मदन मोहन मालवीय जी के सपनों का काशी हिन्दू विश्वविद्यालय (बीएचयू)


– रवि कुमार

महात्मा गांधी ने उन्हें अपना बड़ा भाई कहा और “भारत निर्माता” की संज्ञा दी। एक ऐसी महान आत्मा, जिन्होंने आधुनिक भारतीय राष्ट्रीयता की नींव रखी। वह व्यक्ति और कोई नहीं मदन मोहन मालवीय हैं, जिन्हें महामना (एक सम्मान) के नाम से भी जाना जाता है। वह एक महान राजनेता और शिक्षाविद् थे। उन्होंने भारत के सबसे बेहतरीन विश्वविद्यालयों में से एक ‘काशी हिंदू विश्वविद्यालय’ की स्थापना की। वह एक ऐसे देशभक्त थे जिन्होंने देश की स्वतंत्रता के लिए हरसंभव प्रयास किया और आज वह युवाओं के प्रेरणा स्रोत हैं।

आज से एक शताब्दी पूर्व जब देश में उच्च शिक्षा का कोई पुख्ता इंतजाम नहीं था तब महामना पंडित मदन मोहन मालवीय ने देश में एक ऐसे विश्वविद्यालय की नींव रखी जो प्राचीन भारतीय परम्पराओं को अक्षुण्य रखते हुए देश-दुनिया में हो रही तकनीक की प्रगति की शिक्षा भी दे सके। अपनी इसी सोच को साकार करने के लिए उन्होंने 1916 में काशी हिन्दू विश्वविद्यालय (BHU) की स्थापना की। खास बात ये है कि इस महान विश्वविद्यालय की स्थापना का सारा काम चंदे से किया गया।

बीएचयू की स्थापना का इतिहास कहता है कि पंडित मदन मोहन मालवीय को इस पुनीत कार्य के लिए सबसे पहले एक गरीब और बुजुर्ग महिला ने सबसे पहले एक पैसा चंदा के रूप में दिया। यह सिर्फ चंदा मात्र नहीं बल्कि उस बुजुर्ग महिला का मालवीय जी को दिया पहला आशीर्वाद था जिसके कारण वे अपने मिशन को सफल कर सके।

1300 एकड़ में फैला बीएचयू का मुख्य परिसर, 6 संस्थान, 14 संकाय, 140 विभाग, 75 छात्रावास और 35 हजार विद्यार्थी इस विश्वविद्यालय को एशिया की सबसे बड़ा विश्वविद्यालय बनाता है। यहां विश्व के 34 देशों से छात्र आकर पढ़ते हैं। विश्वविद्यालय को “राष्ट्रीय महत्त्व का संस्थान” का दर्ज़ा प्राप्त है। डॉक्टर सुंदरलाल, पंडित मदन मोहन मालवीय, डॉक्टर एस राधाकृष्णन (भुतपूर्व राष्ट्रपति), डाक्टर अमरनाथ झा, आचार्य नरेन्द्र देव और डॉक्टर त्रिगुण सेन (भूतपूर्व केन्द्रीय शिक्षा मंत्री) जैसे मूर्धन्य विद्वान इस विश्वविद्यालय के कुलपति रह चुके हैं। ख्याति प्राप्त भारतीय वैज्ञानिक शांतिस्वरूप भटनागर ने इस विश्वविद्यालय के कुल गीत की रचना की थी – ‘मधुर मनोहर अतीव सुन्दर यह सर्व विद्या की राजधानी’।

मालवीय जी ने विश्वविद्यालय के लिए जो ध्येय निश्चित किए थे, वे इस प्रकार है –

एक, हिन्दू शास्त्र तथा संस्कृत भाषा के अध्ययन की वृद्धि, जिसके द्वारा भारतवर्ष की प्राचीन सभ्यता में जो कुछ भी श्रेष्ठ और महत्वपूर्ण था उसकी तथा हिन्दुओं की प्राचीन संस्कृति तथा भावनाओं की रक्षा और मुख्यतः हिन्दुओं में एवं सार्वजनिक रूप से सर्व साधारण में उसका प्रचार हो सके।

दो, कला और विज्ञान की सर्वतोमुखी शिक्षा तथा अन्वेषण की वृद्धि।

तीन, आवश्यक प्रयोगात्मक ज्ञान के साथ-साथ विज्ञान, शिल्पादि कला, कौशल तथा व्यवसाय सम्बन्धी ऐसे ज्ञान की वृद्धि जिससे स्वदेशी व्यवसाय तथा धंधों की उन्नति हो ।

चार, धर्म और नीति को शिक्षा का आवश्यक या अभिन्न अंग मान कर युवकों में सदाचार का संगठन या चरित्र निर्माण का विकास करना।

मदन मोहन मालवीय का इस विश्वविद्यालय के सम्बन्ध में सन्देश –  यह मेरी इच्छा और प्रार्थना है कि प्रकाश और जीवन का यह केन्द्र जो अस्तित्व में आ रहा है वह ऐसे छात्र प्रदान करेगा जो अपने बौद्धिक रूप से संसार के दूसरे श्रेष्ठ छात्रों के बराबर होंगे, बल्कि एक श्रेष्ठ जीवन व्यतीत करेंगे, अपने देश से प्यार करेंगे और परम पिता के प्रति इमानदार रहेगे।”

आज यह विचार का विषय है कि महामना मदन मोहन मालवीय जी के सपनों का बीएचयू क्या वैसा ही है जैसा मालवीय जी ने सोचा था? भारतीय शिक्षा के लिए प्रयासरत क्या इस विश्वविद्यालय की मौलिकता बनी हुई है? मालवीय जी ने विश्वविद्यालय के लिए जो उद्देश्य व ध्येय निश्चित किए थे क्या उन्हें प्राप्त करने के लिए आज भी प्रयास हो रहा है?

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