महामना मदनमोहन मालवीय का दीक्षान्त भाषण – 14 दिसम्बर 1929 (भाग एक)

 – अवनीश भटनागर

काशी हिन्दू विश्वविद्यालय ने अपना कार्य अक्टूबर, 1917 में प्रारम्भ किया था। विश्वविद्यालय के बारहवें उपाधि-वितरण समारोह (14 दिसम्बर 1929 ई॰) के अवसर पर महामना पंडित मदन मोहन मालवीय द्वारा दिया गया दीक्षान्त भाषण सम्पूर्ण शिक्षा जगत के लिए मार्गर्दशक ग्रंथ जैसा है। भारत की प्राचीन गुरुकुल-आधारित शिक्षा पद्धति और तत्कालीन कालखण्ड में प्रचलित यूरोपीय शिक्षा प्रणाली से भारतीय पद्धति की तुलना, शिक्षा का माध्यम, संस्कृत शिक्षा का महत्व, विज्ञान-कला-कौशल-व्यवसाय-तकनीक आदि की शिक्षा, स्त्री-शिक्षा, रोजगारपरक शिक्षा आदि समाज जीवन के व्यावहारिक पक्ष से जुड़ी प्रत्येक बात पर महामना इस व्याख्यान में अपने विचार प्रकट करते हैं। राष्ट्र-निर्माण के लिए शिक्षा की आवश्यकता को रेखांकित करते हुए वे शारीरिक शिक्षा, चरित्र निर्माण और देशभक्ति की शिक्षा को सर्वाधिक आवश्यक मानते हैं।

महामना इस भाषण का प्रारम्भ विश्वविद्यालय की स्थापना के उद्देश्यों तथा आदर्शों का विवरण देते हुए करते हैं। वे तक्षशिला और नालंदा के प्राचीन विद्यापीठों की उच्चतम प्रणाली के पुनरुत्थान के माध्यम से श्रेष्ठतम संस्कृति की प्रणाली के अनुकरण के साथ कला, विज्ञान तथा शिल्प की नवीनतम प्रगति का भी संयोजन करना चाहते हैं। विश्वविद्यालय की स्थापना के समय प्रमुख रूप से ये चार ध्येय थे –

  1. संस्कृत भाषा तथा शास्त्रों के अध्ययन द्वारा भारतवर्ष की संस्कृति के श्रेष्ठ तत्त्वों का सर्वसाधारण में प्रचार।
  2. कला और विज्ञान की सर्वतोमुखी शिक्षा तथा अनुसंधान।
  3. भारत में उद्योगों की प्रगति के लिए शिल्प, कला-कौशल तथा व्यवसाय सम्बन्धी ज्ञान की वृद्धि।
  4. धर्म और नीति की शिक्षा के माध्यम से युवकों में सदाचार और चरित्र निर्माण की प्रेरणा देना।

मालवीय जी भारत की पैतृक परम्पराओं में संस्कृत भाषा को सर्वाधिक बहुमूल्य मानते हैं क्योंकि इस भाषा में भारत का श्रेष्ठ तत्त्व ज्ञान तथा साहित्य लिखा गया है। उनका मानना है कि, “प्रत्येक मनुष्य अपनी व्यक्तिगत, शारीरिक, मानसिक, आध्यात्मिक और चरित्र सम्बन्धी उन्नति किस प्रकार कर सकता है तथा कैसे अपने को एक शक्तिशाली समाज में संघटित कर सकता है, इसका पूर्ण विवेचन इसी भाषा में मिलता है। भाषा की उत्तमता की दृष्टि से भाषा-मर्मज्ञों ने संसार की सभी भाषाओं में संस्कृत को ही प्रथम स्थान दिया है।”

महामना काशी हिन्दू विश्वविद्यालय को ‘नवीन राष्ट्रीय विद्या मंदिर’ कहते हैं। इसीलिए वे ‘शताब्दियों से चली आ रही भारत की अटूट आध्यात्मिक परम्पराओं की रक्षा तथा प्राचीन और वर्तमान के सुन्दर संयोग से परम्परा-सिंचित राष्ट्रीय निधि का सुन्दर उपयोग’ करने की बात करते हैं। संस्कृत भाषा की शिक्षा से वे केवल दर्शन-अध्यात्म नहीं, बल्कि गणित, ज्योतिष, आयुर्वेद और साहित्य के क्षेत्र में भी अपने विद्यार्थियों को उन्नत बनाना चाहते हैं।

शिक्षा का माध्यम

महामना शिक्षा के माध्यम के रूप में केवल मातृभाषा को ही उचित मानते हैं। ध्यान दीजिए, यह भाषण वर्ष 1929 का है, जब अंग्रेजों का शासन भारत पर था और किसी भारतीय के लिए उन्नति का मार्ग अंग्रेजी से होकर ही जाता था, इसके विपरीत महामना चिंता व्यक्त करते हैं कि शिक्षा क्षेत्र में अंग्रेजी का प्रयोग व्यापक रूप से होने के कारण भारतीय भाषाओं को भुलाया जाने लगा है।

महामना को इस बात का गौरव है कि काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में हिन्दी में एम.ए. की उपाधि के लिए विषय के रूप में मान्यता है तथा यहाँ विद्वानों का एक समूह कला, विज्ञान तथा आयुर्विज्ञान विषयों की पाठ्यपुस्तकों की रचना हिन्दी में कर रहा है।

कला और विज्ञान: शिक्षा तथा अनुसंधान

मालवीय जी कला तथा विज्ञान की सार्वजनिक शिक्षा में वृद्धि तथा नवीन आयामों पर अनुसंधान के पक्षधर थे। यह बात हम शिक्षा क्षेत्र से जुड़े हुए व्यक्तियों के लिये आश्चर्यजनक और आनन्ददायक है कि 1929 ई0 में, जब देश में शिक्षा क्षेत्र बहुत विकसित नहीं था, तब भी काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में एम.ए. तथा एम.एस-सी. कक्षाओं तक प्राचीन भारतीय इतिहास और संस्कृति, समाजशास्त्र, दर्शन तथा मनोविज्ञान, अर्थशास्त्र, राजनीतिशास्त्र आदि मानविकी के विषयों; हिन्दी, अंग्रेजी, संस्कृत, अरबी, फारसी, उर्दू, मराठी, बंगला आदि भाषाओं तथा गणित, ज्योतिष विज्ञान, भौतिकी तथा रसायनशास्त्र, वनस्पतिशास्त्र, जीव विज्ञान तथा भूगर्भशास्त्र जैसी विज्ञान की शाखाओं के शिक्षण के लिए पाठ्यक्रम की रचना की जा चुकी थी। न केवल शिक्षण, अपितु प्रयोग तथा अन्वेषण-अनुसंधान के काम के लिए व्यवस्थित पुस्तकालय तथा प्रयोगशालाओं की व्यवस्था भी विश्वविद्यालय में थी।

सक्षम शिक्षकों की अगली पीढ़ी तैयार करने के उद्देश्य से विश्वविद्यालय में शिक्षक प्रशिक्षण केन्द्र की व्यवस्था मालवीय जी की दूरदृष्टि की ओर संकेत करती है। इसके साथ ही विधि महाविद्यालय भी है, ताकि जो विद्यार्थी वकालत के क्षेत्र में जाना चाहते हैं, उनके लिए भी शिक्षा की समुचित व्यवस्था हो काशी हिन्दू विश्वविद्यालय का आयुर्वेद कॉलेज भी वर्ष 1929 के पहले कार्यशील हो चुका था। विद्यार्थियों के प्रयोगात्मक ज्ञान के लिए एक सौ रोगियों के ठहरने की व्यवस्था से युक्त चिकित्सालय भी था। उच्चकोटि के भारतीय आयुर्वेद के अध्ययन के साथ-साथ उस कॉलेज में आधुनिक चिकित्साविज्ञान एवं शल्यक्रिया आदि के भी अभ्यास की पर्याप्त व्यवस्था थी।

स्त्री शिक्षा       

मालवीय जी समाज के संतुलित विकास के लिए स्त्री शिक्षा की समुचित व्यवस्था को अनिवार्य मानते थे। इस दीक्षान्त भाषण में भी वे इसकी चर्चा करते हैं। 1929 ई. में, जब भारत में सामान्य भारतीय समाज में स्त्रियों के लिए शिक्षा दुर्लभ थी, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में महिला विद्यालय प्रारम्भ किया जा चुका था जिसके साथ एक सौ छात्राओं के ठहरने की व्यवस्था से युक्त अलग छात्रावास था, जिसकी प्रबन्धक तथा एफ.ए. (सीनियर सेकण्डरी) स्तर तक की छात्राओं के शिक्षण के लिए चार महिला शिक्षिकाएं भी थीं। स्नातक एवं स्नातकोत्तर कक्षाओं की छात्राएँ सभी विषयों की शिक्षा पा सकती थीं। मालवीय जी केवल स्त्री शिक्षा के पक्ष में व्याख्यान नहीं देते बल्कि एक समुचित व्यवस्था खड़ी करके समाज के सम्मुख एक आदर्श उपस्थित करते हैं।

कला-कौशल तथा व्यावसायिक शिक्षा

रोजगारपरक शिक्षा, अपने पैरों पर खड़े होने की क्षमता देने वाली शिक्षा, कला-कौशल तथा उद्योग-धंधे की शिक्षा तथा व्यावसायिक शिक्षा, आज सब दूर शिक्षाविदों, सरकारों तथा नीति-निर्माताओं के बीच चर्चा और चिन्तन के विषय बने हुए हैं। किन्तु आज से लगभग एक शताब्दी वर्ष पूर्व महामना इस दिशा में विचार कर अभियांत्रिकी का एक महाविद्यालय प्रारम्भ कर चुके थे। विद्यार्थियों के शिक्षा पूर्ण करने के बाद स्वाभिमानपूर्ण स्वावलम्बी जीवन जीने के योग्य बनाने के लिए तो मालवीय जी व्यावसायिक शिक्षा की बात करते ही हैं किन्तु उनका यह विचार विद्यार्थियों के व्यक्तिगत जीवन के साथ-साथ राष्ट्र जीवन से भी जुड़ा हुआ। इस दीक्षान्त व्याख्यान में वे कहते हैं, “प्रयोगात्मक ज्ञान के साथ विज्ञान, कला-कौशल तथा व्यवसाय सम्बन्धी ऐसी शिक्षा विद्यार्थियों को दी जाये, जिससे देश में उद्योग-व्यवसाय तथा घरेलू धंधों की उन्नति हो।”

इससे मालवीय जी की दूरदर्शिता तथा समय के आगे चलने की सोच स्पष्ट होती है। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में यंत्र-बिजली की इंजीनियरिंग की शाखाएँ तो थीं ही, धातु-विज्ञान तथा औद्योगिक रसायन विज्ञान विभाग भी स्थापित हो चुका था जोकि तब तक विश्व के अनेक देशों की उच्च शिक्षा संस्थाओं में प्रारम्भ नहीं हुए थे। मालवीय जी इस बात का गौरव अनुभव करते हैं कि भारत में किसी भी अन्य विश्वविद्यालय में इन विषयों की सुविधा उपलब्ध नहीं है किन्तु काशी हिन्दू विश्वविद्यालय ने इस दिशा में पहल की है। वे इसमें छात्रों की कठोर चयन-प्रक्रिया, उच्च शैक्षिक गुणवत्ता और उच्च परिणामों को लेकर भी प्रसन्नता व्यक्त करते हैं।

वे उल्लेख करते हैं कि व्यावहारिक विज्ञान की शिक्षा केवल पुस्तकीय न रह जाये। इसके लिए इंजीनियरिंग कॉलेज के विद्यार्थियों को प्रतिवर्ष एक निश्चित अवधि के लिए रेलवे, कारखानों और खदानों में काम होते हुए देखने तथा प्रत्यक्ष कार्य करके सीखने के लिए भेजा जाता है। इसका परिणाम है कि इस इंजीनियरिंग कॉलेज से उपाधि प्राप्त कर समाज जीवन में गए विद्यार्थियों को उनकी प्रयोग-कुशलता के कारण बिजली-उत्पादन, रेलवे तथा खनन सम्बन्धी उद्योगों में सरलता से नियुक्ति मिल जाती है।

अपने लिए विचार करने की बात है कि पिछली शताब्दी का यह तीसरा दशक था। तब तक भारत में न तो देशभर में रेलवे लाइनें पहुँची थीं और न ही बिजली उत्पादन, वितरण तथा बिजली से चलने वाले उपकरणों का निर्माण करने वाले उद्योगों की बड़ी संख्या थी। परन्तु भविष्य के भारत को दृष्टि में रखते हुए मालवीय जी ने इंजीनियरिंग के इन विषयों और उनके प्रयोग कौशल को काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के पाठ्यक्रम में स्थान दिया।

इसी प्रकार, औद्योगिक एवं व्यावसायिक रसायन विज्ञान की शिक्षा के विषय में मालवीय जी कहते हैं कि यह विभाग ऐसे युवाओं को तैयार कर रहा है जो रोजगार के लिए नौकरी खोजने के बजाय स्वयं का लघु-घरेलू उद्योग प्रारम्भ कर सकेगा। इससे जहाँ स्व-रोजगार को बढ़ावा मिलेगा, वही महामना के समाज-चिंतन की दूसरी दिशा को भी बल मिलेगा, अर्थात् देशी घरेलू उद्योगों तथा व्यवसायों का विकास होगा। युवा वर्ग में स्वयं के परिश्रम से जीविका उपार्जन करने का स्वभाव बनेगा, श्रम के प्रति निष्ठा बढ़ेगी, स्वाभिमान का उदय होगा।

दीक्षान्त भाषण में महामना कहते हैं, “निर्धनता और बेकारी का प्रश्न जटिल होता जा रहा है। इसका हल करना नितान्त आवश्यक है। मेरी समझ में यदि नवयुवकों को व्यावसायिक तथा व्यावहारिक विज्ञान की शिक्षा दी जाये तो यह समस्या बहुत अंशों में हल हो सकेगी। वे बड़ी तनख्वाह वाली सरकारी नौकरियों की मृगतृष्णा अथवा पहले से ही ठसाठस भरे हुए पेशों की ओर न झुकें।” रोजगारपरक शिक्षा का जो अर्थ आज ‘सरकारी नौकरी’ को माना जाने लगा है, उसका स्वावलम्बन पूर्ण आयाम मालवीय जी सुझाते हैं।

इस बात को मालवीय जी भारत की अर्थव्यवस्था के स्वावलम्बन से भी जोड़ते हैं। वे आगे कहते हैं, “इस प्रकार हम धीरे-धीरे विदेशी वस्तुओं के आयात को कुछ अंशों में कम कर सकेंगे तथा देश से बाहर जाने वाले अपने कच्चे माल को भी रोक सकेंगे। इस क्षेत्र में उपयुक्त शिक्षा के द्वारा सरकार से राष्ट्रीय व्यवसाय की वृद्धि के लिए थोड़ी सी सहायता प्राप्त करके दस हजार भारतीयों को प्रतिवर्ष रोजगार दिया जा सकता है।” यह मालवीय जी का भारत की अर्थव्यवस्था को आत्मनिर्भर तथा स्वतःपूर्ण बनाने का स्वप्न है। इसके लिए वे सरकार और विश्वविद्यालयों के बीच सहयोग बढ़ाने की आवश्यकता को रेखांकित करते हैं।

चरित्र निर्माण की शिक्षा

महामना कहते हैं, “विश्वविद्यालय का चौथा ध्येय धर्म और नीति को शिक्षा का आवश्यक अंग मानकर विद्यार्थियों का चरित्र निर्माण है। … हम धर्म को चरित्र निर्माण का सीधा मार्ग और सांसारिक सुख का सच्चा द्वार मानते हैं। हम देशभक्ति को सर्वोत्तम शक्ति मानते हैं, जो मनुष्य को उच्च कोटि की निःस्वार्थ सेवा करने की ओर प्रवृत्त करती है।” आज जहाँ समाज जीवन में धर्म की व्याख्या को लेकर विवाद हों, एक धार्मिक आस्था को अन्य आस्था की तुलना में श्रेष्ठ या कमतर बताया जाता हो, महामना के ये उदात्त विचार शिक्षा के लिए मार्गदर्शी सिद्धान्त हैं। मालवीय जी चरित्र निर्माण की शिक्षा के लिए धार्मिक-पौराणिक आख्यानों, नीति विषयक कथाओं, पूर्वज महापुरुषों के जीवन प्रसंगों को छात्रों को सुनाया जाना आवश्यक मानते हैं ताकि उनमें अपने राष्ट्रीय महापुरुषों तथा जीवन-मूल्यों के प्रति श्रद्धा का भाव उत्पन्न हो सके।

सुसंगठित जीवन का आधार – शारीरिक व्यायाम

मालवीय जी नैतिकता और चरित्र निर्माण के लिए केवल धार्मिक शिक्षा से संतोष नहीं करते। वे शारीरिक व्यायाम, खेलकूद, साहित्य-संस्कृति से सम्बन्धित विषयों तथा कार्यक्रमों को युवाओं के सम्पूर्ण चरित्र गठन के लिए आवश्यक मानते हैं। वे बताते हैं कि उस समय काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में अध्ययनरत 2600 विद्यार्थियों में से 1600 विद्यार्थी छात्रावासों में रहते हैं। शिक्षकों के आवास भी छात्रावास में ही हैं। व्यवस्था इस प्रकार से की गई है कि शिक्षक और विद्यार्थी परस्पर सम्पर्क में रहकर उन्नति के प्रयास करें। सहजीवन के माध्यम से जीवन की शिक्षा का मालवीय जी का यह अभिनव प्रयोग है।

वे उपस्थित जनसमुदाय को इसकी उपयोगिता बताते हैं, “छात्रों ने स्वयं अपनी सामाजिक तथा साहित्यिक सभाएँ, नाटक-मण्डलियों तथा खेल-समितियों और विश्वविद्यालय की राज्य-परिषद् की स्थापना की है। इस पार्लियामेंट में उन्हें सभी प्रकार के राजनीतिक, सामाजिक तथा शिक्षा सम्बन्धी विषयों पर बहस करने का पूर्ण अधिकार है। वे अनेक प्रकार के खेलों का आयोजन करते हैं, अपने कप्तानों को चुनते हैं और अपना हिसाब-किताब स्वयं रखते हैं। कुछ विद्यार्थी विश्वविद्यालय की सैनिक शिक्षा दल के सदस्य हैं जहाँ उन्हें उत्तम रीति की सैनिक शिक्षा दी जाती है। वातावरण शुद्ध और समृद्धिकारी है। गुरुओं से शिक्षा प्राप्त करने के अतिरिक्त प्रत्येक शिक्षार्थी स्वयं अपना गुरु है तथा अपने सहपाठियों को भी शिक्षा देता है। आत्मगौरव का भाव इस प्रकार विद्यार्थियों में बढ़ रहा है जो भविष्य के लिए अच्छा शकुन है।”

मालवीय जी का यह विचार स्पष्ट करता है कि सर्वांगीण व्यक्तित्व विकास के लिए केवल पुस्तकीय शिक्षा का पाठ्यक्रम ही पर्याप्त नहीं बल्कि जीवन के विविध पक्षों का संतुलित संयोजन ही युवाओं को जीवन की दिशा देता है। इसीलिए वे औद्योगिक-व्यावसायिक शिक्षा, चरित्रनिर्माण की शिक्षा, शारीरिक शिक्षा, सैनिक शिक्षा तथा साहित्यिक-सांस्कृतिक गतिविधियों, सभी को शिक्षा का अपरिहार्य अंग मानते हैं और इन सभी के लिए काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में उन्होंने समुचित व्यवस्था की हुई है।

(लेखक विद्या भारती के अखिल भारतीय मंत्री और संस्कृति शिक्षा संस्थान कुरुक्षेत्र के सचिव है।)

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