नागार्जुन का साहित्यिक परिचय

✍ डॉ. मीरा कुमारी

वैद्यनाथ मिश्र जो नागार्जुन के नाम से प्रसिद्ध हुए। इनका जन्म 3 जून 1911 में उनके ननिहाल ‘सतलखा’ गाँव, मधुबनी जिले में हुआ था। इनका पैतृक स्थान दरभंगा के तरौनी नामक गाँव है। बचपन में ही चार पुत्रों के मृत्यु हो जाने के बाद, उनके पिता ने देवघर स्थित महादेव (रावणेश्वर वैद्यनाथ) से संतान की याचना की थी। इसलिए उनका जन्म नाम ‘वैद्यनाथ’ मिश्र रखा गया था, जो लगभग 25 वर्षों तक उनसे सम्बंधित रहा। इनके बचपन का नाम ठक्कन मिश्र था इनको बाद में ‘नागार्जुन’ के नाम से पुकारा जाने लगा। यह नाम उनके साहित्यिक और विचारशीलता के कारण प्रसिद्ध हुआ था। नागार्जुन एक महान भारतीय साहित्यिक और विचारक थे। इनका नाम हिंदी और उर्दू की साहित्यिक परंपराओं को आधुनिकता के साथ जोड़ने के लिए प्रसिद्ध हैं और उनकी कविताएं व लेख उनके विचारशीलता, सामाजिक मुद्दों, और धार्मिक विचारधाराओं को प्रकट करते हैं। नागार्जुन की मृत्यु 5 नवंबर 1998 को हुई। उनका योगदान आज भी हिंदी और उर्दू साहित्य में महत्वपूर्ण माना जाता है।

 ‘यात्री’ नाम का चयन नागार्जुन ने स्वेच्छापूर्वक अपनी मैथिली रचनाओं के लिए किया था। इसी नाम का प्रयोग सन् 1942-43 तक अपनी हिन्दी रचनाओं के लिए भी किया। जब वे श्रीलंकायी प्रवास में थे तब बौद्ध धर्मांवलंबी होने के बाद‌ सन्‌ 1936-37 में उनका ‘नागार्जुन’ नामकरण हुआ। वे अपने सोच और स्वभाव से कबीर एवं देश-दुनिया के खट्टे-मीठे अनुभवों को बटोरने वाले और यायावर की तरह जीवन-यापन करने वाले बैद्यनाथ मिश्र मैथिली में ‘यात्री’, हिन्दी में ‘नागार्जुन’ के अलावा साहित्य में अन्य नामों से भी जाने जाते रहे। जैसे संस्कृत में उन्हें ‘चाणक्य’, लेखकों, मित्रों एवं राजनीतिक कार्यकर्ताओं में ‘नागा बाबा’ नाम से विख्यात थे।  

नागार्जुन के लेखन में उनका आत्मविश्वासपूर्ण व्यक्तित्व और समाज सेवा के प्रति उनका समर्पण दिखता है। सामाजिक और राजनीतिक मुद्दों की आवाज़ होने के साथ-साथ, उन्होंने साहित्यिक क्षेत्र में अपनी अनूठी पहचान बनाई। उनकी कविताएं भावुकता, विचारशीलता और साहित्यिक गहराई के कारण प्रसिद्ध हुई हैं। नागार्जुन को अनेक पुरस्कारों और सम्मानों से पुरस्कृत गया है, जिनमें सहित्य अकादमी पुरस्कार, पद्मश्री, साहित्य अकादमी फेलोशिप, और विभूति पुरस्कार शामिल हैं।

नागार्जुन की रचनाओं मे उनके सहज एवं सरल व्यतित्व की छाप स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। विशेषकर उनकी रचनाएं बाह्य आडंबरों से और बनावटी पनों से कोसों दूर है। हरफनमौला की तरह साहित्य की सभी विधाओं में और विभिन्न विषयों पर उन्होंने अपनी लेखनी चलाई है जिनमें कहानी, उपन्यास, कविताएँ, नाटक, निबंध, गद्य, जीवनी, अनुवाद, आलोचना और समालोचनात्मक लेखन हैं। इसके अलावा विभिन्न भाषाओं में इन्होंने साहित्य सृजन किया है। उनका साहित्य दार्शनिक तत्त्वधारा, सामाजिक समस्याओं पर उनकी चिंता और आधुनिकता की परिभाषा के साथ गहरी तालमेल रखता है।

नागार्जुन की साहित्यिक यात्रा उनकी काव्य रचनाओं के माध्यम से प्रारंभ हुई। नागार्जुन को भाव-बोध और कविता के स्तर पर सबसे अधिक निराला और कबीर के साथ जोड़कर देखा गया है। वैसे यदि व्यापक परिप्रेक्ष्य में नागार्जुन के काव्य में अब तक की पूरी भारतीय काव्य परंपरा ही जीवंत रूप में उपस्थित दिखाई देती है। उन्होंने लगभग 650 कविताओं का सृजन किया है। उनके चौदह काव्य संग्रह एवं दो खण्ड काव्य प्रकाशित है।

उनका पहला काव्य-संग्रह, ‘युगधारा’ (1953), जिसमें उनके युवावस्था की विचारधारा और काव्य क्षेत्र में नवीनता की पहचान है। इसके बाद उन्होंने कई काव्य संग्रह प्रकाशित किए, जिनमें ‘सतरंगे पंखोवाली’ (1959), ‘प्यासी पथराई आँखें’ (1962), ‘तालाब की मछलियाँ’ (1974), ‘तुमने कहा था’ (1980) और ‘खिचड़ी विप्लव देखा हमने’ (1980), ‘हजार-हजार बाहोंवाली’ (1981), ‘पुरानी जूतियों का कोरस’ (1983), ‘ऐसे भी हम क्या! ऐसे भी तुम क्या’ (1985), ‘आखिर ऐसा क्या कह दिया मैनें?’ (1986), ‘इस गुब्बारे की छाया में’ (1990), ‘भूल जाओ पुराने सपने’ (1994), ‘भष्मांकुर’ (1983), और ‘रत्नगर्भ’ (1974) खण्ड काव्य शामिल हैं। इन संग्रहों में नागार्जुन ने सामाजिक और राजनीतिक मुद्दों, प्रेम, भ्रष्टाचार, न्याय, और आधुनिक जीवन के विभिन्न पहलुओं को संवेदनशीलता के साथ व्यक्त किया है।

उपन्यासकार होना नागार्जुन के लिए एक अलग सी बात है। लगभग सभी उपन्यासों में वे जनचेतना के वाहक के रूप में व्याख्यायित किये जाते हैं। वे मूलतः ग्राम्य चेतना के वाहक आंचलिक कथाकार हैं। नागार्जुन ने व्यक्ति विशेष को केन्द्र में रखकर उपन्यासों की रचना की है। नागार्जुन के द्वारा रचित उपन्यासों का संक्षिप्त विवरण इस प्रकार है – ‘रतिनाथ की चाची’ (1943), ‘बलचनमा’ (1952), ‘नई पौध’ (1953), ‘बाबा बटेसरनाथ’ (1954), ‘जमनिया का बाबा’ (1955), ‘दुखमोचन’ (1957), ‘वरुण के बेटे’ (1957), ‘कुम्भीपाक’ (1960), ‘हीरक जयंती’ 1961, ‘उग्रतारा’ (1963), ‘इमरतिया’ (1968), ‘पारो’ (1975), ‘गरीबदास’ (1989)।

 नागार्जुन द्वारा रचित निबन्धों की संख्या लगभग 56 हैं जो ‘नागार्जुन रत्नावली भाग-6 में संकलित हैं। इसमें प्रस्तुत प्रमुख निबन्ध मृत्युंजय कवि तुलसौदास, बुद्धयुग की आर्थिक व्यवस्था, उपन्यास ही क्यों?, मशक्कत को दुनिया,  कैलास की ओर, आज का मैथिली कवि, आज का गुजराती कवि, मैथिली और हिन्दी, अमृता प्रीतम, नई चेतना, पंजाब के पुरुषार्थी, वैशाखी पूर्णिमा, महाकवि वल्लतोल, यशपाल, बालकृष्ण शर्मा ‘नवीन’, अन्नहीनम् क्रियाहीनम, बम भोलेनाथ, सत्यानाशी जलप्रलय, प्रेमचंद : एक व्यक्तित्व, भ्रष्टाचार का दानव, प्यारे हरीचंद्र की कहानी और वन्दे मातरम हैं। इसके अलावा नागार्जुन ने धार्मिक, सांस्कृतिक पर्वों पर भी निबंध लिखे हैं जैसे – ‘दीपावली’, ‘होली’, ‘वैशाख पूर्णिमा’ आदि।

नागार्जुन ने अपने जीवनकाल में मात्र दो नाटकों का सृजन किया है, जिसके कथानक ऐतिहासिक प्रसंगों पर आधारित हैं। ये नाटक हैं – अनुकंपा और निर्णय है।

नागार्जुन ने जीवनी के रूप में निराला के जीवन प्रसंगों का रेखांकन ‘एक व्यक्ति : एक युग’ शीर्षक से किया गया। निराला के व्यक्तित्व का नागार्जुन ने इस शीर्षकों में विभाजित किया है जो इस प्रकार है – जीने की पहली शर्त, आत्मनिष्ठा का संघर्ष,  तीन प्रबल संस्कार, देशकाल के शर से बिंधकर, महाशक्ति का साक्षात्कार, संतुलित रस चेतना, पीडिय़ों के पक्षघर, दुर्घष और अपराजेय एवं सुर्ती फाँकोंगे नागार्जुन?

नागार्जुन को हिन्दी के अतिरिक्त अन्य कई भाषाओं का भी ज्ञान था। अतः उन्होंने अनेक भाषाओं की रचनाओं का अनुवाद अपनी भाषा में किया। जैसे- जयदेव के ‘गीत–गोविन्द’ का भावानुवाद सन्‌ 1948 ई. में किया। कालिदास के ‘मेघदूत’ का सन्‌ 1956 में भावानुवाद किया। शरतचन्द्र के उपन्यासों ‘ब्राह्मण की बेटी’ तथा ‘देहाती दुनिया’ का अनुवाद किया। नागार्जुन द्वारा अनुवादित कन्हैयालाल माणिकलाल मुन्शी के उपन्यास ‘पृथ्वी वल्लभ’ सन्‌ 1954 में प्रकाशित हुआ। इन्होंने विद्यापति के सौ गीतों का अनुवाद भी किया।

संस्कृत में नाजार्गुन के तीन काव्य संग्रह हैं। नागार्जुन रचित संस्कृत लघुकाव्य ‘धर्मलोक शतकम्‌’ सिहली लिपी में प्रकाशित है। जिनमें देश दशकम्‌, कृषक दशकम्‌ और श्रमिक दशकम् है। ‌

नागार्जुन ने मैथिली भाषा में भी कई रचनायें की। जैसे- उपन्यास, कवितायें आदि। मैथिली भाषा में नागार्जुन ने कुल तीन उपन्यासों की रचना की जिनका बाद में हिंदी भाषा में भी अनुवाद हुआ। इन उपन्यासों में से ‘नवतुरिया का हिन्दी में रूपांतरण ‘नई पौध’ के नाम से हुआ। अतिरिक्त दोनों उपन्यास उनके मूल नामों से ही हिंदी में रूपांतरित हुए जिनमें पारो, नवतुरिया, बलचनमा हैं। मैथिली भाषा में उनका चित्रा (1949) और पक्षहीन नग्न गाछ (1967) दो काव्य संग्रह मिलती है। उसी तरह बंगला भाषा में भी नागार्जुन की 41 बंगला कवितायें हैं। जिसका संकलन ‘नागार्जुन रचनावली खण्ड-3’ में किया गया है।

नागार्जुन की लेखनी बहुआयामी रही है। इन्होनें बाल-साहित्य को भी अपनी लेखनी से अछूता नहीं रखा है। इस श्रृंखला में नागार्जुन की रचनायें जैसे कथामंजरी, अयोध्या का राजा, रामायण की कथा, वीर विक्रम, तीन अहदी, अनोखा टापु और सयानी कोयल इत्यादि हैं।

नागार्जुन ने साहित्यिक आलोचना और समालोचनात्मक लेखन में भी महत्वपूर्ण योगदान दिया है। उनके लेख और निबंधों में वे साहित्यिक कृतियों, साहित्यिक सिद्धांतों, और कविता के विभिन्न पहलुओं पर विचार करते हैं। उनका समालोचनात्मक लेखन उनकी विचारधारा, लेखन शैली और समसामयिक चुनौतियों के साथ-साथ हिंदी साहित्य के विकास में महत्वपूर्ण है।

नागार्जुन की रचनाओं में राष्ट्र प्रेम का गहरा अनुभव दिखता है। उनके कविताओं और नाटकों में वे अपने देश, समाज और राष्ट्र के प्रति अपार प्रेम को व्यक्त करते हैं। उन्होंने अपनी कविताओं और नाटकों के माध्यम से अपने पाठकों को एक ऐसे राष्ट्र की संभावना के प्रति प्रेरित किया है जो न्याय, समानता और समरसता के मूल्यों पर आधारित हो।

नागार्जुन की रचनाओं में महिला सशक्तिकरण और महिला मुक्ति के मुद्दे भी उठाए गए हैं। उन्होंने उत्पीड़ित, निर्बल, और दबे हुए वर्गों की आवाज़ उठाई है व समाज में स्त्री-पुरुष समानता की मांग की है। नागार्जुन की भाषा शैली सादगी, सुगठित और प्रभावशाली व्यक्तित्व का परिचय देती है। उनकी साहित्यिक भाषा शैली उनके पाठकों को अपनी अद्भुत विचारधारा, भावनात्मकता और कला के साथ प्रभावित करती है।

(लेखिका रांची विश्वविद्यालय, रांची के अंतर्गत बलदेव साहु महाविद्यालय, लोहरदगा में हिंदी विषय की सहायक प्राध्यापिका है।)

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