– डॉ. मोहन भागवत

विद्या भारती एक शैक्षिक संगठन है जो एक निश्चित विचार के अनुसार विद्यालय संचालित करता है। शिक्षा के माध्यम से हम एक बहुत बड़े कार्य के अनुष्ठान में सहयोग कर रहे हैं। इस बड़े कार्य को अलग-अलग समय पर अलग-अलग ढंग से किया जाता है। इस बडे़ कार्य को एक नाम दिया गया है ‘राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ’। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्य के विषय में समयानुसार अपेक्षा और धारणाएँ बदलती रही हैं। कभी संघ हिन्दू राष्ट्र को स्वतंत्र कराने का संगठन था। स्वतंत्रता के बाद संघ राष्ट्र की सर्वांगीण प्रगति का साधन बना। इन्हीं अपेक्षाओं के कारण संघ में प्रचलित शब्दों एवं गतिविधियों में परिवर्तन हुआ। इससे पहले संघ का कार्य शाखा चलाना मात्र था। संघ स्थान पर दंड, नियुद्ध आदि का अभ्यास होता है। पहले शिकायत थी कि संघ सभी स्थानों एवं गतिविधियों में क्यों है? पूज्य सरसंघचालक जी जनजाति समाज में प्रवास करते हैं, वहाँ के बन्धुओं से आत्मीयता स्थापित करते हैं। इस कार्यक्रम का चर्च के बंधु विरोध करते हैं। यह संघ का बढ़ता हुआ प्रभाव ही माना जाएगा। संघ के बारे में समाज में यह परिवर्तन हुआ है कि सभी सामाजिक सरोकारों में संघ को देखना चाहते हैं। पहले शाखा चलेगी तो अन्य सब स्वतः ही हो जाएगा। आज शाखा के साथ-साथ सेवा बस्तियों में कार्य करना होगा। पंच परिवर्तन के प्रयास भी करना चाहिए। यह सभी कार्य करते हुए संघ विश्व को सम्यक् दिशा दिखाने का कार्य भी करता है। कार्य की शक्ति जैसे-जैसे बढ़ती है वैसे-वैसे हमारी सोच और कार्यविधि में परिवर्तन होता है।
दत्तोपंत ठेंगड़ी जी इस विकास यात्रा को प्रोग्रेसिव अनफोल्ड कहते हैं। कभी-कभी लोगों को यह भ्रम भी होने लगता है कि संघ ने कोई नया विचार अपना लिया है। संघ की स्थापना के पाँच वर्ष पूर्ण होने पर एक संयोग बना। नागपुर में कांग्रेस का अधिवेशन था। व्यवस्था सम्बन्धी दायित्व डॉ. हेडगेवार का था। गांधी जी इस अधिवेशन के अध्यक्ष थे। डॉ. हेडगेवार जी ने विषय नियामक समिति को प्रस्ताव में दो विषय दिए – प्रथम, गौ हत्या का सम्पूर्ण निषेध और दूसरा, भारत के लिए स्वतंत्रता को सम्पूर्ण रूप से प्राप्त करने का लक्ष्य। कांग्रेस इन दोनों विषयों पर घोषणा नहीं कर सकती थी। उस समय कांग्रेस में एक गरम दल था जिसमें अधिकांश अपनी सोच पर तीव्र गति से कार्य करने वाले जवान थे। दूसरा नरम दल था, जिसमें सभी वरिष्ठ नेता थे जो धीरे-धीरे चलने वाले थे। डॉ. हेडगेवार गरम दल के सदस्य थे। आज हम जिस भारत की बात करते हैं वह डॉ. हेडगेवार के विचार का है।
विश्व में परिवर्तन होना चाहिए, यह समय की आवश्यकता है। परिवर्तन की दिशा की रेखा सम्यक् होनी चाहिए। यह परिवर्तन सभी के लिए ठीक होना चाहिए। परिवर्तन समयानुकूल है तथा सर्वजनहिताय है तो स्वीकार्य होना चाहिए। हमारी आयु-सीमा बहुत छोटी है और संसार-चक्र बहुत बड़ा है। मेरा छोटा जीवन बिना कुछ करे सामान्य रूप से कट जाएगा, यह मानकर जियें तो जीवन निरर्थक है। हमारा जन्म भौतिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए नहीं है। जन्म के साथ मृत्यु तय है तो फिर मृत्यु को मंगल बनाने के लिए मंगल कार्य करना चाहिए। अमरता भी अभिशाप है क्योंकि मन को परिवर्तन पसन्द है और अमरता जड़ता लाती है। यह परिवर्तन आवश्यक है किन्तु यह परिवर्तन विवेकपूर्ण हो। प्रकृति के परिवर्तन सार्वभौमिक है, हमें उन्हें स्वीकार करना चाहिए। समय के अनुसार परिवर्तन को स्वीकार्य बनाने के लिए सज्जन शक्ति को सक्रिय रहना चाहिए।
संसार के सभी जीव अपने अनुकूल वातावरण में रहने का प्रबंध करते हैं। अधिकांश जीव परिवेश के अनुकूल वातावरण बनाते हैं क्योंकि वे परिवेश को अपने अनुकूल नहीं बना सकते। हमने अपने को जंगलों में रहने के अनुकूल बना लिया है किन्तु जंगली जानवर जंगल के अलावा अन्य वातावरण में रहने के अनुकूल नहीं बना सकते, इसलिए लुप्त हो जाते हैं। परिवेश को प्रभावित करने की बुद्धि और कुबुद्धि मानव के पास है। मानव अपनी सद्बुद्धि से परिवर्तन को सकारात्मक बनाने में सक्षम है। इसका खतरा यह है कि मानव की संख्या बढ़ती जा रही है। इस खतरे के कारण पर्यावरणीय संतुलन बिगड़ा है।
आज तकनीकी बढ़ी है लेकिन क्या नीति भी बढ़ी है? क्या मानवता भी बढ़ी है? क्या सभ्य मानव उदार भी है? विकास संस्कृति और सुविचार पर आधारित होना चाहिए। गत दो हजार वर्षों में हमारा विकास संस्कृति से विरत होकर किया गया, जिसके कारण हमें सुख के बदले में दुःख ही मिलता है। सुख लाने के पीछे जड़वादी और सूक्ष्मवादी विचारों का समावेश भारतीय दर्शन में प्राचीन काल में हुआ है। इस समावेशी प्रक्रिया में सच्चा सुख मिलने का सार था। इस प्रक्रिया में मनुष्य, प्रकृति, सृष्टि सभी संतुष्ट थे, कलह नहीं था। शरीर, मन और बुद्धि तृप्ति के साथ आत्मा की दिशा की ओर अग्रसर थे। मानव सम्पन्न कितना था, पता नहीं किन्तु सुखी पूर्णरूपेण था।
आज हमें युगानुकूल परिवर्तन की दिशा को ठीक करना होगा। परिवर्तन की दिशा को ठीक करने का कार्य हमें ही करना होगा। भारत वर्ष को करना होगा। आधुनिक विज्ञान और तकनीक में जो ठीक है उसे स्वीकार करके आगे बढ़ना होगा। जो भी गलत है उसे छोड़ना ही श्रेयस्कर है। समग्र एकात्म सम्पूर्ण धारणा जिनके पास है वे भारतीय हैं। हम यह समझते हैं कि अस्तित्व अलग और विविध है। वास्तव में वह अलग नहीं है अपितु विविध है यह विविधता एकात्मता का ही एक हिस्सा है। यह सृष्टि एक से अनेक होने का परिणाम है। ‘‘एकोऽहम् बहुस्याम’’। यह विविधता सदैव अपूर्ण रहती है क्योंकि अपूर्ण होने पर ही किसी अन्य की आवश्यकता होती है। पूर्ण होने पर किसी की आवश्यकता रहती ही नहीं है। विविधता में रहेंगे तो अपूर्णता रहेगी, दुख रहेगा। मूल की एकता में ही शाश्वत सुख मिलता है। इस सत्य के साक्षात्कार के आधार पर हमारे राष्ट्र कर जीवन खड़ा होगा। इस दुनिया में जो कुछ भी दिखाई देता है, वह मेरा अपना है, सब में मैं हूँ। मुझ में सब है। शाश्वत सुख पाने का यह मार्ग सम्पूर्ण जगत् को दिखाना होगा। यह कार्य एक दो व्यक्ति नहीं अपितु सम्पूर्ण समाज को करना होगा। विश्व कल्याण के लिए सभी शक्तियों को अर्जित करना होगा और उनका विनियोग विश्व कल्याण के लिए करना होगा। प्राचीन काल से ही समय-समय पर इस सनातन सत्य से हमने संसार को अवगत कराया है। आज विश्व में जो परिवर्तन आया है उसके गम्भीर परिणाम हमारे सामने हैं। विगत दो हजार वर्षों में परिवर्तन को ठीक करने के लिए जो भी प्रयोग किए गए हैं वे सभी असफल सिद्ध हुए हैं। अब अधिकांश देशों को भारत से ही आशा है कि कोई समाधान का मार्ग प्रशस्त होगा। इस अपेक्षा को पूर्ण करने के लिए हमें तैयार रहना होगा। भारतवर्ष को पूर्णतः सम्पन्न बनाना होगा। सर्व प्रथम हमें युगानूकुल परिवर्तन को समुचित बनना होगा। परिवर्तन सबसे पहले भारतवर्ष में हो। भारत विश्व की परिवर्तन सम्बन्धी अधूरी धारणा को पूर्ण बनाकर अनुकरणीय बनायें। अपनी प्रकृति के अनुसार सर्व गुण सम्पन्न होना होगा। सर्व प्रथम भारत के समाज में परिवर्तन लाना होगा। समाज में परिवर्तन, व्यक्ति में परिवर्तन लाने से होगा इसलिए हमारा प्रमुख कार्य व्यक्ति निर्माण ही है। आज संघ केवल शाखाओं तक सीमित नहीं है अपितु जीवन के हर क्षेत्र में हम हैं। वहाँ केवल हमारी उपस्थिति मात्र नहीं है। वहाँ हमारी भूमिका सर्वस्वीकृत है।
अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर साधन एवं संशाधन के आधार पर संयुक्त राष्ट्र की ओर से प्रगतिशील का दर्जा प्रदान किया जाता है। किसी अन्य व्यक्ति ने विद्या भारती के लिए आवेदन किया है। इस सर्वेक्षण के आधार पर विद्या भारती को सौ करोड़ लोगों को प्रभावित करने वाला संगठन घोषित किया गया है। ऐसी संस्थाओं को ‘बिलियन लाइफ क्लब’ कहा जाता है। हमें अपनी जगह का अनुभव नहीं होता क्योंकि हम केवल प्रतिष्ठा और पहचान के लिए कार्य नहीं करते हैं। विश्व यह भलीभाँति जानता है कि हमारे स्वयंसेवक का जीवन हर क्षेत्र में व्यक्ति निर्माण के माध्यम से समाज परिवर्तन का कार्य करना चाहते हैं।
हमारे यहाँ चार युग कहे गए हैं- सतयुग, त्रेतायुग, द्वापर, कलियुग। कलयुग में धर्म की क्षीणता चरम पर है। धर्म का केवल एक ही पैर बचा है, सत्य। शुचिता चली गई, करुणा रही नहीं और हम तपस मुक्त हो गए हैं। हमारे समाज में कैसे भी पैसा प्राप्त करने के लिए खतरनाक होड़ लगी है। इस धनेष्णा को बढ़ाने के लिए उपाय भी प्रकट हो रहा है। इसी को हम धर्म मान रहे हैं। 1995 में विश्व व्यापार संगठन विकास का यह मॉडल घोषित किया कि किसी भी प्रकार हो विकास होना चाहिए। आर्थिक सत्ता एक होकर विश्व के सम्पन्न देशों के हाथों में रहेगी। अपनी संस्कृति को छोड़कर, भले बुरे का विचार त्यागकर कैसे सम्पन्नता आए यह मार्ग अपनाना चाहिए। एक अर्थशास्त्री ने विचार रख दिया कि भले बुरे का कोई अर्थ नहीं है। जिससे हमारा फायदा हो वह सही है भले ही इससे दूसरों का अहित क्यों न हो। यही वर्तमान कलि का प्रभाव है। हमारे पड़ोसी देश जिनका अस्तित्व हमारे बिना नहीं है, वे भी झूठ का शिष्टाचार बना लेते हैं। बंगलादेश मानता है कि भारत के बिना हमारा गुजारा नहीं है। फिर भी बंगलादेश में निर्दोष हिन्दुओं के साथ अत्याचार होता है। मानव के विचार, बद्धि, मत कितने अपवित्र हो गए हैं? करुणा समाप्त हो गई है और युद्ध हो रहे हैं। यह विनाशकारी परिदृष्य आज विश्व स्तर पर हमें दिखाई दे रहा है।

चीन अकारण हमारी सीमाओं में प्रवेश करता है, संयुक्त राष्ट्र संघ में हमारा विरोध करता है। पाकिस्तान अभी कश्मीर से लेकर गलत बयानबाजी करता है। ऐसे अनेक अनैतिक विषयों का अभद्र लोग समर्थन करते हैं। आज नैतिकता और शुचिता इतिहास के विषय बन गए हैं। हमारा सनातन ही चिर सत्य और सुखदायी है। ऐसा धर्म जिसके कारण सृष्टि युगों-युगों तक गतिशील है। आज इस सनातन धर्म के चार पैरों में से एक मात्र पैर बचा है वह है सत्य। यह सत्य भारत के पास है। भारत में अभी भी करोड़ों लोग एकत्रित होते हैं, अनुशासन में रहते हैं। सभी सत्य के सहारे बड़े-बड़े अनुष्ठान पूर्ण कर लेते हैं। प्रयागराज का महाकुम्भ हमारे सनातन सत्य की प्रतिष्ठा का प्रतीक है। महाकुम्भ के आयोजन के शोधपरक अध्ययनों से ज्ञात होता है कि सत्य भारत में अभी सारपूर्ण है। उसी सत्य पर भारत चल रहा है। सत्य के आधार पर अन्य तीन पैरों का सृजन कर लेगा। इसी सत्य के आधार पर हमें परिवर्तन की दिशा तय करनी है। हमें ‘मैक्सिमम गुड ऑफ द मैक्सिम पीपल’ के स्थान पर ‘सर्वे भवन्तु सुखिनः’के आधार पर कार्य करना होगा। भारत का परम वैभव शेष सभी राष्ट्रों के लिए भी कल्याणकारी सिद्ध होगा। हम अपनी बल, बुद्धि, अहंकार बढ़ाने के लिए नहीं करेंगे। हमारा संगठन चाहता है कि हमारी उन्नति से सभी की उन्नति होनी चाहिए। सभी क्रियाकलापों का आयोजन सत्य के आधार पर विश्व-निर्माण और सृष्टि का निर्माण होगा। परम वैभव सम्पन्न भारतवर्ष की कल्पना ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ पर आधारित होगी। यही युगानुकूल परिवर्तन है। वर्तमान में हम सभी को एकात्म मानववाद का अध्ययन एवं अनुकरण करना चाहिए।
युगानुकूल परिवर्तन के सृजन का कार्य भारतवर्ष ही कर सकता है। प्रत्येक अच्छे कार्य को करने में हमें कुछ प्रतिकूलताओं का सामना करना पड़ता ही है। जो भारतीय अस्मिता के स्थायी और घोषित विरोधी हैं वे अपना ज्ञान हमारे सम्यक् ज्ञान को उल्टा बताने में ही अपनी शक्ति लगाते हैं। सत्य तो निर्विवाद होता है। वस्तुतः स्वार्थ वश कुछ लोग सत्य का विरोध करते हैं। हम सभी को साथ लेकर सन्मार्ग पर चलेंगे। सभी को साथ लेते समय ‘बैनर्स’ का झगड़ा होता है। हम इस झगड़े से बचेंगे। कार्य ठीक दिशा में हो, यह उद्देश्य होना चाहिए।
समाज को साथ लेने का दूसरा अंग है जमीनी स्तर पर कार्य करना। अधिक कार्य, ऊपर के लोग नहीं, जमीन से जुड़े लोग करते हैं। संघ के सभी कार्य, समाज के सहयोग से समाज के लिए हो रहे हैं। सज्जन शक्ति के जागरण में हम सभी की भूमिका है। संघ शताब्दी वर्ष में हमने विस्तार, विमर्श, सज्जन शक्ति का जागरण और पंच परिवर्तन इन तीन विषयों पर कार्य करने का निश्चय किया है। हमें समाज का विमर्श बदलना है, समाज की बुद्धि को बदलना है। प्रबोधन से परिवर्तन लाना हमारा कार्य है। सभी लिए पाँच परिवर्तन वाले कार्यक्रम हों। गत वर्षों में अधूरे विमर्शों के मायाजाल में हमारा समाज पूरी तरह फँसा हुआ है। दूसरों का विनाश होगा तो हमारा फायदा होगा यह भयानक सोच विनाशक है। इस सोच को बदलने का कार्य सनातन से होगा।
श्री राजीव मल्होत्रा जी ‘Who is Raising Your Children’ नामक पुस्तक में समाज की वर्तमान चुनौतियों की ओर सटीक संकेत किए गए हैं और माता-पिता तथा समाज को छात्रों के प्रति कैसा व्यवहार करना चाहिए, इसके मनोवैज्ञानिक प्रयोग बताए गए हैं। यह पुस्तक यह भी सिद्ध करती है कि वर्तमान जीवन में अधिकांश लोग भ्रमजाल के पाश में फँसे हैं तथा जो भी वे कर रहे हैं इन्द्रियों की तुष्टि के लिए कर रहे हैं। सत्य, शुचिता तथा तपस युक्त जीवन को नष्ट करने वाली शिक्षा दी जा रही है। इस कार्य के लिए विश्वस्तर पर षड्यंत्रकारी सक्रिय हैं। पुस्तक के प्रारम्भ में अघासुर की कथा है। वृन्दावन के ग्वालाओं में भगवान् श्रीकृष्ण भी थे। अघासुर राक्षस ने आठ मील लम्बे सर्प का रूप धारण कर लिया। वह पर्वत के जबड़े फाड़कर बैठा था। उसकी आकृति एक गुफा के समान लग रही थी। सर्प की माया के कारण बालकों को उसके जबड़ों में सुन्दर उपवन एवं पक्षी आदि दिखाई दे रहे थे। श्रीकृष्ण ने इन छद्म आकर्षणों का रहस्य जान लिया और अघासुर का बड़ी चतुराई से वध कर दिया। ठीक इसी प्रकार आज विभिन्न मिथ्या आकर्षणों का अघासुर बैठा हुआ है और हम सभी जाने-अजाने में इसमें फँसे हुए हैं। माया के इस प्रपंच को हमें विच्छिन्न करना होगा। इस कार्य की भूमिका घर नाम की संस्था के आधार पर होती है, समाज और शिक्षा के प्रबोधन की होती है। इसलिए विमर्श बदलने में, लोगों का सत्य का दर्शन कराने में, युगानुकूल परिवर्तन को सही आधारपूर्ण दिशा देने में, हमारी भूमिका महत्त्वपूर्ण है। हमारी दृष्टि में शिक्षा क्षेत्र में कार्य करने वाले लोगों की भूमिका प्रमुख है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति में हमारी उद्देशिकाओं का समायोजन है। ‘इस नीति से ‘रिओरिएन्ट्टेशन होगा। अभी कलियुग की केवल 5126 वर्ष ही व्ययतीत हुए हैं। अभी यात्रा काफी लम्बी है। भारत को खड़ा करने का पुनीत कार्य हम सभी को पूर्ण मनोयोग से कार्य करना है।
(विद्या भारती अखिल भारतीय शिक्षा संस्थान के पूर्णकालिक कार्यकर्ता अभ्यास वर्ग, भोपाल में परम पूज्य सरसंघचालक जी के मार्गदर्शन आधारित व्याख्यान प्रस्तुति श्री किशनवीर जी शाक्य)
और पढ़ें : भारतीय शिक्षा ग्रंथमाला के लोकार्पण अवसर पर माननीय डॉ मोहन भागवत जी के उद्बोधन के संपादित अंश