प्रकार से परिवार की मुक्त चर्चा का समय होता था। गरमागरम हलुआ और दो तीन तरह के पापड़ का अल्पाहार करते हुए चर्चा चल पड़ी।
पल्लवी ने पूछा “नानाजी! हमारे विद्यालय में सब बच्चों को एक पुस्तक दी गई है ‘पंच परिवर्तन’। आचार्य जी ने इसके संबंध में हमें समझाया भी।”
“अरे वाह! क्या तुम वह पुस्तक साथ लाई हो? क्या विषय है उसका? पंच परिवर्तन क्या हैं?”
यद्यपि अभिनव जी पहले से जानते थे कि पंच परिवर्तन से क्या तात्पर्य है लेकिन विषय बच्चों ने कितना समझा यह जानने का सुंदर अवसर जानकर वे अनजान बन रहे थे।
पंच परिवर्तन यानि पांच ऐसे कर्तव्य या कहिये महत्वपूर्ण बिन्दु जिन पर आज हमें सबसे अधिक ध्यान देना आवश्यक है। इनकी उपेक्षा की तो हम पर और सब पर भी इसका बुरा प्रभाव होगा।”
“अच्छा!! और वह भला कैसे?” अभिनव जी बोले।
“वह ऐसे कि इन पांच बातों का संबंध हमारे स्वयं से है हमारे परिवार, समाज, देश और सारी धरती से भी है।” सौरभ ने भी चर्चा में सम्मिलित होते हुए कहा। वे दोनों ही सरस्वती शिशु मंदिर के छात्र थे और दोनों को यह पुस्तक मिली थी।
“ऐसे क्या विषय हैं?” पुष्प ने जिज्ञासा प्रकट की।
“पहला है पर्यावरण संरक्षण दूसरा परिवार प्रबोधन।” पल्लवी ने कहा तो सौरभ ने टोका।
“गलत ,गलत। पहला है स्व का बोध फिर सामाजिक समरसता फिर पर्यावरण।”
“वैसे पुस्तक में तीसरे क्रम पर नागरिक कर्तव्य है भाई!” पल्लवी ने उसे टोका।
तभी अभिनव जी उठे और अपने कक्ष से एक पुस्तक उठा लाए। मुस्कुराते हुए बच्चों को दिखाते हुए पूछा “वह यही पुस्तक है क्या?”
“अरे! यह आपके पास भी है? हम तो समझे थे यह हम शिशु मंदिर के बच्चों के लिए ही है।”
“हाँ हाँ, यह हमने भी पढ़ी है।” पुष्प और साधना एक-साथ चहककर बोल पड़े। अब उनका यह संकोच छूमंतर हो गया था कि पल्लवी और सौरभ किसी ऐसे विषय पर बात कर रहे हैं जिसे वे नहीं जानते।
अब अभिनव जी ने समझाना आरंभ किया “देखो इन विषयों में कोई पहले दूसरे चौथे पांचवें नहीं है। तुमने पूजा घर में देखा न, गणेश जी को केन्द्र में बैठा दो तो गणेश पंचायतन और दुर्गा जी को बैठा दो तो देवी पंचायतन। ऐसा ही बाकी देवताओं के लिए भी।”
बच्चों के हाव-भाव से लगा कि विषय अधिक स्पष्ट नहीं हुआ। वे भी पक्के शिक्षक थे। हार कैसे मानते तत्काल प्रयोग बदला। बोले लता तुम उठो यहाँ खड़ी रहो, पल्लवी इसके पास फिर सौरभ फिर पुष्प और साधना। चलो अब सब अपने पास वाले के हाथ पकड़ लो और घेरा बना लो फिर एक-साथ…..”
“उपविश” बच्चों ने ही कह दिया और खिलखिलाते हुए हँसकर बैठ गए। अभिनव जी भी अब बच्चे ही बन गए थे जैसे वे उनके बीच बैठ गए और बोले अच्छा अब मैं जो क्रम कहूँ वह बच्चा मुझे छुए। सही निकला तो दो आम पुरस्कार मिलेगा और गलती हुई तो एक ही। ठीक है?” उन्होंने सामने पानी भरे बड़े भगौने में डूब रहे देसी आमों की ओर अंगुली दिखाकर कहा। बच्चों के हर्षनाद से घर गूंज उठा।
अभिनव जी बोले “तीन”
पल्लवी ने उन्हें छुआ और पुष्पा ने भी।
“दोनों सही जाओ दो दो आम ले लो।” यह कैसे दादाजी लता ने आपत्ति ली।
“अरे! गलत हुआ क्या? बैठो बैठो वापस बैठो।” बच्चे बैठ गए तो उन्होंने साधना से आरंभ किया “एक दो तीन। हुई न पल्लवी तीसरी?”
“फिर पुष्प कैसे तीसरा हुआ?” सौरभ रूठे स्वर में बोला।
अभिनव जी ने पल्लवी से गिनना आरंभ किया “एक, दो, यह पुष्प तीन।”
“ऐसे तो सभी तीसरे हैं।” पल्लवी बोली।
“और सभी पहले या दूसरे, चौथे, पांचवें भी।”
“यही तो पंच परिवर्तन भी ऐसे ही तो हैं।” अभिनव जी ठहाका लगाकर बोले।” अच्छा चलो पहले आम सभा हो जाए फिर आम सभा करेंगे।”
“मतलब?” लता ने चौंककर कहा।
“मतलब आम चूसते चूसते बातें करेंगे।”
“जो अधिक बात बताएगा उसे अधिक आम …” सौरभ उत्साह से बोला।
“नहीं सबसे कम आम मिलेंगे!” साधना बोली।
“अरे! ऐसा कैसे?” पुष्प ने पूछा।
“अरे, जो जितनी देर बोलेगा उतनी देर आम कैसे चूसेगा?” पल्लवी ने सोचकर बताया।
“तब कोई बोलेगा ही क्यों?” सौरभ ने हाथ हिलाकर कर कहा।
“पास आओ एक रहस्य है” पाँचों के सिर पलभर भिड़े फिर एक सामूहिक ठहाके साथ अलग हुए। तय हुआ कि दादाजी अधिक बोलेंगे हम बात शुरू कर रस लेते हुए सुनेंगे तो आम के आम और गुठलियों के दाम।
बाल योजना को सफल बनाने में सहयोग देते हुए अभिनव जी ने कहना आरंभ किया “देखो जैसे हमने नागरिक कर्तव्य बोध लिया तो एक अच्छे नागरिक को अपनी संस्कृति, अपनी परंपरा, अपने राष्ट्र का बोध होना चाहिए यानि स्व का बोध। फिर वही संस्कृति बताती है कि प्रकृति को माता मानो उसकी सेवा करो राष्ट्र की प्रकृति और पर्यावरण की रक्षा नागरिक कर्तव्य है ही। समाज में ऊँच-नीच का भाव समाप्त हों सब एकात्म हों समरस हों यह संविधान भी कहता है और संस्कृति तो समझाती ही है तो सामाजिक समरसता भी नागरिक कर्तव्य है तथा कर्तव्य पालन की पहली पाठशाला और कार्यशाला भी।”
“और सामाजिक समरसता से आरंभ करें तो।” अंगुलियों और अंगूठे से ऊपर नीचे से पकड़े दूसरे हाथ से घुमा घुमाकर नया आम घुलाते हुए सौरभ ने पूछा।
“समरसता अपने को और अपनों को एक समान अनुभव करने से होती है अर्थात् स्व का बोध व्यापक होकर समरसता में बदलता है। यह बन्धु भाव आरंभ तो पारिवारिक संस्कार से ही होता है और जब सारे नागरिक परस्पर बन्धुभाव से एकात्म होते हैं तो अधिकारों से कर्तव्य प्रथम का भाव नागरिक कर्तव्य की धुरी बनता है। यह समरसता सामाजिकता से और व्यापक होकर आध्यात्मिकता बन जाती है तब पर्यावरण से समरसता भी सहज ही स्थापित हो जाती न? अभिनव जी रुके।
अब साधना ने जिज्ञासा की “मानो हमने आरंभ परिवार प्रबोधन से करना हो?”
“करना ही होगा शेष चारों परिवर्तन परिवार से ही समाज में प्रभावी हो सकते हैं। परिवार समाज की पहली इकाई जो है?”
अभी कुछ आम शेष थे। पेट भर रहा था पर मन नहीं, इसलिए लता बोली “दादाजी! मुझे तो यह बताइए कि स्व का बोध क्या और वह कैसे इन सबसे जुड़ा है?”
“स्व का बोध यानि अपने को जानना। क्या क्या अपना है यह पहचानना। हमारे आचार, विचार, संस्कार, परंपरा, इतिहास, भाषा, वेश, भोजन पद्धति, शास्त्र, जीवन पद्धति ये अनेक बातें स्व के बोध के रूप में समाहित हैं। इनसे परिवार का, समाज का, राष्ट्रीयता का और संपूर्ण सृष्टि को देखने और उससे व्यवहार का बोध होता है। स्व का बोध होगा तो स्मरण रहेगा कि सारे आम स्वयं ही चट कर जाएं या दादाजी-नानाजी को, या सामने न होते हुए भी हमारे लिए दूसरे कामों में लगे मामा-मामी या माँ पिताजी या बड़ी दादी-नानी और घर में अनाज बीनने आई पड़ौस की मौसियाँ भी इन्हें पा सकें..” अभिनव जी मुस्कुराए तो बच्चे खिसिया गए। वे समझ गए दादाजी-नानाजी से चालाकी छुपी नहीं हमारी। सबके हाथ आम लिए उनकी ओर बढ़ गए।
“ये आम आपने ही तो दिए हैं हमें।” पल्लवी ने दृष्टि झुकाकर कहा।
“जैसे प्रकृति ने हमें सब दिया है। उदास न होओ बच्चों ये तुम्हारे ही लिए हैं।” वे आगे कहने लगे “हमारे राष्ट्र गीत वंदेमातरम् और राष्ट्र गीत में भी भारत की प्रकृति का उल्लेख है। सुजलां सुफलां मलयज शीतलाम् य फुल्ल कुसुमित द्रुमदल शोभिनीम्, अथवा विंध्य हिमाचल यमुना गंगा, उच्छल जलधि तरंग में।
इसलिए इस प्रकृति की रक्षा, पोषण, संरक्षण, संवर्धन हमारा संविधान में भी उल्लिखित नागरिक कर्तव्य है। यह प्रकृति केवल हमारे नहीं अपितु हमारे समान करोड़ों प्रजाति के जीवों के लिए भी है, इसलिए निजी स्वार्थ के लिए ही उसे उपयोग कर अन्य प्राणियों को उससे वंचित करना यह समरसता भाव के विरुद्ध है और यह शोषण, संवेदना और ममता भरा दोहन बने हम प्रकृति माता का प्रसाद मान कर न्यूनतम संसाधन का उपयोग करें, अधिकतम बाकी लोगों के लिए भी बचने दें, यह एक अच्छे हिन्दू परिवार की पहचान हैं जो कि परिवार प्रबोधन से साध्य है। इस प्रकार ‘माताभूमिःपुत्रोऽहम् पृथिव्या:’ का सांस्कृतिक बोध, ‘आत्मवत् सर्वभूतेषु’ का भाव, ‘सर्वभूत हितेरताः’ का सेवाभाव और ‘सर्वं खल्विदं ब्रह्म:’ जैसा स्व का व्यापक भाव स्व का ही व्यापक बोध है। इसलिए पाँचों विषय एकात्म हैं जैसे पंचमुखी शिव या पंचमुखी हनुमान या…” वे केलेंडर पर छपे पंचमुखी शिव और हनुमान का चित्र बताते हुए बोले।
“बताओ बताओ और कोई उदाहरण?” अभिनव जी ने प्रोत्साहित किया।
बच्चे सोचने लगे फिर लता उठी और अंदर के कमरे से गायत्री माता का चित्र लाकर बोली “पंचमुखी गायत्री माता।”
“बहुत बढ़िया। पर अब मेरा पुरस्कार?” आमों का खाली हो चुका बर्तन देखते हुए अभिनव जी बोले तो बच्चे एक दूसरे का मुंह ताकने लगे।
“आम तो समाप्त।” सौरभ उदास होकर बोला।
अभिनव जी बच्चों को उत्साहित रखना चाहते थे बोले “आम समाप्त पर गुठलियां तो हैं न आओ इन्हें बाहर बो देते हैं।”
सभी गुठलियां बटोरकर बाहर चल दिए मोहित महार के खेत के पास खाली भूमि थी अभिनव जी ने बालमंडली के साथ वहाँ गुठलियां बो दीं।
उधर से गुजरते हुए ठाकुर दादा ने उन्हें देखा तो बोले “बच्चो! इन्हें सींचना भी है। मेरे कुएं से पानी ले लेना।”
“पाय लागीं दादाजी! पर हम तो छुट्टी खत्म होते ही लौट जाएँगे।” सौरभ ने कहा।
“तो मोहित का बेटा राजीव सींचेगा, हम लोग पौधे पेड़ बनने तक देखभाल कर लेंगे।”
तभी मोहित महार वहाँ आ गए। सबने आपस में यथायोग्य राम-राम की।
ठाकुर दादा ने हँसकर कहा “क्यों मोहित तुम्हारे आम तो सबको खिलाओगे न?”
“आम मेरे नहीं भगवान के हैं हाँ मैं उनकी रखवाली करूंगा जिससे पक जाने के बाद ही सबमें बंट सके।”
सभी की सामूहिक हँसी ने जैसे इस सामुहिक निर्णय पर मुहर लगा दी थी।
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(लेखक इंदौर से प्रकाशित ‘देवपुत्र’ बाल मासिक पत्रिका के संपादक है।)