मात्र पेट भरने वाली शिक्षा नहीं, मनुष्यता का संस्कार देने वाली शिक्षा

 – डॉ. मोहन भागवत

विद्या भारती (सरस्वती शिक्षा संस्थान) छत्तीसगढ़ के रजत जयंती समारोह (23 नवम्बर 2015, रायपुर) में उद्बोधन

25 वर्ष परिश्रम से अपेक्षा

बहुत द्रुत गति से यहाँ पर विद्या भारती के विद्यालयों का कार्य विस्तारित हुआ है। मुझे जो थोड़ी बहुत जानकारी है, उसके अनुसार सारे भारत के सब प्रान्तों में से छतीसगढ़ प्रान्त में पिछले 25 वर्षों में कार्य का विस्तार हुआ है वह सबसे अधिक गति है। ये अपना सब का परिश्रम है। वह परिश्रम हमने किया, हमें उसका फल मिला और इसलिए रजत जयंती के उत्सव मनाने के हम इसके आधे अधिकारी बन गए। पूरे अधिकारी बनना है तो 25 वर्ष कार्य किया है इसलिए हमसे अपेक्षा भी बन गई। जो काम नहीं करेगा, उससे अपेक्षा भी नहीं होती। जिसने अपनी क्षमता दिखा दी है, उससे अधिक अपेक्षा होती है। सीता जी को खोजने के लिए सागर तट दक्षिण तीर पर सारे वानर वीर पहुंचे।  सागर पार कौन जाएगा, इसकी खोज जब होने लगी तो हनुमान जी का नाम ही सबके सामने आया। हनुमान जी का नाम क्यों सामने आया क्योंकि हनुमान जी की क्षमता बाकी लोगों को पता थी। उस कथा में ये है कि उस समय हनुमान जी को पता नहीं था परन्तु लोगों ने उनका पराक्रम देखा था। उनकी स्मृतियाँ उनके मन में थी और इसलिए उन्होंने हनुमान जी को ही कहा कि आप जाकर आओ।

अपेक्षा के अनुरूप योजना व कर्तव्य

25 वर्ष के हमारे कार्य का फल समाज देखता है तो समाज में कुछ नई अपेक्षाएं तैयार होती है। उनको पूर्ण करने का, कर्तव्य धारण करने का संकल्प इस रजत जयंती वर्ष में हमें लेना है। उसकी योजना बनानी है और उस पर कार्य प्रारम्भ करना है। वैसे ये आनंद का विषय है। उस आनंद को मनाने का अधिकार तब प्राप्त होता है जब आगे आने वाले कर्तव्य के प्रति सजग होकर उसकी तैयारी करते हैं। मेरा विश्वास है कि इस प्रकार के कार्य भी रजत जयंती वर्ष के समारोह में विद्या भारती छत्तीसगढ़ के द्वारा होंगे।

शिक्षा आवश्यक है

परन्तु हम यहाँ सब समाज के लोग बैठे हैं। हमें विचार करना चाहिए कि क्या ये केवल विद्या भारती का काम है। शिक्षा ये तो जीवन में आवश्यक वस्तु है। यह सारी दुनिया आज जानती है इसलिए गरीब से गरीब व्यक्ति भी अपने पाल्य को पढ़ाने का भरसक प्रयत्न करता है। वह पेट काट कर बच्चों को पढ़ाने का प्रयास करता है क्योंकि वह जानता है कि ज्ञान के बिना मुक्ति नहीं, विद्या के बिना मुक्ति नहीं और इसलिए शिक्षा आवश्यक है।

मनुष्य और पशु के जीवन में अंतर

अकेला मनुष्य प्राणी ऐसा है, जिसको शिक्षा लेनी पड़ती है क्योंकि मनुष्य का जीवन मर्यादित नहीं है। पशुओं का जीवन मर्यादित है। भगवान ने जैसा जन्म दिया, उनको वैसा ही मरते दम तक रहना है। मनुष्य होने के कारण उनको कुछ हूनर सिखाये जाते हैं, उसका उपयोग मनुष्य करता है। बैल को जोतना सिखाया जाता है। सर्कस में अन्य अन्य पशुओं के अलावा कई करतब करवाए जाते है। ये सब मनुष्यों की सीख है। पशु का कोई अपना विचार नहीं। जैसा जन्म है, वैसा ही मरेगा। उसको इतना पता है कि प्रकृति ने शरीर व जीवन दिया है, उसको पूर्ण करते करते एक दिन मरना है। क्यों मरना है, वह कुछ प्रश्न विचार नहीं करता। क्योंकि उसके मन में विचार नहीं आते।

मनुष्य ऐसा नहीं है। मनुष्य के मन में विचार है और इसलिए मनुष्य की एक स्वभाविक प्रवृति है कि अपने परिवेश व पृष्ठभूमि पर मात करके जैसा जीवन उसको प्रकृति दृष्टि से मिला है, उससे ऊपर का श्रेष्ठ जीवन जो उसकी परिकल्पना में है, उसका वरण करने के लिए वह शिक्षा लेता है। कभी-कभी शिक्षा का अर्थ भी हम लोग केवल पेट भरने वाली शिक्षा मानते है। केवल पेट भरने वाली शिक्षा नहीं होती। पशुओं को भी पेट भरना पड़ता है। उनके लिए विद्यालय-महाविद्यालय नहीं है। पेट भरना एक काम है जो मनुष्य और पशुओं में सामान है – ‘आहार निद्रा भय मैथुनम् च सामान्यमेतत् पशुभिर्नराणाम्’। (हितोपदेश 25)

स्वावलंबी व आत्मविश्वास युक्त बनाने वाली शिक्षा

पशु जैसा जीना है तो शिक्षा की आवश्यकता नहीं। लेकिन मनुष्य को मनुष्यत्व अपने में लाकर मनुष्य जैसा जीना है तो शिक्षा की आवश्यकता है। इसलिए शिक्षा का एक उद्देश्य ऐसा है कि शिक्षित व्यक्ति को स्वावलंबी व आत्म विश्वास युक्त बनाकर अपना जीवन चलाने के योग्य बनाना। लेकिन मनुष्य की शिक्षा यहाँ रुकती नहीं, वह आगे जाती है। मनुष्य अपना जीवन चलाने में सक्षम बने, केवल उसे मनुष्य नहीं कहते।

आदर्श कौन?

हम अपने सामने आदर्श रखते है। अपने बच्चों को कहानियां बताते है। किसकी कहानियां बताते है? एक बड़ा मजेदार प्रसंग हुआ। पुराने समय में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरकार्यवाह मा. शेषाद्रि जी, कर्नाटक में प्रान्त प्रचारक थे। वे बस से प्रवास करते थे। एक बार बस में गए। उनके पास में एक युवक बैठा था। लम्बा चार-साढ़े चार घंटे का मार्ग था तो स्वभाविक ही आपस में बातचीत चली। उन्होंने युवक से उसका परिचय पुछा। युवक ने नाम बताया। फिर पूछा- ‘क्या करते हो।’ उसने कहा- ‘M.Sc,  B.Ed भी हुआ है, और अभी प्राध्यापक हूँ।’ ‘घर में कौन-कौन है?’ ये सारी बातें हुई। फिर युवक ने भी पूछना प्रारम्भ किया।

युवक : ‘आपका नाम क्या है?’

शेषाद्रि जी: अपना नाम बताया।

युवक : ‘आप कितने पढ़े हैं?’

शेषाद्रि जी : ‘मैं भी M.Sc. Chemistry हूँ।’

युवक : ‘आप क्या करते हैं?’

शेषाद्रि जी : मजाक में कहा कि करता कुछ नहीं हूँ, घूमता रहता हूँ।

युवक : ‘घूमते रहते है! आपकी कितनी कमाई होती है?’

शेषाद्रि जी : ‘कमाई कुछ नहीं होती।’

युवक : ‘कमाई नहीं होती तो आपका घूमना-फिरना, दो बार दिन में खाना-पीना करना ही पड़ता होगा ये सारा कौन करता है?’

शेषाद्रि जी : ‘जिनके यहाँ जाता हूँ, वह देते है, नहीं तो भूखा रहता हूँ।’

युवक : ‘आपका परिवार कैसे चलता है?’

शेषाद्रि जी : ‘परिवार है ही नहीं, मैंने विवाह नहीं किया इसलिए परिवार नहीं है। घर छोड़ दिया है इसलिए उसका भी दायित्व नहीं।’

युवक : (थोडा सा क्रोधित होते हुए) ‘कैसे हैं आप? अरे अपने भारत की परम्परा में तो वंश को आगे चलाना कर्त्तव्य माना जाता है। अगर वंश आगे नहीं चला तो नरक प्राप्त होता। आपने न आज के अपने घर को चलाया है, न अपना घर चलाकर वंश को आगे बढ़ा रहे हो तो आप नरक में नहीं जायेंगे क्या?’

शेषाद्रि जी : (हँसते हुए, पांच मिनट कुछ नहीं बोले। पांच मिनट गंभीर शांतता रही।) ‘मैं नरक में जाऊंगा तो जाऊँगा। तुम चिंता मत करो, मैं देख लूँगा क्या होगा। लेकिन मुझे एक जिज्ञासा है कि तुम इतने पढ़े-लिखे हो तो अपनी आठवीं पीढ़ी के पूर्वज का नाम बताओ।’

युवक : ‘आठवीं पीढ़ी के पूर्वज का नाम कैसे पता होगा। कोई कुल वृतांत लिखने वाला हो तो उसे पता होता है। हमें तो श्राद्ध में नाम लेना पड़ता है। इसलिए पिता जी और माता जी की तरफ से तीन पीढ़ियों के नाम याद है। याद तो दादा जी के बाद किसी का नाम नहीं है। आठवीं पीढ़ी के पूर्वज का तो सवाल ही नहीं।’ (फिर दो तीन मिनट शांत रहे।)

शेषाद्रि जी: दूसरा प्रश्न पूछा, ‘स्वामी विवेकानंद को जानते हो क्या?’

युवक : ‘उनको कौन नहीं जानता।’

शेषाद्रि जी : ‘नहीं कोई जाने न जाने, तुम जानते हो क्या?’

युवक : ‘हाँ, मैं जानता हूँ।’

शेषाद्रि जी : ‘वह तुम्हारे रिश्तेदार थे क्या?’

युवक : ‘रिश्तेदार तो नहीं थे।’

शेषाद्रि जी : ‘वह बंगाल के रहने वाले थे, मैं तो कन्नड़ भाषी हूँ।’

शेषाद्रि जी : ‘अच्छा! तुम्हारे गाँव में आये थे।’

युवक: ‘नहीं! मेरे गाँव में नहीं आये थे।’

शेषाद्रि जी : ‘तुमने देखा क्या उनको।’

युवक : ‘मैं उनके तीन पीढ़ी के बाद जन्मा हूँ, मैं कैसे देखूँगा।’

शेषाद्रि जी : ‘विवेकानंद को क्यों जानते हो। वह तुम्हारे पूर्वज नहीं, तुम्हारे गाँव में आये नहीं, तुमने उन्हें देखा नहीं। तो तुम मुझसे प्रश्न पूछते हो कि तुम क्या कमाते हो, विवेकानंद ने कितना कमाया?’

युवक : ‘कमाया तो कुछ नहीं था, उनकी माता जी थी। महाराजा उनके लिए धन भेज कर उनका निर्वाह करते थे, यह स्थिति थी। सबको पता है।’

शेषाद्रि जी : कमाया तो कुछ नहीं। तुम क्यों नाम जानते हो। वे कोई जिला परिषद् में, ग्राम पंचायत में चुन कर आये। ऐसा भी कुछ नहीं। तुम्हें तुम्हारे आठवी पीढ़ी के पूर्वज का नाम पता नहीं और तुम विवेकानंद को जानते हो। उन्होंने शादी विवाह भी नहीं किया। उन्होंने भी अपना वंश आगे नहीं बढ़ाया तो शायद वे भी नरक में गए होंगे।’

युवक : ‘क्या बात कर रहे है आप?’

फिर उसके ध्यान में बात आई मनुष्य का कर्तव्य क्या है? केवल अपने को बड़ा नहीं करना। हम कहानियां उनकी बताते है जिन्होंने व्यक्तिगत दृष्टि से कुछ कमाया हो न कमाया हो लेकिन समाज, देश, मानवता के लिए वे बहुत कुछ देकर गए। कमाने वालों की कहानियाँ हमारे यहाँ नहीं चलती, बाँटने वालों की कहानियाँ चलती हैं। हम अपने बच्चों को वही कहानियाँ बताते हैं।

संस्कार देने वाली शिक्षा

शिक्षा का उद्देश्य क्या है? मनुष्य मानवता वाला मनुष्य बने। मनुष्य स्वयं का जीवन चलाने के लिए स्वावलंबी और आत्म विश्वास युक्त हो। लेकिन समाज का जीवन चलाने की चिंता करने वाला हो। ये संस्कारों की शिक्षा कहाँ मिलेगी? आज देश में बहुत से शिक्षा संस्थान है। पेट भरने की शिक्षा सब जगह मिलती है। लेकिन एक बात है कि सब को नहीं मिलती। सामान्य लोगों की पहुँच के बाहर होती चली जा रही है और उसके आगे जाकर संस्कार देने वाली शिक्षा अगर खोजेंगे तो बहुत खोजना पड़ता है।

(भारतीय शिक्षा दृष्टि – डॉ.मोहन भागवत, पुस्तक से साभार)

और पढ़ें : ‘वर्तमान परिदृश्य एवं हमारी भूमिका’ विषय पर प.पू. सरसंघचालक डॉ० मोहन भागवत जी का बौद्धिक वर्ग – 26 अप्रैल 2020

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *