✍ रवि कुमार
श्रीराम कथा अनंत है। उसके स्वरूप भी विविध है। श्रीराम के काल से आज तक अलग-अलग रूप में रामकथा प्रकट हुई है। एक कथा ऐसी भी है जिसका उद्भव एक आंदोलन से हुआ और उस कथा का स्वरूप भी अलग प्रकार का है। यह कथा है श्रीराम जन्मभूमि आंदोलन से उपजी रामकथा।
श्रीराम जन्मभूमि आंदोलन मात्र अयोध्या में राम मंदिर निर्माण का आंदोलन ही नहीं है, यह आंदोलन राष्ट्र जागरण का आंदोलन है, हिंदुत्व शक्ति जागरण का आंदोलन है, श्रीराम भक्ति जागरण का आंदोलन है और सबसे महत्वपूर्ण ‘राम मंदिर से राष्ट्र मंदिर’ निर्माण का आंदोलन है। 1984 में शुरू हुआ आंदोलन, 2019 में मंदिर निर्माण की अनुमति, 2020 में भूमि पूजन और 2024 में मंदिर उद्घाटन में पूर्ण हुआ। 1984-2019 के दौरान संघर्ष का यह आंदोलन भारत में एक नई रामकथा को जन्म देता है जो गीतों के रूप में, वीर रस और ओजपूर्ण कविताओं के रूप में, भाषणों के रूप में, भजनों के रूप में, नए कथाकारों के मुख से निकली रामकथा के रूप में, नारों के रूप में सम्पूर्ण भारत में एक विराट जनजागरण का कार्य करती है। यह रामकथा भारत के हिन्दू समाज के मन में व्याप्त अनन्य राम भक्ति को राष्ट्र भक्ति के रूप में अभिव्यक्त करती है।
श्रीराम जन्मभूमि आंदोलन के प्रमुख जयघोष
भारत के सर्वदूर ग्रामों में व्याप्त ‘जय सिया राम’, ‘राम-राम’ का अभिवादन इस आंदोलन में ‘जय श्रीराम’ के जयघोष के साथ प्रकट होता है। यह जयघोष भारत में सभी रामभक्तों में, कारसेवकों में एक विशेष प्रकार की ऊर्जा व उत्साह का संचार करता है। आंदोलन के समय कुछ और जयघोष विशेष रूप से प्रचलित हुए, जो उस समय रैलियों व रथ यात्रा में लगते थे और जिन्हें आज भी बोलें तो श्रीराम जन्मभूमि आंदोलन की स्मृतियाँ आँखों के सामने पुनर्जीवित हो उठती हैं। ये जयघोष है- ‘एक ही नारा एक ही नाम जय श्रीराम जय श्रीराम’, जो हिन्दू हित की बात करेगा वही देश पर राज करेगा’, ‘बच्चा बच्चा राम का जन्मभूमि के काम का’। कुछ अति उत्साही युवक ये भी नारे लगाते थे- ‘तेल लगाकर डाबर का नाम मिटा दो बाबर का’, ‘एक धक्का और दो बाबरी ढांचा तोड़ दो’, ‘जय श्रीराम हो गया काम’।
श्रीराम जन्मभूमि आंदोलन के प्रमुख गीत
आंदोलन के काल में अनेक गीत बने और राष्ट्र व्यापी हुए। इन गीतों ने अपने भावों से समाज को आंदोलन से जोड़ा भी और समाज के मन को उद्वेलित भी किया। ये गीत हर सभा, रथ यात्रा और कार सेवा में लाऊड स्पीकरों पर गूंजते थे। ‘राम लला हम आएँगे, मंदिर वहीं बनायेंगे’, सौगंध राम की खाते हैं मन्दिर वहीं बनायेंगे’, ‘चले अयोध्या, चलें अयोध्या राम काम के काज को’ ये गीत प्रमुख रूप से प्रचलित हुए। ‘राम जी की सेना चली, श्रीराम जी की सेना चली, हर हर महादेव’ यह गीत मूल रूप से रामानन्द सागर की ‘रामायण’ का गीत है, लेकिन जब कारसेवकों के जत्थे निकलते थे तो इस गीत से उनका स्वागत व विदाई होती थी। ‘राम कहानी सुनो रे राम कहानी’ – श्री रविन्द्र जैन के संगीत व आवाज में सजे भजनों ने आंदोलन को गहरा आध्यात्मिक आधार दिया। ‘अयोध्या करती है आह्वान, हाथ से कर मंदिर निर्माण। शिला की जगह लगा दे प्राण, बैठा दे वहाँ राम भगवान।।’ इस प्रकार के गीत ने अयोध्या नगरी व आंदोलन के जीवंत चरित्र को प्रस्तुत किया। भारत की विविध भाषाओं में विभिन्न गीतों की रचना हुई जो समाज व्यापी हुए। राजस्थान में एक गीत बहुत प्रचलित हुआ – ‘कसो लंगोटो ले ल्यो सोटो, अभै अयोध्या जाणो है। बण जाओ बजरंग बली, मन्दिर वहीं बनाणो है।’
श्रीराम जन्मभूमि आंदोलन के ऑडियो व वीडियो कैसेट्स
आंदोलन के समय सोशल मीडिया नहीं था और न ही व्हाट्सएप्प, टेलीग्राम जैसे मैसेंजर एप्प थे। देश के कोने-कोने तक वैचारिक सन्देश, ओजस्वी भाषण और प्रेरक गीतों को पहुंचाने का एक मात्र साधन कैसेट्स ही थे। इस आंदोलन में साध्वी ऋतंभरा के ओजस्वी व तीखे भाषणों के ऑडियो कैसेट्स सबसे ज्यादा लोकप्रिय हुए। उनकी ओजपूर्ण वाणी, कविताओं और राष्ट्रवाद से ओत-प्रोत भाषणों ने युवाओं को गहराई से प्रभावित किया। गाँव की चौपालों और नगरों की गलियों में लाऊड स्पीकर लगाकर इनके कैसेट्स बजाए जाते थे। साध्वी ऋतंभरा की तरह प्रखर वक्ता उमा भारती के भाषणों के ऑडियो कैसेट्स भी देशभर में बांटें गए, जिन्होंने धार्मिक व सांस्कृतिक अस्मिता की भावना जगाई। रथ यात्रा व रैलियों में हुए अशोक सिंघल, अटल बिहारी वाजपेयी और लाल कृष्ण आडवानी के वैचारिक भाषणों की रिकार्डेड ऑडियो कैसेट्स को भी प्रसारित किया जाता था।
‘मन्दिर का निर्माण करो’ यह उस समय का सबसे चर्चित ऑडियो एल्बम था। इसमें आंदोलन के मुख्य संकल्प गीत राम लला हम आएँगे.. शामिल थे। कई स्थानों पर प्रतिबन्ध होने के बावजूद इसकी लाखों प्रतियाँ ब्लैक में बिकी। गुलशन कुमार की ‘टी-सीरिज’ कम्पनी ने इस दौर में राम भजनों की बाढ़ ला दी। ‘जय श्री राम’ नाम की ऑडियो कैसेट में शामिल गीतों को उस समय प्रचलित हिंदी फिल्मों के गानों की धुनों पर तैयार किया गया था ताकि वे आम जनता की जुबान पर आसानी से चढ़ सके। उत्तर प्रदेश, बिहार और मध्य प्रदेश के स्थानीय लोक कलाकारों ने स्थानों बोलियों (भोजपुरी, अवधी, बुन्देली) में श्रीराम जन्मभूमि से जुड़े गीतों के कैसेट रिकार्ड कर प्रसारित किए जिससे ग्रामीण भारत इस आंदोलन से सीधे जुड़ गया। कुछ और प्रसिद्ध ऑडियो कैसेट्स हैं- काशी बुल्लू की ‘राम जन्म भूमि अयोध्या’: मैक्स कैसेट्स इंडस्ट्री द्वारा 1991 में जारी यह एक बेहद लोकप्रिय ‘बिरहा’ और लोकगीत शैली की ऑडियो कैसेट, कार्यकर्त्ता प्रबोधन की दृष्टि से ‘डॉ. सुब्रमण्यम स्वामी और आचार्य धर्मेंद्र के वक्तव्य’; संतों के संदेश, कारसेवा के निर्देश, अयोध्या पहुँचने के आह्वान गीत के लिए ‘चलो अयोध्या’, भजनों और गीतों के लिए ‘सौगंध राम की खाते हैं’।
श्रीराम जन्मभूमि आंदोलन में काव्य
श्रीराम जन्मभूमि आंदोलन के काल में हिंदी काव्य-जगत में एक समानांतर धारा विकसित हुई, जिसे ‘आंदोलन-काव्य’ कहा जा सकता है। ओज और वीररस प्रधान इन कविताओं में राम को संघर्षशील, न्यायप्रिय और आत्मगौरव के प्रतीक के रूप में चित्रित किया गया। उस समय देश के बड़े-बड़े कवियों की कविताओं को संकलित कर विशेष कैसेट जारी किए जाते थे। इनमें भारत के 500 वर्षों के संघर्ष और हिन्दू मान बिन्दुओं की पुनर्प्रतिष्ठा का वर्णन होता था। साध्वी ऋतंभरा के भाषणों में एक कविता अवश्य रूप में आती थी –
महाकाल बन करके हम दुश्मन से टकराएँगे। जहाँ बनी है मस्जिद, अपना मन्दिर वहीं बनाएंगे।
काशी, मथुरा, वृन्दावन ने एक साथ हुंकारा है। कहो गर्व से हम हिन्दू है हिन्दुस्थान हमारा है।
वीर रस के कवि हरिओम पंवार ने आंदोलन में अपनी कविताओं से गहरी छाप छोड़ी –
‘राम दवा है रोग नहीं हैं सुन लेना। राम त्याग है भोग नहीं है सुन लेना।
राम दया है क्रोध नहीं है सुन लेना। राम सत्य है शोध नहीं है जग वालों।
राम हुआ है नाम लोक हितकारी का। रावण से लड़ने वाली खुद्दारी का।’
श्रीराम जन्मभूमि आंदोलन में रामकथा व कथाकार
रथयात्रा, शिलापूजन और रैली जैसे आयोजनों में दिए गए भाषण रामकथा-प्रसार का सबसे प्रभावी माध्यम सिद्ध हुए। इन भाषणों में वक्ता रामायण के प्रसंगों को ऐतिहासिक-राजनीतिक संदर्भों से जोड़ते थे। राम-वनवास को ‘सांस्कृतिक पराभव’ और राम-राज्याभिषेक को ‘मुक्ति की प्रतीक्षा’ के रूपक के रूप में प्रस्तुत किया जाता था। भाषण-शैली भावना प्रधान व आह्वान करने वाली थी, जिसका उद्देश्य श्रोता को कथा का सक्रिय भागीदार बनाना था। इस आंदोलन में विभिन्न संत-साध्वी ‘राम कथाकार’ के रूप में उभरे। इनमें प्रमुख नाम है- मोरारी बापू, संत आचार्य धर्मेन्द्र, स्वामी रामभद्राचार्य, रमेश भाई ओझा, महंत रामचन्द्र दास परमहंस, स्वामी चिन्मयानन्द सरस्वती, देवराहा बाबा, महंत अवैद्यनाथ, स्वामी वामदेव महाराज, स्वामी परमानन्द गिरी महाराज, साध्वी ऋतंभरा, साध्वी उमाश्री भारती, स्वामी पुरुषोत्तमाचार्य महाराज, स्वामी सत्यमित्रानन्द गिरी महाराज।
श्रीराम जन्मभूमि आंदोलन पर साहित्य
रामजन्मभूमि आंदोलन के समय ही नरेंद्र कोहली की पूर्व-प्रकाशित रामकथा शृंखला को ‘अभ्युदय’ (1989-1990) नाम से दो वृहद् खंडों में समेकित कर पुनः प्रकाशित किया गया, जो उस समय सांस्कृतिक चेतना का प्रमुख केंद्र बनी। कुछ और प्रमुख पुस्तकें आंदोलन के दौरान प्रकाशित हुई – ‘Ram Janmabhoomi Vs. Babri Masjid: A Case Study in Hindu-Muslim Conflict’ (1990): बेल्जियम के प्रसिद्ध विद्वान डॉ. कोनराड एल्सट द्वारा लिखित, ‘Ayodhya and After: Issues Before Hindu Society’ (1991): डॉ. कोनराड एल्सट की पुस्तक, Hindu Temples: What Happened to Them’ (1990): सीताराम गोयल और सहयोगी लेखकों द्वारा संकलित। कुछ पुस्तकें बाद में प्रषित हुई, पर उनका सम्बन्ध आंदोलन की कड़ियाँ ही थी – मीनाक्षी जैन की ‘राम और अयोध्या’, हेमंत शर्मा की ‘युद्ध में अयोध्या’ और ‘राम फिर लौटे’।
श्रीराम जन्मभूमि आंदोलन का व्याप जितना विस्तृत व व्यापक था, उस समय उपजी रामकथा भी उतनी ही विस्तृत व व्यापक है। वह रामकथा जिसने भारत के जनमानस पर छाप छोड़ी। रामचरितमानस के बालकाण्ड में तुलसीदास जी ने लिखा है – “हरी अनंत हरी कथा अनंता। कहहिं सुनहिं बहुबिधि सब संता॥” इसके अनुसार श्रीराम जन्मभूमि की रामकथा भी अनंत है।
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(लेखक विद्या भारती जोधपुर प्रान्त के संगठन मंत्री है।)