भारतीय शिक्षा – ज्ञान की बात 99 (परिवार व समाज में समरसता लाना)

 ✍ वासुदेव प्रजापति

पूर्व अध्याय में हमने हीनताबोध और उसका स्वरूप क्या है? यह समझा और उससे मुक्त होने के लिए मनोवैज्ञानिक उपाय करने की आवश्यकता भी अनुभव की। कुछ पाठकों को लगा होगा कि ये मनोवैज्ञानिक उपाय तो सामान्य रूप से निकृष्ट माने जाते हैं, फिर ऐसे निकृष्ट उपाय क्यों करना चाहिए? जब सीधी उंगली से घी नहीं निकलता तब उंगली टेड़ी करनी पड़ती है। जब बौद्धिक उपाय निष्फल होते हैं तो मनोवैज्ञानिक उपाय करने ही पड़ते हैं। ऐसे उपाय शीघ्र परिणामकारी भी होते हैं।

ये उपाय तो पाश्चात्यीकरण के प्रभाव से उत्पन्न हुए हीनताबोध के लिए हैं। किन्तु अंग्रेजों ने हमारे परिवार व समाज में जो फूट डाली है, उसके लिए ये उपाय नहीं हो सकते। उस फूट को मिटाकर परिवार और समाज में समरसता निर्माण करने हेतु हमें भिन्न स्वरूप के उपाय करने होंगे। क्योंकि यह तो हमारी अपनी ही नासमझी का विषय है, अपने ही अवगुणों को दूर करने का विषय है। इसलिए हमें अपने ही उपाय करने होंगे।

स्त्री-पुरुष समानता का विषय

सबसे पहला विषय स्त्री व पुरुष की समानता का है। इस विषय ने हमारे परिवारों में दरार पैदा कर दी है। परिवार विघटित हो गए हैं, इस विघटन से एक बड़ी हानि यह हुई है कि हमारी संस्कृति का एक प्रभावी आलम्बन ही समाप्त हो गया। अंग्रेजों ने हमारे देश के स्त्री-पुरुषों को शिक्षा के माध्यम से स्त्री-पुरुष समानता की पाश्चात्य भ्रान्त संकल्पना समान रूप से दी जो परिवारों के विघटन का प्रमुख कारण बनी है। दासता के कालखण्ड में स्त्रियों पर अत्याचार भी हुए, उन्हें आश्रित रहने के कारण हीनता का दंश भी झेलना पड़ा, यह सत्य है। परन्तु समानता लाने के जो उपाय किए गए और आज भी किए जा रहे हैं, वे पारिवारिक सन्तुलन बनाने वाले नहीं अपितु बिगाड़ने वाले ही सिद्ध हुए हैं।

स्त्रियों का पुरुष जैसा बनने की होड़

समानता लाने के उपायों में आज स्त्रियों को पुरुष जैसा बनना अच्छा लगता है। पुरुष जो काम करते हैं, वे सभी काम करने में और उनसे भी आगे निकलने में गर्व का अनुभव होता है। स्त्रियाँ ये सब करें, इसमें पुरुषों को कोई आपत्ति नहीं हैं। परन्तु भारत की करोड़ों स्त्रियों को ऐसी शिक्षा और ऐसे अवसर नहीं दिये जा सकते। ऐसा करना कितना ही आवश्यक लगता हो तब भी व्यावहारिक स्तर पर यह सम्भव नहीं है। इसके साथ यह भी विचार करना चाहिए कि ऐसा मानने से और करने से स्त्री-पुरुष समानता सिद्ध नहीं होती अपितु पुरुष का श्रेष्ठत्व ही सिद्ध होता है। स्त्री को पुरुष जैसा बनने की, करके दिखाने की चुनौती स्वीकारनी पड़ती है। वह स्वीकार कर भी लेती है परन्तु उससे सिद्ध तो यही होता है कि पुरुष श्रेष्ठ है।

यदि पुरुष श्रेष्ठ नहीं होता तो स्त्री पुरुष जैसा क्यों बनना चाहती है? स्त्री का पुरुष जैसा बनने का परिणाम यह होगा कि समाज स्त्री विहीन हो जायेगा, सम्पूर्ण समाज में अकेले पुरुष ही होंगे। स्त्री देह में भी पुरुष ही बैठा मिलेगा, शारीरिक और जैविक स्तर भी एक स्त्री वृत्ति में, कार्य में तथा व्यवहार में पुरुष ही होगी। इस प्रकार समाज में स्त्री देहधारी पुरुष ऐसी एक नई प्रजाति का उदय होगा, जो स्वस्थ समाज के लिए किसी भी दृष्टि से उचित नहीं होगा। एक सभ्य व संस्कारित समाज में स्त्री व पुरुष दोनों का समान संख्या में होना नितान्त आवश्यक है। स्त्रियों को स्त्रियों के रूप में समान मानना, स्त्रियों के गुणों का आदर करना तथा स्त्रीत्व एक अमूल्य सम्पत्ति है यह मानकर उसकी रक्षा करना ही सही उपाय है।

परिवारों को सुदृढ़ करना

परिवार समाज की प्रथम ईकाई है। यह प्रथम ईकाई जितनी सुदृढ़ होगी उतना ही समाज सुदृढ़ होगा। इसलिए हमें इन परिवारों को स्त्री कन्द्री बनाना होगा। हमें इन परिवारों को कार्यालयों, कारखानों और मंत्रालयों से अधिक महत्वपूर्ण मानकर शेष बातों की रचना करनी होगी। जैसे परिवार शिक्षा के विविध आयामों को विधिवत पाठ्यक्रम व पठन-पाठन सामग्री की सहायता से मुख्य प्रवाह की शिक्षा के साथ में अथवा उसके समानान्तर चलाना होगा। युवक व युवतियों के मानस परिवार बनाने के अनुकूल गढ़ने होंगे। फलतः विवाह की आयु कम होगी, जन्म लेने वाले बच्चे भी स्वस्थ होंगे। युवक-युवतियों में गृहस्थ व गृहिणी बनने की चाह जगानी होगी। विवाह को अर्थार्जन से अधिक वरीयता देनी होगी।

व्यावहारिक दृष्टि से विचार करके लड़के व लड़कियों को अर्थार्जन की पात्रता निर्माण करने का कार्य पहले करना चाहिए। यह पात्रता दोनों में समान रूप से निर्माण करनी चाहिए, परन्तु अर्थार्जन शुरु करने से पहले विवाह कर लेना चाहिए। बाद में पति-पत्नी दोनों को मिलकर एक साथ अर्थार्जन करना चाहिए। इतना अवश्य ध्यान रखना चाहिए कि अर्थार्जन एक दूसरे से स्वतन्त्र रहकर अलग-अलग नहीं करना चाहिए। किसी भी परिस्थिति में जब तक कोई घोर विपत्ति न आ जाये, तब तक पति-पत्नी को एक दूसरे के साथ ही रहना चाहिए, अलग-अलग रहना अच्छा नहीं मानना चाहिए। दोनों का साथ मिलकर घर चलाने से कुछ समय उपरान्त अपने आप ध्यान में आने लगता है कि दोनों को समान रूप से अर्थार्जन करने में कोई सुविधा नहीं है और बहुत अधिक आवश्यकता भी नहीं है। उधर परिवार दुर्लक्षित होता है, वह अलग। इसलिए समझदारी इसी में है कि एक अर्थार्जन करे और दूसरा घर चलाए, यह मानकर कि घर चलाना अर्थार्जन से अधिक महत्वपूर्ण कार्य है।

स्त्री-पुरुष समानता या समरसता

स्त्री-पुरुष के समान हों और उसे सम्मान मिले, इससे भी बढ़कर स्त्री व पुरुष में समरसता हो यह अधिक महत्वपूर्ण विषय है। दोनों में समरसता स्थापित होने पर अधिकार, समानता व श्रेष्ठता जैसी बातें ही खड़ी नहीं होती। समरसता प्रेम के आधार पर बनती है, इसके संस्कार घर में ही होते हैं। विद्यालयों में यह शिक्षा नहीं दी जा सकती। सन्तानों को इसके संस्कार देने हेतु माता के सम्बन्ध की प्रेरणा महत्वपूर्ण कारक है। माता से समरसता के अनेक प्रश्नों के उत्तर सरलता से मिल जाते हैं।

स्त्री-पुरुष समरसता के बाद बेटे-बेटी का सही लालन-पालन भावी पीढ़ी के सर्व प्रकार के स्वास्थ्य की दृष्टि से महत्वपूर्ण विषय है। पति-पत्नी की समरसता से  संतानों के लालन-पालन की सही दृष्टि प्राप्त होती है। इसके साथ-साथ दो पीढ़ियों की समरसता भी महत्वपूर्ण मुद्दा है। जन्म लेने वाली सन्तान को पिता की चौदह पीढ़ियों और माता की पाँच पीढ़ियों को साथ जोड़कर हमारे शास्त्रों ने समरसता स्थापित करने का महती कार्य किया है। हमारे संस्कार सिद्धान्त में भी समरसता को ही प्रस्थापित किया गया है। ये सारे प्रयास कृति के नहीं है, जैविक और मानसिक स्तर के जो तथ्य हैं उन्हें निरूपित किया है। आज हमने इनकी उपेक्षा की है इसलिए अनेक संकट निर्माण हुए हैं।

सामाजिक समरसता का विषय

पारिवारिक समरसता के समान ही सामाजिक समरसता का विषय भी महत्वपूर्ण है। आज वर्णद्वेष के रूप में बहुत बड़ा संकट हमारे सामने है। एक समय वह भी था जब वर्णव्यवस्था भारतीय समाज का आधार स्तम्भ थी। परन्तु आज वह पूर्णरूपेण विकृत हो गई है। वर्ण के साथ जाति संस्था भी उलझ गई है, जबकि ये दोनों परस्पर जुड़ी हुई हैं। वर्ण और जाति का आपसी सम्बन्ध, दोनों की व्यवस्था, दोनों का प्रयोजन अत्यन्त अस्पष्ट हो गया है। ये दोनों संस्थाएँ इतनी पुरानी और समाज के मानस में इतनी गहरी पैठ बनाये हुए है कि वे जाती ही नहीं है, लोग इन्हें भूलते भी नहीं हैं। अंग्रेजों ने विभिन्न वर्णों के मध्य द्वेष पैदा करने का सफल प्रयत्न किया है, जो उस समय से लेकर आज तक समस्या बनी हुई है। आज वर्णद्वेष एक भीषण रोग बन गया है। राजनीतिक दलों ने अपने स्वार्थों की पूर्ति हेतु इसे बनाए रखने और बढ़ाने हेतु आग में घी डालने का कार्य किया है। क्योंकि राजनीतिक दलों के लोग भले ही भारतीय हों परन्तु वे उसी व्यवस्था में पले-बढ़े हैं जिसे अंग्रेजों ने स्थापित किया था। इसलिए इनकी सोच भी वही है जो अंग्रेजों की थी।

आज वर्ण और जाति व्यवस्था इतनी अधिक विकृत हो गई है कि उसको कैसे सुधारा जाये, कुछ भी समझ में नहीं आ रहा है। अनेक अविवेकी लोग विकृति को दूर करने के स्थान पर वर्ण एवं जाति व्यवस्था को ही नष्ट करने की बात करते हैं। दूसरी और उतने ही अविवेकी लोग वर्ण और जाति की उसी प्राचीन व्यवस्था को पुनर्जीवित करने की बात करते हैं। परन्तु ऐसा करने से न व्यवस्था समाप्त होती है, न विकृति सुधरती है और न वह पुनर्जीवित ही होती है। आवश्यकता है समरसता स्थापित करने की। केवल मनोरथ करने से समरसता स्थापित नहीं होती, उसके लिए कोई व्यावहारिक चरणबद्घ योजना होनी चाहिए। वैसे सरकार ने आरक्षण की व्यवस्था की है, परन्तु जब तक सामाजिक स्तर पर उसके अनुकूल मनोवैज्ञानिक उपाय नहीं किए जायेंगे तब तक आरक्षण जैसी अन्य व्यवस्थाएँ कर लेने के बाद भी समस्या ज्यों की त्यों बनी रहेंगी।

समरसता निर्माण हेतु पहल करना

समरसता निर्माण करने की पहल ब्राह्मणों को करनी होगी। इसके लिए पहले ब्राह्मणों का मानस बनाना होगा। आज ब्राह्मणों का ब्राह्मणत्व उपनयन व पौरोहित्य में ही सिमटकर रह गया है। अनेक ब्राह्मण इन दोनों कार्यों को छोड़ भी चुके हैं तथापि जन्म से जो वर्ण प्राप्त हुआ है उसका गर्व छोड़ नहीं पाए हैं। वह गर्व उनके अंग विन्यास, भाषा और व्यवहार में प्रकट होता है, उसका उपाय करना होगा। यह उपाय ब्राह्मणों को ही करना होगा क्योंकि और कोई कर नहीं सकता।

समाज को ब्राह्मण तो चाहिए परन्तु अध्ययन करने वाला, ज्ञान को न बेचने वाला अर्थात् निशुल्क पढ़ाने वाला, समाज हित के लिए यज्ञ करने तथा करवाने वाला, तप करने वाला, शुद्ध व पवित्र आचार-विचार वाला ब्राह्मण चाहिए। परन्तु आज के ब्राह्मण ने अपने आचार और जीवनकार्य (मिशन) दोनों का त्याग कर दिया है, फिर भी ब्राह्मण होने का गर्व करते हैं जो क्षमा के योग्य भी नहीं हैं।

एक नई व्यवस्था देनी होगी

एक नए सूत्र पर विचार करना चाहिए। जो जिस वर्ण के आचार और व्यवसाय अपनाता है, वह उस वर्ण का माना जायेगा। वर्ण व्यवसाय के आधार पर बनाए जाएँ और उसके अनुरूप आचार भी वह अपनाएँ। जिसे जो वर्ण अपनाना है, वह उसके व्यवसाय को अपना सकता है। परन्तु व्यवसाय अपनाने के साथ आचार नहीं अपनाया तो नहीं चलेगा। इस नई व्यवस्था में वर्णों के पुराने नामों के स्थान पर नए नाम देने चाहिए। उदाहरण के लिए वर्णों के नाम – डॉक्टर, इंजीनियर, शिक्षक, व्यापारी व कारीगर हो सकते हैं। ऐसी व्यवस्था देने वाले किसी भी तरह सत्ता, पद, मान व पुरस्कार आदि से जुड़े हूए न हों, वे पूर्ण रूप से निष्पक्ष हों, ऐसा आवश्यक रूप से होना ही चाहिए। यह नई व्यवस्था व्यावहारिक व अनुसरणीय भी होनी चाहिए।

अस्पृश्यता भारतीय समाज का कलंक है, वह समरसता का बड़ा अवरोधक है। आज सार्वजनिक स्थान व समारोह में अस्पृश्यता दिखाई नहीं देती परन्तु वह परिस्थितिजन्य विवशता है, मन से अस्पृश्यता अभी तक नहीं गई है। इसका उपाय भी बड़ों के पास ही है। जिन्हें समाज को समरस बनाना है वे ही भेदभाव करते हैं। इसलिए समरसता की समस्या आज तक बनी हुई है। अस्पृश्यता निवारण के लिए हमारे देश के अनेक महापुरुषों ने प्रयास किये हैं। ऐसा ही एक संस्मरण हम अपनी कृति में लायें, इसी दृष्टि से यहाँ दिया जा रहा है।

समरसता का एक ठोस उदाहरण

बात सन् 1950 ई. की है। महाराष्ट्र के पुणे में संघ का ग्रीष्मकालीन प्रशिक्षण शिविर लगा हुआ था। एक दिन की बात है, भोजन के लिए सभी स्वयंसेवक पंक्तिबद्ध बैठे हुए थे। एक पंक्ति में परम पूजनीय श्रीगुरुजी, अतिथि एवं वरिष्ठ कार्यकर्ता बैठे हुए थे। गुरुजी ने देखा भोजन वितरण करने वाले स्वयंसेवकों मे से एक स्वयंसेवक वितरण नहीं कर रहा है। श्रीगुरुजी तुरन्त उसके पास गए और उससे वितरण न करने का कारण पूछा। उस स्वयंसेवक ने बड़े संकोच के साथ उत्तर दिया कि वह जाति से मोची है, इसलिए …..। श्रीगुरुजी को यह सुनकर बड़ा दुख हुआ। उन्होंने उस दिन बनी मिठाई जलेबी का पात्र लिया और उस तथाकथित अस्पृश्य स्वयंसेवक के हाथ में थमाया। वे उस स्वयंसेवक को लेकर अपनी थाली के पास आए और बोले, “सबसे पहले मेरी थाली में जलेबी परोसो फिर पंक्ति में बैठे सभी स्वयंसेवकों को परोसते चलो।” उस मोची जाति के स्वयंसेवक ने ऐसा ही किया। श्रीगुरुजी का ऐसा वास्तविक और व्यावहारिक मार्गदर्शन मिलने से इस समस्या का तत्काल समाधान हो गया। जब बड़े लोग अपने जीवन में सामाजिक समरसता के वास्तविक उदाहरण रखते हैं तब समरसता विवशता नहीं होती अपितु मन में बसती है।

(लेखक शिक्षाविद् है, भारतीय शिक्षा ग्रन्थमाला के सह संपादक है और विद्या भारती संस्कृति शिक्षा संस्थान के सचिव है।)

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