भारतीय शिक्षा – ज्ञान की बात 100 (साम्प्रदायिक सौहार्द बढ़ाना)

 ✍ वासुदेव प्रजापति

गत अध्याय में हमने सामाजिक समरसता निर्माण करने के विषय में जाना। सामाजिक समरसता के समान ही दूसरा महत्वपूर्ण विषय साम्प्रदायिक सौहार्द बढ़ाना भी है। भारतीय समाज में अनेक सम्प्रदायों का होना स्वाभाविक है। भिन्न-भिन्न रुचि के लोग भिन्न-भिन्न सम्प्रदायों को अपनाकर भिन्न-भिन्न देवी-देवताओं की उपासना करते हैं। यह भारत में प्राचीन समय से मान्य है, किन्तु संकुचित मानस वाले लोग अपने ही सम्प्रदाय को सर्वश्रेष्ठ मानते हैं और दूसरे सम्प्रदायों की निन्दा करते हैं। ऐसा करने से साम्प्रदायिक विद्वेष निर्माण होता है, जो समाज के सन्तुलन को बिगाड़ता है। समाज का सन्तुलन न बिगड़े इसके लिए प्रत्येक  सम्प्रदाय के आचार्यों को अपने अनुयायियों को अन्य सम्प्रदायों का आदर करना सिखाना चाहिए।

अन्य सम्प्रदायों के प्रति आदर का भाव निर्माण करने के साथ-साथ उन्हें धर्म की सही-सही जानकारी देनी चाहिए। धर्म और सम्प्रदाय में क्या अन्तर है और अपना सम्प्रदाय भी उस धर्म का ही एक अंग है, यह समझाने की बड़ी आवश्यकता है। हमारे सभी सम्प्रदाय हिन्दू धर्म के ही अंग हैं, यह समझाने में धर्माचार्यों को तनिक भी संकोच नहीं करना चाहिए। भारत में हिन्दू धर्म को ही मानव धर्म कहा गया है और यही धर्म सनातन है, ऐसा प्रतिपादन भी बार-बार किया गया है। फिर भी कुछ सम्प्रदायों को हिन्दू धर्म कहने में आपत्ति हो तो उन्हें सनातन धर्म या केवल धर्म शब्द का प्रयोग करना चाहिए और अपने सम्प्रदाय को धर्म के प्रकाश में व्याख्यायित करना चाहिए।

सहअस्तित्व को स्वीकार करना

भारत में बहुसंख्यक हिन्दू धर्म के साथ मुस्लिम व ईसाई  पंथ को मानने वाले लोग रहते हैं। हिन्दू सबके अस्तित्व को स्वीकार करता है परन्तु ये दोनों पंथ सहअस्तित्व को स्वीकार नहीं करते। इस्लाम कहता है कि जो मुसलमान नहीं वे सब काफिर हैं अर्थात् नापाक है। उन्हें मुसलमान बनाकर पाक करना, सच्चे मुसलमान का कर्तव्य है। यदि कोई काफिर मुसलमान बनने से मना करता है तो उसको जीवित रहने का अधिकार नहीं है। ऐसे काफिर का सर तन से जुदा करने वाले मुसलमान को जन्नत मिलती है। अर्थात् सम्पूर्ण विश्व में केवल मुसलमान को ही जीवित रहने का अधिकार है, ऐसा वे मानने वाले हैं।

इसी प्रकार दूसरे पंथ ईसाई  का मानना है कि जो ईसाई  नहीं है उसे कभी मुक्ति नहीं मिलती। इस सम्पूर्ण पृथ्वी पर यीशु का ही अधिकार है, और वही एकमात्र ईश्वर का पैगम्बर है। इसलिए विश्व के सभी लोगों को ईसाई बन जाना चाहिए। ये दोनों पंथ अन्य किसी भी मत-पंथ का अस्तित्व स्वीकार नहीं करते। यही कारण है कि भारत में सर्वाधिक विद्वेष इस्लाम, ईसाई  व हिन्दू धर्म के बीच में हैं। ये दोनों ही पंथ हिन्दुओं का धर्मान्तरण करने में लगे रहते हैं। एक धर्म के नाम पर सर तन से जुदा करते हैं और हिंसा फैलाते हैं। जबकि दूसरा भय, लालच और कपट के द्वारा धर्मान्तरण करते हैं। इन सबके मूल में सहअस्तित्व को न मानना ही है।

सहअस्तित्व को स्वीकार करने वाला हिन्दू और सहअस्तित्व को सर्वथा नकारने वाला इस्लाम और इसायत साथ-साथ कैसे रह सकते हैं, इस प्रश्न का हल खोजे बिना सामाजिक समरसता कैसे हो सकती है? सरकार अल्पसंख्यकों के अधिकारों के नाम पर उनका तुष्टिकरण करती है, उससे कोई हल नहीं निकलता। मुसलमान और ईसाई  इसका हल खोजना चाहते ही नहीं क्योंकि उनको सहअस्तित्व कतई मान्य नहीं। जिन्हें सहअस्तित्व मान्य नहीं उनके साथ रहने की संवैधानिक बाध्यता हिन्दुओं की है। इन परस्पर धुर विरोधी लोगों का साथ रहना जिन्हें मान्य नहीं हैं, वे तो धर्मान्तरण करना या काफिर को मारना ही उपाय मानते हैं, परन्तु सहअस्तित्व को मानने वाले हिन्दुओं के पास तो कोई उपाय नहीं है।

इस प्रश्न पर विश्वविद्यालयों, धर्मसंस्थाओं और सरकारों को मिलकर योजना बनानी चाहिए। उन दोनों पंथों से यह पूछा जाना चाहिए कि सहअस्तित्व को न मानना सम्पूर्ण मानवता का विरोधी है या नहीं? जन सामान्य को उनके आतंक से बचाने का काम सीधा-सीधा धर्माचार्यों का है। हिन्दू और मुस्लिम धर्माचार्यों की चर्चा होनी चाहिए। भीरु प्रजा को निडर बनाने का काम धर्माचार्य करें, उन्हें ज्ञानवान बनाने का काम विश्वविद्यालय करे और इन दोनों के साथ शासन की और से हर प्रकार की सुरक्षा मिले तो इस प्रश्न का हल निकल सकता है।

जनमानस को समर्थ बनने के उपाय

जनमानस को समर्थ बनाने हेतु प्रभावी और व्यापक उपाय करने की आवश्यकता है। ये उपाय अधोलिखित हो सकते हैं –

1. खेल एवं शारीरिक व्यायाम – आज की युवा पीढ़ी खेलों से दूर भाग रही है। खेल के मैदान खाली पड़े रहते हैं। प्रातःकाल टहलने वाले प्रौढ़ व वृद्ध तो दिखाई देते हैं परन्तु बाल, किशोर एवं युवा दिखाई नहीं देते। इसलिए किशोर एवं युवाओं को प्रतिदिन कम से कम एक घंटा मैदानी खेल खेलना अनिवार्य करना चाहिए। इतना तो अवश्य खेलना ही चाहिए कि पहने हुए कपड़े भीग जाए और पसीना टपकने लगे। पसीने के साथ शरीर व मन का मैल भी निकल जाता है और उत्साह व साहस का संचार होता है। आज व्यायामशालाएँ तो समाप्त प्राय: हो गई है। एक समय था जब हमारे देश की व्यायामशालाओं में युवा कुश्ती के दाव-पेच लगाते थकते नहीं थे। फिर से युवाओं को व्यायामशालाओं में भेजने की योजना बनानी चाहिए। दण्ड व बैठक लगाना, कुश्ती लड़ना, मल्लखम्भ और सूर्यनमस्कार करने से जो शक्ति आती है, उससे मन के दुर्बल विचार भाग जाते हैं। ये सब लाभ क्रिकेट में कहाँ? परन्तु हमारे बाल, किशोर व युवा सभी पश्चिमी कुचक्र में फँसते जा रहे हैं, उन्हें इस कुचक्र से बाहर निकालकर भारतीय खेलों में प्रवृत्त करने की महती आवश्यकता है। इसी प्रकार युवाओं को मोटर साइकिल छोड़कर पैदल चलना, दौड़ना और साइकिल चलाकर पसीना निकालना चाहिए। बिना पसीना बहाए तन व मन स्वस्थ नहीं होते। प्रजा को स्वस्थ बनाने की दृष्टि से यह प्रथम महत्त्व का उपाय है।

2. भारत को भारत जानना- आज के भारतवासी जिस भारत को जानते हैं वह जम्बूद्वीपे भरतखण्डे आर्यावर्ते वाला भारत नहीं है। आज का भारत तो वह भारत है जो अंग्रेजों ने हमें बताया है। हमें लूटने वाले, हम पर अत्याचार करने वाले और हमें बदनाम करने वाले हमारे लिए जो भाषा बोलते थे, वही भाषा हम गर्व से बोलते हैं। जिन्होंने हमें गुलाम बनाया और हमारे देश के बारे में जो कुछ भी कहा उस पर अन्धविश्वास करके मान लेना क्या भारतीयों को शोभा देता है? क्या हमें भारत के विषय में सही क्या है और क्या गलत है? यह नहीं जानना चाहिए। तनिक विचार करें जो देश विश्व में सबसे अधिक आयु वाला है क्या उसकी समाज व्यवस्था इतनी गई बीती थी कि वहाँ के लोग जंगली जीवन जीते थे, स्त्रियों का शोषण होता था और वहाँ के लोग दरिद्र व पिछड़े थे। आज तक हमें यही बताया गया और हम आँख मूँदकर विश्वास करते रहे। जबकि दीर्घकाल तक भारत की ज्ञान सम्पन्नता और अर्थ सम्पन्नता विश्व विख्यात रही है। क्या यह किसी श्रेष्ठ जीवन व्यवस्था के बिना सम्भव हो सकता है? नहीं, कदापि नहीं। भारत में आदिकाल से एक श्रेष्ठ संस्कृति रही है। वास्तविकता तो यह है कि वसुधैव कुटुम्बकम् मानने वाली तथा सर्वभूत हितेरता: चाहने वाली भारतीय संस्कृति ने विश्व के सभी देशों में जाकर उन्हें अपने जैसा श्रेष्ठ बनाकर उनका कल्याण किया है। इसीलिये वे भारत को अपना गुरु मानते थे और आज भी उन देशों में भारतीय संस्कृति के चिह्न विद्यमान हैं। आज की युवा पीढ़ी अपने देश का वही इतिहास पढ़ रही है जो अंग्रेजों ने बताया है, जिसमें भारत विषयक लज्जाजनक बातें यथा, छुआछूत, बाल विवाह, दहेज प्रथा, सती प्रथा जैसी कुरीतियाँ ही बताई जाती है, भारतीय समाज की एक भी विशेषता नहीं बताई जाती।

3. भारत की श्रेष्ठता न जानना- जिस देश में ज्ञानविज्ञान के ग्रन्थों का भंडार हो, महान ऋषि-मुनियों के द्वारा किए गए वैज्ञानिक प्रयोगों के संग्रह हों, तकनीक के क्षेत्र में जो देश विश्व में सर्वश्रेष्ठ हो उस देश के युवा पश्चिमी तकनीक से प्रभावित हो रहें हैं! क्योंकि वे भारत का सही ज्ञान नहीं रखते। यदि रखते होते तो पश्चिमी तकनीक व पश्चिमी अर्थव्यवस्था की विनाशकता उनके ध्यान में आ जाती। भारत का शास्त्रीय संगीत, भारत का नृत्य, भारत का साहित्य सम्पूर्ण विश्व में अपनी श्रेष्ठता सिद्ध कर चुके हैं। फिर हम इतने अनाड़ी बनकर क्यों घूम रहे हैं? क्या कारण है कि भारतीय शास्त्रीय संगीत हमें आनन्द नहीं देता जबकि पश्चिम का बन्दरकूद नृत्य और गलाफाडू चिल्लाने वाला संगीत हमें रुचता है? इसका एकमात्र कारण भारत का सही ज्ञान न होना ही है। सम्पूर्ण विश्व को एक परिवार मानने वाला उदार अन्त:करण जिस देश का है, उस देश के नागरिक अपने देश को बदनाम होने से क्यों नहीं बचा पा रहे हैं? अज्ञानता के कारण अनेक बार वे भी अपने ही देश को बदनाम करने वालों के साथ हो जाते हैं। भारत सोने की चिडिया थी, आज भी है। भारत प्राकृतिक सम्पदा से समृद्ध देश था जो आज भी है। परन्तु हमारी आँखों पर ऐसी कौनसी पट्टी बँधी है कि हमें भारत की समृद्धि दिखाई ही नहीं देती। दिखाई नहीं देती इसलिए उसकी रक्षा करने का विचार भी मन में नहीं आता। हम इस जन्मभूमि में पले-बढ़े हैं, यहीं पर पढ़-लिखकर योग्य बने हैं। फिर विदेश जाकर अपनी योग्यता का लाभ दूसरे देशों को देने के लिए मन कैसे तैयार हो जाता है? क्या चार पैसे हमें इतना आकर्षित करते हैं कि हम अपने ही देश में पैसा नहीं, अवसर नहीं, रिसर्च की सुविधा नहीं आदि बहाने बनाकर विदेश भाग जाते हैं। भारतीय अठारह विद्याओं व चौसठ कलाओं को पढ़ने व सीखने की हमारी इच्छा क्यों नहीं होती? हमारे यहाँ ज्ञान व तकनीकी का भंडार होते हुए भी हमारे विश्वविद्यालयों में क्यों यूरोअमेरिकी ज्ञान दिया जा रहा है? क्योंकि हम भारतीय ज्ञान- विज्ञान से परिचित नहीं हैं और स्वाभिमान शून्य हैं।

सबमें स्वाभिमान जगाएँ

हीनताबोध से मुक्त होने के लिए समस्त प्रजाजन में स्वाभिमान जगाना होगा। ‘स्व’ का अभिमान तभी होता है जब हम अपनी श्रेष्ठताओं को पहले जाने फिर माने और उन पर गर्व करें। अभी तो हम यही जानते हैं कि भारत तो पुराणपंथी है, वेद तो गडरियों के गीत हैं, यहाँ के लोग तो गर्म जलवायु के कारण निकम्मे हैं, यह तो जादूगरों व सपेरों का देश है, इसे तो अंग्रेजों ने सभ्य और शिक्षित किया है। यह नितान्त असत्य है, हम अंग्रेजों के गुलाम थे अतः हमने गुलामी की मानसिकता में उनकी बातों पर विश्वास कर लिया और मान लिया। इस गुलामी की मानसिकता के परिणामस्वरूप ही हम हीनता बोध से ग्रसित हैं।

वास्तविकता तो यह है कि हम ज्ञानवान हैं और सारी दुनियाँ को ज्ञानवान बनायेंगे। हम गुणवान हैं सारी दुनियाँ को गुणवान बनायेंगे, हम समृद्ध हैं सारी दुनियाँ को समृद्धि का पाठ पढ़ायेंगे, हम श्रेष्ठ हैं और सारे विश्व को श्रेष्ठ बनायेंगे। ऐसा उत्साह हमारे मनों में भी जाग्रत होना चाहिए। हमारे पास सब कुछ है, हम सबको सब कुछ दे सकते हैं। हमारे पूर्वजों ने सारे विश्व को सब कुछ दिया है, हम उनके वंशज हैं इसलिए हम भी दे सकते हैं। यह विश्वास आज पुनः जगाने की आवश्यकता है।

जो विनयशील बनकर आयेगा उसे हम सब कुछ देंगे परन्तु जो बलपूर्वक छीनने आयेगा उसे कठोर दण्ड मिलेगा। जो हमें मूर्ख बनाकर छलने के लिए आयेगा उसे उसके ही जाल में फँसाने की चतुराई हममें है। आज का भारत मूर्ख नहीं है उदार है, शठ नहीं है दानी है, विलासी नहीं है तपस्वी है, कायर नहीं है बलवान है। यह नया भारत है, जागृत भारत है, विश्व का नेतृत्वकर्त्ता भारत है, विश्व का मंगलकर्त्ता भारत है। हम ऐसे श्रेष्ठ भारत के नागरिक हैं, भगवान की दी हुई भूमिका को हमें ही पूरा करना है और हम करके रहेंगे। यह अदम्य साहस व विश्वास सभी देशवासियों में जगाने से ही हीनता बोध से भारत को मुक्ति मिलना सम्भव है।

(लेखक शिक्षाविद् है, भारतीय शिक्षा ग्रन्थमाला के सह संपादक है और विद्या भारती संस्कृति शिक्षा संस्थान के सचिव है।)

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