शिक्षकों, पढ़ाना बंद करो

 – दिलीप बेतकेकर

पिंकी आधा घंटा तक फोन पर बात करती रही। आधे घंटे पश्चात उसने मोबाइल रख दिया। पिताजी देख रहे थे! “अरे वाह! आज तो तुमने बहुत कम समय तक बात की फोन पर! अच्छी प्रगति है”। पिंकी बोली, “जी, वह तो राँग नंबर था!” है न मज़े की बात!

धेंडोपंत ने गुंडोपंत को फोन किया। गुंडोपंत ने उठाया ही नहीं। फिर भी धोंडोपंत आधे घंटे तक फोन पर बोलते ही रहे। गुंडोपंत ने चिंतोपंत को फोन किया। चिंतोपंत का फोन चालू नहीं था। फिर भी गुंडोपंत बीच-पच्चीस मिनट तक जोर-जोर से कुछ बोलते रहे।

“हँss! ये कुछ तो भी क्या गप लगा रहे हो!” मन में ही कहा न?

“ऐसा कभी होता है क्या?”

हां, ऐसा होता है, अपनी शाला में, कक्षाओं में!!

शिक्षक पूरी तैयारी करके कक्षा में जाते हैं। कक्षा में जाते ही अपना ‘फोन’ उठाते हैं और धड़धड़ से ‘मशीनगन’ शुरू करते हैं। जोर-जोर से, चिल्लाकर, खिसियाने अंदाज में लाई हुई सामग्री बच्चों के सिर पर उड़ेल देते हैं। किन्तु बच्चों का क्या?

कुछ बच्चों के फोन खराब, तो कुछ ने उठाये ही नहीं। फोन न उठाते हुए ये ‘स्मार्ट’ बच्चे शोरगुल करते हुए पढ़ाने का प्रयास करने वाले शिक्षक की दयनीय झल्लाहट देखते रहते हैं। मजा लेते हैं। एक दूसरे की ओर मुस्कुराते हुए देखकर, खिल्ली उड़ाते हुए, मजा लूटते हैं। पैंतीस या पैंतालीस मिनिट चिल्लाकर पढ़ाने के पश्चात शिक्षक थक जाते हैं (स्टाफ रूम में वापस लौटते हैं) इस संतुष्टि के साथ कि निश्चित किया हुआ आज का पाठ्यांश हमने पूरा कर लिया।

पढ़ाते हुए दो-चार प्रश्न विद्यार्थी से पूछ लिये जाते हैं। देशभर, सभी राज्यों के, सभी शालाओं में, सभी कक्षाओं के लिए, ‘यूनीवर्सल’ प्रश्न होते हैं। भाषा केवल राज्यों के अनुसार भिन्न होती है। प्रश्न वे ही निश्चित, जिसके उत्तर भी निश्चित ही मिलते हैं।

शिक्षक का प्रथम प्रश्न, ‘समझे क्या’? सभी का एक सुर में उत्तर, “हाँ सर”।

हमने जो कुछ पढ़ाया, वह छात्रों को समझ में आया इसका शिक्षक को कितना संतोष और आनंद! उसके बाद दूसरा प्रश्न पूछा जाता है –

“कुछ कठिन, समझ में न आया हो? एनी डिफिकल्टी?” बच्चों का फिर कोरस (समवेत स्वर में) उत्तर – “नो सर!”

“चलो भाई, समझ गए सभी! अब अगले अध्याय की तैयारी करते हैं!” अपने पास रखी कॉपी से छात्रों की कॉपी में स्थानांतरित करवा देना, अर्थात् पढ़ा दिया ऐसी धारणा रखते हैं कुछ शिक्षक! अध्याय का वाचन, कठिन शब्दों के अर्थ बताना, अध्याय के अंत में दिए चार-पांच प्रश्नों के उत्तर लिखने को कहना अथवा स्वयं बता देना, अर्थात् पढ़ाई हो गई। ऐसी ही है कुछ शिक्षकों की धारणा! पाठ के नीचे चार प्रश्न होंगे तो उन्हीं के उत्तर देना, उससे अधिक पांचवां प्रश्न अपनी कल्पनानुसार बनाना अर्थात् पाप हो गया, ऐसा भी समझते हैं कुछ लोग!

‘पावलो फ्रेअर’ दक्षिण अमेरिका के शिक्षाविद् हैं। वे अपनी पुस्तक ‘पेडागॉजी ऑफ ऑप्रेस्ड’ (Pedagogy of Oppressed) में वर्तमान शिक्षा पद्धति का विश्लेषण करते हुए लिखते हैं –

  1. शिक्षक पढ़ाने वाले, विद्यार्थी पढ़ने वाले।
  2. शिक्षक सर्वज्ञ! उसे सब कुछ ज्ञात है, विद्यार्थी को कुछ भी ज्ञान नहीं।
  3. शिक्षक विचारवंत! विद्यार्थी अन्य लोगों के विचार का विषय।
  4. शिक्षक बोलता रहता है! विद्यार्थी शांति से सुनता रहता है।

ये और ऐसे ही कुछ और उदाहरणों के आधार पर घंटों, महीनों, वर्षों तक अखंड, निर्बाध रूप से ‘पढ़ाई’ चल रही है। एक शिक्षण पत्रिका में एक मार्मिक वाक्य पढ़ा – “शिक्षक-प्राध्यापकों की कॉपी की विषय वस्तु लेखनी द्वारा विद्यार्थियों की कॉपी में स्थानांतरित होना और वह दोनों के ही दिमाग को स्पर्श न करे, इस प्रक्रिया को शिक्षा कहते हैं।” यह वाक्य पढ़ने को भारी, पचने में अधिक भारी, वेदनादायी, किन्तु सत्य है।

शिक्षा विषय पर शोध करने वाले एक समूह को ध्यान में आया कि प्रत्येक कक्षा में 60 प्रतिशत से अधिक समय तक विद्यार्थी शांति से, आज्ञाकारी समान, शिक्षक के व्याख्यान को सुनते हैं अथवा नोट्स बनाते रहते हैं।

शिक्षक ‘हाईपरएक्टिव’ और विद्यार्थी ‘टोटली पैसिव’। ऐसा है कक्षा का चित्र। शिक्षक द्वारा इधर-उधर से विषयवस्तु एकत्र करना और बच्चों के सिर पर उडेल देना। ‘फ्रॉम जग टू मग (From Jug to Mug) ऐसी है अपनी शिक्षा! और ऐसा ‘रेडिमेड’ बालकों को प्रदान करने वाला विद्यार्थी और पालकों की दृष्टि से अच्छा शिक्षक!

परीक्षा में यदि प्रश्न कुछ अलग ढंग से पूछा जाए, प्रश्न का सांचा बदल जाए तो तुरंत ही पालक और मीडिया की चिल्लाहट शुरू हो जाती है, “आउट ऑफ कोर्स”, “आउट ऑफ सिलॅबस”! फिर सभी को अंकों की खैरात! इस प्रकार की ‘पढ़ाई’ जितनी जल्द बंद होगी, उतनी बच्चों की पढ़ाई अच्छी होगी। शिक्षाविद् गिलबर्ट बहुत मार्मिक प्रश्न पूछते हैं, आपकी शाला “टीचिंग स्कूल” है या “लर्निंग स्कूल”? ये सरल, सहज दिखने वाला प्रश्न बहुत गंभीरता लिए हुए है। शाला और शिक्षा को एक महत्वपूर्ण अलग ही मार्ग दिखाने वाला है।

अब ‘सिखाने’ की अपेक्षा ‘सीखना’ आवश्यक हो गया है। पर्याप्त परिश्रम करना होगा। शिक्षकों की अपेक्षा शिक्षार्थी को अधिक सक्रिय होना पड़ेगा! उनकी सक्रियता में किस प्रकार से वृद्धि होगी, यह शिक्षक को देखना पड़ेगा! देखा जाए तो इस जगत में कोई किसी को नहीं सिखा सकता। स्वामी विवेकानन्द के अनुसार, “कोई व्यक्ति किसी दूसरे व्यक्ति को नहीं सिखा सकता। जिसे सीखना है, उसे स्वयं सीखना होगा।” इसी संदर्भ में महर्षि अरविंद घोष कहते थे, “दूसरों को कोई सिखा नहीं सकता, ये शिक्षा का प्रथम सिद्धान्त है। शिक्षक ये इन्स्ट्रक्टर नहीं है, वह मार्गदर्शक और सहायक है। ‘सुझाव’ उसका कर्तव्य है, बच्चों पर थोपना नहीं। शिक्षक विद्यार्थी को ज्ञान संपादन के आयुध को धार लगाना सिखाता है। विद्यार्थी को मदद करता है, प्रेरणा देता है। ज्ञान प्राप्ति स्वयं कैसे करें, यह विद्यार्थी को दिखाता है।” गैलिलियो के अनुसार,- “आप दूसरे किसी व्यक्ति को कुछ भी सिखा नहीं सकते। स्वयं में स्थित ज्ञान को खोजने में सहायता कर सकते हैं”। महान शास्त्रज्ञ अल्बर्ट आइन्सटाइन की याद इस संदर्भ में अवश्य आती है। वे कहते थे, “मैं किसी को कुछ भी सिखाता नहीं हूँ। मैं सीखने हेतु अनुकूल पोषक, परिस्थिति, वातावरण निर्मित करता हूँ।”

एलबर्ट हुव्बर्ड के मतानुसार, “शिक्षक के आधार बिना विद्यार्थी को ज्ञान मार्ग पर चलना आना चाहिए। सिखाने का यह प्रमुख उद्देश्य है। विद्यार्थी सदैव शिक्षक पर निर्भर रहता हो तो वह शिक्षक की पराजय है।” उत्कृष्ट शिक्षक के लिए कहा जाता है कि वह स्वयं को ‘प्रोग्रेसिव्हली अननेसेसरी’ करता जाता है। विद्यार्थी को इतना स्वयंपूर्ण, स्वावलम्बी बनाता है कि उसे शिक्षक की आवश्यकता नहीं पड़ती। ऐसा शिक्षक बनाने के लिए कितना कौशल्य लगता होगा!

एक कहावत के अनुसार,- “मुझे एक मछली दें तो मेरा एक दिन गुजारा होगा, परन्तु यदि मछली पकड़ना सिखा दें तो मैं स्वयं अपने लिए मछली पकडूंगा।”

अमेरिकन लेखक और पत्रकार हेन्नी ब्रुक्स अॅडम्स कहते हैं, “दे नो इनफ हू नो हाऊ टू लर्न।” (They know enough who know how to learn) ।” ‘कैसे सीखें’ यह जो सीख पाया वही सच्चा शिक्षित! ऐसा महात्मा गांधी का मत है। क्ले बेडफोर्ड स्व-अध्ययन का महत्व अलग शब्दों द्वारा व्यक्त करते हैं। उनके अनुसार,- “आप विद्यार्थी को एक दिन एक अध्याय पढ़ा सकोगे परन्तु यदि उसकी जिज्ञासा को जागृत किया जाए, पढ़ने को प्रेरित करें, तो जीवन के अंत तक वह अध्ययनशील रहेगा।”

सिखाना ये बाह्य प्रक्रिया है, सीखना ये आंतरिक प्रक्रिया है। जब तक अंदर से ही, विद्यार्थी को सीखने की प्रेरणा नहीं मिलती, तब तक सारे प्रयास व्यर्थ हैं।

ज्ञान की विधाएं दिन-ब-दिन विस्तारित हो रही हैं। ज्ञान का विस्फोट हो रहा है। ऐसे समय में शिक्षक विद्यार्थी को स्वयं ही एकत्रित कर ‘रेडिमेड प्रॉडक्ट’ कब तक और कितने दे पाएंगे? ऐसी ‘रेडिमेड सामग्री’ का उपयोग कहां तक? इसलिए शिक्षक को अब अपना प्राधान्यक्रम बदलना पड़ेगा।

थॉमस फीड्मैन की ‘वर्ल्ड इज फ्रलैट’ अत्यंत प्रख्यात पुस्तक है। उसमें फीड्मैन कहते हैं, “आज दुनिया में प्रमुखता से ‘लर्न टू लर्न’ क्षमता विकसित करनी होगी। उनके अनुसार, “हमें आज पुरानी बातें नयी पद्धति से अथवा नयी बातें नयी पद्धति से आत्मसात करने के सिवाय अन्य मार्ग नहीं है। आजकल शिक्षक की समस्त साधन-सामग्री, सारा समय, सारी शक्ति ‘सिखाना-पढ़ाना’, ‘सिखाना-पढ़ाना’ इसी में खर्च हो जाती है। केवल ‘हार्ड वर्क’ करके थक जाना यह सार्थक नहीं है। ‘स्मार्ट वर्क’ से कार्य करने में कोई परेशानी नहीं।

“सीखने हेतु सिखाना यह मेरा प्रथम उद्देश्य है।” ऐसा यदि शिक्षक पक्का निश्चय करें तो उपाय और मार्ग दिखने लगेंगे। सदैव से आज तलाश करने पर विविध प्रयोग, कल्पनाएँ सामने आ जाती है। “मुझे यदि तैयार मार्ग उपलब्ध न हो रहा हो तो मैं स्वयं अपना नया मार्ग तैयार करूंगा।” ऐसा यदि स्वयं पर विश्वास होगा तब मार्ग निश्चित ही मिलेगा। अब ‘सिखाना’ कब बंद करेंगे?

(लेखक शिक्षाविद, स्वतंत्र लेखक, चिन्तक व विचारक है।)

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