– गोपाल माहेश्वरी

अगले सप्ताह वार्षिक परीक्षाऍं आरंभ होने वाली थीं इसलिए मधुकर दिन रात पढ़ाई में जुटा हुआ था।
सायं के छ: बजने वाले थे। प्रतिदिन की भांति संदीप जी की आवाज सुनाई पड़ी “मधुकर जी! मधुकर जी! चलिए शाखा का समय हो रहा है।”
मधुकर ने द्वार खोला और संदीप जी से शिष्टतापूर्वक कहा “भाईसाहब! अगले सप्ताह मेरी परीक्षाएं आरंभ हो रही हैं। माताजी का कहना है कि यदि बीस- बाईस दिन शाखा न जाकर पूरा ध्यान पढ़ाई पर केंद्रित करूं तो मैं बहुत अच्छी श्रेणी में उत्तीर्ण हो सकूंगा। इसलिए यदि आज से मैं शाखा न आऊं तो ….”
संदीप जी दो पल मौन रहे फिर बोले “कोई बात नहीं। मैं शाखा से लौटकर मिलने आता हूँ।” उनकी साईकिल आगे बढ़ गई।
साढ़े सात के लगभग वे मधुकर के घर आए तो द्वार माताजी ने ही खोला। नमस्ते का आदान-प्रदान हुआ।
माता जी ने कहा “मधु पढ़ाई के कमरे में है आप वहीं चले जाइए। और हाँ, आप भोजन यहीं करके जाइएगा, बस आधे घंटे में तैयार हो जाएगा।”
मधुकर की मेज पर कुछ पुस्तकें और कापी खुले रखे थे वह नोट्स बनाने में व्यस्त था। संदीप जी की आवाज से उसका ध्यान भंग हुआ, वे कह रहे थे “भारत माता आपको देखकर कितनी प्रसन्न हो रही होगी कि उसके भविष्य रूपी आप जैसे विद्यार्थी कितने परिश्रम और मनोयोग से पढ़-लिखकर तैयार हो रहे हैं जिससे योग्य प्रकार से राष्ट्र सेवा कर सके।”
मधुकर ने कुर्सी से खड़े होकर नमस्ते की, फिर बोला “इसमें भी राष्ट्रीय भाव!”
“हाँ भाई! क्यों नहीं? पढ़-लिखकर अपना और अपने परिवार का पेट भरने और खूब पैसा कमाने का उद्देश्य तो बहुत अधूरा है। जब तक उसमें समाज और राष्ट्र का हित सम्मिलित न हो। एक भ्रष्टाचारी भी बहुत कमा सकता है लेकिन वह समाज और राष्ट्र का कोई भला नहीं करता बल्कि हानि ही करता है। इसलिए मैं मानता हूँ हम अपनी आँखों में अपने सपनों से अधिक भारत माता के सपनों को बसाएं, उन्हें पूरा कर सकें इस योग्य अपने को तैयार करें।”
“आप समझाना क्या चाहते हैं? आप जानते हैं मैं कितने परिश्रमपूर्वक परीक्षा की तैयारी कर रहा हूँ, इसीलिए तो आज से कुछ दिनों शाखा जाना भी बंद।”
“देखो मधु जी! स्वयंसेवक का अर्थ ही है स्वयं की प्रेरणा से कार्य करने वाला। आप अपने विचार को सुनिश्चित रखने के लिए स्वतंत्र हैं पर यह सुझाव है कि किसी एक लक्ष्य को साधने में बाकी की सर्वथा उपेक्षा उचित नहीं है। दिन में आठ-दस-बारह घंटे मस्तिष्क और मन बहुत काम कर ले इससे शरीर की बाकी आवश्यकता पूरी नहीं हो जाती ऐसे में शरीर मनोमस्तिष्क को पूरा सहयोग नहीं करेगा अंततः वे भी शरीर के ही अंग हैं।”
“मैं स्पष्ट रूप से समझा नहीं? मैं चाहता हूँ, बड़ा होकर अच्छा वैज्ञानिक बनूं, खूब कमाऊंगा तो समाज के लिए भी सहयोग कर सकूंगा। और…”
संदीप जी हँसे”…और फिर अच्छी पढ़ी-लिखी लड़की से विवाह करके अच्छी घर गृहस्थी….”
मधुकर शर्मा गया “नहीं नहीं भाईसाहब! इतना आगे अभी नहीं सोचा है मैंने।”
“पर अधिकतर किशोर ऐसा ही सोचते हैं।..पर सोचो अगर भगतसिंह, स्वतंत्रता के लिए दीवाने न होते, फांसी के फंदे को वरमाला और स्वतंत्रता को दुल्हन न मान लेते तो? तो आज हम उनका बलिदान दिवस न मना रहे होते। वे और उनके जैसे छात्र बने रहने की आयु में अपने प्राण न्यौछावर करने वाले नवयुवक करोड़ों देशवासियों की प्रेरणा हैं। दूसरा उदाहरण डॉ. हेडगेवार हैं आज संघ का विराटवट उन्हीं के बोये संघ-बीज का परिणाम है। अपने बाकी सरसंघचालक और संघ के कितने ही स्वयंसेवक जो अपना व्यक्तिगत करियर ही बनाते तो देश के प्रथम श्रेणी के लोग बनते लेकिन वे सामान्य सफलताओं से प्रथम न बने वे राष्ट्र को प्रथम बनाने हेतु अग्रणी बने।”
“भगतसिंह का दौर अलग था।” मधुकर ने तर्क किया।
“सही है, वह युग था जब देश पर मरने वालों की अधिक आवश्यकता थी पर स्वतंत्र भारत को जग सिरमौर बनाने हेतु देश के लिए जीना अधिक आवश्यक है और राष्ट्र की आवश्यकता के अनुसार आज के वैश्विक स्पर्धा के युग में और अधिक योग्यता, दक्षता, कुशलता वाले नवयुवक चाहिए।”
“खूब पढ़ना भी है, और शाखा भी…. समझा नहीं।” मधुकर बोला।
“अरे भाई! पढ़ाई के साथ-साथ थोड़ा खेलकूद, व्यायाम, प्राणायाम भी आवश्यक नित्यकर्म ही है। नींद भी और सात्विक और पौष्टिक भोजन भी जरूरी है। और खेलकूद व्यायाम प्राणायाम के लिए शाखा एक बहुउपयोगी माध्यम नहीं है क्या? जहाँ शरीर, मन और मस्तिष्क को एकसाथ पोषण और राष्ट्र के लिए स्वयं को योग्य बनाने का वातावरण मिलता है। बौद्धिक दृष्टि से पढ़ाई-लिखाई से उत्तम सफलता पाकर भी निर्बल शरीर, दुर्बल स्वास्थ्य रहा तो भी उद्देश्य पूरा होगा क्या? अभी परीक्षाएं पास हैं तो केवल शाखा आ सकते हो, संपर्क आदि संभव हो तो ठीक नहीं तो बाकी स्वयंसेवक कर लेंगे।”

तभी माताजी का बुलावे की आवाज आई “भोजन तैयार है, हाथ-मुंह धोकर आ जाओ, भोजन सब साथ ही करेंगे।”
भोजन करके संदीप जी बोले “अच्छा मधु जी! चलता हूँ।”
“अब किधर?
“अभी सोहन जी के यहाँ जाऊँगा।”
“क्यों? प्रोफेसर साहब की ही कह रहे हैं न? उनके यहाँ क्यों?”
“भाई! मेरी भी महाविद्यालय की परीक्षा चल रही है। अपने वर्षप्रतिपदा के उत्सव में अतिथि बनकर आए थे तो प्रा. सोहन जी बोले थे, ‘शाखा के किसी भी स्वयंसेवक को गणित, विज्ञान आदि में कुछ समझना-पूछना हो तो मेरे पास आ सकता है।’ बस गणित की कुछ समस्या सुलझाने हेतु जा रहा हूँ। परसों परीक्षा है।”
“आपकी परीक्षा है और आप मुझे समझाने चले आए! और मैं हूँ कि शाखा के एक घंटे के लिए भी छुट्टी चाह रहा था।” मधुकर का स्वर आश्चर्य और पश्चाताप से भरा था।
संदीप जी विद्यार्थी विस्तारक थे। उनका संपर्क सफल हुआ। “देश के लिए जियें, समाज के लिए जियें। ये धड़कनें ये प्राण हो जन्मभूमि के लिए” गुनगुनाते हुए उनकी साईकिल गली के मोड़ पर मुड़कर ओझल हो गई।
(लेखक इंदौर से प्रकाशित ‘देवपुत्र’ बाल मासिक पत्रिका के संपादक है।)
और पढ़ें : दादा जी का चमत्कार