-लेख (मूल मराठी) दिलीप बसंत बेतकेकर
-अनुवाद (हिन्दी) डॉ. रमेश चौगांवकर
“समझे या नहीं?”, हैव् यू अण्डरस्टेण्ड? कक्षा में पढ़ाते समय ऐसे प्रश्न शिक्षक अपने विद्यार्थियों से अनेक बार पूछते रहते हैं। भिन्न-भिन्न प्रान्तों में भाषा अलग होने पर भी प्रश्न पूछते रहते हैं। ‘जी हां’, ‘यस सर’, ‘हो सर’……… ऐसे ही निश्चित उत्तर विद्यार्थियों से मिलते हैं, और विद्यार्थियों से संयुक्त सुर में ‘हां’ उत्तर मिलने पर तो शिक्षक प्रसन्न होकर दूसरा प्रश्न उछालता हैं।
‘कुछ आशंका?’ ‘कुछ कठिनाई?’, ‘एनी डिफिक्लटी?’…… जैसे प्रश्नों का उत्तर भी ‘नो सर’, ‘नहीं सर’ संयुक्त रूप से मिलते ही प्रसन्न शिक्षक आगे पढ़ाना जारी रखते है………….
गहराई से परखने पर ध्यान में आता है कि कुछ विद्यार्थियों को कुछ भी समझ में नहीं आया होता है, और कुछ समझ में आने पर भी उत्तर नहीं दे पाते! इसका क्या कारण हो सकता है? गहन अध्ययन पश्चात् जो कारण समझ में आते हैं – ये हैं – विद्यार्थियों के मन में उभरते अनेक प्रकार के डर!
- उत्तर गलत होने का डर: अनेक विद्यार्थियों के मन में एक अदृश्य डर बैठा बैठा रहता है कि गलत उत्तर बताने पर कक्षा में हंसी उड़ेगी, शिक्षक गुस्सा होंगे, डाटेंगे, ये डर भी उन्हें उत्तर देने से रोकता हैं।
- परीक्षा केन्द्रित शिक्षा: हमारी शिक्षा पद्धति उत्तर-केन्द्रित अधिक हैं, प्रश्न-केन्द्रित विचारों पर नहीं, परिणामस्वरूप परीक्षा में जो पूछा जाना अपेक्षित नहीं उस सम्बन्ध में प्रश्न क्यों पूछें ऐसी मानसिकता बन जाती हैं।
- शिक्षक केन्द्रित कक्षा: शिक्षक ही केवल निरन्तर बोलता जाए और विद्यार्थी केवल सुनते रहे, ऐसी कक्षा में विद्यार्थियों को बोलने-पूछने का अवसर और उनका अधिकार नहीं मिलता हैं।
- प्रश्न पूछना भी एक कौशल्य है, जो प्रयास से ही प्राप्त होता है, जहां बाल्यकाल से ही प्रश्नों को दबा दिया जाता है वहां प्रश्न उभरते ही नहीं।
‘मुझे उत्तर ज्ञात नहीं, ऐसा कहने में विद्यार्थी शरमाता है, और ज्ञात न होना अर्थात् अपयश यह भावना मन में बैठी होती हैं।
कभी-कभी शिक्षकों के प्रश्न पूछने का सुर विद्यार्थी को अरूचिकर लगता है। कभी शिक्षक उलझन भरे अथवा उपहास करने हेतु प्रश्न पूछते हैं। सदैव कुछ विशेष होशियार विद्यार्थियों को ही प्रश्न पूछे जाए तो अन्य विद्यार्थी मौन बैठने को विवश होते हैं।
पाठ्य पुस्तक और परीक्षा-केन्द्रित अध्यापन के कारण उत्तर महत्वपूर्ण और प्रश्न गौण ऐसी मानसिकता बनती हैं। परिणाम स्वरूप विद्यार्थी की जिज्ञासा अनदेखी रह जाती है। “और कोई प्रश्न तो पूछना नहीं है”? ऐसा शिक्षक के बोलने पर उत्तर मौन होता हैं।
वास्तविकता तो है कि इन्हीं बच्चों ने अपने बाल्यकाल में अपने माता-पिता को हजारों प्रश्न पूछे होते हैं, तो फिर कक्षा में मौन क्यों हो जाते हैं यह प्रश्न पालक गण और शिक्षकों को स्वयं से पूछना होगा। बच्चों द्वारा पूछे प्रश्नों के उत्तर अनेक बार पालकों के पास नहीं होते हैं, उनके प्रश्नों का महत्व और उसकी गंभीरता पालक समझ नहीं पाते हैं, उनके प्रश्न पालकों को उबाऊ, झंझट वाले लगते हैं। इसलिए पालक उन्हें ‘चुप बैठ’, ‘मूर्खो’ जैसे सवाल मत कर, कहते हुए बच्चों को निराश कर देते हैं। परिणाम स्वरूप नये पालकों से प्रश्न पूछना कम कर देते हैं, जैसे-जैसे बच्चे ऊँची कक्षाओं में जाते हैं, जैसे वे अधिक मौन हो जाते हैं – शिक्षक द्वारा प्रश्न पूछने पर कक्षा में बच्चे मौन रहते हैं, शिक्षक की नजर से हटने का प्रयास होता है, आँखे नीचे की ओर झुका लेते हैं बच्चे! कक्षा में प्रश्नों का अभाव अच्छे अनुशासन की श्रेणी में नहीं रखा जाता है, वह निःशब्दता है, शान्त, मौन कक्षा जीवित कक्षा नहीं कहलाती है।
कक्षा में जब प्रश्न पूछे जाते हैं, तब कक्षा केवल सीखने की जगह न होकर विचारों की कार्यशाला हो जाती है – शैक्षणिक मानस शास्त्र के अनुसार प्रश्न पूछना उच्च स्तरीय वैचारिक कौशल्य है, विश्लेषण, मूल्यांकन और सृजनशीलता के स्तर पर प्रश्नों की भूमिका निर्णायक होती है, प्रश्नों द्वारा ही संकल्पनाएं स्पष्ट होती है, चिकित्सकीय विचारशक्ति विकसित होकर ज्ञान प्राप्ति की प्रेरणा जागृत होती है।
कुशल प्रश्नोत्तर – अर्थात् – अच्छे अध्यापन शास्त्र का धड़कता दिल हैं। भारतीय ज्ञान परम्परा प्रश्नोतरों से ही प्रारम्भ होती है, उपनिषद् के संवाद प्रश्नोत्तरों के रूप में ही हैं।
“कस्मिन्न भगवो विज्ञाते सर्व मिदं विज्ञानतं भवति?” यह मुंडकोपनिषद् का प्रश्न ही सम्पूर्ण मुंडकोपनिषद् का आधार है।
“अथातो ब्रह्म जिज्ञासा, येन ज्ञानं सर्वमिदं ज्ञातं भवति, कोऽहं, तत्वमसि, नायमात्या प्रवचनेन लभ्यो, किम कर्म किमकर्मेति?” यह सब वचन चिंतन को प्रवृत करती हैं। इतनी विशाल ज्ञान परम्परा होते हुए भी आज हमारे विद्यार्थियों में प्रश्न क्यों उभरते नहीं, यह गहन विचारणीय समस्या हैं।
बच्चे कक्षा में क्यों मौन रहते हैं, क्यों उत्तर नहीं देते, प्रश्न पूछते नहीं, यह है शिक्षकों की शिकायत, परन्तु शिकायत करना ही समस्या का हल नहीं। इस हेतु कोई ठोस प्रामाणिक विचार विमर्श आवश्यक हैं।
प्रश्न न पूछने वाला विद्यार्थी समूह एक अनुशासित समूह हैं ऐसा मानना उचित नहीं, वास्तव में देखा जाए तो ऐसे विद्यार्थी विचार शून्य हो सकते हैं। प्रश्न पूछना केवल जिज्ञासा की अभिव्यक्ति नहीं, अपितु ज्ञान प्राप्ति का प्रारम्भ हैं। प्रश्न पूछना अध्ययन प्रक्रिया का प्रथम सोपान है – प्रश्न से ही ज्ञान निर्मिति और विचार प्रक्रिया प्रारम्भ होती है, जहां प्रश्नों का अभाव वहां विचारों का भी अभाव और विचारों के अभाव में वास्तविक शिक्षा अवरूद्ध होती है।
चीनी भाषा में एक कहावत के अनुसार – यदि आप प्रश्न पूछते हैं, तो लोग आपको मूर्ख समझेंगे, आपकी हंसी उड़ायेंगे, परन्तु केवल पांच-दस मिनिट! परन्तु यदि आपने प्रश्न पूछा नहीं तो आप आजीवन मूर्ख रहने की सम्भावना हैं।
एक अंगेज लेखक रूड़याई किपलिंग के अनुसार – “मैंने छह मित्रों को अपने पास जोड़ रखा है, वे मेरे हर कार्य में सहायक होते हैं ओर वे छह मित्र है – क्या, कौन, कहां, कैसे, कब, और, क्यों?”
साक्रेटिस की प्रश्नोत्तर पद्धति एक प्रभावी प्रक्रिया मानी जाती हैं। जॉन हुई के मतानुसार शिक्षा एक समस्या निवारण की प्रक्रिया है, और समस्या प्रश्नों के अभाव में अस्तित्व में नहीं आती।
अपनी अधिकतर कक्षाओं में मौन संस्कृति ही विद्यमान है – प्रश्न पूछने की आदत विद्यार्थी में अपने आप ही निर्मित नहीं होती, वरन उसे प्रयास पूर्वक ही विद्यार्थी में निर्माण करनी पड़ती हैं।
इसलिए शिक्षकों से अपेक्षा की जाती है कि वे अध्यापन पद्धति में परिवर्तन लाकर, प्रश्नों को महत्वपूर्ण स्थान दें तभी कक्षा जीवित-संवादमय और विचार-समृद्ध हो सकेगी। प्रश्न पूछने वाला विद्यार्थी ही वास्तव में ज्ञान प्राप्त करने वाला विद्यार्थी होता है, यह शिक्षा का मूल मंत्र स्वीकार करना होगा। प्रश्न पूछने की आदत शिक्षा-प्रक्रिया में से ही विकसित होती है। प्रश्न केन्द्रित अध्यापन पद्धति स्वीकारने से ही विद्यार्थी का सहयोग, आकलन और चिकित्सकीय विचार शक्ति का लाक्षणिक विकास हो पायेगा।
प्रश्न-संस्कृति निर्मिति
- सुरक्षित और मित्रता का वातावरण निर्मित कीजिये, प्रश्नों का स्वागत आवश्यक है, प्रश्न पूछना पुलिस अधिकारी जैसा न हो।
- विद्यार्थी द्वारा पूछे प्रश्न की खिल्ली न उड़ाए ना ही उसे अनदेखा करें।
- स्वयं को उत्तर ज्ञात ना हो तो प्रामाणिकता से स्वीकार कर कहें कि प्रश्न अच्छा है, हम अन्तर के लिए अध्ययन कर बताते हैं।
- प्रश्न पूछने का मॉडल बनें, स्वयं मनन करें, स्वयं को प्रश्न पूछे, ऐसा क्यों? प्रश्न का अन्य पर्याय क्या हो सकता है? इस पर भी मंथन करें।
- छोटे-छोटे समूहों में चर्चा करें, सम्पूर्ण कक्षा में चर्चा करने से दो-तीन समूहों में चर्चा करने से प्रश्न सहजता से उभरेंगे।
- प्रश्न पूछने के लिए पर्याप्त समय दें, जल्दबाजी न करें, अध्यापन में शीघ्रता के कारण प्रश्न पूछने के लिए पर्याप्त समय नहीं दे पाते, विचार करने हेतु शान्ति और समय आवश्यक हैं।
- प्रश्न पूछने के लिए भी प्रशिक्षण देना पड़ता है, कौशल्य का पाठ भी पढाएं, समूह चर्चा, प्रकल्प पद्धति, समस्या आधारित शिक्षा द्वारा प्रश्नों की संख्या में वृद्धि होती है, मूल्यांकन केवल उत्तरों का ही नहीं, प्रश्नों को भी महत्व देकर उनका मूल्यांकन करें।
अधिकतर विद्यार्थी कक्षा में बोलने में शरमाते है अथवा झिझकते है, या डरते हैं, इसलिए उन्हें उनके प्रश्न कागज पर लिखकर पश्चात् उन्हें पढ़ने को कहें, प्रश्न पूछने की आदत और कौशल्य विकसित करने हेतु अनेक खेल अथवा उपक्रम उपयोग में लाए जा सकते हैं।
शिक्षक अपने एजेण्डा में ‘प्रश्न कोशल्य’ विषय रखें और इस पर क्या कर सकते हैं इसका विचार-विमर्श करें जिससे अनेक उपाय समक्ष आएंगे, परन्तु इस हेतु शिक्षकों के समक्ष ही यह प्रश्न उभरना चाहिये, तभी उत्तर कही अन्य स्थान से न आकर शिक्षक स्वयं से ही प्राप्त होगा। मार्ग प्रशस्त होगा। विद्यार्थी के मन में प्रश्न पूछने की क्षमता निर्मित होना इसी में शिक्षक का सुयश छुपा हुआ हैं।
ब्रह्मसूत्र का सूत्र ‘अथातो जिज्ञासा’ पर आधारित ‘अथातो प्रश्न जिज्ञासा’ अर्थात् अब प्रश्न पूछने की जिज्ञासा जागृत करने का समय आ गया हैं।
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(लेखक शिक्षाविद, स्वतंत्र लेखक, चिन्तक व विचारक है।)