दादा जी का चमत्कार       

           – गोपाल माहेश्वरी

स्मृति इन दिनों दसवीं बोर्ड की परीक्षा के लिए खूब परिश्रमपूर्वक पढ़ रही थी। उसने ठान लिया था कि इस बार उसे प्रावीण्य सूची में आना ही है, इसलिए अति आवश्यक कामों को छोड़कर वह पूरे समय अपनी पाठ्य-पुस्तकों में खोई रहती थी। पिताजी और माॅं दोनों ही उसे समझा चुके थे कि अति हर बात की बुरी होती है। इसलिए पढ़ाई से थोडा़ समय निकालकर कुछ योग-व्यायाम, खेलकूद भी कर लिया करो। लेकिन स्मृति को तो जैसे पुस्तकों की एक-एक पंक्ति रट लेने का भूत सवार था। कभी कभी वह बहुत निराश-सी होकर सिर पकड़े उदासी में डूब जाती। माॅं उसे ऐसे देखकर चिंतित हो उठती। रात को दो बजे हों या सुबह चार बजे का समय हो माॅं की नींद जब भी खुलती स्मृति या तो हाथों मैं पुस्तक लिए कमरे में चक्कर लगा रही होती या खुली पुस्तक पर सिर टिकाए अनजाने में ही सोई मिलती। माॅं उसे बिस्तर पर लेटाने या शाॅल ओढ़ाने का प्रयत्न करती तो वह चौंक कर जागती। कभी नहीं जाग पाती तो उठते ही माॅं पर खीज निकालती “मुझे ओढ़ाया क्यों? नींद लग गई न मेरी, मुझे पढ़ना था।”

माॅं समझातीं “स्मृति इस तरह तो तुम बीमार होकर रहोगी। परीक्षा-वरीक्षा सब धरी रह जाएगी।” लेकिन यह समझाइश बेकार ही जाती। जब कभी वह थोड़ा सोती तब भी कई बार नींद में पाठ्यक्रम की ही गड्डमड्ड सी बातें ही बड़बड़ाती रहती। जबसे पिताजी ने यह देखा वे बहुत चिंतित थे। इस तरह तो यह लड़की पागल हो जाएगी या गंभीर रूप से बीमार। लेकिन स्मृति को रोकना कठिन था फिर कोई माता पिता अपनी बेटी को पढ़ने से कैसे रोके?यह बुद्धि संकट भी था।

किसी के सुझाव पर एक दिन परिवार ने एक स्थानीय पर्यटन स्थल पर जाने का कार्यक्रम बनाया लेकिन स्मृति ने जाने से मनाकर दिया। माॅं ने बताया कि स्मृति पिछले माह अपनी मौसी के बेटे के विवाह में भी नहीं गई थी और पिछले सप्ताह अपनी सहेली सरिता के जन्मदिन पर भी नहीं।

चिंतित पिता ने अपने पिता से एक दिन यह बताया। गाॅंव में रहने वाले स्मृति के दादाजी वैद्य थे और संगीतमय भागवत कथा भी कहते थे। बेटे से स्मृति की स्थिति समझकर उन्होंने बेटे के पास शहर आने का निर्णय किया। माॅं ने जब स्मृति को सूचना दी तो यह नहीं बताया कि दादाजी आ रहे हैं उसे बताया कि गाॅंव से कोई मेहमान आ रहे हैं।

स्मृति भड़क उठी “परीक्षा के दिनों में कोई अपने घर मेहमान बुलाता है क्या?”

माॅं ने मुस्कुराते हुए कहा “अब वे तो शाम तक आ ही रहे हैं।” स्मृति पैर पटकते हुए माॅं को अपने कमरे से धकेलते हुए बाहर करना चाहा।

माॅं की हॅंसी फूट पड़ी “जाती हूॅं बाहर पर उनका बिस्तर तो इसी कमरे में लगाना होगा न? जरा किताबें जमा लो मैं कमरा ठीक-ठाक कर दूॅं।”

“क्या?? वे रुकेंगे भी इसी कमरे में? आपकी मुझसे कोई दुश्मनी तो नहीं है फिर ऐसा क्यों?” स्मृति का पारा सातवें आसमान पर पहुॅंच गया था।

माॅं के मुख पर आज एक विचित्र समाधान झलक रहा था। एक तो खीजने के बहाने ही सही स्मृति की गंभीरता का मानसिक आवरण टूटा था दूसरे उसे पूरा विश्वास था कि श्वसुर जी स्मृति समस्या सुलझाने में बहुत सफल होंगे ही।

स्मृति बुरी तरह चिढ़ चुकी थी। उसने भी अपना ब्रह्मास्त्र चलाया। तुरन्त गाॅंव  पर दादाजी को फोन लगा दिया, वे परिवार के सर्वोच्च न्यायाधीश जो थे।

“दादाजी! जय श्रीराम! मैं यहाॅं बहुत परेशान हूॅं, मेरी न पिताजी सुनते हैं न माॅं। कभी घूमने जाना है तो कभी शादी पार्टी में।आज तो मेरी पढ़ाई में विघ्न डालने मेहमान भी बुलाए जा रहे हैं। दादाजी!आप सुन रहे हैं न?”

“हाॅं सुन रहा हूॅं सुन रहा हूॅं” उधर से दादाजी की आवाज आई। “तो अब मैं क्या करूॅं?” स्मृति सचमुच परेशान थी। दादाजी ने कहा”यहाॅं गाॅंव आ जाओ। छुट्टियाॅं तो हैं हीं तुम्हारी।”

“ओफ्फो! दादा जी आप भी क्या कह रहे है? अगले महिने परीक्षा है मेरी। अभी मेरी पढ़ाई के लिए छुट्टी है प्रिपरेशन लिव, न कि गर्मी की छुट्टी। इतनी किताबें कापियाॅं लेकर गाॅव कैसे आ जाऊॅं?”

“चलो फिर मैं ही आता हूॅं। ठीक है? पर घर में मेहमान आ रहे हैं ओ मैं कहाॅं रुकूॅंगा?” “मेरा कमरा है न? आप हमेशा वहीं रुकते तो हो फिर कोई और रुककर डिस्टर्ब करे उससे आपका रुकना मेरे लिए बहुत अच्छा होगा।आप जल्दी से जल्दी आ जाइए।”

माॅं दूध का गिलास लिए स्मृति के कमरे में आई तो स्मृति को कमरा व्यवस्थित करते देख चकित थी। उसके मुख पर अभी तनाव था न आक्रोश। उसने चुपचाप गिलास लिया और फूॅंक-फूॅंक पीने लगी। वह एक विजयी रहस्यभरी मुस्कान के साथ बोली “माॅं, आपके मेहमान अब यहाॅं नहीं रुकेंगे। यहाॅं मेरे दादाजी आ रहे हैं। “स्मृति को लगा माॅं चौंकेगी। लेकिन आलमारी के दर्पण में माॅं-बेटी के मुखपर एक जैसे भावभरी मुस्कान थी जिसका रहस्य स्मृति के लिए अधिक गहरा था।

शाम को दादाजी आए माता-पिता के साथ दौड़कर उनका स्वागत किया माता-पिता ने चरणस्पर्श किए, स्मृति भी पैर छूनेलगी तो दादाजी ने बीच में ही थामकर अपने से चिपका लिया “अरे कन्या से पैर छुआ कर मुझे नर्क में जाना है क्या? “एक जोरदार आत्मीयता भरी मुक्त हॅंसी के साथ दादाजी ने घर में प्रवेश किया।

रात को दस बजे दादा जी बोले “बिटिया हम बाहर जाकर सो रहे हैं यहाॅं तो रातभर बत्ती जलेगी हम सो न पाऍंगे।”

स्मृति एक पल सोच में पड़ी फिर बोली “नहीं आप कहीं न जाऍंगे।” उसे डर था दादा जी ने जगह खाली की तो जाने कोई और मेहमान न आ धमके यहाॅं? और पिछले कई दिनों से रात-रात भर जलने वाली ट्यूबलाइट को आज आराम मिला। आज स्मृति भी गहरी नींद सोई।

सुबह छः बजे दादा जी बोले “बिटिया! थोड़ा घूम आऍं।” स्मृति ने किताबों की ओर देखा फिर एक अज्ञात से सम्मोहन में बॅंधी दादा जी के साथ चल पड़ी। दादा जी रह में अनेक वनस्पतियों का परिचय कराते बगीचे के अंदर स्थित देवालय में जा पहुॅंचे। सुबह की स्वच्छ वायु से स्मृति तरोताजा अनुभव कर रही थी।

देवालय में आशनेक प्रतिमाऍं थीं। महर्षि वेदव्यास की भी  प्रतिमा लगी थी। दादा जी बोले “व्यास जी को विशाल बुद्धि कहा जाता है? वेदों के विभागकर्ता, अठारह पुराणों के, महाभारत के रचयिता, स्मृति ग्रन्थ के रचनाकार वेदव्यास जैसा विलक्षण ज्ञानी ,मेधावी भला संसार मैं कौन होगा? लाखों श्लोक रचे जिनमें संसार के लगभग समस्त विषय समाहित हुए।” दादा जी ने देखा स्मृति कुछ सोच रही है। दूसरी और लवकुश को पढ़ाते महर्षि वाल्मीकि की प्रतिमा थी।

दादाजी बोले “अहो! कितने विलक्षण गुरु-शिष्य हुए हैं ये। चौबीस हजार श्लोकों की रामायण इन किशोर बालकों लवकुश ने न केवल कंठस्थ कर ली थी बल्कि राम दरबार में बिना भूले गाकर सुना भी दी।” स्मृति का आश्चर्य और गहरा गया। अंदर के कक्ष में कृष्ण-बलराम व सुदामा को पढ़ाते महर्षि सांदीपनि विराजमान थे। दादा जी बोले “केवल चौदह दिन में चौदह विद्याऍं और समस्त कलाऍं सीखनेवाले  विलक्षण विद्यार्थी श्रीकृष्ण हैं ये।”

वे मंदिर से निकल कर बाहर एक विशाल पीपल के चबूतरे  बैठ गए। स्मृति ने कहना आरंभ किया “मैं तो कितना भी रट्टा मारूॅं। एक प्रश्न का उत्तर याद करूॅं तो दूसरा भूल जाती हूॅं। कभी-कभी लगता है कि दिमाग की पटरी पर कई ट्रेनें एक साथ दौड़ रही हैं और मैं एक से दूसरी पर कूदती डिब्बे बदल रही हूॅं। उन पर सवार हूॅं पर कहाॅं जा रही हूॅं पता नहीं। न ट्रेनें रुकती हैं न मैं कहीं पहुॅंचती हूॅं।”

“देखो बिटिया! तुम्हारी समस्या कुछ अलग है। तुम्हारी स्मरणक्षमता अच्छी है पर याद करने का तरीका ठीक नहीं। केवल रटना समस्याका हल ही नहीं है। विषय समझो, रटो मत। हम सैकड़ों किलो अनाज अब तक खा चुके होंगे पर एक दिन में नहीं, धीरे-धीरे पचाते हुए। एक दिन में इसका सौवां, हजारवां भाग भी खा लें तो बीमार हो जाऍं।”

“फिर भी दादा जी! अच्छे अंक लाना है तो पढ़ना ही पड़ता है परीक्षा सिर पर है।” स्मृति की चिता स्वाभाविक थी।

“परीक्षा है इसीलिए पढ़ना है तो तनाव बढ़ेगा ही, पढ़ना पड़ता है यह विवशता है और विवशता हमेशा बोझिल ही होती है क्योंकि काम शरीर का हो या बुद्धि का मन साथ न दे तो कई गुना कठिन हो जाता है।”

“फिर कैसे करें?” स्मृति ने चिंतित होकर पूछा तो दादाजी बोले “जैसे लवकुश ने श्रीकृष्ण ने या वेदव्यास ने किया। देखा नहीं उनके मुख पर कैसी शांति, कैसा आनंद, होठों पर मुस्कराहट थी। अरे मनचाहा कुछ मिले तो आनंद होता है यह आनंद ही अमरत्व है विद्या अमृत है तो विद्या प्राप्ति आनंद देने वाली ही होगी। जिसे पाते हुए ही आनंद नष्ट होकर तनाव होता हो तो उसे पाकर आनंद कैसे मिलेगा?”

दादा जी ने बगीचे के बाहर एक फल वाले से ताजे अमरूद खरीदे और एक स्मृति को दिया दूसरा आप खाने लगे। स्मृति का अमरूद थोड़ा कम पका था दादा जी का पूरा पका नरम-सा। उन्होंने हथेली से दबाया और टुकड़ा कर खाने लगे। स्मृति ने दाॅंतों से काटने की कोशिश की उसके मसूड़े छिल गए। दादा जी ने कहा कच्चा है तब तक कठोर है उसे थोड़ा थोड़ा कुतरो पका होने पर अधिक भी एक साथ खा सकते हैं। ऐसा ही पढ़ाई में भी है। है न?”

स्मृति ने स्वीकार सूचक सिर हिलाया फिर बोली “आप जिनकी बात कर रहे हैं वे कृष्ण जी भगवान थे व्यास जी महान ऋषि और लव-कुश भगवान राम के बेटे, उनसे हमारी क्या तुलना?”

“वे भगवान हों, ऋषि-मुनि या देवपुत्र लेकिन इसी भारत में जन्मे मानव थे।हम उनकी ही परंपरा में जन्मीं भारत संतानें हैं। उतना भी कर सकते हैं उतना नहीं तो अपनी आवश्यकता जितना तो कर ही सकते हैं। बस उस पद्धति को याद रखना होगा।”

“और क्या पद्धति है वह?”अमरूद कुतरते हुए स्मृति उसके मीठे गूदे तक पहुॅंच चुकी थी, अब अमरूद आनंद दे रहा था।

“इस सबने किताबी कीड़ा बनकर अध्ययन नहीं किया।

आहार-विहार, योग, कला, प्रकृति का सान्निध्य, गुरुओं से मन लगाकर सीखकर, सीखा हुआ दुहराकर, साथियों से चर्चा कर उसे मांझकर, क्रिया करके, अनुभव करके वे यह सब आनंदपूर्वक कर सके, हम भी कर सकते हैं।”

स्मृति ने पूछा” यह सतयुग,त्रेता और द्वापर की बातें आज संभव हैं क्या?”

“तब से आज तक मनुष्य होना संभव है तो वैसा कर पाना भी संभव है। अभी पिछले दिनों बालक चाणक्य के बारे में सुना नहीं था, और अभी अभी वेदों का कठिन दण्डक्रम पारायण करने वाला युवा देवव्रत रेखे, इसी युग के हैं न। श्रीनिवास रामानुजम्, विवेकानंद, शंकराचार्य ऐसे अनेक विलक्षण मेधावी इसी युग में हुए हैं। हम महापुरुषों को चित्र और मूर्ति बनाकर स्थापित कर देते हैं लेकिन ऐसा करने का उद्देश्य भूल जाते हैं, उनके जैसे बनने का प्रयास करना, प्रेरित होना। सामान्य लोग और महापुरुष के बीच न लांघी जाने वाली काल्पनिक रेखा हमने ही बना ली है अन्यथा असंभव कुछ नहीं।”

वे घर की ओर चल दिए। सायं भोजन करते हुए बोले अभी रात्रि की बस से गाॅंव लौटना होगा। स्मृति से मिलना था लगता है उसमें थोड़ा मिला हूॅं। स्मृति मुस्कुरा दी। माता-पिता को कुछ कहना ही न पड़ा। स्मृति ने पूछा “माॅं!आपके मेहमान?

“वे नहीं आऍंगे। “माॅं मुस्कुरा दी। पिताजी हॅंसे “वे दादाजी…”

“मुझे पता चल गया है पिताजी! आखिर आपकी ही बेटी हूॅं। वे दादाजी ही थे।” सबका सम्मिलित ठहाका गूॅंज उठा।

स्मृति अब भी खूब पढ़ती है पर समय पर सोती है, जल्दी उठती है, समय पर भोजन सुबह घूमना और योगाभ्यास भी उसकी दिनचर्या में सम्मिलित है। माॅं प्रसन्न थी जब उसे हॅंसते ठहाके लगाते फोन सहेलियों से पढ़ाई की बातें करते सुना। स्मृति की पढ़ाई अब एक आनंद उत्सव में बदल चुकी थी।

(लेखक इंदौर से प्रकाशित ‘देवपुत्र’ बाल मासिक पत्रिका के संपादक है।)

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