नोमोफोबिया – मोबाइल से दूर होने की बेचैनी

 – डॉ शिवानी कटारा

हमारे हाथ में हर समय मौजूद स्मार्टफोन अब केवल एक तकनीकी उपकरण नहीं रहा। वह हमारी अलार्म घड़ी है, पढ़ाई का सहारा है, दोस्तों से जुड़ने का माध्यम है और कई बार अकेलेपन का विकल्प भी। लेकिन जब यही फोन न हो और उसके बिना रहने का विचार ही बेचैनी, घबराहट या असुरक्षा पैदा करने लगे, तो यह स्थिति नोमोफोबिया कहलाती है – यानी मोबाइल फोन के बिना रहने का डर। भारत जैसे देश में, जहाँ युवा आबादी अधिक है और इंटरनेट सस्ता व सुलभ है, यह समस्या तेजी से सामान्य होती जा रही है।

हाल के भारतीय अध्ययनों और कॉलेज-स्तरीय सर्वेक्षणों से संकेत मिलता है कि बड़ी संख्या में युवा मध्यम से लेकर गंभीर स्तर तक फोन-निर्भरता का अनुभव कर रहे हैं। कई छात्रों के लिए फोन सिर्फ सुविधा नहीं, बल्कि दिनचर्या और भावनात्मक संतुलन का आधार बन चुका है। यही कारण है कि फोन दूर होते ही बेचैनी, ध्यान की कमी और चिड़चिड़ापन जैसे लक्षण दिखाई देने लगते हैं।

नोमोफोबिया को अभी औपचारिक रूप से मानसिक रोगों की सूची में अलग पहचान नहीं मिली है, लेकिन इसके लक्षण – बार-बार फोन चेक करना, नेटवर्क या बैटरी खत्म होने का डर, और फोन पास न होने पर असहज महसूस करना—स्पष्ट रूप से मानसिक स्वास्थ्य से जुड़े हुए हैं। भारत में मनोवैज्ञानिक और शिक्षाविद् अब इसे केवल ‘आदत’ नहीं, बल्कि व्यवहारिक समस्या के रूप में देखने लगे हैं।

दिमाग पर प्रभाव

स्मार्टफोन पर हर नोटिफिकेशन दिमाग को एक छोटा-सा सुख देता है। मैसेज, लाइक या नया वीडियो देखने से मस्तिष्क में डोपामिन सक्रिय होता है, जिससे अच्छा महसूस होता है। समस्या तब शुरू होती है जब दिमाग इसी त्वरित सुख का आदी हो जाता है। परिणामस्वरूप व्यक्ति बार-बार फोन देखने लगता है, पढ़ाई या काम के दौरान ध्यान भटकता है और बिना फोन के बेचैनी होने लगती है। धीरे-धीरे एकाग्रता कम होती है और मन शांत रहने के बजाय लगातार उत्तेजित अवस्था में बना रहता है। कई युवाओं में यह स्थिति चिंता और भावनात्मक अस्थिरता तक ले जाती है।

शरीर पर असर

नोमोफोबिया का प्रभाव केवल मानसिक नहीं, शारीरिक भी है। देर रात तक स्क्रीन देखने से नींद का प्राकृतिक चक्र बिगड़ जाता है। नीली रोशनी नींद लाने वाले हार्मोन (मेलाटोनिन) को प्रभावित करती है, जिससे देर से नींद आती है और सुबह थकान बनी रहती है। लगातार झुककर फोन देखने से गर्दन और कंधों में दर्द, आंखों में जलन और सिरदर्द जैसी समस्याएँ आम हो गई हैं। शारीरिक गतिविधि कम होने से मोटापा और जीवनशैली से जुड़ी बीमारियों का खतरा भी बढ़ता है। कई भारतीय छात्रों ने यह स्वीकार किया है कि फोन के अत्यधिक उपयोग ने उनकी नींद और ऊर्जा दोनों को प्रभावित किया है।

सामाजिक जीवन पर प्रभाव

जो फोन हमें दुनिया से जोड़ता है, वही कई बार हमें अपने आसपास के लोगों से दूर भी कर देता है। परिवार या दोस्तों के साथ बैठकर भी व्यक्ति बार-बार फोन देखने लगता है। बातचीत अधूरी रह जाती है और सामने वाले को अनदेखा किए जाने की भावना पैदा होती है। समय के साथ रिश्तों में गहराई कम होने लगती है और अकेलेपन की अनुभूति बढ़ती है।

भारत में इसके वास्तविक उदाहरण सामने आने लगे हैं। एक महानगर की कॉलेज छात्रा का मामला अक्सर उद्धृत किया जाता है, जहाँ स्मार्टफोन खराब हो जाने के बाद वह गहरी बेचैनी और उदासी में चली गई। नया फोन तुरंत न मिल पाने पर उसकी दिनचर्या बिगड़ गई, पढ़ाई में मन नहीं लगा और अंततः उसे काउंसलिंग की जरूरत पड़ी। यह घटना दिखाती है कि फोन कई युवाओं के लिए केवल साधन नहीं, बल्कि भावनात्मक सहारा बन चुका है।

इसी तरह, शैक्षणिक स्तर पर भी इस समस्या की पहचान होने लगी है। भारत की एक विश्वविद्यालय में मनोविज्ञान विभाग द्वारा नोमोफोबिया को मापने के लिए विशेष परीक्षण विकसित किए गए, ताकि बच्चों और युवाओं में समय रहते फोन-निर्भरता को समझा जा सके और सही मार्गदर्शन दिया जा सके। यह स्पष्ट करता है कि यह समस्या अब केवल व्यक्तिगत नहीं, बल्कि सामाजिक स्तर पर देखी जा रही है।

समाधान की राह

नोमोफोबिया से निपटना कठिन नहीं है, बस जागरूकता और छोटे-छोटे बदलावों की जरूरत है। दिन में कुछ समय फोन से दूरी बनाना, भोजन और पढ़ाई के दौरान फोन अलग रखना, और अनावश्यक नोटिफिकेशन बंद करना सरल लेकिन प्रभावी उपाय हैं। खेल, योग, पढ़ना और दोस्तों से आमने-सामने बातचीत जैसी गतिविधियाँ दिमाग और शरीर दोनों को संतुलन देती हैं। यदि फोन न होने पर घबराहट बहुत अधिक हो, तो मनोवैज्ञानिक से बात करना भी एक सकारात्मक और समझदारी भरा कदम हो सकता है।

अंततः, नोमोफोबिया आधुनिक भारत की एक वास्तविक चुनौती है, खासकर युवाओं के लिए। तकनीक हमारे जीवन को आसान बनाने के लिए है, न कि हमें नियंत्रित करने के लिए। जब हम फोन का उपयोग समझदारी से करना सीख लेते हैं, तभी हम अपने समय, रिश्तों और मानसिक शांति को वास्तव में बचा पाते हैं।

(लेखिका डेंटल सर्जन व दिल्ली स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स से पीएचडी हैं और सामाजिक कार्यों में सक्रिय हैं।)

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