गुरुजी और गूगल


 – दिलीप वसंत बेतकेकर

एक छोटा वीडियो सोशल मीडिया पर बहुत लोगों ने देखा ही होगा‌। एक छोटी बच्ची ने दो हजार रुपयों के नोट्स काटकर महात्मा गाँधी जी के चित्र काटकर चिपकाए और शि‌क्षक द्वारा दिया हुआ प्रकल्प (प्रोजेक्ट) पूरा कर दिया। उस बच्ची का प्रकल्प देखकर उसके अभिभावक रोते होंगे और अन्य देखने वाले हंसकर मजा लेते होंगे।

आज कल प्राथमिक कक्षा से लेकर विद्यापीठ स्तर तक ऐसे ही प्रकल्प पूरे किए जा रहे है। ‘कटींग पेस्टींग’ जोर से चल रहा है। नेट से निकालना और चिपकाते जाना। धंधा जोर शोर से चल रहा है। कुछ मिनिटों में जानकारी नेट से मिलती है। कॉपी करो और चिपकाओ। जानकारी आसानी से और कम समय में मिलती है। इसी कारण से कुछ लोगों को लगता है कि आज गूगल युग में गुरुजी की क्या आवश्यकता है। तंत्रज्ञान बहुत तेजी से और बड़े पैमाने पर प्रगति कर रहा है। यह तांत्रिक प्रगति जितनी बढ़ेगी उतनी शिक्षक की आवश्यकता कम होती जाएगी ऐसा कुछ लोगों को लगता है।

क्या गूगल युग में गुरूजी की आवश्यकता नहीं होगी?

क्या गुरुजी के सब काम गूगल कर सकता है? क्या गूगल गुरुजी का स्थान लेकर गुरुजी को निष्प्रभावी करेगा?

दुसरी ओर गुरुजी और गूगल एक दुसरे के दुश्मन, शत्रु है क्या, यह भी प्रश्न खडा होता है। गुरूजी और गूगल प्रतिस्पर्धी है या सहयोगी हो सकते है?

गूगल तंत्रज्ञान है। तंत्रज्ञान गूगल का प्रतीक, प्रतिनिधि इस अर्थ से हम यहाँ उपयोग कर रहे है। आज गूगल, शिक्षक का विकल्प नहीं है और भविष्य में भी नहीं होगा, होना भी नहीं चाहिए। शिक्षक का स्थान गूगल नहीं ले सकता। गूगल गुरुजी की सहायता कर सकता है और आज के शिक्षक को तंत्रज्ञान की सहायता लेनी भी चाहिए। तंत्रज्ञान अस्पर्श नहीं है। लेकिन किस प्रकार की सहायता, कब, कैसी और कितनी मात्रा में, इसका विवेक शिक्षक के पास होना आवश्यक है।

‘गूगल वाक्यं प्रमाणम्’ न हो इस बात की दक्षता आवश्यक है। हमें तंत्रज्ञान का गुलाम नहीं बनना है।

तंत्रज्ञान हमारा गुलाम बने तो बहुत अच्छा। यह विवेक, संतुलन खो गया तो सारी गड़बड़ हो जाएगी। आज ऐसे कई उदाहरण दिख रहे हैं।

‘टेक्नोक्रेट’ बनने की होड़ में कुछ नया आधुनिक करने की सोच से विषयों की पीपीटी बनाना और कक्षा में बच्चों को दिखाना ऐसा हो रहा है। इस अध्यापन पद्धति में न जान है और न ही प्राण। जो सामने पर्दे पर दिखाया जा रहा है, वह सिनेमा देखने जैसा निष्क्रीयता से देखा जाता है। और शिक्षा में आधुनिक तंत्रज्ञान का हम उपयोग कर रहे है, इस गलतफहमी और गलत आनंद में शिक्षक जी रहे है। कुल मिलाकर सब आनंद ही आनंद ।

गूगल गुरुजी का सहायक है। जैसे प्रयोगशाला में प्रयोग करने में विज्ञान के शिक्षक की सहायता करने के लिए सहायक (लैब असिस्टंट) होता है उसी प्रकार से गूगल गुरुजी का असिस्टंट है। वह प्रमुख नहीं है। गुरुजी ही प्रमुख है, यह बात नहीं भुलनी चाहिए। शिक्षक यह बात यदि ठीक से समझे और व्यवहार करे तो गूगल की मदद लेने में कोई आपत्ति नहीं। पैसे के बारे में कहते है, Money is a good  slave but bad master. गूगल के बारे में भी यही है।

गूगल की व्याप्ति (scope) कितनी विशाल है इसका हम सब अनुभव ले रहे है। किसी भी विषय के बारे में इतनी विविध प्रकार की जानकारी इतने कम समय में हमारे सामने आती है। कितना बड़ा और विशाल खजाना! जैसे अल्लादीन का दीया।

लेकिन यह केवल जानकारी है यह नहीं भुलना चाहिए। जानकारी, ज्ञान और विद्वत्ता एक नहीं। उसमें अंतर है। इनफार्मेशन, नॉलेज और विज्डम ऐसे अलग अलग शब्द है। और तीनों के अर्थ भी अलग है।

जानकारी यह प्रथम चरण, प्रथम सोपान ऐसा कह सकते है। गूगल जानकारी देने का काम बहुत अच्छी ढंग से करता है। लेकिन जानकारी पर्याप्त नहीं है। इस जानकारी को न तो रूप, रंग और गंध है। जानकारी शुष्क, रुक्ष, निर्जीव है। हम उसको कच्चा माल (रॉ मटेरियल) कह सकते है। यह रॉ मटेरीयल इकठ्ठा करके रखने का क्या मतलब और उपयोग? उसका उपयोग करके कुछ उपयुक्त बनाया तो ठीक।

दूसरी बात यह जानकारी अच्छी भी हो सकती है और बुरी भी हो सकती है, विधायक और विध्वंसक भी हो सकती है। यह जानकारी उपयोगी या निरुपयोगी भी हो सकती है। टिकटॉक, ब्लू व्हेल गेम भी तो एक प्रकार की जानकारी ही है। नेटपर खूब मिलती है। पोर्नोग्राफी से भरा पूरा है नेट। लेकिन क्या यह सब व्यक्ति के कल्याण के लिए है? खतरनाक खेल खेलते-खेलते बच्चों की जान जा रही है। खुदकुशी करते है मासुम बच्चे। शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य बिगड़ने के कई उदाहरण अखबारों में आ रहे है।

मेडीकल रिपोर्टस सामने आ रही है। छोटों से लेकर बडों तक जीवन बर्बाद हो रहे है। तंत्रज्ञान, नेट, गूगल दुधारी शस्त्र है। इस शस्त्र का उपयोग करना यह एक बड़ी कुशलता है। अपना खुद का नुकसान न करते हुए इस शस्त्र का उपयोग करना सीखना चाहिए। यह कौशल सिखाना, बढ़ाना यह आज के गुरुजी का एक महत्वपूर्ण कार्य है। यह आज के शिक्षक और अभिभावक के सामने एक बड़ी चुनौती है।

केवल जानकारी पर्याप्त नहीं है। उसका उपयोग कब, कैसा, कितना और किसलिए करना यह जानना, समझना भी आवश्यक है अन्यथा भारी नुकसान होने की संभावना है। नेट पर मौलिक जानकारी है और कबाड़ भी है। उसमें से क्या चयन करके लेना और क्या फेंकना यह विवेक जगाना यही बड़ा काम है। गूगल दोनों प्रकार की जानकारी परोसता है। चयन करना हमारी जिम्मेदारी है। गुरुजी को नीरक्षीर विवेक बुद्धि जगाने का चुनौतिपूर्ण और महत्वपूर्ण कार्य करना है। जहाँ गूगल रुकता है वहाँ से आगे गुरुजी का काम शुरु होता है।

शिक्षक के कार्य का महत्व एरीक जेन्सन बताता है, “strong  teachers do not teach content. strong teachers connect the learning in ways that inspire kids to learn more and strive for greatness.”

गूगल information देता है ,गुरुजी inspiration देता है।

गूगल content देता है, गुरुजी confidence देता है।

गुरुजी जब अच्छे काम के लिए बालक की पीठ थपथपाते हुए, ‘वाह! बहुत बढ़िया, अच्छा शानदार प्रदर्शन है। मुझे तुम पर गर्व है’ ऐसा कहते है तो बालक को प्रेरणा मिलती है, उसका हौसला बढ़ता है। पीठ थपथपाने वाले हाथ गूगल के पास नहीं है। यह हाथ केवल गुरुजी के पास है और यही गुरुजी की सबसे बड़ी ताकत है। गुरुजी के हाथों के स्पर्श में उर्जा और जादू है, यह नजरअंदाज नहीं हो सकता।

तंत्रज्ञान की मर्यादा स्पष्ट करते हुए महाजाल का जनक और संशोधक बर्नर्सलि कहता है, ‘मैने महाजाल का (www) आविष्कार किया होगा लेकिन उसका उपयोग कैसे होगा यह आप पर निर्भर है। आप तय करेंगे। यह महाजाल आपकी आशा, अपेक्षा, सपने पूरे करने वाला हो या भयप्रद, विभाजन करने वाला हो यह आप ही निश्चित कर सकते है।’

विवेक जगाने का दायित्व गुरुजी पर आता है। यदि विवेक, नीरक्षीर विवेक बुद्धि नहीं तो जानकारी के महासागर में डूबने की ही संभावना अधिक है। रोज इस प्रकार के उदाहरण सामने आ रहे है। उनकी संख्या बढ़ रही है।

इक्कीसवीं शताब्दी का शिक्षक केवल जानकारी देने वाला नहीं, विषय का नहीं, प्रमुख रुप से विद्यार्थी का शिक्षक हों। इस कक्षा में जो पाठ पढ़ाया जाता है वह विद्यार्थी को अपना स्थान छोड़े बिना भी गूगल से मिल सकता है। उसके लिए शिक्षक पर निर्भर रहने की कोई आवश्यकता नहीं। सबसे बड़ी जरूरत है कुशलता सिखाने की, बढाने की। ढूँढना, पहचानना, संकलन करना, उचित समय पर उपयोग करना, नया बनाना यह सब कौशल है। केवल सीखाने के स्थान पर कैसे सीखना यह सीखाना यही शिक्षक का पहला कार्य है।

अमेरिकन लेखक आयन गिल्बर्ट इक्कीसवीं शताब्दी के शिक्षक के बारे में लिखते है, If the end of the 20th century saw the democratisation of knowledge, then the role of the 21st century teacher is quite simple – to preside over the democratisation of learning.”

तंत्रज्ञान का उपयोग करने से बच्चे रोबोट जैसे बनने की अधिक संभावना है। गूगल को अस्पृश्य समझकर दूर रखना भी ठीक नहीं है। अपने कार्य के लिए गूगल का, कब, कैसे, कितना उपयोग करना यह भाव समझना और बच्चों में जगाना यही आज के गुरुजी का प्रमुख कार्य है।

जो नेट पर आ रहा है वही सच मानना यह भी एक आधुनिक अंधश्रद्धा बन सकती है जो सामने आ रहा है वह सोच समझकर लेने की आदत बननी चाहिए। अल्बर्ट आइंस्टीन ने जो खतरे की घंटी बजाई थी वह आज भी ध्यान में रखनी चाहिए। आइंस्टीन कहते है, ‘We a living in the world where technology almost surpassed humanity.’

गुरुजी और गूगल हाथ से हाथ मिलाकर चलें यह आज के समय की माँग है।

(लेखक शिक्षाविद् है और विद्या भारती अखिल भारतीय शिक्षा संस्थान के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष है।)

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