नवरात्र और भारतीय ज्ञान परंपरा-२

॥ श्रीदुर्गादेव्यै नमः॥

शारदेय नवरात्र के द्वितीय दिवस पर पराम्बा आदिशक्ति के श्रीचरणों में नमन और सभी ज्ञानसाधक बन्धु-बहनों को सादर नमस्कार।

सर्वरूपमयी देवी, सर्वं देवीमयं जगत।

अतोऽहं विश्वरूपां तां नमामि परमेश्वरीम्॥

“देवी सर्वरूपों से युक्त हैं तथा संपूर्ण जगत देवीमय है अतः मैं उन विश्वरूपा परमेश्वरी को नमस्कार करता हूँ।”

( मूर्ति रहस्यम् )

भारतीय तत्व चिंतन के अनुसार मनुष्य की मूल प्रकृति आध्यात्मिक है परंतु मनुष्य प्रायः इसकी ओर सचेत नहीं रहता। आत्मा सत्-चित् आनंद स्वरूप है। मानव अपने मूल स्वरूप की खोज करता है, परम सत्य को जानने की जिज्ञासा रखता है। इसी खोजी प्रवृत्ति के कारण मनुष्य ने स्वयं को साहित्य-संगीत-कला-धर्म आधारित सदाचरण आदि के विभिन्न रूपों में अभिव्यक्त किया है।

आत्मा को ज्ञान स्वरूप कहा गया। समस्त ज्ञान मनुष्य के अंतर में निहित है और उसके अनावरण से ज्ञान का प्रकटीकरण होता है। मनुष्य को ऐसा कुछ नहीं सिखाया जा सकता जो जीव की आत्मा में सुप्त रूप से पहले से स्थित न हो। इसी अंतर्निहित पूर्णता की अभिव्यक्ति शिक्षा है। ‘जानने’ का अर्थ है, आविष्कार करना, अनावरण करना, प्रकट करना। जैसे-जैसे यह आवरण हटता जाता है, हम कहते हैं कि हम सीख गए हैं।स्वामी विवेकानंद इसे ही “manifestation of perfection already in man” कहते हैं।

श्रीमद्भगवद्गीता में श्रीकृष्ण इसका कारण बताते हैं –

धूम्रेनाव्रियते वह्निर्यथादर्शो मलेन च।

यथोल्बेनावृत्तो गर्भस्तथा तेनेदमावृतम्॥ ३/३८॥

आवृत्तं ज्ञानमेतेन ज्ञानिनो नित्यवैरिणा।

कामरूपेण कौन्तेय दुष्पूरेणानलेन च॥३/३९॥

“जैसे धुंए से अग्नि, मल से दर्पण तथा जेर से गर्भ ढका रहता है, उसी प्रकार काम से ज्ञान ढक जाता है जो ज्ञानियों के ज्ञान मार्ग में शत्रु है, अग्नि की भांति उनका मार्ग अवरुद्ध करता है।” जैसे धुंए का कारण हटा दें तो अग्नि प्रकट हो जाती है, दर्पण पर जमा हो गई धूल हटा दें तो उसमें प्रतिच्छवि दिखाई देने लगती है, वैसे ही कामनाओं का, माया का आवरण मनुष्य के अंतःकरण से हट जाए तो ज्ञान अनावृत्त हो जाता है।

इस अनावरण की प्रक्रिया, जिसे ज्ञानार्जन कहते है, इसमें गुरु मार्गदर्शन और सहयोग करते हैं परन्तु शिष्य की पात्रता और प्रयास के बिना ज्ञान अर्जन होता नहीं। श्रीकृष्ण कहते हैं – “श्रद्धावांल्लभते ज्ञानं तत्पर: संयतेन्द्रिय:।” (गीता ४/३९) अर्थात् श्रद्धा, ज्ञानार्जन के लिए तत्परता और इंद्रियों का संयम होने पर ही ज्ञान का लाभ मिलता है।

आजकल के शिक्षा विचार में बताया जाता है कि बालक कोरी स्लेट के समान होता है, शिक्षक जैसाचाहे लिखकर उसे भर सकता है।

भारतीय शिक्षा दर्शन का कहना है –

आचार्यात् पादमादत्ते, पादं शिष्य स्वमेधया।

पादं सब्रह्मचारिभ्य:, पादं कालक्रमेण च॥

शिष्य एक चतुर्थांश आचार्य से, एक चौथाई अपनीबुद्धि का प्रयोग कर के, अगला चतुर्थांश अपने सहपाठियों से और शेष ज्ञान कालक्रम में अपने जीवनके अनुभवों से ग्रहण करता है।

जीवनपर्यंत हम जिज्ञासु साधक बने रहें, अपने अंत:करण पर पड़े माया के आवरण को हटाने और ज्ञान को विस्तार देने में प्रयासरत रहें, माँ भगवती से यही प्रार्थना।

ज्ञान मार्ग में आपका सहयात्री,

– अवनीश भटनागर

(लेखक विद्या भारती के अखिल भारतीय उपाध्यक्ष है।)

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