अभिनव भारत की संकल्पना और शिक्षा-1


– अवनीश भटनागर

शिक्षा एक ऐसा पक्ष है, जिससे किसी भी राष्ट्र की प्रगति या अवनति जुड़ी हुई है । राष्ट्र के सर्वांगीण विकास में शिक्षा महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है । पिछली दो शताब्दियों से शिक्षा के सम्मुख आने वाली घटनाएँ, चुनौतियाँ आज भी अनसुलझी हुई हैं । भारत की स्वतन्त्रता के इकहत्तर वर्षों के बाद भी शिक्षा की स्थिति एवं शिक्षा के स्वरूप की विवेचना एवं व्याख्या करनी पड़ रही है इसका अर्थ यही है कि शिक्षा के क्षेत्र में हम अब तक असफल रहें हैं ।

तीन प्रर्श्नों की विवेचनाः-

आज सामान्य व्यक्ति भी यह कहता है कि हमारे देश में शिक्षा की स्थिति अच्छी नहीं है । यहाँ मैं एक पुस्तक का सन्दर्भ दे रहा हूँ । सन् 2012-2013 में यह पुस्तक “भारत में राष्ट्रीय शिक्षा आंदोलन का इतिहास” प्रकाशित हुई । विश्वविद्यालय में इतिहास विभाग के प्राध्यापक थे, अब सेवा निवृत्त हो गये हैं । अनेक लोग इन्हे ‘पांचजन्य’ नामक पत्रिका के सम्पादक के रूप में जानते हैं । डॉ. देवेन्द्र स्वरूप जी इस पुस्तक की प्रास्तवना में देश के शिक्षाविदों एवं पाठकों के सम्मुख तीन प्रश्न उठाते हैं । इन तीनों पर्श्नों में पहले कथन है- और कथन के साथ एक प्रश्न उठाते है । उनका पहला कथन है-  सब कोई यही कहता है कि देश की शिक्षा की स्थिति अनुकूल नहीं है, इसमें बदलाव आना चाहिए । कौन कहता है? राजनीतिज्ञ कहते हैं । प्रशासनिक अधिकारी कहते हैं, कुलपति कहते है, प्राध्यापक कहते हैं । समाज का उद्योगपति व व्यवसायी वर्ग का व्यक्ति भी कहता है, समाज का प्रत्येक वर्ग कहता है कि भारत की शिक्षा में बदलाव आना चाहिए, यह कहते तो सब हैं किन्तु प्रयास कौन करता है?

आज की परिस्थितियों से सीधा जुड़ा हुआ और अत्यन्त प्रासंगिक प्रश्न देवेन्द्र स्वरूप जी खड़ा करते हैं कि यदि केवल शिक्षानीति के बदलाव कर दिया जाय, परन्तु राजनीति, अर्थनीति और समाजनीति ऐसी ही चलती रहे जैसी आज चल रही है, तो क्या शिक्षानीति का परिवर्तन प्रभावी होगा? क्या वह समाज को आगे तक ले जा पायेगा अथवा क्या समाज की दिशा बदल पायेगा? आगे वह इसके ठीक विपरीत प्रश्न खडा करते हैं कि मानों आपने राजनीति, अर्थनीति व समाजनीति में परिवर्तन कर दिया परन्तु शिक्षानीति को छूआ भी नहीं, तो क्या यह परिवर्तन टिकाऊ होगा? यह उनका दूसरा प्रश्न है । अर्थात् वे यह कहना चाहते है कि केवल शिक्षानिति में परिवर्तन लाने से राष्ट्र या समाज का सर्वतोन्मुखी विकास तब तक सम्भव नहीं है, जब तक शिक्षानीति, राजनीति, अर्थनीति एवं समाजनीति में भी एक साथ परिवर्तन न किया जाय ।

अगला व तीसरा महत्त्वपूर्ण प्रश्न वे यह उठाते हैं कि शिक्षानीति में परिवर्तन करे कौन? हम सभी लोकतंत्र में रहने के कारण इस बात के अभ्यासी हो गये  है कि पार्लियामेंट करेगी, सरकार करेगी । हम यह मान कर चलते हैं कि हर बात सरकार के हाथों में अर्थात् सत्ता के हाथों में केन्द्रित है अतः सभी काम सरकार को ही करने चाहिए ।

सरकारी तंत्र का हालः-

सरकार के काम के साथ एक बड़ी समस्या यह है कि सरकार प्रत्येक काम में अपना मैकेनिजम अर्थात् अपना एक तंत्र खड़ा करने का प्रयास करती है । उस तंत्र को उस मैकेनिजम को परिपूर्ण बनाने में अधिक ऊर्जा, अधिक धन व्यय होता है, परन्तु उसका प्रभाव व परिणाम उतने नहीं होते , जितने होने चाहिए । जैसे हमें सुबह जल्दी कहीं जाना होता है तो हम पहले अलार्म घड़ी में और आजकल मोबाईल में अलार्म लगते हैं | सुबह जब आलार्म बजता है तो सबसे पहले हम आलार्म  को बन्द करते हैं, करवट लेते हैं और सो जाते हैं । मोबाईल या घड़ी में अलार्म बजना मैकेनिजम है । और उसे बंद कर सो जाना एंटीमैकेनिजम है । प्रत्येक मैकेनिजम से एक एन्टीमैकेनिजम स्वतः ही जन्म लेता है । इस प्रकार हम इस मैकेनिजम से बन्ध जाते हैं । एक स्थान पर दो मजदूर सरकारी काम कर रहे थे । क्या कर रहे थे? एक मजदूर गड्ढा खोद रहा था और दूसरा उस गड्ढे में मिट्टी भर रहा था । फिर थोड़ी दूरी पर लगभग 10 फिट दूर जाकर पहला मजदूर गड्ढा खोदता है और दूसरा उसमें मिट्टी भरता है । एक दूकानदार अपनी दूकान पर बैठा-बैठा यह सब देखता है । उससे रहा नहीं गया, उसने उस मजदूर से पूछा, यह क्या कर रहे हो? तो वह बोला वृक्षारोपण कर रहे हैं । वृक्षारोपण कर रहे हो तो वृक्ष कहाँ हैं? उसने बताया कि हम तीन लोगो की गेंग है मेरा काम गड्ढा खोदना है और इसका काम मिट्टी भरने का है और तीसरे का काम पौधा लगाना है । तीसरा आज छुट्टी पर है, इसलिए आया नहीं । हम दोनो आये है, इसलिए हम दोनों अपनी ड्यूटी पूरी कर रहे हैं । यह सरकार का मैकेनिजम है, इस मैकेनिजम को पूरा करने के लिए हम बन्ध जाते हैं । बिना विवेक के जब मैकेनिजम को पूरा किया जाता है तो परिणाम क्या होता है? यह सब जानते हैं । देवेन्द्र स्वरूप जी कहते हैं कि संसद या सरकार परिवर्तन करे, इससे बेहतर होगा कि शिक्षा को जानने वाले विद्वान संसद में बैठे लोगों के मानस में परिवर्तन करें । वास्तव में आज की शिक्षा व्यवस्था के सामने यह सबसे बड़ी चुनौती है । यह चुनौती केवल शिक्षाविदों का विषय न होकर सम्पूर्ण समाज का विषय बनना चाहिए ।

मेरा प्रिय प्रसंग

प्रसंग महाभारत का है, आप सभी जानते हैं,  मैं उसी प्रसंग को आज की शिक्षा व्यवस्था से जोड़कर आज की भाषा में आपको बताता हूँ । भीष्म पितामह ने एक इंस्टीट्यूट खोला । उसकी विशेषता थी सेंट परसेंट मेनेजमैंट कोटा, आउट साइड एडमिशन बिल्कुल नहीं । धृतराष्ट्र के सौ लडकों को तथा पाण्डु के पाँच पुत्रों को ही एडमिशन दिया जाना तय था । भीष्म पितामह ने उस इंस्टिट्यूट के लिए एक डायरेक्टर साहब को नियुक्त किया । डायरेक्टर साहब ने कहा कि मेरा भी एक पुत्र है, उसे मैं कहाँ भेजूँगा । स्पेशल परमिशन देकर उसको भी एडमिशन दे दिया गया । बस! एक सौ छः अब आगे एडमिशन नहीं हो सकता ।

अब  इंस्टीट्यूट शुरू हुआ, डायरेक्टर बड़े दक्ष, बड़े नामी इसलिए समाज में एक अच्छा सन्देश गया । एक दिन ट्राइबल इलाके का एक नवयुवक खाजते-खोजते उस इंस्टीट्यूट में आया और डायरेक्टर साहब से कहा, मुझे भी एडमिशन चाहिए । डायरेक्टर साहब ने रूल्स बताये, हमारे यहाँ 100 प्रतिशत मेनेजमेन्ट कोटा है, आउट साइड्स नॉट अलाउड । बस 106 एडमिशन होने थे सो हो गये, अब कोई चांस नहीं । उस नवयुवक ने फिर कहा, चेयरमेन से रिक्वेस्ट कर दीजिए, बड़ी दूर से उम्मीद लेकर आया हूँ, सीखने का पक्का निश्चय करके आया हूँ अगर एडमिशन हो जाये तो अच्छा रहेगा । डायरेक्टर साहब ने कहा, हमारे चेयरमेन साहब बड़े स्ट्रीक्ट हैं, बाहर का कोई एडमिशन, किसी भी हालत मे परमिशन नहीं देंगे । बिचारा वह नवयुवक लौट गया । परन्तु निराश होकर नहीं गया, दूसरा निश्चयी जो था आप सबने यह कथा सुनी हुई है इसलिए व्याख्या नहीं कर रहा हूँ । मेरे मन में उनके प्रति तनिक भी अश्रद्वा का भाव नहीं है, मैं तो बस! आज के सन्दर्भ में उनके पक्ष-विपक्ष पर टिप्पणी कर रहा हूँ ।

अब कथा आगे बढ़ती है, कुछ दिनों बाद उन 106 विद्यार्थियों के साथ डायरेक्टर साहब पिकनिक पर जंगल में गये, उनके साथ एक पालतु कुत्ता भी था । कुत्ता उनसे आगे-आगे भाग रहा था । एक स्थान पर किसी अन्य को देखकर जोर-जोर से भौंकने लगा । थोड़ी देर में उसका भौंकना बन्द हो गया । लौटकर जब वह उन सबके पास आया तो सब उसे देखकर आश्चर्यचकित थे । आश्चर्य इस बात का था कि कुत्ते का मुहँ पूरा बाणों से भरा हुआ था किन्तु इस तरह से बाण भरे थे कि खून की एक बूंद भी नहीं निकली थी । ऐसा अद्भूत सरसंधान कि बाणों से मुहँ भर गया और भौंकना बन्द हो गया, परन्तु रक्त बिल्कुल नहीं निकला । ऐसे व्यक्ति को ऐसे श्रेष्ठ धनुर्धर को वे सभी ढूँढने हेतु कुत्ते के पीछे-पीछे गये । कुत्ता एक स्थान पर रुका, एक युवक ने आकर डायरेक्टर साहब को प्रणाम किया । डायरेक्टर साहब ने पहचाना नहीं अतः पूछा कौन हो वत्स? इस प्रकार की सरसंधान की विद्या किससे सीखी । गुरुजी आपका ही स्टुडेन्ट हूँ, और आपसे ही यह विद्या सीखी है । अरे! मुझ से कब सीखी? मैने तो इन 106 विद्यार्थीयों के अलावा न तो किसी को एडमिशन दिया और न किसी को सिखाया, फिर तुम्हे मैने कब सिखाया? तब वह युवक बताने लगा, सामने चबुतरे पर मैने आपकी प्रतिमा स्थापित कर रखी है । मैं गुरु प्रतिमा के सम्मुख ध्यान लगाकर बैठता था, जब आप इन राजकुमारों को शिक्षा दिया करते थे, तब मैं उसे ध्यानावस्था में देख लेता था । उसी का तन्मय होकर कठोर अभ्यास करता था परिणाम स्वरूप मैं यह विद्या सीख गया हूँ । आज की भाषा में गुरुजी जो कुछ अपलोड करते थे, उसी को वह डाउनलोड कर लेता था । इस तरह उसने गुरुजी की साइट हैक कर ली थी ।

इसके बाद आगे की कथा जो इस कथा का एक्स्ट्रीम है, वह यह कि डायरेक्टर ने उससे पूछा, तुम कैसे विद्यार्थी हो? कभी कलासरूम में आये नहीं, कही लेबोरेट्री में दिखे नहीं, प्लेग्राउंड में आये नहीं और न कभी केन्टिन में दिखाई दिये, कहाँ गये थे? कैसे विद्यार्थी हो? मैं तो डिस्टेन्स लर्निंग वाला विद्यार्थी था, ऑनलाइन कोर्स था मेरा, नोन एटेंन्डिग कोर्स होने के कारण मैं आपको कभी दिखा नहीं । मैं यही से सारा काम करता था । गुरुजी ने कहा तुम्हारे सारे पेमेन्टस जैसे-तुम्हारी ट्यूशन फीस, एक्जाम फीस आदि जो-भी कुछ होता है, सब क्लियर हो गया या नहीं? गुरुजी मुझ से तो कभी माँगा ही नहीं गया और मैं दुबारा कभी इंस्टिट्यूट में आया ही नहीं । फिर तो डिग्री मिलने में बहुत तकलीफ होगी, इसलिए पहले बकाया भुगतान करो । फिर हम सब जानते हैं कि उस ड्यूज के नाम पर उसके शरीर का एक महत्त्वपूर्ण अंग माँग लिया गया जो धनुर्विधा का आधार था । मैं फिर से कह रहा हूँ कि मेरे मन में उन डायरेक्टर साहब के प्रति कोई दुर्भावना नहीं है । केवल एक घटना का आज के परिप्रेक्ष्य में निरूपण मात्र कर रहा हूँ  । उनकी अपनी मार्यदाएँ थी । भारतीय शिक्षा के इतिहास में पहले प्राईवेट ट्यूटर के रूप में उनका नाम दर्ज है । इनसे पहले हमारे यहाँ चाहे राजा का लड़का हो या किसान का, सबको गुरुजी के आश्रम में जाकर ही शिक्षा प्राप्त करनी होती थीं यह पहले प्राईवेट ट्यूटर थे जो राजदरबार में आकर राज्याश्रित होकर शिक्षा प्रदान करते थे ।

स्किल को शिक्षा का अंग नहीं माननाः-

इसका परिणाम क्या हुआ? आज सरकार चर्चा करती है, स्किल डवलपमेंट की । शिक्षा का उद्देश्य व्यक्ति में ज्ञानात्मक, कौशलात्मक और अभिवृत्यात्मक विकास करना है । डवलपमेंट ऑफ नॉलेज, दूसरा परिवर्तन आना चाहिए उस नॉलेज का कैसे ट्रांसलेट इन टू प्रेक्टिस करना अर्थात् उपयोग में लाने की क्षमता, जिसे कौशलात्मक विकास कहा गया  । इनके आधार पर उसके जीवन में, सोचने के ढंग में और जीवन दृष्टि में परिवर्तन आना चाहिए । व्यक्ति पहले भी अन्धविश्वासी और बाद में भी अन्धविश्वासी, पहले भी विवेकहीन और बाद में भी, पहले भी विचारवान नहीं और बाद में भी नहीं । ऐेसी शिक्षा की उपयोगिता स्वतः ही समाप्त हो जाती है । महाभारत के इस पुराने प्रंसग को हम भले ही वर्तमान से जोड़ रहे हैं हमारे लिए विचार की बात यह है कि हमारी शिक्षा व्यवस्था ने पिछले 71 वर्षों में भारतमाता के सारे सपूतों के अंगूठे कटवा लिये । स्किल को शिक्षा का अंग नहीं माना गया । साक्षरता और निरक्षरता के सरकारी आँकड़ों के मायाजाल में ज्ञान की विभिन्न विधाओं को हटा दिया गया  । हमारे देश में वाचित परम्पराओं का ज्ञान शिक्षा का एक बड़ा अंग होता था, उसकी चर्चा ही बन्द कर दी गई । जैसे – वक्तृत्व कला, सुनी हुई सौ बातों को याद रखना, शतावधानी बनना आदि को शिक्षा नही मानना ।

भारत में शिक्षा को जो विशेषताएँ थीं, उनमें शिक्षा राज्य के अधीन नहीं थीं, वह राज्य के अधीन हो गई । जो शिक्षा निःशुल्क थी अब शिक्षा युक्त हो गई । जीवन में शिक्षा द्वारा जो दृष्टि विकसित की जाती थीं, वह दृष्टि विकसित करने वाली शिक्षा व्यवस्था ही हमने त्याग दी । आज शिक्षा माने एक पाठ्यक्रम, उस पाठक्रम को पूरा करना, उस पर आधारित परीक्षा, परीक्षा में प्राप्त अंक मार्कशीट और प्रमाणपत्र । उस प्रमाणपत्र के आधार पर नौकरी, यह शिक्षा की सीधी सरल रेखा बन गई है  । इसके कारण जीवन में विकास करने वाली शिक्षा का विचार ही हमने त्याग दिया ।

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