नर गंधर्व पंडित लखमीचंद जी

– डॉ. सुभाष शर्मा

भारत का जीवन लोक परंपराओं में ही दिख जाता है। इन लोक परंपराओं को जन-जन तक पहुंचाने का काम लोक नर्तक, लोक गायक आदि आंचलिक कलाकार करते हैं। प्रत्येक क्षेत्र या प्रदेश में ऐसे कलाकार होते हैं। इनमें से कुछ ऐसे कला-शिल्पी होते हैं जिनका लोक जीवन पर लंबे समय तक प्रभाव रहता है। ऐसे लोग किंवदंती बन जाते हैं और हर प्रसंग में उनकी बातें उद्धृत की जाती हैं। हरियाणा की वेद मंत्रों से गुंजित, महाभारत की साक्षी, लोक संगीत की संरक्षक और राग-रागिनियों की इस स्थली पर भी एक ऐसे ही नर गंधर्व पैदा हुए, जो जीवन रहते जितने प्रसिद्ध हुए जीवन के बाद उससे भी अधिक प्रतिष्ठित हुए। हरियाणा के कालिदास कहे जाने वाले लोक कवि पंडित लख्मीचंद जी ऐसा ही एक मूर्धन्य नाम हैं। परम पावनी यमुना नदी के तट पर वीर प्रसूता धर्मधरा की गोदी में ऐसे महान शब्द शिल्पी पंडित लख्मीचंद जी अवतरित हुए।

सोनीपत जिले के गांव जाटी कला में सन 1901 में (कहीं कहीं इनके जन्म का उल्लेख 1903 मिलता है) एक सामान्य ब्राह्मण परिवार में इनका जन्म हुआ। इनके पिताजी पंडित उदमीराम जी थोड़ी सी भूमि पर कृषि करके जैसे-तैसे अपने परिवार का पालन पोषण करते थे। परिवार की आर्थिक स्थिति निम्न स्तर पर ही थी। ऐसे सामान्य गौड़ ब्राह्मण परिवार में जन्मे इस हीरे के विषय में लिखा गया है कि

“लख्मीचंद बसे थे जाटी, जमुना के किनारे नरले तै तीन कोस सड़के आजम के सहारे।

ईसा गवैया कोई भी होया ना सारा देश पुकारे। मेरी तेरी सीख रागनी इब दुनिया रुक्के मारे।”

परिवार में आर्थिक अभाव तो था किंतु परिवार की सामाजिक प्रतिष्ठा अच्छी थी। समाज में परिवार का अच्छा प्रभाव था। बड़ा परिवार होने के कारण प्रभुत्व भी था। किंतु अभाव की स्थिति के कारण लख्मीचंद को पाठशाला में पढ़ने के स्थान पर गोचारण के लिए खेतों में भेज दिया गया। यहीं से उनको गीत गाने का शौक हुआ। अपने ग्वाले साथियों से टूटे-फूटे गीतों की पंक्तियां गुनगुनाते हुए दिन भर घूमते रहते थे। उनकी बेहतरीन रागनियों का सभी आनंद लेते थे। इस प्रकार अनपढ़ बालक संगीत की दुनिया की ओर चल दिया।

“पढ़े लिखे और भाव बिना मने छंद का बेरा ना सै।

पर गांवण और बजावण का मनै बालकपन तै चा सै।

ऐसे ही समय बीतता गया और आसपास आने वाले भजनी, जोगी और सागियों को सुनने का वह कोई अवसर नहीं छोड़ते थे। 10 वर्ष की आयु में एक बार प्रसिद्ध सांगी पंडित दीपचंद जी का सांग देखने गए तो एक सप्ताह बाद घर आए। घर वाले उनकी इस आदत से परेशान रहते थे। उनकी मां सीबिया देवी ने उदमीराम जी से आग्रह करके इनका विवाह कर दिया। उनकी पत्नी अल्पना सुहासिनी थी। उनका पुत्र हुआ तुलेराम कौशिक। इन्होंने पंडित लखमी चंद जी के बाद उनकी परंपरा को आगे बढ़ाया। इन सब प्रसंगों के बीच ही पड़ोस के गांव बसोदी के प्रज्ञा चक्षु कवि पंडित मानसिंह को उन्होंने अपना गुरु मान लिया। घर से दूर 6 महीने तक उनकी सेवा करते हुए गायन, वादन और नृत्य सीख लिया। जैसे रामकृष्ण परमहंस का प्रभाव स्वामी विवेकानंद पर रहा वैसे ही सामान्य कवि पंडित मानसिंह जी का प्रभाव जीवन भर पंडित लख्मीचंद पर रहा। उन्होंने भी गुरु प्रतिष्ठा कायम रखने में अपनी साधना और भविष्य तक को दाव पर लगा दिया। एक बार बरेली में जाट रेजीमेंट में सांग करते समय उन्होंने अपने गुरु पंडित मानसिंह का स्मरण किया तो बेड़ेबंद सांगी सोहन कुंडल वाला ने कहा कि वह अंधा क्या जानता है? तुम मुझे अपना गुरु बना लो। लख्मीचंद उसी समय सांग के बेड़े को छोड़कर अपने घर वापस आ गए। इसी कारण उनके कुछ ईर्ष्यालु साथियों ने उनको पारा खिला दिया। इससे उनकी हालत काफी बिगड़ गई। देसी इलाज से प्राण तो बच गए परंतु आवाज खराब हो गई। उन्होंने अपने गुरु को स्मरण करते-करते 11 मास तक एक सूखे कुएं में अभ्यास किया और प्रभु कृपा से उनकी आवाज पूर्ववत हो गई। अब उन्होंने हरियाणा व दिल्ली को अपना कार्य क्षेत्र चुना, अपना अलग सांग का बेड़ा बनाया और दिनोंदिन प्रसिद्ध होते चले गए। प्रारंभिक सांगों में उन्होंने श्रृंगार और विलासिता को प्रमुखता दी। इसी कारण समाज के संभ्रांत लोगों ने उनको सुनना बंद कर दिया। उनके गीतों को द्विअर्थी समझ कर बहिष्कृत किया जाने लगा। यहां तक कि प्रसिद्ध स्वतंत्रता सेनानी पंडित श्रीराम शर्मा भी उन्हें पसंद नहीं करते थे।

इस सबके बावजूद उनको सांग कला के क्षेत्र में आशातीत सफलता मिली परंतु अभी उन्हें संतुष्टि नहीं थी। युवा वर्ग उन्हें खूब सुनता था किंतु प्रतिष्ठित, पढ़ा-लिखा, प्रौढ़ वर्ग और इसके अतिरिक्त साधु-संत, पुजारी जैसा वर्ग अभी उनसे दूर था। यही कसक उन्हें आध्यात्मिक क्षेत्र की ओर ले गई। वह रोहतक जिले के टिटौली गांव में संस्कृत के प्रकांड विद्वान पंडित टीकाराम जी से मिले। दोनों में बातचीत हुई, गहन विमर्श हुआ और पंडित टीकाराम उनसे अत्यंत प्रभावित हुए। इसके बाद पंडित टीकाराम ने उनके साथ रहना स्वीकार किया। पंडित लख्मीचंद पंडित टीकाराम जी से रात-रात भर वेद शास्त्रों, पुराणों, उपनिषदों, रामायण महाभारत और यहां तक कि व्याकरण संबंधी नियम भी सुनते और सुबह उसी को रागिनी के रूप में सांग में गाते थे। सारे आध्यात्मिक साहित्य को उन्होंने लोक परंपराओं से जोड़ते हुए जन जीवन में प्रसारित किया। उनके उत्तरवर्ती सांगों में आध्यात्म गहराता चला गया। इस प्रकार समाज के प्रतिष्ठित वर्ग में उनके प्रति धारणा बदली और उनकी दृष्टि में 20-25 साल का उथला सा कवि अब एक उच्च कोटि का विद्वान बन गया। वह स्वयं एक किंवदंती हो गए। आज भी किसी बात की सत्यता प्रमाणित करने के लिए कहते हैं कि “भाई कहणा दादा लखमी का।

उन्होंने शाही लकड़हारा, राजा भोज सरण दे, हीर रांझा, चीर पर्व, विराट पर्व, नल दमयंती, सत्यवान सावित्री, राजा हरिश्चंद्र, सेठ ताराचंद, पद्मावत, हूर मेनका, नरसी का भात, मीराबाई आदि अनेक सांगों की रचना की। और वह ब्रह्म ज्ञान को सहज सरल शब्दों में जन-जन तक पहुंचाने में सफल हुए।

लख्मीचंद जी के हर ऋतु, पर्व, उत्सव, शादी और नीति प्रधानता में साहित्य और शब्द संयोजन से सब अचंभित हैं। उनकी रागनियों में हिंदी, संस्कृत, पंजाबी, उर्दू, फारसी, अंग्रेजी, खड़ी बोली और अन्य स्थानीय शब्दों का समावेश मिलता है। उन्होंने अपनी रचनाओं में व्याकरण का भी भरपूर प्रयोग किया है। जैसे अनुप्रास अलंकार का प्रयोग करके कितनी खूबसूरती से एक रचना रची –

अलख अगोचर अजर अमर अंतर्यामी असुरारी।

गुण गुण गाऊं गोपाल गरुड़गामी गोविंद गिरधारी।

अब उपमा का प्रयोग देखिए –

कल से नेत्र, नाक सुवा सा चंदा सा मुख गोल जिसका।

मोर पपैये, कोयल कैसी मीठी वाणी बोले।

और अब रूपक का उपयोग –

गम-गंगा का नीर नहाण नै, मुक्ति माखन मिले खाण नै।

अतिशयोक्ति अलंकार का उपयोग भी बखूबी किया गया है।

मद जोबन की बलैं अंगीठी, जाने कब बोले मीठी मीठी,

एक हाथ की घीट्टी मैं कै जाता दिखै नीर।

इसके अतिरिक्त एकावली का प्रयोग भी अनूठा है –

हंस फिरे बिना, तेरा मेरे बिना, मेरा तेरे बिना, जी लागण का कोन्या।

विषम अलंकार का उपयोग उनकी रागनियों में देखने को मिलता है –

हंसणी नै कित संगत ली कागां की।

लख्मीचंद जी के सांगों में लोक जीवन का ऐसा कोई आयाम नहीं, जो उन्होंने उद्घाटित न किया हो। जन्म, विवाह, बुढ़ापा, मृत्यु, मिलन, विदाई यहां तक कि अंतिम संस्कार तक का मार्मिक वर्णन उन्होंने बड़ी सहजता व सरलता से किया है। इस प्रकार भाव, भाषा, गीत-संगीत, शिल्प विधान आदि सभी दृष्टियों में उनका साहित्य बेजोड़ है।

प्रत्येक गायक, लेखक, गीतकार की कुछ विशेष रचना होती है। उसके साहित्य की कोई विशेषता होती है तो साहित्य में भी कुछ विशेष होता है। उसी प्रकार पंडित लखमीचंद जी का ‘ब्रह्मज्ञान’ बहुत प्रसिद्ध है। लोक जीवन की प्रत्येक घटना से आज भी लोग ब्रह्मज्ञान को जोड़कर उदाहरण देते हैं। ब्रह्मज्ञान में संपूर्ण सृष्टि का वर्णन किया गया है। उनकी ब्रह्मज्ञान की एक सर्वप्रसिद्ध रचना 84 लाख योनियों, उनके प्रकार, इहलोक, परलोक, स्वर्ग नरक, कर्मबंधन, मायाजाल, मुक्ति, मोक्ष, आदि को वर्णित करती है।

लाख चौरासी खत्म हुए ना, बीत कल्प युग चार गए।

नाक में दम आ लिया करें क्या, मरते मरते हार लिए।।

जब वे सांग में अपने चरित्र को अभिनीत करते थे तो देखने वाले नर-नारी सब जार-जार रोते थे। सांग संपन्न होने के बाद भी लोग बैठे रहते थे। लखमीचंद जी का रचा हुआ ब्रह्मज्ञान जीवन की शुद्धता, शुचिता और सदाचार का सहज और सरल वर्णन है जिसे लोग बात-बात में नसीहत के तौर पर प्रयोग करते हैं।

उनकी उस समय कही गई बातें कालांतर में अक्षरशः सत्य सिद्ध हुई जो उनकी दूरदर्शिता का प्रमाण हैं।

सांग के माध्यम से उन्होंने लोक कल्याण के अनेक महत्वपूर्ण कार्य किए। उस समय की परिस्थिति और आवश्यकताओं के अनुसार उन्होंने सभी जाति, मत-पंथ-संप्रदाय के लोगों के कल्याण के लिए अनेक कार्य किए। गांव-गांव में कुएं, तालाब, धर्मशाला, प्याऊ, चौपाल और पाठशालाएं खुलवाने में अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया। उन्होंने गौशालाओं के लिए भी बहुत सांग किए और सांग में आने वाली राशि एवं अनाज को गौशालाओं में दान कर दिया। आज भी हरियाणा और दिल्ली में अनेक स्थानों पर लखमी वाली प्याऊ, लखमी वाली पाठशाला, लखमी वाला जोहड़ और लखमी वाला कुआं देखने को मिल जाता है।

ऐसे महामानव का सान्निध्य उनके जिन शिष्यों को मिला वे सब भी लखमी चंद जी जैसे ही पूजनीय बन गए। उनके प्रमुख व प्रसिद्ध शिष्य पंडित मांगेराम, पंडित रामचंद्र, पंडित रतिराम, पंडित माइचंद, पंडित सुल्तान, पंडित चन्दनलाल, पंडित रामसरुप, फौजी मेहरसिंह, पंडित हवा सिंह, धारा सिंह, धर्म सिंह जोगी, हजूर मीर, सरूपा, तूंगल, हरबख्श, लखीराम, मित्रसैन, चन्दगी, मुंशी, गुलाम रसूल, हैदर है।

यहां तक कि उनके सांग का रसोईया और पानी भरने वाला भी समाज में सम्मान की दृष्टि से देखे जाते हैं। उनके साजिंदे और कारिंदे भी खूब स्वाभिमानी थे। सोनीपत जिले के पुरखास गांव में गोरखा नाम के व्यक्ति ने लखमीचंद के सांग में दो-चार बार पीने का पानी भरा था। उसके 50 साल बाद किसी सांग में उनको पानी भरने के लिए कहा तो गोरखे ने उत्तर दिया कि “जिसने लखमी का पानी भर दिया वो किसी और का पानी नहीं भर सकता।”

श्री रोशन वर्मा ने भी लखमीचंद पर रिसर्च किया हैं उसके आधार पर ‘दादा लखमी’ फिल्म बनी है जिसे 50 के लगभग राष्ट्रीय पुरस्कार मिल चुके हैं। प्रसिद्ध बॉलीवुड अभिनेता यशपाल शर्मा की इस शोधपूर्ण फिल्म ‘दादा लखमी’ ने पूरे देश में धूम मचा रखी है। इसके अतिरिक्त फिल्म समीक्षक व आलोचक डॉ.रक्षा गीता जी ने ‘दादा लखमी ए म्यूजिकल जर्नी’ विषय पर विस्तृत चर्चा हिमाचल साहित्य अकादमी में प्रकाशित की है। लखमीचंद जी पर शोध करने वाले डॉ.हरिचंद लठवाल, डॉ.के.सी.शर्मा, पंडित केशो राम व डॉ.पूर्णचंद शर्मा है।

लख्मीचंद जी पर कुछ विशेष पुस्तकें प्रकाशित हुई जिसमें श्री कृष्ण चंद्र शर्मा कृत ‘कविसूर्य लखमीचंद’, श्री लक्ष्मीनारायण शर्मा ‘वत्स’ द्वारा रचित ‘श्री शुकदेव स्वरूप पंडित लखमीचंद रत्नकोष’ और सर्वाधिक प्रचलित डॉ. पूर्णचंद शर्मा द्वारा संपादित ‘पंडित लखमीचंद ग्रंथावली’ है।

व्यक्तिगत जीवन के संघर्षों से जूझते हुए, लोक कल्याण के कार्य करते हुए, हिंदू जीवन दर्शन, धर्म-कर्म आदि की सब बातें समाज को देते रहे। ऐसे पंडित लख्मीचंद जी की आयु अल्प ही रही। 17 अक्टूबर 1942 को मात्र 41 वर्ष की आयु में उनका शरीर शांत हो गया। उनकी मृत्यु के बाद भी उनके प्रति प्रेम के अनेक किस्से आज भी प्रसिद्ध हैं। 1964 में पंडित जवाहरलाल नेहरू की मृत्यु का समाचार आया तो उनके प्रेमी श्रोताओं ने कहा- “फेर के होया जब लखमी ए मर लिया।” इतनी गहरी पैठ आज भी उनकी समाज में है। साहित्य में नोबेल पुरस्कार विजेता सर विद्याधर सूरजपाल नायपाल ने कहा कि “पश्चिमी जगत का सारा साहित्य पंडित लख्मीचंद जी की एक रागिनी की भी बराबरी नहीं कर सकता।” ऐसे मूर्धन्य लोक कवि पंडित लख्मीचंद जी को नर गंधर्व कहना कोई अतिशयोक्ति नहीं है।

(लेखक शिक्षाविद व स्वतंत्र साहित्यकार है और विद्या भारती उत्तर क्षेत्र के सेवा शिक्षा संयोजक है।)

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One thought on “नर गंधर्व पंडित लखमीचंद जी

  1. लोक परम्पराओं और भारतीय जीवन दर्शन को लोकवाणी में छन्द बद्ध करने वाले गन्धर्व के अवतार पण्डित लखमी चंद जी जीवन को शब्दों में व्यक्त करने के असाध्य कार्य को साधने का पुनीत कार्य करने का जो महत्वपूर्ण प्रयत्न आदरणीय डॉ सुभाष शर्मा जी ने किया है उसके लिए आपको कोटि कोटि साधुवाद।

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