– शिरोमणि दुबे

कोई चलता पद चिह्नों पर, कोई पद चिह्न बनाता है।
जो राहों को खुद गढ़ता है, वही युगों तक गाया जाता है।
कविता की ये पंक्तियाँ उन लोगों को प्रेरणा देती हैं, जो निर्भय होकर अपनी मंजिलें स्वयं तय करते हैं। सच्चा कर्मवीर वही होता है, जो निरन्तर संघर्षों से जूझते हुए बार-बार उठता है, अन्ततः अपने पुरुषार्थ से अमर हो जाता है। यूँ तो दुनियाँ में बहुतेरे लोग हैं, जो गंगोत्री से गंगासागर की यात्रा अनेक बार कर लेते हैं। लेकिन जो लोग धारा के विपरीत गंगा सागर से गंगोत्री की ओर प्रवाह को चीरते हुए सृष्टि के लोकमंगल के लिए बिना रुके, बिना थके अनथक राही के सदृश जीवनभर चलते हैं। वे ही हुतात्माएँ पूजनीय होती हैं, वंदनीय हो जाया करती हैं। माखनलाल चतुर्वेदी की साहित्य साधना से उपजी साहित्य दृष्टि पारतंत्र्य के घटाटोप अँधियारें में भी प्रकाश स्तम्भ की भाँति राष्ट्र जीवन का पथ आलोकित करती रही। श्री चतुर्वेदी का साहित्य-दर्शन जहाँ समाज की विषमताओं-विद्रूपताओं पर गहरी चोट करता है, वहीं प्रकृति प्रेम की कविताओं में उनके शब्द-शब्द कलरव करते हुए सुनाई देते हैं। उनके लिए राष्ट्र कोई सीमाओं से आबद्ध भूगोल-भूखण्ड भर नहीं है। उनका राष्ट्रवाद केवल गोरी हुकूमत के विरोध तक सीमित नहीं था बल्कि उनकी कविताएँ आज भी उद्दाम देशभक्ति, आत्मगौरव तथा राष्ट्र निर्माण की प्रेरणा देती हैं।
माखनलाल चतुर्वेदी की कविता ‘मुक्त गगन है, मुक्त पवन है’ स्वतंत्रता, स्वाभिमान तथा राष्ट्रभक्ति की भावना को व्यक्त करती है। इस कविता में कवि जहाँ स्वतन्त्र भारत की महिमा का गुणगान करता है, वहीं वे यह भी मानते हैं कि केवल राजनीतिक स्वतन्त्रता ही पर्याप्त नहीं है, हमें मानसिक दासता के जुएं को उतारकर सामाजिक एवं सांस्कृतिक रुप से स्वतंन्त्र होना होगा –
मुक्त गगन है मुक्त पवन है, मुक्त साँस गर्बीली।
लाँघ सात लम्बी नदियों को, हुई श्रृंखला ढीली।
टूटी नहीं कि लगा अभी तक, उपनिवेश का दाग।
बोल तिरंगे तुझे उड़ाऊँ, या कि जगाऊँ आग?
राष्ट्रवादी कवि एवं लेखक माखनलाल चतुर्वेदी का जन्म होशंगाबाद वर्तमान नर्मदापुरम् जिले के बावई ग्राम में 04 अप्रैल 1889 को हुआ था। पिता नंदलाल चतुर्वेदी एवं माता श्रीमती रामादेवी चतुर्वेदी की गोद में खेलकर वे बड़े हुए थे। पिताजी गाँव की ही प्राथमिक पाठशाला में अध्यापक थे। उसी पाठशाला में अपने पिता के सानिध्य में ही श्री चतुर्वेदी ने प्राथमिक शिक्षा पूर्ण की थी। बाद में उन्होंने हिन्दी, संस्कृत, बांग्ला, गुजराती आदि भाषाओं का गहराई से अध्ययन किया और वे इन भाषाओं के निष्णात विद्वान बन गए। इसीलिए माखनलाल चतुर्वेदी के सम्पूर्ण लेखन में हिन्दी एवं संस्कृत भाषा की गहरी छाप दिखाई देती है। वे मात्र 16 वर्ष की आयु में शिक्षक बन गए।
माखनलाल चतुर्वेदी ने जब युवानी की दहलीज पर कदम रखा, तब देश अंग्रेजों की दासता से मुक्त होने के लिए झटपटा रहा था। राष्ट्रीय परिदृश्य में “स्वतन्त्रता हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है” यह नारा स्वतंत्रता के लिए आत्मोत्सर्ग करने वाले रणबाँकुरों के लिए प्रेरणास्त्रोत बन चुका था। दक्षिण अफ्रीका में सत्याग्रह के अमेघ अस्त्र का सफल प्रयोग कर मोहनदास करमचन्द गांधी का भारतीय परिदृश्य के केन्द्र में आगमन हो चुका था। पूरे देश में स्वदेशी, स्वगौरव का भाव हिलोरें मार रहा था। सामाजिक सुधारों के लिए अनेक अभियान सम्पूर्ण देश में प्रारंभ हो चुके थे। देशवासियों में माँ भारती की बंदिशों की बेड़ियों को तोड़ना राष्ट्रीय चेतना का पर्याय बन गया था। ऐसे समय में अप्रैल 1913 में हिन्दी साहित्य सेवी खण्डवा निवासी कालूराम गंगराणे ने मासिक पत्रिका ‘प्रभा’ का प्रकाशन आरंभ किया तथा इस पत्रिका के संपादन का दायित्व माखनलाल चतुर्वेदी को सौंपा गया। इसी बीच सितम्बर 1913 को अध्यापक की नौकरी से त्यागपत्र देकर श्री चतुर्वेदी पूर्णरुपेण पत्रकारिता, साहित्य सृजन तथा राष्ट्रीय आंदोलन के लिए समर्पित हो गए।
संयोगवश इसी वर्ष गणेश शंकर विद्यार्थी ने ‘प्रताप’ पत्रिका का संपादन-प्रकाशन आरंभ किया। 1916 में लखनऊ कांग्रेस अधिवेशन के दौरान माखनलाल जी ने विद्यार्थी जी के साथ मैथलीशरण गुप्त एवं महात्मा गांधी जी से राष्ट्रीय परिदृश्य पर छाए धुँधलके को हटाने के लिए भेंट की थी। 1920 में महात्मा गांधी द्वारा आहूत असहयोग आंदोलन में श्री चतुर्वेदी ने अपनी प्रभावी भूमिका का निर्वहन किया और 1921 में उन्हें राजद्रोह के आरोप में गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया। यह सब सहन करने के बाद भी फिरंगियों के विरोध में उनकी लेखनी शब्दों के शोले बरसाती रही। आदरणीयता के शिखर पुरुष माखनलाल चतुर्वेदी के बारे में प्रसिद्ध कवि रामावतार त्यागी की यह पंक्तियाँ बहुत समीचीन लगती हैं –
जितने कष्ट-कंटकों में है, जिनका जीवन सुमन खिला।
गौरव-गंध उन्हें उतना ही, अत्र-तत्र-सर्वत्र मिला।
माखनलाल चतुर्वेदी ने पत्रकारिता के माध्यम से राष्ट्रीय चेतना को झकझोर दिया। उनकी प्रखर लेखनी सामाजिक कल्मष-कलुश को मिटाने के लिए अंगारे उगलती रही। उनकी कविताओं में राष्ट्रभक्ति, स्वाधीनता संग्राम तथा भारतीय संस्कृति का गर्भनाल सम्बन्ध होने के कारण साहित्य जगत में श्री माखनलाल चतुर्वेदी को ‘एक भारतीय आत्मा’ के नाम से जाना जाता है। उनकी प्रसिद्ध कविता ‘पुष्प की अभिलाषा’ मातृभूमि के लिए सर्वोच्च बलिदान की प्रेरणा देती है-
चाह नहीं, मैं सुरबाला के गहनों में गूँथा जाऊँ।
चाह नहीं, प्रेमी माला में बिंध प्यारी को ललचाऊँ॥
चाह नहीं, सम्राटों के शव पर, हे हरि, डाला जाऊँ।
चाह नहीं, देवों के सिर पर चढूँ, भाग्य पर इठलाऊँ॥
मुझे तोड़ लेना वनमाली! उस पथ में देना तुम फेंक॥
मातृभूमि पर शीश चढ़ाने। जिस पथ जावें वीर अनेक॥
माखनलाल चतुर्वेदी अपनी कविताओं में शिल्प की तुलना में भाव को अधिक महत्व देते हैं। परम्परागत छंदबद्धता रचना के अनुकूल शब्दों का वे प्रयोग करते हैं। ब्रितानी उपनिवेशवाद के शोषण तंत्र का बारीक विश्लेषण करते ‘कैदी और कोकिला’ नामक कविता भारतीय स्वाधीनता सैनानियों के साथ जेल में किए गए दुर्व्यवहारों व क्रूरताओं का मार्मिक साक्ष्य प्रस्तुत करती है। कैदी कवि जेल में एकाकी और उदास है। वह गोरी हुकूमत के प्रति अपने आक्रोश को व्यक्त करते हुए कोयल से कहता है कि यह समय मधुर गीतों को गाने का नहीं बल्कि मुक्ति के गीत सुनाने का है। वे लिखते हैं-
काली तू, रजनी भी काली,
शासन की करनी भी काली।
काली लहर, कल्पना काली,
मेरी काल.कोठरी काली।
टोपी काली, कमली काली,
मेरी लौह.श्रृंखला काली।
पहरे की हुंकृति की व्याली,
तिस पर है गाली, ऐ आली।
इस काले संकट.सागर पर
मरने को, मदमाती,
कोकिल, बोलो तो।
अपने चमकीले गीतों को
क्योंकर हो तैराती
कोकिल, बोलो तो!

माखनलाल चतुर्वेदी का साहित्य दर्शन मुख्य रुप से राष्ट्रीयता, प्रकृति प्रेम तथा सामजिक चेतना से ओत-प्रोत है, जहाँ वे भारतीय आत्मा की अभिव्यक्ति के रुप में जाने जाते हैं। श्री चतुर्वेदी ने स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान ‘प्रभा’, ‘कर्मवीर’ जैसे समाचार पत्रों का संपादन किया। उन्होंने अपनी कविताओं, लेखों के माध्यम से जातिवाद, छुआछूत पर जोरदार प्रहार किया था। वे जानते थे कि राष्ट्र की वास्तविक स्वतंत्रता तभी संभव होगी जब समाज में सब को बराबरी तथा समान अधिकार मिलेंगे। अपनी कविता ‘सच है’ में वे लिखते हैं-
सच है, मैने छुआ नहीं उसे,
क्योंकि वह कहता था?
कि वह नीच है,
और मैं उच्च।
पर जब उसने मेरी प्यास बुझाई,
मेरे लिए आग जलाई,
और छाया दी,
तब जाना!
छुआ नहीं, मानवता को खो दिया।
माखनलाल चतुर्वेदी ने हिन्दी साहित्य तथा पत्रकारिता से शिक्षा के प्रचार-प्रसार को बढ़ावा दिया। उनकी दृढ़ मान्यता थी कि मजबूत राष्ट्र खड़ा करने के लिए शिक्षित समाज की आवश्यकता है। उनकी ‘वीणा’, ‘युगचरण’ और ‘हिम तरंगिणी’ जैसे काव्य संग्रहों की कई रचनाएँ सामाजिक चेतना, अज्ञानता के अंधकार को मिटाने के लिए शिक्षा को प्रकाश स्तम्भ के रुप में प्रस्तुत करती हैं –
नव जागरण की वीणा बजा दो,
अज्ञानता के बंधन काटो,
शिक्षा का दीप जलाओ,
मनुजता को आगे बढ़ाओ।
उनकी कविता ‘काका का सपना’ एक ऐसी रचना है, जिसमें शिक्षा और सामाजिक जागरण की चेतना दिखाई देती है –
स्कूल न हो सिर्फ इमारत,
वहाँ विचारों की हो खेती।
पढ़-लिखकर लौटे हर बच्चा,
बनकर गाँव की ज्योति।
माखनलाल चतुर्वेदी हिन्दी साहित्य के महान कवि, पत्रकार व विचारक थे। उन्होंने साहित्य को सामाजिक चेतना और राष्ट्रीय भावनाओं से जोड़ा। माखनलाल चतुर्वेदी को साहित्यिक योगदान के लिए कई पुरस्कारों से सम्मानित किया गया। उनकी प्रमुख रचनाएँ – समर्पण, मरण-ज्वार, हिम-तरंगिणी, युगचरण, बीजुरी काजल आँज रही, साहित्य के देवता, समय के पाँव, अमीर इरादे-गरीब इरादे, नागार्जुन युद्ध आदि अत्यंत लोकप्रिय ग्रंथ हैं। उनके काव्य संग्रह हिम तरंगिणी के लिए उन्हें सन् 1955 में साहित्य अकादमी पुरस्कार तथा साहित्य एवं शिक्षा क्षेत्र में योगदान के लिए भारत सरकार द्वारा 1963 में पद्मभूषण पुरुष्कार और राष्ट्रकवि की उपाधि से भी विभूषित किया गया है। मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल में स्थित माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय उनकी साहित्य साधना एवं दर्शन का अनूठा स्मारक है।
(लेखक देवी अहिल्याबाई होल्कर राज्य स्तरीय आयोजन समिति, भोपाल के सदस्य है।)
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