भारतीय ज्ञान का खजाना-21 (बाणस्तंभ)

✍ प्रशांत पोळ

‘इतिहास’ बड़ा चमत्कारी विषय है। इसको खोजते खोजते हमारा सामना ऐसी स्थिति से होता है कि हम आश्चर्य में पड़ जाते हैं। पहले हम स्वयं से पूछते हैं, यह कैसे संभव है? डेढ़ हजार वर्ष पहले इतना उन्नत और अत्याधुनिक ज्ञान हम भारतीयों के पास था, इस पर विश्वास ही नहीं होता!

गुजरात के सोमनाथ मंदिर में आकर कुछ ऐसी ही स्थिति होती है। वैसे भी सोमनाथ मंदिर का इतिहास बड़ा ही विलक्षण और गौरवशाली रहा है। बारह ज्योतिर्लिंगों में से पहला ज्योतिर्लिंग है सोमनाथ। एक वैभवशाली, सुंदर शिवलिंग। इतना समृद्ध कि उत्तर-पश्चिम से आने वाले प्रत्येक आक्रांता की पहली नजर सोमनाथ पर जाती थी। अनेक बार सोमनाथ मंदिर पर हमले हुए। उसे लूटा गया। सोना-चाँदी, हीरा, माणिक मोती आदि गाड़ियाँ भर-भरकर आक्रांता ले गए। इतनी संपत्ति लुटने के बाद भी हर बार सोमनाथ का शिवालय उसी वैभव के साथ खड़ा हो जाता था।

लेकिन केवल इस वैभव के कारण ही सोमनाथ का महत्त्व नहीं है। सोमनाथ का मंदिर भारत के पश्चिम समुद्र तट पर है। विशाल अरब सागर रोज भगवान सोमनाथ के चरण पखारता है और गत हजारों वर्षों के ज्ञात इतिहास में इस अरब सागर ने कभी भी अपनी मर्यादा नहीं लांघी है। न जाने कितने आँधी-तूफान आए, चक्रवात आए, लेकिन किसी भी आँधी-तूफान, चक्रवात से मंदिर को कोई हानि नहीं हुई।

इस मंदिर के प्रांगण में एक स्तंभ (खंभा) है। यह ‘बाणस्तंभ’ नाम से जाना जाता है। यह स्तंभ कब से यहाँ पर है, बता पाना कठिन है। लगभग छठी शताब्दी से इस बाणस्तंभ का इतिहास में नाम आता है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि बाणस्तंभ का निर्माण छठी शताब्दी में हुआ है। उसके सैकड़ों वर्ष पहले इसका निर्माण हुआ होगा। यह एक दिशा दर्शक स्तंभ है, जिस पर समुद्र की ओर इंगित करता एक बाण है। इस बाणस्तंभ पर लिखा है-

‘आसमुद्रान्त दक्षिण ध्रुव पर्यन्त अबाधित ज्योतिमांगं’ इसका अर्थ यह हुआ – ‘इस बिंदु से दक्षिण ध्रुव तक सीधी रेखा में एक भी अवरोध या बाधा नहीं है।’ अर्थात् ‘इस समूची दूरी में जमीन का एक भी टुकड़ा नहीं है।’

जब मैंने पहली बार इस स्तंभ को देखा और यह शिलालेख पढ़ा तो मेरे रोंगटे खड़े हो गए। यह ज्ञान इतने वर्षों पहले हम भारतीयों को था? कैसे संभव है? और यदि यह सच है तो कितने समृद्धशाली ज्ञान की वैश्विक धरोहर हम सँजोए हैं!

संस्कृत में लिखे हुए इस पंक्ति के अर्थ में अनेक गूढ़ अर्थ समाहित हैं। इस पंक्ति का सरल अर्थ यह है कि ‘सोमनाथ मंदिर के इस बिंदु से लेकर दक्षिण ध्रुव तक (अर्थात् अंटार्कटिका तक) एक सीधी रेखा खींची जाए तो बीच में एक भी भूखंड नहीं आता है।’ क्या यह सच है? आज के तंत्र-विज्ञान के युग में यह ढूँढ़ना संभव तो है, लेकिन उतना आसान नहीं।

गूगल मैप में ढूँढ़ने के बाद भूखंड नहीं दिखता है, लेकिन वह बड़ा भूखंड! छोटे-छोटे भूखंडों को देखने के लिए मैप को ‘एनलार्ज’ या ‘जूम’ करते हुए आगे जाना पड़ता है। वैसे तो यह बड़ा ही ‘बोरिंग’ सा काम है, लेकिन धीरज रखकर धीरे-धीरे देखते गए तो रास्ते में एक भी भूखंड (अर्थात् 10 किलोमीटर x 10 किलोमीटर से बड़ा भूखंड। उससे छोटा पकड़ में नहीं आता है) नहीं आता है, अर्थात् हम मानकर चलें कि उस संस्कृत श्लोक में सत्यता है।

किंतु फिर भी मूल प्रश्न वैसा ही रहता है। अगर मानकर भी चलते हैं कि सन् 600 में इस बाणस्तंभ का निर्माण हुआ था, तो भी उस जमाने में पृथ्वी का दक्षिणी ध्रुव हैं, यह ज्ञान हमारे पुरखों के पास कहाँ से आया? अच्छा, दक्षिण ध्रुव ज्ञात था, यह मान भी लिया, तो भी सोमनाथ मंदिर से दक्षिण ध्रुव तक सीधी रेखा में एक भी भूखंड नहीं आता है, यह ‘मैपिंग’ किसने किया? कैसे किया? सब कुछ अद्भुत!

इसका अर्थ यह है कि ‘बाणस्तंभ’ के निर्माण-काल में भारतीयों को पृथ्वी गोल है, इसका ज्ञान था। इतना ही नहीं, पृथ्वी का दक्षिण ध्रुव है (अर्थात् उत्तर ध्रुव भी है) यह भी ज्ञान था। यह कैसे संभव हुआ? इसके लिए पृथ्वी का ‘एरिअल व्यू’ लेने का कोई साधन उपलब्ध था? अथवा पृथ्वी का विकसित नक्शा बना था?

नक्शे बनाने का एक शास्त्र होता है। अंग्रेजी में इसे ‘कार्टोग्राफी’ (यह मूलतः फ्रेंच शब्द है) कहते हैं। यह प्राचीन शास्त्र है। इससे पहले छह से आठ हजार वर्ष पूर्व की गुफाओं में आकाश के ग्रह-तारों के नक्शे मिले थे, परंतु पृथ्वी का पहला नक्शा किसने बनाया, इस पर सब एकमत नहीं हैं। हमारे भारतीय ज्ञान का कोई सबूत न मिलने के कारण यह सम्मान ‘एनेक्सिमेंडर’ नामक ग्रीक वैज्ञानिक को दिया जाता है। इनका कालखंड ईसा पूर्व 611 से 546 वर्ष था, किंतु इनका बनाया हुआ नक्शा अत्यंत प्राथमिक अवस्था में था। उस कालखंड में जहाँ-जहाँ मनुष्यों की बसाहट का ज्ञान था, बस, वही हिस्से नक्शे में दिखाए गए हैं। इसलिए उस नक्शे में उत्तर और दक्षिण ध्रुव दिखने का कोई कारण ही नहीं था।

आज की दुनिया के वास्तविक रूप के करीब जाने वाला नक्शा ‘हेनरिक्स मार्टेलस’ ने साधारणतः सन् 1490 के आसपास तैयार किया था। ऐसा माना जाता है कि कोलंबस ने इसी नक्शे के आधार पर अपना समुद्री सफर तय किया था।

‘पृथ्वी गोल है’ इस प्रकार का विचार यूरोप के कुछ वैज्ञानिकों ने व्यक्त किया था। ‘एनेक्सिमेंडर’ ने ईसा पूर्व 600 वर्ष, पृथ्वी को सिलेंडर के रूप में माना था। ‘एरिस्टोटल’ (ईसा पूर्व 384 ईसा पूर्व 322) ने भी पृथ्वी को गोल माना था।

लेकिन भारत में यह ज्ञान बहुत प्राचीन समय से था, जिसके प्रमाण भी मिलते हैं। इसी ज्ञान के आधार पर आगे चलकर आर्यभट्ट ने सन् 500 के आसपास इस गोल पृथ्वी का व्यास 4,967 योजन है (अर्थात् नए मापदंडों के अनुसार 39,968 किलोमीटर है), यह भी दृढ़तापूर्वक बताया। आज की अत्याधुनिक तकनीक की सहायता से पृथ्वी का व्यास 40,075 किलोमीटर माना गया है। इसका अर्थ यह हुआ कि आर्यभट्ट के आकलन में मात्र 0.26 प्रतिशत का अंतर आ रहा है, जो नाममात्र है! लगभग डेढ़ हजार वर्ष पहले आर्यभट्ट के पास यह ज्ञान कहाँ से आया?

सन् 2008 में जर्मनी के विख्यात इतिहासविद् जोसेफ श्वार्ट्सबर्ग ने यह साबित कर दिया कि ईसा पूर्व दो-ढाई हजार वर्ष पहले भारत में नक्शा शास्त्र अत्यंत विकसित था। नगर-रचना के नक्शे उस समय उपलब्ध तो थे ही, साथ ही नौकायन के लिए आवश्यक नक्शे भी उपलब्ध थे।

भारत में नौकायन शास्त्र प्राचीन काल से विकसित था। संपूर्ण दक्षिण एशिया में जिस प्रकार से हिंदू संस्कृति के चिह्न पग-पग पर दिखते हैं, उससे यह ज्ञात होता है कि भारत के जहाज पूर्व दिशा में जावा, सुमात्रा, यवद्वीप को पार करके जापान तक प्रवास करके आते थे। सन् 1955 में गुजरात के ‘लोथल’ में ढाई हजार वर्ष पूर्व के अवशेष मिले हैं। इसमें भारत के प्रगत नौकायन के अनेक प्रमाण मिलते हैं। सोमनाथ मंदिर के निर्माण काल में दक्षिण ध्रुव तक दिशा-दर्शन, उस समय के भारतीयों को था, यह निश्चित है, लेकिन सबसे महत्त्वपूर्व प्रश्न सामने आता है कि दक्षिण ध्रुव तक सीधी रेखा में समुद्र में कोई अवरोध नहीं है, ऐसा बाद में खोज निकाला या दक्षिण ध्रुव से भारत के पश्चिम तट पर बिना अवरोध के सीधी रेखा जहाँ मिलती है, वहाँ पहला ज्योतिर्लिंग स्थापित किया?

उस बाणस्तंभ पर लिखी गई उन पंक्तियों में, (‘आसमुद्रान्त दक्षिण ध्रुव पर्यन्त, अबाधित ज्योतिर्मार्ग’) जिसका उल्लेख किया गया है, वह ‘ज्योतिर्मार्ग’ क्या है? यह आज भी प्रश्न ही है!
और पढ़ें : भारतीय ज्ञान का खजाना-19 (भारतीय स्थापत्य शास्त्र भाग – दो)

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