सा विद्या या विमुक्तये
– ब्रज मोहन रामदेव
दर्शन का संबंध जगत मानव और प्रकृति के वास्तविक स्वरूप को समझने से है। यह जगत क्या है? उसका सृष्टि में क्या प्रयोजन है? विश्व का दृष्टा कौन है तथा उसका स्वरूप कैसा है? यह संसार सुखमय या दुःखमय क्यों है? जीवन का अंतिम लक्ष्य है, आदि सभी प्रकार के प्रश्नों का उतर दर्शन शास्त्र में मिलता है। आध्यात्मिकता भारतीय दर्शन का प्राण है। धर्म अथवा आचरण-शुद्धि इसका व्यावहारिक स्वरूप है। भारतीय दर्शन पर आधारित शिक्षा दर्शन मनुष्य को व्यापक व समग्र दृष्टि प्रदान करता है।
भारतीय दर्शन को मुख्यतः दो भागों में बांटा गया है – 1. आस्तिक दर्शन 2. नास्तिक दर्शन।
वैदिक वांग्मय में आस्तिक का अर्थ वेदों को मानने वालों से और नास्तिक का अर्थ वेदों को न मानने वालो से है। आस्तिक दर्शन की छः धाराएं है, जिन्हें षडर्शन कहते हैं। यथा 1. न्याय दर्शन 2. वैशोषिक दर्शन 3. सांख्य दर्शन 4. योग दर्शन 5. मीमांसा दर्शन और 6. वेदान्त दर्शन। इसी प्रकार नास्तिक दर्शन के भी तीन प्रकार है – 1. जैन दर्शन 2. बौद्ध दर्शन और 3. चार्वाक दर्शन। चार्वाक दर्शन के अलावा सभी भारतीय दर्शन आत्मा की सत्ता में विश्वास करते हैं। चार्वाक दर्शन नितांत भौतिकवादी है तथा जड़वाद का समर्थक है। यह आत्मा के अस्तित्व को नहीं मानता। अतः यह आध्यात्मिक शिक्षा का आयाम नहीं है। अन्य आठ दर्शनों का शिक्षा के साथ अन्तर्सम्बन्ध निम्न प्रकार से हैं –
योग दर्शन के अनुसार शिक्षा वह प्रक्रिया है, जो मनुष्य को अपने लौकिक कार्य करने के साथ-साथ जीवन के अंतिम सत्य कैवल्य (मोक्ष) को प्राप्त कराने के योग्य बनाता है। यम-नियम अच्छे संस्कारों का निर्माण करते हैं। लोक कल्याण और मोक्ष प्राप्ति योग दर्शन की शिक्षा का प्रमुख हेतु हैं।
मीमांसा दर्शन के अनुसार शिक्षा का उद्देश्य धर्म के स्वरूप (विहित कर्म) को समझना और उसे जीवन में उतारना है इसके लिये शिक्षा को चाहिये कि वह वेदों के प्रति निष्ठा पैदा करे तथा उनको समझने की योग्यता उत्पन्न करें।
वेदांत सूत्रों का प्रमुख विषय ब्रह्म विचार है। ब्रह्मसूत्र के अनुसार जगत की उत्पति स्थिति और संहार का कारण ब्रह्म है। बल के चिन्तन से ज्ञान का बोध होता है तथा ज्ञान से मुक्ति मिलती है। वेदांत सूत्र का प्रारम्भ ‘अथातोब्रह्मजिज्ञासा’ से होता है। इससे ज्ञात होता है कि वेदान्त सूत्रों का प्रमुख विषय ब्रह्म विचार है। इसलिये वेदांत सूत्रों की ब्रह्मसूत्रों को ब्रह्मसूत्र भी कहते हैं। वेदांत दर्शन के अनुसार शिक्षा का उददेश्य ब्रह्म जिज्ञासा है। ब्रह्म जिज्ञासा स्वाध्याय से प्राप्त होती है अतः इसमें स्वाध्याय को विशेष महत्व दिया गया हे। वेदांत में ज्ञान प्राप्त करने की तीन प्रक्रियाएं क्रमशः श्रवण, मनन, व निदिध्यासन है। यह व्यक्ति को पूर्ण बोध की ओर ले जाती है। यह तब होता है, जब साधक की जिज्ञासा प्रबल हो। वेदांत दर्शन में शिक्षा का प्रयोजन शिक्षार्थी को अविद्या से मुक्त कराकर उसे ब्रह्म ज्ञान की प्रतीति (अनुभूति) कराना है, अर्थात् मोक्ष की प्राप्ति कराना है।
महात्मा बुद्ध के अनुसार संसार दुःखों से परिपूर्ण है। अतः बौद्ध दर्शन की शिक्षा का उद्देश्य दुःखों की निवृति करना है इस लक्ष्य को प्राप्ति हेतु अष्टांगिक मार्ग की शिक्षा देना बौद्ध दर्शन की शिक्षा का मुख्य प्रयोजन हैं।
विनय पिटक में नीति संबंधी बातों की व्याख्या है। भिक्षुओं के आचरण संबंधी नियम इसमें है। सुत पिटक में बुद्ध के लोकोपयोगी उपदेश है तथा अभिधम्म पिटक में बुद्ध के दार्शनिक और मनोवैज्ञानिक विचारों का संकलन है। इस ग्रन्थ की रचना प्रश्नोतर शैली में की गई है। इन पिटकों के अंदर अनेक छोटे-बड़े पन्द्रह ग्रन्थ संकलित हैं।
(लेखक आर्ष साहित्य के अध्येता है।)
और पढ़ें : भारतीय शिक्षा के आध्यात्मिक आधार – भाग चार (पुरुषार्थ चतुष्टय की शिक्षा)
Your email address will not be published. Required fields are marked *
Comment *
Name *
Email *
Website