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	<title>बाल केन्द्रित क्रिया आधारित शिक्षा Archives - राष्ट्रीय शिक्षा : शिक्षा में समाज प्रबोधन rashtriyashiksha.com</title>
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	<description>सा विद्या या विमुक्तये</description>
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	<title>बाल केन्द्रित क्रिया आधारित शिक्षा Archives - राष्ट्रीय शिक्षा : शिक्षा में समाज प्रबोधन rashtriyashiksha.com</title>
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		<title>बाल केन्द्रित क्रिया आधारित शिक्षा- 30 (विद्यालय में विशेष आयोजन)</title>
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		<dc:creator><![CDATA[राष्ट्रीय शिक्षा]]></dc:creator>
		<pubDate>Sat, 18 Dec 2021 09:10:45 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[अध्यापक शिक्षा]]></category>
		<category><![CDATA[नवीनतम]]></category>
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					<description><![CDATA[<p> &#8211; रवि कुमार   विद्यार्थियों में विशेष गुणों के विकास की दृष्टि से अनेक विशेष आयोजनों की योजना होती है। कुछ आयोजन उस वर्ष में आने वाले विशेष दिवस के&#8230; </p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: right;"> &#8211; रवि कुमार</p>
<p> <img fetchpriority="high" decoding="async" class="alignnone wp-image-4486" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2021/12/WhatsApp-Image-2021-12-18-at-12.34.44-300x225.jpeg" alt="" width="863" height="647" srcset="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2021/12/WhatsApp-Image-2021-12-18-at-12.34.44-300x225.jpeg 300w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2021/12/WhatsApp-Image-2021-12-18-at-12.34.44-1024x768.jpeg 1024w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2021/12/WhatsApp-Image-2021-12-18-at-12.34.44-768x576.jpeg 768w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2021/12/WhatsApp-Image-2021-12-18-at-12.34.44.jpeg 1032w" sizes="(max-width: 863px) 100vw, 863px" /></p>
<p>विद्यार्थियों में विशेष गुणों के विकास की दृष्टि से अनेक विशेष आयोजनों की योजना होती है। कुछ आयोजन उस वर्ष में आने वाले विशेष दिवस के साथ जुड़े होते हैं। कुछ आयोजन प्रतिवर्ष होते हैं और सर्वदूर उनकी मान्यता हैं। बाल केंद्रित शिक्षा में  ऐसे दो विशेष प्रकार के आयोजन विद्यालय में करना आवश्यक है &#8211; १ शैक्षिक भ्रमण २ वार्षिकोत्सव। आइए इन दोनों विशेष आयोजनों के विषय में जानते है-</p>
<p><strong>शैक्षिक भ्रमण</strong></p>
<p>सामान्यतः सभी विद्यालयों में शैक्षिक भ्रमण का आयोजन होता तो है। परंतु यह आयोजन होता है कुछ प्रतिशत विद्यार्थियों के लिए। विद्यालय में सूचना दी जाती है कि आमुख स्थान पर भ्रमण जाएगा, आप अपना पंजीकरण करवा सकते है। भ्रमण पर जाने की साधन व्यवस्था एक बस है जिसकी क्षमता 40/50 ही है। प्रायः बड़ी कक्षाओं के विद्यार्थियों को ही इस भ्रमण में जाने का अवसर मिलता हैं। यात्रा व भोजन आदि का अधिक शुल्क के कारण सभी विद्यार्थियों के अभिभावक भ्रमण पर जाने की अनुमति नहीं देते। वे अन्यान्य कारण बताकर विद्यार्थी से मना करवा देते हैं। जिन विद्यार्थियों का मन भ्रमण पर जाने का है उपरोक्त दोनों कारणों से वे नहीं जा पाते। विद्यालय के 40-50 विद्यार्थी दो-तीन दिन का भ्रमण करके आते हैं और विद्यालय के गतिविधि पंचांग में जुड़ गया शैक्षिक भ्रमण!</p>
<p>अब ये शैक्षिक भ्रमण था या केवल भ्रमण? इस पर भी विचार करना आवश्यक है। यह भ्रमण सभी विद्यार्थियों के लिए था या कुछ % के लिए?</p>
<p>शैक्षिक भ्रमण की योजना कक्षा अनुसार की जाए। छोटी कक्षाओं के विद्यार्थी कम दूरी पर कम समय के लिए जा सकते है। कक्षा स्तर व आर्थिक स्थिति अनुसार दूरी व समय बढ़ा सकते है। चालू सत्र में जो पाठ्यक्रम पढ़ाया जा रहा है उसके अनुसार आसपास देखने के लिए कौन-कौन सा स्थान है जिसका ऐतिहासिक, सामाजिक व सांस्कृतिक महत्व है, यह विचार कर योजना हो। जहां जा रहे है, उस स्थान पर जाने से विद्यार्थी क्या सीखने वाले हैं, इसे योजना में सम्मिलित किया जाए। यह सब करने से तभी सही स्थान का चयन हो पाएगा।</p>
<p>एक विद्यालय में कक्षा 6 से 8 के विद्यार्थियों का ग्राम भ्रमण रखा। अब ग्राम भ्रमण में क्या विशेष है? यह प्रश्न हमारे मन में आना स्वाभाविक है। परन्तु इस भ्रमण में भी कुछ विशेष था। कक्षा 6 से 8 में अध्ययन करने वाले नगरीय अंचल के विद्यार्थियों का यह भ्रमण था। सामान्यतः नगरीय विद्यार्थियों को ग्राम्य जीवन का अनुभव न के बराबर होता है। ग्राम्य जीवन से जुड़ी बातें पाठ्यक्रम का भाग तो होती ही हैं। ग्रामीण विद्यार्थियों को इसका अनुभव दैनदिन होता रहता है। ऐसे में नगरीय विद्यार्थियों को ग्रामीण जीवन का अनुभव प्रत्यक्ष मिलने से अच्छा रहता है।</p>
<p>विद्यालय के आसपास का धार्मिक स्थल- मन्दिर, गुरुद्वारा; सब्जी मंडी, डाकघर, रेलवे स्टेशन, पुलिस स्टेशन, हस्पताल, पैथ लैब, समाचार पत्र-पत्रिका कार्यालय, रेडियो स्टेशन, टीवी चैनल, ऑटो वर्कशॉप, फ़ूड प्रोसेसिंग यूनिट, संग्रहालय, कुम्हार-लोहार-फर्नीचर कार्यस्थल आदि सभी भ्रमण के स्थान हो सजते हैं। भ्रमण विद्यार्थी के मन को आनन्दित करता है। सही स्थान का चयन व योजना इस आनन्द के साथ अधिगम को बढ़ाएगी।</p>
<p><img decoding="async" class="alignnone wp-image-4485" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2021/12/WhatsApp-Image-2021-12-18-at-12.35.01-e1639818611620-300x197.jpeg" alt="" width="891" height="585" srcset="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2021/12/WhatsApp-Image-2021-12-18-at-12.35.01-e1639818611620-300x197.jpeg 300w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2021/12/WhatsApp-Image-2021-12-18-at-12.35.01-e1639818611620-768x505.jpeg 768w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2021/12/WhatsApp-Image-2021-12-18-at-12.35.01-e1639818611620.jpeg 852w" sizes="(max-width: 891px) 100vw, 891px" /></p>
<p><strong>वार्षिकोत्सव </strong></p>
<p>वर्ष में एक बार किया जाने वाला उत्सव वार्षिकोत्सव कहलाता है। कहीं-कहीं यह विद्यालय के स्थापना दिवस पर भी होता है। वर्षभर में विद्यार्थियों को जो सिखाया जा रहा हैं उसको अभिभावकों व समाज के सामने अभिव्यक्त करने का अवसर वार्षिकोत्सव प्रदान करता है। अतः वार्षिकोत्सव की योजना भी वर्षभर करना आवश्यक है। वर्षभर में जो सीखा-सिखाया गया उसे ही वार्षिकोत्सव में शारीरिक व सांस्कृतिक कार्यक्रमों के माध्यम से प्रस्तुत किया जाना चाहिए। हाँ, प्रस्तुति अच्छी हो सके इसके लिए एक मास पूर्व उन सभी कार्यक्रमों का अधिक अभ्यास आवश्यक है।</p>
<p>सामान्यतः वार्षिकोत्सव के लिए ही कार्यक्रम तैयार करवाए जाते हैं। ऐसे में वो वार्षिकोत्सव है या तत्काल उत्सव? यह विचारणीय है। सांस्कृतिक (भारतीय संस्कृति से ओतप्रोत) कार्यक्रम है या फिल्मी रंगमंच? कुछ विद्यार्थियों को अवसर है या अधिकतम विद्यार्थियों को? तैयारी आचार्य करवाएंगे या बाहर से कोई प्रोफ़ेशनल? व्यवस्थाएं विद्यालय के संसाधनों से होंगी या बाहरी संसाधनों से? व्यवस्थाएं व सज्जा विद्यालय के विद्यार्थी व आचार्य करेंगे या बाहरी किराए के व्यक्ति? सहयोग अभिभावकों-पूर्व छात्रों का लेना है या किराए के व्यक्तियों का? प्रतिभा प्रदर्शन विद्यार्थियों का है या डिजिटल ऑडियो/वीडियो का? ये सब प्रश्न विचार के योग्य है। उपरोक्त में से सही चुनाव ही आपके वार्षिकोत्सव का सही प्रकटीकरण करेगा, जो अभिभावकों व समाज के लिए विद्यालय का चेहरा होगा।</p>
<p>एक स्थान पर एक मंचीय कार्यक्रम प्रस्तुत हुआ। कक्षा 3 व 4 के विद्यार्थियों ने एक समूह गीत प्रस्तुत किया। गीत था – “धरती की शान तु है मनु की संतान, तेरी मुट्ठियों में बंद तूफान है रे, मनुष्य तु बड़ा महान है।” लगभग 25 विद्यार्थियों ने इस गीत पर अभिनय किया, गायन बड़ी कक्षा की बालिकाओं ने और वादन का कार्य वंदना विभाग के छात्रों द्वारा किया गया। विद्यार्थियों ने विद्यालय वेश पहना हुआ था। इस कार्यक्रम की तैयारी कक्षा 3 व 4 की आचार्य दीदी द्वारा करवाई गई। गीत के बोल के साथ अभिनय करते हुए सुंदर प्रस्तुति! भारतीय संस्कृति के संस्कार व विचार के साथ विद्यार्थियों की कर्मेन्द्रियों व ज्ञानेन्द्रियों की सक्रियता। कोई बाह्य सहायता नहीं, कोई विशेष खर्च नहीं, विद्यार्थियों द्वारा दैनदिन रूप से सहज तैयारी व प्रस्तुति।</p>
<p><em>विद्यार्थी काल में सम्पन्न हुए विशेष आयोजन शैक्षिक भ्रमण व वार्षिकोत्सव का जीवनभर प्रभाव रहता है</em><em>।</em><em> इन दोनों कार्यक्रमों की स्मृतियाँ विद्यार्थी के मानस पटल पर सदा अंकित रहती हैं</em><em>।</em><em> आचार्य परिवार द्वारा चिंतन-मनन कर सकारात्मक एवं दूरगामी परिणामों को ध्यान में रखकर इसकी योजना होनी चाहिए</em><em>।</em><em> और विद्यालय के प्रत्येक विद्यार्थी को इन विशेष आयोजनों में भाग लेने का अवसर प्राप्त हो, इसका भी ध्यान रखा जाए</em><em>।</em><em>    </em></p>
<p>(लेखक विद्या भारती हरियाणा प्रान्त के संगठन मंत्री है और विद्या भारती प्रचार विभाग की केन्द्रीय टोली के सदस्य है।)</p>
<p>और पढ़ें : <span style="color: #000080;"><strong><a style="color: #000080;" href="https://rashtriyashiksha.com/child-centered-activity-based-education-yog-shiksha/" target="_blank" rel="noopener">बाल केन्द्रित क्रिया आधारित शिक्षा- 29 (योग शिक्षा)</a></strong></span></p>
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		<title>बाल केन्द्रित क्रिया आधारित शिक्षा- 29 (योग शिक्षा)</title>
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		<dc:creator><![CDATA[राष्ट्रीय शिक्षा]]></dc:creator>
		<pubDate>Fri, 19 Nov 2021 11:59:54 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[नवीनतम]]></category>
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		<category><![CDATA[श्री रवि कुमार जी]]></category>
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					<description><![CDATA[<p> &#8211; रवि कुमार योग आज सर्वदूर सभी की चर्चा का विषय बना है। गत कुछ वर्षों से यह सभी की दिनचर्या का भाग बना है। समाज में यह भी विमर्श&#8230; </p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: right;"> &#8211; रवि कुमार</p>
<p><img decoding="async" class="alignnone wp-image-4317" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2021/11/gn141122-1479060424_835x547-300x186.jpg" alt="" width="1181" height="732" srcset="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2021/11/gn141122-1479060424_835x547-300x186.jpg 300w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2021/11/gn141122-1479060424_835x547-768x477.jpg 768w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2021/11/gn141122-1479060424_835x547.jpg 835w" sizes="(max-width: 1181px) 100vw, 1181px" /></p>
<p>योग आज सर्वदूर सभी की चर्चा का विषय बना है। गत कुछ वर्षों से यह सभी की दिनचर्या का भाग बना है। समाज में यह भी विमर्श बना है कि योग शिक्षा का एक प्रमुख भाग होना चाहिए अर्थात् योग शिक्षा प्रत्येक विद्यार्थी को दी जानी चाहिए। 21 जून को अंतरराष्ट्रीय योग दिवस घोषित होना वैश्विक स्तर पर योग की स्वीकार्यता को दर्शाता है।</p>
<p>श्रीमद्भगवद्गीता में योग पर भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं –</p>
<p style="text-align: center;"><strong>योगस्थः कुरु कर्माणि, संग त्यक्त्वा धनंजय।</strong></p>
<p style="text-align: center;"><strong>सिद्धयसिद्धयोः समो भूत्वा, समत्वं योग उच्यते॥ (२/४८)</strong></p>
<p>हे धनंजय! तू आसक्ति को त्यागकर तथा सिद्धि और असिद्धि में समान बुद्धिवाला होकर योग में स्थित हुआ कर्त्तव्य कर्मों को कर, समत्व ही योग कहलाता है।</p>
<p style="text-align: center;"><strong>बुद्धियुक्तो जहातीह उभे सुकृतदुष्कृते।</strong></p>
<p style="text-align: center;"><strong>तस्माद्योगाय युज्यस्व योगः कर्मसु कौशलम्‌॥ (२/५०)</strong></p>
<p>समबुद्धियुक्त पुरुष, पुण्य और पाप दोनों को इसी लोक में त्याग देता है अर्थात् उनसे मुक्त हो जाता है। इससे तू समत्व रूप योग में लग जा, यह समत्व रूप योग ही कर्मों में कुशलता है अर्थात कर्मबंध से छूटने का उपाय है।</p>
<p>समाज में योग शिक्षा का जो विमर्श बना है वह केवल योगासन व प्राणायाम तक सीमित रह गया है। योगाचार्य समाज में योग कक्षाएं चलाते है। इस योग कक्षाओं में रोग निवारण हेतु योग अर्थात किस रोग में कौन सा योगासन-प्राणायाम करना अच्छा रहता है अथवा किस योगासन-प्राणायाम को करने से कौन सा रोग नहीं होता, पर ही केंद्रित रहता है।</p>
<p>वास्तव में योग क्या है और योग शिक्षा क्या है? यह समझना शिक्षा क्षेत्र के कार्यकर्ताओं के लिए आवश्यक है। महर्षि पतंजलि ने &#8216;योग सूत्र&#8217; में अष्टांग योग भारतीय समाज को दिया है। अष्टांग योग यानि जिसके आठ अंग हो। ये आठ अंग कौन-कौन से हैं &#8211;</p>
<p><strong>१ यम, २ नियम, ३ आसन, ४ प्राणायाम, ५ प्रत्याहार, ६ धारणा, ७ ध्यान </strong><strong>एवं </strong><strong>८ समाधि</strong></p>
<p>यम के अंतर्गत पांच बातें है &#8211; सत्य, अहिंसा, अस्तेय, अहिंसा व अपरिग्रह। इसी प्रकार नियम के अंतर्गत भी पांच बातें है &#8211; शौच, संतोष, तप, स्वाध्याय व ईश्वर-प्राणिधान।</p>
<p>योग भारतीय जीवन शैली है अर्थात भारतीय जीवन शैली का प्रकटीकरण पतंजलि अष्टांग योग के अनुसार जीवन जीने में है। योग आधारित जीवन शैली भारतीय शिक्षा का भाग बने इसके लिए विद्यालय की पाठ्यचर्या में योग शिक्षा अनिवार्य रूप से सम्मिलत हो ताकि रोजगारपरक शिक्षा के साथ एक अच्छे मनुष्य का निर्माण शिक्षा से हो सके।</p>
<p>यम के अंतर्गत अपरिग्रह का अर्थ है कि मेरी जितनी आवश्यकता है, उससे अधिक एकत्र नहीं करना। आज के भौतिक जगत की अनेकानेक समस्याएं अधिकाधिक एकत्र करने की प्रवृति के कारण ही उत्पन्न हुई है। आज की पीढ़ी को यदि अपरिग्रह आत्मसात हो जाता है तो वर्तमान व भविष्य के भौतिक जगत की अनेक समस्याओं का समाधान स्वतः ही हो जाएगा।</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone wp-image-4318" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2021/11/2019-05-28-at-9.00.51-PM-850x491-1-300x173.jpeg" alt="" width="1202" height="693" srcset="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2021/11/2019-05-28-at-9.00.51-PM-850x491-1-300x173.jpeg 300w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2021/11/2019-05-28-at-9.00.51-PM-850x491-1-768x444.jpeg 768w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2021/11/2019-05-28-at-9.00.51-PM-850x491-1.jpeg 850w" sizes="auto, (max-width: 1202px) 100vw, 1202px" /></p>
<p><strong>विद्यालय में कैसे क्रियान्वयन </strong><strong>करें</strong><strong> &#8211; </strong></p>
<p>योग शिक्षा के दो भाग है &#8211; एक सैद्धांतिक और एक व्यावहारिक। सिद्धांत का अधिगम व व्यवहारिक का आचरण में प्रकटीकरण आवश्यक है। क्रियान्वयन में दो मूलभूत बातें आवश्यक है &#8211;</p>
<p>१ विद्यालयों के आचार्यों का योग शिक्षा पर मानस, अध्ययन, व विद्यार्थियों को योग करवाने के लिए दक्षता</p>
<p>२ विद्यार्थियों को योग करवाने के लिए समय की उपलब्धता।</p>
<p>योग शिक्षा विद्यार्थियों के लिए आवश्यक है, यह जितना अधिक आचार्यों के मानस में होगा, उतना अधिक योग शिक्षा का क्रियान्वयन विद्यार्थियों में होगा। आचार्य पतंजलि अष्टांग योग एवं विद्या भारती द्वारा प्रकाशित योग शिक्षा पाठ्यक्रम का अध्ययन करें। आचार्यों की दक्षता के लिए विद्यालय आचार्यों के मासिक प्रशिक्षण कार्यक्रम में योग शिक्षा के व्यावहारिक पक्ष का अभ्यास करवाया जाए।</p>
<p>प्रातःकाल की वंदना सभा गतिविधियों में सूर्यनमस्कार, आसन, प्राणायाम व ध्यान को सम्मिलित किया जाए। वंदना सभा में बैठते हुए पद्मासन या वज्रासन में बैठने का आग्रह बढ़ाया जाए। साप्ताहिक कालांश योजना में एक अथवा दो कालांश योग शिक्षा को दिए जाए। अष्टांग योग के एक-एक बिंदु, स्वास्थ्य चेतना सम्बंधी छोटी छोटी बातों की अवधरणा बताई जाए। आहार-विहार संबंधी छोटी-छोटी बातों को आचरण में डलवाया जाए।</p>
<p>विद्यालय की गतिविधियों व कार्यक्रमों में अष्टांग योग को भी स्थान दिया जाए। 21 जून योग दिवस में सभी विद्यार्थियों के साथ अभिभावक व समाज के लोग भी भाग ले। सूर्य रथ सप्तमी पर सूर्यनमस्कार महायज्ञ (सभी विद्यार्थियों द्वारा सामूहिक सूर्यनमस्कार) का आयोजन हो।</p>
<p><strong><em>योग शिक्षा कार्यक्रम, कालांश अथवा विद्यालय तक ही सीमित न रहकर विद्यार्थी की दिनचर्या का अनिवार्य भाग बने</em></strong><strong><em>,</em></strong> <strong><em>इस </em></strong><strong><em>पर </em></strong><strong><em>ध्यान देना अति आवश्यक है। एक स्वस्थ, समृद्ध व सुसंस्कृत भारत का निर्माण नवीन पीढ़ी को योग आधारित भारतीय जीवन शैली में ढाल कर ही सम्भव हो सकता है।</em></strong></p>
<p>(लेखक विद्या भारती हरियाणा प्रान्त के संगठन मंत्री है और विद्या भारती प्रचार विभाग की केन्द्रीय टोली के सदस्य है।)</p>
<p>और पढ़ें : <strong><span style="color: #000080;"><a style="color: #000080;" href="https://rashtriyashiksha.com/child-centered-activity-based-education-indian-philosophy-of-education/" target="_blank" rel="noopener">बाल केन्द्रित क्रिया आधारित शिक्षा- 28 (भारतीय शिक्षा दर्शन)</a></span></strong></p>
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		<title>बाल केन्द्रित क्रिया आधारित शिक्षा- 28 (भारतीय शिक्षा दर्शन)</title>
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		<dc:creator><![CDATA[राष्ट्रीय शिक्षा]]></dc:creator>
		<pubDate>Tue, 19 Oct 2021 06:57:44 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[<p> &#8211; रवि कुमार शिक्षा समाज व राष्ट्र जीवन का महत्वपूर्ण भाग है। शिक्षा क्या है और शिक्षा की क्यों आवश्यकता है? यह एक महत्वपूर्ण प्रश्न है। यह प्रश्न आज का&#8230; </p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: right;"> &#8211; रवि कुमार</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone wp-image-4164" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2021/10/WhatsApp-Image-2021-10-19-at-17.00.22-1-300x198.jpeg" alt="" width="1198" height="791" srcset="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2021/10/WhatsApp-Image-2021-10-19-at-17.00.22-1-300x198.jpeg 300w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2021/10/WhatsApp-Image-2021-10-19-at-17.00.22-1.jpeg 682w" sizes="auto, (max-width: 1198px) 100vw, 1198px" /></p>
<p>शिक्षा समाज व राष्ट्र जीवन का महत्वपूर्ण भाग है। शिक्षा क्या है और शिक्षा की क्यों आवश्यकता है? यह एक महत्वपूर्ण प्रश्न है। यह प्रश्न आज का भी है और जब से शिक्षा व्यवस्था है तब से तो है ही। हर काल में यह प्रश्न रहेगा ही। इसकी खोज करना भी शिक्षक व शिक्षार्थी दोनों का कार्य है।</p>
<p>शिक्षा क्या है? शिक्षा ज्ञान की व्यवस्था है। ज्ञान परंपरा बनाना, ज्ञान परंपरा बनी रहे, अखंड रूप से चलती रहे, यदि खंडित हुई तो पुनः स्थापित करना यह शिक्षा का कार्य है। ज्ञान ब्रह्म का स्वरूप है। ब्रह्म स्वरूप ज्ञान को विश्व रूप में प्रकट करना शिक्षा का कार्य है। शिक्षा को देखना यानि शिक्षक को देखना। अतः शिक्षक को ज्ञाननिष्ट होना आवश्यक है। शिक्षा का संबंध जीवन के साथ है, रोजगार के साथ नहीं। शिक्षा आजीवन होती है, सार्वत्रिक होती है। ज्ञान पवित्रतम है अतः शिक्षा भी पवित्रतम है और उसके साथ व्यवहार भी वैसा ही अपेक्षित है।</p>
<p>शिक्षा के तीन प्रमुख कार्य है –</p>
<p>१ प्राचीन ज्ञान नवीन पीढ़ी को स्थानांतरित करना</p>
<p>२ नव ज्ञान का सृजन करना</p>
<p>३ जीवन के संघर्ष व चुनौतियों का सामना करने के लिए नवीन पीढ़ी को सुसज्ज करना</p>
<p>प्रथम दो में ज्ञान का ही वर्णन है। अतः ज्ञान क्या है? ज्ञान व सूचना में क्या अन्तर है? ज्ञान व शिक्षा का क्या संबंध है? ये प्रश्न स्वाभाविक है। शिक्षा का उद्देश्य समझने के लिए ज्ञान के विषय में स्पष्ट संकल्पना जानना आवश्यक है।</p>
<p>आजकल शिक्षा जगत पाठ्यक्रम, पुस्तक, कालांश, परीक्षा व अंक में फस कर रह गया है। पुस्तक में जो लिखा है उसे ही कक्षाकक्ष में पढ़ाया जाता है। जो विषयवस्तु पुस्तक में है उसे ही ज्ञान मान लिया जाता है। क्या पुस्तक में प्रकाशित विषय वस्तु ज्ञान है? वो तो मात्र सूचना है। आजकल डिजिटल तकनीक के कारण सूचनाएं इंटरनेट पर भरी पड़ी है। वह सब सुचना है तो ज्ञान क्या है?</p>
<p><strong>स्वामी विवेकानन्द ने ज्ञान के विषय में कहा है – “समस्त ज्ञान</strong><strong>, </strong><strong>चाहे वह भौतिक हो अथवा आध्यात्मिक</strong><strong>, </strong><strong>मनुष्य की आत्मा में है। बहुधा वह प्रकाशित न होकर ढका रहता है और जब आवरण धीरे धीरे हट जाता है तो हम कहते हैं कि</strong><strong>, </strong><strong>हम सीख रहे हैं।”</strong></p>
<p>दूसरे शब्दों में बालक आपने ज्ञानेन्द्रिय व कर्मेन्द्रिय द्वारा सुनता, देखता, स्पर्श आदि करता है, सूचनाएं प्राप्त करता है। इन सूचनाओं पर चिंतन-मनन करता है, उस विषय में स्वयं अनुभव करता है और उस अनुभूति से जो प्राप्त होता है वह ज्ञान है।</p>
<p>सूचना व ज्ञान में बड़ा भारी अंतर है यह आज शिक्षा जगत को समझने की आवश्यकता है।</p>
<p>ज्ञान सार्वभौमिक है और शिक्षा राष्ट्रीय। इसके विषय में भी प्रश्न आता है कि यह कैसे संभव है? आजकल वैश्वीकरण की बात होती है। शिक्षा राष्ट्रीय है तो विद्यार्थी का विकास विश्व के अनुसार कैसे होगा? गणित व विज्ञान में जो सूत्र व अवधारणाएं रहती है वह राष्ट्र की सीमाओं से बाहर भी वैसी ही रहेगी। परंतु उसका मानव जीवन के लिए उपयोग राष्ट्र की आवश्यकता के अनुसार होगा। जैसे जल एक तत्व है रसायन शास्त्र में H2O इसका सूत्र है। H2O की अभिक्रिया अलग अलग तत्वों/धातुओं के साथ होंगी तो उसका परिणाम भी सभी स्थानों पर एक जैसा रहेगा। परंतु जल तत्व के प्रति भावना, उसका संरक्षण, जल स्त्रोतों का विकास व संवर्धन, जल को पूज्य मानना या नहीं मानना यह राष्ट्र की भावना के अनुसार होगा। कपड़ा मूलतः तन ढकने के काम आता है। परंतु तन कैसे ढका जाए यह राष्ट्र की संस्कृति के अनुसार होगा। इसलिए कहा है कि ज्ञान सर्वभौमिक है और शिक्षा राष्ट्रीय।</p>
<p>स्वामी विवेकानन्द ने कहा है – <strong>“Education should be routed to culture and target to progress.”</strong></p>
<p>फिर राष्ट्र क्या है?</p>
<p>राष्ट्र की संकल्पना सांस्कृतिक है जिसका सम्बन्ध तीन बातों से है – १ भूमि, २ भूमि पर रहने वाली प्रजा, जो उसे अपनी माता मानती है और ३ प्रजा का दर्शन। हर राष्ट्र की प्रजा का एक दर्शन होता है जिसे उस राष्ट्र का जीवन दर्शन कहते है। भूमि, प्रजा और जीवन दर्शन तीनों को मिलाकर राष्ट्र की संकल्पना है। भूमि पर रहने वाली प्रजा में राष्ट्र निष्ठा उत्पन्न हो यह शिक्षा का उद्देश्य है।</p>
<p>भारत के संदर्भ में शिक्षा का क्या उद्देश्य है?</p>
<p>१ विश्व का कल्याण</p>
<p>२ राष्ट्र को परम वैभव के पथ पर ले जाना। परम वैभव के आयाम &#8211; अभ्युदय (वैभव व समृद्धि की प्राप्ति) व निःश्रेयस (परम कल्याण की प्राप्ति)।</p>
<p>३ व्यक्ति का समग्र विकास</p>
<p>व्यक्ति का सर्वांगीण विकास किस लिए करना है? समाज को सत्य और धर्म के मार्ग पर ले जाते हुए राष्ट्र को परम वैभव के पथ पर लेकर जाना ताकि विश्व का कल्याण हो।</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone wp-image-4163" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2021/10/WhatsApp-Image-2021-10-19-at-17.00.21-300x168.jpeg" alt="" width="1123" height="629" srcset="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2021/10/WhatsApp-Image-2021-10-19-at-17.00.21-300x168.jpeg 300w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2021/10/WhatsApp-Image-2021-10-19-at-17.00.21.jpeg 739w" sizes="auto, (max-width: 1123px) 100vw, 1123px" /></p>
<p>धर्म वैश्विक नियम है। जो धारण किया जाता है वो धर्म है। <strong>‘राष्ट्र निर्माण के लिए</strong><strong> </strong><strong>व्यक्ति विकास’</strong> ऐसा स्वामी विवेकानन्द ने कहा है। राष्ट्र निर्माण के लिए व्यक्ति का विकास सबसे अंत में है। व्यक्ति विकास का मुद्दा पश्चिम से आया है। भारतीय विचार कहता है – ‘समस्त सृष्टि के लिए मैं’, और सेमेटिक यानि पश्चिम का विचार कहता है – ‘मेरे लिए समस्त सृष्टि’। भारतीय विचार सबके कल्याण के लिए स्वयं को प्रस्तुत करता है। हमारा दायित्व बनता है कि हम शिक्षा व्यवस्था के क्रम को बदले।</p>
<p>सर्वांगीण विकास व समग्र विकास की संकल्पना क्या है? सर्वांगीण अर्थात पंचकोशीय विकास &#8211; व्यक्ति की क्षमताओं का विकास। यह लक्ष्य नहीं साधन है। व्यष्टि से समष्टि के विनियोग में व्यक्ति की क्षमताओं का विकास अर्थात समग्र विकास।</p>
<p>तीन प्रकार की शिक्षा है। कुटुंब की शिक्षा जिसका संचालन सूत्र माता-पिता है। विद्यालयीन शिक्षा का शिक्षक व समाज शिक्षा का संचालन सूत्र मठ-मंदिर-धर्माचार्य है। शिक्षक, माता-पिता और धर्माचार्य का समन्वय शिक्षा को करना है।</p>
<p>शिक्षा में आमूलचूल परिवर्तन करना है तो परिवर्तन का केंद्र कहाँ है? परिवर्तन का केंद्र है कक्षा कक्ष। कक्षाकक्ष के केंद्र में शिक्षक व छात्र है। कक्षाकक्ष में विचारों, कौशलों व भावनाओं का आदान प्रदान होता है। कक्षाकक्ष के पाठ में संकल्पना, भावना, कौशल, विचार, दृष्टि, व्यवहार व क्रियाकलाप होता है। कक्षाकक्ष की शिक्षा में यह सब हुआ तो ही शिक्षा में आमूलचूल परिवर्तन होगा। इस परिवर्तन का वाहक शिक्षक को बनना है।</p>
<p>(लेखक विद्या भारती हरियाणा प्रान्त के संगठन मंत्री है और विद्या भारती प्रचार विभाग की केन्द्रीय टोली के सदस्य है।)</p>
<p>और पढ़े : <span style="color: #000080;"><strong><a style="color: #000080;" href="https://rashtriyashiksha.com/child-centered-activity-based-education-21st-century-parenting-education/" target="_blank" rel="noopener">बाल केन्द्रित क्रिया आधारित शिक्षा-27 (21वीं सदी के अभिभावकों की शिक्षा)</a></strong></span></p>
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		<title>बाल केन्द्रित क्रिया आधारित शिक्षा-27 (21वीं सदी के अभिभावकों की शिक्षा)</title>
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		<dc:creator><![CDATA[राष्ट्रीय शिक्षा]]></dc:creator>
		<pubDate>Sat, 18 Sep 2021 12:00:13 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[अभिभावक शिक्षा]]></category>
		<category><![CDATA[नवीनतम]]></category>
		<category><![CDATA[बाल केन्द्रित क्रिया आधारित शिक्षा]]></category>
		<category><![CDATA[श्री रवि कुमार जी]]></category>
		<category><![CDATA[bal kendrit kriya aadharit]]></category>
		<category><![CDATA[Bhartiya Education]]></category>
		<category><![CDATA[Child]]></category>
		<category><![CDATA[indian education]]></category>
		<category><![CDATA[Kids]]></category>
		<category><![CDATA[Rashtriya shiksha]]></category>
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					<description><![CDATA[<p> &#8211; रवि कुमार ‘अभिभावक’ शब्द पर विचार करते हैं तो ध्यान में आता है माता-पिता। एक शब्द और चलता है &#8211; ‘पाल्य या पालक’ अर्थात् पालन करने वाले। तीनों शब्दों&#8230; </p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: right;"> &#8211; रवि कुमार</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone wp-image-4021" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2021/09/00015f7e-50c6-4507-ad22-cf5d62053ebf_800_420-300x158.jpeg" alt="" width="1249" height="658" srcset="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2021/09/00015f7e-50c6-4507-ad22-cf5d62053ebf_800_420-300x158.jpeg 300w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2021/09/00015f7e-50c6-4507-ad22-cf5d62053ebf_800_420.jpeg 800w" sizes="auto, (max-width: 1249px) 100vw, 1249px" /></p>
<p>‘अभिभावक’ शब्द पर विचार करते हैं तो ध्यान में आता है माता-पिता। एक शब्द और चलता है &#8211; ‘पाल्य या पालक’ अर्थात् पालन करने वाले। तीनों शब्दों में संकेत माता-पिता की ओर जाता है। 21वीं सदी के अभिभावक जब कहते हैं तो ध्यान में क्या आएगा? वर्ष 2021 चल रहा है। इस समय विद्यालय में जो बालक शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं वे सब 21वीं सदी के विद्यार्थी हैं और उनके अभिभावक 21वीं सदी के अभिभावक।</p>
<p><strong>अभिभावक शिक्षा</strong></p>
<p>बालकों की शिक्षा की चर्चा तो आवश्यक है और वह चर्चा सूक्ष्म रूप में होती है। परन्तु ये अभिभावक शिक्षा क्या है? यह एक अलग प्रकार का प्रश्न अवश्य है। आज अभिभावकों से सब बालकों के सम्बन्ध में चर्चा करते हैं तो वे बालकों सम्बन्धी अनेक विषयों को लेकर दिग्भ्रमित दिखाई देते हैं। अभिभावकों के मन में अनेक प्रकार के प्रश्न रहते है जिनका उन्हें उत्तर चाहिए। बालकों के विषय में कुछ विषयों को लेकर ये सोचते हैं कि क्या करें? इस प्रकार की चर्चा से ध्यान आता है कि उनके प्रश्नों का उत्तर यदि उन्हें मिल जाए एवं बालकों के सम्बन्ध में वे जो दिग्भ्रमित है उन्हें दिशा मिल जाए तो बालकों के विकास की गति अच्छी हो सकती है। बालकों के सम्बन्ध में अभिभावकों का दिशा-दर्शन ही अभिभावक शिक्षा है।</p>
<p><strong>21</strong><strong>वीं सदीं के अभिभावकों की शिक्षा क्यों</strong></p>
<p>20वीं सदीं गए 20 वर्ष ही हुए हैं। परन्तु 20वीं सदीं व 21वीं सदीं में अन्तर एक शताब्दी यानि 100 वर्षों का है। इन 20 वर्षों में बहुत अंतर आया है। परिवारों की स्थिति का ध्यान करेंगे तो संयुक्त परिवार एकल परिवारों में बदले हैं। एकल यानि माता-पिता व बालक। संयुक्त परिवार कहीं-कहीं देखने को मिलता है। आजकल एक और शब्द चल पड़ा है – न्यूक्लीयर फैमिली, ये न्यूक्लीयर फैमिली क्या हैं? एक न्यूक्लीयर में एक न्यूटॉन, एक प्रोटॉन व एक इलेक्ट्रान होता है। आजकल एकल परिवार का रूप भी बदला है। न्यूक्लीयर फैमिली अर्थात माता-पिता और एक बालक। संयुक्त परिवार में बालक की चिन्ता करने वालों में माता-पिता, दादा-दादी, चाचा-चाची, ताऊ-ताई रहते हैं। सामाजिक ताना-बाना बदला है। पूर्व में पड़ोसी व मोहल्ले वाले भी चिन्ता करते थे। आज केवल माता-पिता और उनमें से भी केवल माता चिंता करती है, अनुभव के आधार पर ऐसा कह सकते हैं। संयुक्त परिवार रहने से अभिभावक की भूमिका की जानकारी और प्रशिक्षण पीढ़ी दर पीढ़ी चलता रहता है। आज इस विषय में कठिनाई है। सामाजिक ताना-बाना बदलने से अगली पीढ़ी को जो मिलना चाहिए वह नहीं मिल रहा।</p>
<p><strong>21 वीं सदी के अभिभावकों के सामने चुनौतियाँ</strong></p>
<p>21वीं सदी की चुनौतियाँ भी अलग हैं। मोबाइल, टी.वी., इंटरनेट यह 20वीं सदीं में नहीं था। आज इसका प्रभाव अधिक दिखाई देता है। करियर व प्रतियोगिता की अधिक चर्चा व इन विषयों का बालक पर दबाव अधिक है। न्यूक्लीयर फैमिली में अधिक संभाल भी समस्या उत्पन्न करती है।</p>
<p>आज नई पीढ़ी के अभिभावक से जब चर्चा करते हैं तो वह कहता है &#8211; आज पहले जैसा नहीं है, युग बदला है। पहले बड़े परिवार होते थे। आज एकल परिवार हैं। पहले माता-पिता पढ़े-लिखे कम होते थे, आज सभी शिक्षित हैं। पहले शिक्षा की जागरूकता नहीं थी,  आज परिवार एवं समाज में शिक्षा की जागरूकता बढ़ी है। पहले शिक्षा के अवसर कम थे या ना के बराबर थे, शिक्षा केन्द्रों की उपलब्धता कम थी, आज शिक्षा के अवसर एवं शिक्षा केन्द्रों की उपलब्धता बढ़ी है। इन सब बातों से तो स्पष्ट हो ही जाता है कि आज पहले जैसा नहीं है, युग बदला है। फिर युग बदला है तो चुनौतियाँ बढ़ी हैं। हर काल में अलग-अलग चुनौतियाँ होती हैं। चुनौतियाँ बढ़ती नहीं बल्कि बदलती है। हाँ, चुनौतियाँ का बढ़ना या न बढ़ना इस बात पर निर्भर करता है कि चुनौतियों का सामना करना व मार्ग निकालना इसकी सिद्धता है या नहीं और है तो सिद्धता कैसी है?</p>
<p>एक व्यक्ति मिलने के लिए आए। वे एक विद्यालय का संचालन करते हैं। उनसे चर्चा हुई कि आजकल शिक्षा का रुझान कैसा है? उनका तुरंत उत्तर था कि आजकल शिक्षा का विषय मोबाइल ने गड़बड़ कर दिया है। बालक घर जाकर मोबाइल में लगा रहता है। पढ़ाई में उसकी एकाग्रता ही नहीं बनती। बालकों में चर्चा का विषय ही मोबाइल रहता है। घर में वह इस ताक में रहता है कि कब मुझे मोबाइल मिले और आज के समय में बालक को मोबाइल से दूर भी नहीं कर सकते। नई टेक्नोलॉजी है, उसे सीखना व उपयोग करना भी आवश्यक है। क्या करें समझ ही नहीं आता? अभिभावकों से पूछते है कि घर में टी0 वी0 देखते हैं? उत्तर है कि देखते हैं। कितना समय और क्या देखते हैं? उत्तर में- “कितना समय तो जब चाहे तब देखते हैं, और कार्टून ज्यादा देखते हैं, उन्हें यह पंसद हैं”। कुछ समय पश्चात् अभिभावक को ध्यान में आता है कि बालक के स्वभाव में परिवर्तन आ रहा है, वह जल्दी उत्तेजित हो जाता है। बालक पलट कर उल्टा-सीधा जवाब देता है। ऐसा क्यों हो रहा है और इसे कैसे ठीक करें, समझ में नहीं आता।</p>
<p>बालक घर में नित नई माँग करता है। अपने लिए व घर के लिए ये चाहिए, वो चाहिए, उस ब्रांड की चाहिए, इस ब्रांड की नहीं चाहिए। अभिभावक सोचते है इतनी छोटी अवस्था में बालक को इतनी सारी बातें कैसे पता होती हैं?और इतनी सारी माँग और महंगे ब्रांड परिवार के बजट से बाहर हैं यह बालक को कैसे समझाएँ? एक घर में पिताजी ने बड़े पुत्र से कहा, “बेटा एक गिलास पानी लाना”। पुत्र की ओर से कोई प्रतिक्रिया नहीं। तीन-चार बार कहने पर भी कोई प्रतिक्रिया नहीं आई और ना ही एक गिलास पानी आया। अब छोटे पुत्र ने कहा, “पिताजी, आपको तो पता है बड़ा भाई कुछ काम नहीं करता। आप ऐसा करिए, स्वयं जाकर पानी पीजिए और एक गिलास पानी मेरे लिए भी लेते आइए।’</p>
<p>अभिभावक सोचते हैं कि बालक छोटे-छोटे काम क्यों नहीं करते, बड़ों का कहना क्यों नहीं मानते? कभी-कभी अभिभावकों के मन में प्रश्न आता है, “बालक बड़ा हो रहा है, विशेषकर जब वह कक्षा 9 से 12 में होता है, उस अवस्था में हमारी बात क्यों नहीं मानता? कुछ भी कार्य करना है, कहीं भी आना-जाना है, हमसे न पूछता है न बताता है। हमारे नियंत्रण से बाहर होता जा रहा है। ऐसा क्यों हो रहा है? जबकि हमने बचपन से अब तक उसकी सब बातों का ध्यान रखा है। उसकी हर माँग को पूरा किया है। उसने मुँह से निकाला नहीं और हमने पूरा किया। फिर भी ऐसा क्यों हो रहा है, समझ में नही आता।</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone wp-image-4022" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2021/09/1-1-300x169.jpg" alt="" width="1104" height="622" srcset="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2021/09/1-1-300x169.jpg 300w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2021/09/1-1-768x432.jpg 768w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2021/09/1-1.jpg 853w" sizes="auto, (max-width: 1104px) 100vw, 1104px" /></p>
<p>कभी-कभी बालक के सम्बन्ध में ध्यान आता है कि वह जल्दी-जल्दी अस्वस्थ हो रहा है। इस कारण से विद्यालय से बार-बार अवकाश लेना पड़ता है। बालक के अध्ययन पर भी इसका प्रभाव पड़ रहा है। डॉक्टर से चर्चा करते हैं कि ऐसा बार-बार क्यों होता है, तो ठीक उत्तर नहीं मिलता। फिर बालक के प्रति धारणा बन जाती है कि ये जल्दी अस्वस्थ होता ही है। जब ऋतु बदलती है तो अस्वस्थ होना ही है। अस्वस्थ जल्दी क्यों हो रहा है अथवा जल्दी अस्वस्थ न हो इसके बारे में समझ में नहीं आता। एक स्थाई विषय ‘जल्दी अस्वस्थ होना’ जीवनकाल में जुड़ जाता है।</p>
<p>उपरोक्त सब बातें हमारे सामने 21वीं सदी की चुनौतियां के रूप में खड़ी हुई हैं। ऐसे में अभिभावकों का प्रबोधन अति आवश्यक हो जाता है। पूर्व में प्रबोधन परिवार व समाज करता था, आज नहीं करता। अतः यह दायित्व विद्यालय पर आ गया है। आज अभिभावकों की शिक्षा 21वीं सदीं की चुनौतियों को ध्यान में रखकर करना समाज व युग की आवश्यकता हो गई है।</p>
<p>(लेखक विद्या भारती हरियाणा प्रान्त के संगठन मंत्री है और विद्या भारती प्रचार विभाग की केन्द्रीय टोली के सदस्य है।)</p>
<p>और पढ़ें : <span style="color: #000080;"><strong><a style="color: #000080;" href="https://rashtriyashiksha.com/child-centered-activity-based-education-skill-development/" target="_blank" rel="noopener">बाल केन्द्रित क्रिया आधारित शिक्षा-26 (कौशल विकास)</a></strong></span></p>
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		<title>बाल केन्द्रित क्रिया आधारित शिक्षा-26 (कौशल विकास)</title>
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		<dc:creator><![CDATA[राष्ट्रीय शिक्षा]]></dc:creator>
		<pubDate>Fri, 14 May 2021 09:44:04 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[अध्यापक शिक्षा]]></category>
		<category><![CDATA[नवीनतम]]></category>
		<category><![CDATA[बाल केन्द्रित क्रिया आधारित शिक्षा]]></category>
		<category><![CDATA[श्री रवि कुमार जी]]></category>
		<category><![CDATA[bal kendrit kriya aadharit]]></category>
		<category><![CDATA[indian education]]></category>
		<category><![CDATA[Rashtriya shiksha]]></category>
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					<description><![CDATA[<p> &#8211; रवि कुमार एक नवयुवक स्नातक पूर्ण कर आजीविका के लिए किसी के पास जाता है और नौकरी के लिए पूछता है। सामने वाला प्रश्न पूछता है, “आपको क्या आता&#8230; </p>
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]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: right;"> &#8211; रवि कुमार</p>
<p style="text-align: justify;"><img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone wp-image-3178" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2021/05/SkillDevelopment-24-2-2021-300x206.jpg" alt="" width="952" height="654" srcset="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2021/05/SkillDevelopment-24-2-2021-300x206.jpg 300w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2021/05/SkillDevelopment-24-2-2021.jpg 500w" sizes="auto, (max-width: 952px) 100vw, 952px" /></p>
<p style="text-align: justify;">एक नवयुवक स्नातक पूर्ण कर आजीविका के लिए किसी के पास जाता है और नौकरी के लिए पूछता है। सामने वाला प्रश्न पूछता है, “आपको क्या आता है?” नवयुवक कहता है, “मैंने स्नातक पूर्ण की है।” सामने से वही प्रश्न पुनः दोहराया जाता है। नवयुवक उत्तर देता है, “मैंने स्नातक 60% अंकों से उत्तीर्ण की है।” सामने से फिर प्रश्न आता है, “आपको कुछ आता है तो नौकरी के विषय में विचार कर सकते है।” नवयुवक सोच में पड़ जाता है कि मैं स्नातक हूँ। मुझे और क्या आना चाहिए? यह आज की वस्तुस्थिति है। डिग्री तो है परन्तु कुछ करना नहीं आता। किसी विषय में कुशलता प्राप्त नहीं की। ऐसा क्यों है? क्योंकि कौशल विकास को शिक्षा का अंग नहीं माना गया। विद्यार्थी कुछ विषयों को पढ़ता है, उसकी परीक्षा देता है और डिग्री प्राप्त करता है।</p>
<p style="text-align: justify;">राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 में कौशल विकास को शिक्षा का अंग माना है और विद्यालयीन शिक्षा में कक्षा छह से सम्मिलित किया है। विद्यार्थी कौशल विकास की विभिन्न विधाओं में किसी एक विधा को अपनी रूचि अनुसार कक्षा छह से आठ तक रूचि विकास की दृष्टि से और कक्षा 9 से 12 एक व्यावसायिक विषय के रूप में रूप में सीखेगा। इससे विद्यार्थी यदि चाहे तो अपने आगामी जीवन में कौशल विकास की इस विधा को करियर का विषय भी बना सकेगा अथवा स्नातक के साथ साथ उसके पास कुछ न कुछ कुशलता भी रहेगी।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>क्या है कौशल विकास : </strong>वास्तविकता में कौशल विकास क्या है और यह कौन सी आयु से प्रारंभ होता है? इस पर विचार करेंगे तो कौशल विकास है कर्मेन्द्रियों (हाथ, पैर और वाणी) एवं ज्ञानेन्द्रियों (आँख, नाक, कान, जीभ और त्वचा) की कुशलता। ये सब जितने कुशल होंगे व्यक्ति अपने सभी कार्य ठीक प्रकार से कर पाएगा। यह तभी संभव है जब परिवार शिक्षा से विद्यालय शिक्षा तक सभी में कर्मेन्द्रियों व ज्ञानेन्द्रियों की कुशलता प्राप्त करने के लिए प्रयास हो।</p>
<p style="text-align: justify;"><img loading="lazy" decoding="async" class=" wp-image-3179" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2021/05/iStock_17072380_XLARGE-300x200.jpg" alt="" width="560" height="373" srcset="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2021/05/iStock_17072380_XLARGE-300x200.jpg 300w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2021/05/iStock_17072380_XLARGE-1024x683.jpg 1024w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2021/05/iStock_17072380_XLARGE-768x512.jpg 768w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2021/05/iStock_17072380_XLARGE-1536x1024.jpg 1536w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2021/05/iStock_17072380_XLARGE-2048x1365.jpg 2048w" sizes="auto, (max-width: 560px) 100vw, 560px" /></p>
<blockquote><p><strong>विद्यालय में कैसे करे : </strong>हाथ से काम करना, उपयोगी वस्तुएं बनाना, उत्कृष्ट वस्तुओं का निर्माण करना, कोई भी विषय प्रायोगिक रूप से सीखना आदि प्राथमिक शिक्षा का प्राण है, ऐसा सभी को आत्मसात करना चाहिए। खेलों के लिए जिस प्रकार मैदान अनिवार्य है, उसी प्रकार कौशल विकास के लिए कार्यशाला अनिवार्य है। जीवन के कार्यों को आसान बनाने के लिए विभिन्न प्रकार की तकनीक आनी चाहिए और उसमें प्रयुक्त होने वाले यंत्रों को चलाने की कुशलता प्राप्त करना भी आवश्यक है। ऐसा करने के लिए सक्षम शरीर और एकाग्र मन भी चाहिए।</p></blockquote>
<p style="text-align: justify;">उदाहरण के लिए उबले आलू छीलने के लिए केवल हाथ चाहिए परन्तु काटने के लिए चाकू चाहिए। कील ठोकने के लिए हथौड़ी, रेखा खींचने के लिए पट्टी, कद्दूकस करने के लिए किसनी, लिखने के लिए लेखनी और रंग भरने के लिए ब्रुश चाहिए। झाड़ू, पोंछा, हाथ का पंखा, चलनी, धौंकनी, रस्सी, फावड़ा, कुदाल, चिमटा, पेचकस आदि असंख्य उपकरण हैं जिनका उपयोग कर हम अनेक प्रकार के कार्य संपन्न करते हैं। इन छोटे-बड़े, स्थूल-सूक्षम, कम या अधिक जटिल उपकरणों का सफाई से और कुशलता से उपयोग करना सीखना आवश्यक है। प्राथमिक शिक्षा का यह बहुत बड़ा अंग बनना चाहिए।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>कौशल मानचित्रण </strong><strong>Skill Mapping : </strong>उच्च प्राथमिक एवं माध्यमिक कक्षाओं के विद्यार्थियों के लिए यह जानना आवश्यक है कि उनकी रूचि कौशल विकास की किस विधा में है। इसके लिए कौशल मानचित्रण करना होगा। स्थानीय कौशलों को सूचीबद्ध कर उसका एक चार्ट बनाना होगा। एक प्रश्नावली बनाकर विद्यार्थियों से भरवाकर कौशल मानचित्रण कर सकते हैं। उदाहरण के लिए विद्यार्थियों से पूछ सकते है कि घर में जब खाली समय होता है तो क्या करते हैं। जब व्यक्ति खाली होता है तो सबसे रुचिकर काम करना ही पसंद करता है। कुछ विधाओं को बताकर विद्यार्थियों से यह भी पूछ सकते हैं कि उन्हें क्या क्या करना आता है और क्या अच्छे से करना आता है। कौशल मानचित्रण करते समय जल्दबाजी नहीं करनी चाहिए। जल्दबाजी से इस कार्य में परिणाम अच्छे नहीं आएँगे। कौशल मानचित्रण के पश्चात विधाशः विद्यार्थियों के अलग अलग समूह बना देने चाहिए।</p>
<p style="text-align: justify;">कौन कौन से विधाएँ हो सकती है कौशल विकास की? इस विषय में जब विचार करेंगे तो ध्यान में आएगा कि हमारे इर्द-गिर्द अनेक विधाएँ है जिनमें यदि कुशलता प्राप्त की जाएँ तो जीवन कितना सुगम हो सकता है और ये सब विधाएँ करियर का विषय भी हो सकती हैं। जैसे – पाक-कला, बागवानी, सिलाई, कढ़ाई, बुनाई, किचन गार्डनिंग, दूध डेरी, कला और शिल्प, मेहंदी लगाना, गायन, नृत्य, संगीत यंत्र, मिट्टी के बर्तन/सजावट का सामान बनाना, इलेक्ट्रीशियन, प्लम्बिंग, कारपेंटर, वेब डिजाइनिंग, डेटा प्रोग्रामिंग, कंप्यूटर टाइपिंग आदि। प्रारम्भ में दैनिक उपयोग में आने वाली वस्तुओं के निर्माण एवं दैनिक उपयोगी गतिविधियों को सीखा सकते हैं। जैसे कला शिल्प में हार्ड बोर्ड या चार्ट से ज्योमेट्री बॉक्स एवं पेन स्टैंड का निर्माण, सिलाई में बटन-टांका लगाना, पाक-कला में चाय-कॉफ़ी बनाना आदि।</p>
<p style="text-align: justify;">कौशल विकास के लिए हमें संसाधकों (Resource Person) की आवश्यकता रहेगी। सबसे पहले आचार्य परिवार व गैर शैक्षणिक कर्मचारियों में से ढूंढे कि किस विधा में कौन पारंगत है। इसके बाद अभिभावकों में से या विद्यालय से जुड़े समाज के विभिन्न लोगों में से संसाधक ढूंढ सकते हैं।</p>
<p style="text-align: justify;">इस योजना को क्रियान्वयन में लाने के लिए समय की आवश्यकता पड़ेगी। इसके लिए दो प्रकार हो सकते हैं। पहला है कौशल गतिविधि कालांश (Skill activity period) देना। इसके लिए साप्ताहिक एक या दो कालांश की योजना हो सकती है। दूसरा है कौशल दिवस (Skill Day) मनाना। इसके लिए मास में कोई एक दिवस निश्चित कर न्यूनतम चार से छह कालांश इस कार्य के लिए देना। यह एक या दो बार करने का विषय नहीं है। <em>वर्षभर की योजना में साप्ताहिक कालांश या मासिक दिवस को सम्मिलित करना आवश्यक है।</em> किस कक्षा स्तर तक उस विधा को कितना सिखाना इसका भी पाठ्यक्रम बनना चाहिए। विद्यार्थी अपनी रूचि, क्षमता व योग्यता से स्तरानुसार सीखे। <em>यह कार्य पूर्णतः प्रायोगिक है अतः प्रायोगिक पर ही बल रहे।   </em></p>
<p style="text-align: justify;">(लेखक विद्या भारती हरियाणा प्रान्त के संगठन मंत्री है और विद्या भारती प्रचार विभाग की केन्द्रीय टोली के सदस्य है।)</p>
<p style="text-align: justify;">और पढ़ें : <strong><a href="https://rashtriyashiksha.com/key-dimensions-of-teaching-method/" target="_blank" rel="noopener">बाल केन्द्रित क्रिया आधारित शिक्षा-25 (पाठन पद्धति के प्रमुख आयाम)</a></strong></p>
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		<title>बाल केन्द्रित क्रिया आधारित शिक्षा-25 (पाठन पद्धति के प्रमुख आयाम)</title>
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		<dc:creator><![CDATA[राष्ट्रीय शिक्षा]]></dc:creator>
		<pubDate>Mon, 15 Feb 2021 07:10:07 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[अध्यापक शिक्षा]]></category>
		<category><![CDATA[नवीनतम]]></category>
		<category><![CDATA[बाल केन्द्रित क्रिया आधारित शिक्षा]]></category>
		<category><![CDATA[श्री रवि कुमार जी]]></category>
		<category><![CDATA[bhartiya shiksha]]></category>
		<category><![CDATA[education]]></category>
		<category><![CDATA[IndianEducation]]></category>
		<category><![CDATA[Rashtriya shiksha]]></category>
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					<description><![CDATA[<p> &#8211; रवि कुमार ‘बाल केंद्रित क्रिया आधारित शिक्षा’ यह सर्व विदित है। इसका अर्थ भी सब समझते है। परंतु इसका व्यवहार रूप देखने को कम मिलता है। इसे कक्षाकक्ष में&#8230; </p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: right;"> &#8211; रवि कुमार</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone wp-image-2761" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2021/02/CUE_UrvashiSahni_PrernaSchool001-300x169.jpg" alt="" width="1031" height="581" srcset="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2021/02/CUE_UrvashiSahni_PrernaSchool001-300x169.jpg 300w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2021/02/CUE_UrvashiSahni_PrernaSchool001-1024x577.jpg 1024w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2021/02/CUE_UrvashiSahni_PrernaSchool001-768x432.jpg 768w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2021/02/CUE_UrvashiSahni_PrernaSchool001.jpg 1030w" sizes="auto, (max-width: 1031px) 100vw, 1031px" /></p>
<p>‘बाल केंद्रित क्रिया आधारित शिक्षा’ यह सर्व विदित है। इसका अर्थ भी सब समझते है। परंतु इसका व्यवहार रूप देखने को कम मिलता है। इसे कक्षाकक्ष में उतारने के लिए दो बातें है – पाठन पद्धति व विषय वस्तु। पाठन पद्धति यानि किस प्रकार से शिक्षण का कार्य हो रहा है और विषय वस्तु यानि जो शिक्षण में दिया जा रहा है। इस लेख में हम पाठन पद्धति के प्रमुख आयामों की चर्चा करेंगे।</p>
<p>पाठन पद्धति के चार प्रमुख आयाम है &#8211;</p>
<p>१ कंठस्थीकरण</p>
<p>२ अभ्यास</p>
<p>३ कौशलों का विकास</p>
<p>४ स्वतंत्रता, कल्पनाशीलता, सृजनशीलता</p>
<p><strong>कंठस्थीकरण</strong> : कंठस्थ करना यानि कंठ के अंदर लेना। आजकल रटना शब्द ज्यादा प्रचलित है और व्यवहार में भी अधिक है। शिक्षक व अभिभावक सभी को लगता है कि आज के समय में रटना आवश्यक है। यहां हम कंठस्थ करने की बात कर रहे है, रटने की नहीं। आज से पूर्व की पीढ़ी से जब पूछते है कि विद्यालय समय में जो कंठस्थ किया और आज भी कंठस्थ है, सुना सकते है, बताएं। तो वे अनेक ऐसी विषय वस्तु सुनाते है जो बाल्यकाल में कंठस्थ की थी। यथा &#8211; कबीर-रसखान-तुलसी के दोहे, श्लोक, मंत्र, कविताएं आदि अनेकनेक। 20 संख्या तक पहाड़े तो सभी को स्मरण रहते है। डेढ़, ढाई, आधा, पौना के पहाड़े भी कुछ को स्मरण मिलते है। उन्हें आजतक स्मरण है और आज की पीढ़ी को केवल परीक्षा तक। कारण आजकल रटना होता है और पहले कंठस्थ करना।</p>
<p>एक वर्ग में रामलीला के विषय में चर्चा हुई। भारत में ग्रामीण व नगरीय आँचल में सर्वदूर रामलीला की परंपरा है। वर्ग के प्रतिभागियों से पूछा गया कि रामलीला में किस-किस ने अभिनय किया है। कुछ ने हाथ उठाया। उनमें से किसी एक को उस अभिनय के दौरान जो बोला जाता था, उसे बोलने का मौका दिया। रामलीला में परशुराम-लक्ष्मण संवाद आता है। एक प्रतिभागी ने लक्ष्मण का अभिनय किया था। इन्होंने अपना संवाद बोला। साथ ही दूसरा एक प्रतिभागी जिसने परशुराम का अभिनय किया होगा। स्वतः ही बोलना प्रारम्भ हो गया। काफी देर तक संवाद चलता रहा। बिना देखे परशुराम-लक्ष्मण संवाद देर तक बोलना सभी के लिए आश्चर्य की बात थी। क्योंकि दोनों प्रतिभागियों को कंठस्थ था, इसकारण बिना बाधा के वे बोल पाए।</p>
<p>बाल अवस्था की शिक्षा में कौन-कौन सी विषय वस्तु को कंठस्थ करवाना, यह चिन्हित कर उसे शिक्षण में सम्मिलित करना आवश्यक है। छोटी आयु में समझ कम होती है परन्तु स्मृति तेज होती है। इसका लाभ उठाकर कंठस्थीकरण को पाठन पद्धति का अंग बनाया जाए। आयु बढ़ती है तो समझ विकसित होती जाती है और स्मरणशक्ति कम होती जाती है। जो बातें समझने लायक है उन्हें कंठस्थ नहीं करना बल्कि उन्हें समझने पर जोर देना। परन्तु जो बातें याद करना है उन्हें कंठस्थ ही करना चाहिए।</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone wp-image-2760" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2021/02/shiksha-bharti-vidyalaya-rohtak-ho-rohtak-schools-2elnmj1-300x204.jpg" alt="" width="1026" height="698" srcset="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2021/02/shiksha-bharti-vidyalaya-rohtak-ho-rohtak-schools-2elnmj1-300x204.jpg 300w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2021/02/shiksha-bharti-vidyalaya-rohtak-ho-rohtak-schools-2elnmj1.jpg 422w" sizes="auto, (max-width: 1026px) 100vw, 1026px" /></p>
<p><strong>अभ्यास</strong> : यह एक आवश्यक आयाम है बाल शिक्षा में। परंतु आजकल इसका रूप बदल गया है जिससे कठिनाई हो गई है। आजकल अभ्यास का अर्थ बार-बार टेस्ट लेना हो गया है। अभ्यास का अर्थ है जो एक बार सीखा उसे बार बार करके देखना जब तक वह पक्का न हो जाए। गणित में एक सूत्र के आधार पर प्रश्न हल किया। जब तक अनेक प्रश्नों को हल नहीं करेंगे और बार-बार नहीं करेंगे तो अभ्यास कैसे होगा। एक गीत सीखा, बार-बार उसे गाने से यानि अभ्यास करने से वो पक्का होगा और वर्षों तक गीत स्वर सहित स्मरण रहेगा। अभ्यास बार-बार टेस्ट के रूप में नहीं बार-बार करने के रूप में शिक्षण में सम्मिलित होने चाहिए।</p>
<p style="text-align: center;"><strong>&#8220;करत करत अभ्यास ते जड़मति होत सुजान।</strong></p>
<p style="text-align: center;"><strong>रसरी आवत-जात के सिल पर परत निशान।।&#8221;</strong></p>
<p>वर्तमान मानसिकता में अभ्यास को आदरपूर्वक नहीं  देखा जाता। अल्प अभ्यास से संतुष्ट होना आम प्रवृति हो गई है। दीर्घ अभ्यास को सहज माना जाना चाहिए। एक ही क्रिया बार बार करने पर यांत्रिकता आती है और यांत्रिकता आते ही सीखना बंद हो जाता है। अभ्यास को यांत्रिकता से बचाना अध्यापकों का दायित्व है। बालक निश्चिंतता, सुख, आराम से तथा मनोयोगपूर्वक अभ्यास हो सके इसलिए समय, सुविधा, सहयोग और मार्गदर्शन की आवश्यकता रहती है।</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone  wp-image-2770" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2021/02/Shiksha-Bharti-Vidyalaya-shiksha2-300x225.jpg" alt="" width="1035" height="776" srcset="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2021/02/Shiksha-Bharti-Vidyalaya-shiksha2-300x225.jpg 300w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2021/02/Shiksha-Bharti-Vidyalaya-shiksha2.jpg 600w" sizes="auto, (max-width: 1035px) 100vw, 1035px" /></p>
<p><strong>कौशलों का विकास</strong> : बालक में विभिन्न प्रकार के कौशलों की संभावना रहती है। उन्हें विकसित करने के लिए अवसर मिलना आवश्यक है। यहां तीन प्रकार के कौशलों पर विचार करेंगे &#8211; एक, हस्त कौशल, दूसरा वाणी कौशल, तीसरा पैर का कौशल। हस्त कौशल यानि हाथों की कुशलता; वाणी कौशल यानि बोलने की कुशलता। सुंदर लेखन, सीधी, आड़ी, तिरछी, वक्र रेखाएं खींचना, गांठ लगाना, रंगोली में रंग भरना, फुल चुनना, कपड़े व्यवस्थित करना, मिट्टी को आकृति देना, कोई वस्तु या कागज चिपकाना, सज्जा करना, कागज से आकृति बनाना आदि अनेक क्रियाएँ है जो हस्त कौशल विकसित करती है। शुद्ध उच्चारण व सस्वर गायन, किसी की आवाज नकल करना, धारा प्रवाह बोलना आदि क्रियाएँ वाणी के कौशल को विकसित करने के लिए आवश्यक है। सुंदर ढंग से खड़े रहना, चलना, कूदना, दौड़ना, हाथ में प्याला लेकर रेखा पर बिना पानी गिराए चलना आदि पैर के कौशल विकास के लिए है।</p>
<p>इन सब कौशलों के विकास से बड़े-बड़े कार्य करने की आधारभूत तैयारी होती है। शरीर सद्धता है, मन एकाग्र होता है, बुद्धि का विकास होता है, आनंद आता है और आत्मविश्वास बढ़ता है। जीवनभर के अनेक प्रकार के व्यवहारों और अध्ययन के लिए अति आवश्यक कौशलों को हस्तगत करना बाल अवस्था में ही संभव है।</p>
<p><strong>स्वतंत्रता</strong><strong>, कल्पनाशीलता, सृजनशीलता</strong> : ज्ञानात्मक, भावात्मक एवं क्रियात्मक विकास के लिए ये तीनों आवश्यक है। कोई भी क्रिया जितनी सही ढंग से करनी आवश्यक है, उतना ही अपने ढंग से करना आवश्यक है। क्रिया को बांध देने से वह पूर्णता की ओर नहीं बढ़ती है। न ही उसमें नवीनता आती है। जैसे चित्र बनाना यदि बताया तो बालक को स्वतंत्रता से करने दीजिए उसे बांधे मत। जो उसकी कल्पना में आएगा वह चित्रित होगा। चित्र उस बालक की मौलिकता को प्रकट करेगा। निबन्ध रटने की बजाय किस प्रकार लिखते है यह बालक को सिखाएं और उसकी कल्पना को शब्दों में पिरोने दे। कहानी में से उसे स्वयं प्रश्न बनाने दे और उसका उत्तर भी स्वयं ही ढूंढने दे। पूर्ण व्यक्तित्व के विकास के लिए यह तीनों आवश्यक है।</p>
<p>(लेखक विद्या भारती हरियाणा प्रान्त के संगठन मंत्री है और विद्या भारती प्रचार विभाग की केन्द्रीय टोली के सदस्य है।)</p>
<p>और पढ़ें : <a href="https://rashtriyashiksha.com/child-centered-activity-based-education-teaching-english-language/" target="_blank" rel="noopener">बाल केन्द्रित क्रिया आधारित शिक्षा-24 (आंग्ल भाषा शिक्षण)</a></p>
<p>&nbsp;</p>
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		<title>बाल केन्द्रित क्रिया आधारित शिक्षा-24 (आंग्ल भाषा शिक्षण)</title>
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		<dc:creator><![CDATA[राष्ट्रीय शिक्षा]]></dc:creator>
		<pubDate>Thu, 26 Nov 2020 05:17:55 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[अध्यापक शिक्षा]]></category>
		<category><![CDATA[नवीनतम]]></category>
		<category><![CDATA[बाल केन्द्रित क्रिया आधारित शिक्षा]]></category>
		<category><![CDATA[श्री रवि कुमार जी]]></category>
		<category><![CDATA[Baal Kendrit Kriya Aadharit Shikshan]]></category>
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					<description><![CDATA[<p> &#8211; रवि कुमार भारत में आंग्ल भाषा सीखना एक भूत की तरह है, जिसका डर हमेशा लगा रहता है। यह स्वाभाविक भी है। आंग्ल भाषा यह भारतीय भाषा नहीं है&#8230; </p>
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]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: right;"> &#8211; रवि कुमार</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone wp-image-2379" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2020/11/language_1557814906154-300x169.jpg" alt="बाल केन्द्रित क्रिया आधारित शिक्षा" width="902" height="508" srcset="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2020/11/language_1557814906154-300x169.jpg 300w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2020/11/language_1557814906154.jpg 600w" sizes="auto, (max-width: 902px) 100vw, 902px" /></p>
<p>भारत में आंग्ल भाषा सीखना एक भूत की तरह है, जिसका डर हमेशा लगा रहता है। यह स्वाभाविक भी है। आंग्ल भाषा यह भारतीय भाषा नहीं है और न ही इसका भारतीय भाषाओँ से सरोकार है। इसकी लिपि एवं उच्चारण किसी भी भारतीय भाषा से मिलता नहीं है। भारतीय भाषाओँ की गंगोत्री संस्कृत को कहा जाता है इस कारण भारतीय भाषाओँ में काफी कुछ मिलता जुलता है। आंग्ल भाषा आंग्ल प्रदेश यानि इंग्लैंड से यहाँ आई है। भारत की स्वतंत्रता के पश्चात आंग्ल भाषा का उपयोग समाप्त होकर भारतीय भाषाओँ का ही सर्वत्र उपयोग होना चाहिए था। परन्तु इस सब के लिए आम जनमानस की दृढ़ इच्छा शक्ति की आवश्यकता होती है।</p>
<p>आज आंग्ल भाषा आम जनमानस में अपना स्थान बनाए हुए है। विद्यार्थी जीवन में आंग्ल भाषा पढ़ना सभी को अनिवार्य लगता है। केवल आंग्ल भाषा ही नहीं आंग्ल माध्यम से पढ़ना अभिभावकों की प्रथम मांग रहती है। एक नई भाषा एवं सम्पर्क की भाषा के रूप में आंग्ल भाषा सीखना तो ठीक है। परन्तु सभी विषय आंग्ल भाषा में सीखना यह अनुचित है। आंग्ल माध्यम के कारण विद्यार्थी न तो विषय सिख पाता है और न ही भाषा। फिर आंग्ल माध्यम है तो पुस्तकें भी आंग्ल भाषा में है। परन्तु देशभर में आंग्ल भाषा का शिक्षण ही स्थानीय भाषा में होता है यानि भाषा रूपान्तर करके पढ़ाया जाता है। आंग्ल भाषा के शिक्षकों को यदि कहा जाए कि आपको कक्षा के 40 मिनट में आंग्ल भाषा में ही पढाना है तो 90% शिक्षकों को कठिनाई आएगी, साथ ही विद्यार्थियों को भी। यहाँ आंग्ल भाषा का विरोध नहीं है बल्कि वस्तुस्थिति की समीक्षा है।</p>
<p><strong>आंग्ल भाषा कैसे सिखाएं :</strong>  सबसे पहले आंग्ल भाषा के डर को विद्यार्थी के मन से निकालना होगा। मन में डर रहेगा तो सीखना कठिन है। सरल से कठिन की ओर ले जाना होगा। भाषा उतनी आती है जितनी अधिक उपयोग करते है। अतः कक्षा शिक्षण में आंग्ल भाषा का जितना अधिकाधिक उपयोग अध्यापक व विद्यार्थी करेगा भाषा उतनी आएगी। संभव हो तो अध्यापक द्वारा आंग्ल भाषा की कक्षा में सूचना दी जाए कि कक्षा में जो भी संवाद करना है आंग्ल भाषा में करना है, स्थानीय भाषा में नहीं, जैसी भी टूटी-फूटी आती है उसी में। अध्यापक को भी आंग्ल में ही पढ़ाना व संवाद करना है। ऐसा करने से धीरे-धीरे कक्षा में आंग्ल भाषा बोलने का विश्वास बढ़ने लगेगा। मन से डर निकलने पर एवं विश्वास बढ़ने पर शुद्धता की ओर ध्यान दिया जाए। कक्षाकक्ष में गतिविधि आधारित पढ़ाया जाए न कि भाषण आधारित।</p>
<p>भाषा में शब्दों की आवश्यकता रहती है। विद्यार्थी का शब्दकोष छोटा है तो भाषा बोलने में कठिनाई रहती है। विद्यार्थियों को नए-नए शब्द सीखने के लिए प्रेरित किया जाए। इसके लिए शब्दकोष का उपयोग करना सिखाए। विद्यार्थी को प्रतिदिन पांच नए शब्द अर्थ सहित अपनी कॉपी में लिखने को कहे। इससे विद्यार्थी के शब्दकोष का विस्तार होगा। विद्यार्थी आंग्ल भाषा का समाचार पत्र, कहानियों की पुस्तक आदि पढ़े। प्रारंभ में समझ कम आएगा, धीरे धीरे समझ आना बढ़ता जाएगा और भाषा का स्तर भी बढ़ेगा।</p>
<p><strong>कक्षा शिक्षण के दौरान विभिन्न गतिविधियाँ :</strong></p>
<ol>
<li>
<h5>चित्र वर्णन (Picture Description) – इस गतिविधि में कोई एक दृश्य का चित्र विद्यार्थियों के सामने रखा जाए और उसे देखकर चित्र में क्या है यह आंग्ल में बताने को कहे। विद्यार्थी को जो समझ आएगा, वह उसे कहेगा। इससे देखकर वर्णन करने की क्षमता बढ़ेगी।</h5>
</li>
<li>
<h5>समूह चर्चा (Group Discussion) – कक्षा को विभिन्न ग्रुपों में बाँट कर विषय देकर चर्चा करने को कहे। चर्चा के दौरान समूह प्रमुख चर्चा में आए बिन्दुओं को सूचीबद्ध करे और चर्चा पश्चात उन बिन्दुओं को सभी के सम्मुख रखे। सारा संवाद आंग्ल भाषा में हो और विषय पाठ्यक्रम आधारित हो।</h5>
</li>
<li>
<h5>कथा कथन (Story Telling) : पाठ्यपुस्तक में आई कथा को अपने शब्दों में व्यक्त करने को कहे। एक ही कथा को सभी अपने शब्दों में व्यक्त करे। कोई विषय या दृश्य बताकर कथा निर्माण के लिए भी बता सकते है।</h5>
</li>
<li>
<h5>वाक्य निर्माण (Sentence Making) : विद्यार्थियों को एक शब्द देकर या दृश्य बताकर न्यूनतम पांच वाक्य निर्माण को कहे। वाक्य निर्माण के पश्चात सभी के सम्मुख वाक्य पढ़ने को कहे। गलत वाक्य देकर ठीक वाक्य लिखने को कहे। विभिन्न शब्दों के फ्लेश कार्ड देकर वाक्य बनाने को कहा जाए।</h5>
</li>
</ol>
<p>इसी प्रकार आंग्ल भाषा में कविता पाठ, गीत गायन, भाषण प्रतियोगिता, नाट्य मंचन आदि गतिविधियां कक्षा कक्ष में करवा सकते है। व्याकरण को पाठ्यपुस्तक के साथ ही सिखाया जाए। व्याकरण प्रयोग आधारित सिखाया जाता है तो रुचिकर रहता है अन्यथा अरुचिकर। अन्ततोगत्वा व्याकरण का उपयोग तो सामान्य व्यव्हार में भाषा के शुद्धरूप में ही होता है।</p>
<p>आंग्ल माध्यम में शिक्षण होने से रटने की प्रवृति बढ़ी है। रटने से परीक्षा में अंक तो आ जाते है परन्तु अधिगम न के बराबर होता है। आंग्ल भाषा न आने के कारण और उसी में सभी विषय होने से ऐसा होता है। <strong>अतः विद्यार्थी को रटने की बजाय समझ कर पढ़ने के लिए प्रेरित करने का कार्य करना होगा।</strong></p>
<p><strong><img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone wp-image-2380" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2020/11/Learning-English-300x200.png" alt="Learning-English" width="902" height="601" srcset="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2020/11/Learning-English-300x200.png 300w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2020/11/Learning-English.png 600w" sizes="auto, (max-width: 902px) 100vw, 902px" />    </strong></p>
<blockquote><p><strong>एक भ्रम सभी के मन में रहता है कि आंग्ल भाषा में ही सब ज्ञान निहित है</strong><strong>। यह भ्रम भी विद्यार्थियों में से निकालना आवश्यक है। भारत का ज्ञान भारतीय भाषाओँ में लिपिबद्ध शास्त्रों में है और ज्ञान अनुभवजन्य है यानि अनुभूति से प्राप्त होता है। लिपिबद्ध को पढ़ने से केवल जानकारी प्राप्त होती है। और पश्चिम अभी भी भारत के ज्ञान के आसपास भी नहीं पहुंचा है।</strong></p></blockquote>
<p><em>एक नई भाषा</em><em>, संपर्क भाषा एवं विषय के रूप में आंग्ल भाषा को सीखना उचित होगा।</em> <em>अधुरा अधिगम अच्छा नहीं है अतः जो सीखे पूरा सीखे, ठीक सीखे और सिखाएं</em><em>।  </em></p>
<p>(लेखक विद्या भारती हरियाणा प्रान्त के संगठन मंत्री है और विद्या भारती प्रचार विभाग की केन्द्रीय टोली के सदस्य है।)</p>
<p>और पढ़ें : <a href="https://rashtriyashiksha.com/child-centered-activity-based-education-physical-education/" target="_blank" rel="noopener noreferrer">बाल केन्द्रित क्रिया आधारित शिक्षा-23 (शारीरिक शिक्षा)</a></p>
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		<title>बाल केन्द्रित क्रिया आधारित शिक्षा-23 (शारीरिक शिक्षा)</title>
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		<dc:creator><![CDATA[राष्ट्रीय शिक्षा]]></dc:creator>
		<pubDate>Sat, 24 Oct 2020 09:25:46 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[अध्यापक शिक्षा]]></category>
		<category><![CDATA[नवीनतम]]></category>
		<category><![CDATA[बाल केन्द्रित क्रिया आधारित शिक्षा]]></category>
		<category><![CDATA[श्री रवि कुमार जी]]></category>
		<category><![CDATA[education]]></category>
		<category><![CDATA[indian education]]></category>
		<category><![CDATA[Rashtriya shiksha]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>  &#8211; रवि कुमार स्वामी विवेकानन्द के अनुसार ‘श्रीमद भगवदगीता’ जैसे &#x200d;पवित्र ग्रंथ के अध्ययन से पूर्व फुटबॉल खेलना ज्यादा आवश्यक है। ‘श्रीमद भगवदगीता’ वीरों का शास्त्र है। भगवान श्रीकृष्ण द्वारा&#8230; </p>
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]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: right;">  &#8211; रवि कुमार</p>
<blockquote><p><strong><em>स्वामी विवेकानन्द के अनुसार ‘श्रीमद भगवदगीता’ जैसे &#x200d;पवित्र ग्रंथ के अध्ययन से पूर्व फुटबॉल खेलना ज्यादा आवश्यक है</em></strong><strong><em>। ‘श्रीमद </em></strong><strong><em>भगवदगीता’ वीरों का शास्त्र है। भगवान श्रीकृष्ण द्वारा महारथी अर्जुन को दिया गया दिव्य उपदेश है। उनका मानना था कि शरीर का बल बढ़ना आवश्यक है। शरीर स्वस्थ होगा तो समझ भी परिष्कृत होगी।</em></strong></p></blockquote>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone wp-image-2281" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2020/10/vidya-bharati-6-300x208.jpg" alt="vidya-bharati" width="779" height="540" srcset="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2020/10/vidya-bharati-6-300x208.jpg 300w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2020/10/vidya-bharati-6-1024x711.jpg 1024w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2020/10/vidya-bharati-6-768x533.jpg 768w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2020/10/vidya-bharati-6-1536x1067.jpg 1536w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2020/10/vidya-bharati-6.jpg 1600w" sizes="auto, (max-width: 779px) 100vw, 779px" /></p>
<p>शारीरिक व खेलकूद का विद्यार्थी जीवन में अत्यधिक महत्व है। गत दिनों सीबीएसई ने एक सर्कुलर द्वारा विद्यालयों को आदेशित किया कि कक्षा 9 से 12 में शारीरिक का कालांश अनिवार्य रूप से होना चाहिए। और फिट इंडिया के नाम से एक प्रकल्प लांच किया जिसके अंतर्गत विद्यालय में शारीरिक व खेलकूद की गतिविधियों का संचालन होना है। जिस विद्यालय में शारीरिक की गतिविधियों का संचालन ठीक होगा उन्हें फिट इंडिया सर्टिफिकेट व फ्लैग प्रदान किया जाएगा। सीबीएसई द्वारा उपरोक्त सर्कुलर आदेशित करना व फिट इंडिया प्रकल्प लांच करना विद्यार्थी जीवन में शारीरिक व खेलकूद की महत्ता को दर्शाता है।</p>
<p>एक कार्टून आता है जिसमें दो दृश्य बने है, एक दृश्य 1990 के दशक का है। पुत्र मैदान में खेल रहा है, उसकी मां उसका कान खींचकर घर की ओर ले जा रही है और पढ़ने के लिए कह रही है। दूसरा दृश्य आज का है जिसमें बालक मोबाइल में लगा है और मां उसका कान पकड़कर घर से बाहर की ओर ले जा रही है तथा खेलने के लिए कह रही है। यह कार्टून वस्तुस्थिति को अभिव्यक्त कर रहा है।</p>
<p>विद्यार्थी जीवन में शारीरिक व खेलकूद में सहभागिता रहती है तो उसका प्रभाव जीवनभर रहता है। बालक में रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है। शारीरिक विकास व वृद्धि ठीक से होती है। मौसम परिवर्तन का स्वास्थ्य पर विपरीत प्रभाव नहीं पड़ता। खेलकूद से सामुदायिक भावना का विकास होता है।</p>
<p>परंतु वस्तुस्थिति यह है कि बालक घर, गली-मोहल्ले, पार्क आदि  में नहीं खेलता और विद्यालय में भी सभी बालकों को अवसर नहीं मिलता। मुख्य विषयों की पढ़ाई, पाठ्यक्रम पूर्ण करना और परीक्षा तैयारी के नाम पर शारीरिक का कालांश शहीद हो जाता है। सत्र प्रारम्भ के कुछ मास अधिक गर्मी के होते है और अंत के परीक्षा की तैयारी के। दोनों स्थितियों में शारीरिक व खेलकूद नहीं होता। जहां खेलकूद होता है, वहां कुल संख्या के 5 से 10% को अवसर मिलता है। शेष बालक मात्र दर्शक बनकर रहते है। परंतु यह नई पीढ़ी के निर्माण के लिए सर्वथा अनुचित है। सभी घटकों को मिलकर इस स्थिति को बदलने की आवश्यकता समय की मांग है।</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone wp-image-2283" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2020/10/10_10_2012-10cpr12-c-2-300x183.jpg" alt="vidya-bharati" width="767" height="468" srcset="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2020/10/10_10_2012-10cpr12-c-2-300x183.jpg 300w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2020/10/10_10_2012-10cpr12-c-2.jpg 380w" sizes="auto, (max-width: 767px) 100vw, 767px" /></p>
<p><strong>शारीरिक व खेलकूद का क्रियान्वयन विद्यालय में कैसे करे</strong></p>
<p>विद्यालय में शारीरिक शिक्षक है या नहीं, सभी आचार्यों का शारीरिक प्रशिक्षण होना आवश्यक है ताकि बालकों को अधिकाधिक सिखाया जा सके। प्रथमतः वंदना सभा में दिवसानुसार शारीरिक क्रियाकलापों का समायोजन करना अच्छा रहता है। उसमें दस मिनट न्यूनतम शारीरिक (वार्मअप एक्सरसाइज़), व्यायाम योग, सूर्यनमस्कार, आसन आदि हो सकते है। वंदना सभा में शारीरिक होने से उसका प्रभाव दिनभर रहता है। कक्षा शिक्षण के दौरान बालक गतिमान व एकाग्रचित होकर अध्ययन करता है। दो विद्यालयों में दस मिनट न्यूनतम शारीरिक वंदना सभा में होने लगा। वहां बातचीत में आचार्यों से पूछा गया कि न्यूनतम शारीरिक का कक्षा शिक्षण पर क्या प्रभाव हो रहा है? आचार्यों ने अपनी कक्षा शिक्षण अनुभव के आधार पर बताया कि अब विद्यार्थी कक्षा में अंतिम कालांश तक चुस्त व एकाग्र रहते रहते है, आलस्य उनके निकट नहीं आता। केवल प्रातः दस मिनट के शारीरिक का इतना प्रभाव!</p>
<p><strong>कालांश व्यवस्था</strong><strong>:</strong> प्राथमिक कक्षाओं में साप्ताहिक छह कालांश, उच्च प्राथमिक कक्षाओं में साप्ताहिक तीन तथा माध्यमिक व उच्च माध्यमिक कक्षाओं में दो-दो साप्ताहिक कालांशों को व्यवस्था हो और यह कालांश मैदान में जाकर ही सम्पन्न हो। कालांश में समता, संचलन, 3-4 मिनट के सभी की सहभागिता वाले खेल हो। शारीरिक कालांश की व्यवस्था वर्षभर की रहे। किसी भी अवस्था में यह समाप्त न की जाए।</p>
<p><strong>वार्षिक कार्यक्रम:</strong> वर्ष में एक बार खेलकूद दिवस या सप्ताह मनाया जाए। इस दौरान खेलकूद स्पर्धाओं में सभी को भाग लेने का अवसर प्राप्त हो, ऐसी व्यवस्था बने। वर्ष में एक बार सूर्य रथसप्तमी के अवसर पर सूर्यनमस्कार महायज्ञ का आयोजन हो और एक बार घोष वादन के साथ संचलन का कार्यक्रम किया जाए।</p>
<p>विद्यालय एथलेटिक्स के अलावा कोई दो खेल का चयन कर उसकी टीम के सतत अभ्यास की व्यवस्था बनाए। अभ्यास का समय विद्यालय समय से पूर्व अथवा पश्चात हो ताकि 60 मिनट वार्मअप, शारीरिक क्रियाएं, स्ट्रेचिंग आदि हो और 30 मिनट खेल का अभ्यास हो सके।</p>
<p>विद्यालय में शारीरिक व खेलकूद के क्रियान्वयन की बात होती है तो अधिकांशतः कुछ एक जैसी बाते सुनने में आती है। यथा हमारे यहाँ मैदान नहीं है, खेलकूद कैसे करवाए, हमारे यहाँ शारीरिक आचार्य नहीं है। विद्यार्थी गर्मी सहन नहीं कर सकते, खेलने से चोट लग सकती है, इस प्रकार के भय भी रहते है। एक धारणा सर्वदूर बनी है कि मिट्टी में नहीं खेलना चाहिए। मिट्टी में खेलने से कपड़े व शरीर गन्दा हो जाता है। मैदान के खेल बालिकाओं के लिए नहीं है।</p>
<p>मैदान यदि विद्यालय में नहीं है तो आसपास होगा, बस वहां आने जाने के लिए यातायात की व्यवस्था करनी होगी। मैदान निकट में नहीं है, दूर है तो सप्ताह में आधा दिवस कक्षाएं क्रमशः ले जाने की व्यवस्था बन सकती है। विद्यालय परिसर में कम स्थान होने पर इंडोर गेम्स की व्यवस्था बनाई जा सकती है। कम स्थान में क्या-क्या शारीरिक क्रियाकलाप हो सकते है, इसकी योजना बनाई जाए एवं आचार्यों को इसका प्रशिक्षण दिया जाए। गर्मी व चोट से डरते रहेंगे तो शारीरिक विकास कैसे होगा। इसके लिए आचार्य व बालक के मन से भी भय निकालने की आवश्यकता है। इस विषय में अभिभावक को भी जागरूक करने की आवश्यकता है। <em>एक रिपोर्ट में दावा किया गया है कि जो बालक बाल्यकाल में मिट्टी के अधिक संपर्क में रहे है उन्हें बाद में धूल आदि से कोई एलर्जी नहीं होती और वे अन्यों की अपेक्षा अधिक स्वस्थ व निरोगी रहते है।</em></p>
<blockquote><p><strong><em>प्रत्येक विद्यार्थी नियमित खेलना चाहता है। क्या आचार्य व अभिभावक उसकी यह इच्छा पूर्ण करने का मनोभाव रखते है? विद्यार्थी जीवन में हुआ शारीरिक विकास व नियमित व्यायाम की आदत जीवनभर साथ रहती है। इससे एक स्वस्थ भारत की कल्पना कर सकते है। क्या आचार्य व अभिभावक इस विषय में अपना योगदान दे सकता है? यह हम सबके लिए विचारणीय प्रश्न है।</em></strong></p></blockquote>
<p>(लेखक विद्या भारती हरियाणा प्रान्त के संगठन मंत्री है और विद्या भारती प्रचार विभाग की केन्द्रीय टोली के सदस्य है।)</p>
<p>और पढ़ें : <a href="https://rashtriyashiksha.com/teacher-education-child-centered-activity-based-education-sanskrit-language-teaching/" target="_blank" rel="noopener noreferrer">बाल केन्द्रित क्रिया आधारित शिक्षा-22 (संस्कृत भाषा शिक्षण)</a></p>
<p>&nbsp;</p>
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		<item>
		<title>बाल केन्द्रित क्रिया आधारित शिक्षा-22 (संस्कृत भाषा शिक्षण)</title>
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		<dc:creator><![CDATA[राष्ट्रीय शिक्षा]]></dc:creator>
		<pubDate>Thu, 16 Jul 2020 10:26:36 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[अध्यापक शिक्षा]]></category>
		<category><![CDATA[नवीनतम]]></category>
		<category><![CDATA[बाल केन्द्रित क्रिया आधारित शिक्षा]]></category>
		<category><![CDATA[श्री रवि कुमार जी]]></category>
		<category><![CDATA[Bal Kendrit Kriya A]]></category>
		<category><![CDATA[education]]></category>
		<category><![CDATA[indian education]]></category>
		<category><![CDATA[Rashtriya shiksha]]></category>
		<category><![CDATA[Sanskrit]]></category>
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					<description><![CDATA[<p> &#8211; रवि कुमार संस्कृत भाषा विश्व की प्राचीनतम भाषा है और अनेक भाषाओं की जननी है। भारतीय संस्कृति, परम्परा, इतिहास, मान बिदु, जीवन मूल्य आदि की वाहक कोई भाषा है&#8230; </p>
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]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: right;"> &#8211; रवि कुमार</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone wp-image-1717" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2020/07/Sanskrut-Bhasha-300x193.jpg" alt="" width="908" height="584" srcset="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2020/07/Sanskrut-Bhasha-300x193.jpg 300w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2020/07/Sanskrut-Bhasha.jpg 646w" sizes="auto, (max-width: 908px) 100vw, 908px" /></p>
<p>संस्कृत भाषा विश्व की प्राचीनतम भाषा है और अनेक भाषाओं की जननी है। भारतीय संस्कृति, परम्परा, इतिहास, मान बिदु, जीवन मूल्य आदि की वाहक कोई भाषा है तो वह संस्कृत है। भारतीय ज्ञान-विज्ञान संस्कृत साहित्य में भरा हुआ है। इस ज्ञान-विज्ञान का दोहन करने में सबसे बड़ी कठिनाई यह है कि जो ज्ञान विज्ञान के ज्ञाता है या विद्यार्थी है वो संस्कृत नहीं जानते, और जो संस्कृत जानने वाले है वे ज्ञान-विज्ञान में रूचि नहीं रखते।</p>
<p>अध्ययन-अध्यापन में संस्कृत भाषा का शिक्षण भी सीमित हो गया है। संस्कृत मात्र एक विषय रह गया है और जो मुख्य विषयों से बाहर है। इस कारण से विद्यार्थियों की रूचि के रूप में संस्कृत भाषा गौण होती जा रही है। संस्कृत आचार्य द्वारा संस्कृत पढ़ाते समय गौरव का अनुभव करना एवं विद्यार्थी को गौरव का अनुभव करवाना, इसकी बजाय मन में हीनता का भाव आचार्य व विद्यार्थी में रहता है।</p>
<p><strong>क्यों आवश्यक है संस्कृत :</strong> संस्कृत भाषा प्राचीन होने के साथ-साथ शब्द भण्डार के हिसाब से अत्यंत समृद्ध है। संस्कृत भाषा के पठन-पाठन से उच्चारण में स्पष्टता आती है एवं संवाद कौशल बढ़ता है, जो अन्य भाषा संवाद में भी सहायक होता है। ध्यान में आना आवश्यक है कि जो व्यक्ति संस्कृत भाषा में अध्ययन करते है, उनकी हिंदी संवाद में पकड़ हिंदी विषय में अध्ययन करने वाले विद्यार्थियों से अधिक होती है। सुभाषित, श्लोक आदि के भाव-अर्थ सहित कंठस्थ करने से जीवन में संस्कार का आगमन सहजता से होता है।</p>
<blockquote><p><strong>क्योंकि संस्कृत अनेक भाषाओं की जननी है और अन्यान्य भाषाओं में विभिन्न शब्द संस्कृत से गए है, अतः अन्य भाषा सीखने में सरलता होती है। संस्कृत भाषा व्यक्ति में उत्साह निर्माण करती है। पंचकोशीय विकास में विज्ञानमय कोश के विकास में संस्कृत भाषा की विशेष भूमिका है।</strong></p></blockquote>
<p><strong>विषय के रूप में नहीं भाषा के रूप में पढाएं : </strong>संस्कृत विषय सामान्यतः कक्षा 6 से लेकर 12 तक ऐच्छिक विषय के रूप में पाठ्यचर्या में सम्मिलित है। उसमें भी अंक आधारित परीक्षा व्यवस्था होने के कारण जो विषय अच्छे अंक सरलता से दिला सकता है, विद्यार्थी उस विषय की ओर उन्मुख होता है। जहाँ विषय पढ़ाया भी जाता है वहां ऐच्छिक विषय के कारण पाठ्यक्रम पूर्ति पर ही केन्द्रित होता है।</p>
<p>सर्वप्रथम यह आवश्यक है कि संस्कृत विषय पढ़ाया जाएँ और कक्षा प्रथम से दशम तक अनिवार्य रूप से पढाया जाएँ। दूसरा यह है कि संस्कृत विषय रूप में नहीं भाषा के रूप में पढ़ाया जाएँ। जब भाषा के रूप में पढ़ाने की बात होती है तो इस बात पर ध्यान रहेगा कि विद्यार्थी संस्कृत व्याकरण को अधिगम करे, बिना अनुवाद के संस्कृत को समझ सके और संस्कृत में संवाद भी कर सके। इस सब के लिए कक्षा शिक्षण में विद्यार्थी को अवसर भी प्राप्त हो ऐसा भी प्रयास प्रारंभ होगा।</p>
<p><strong>कक्षा शिक्षण संभाषण पद्धति से हो : </strong>‘संस्कृत भारती’ संगठन संस्कृत भाषा आमजन की भाषा बने इसके लिए प्रयासरत है और ‘संस्कृत भारती’ इस विषय में काफी सफल भी हो रही है। श्री प्रताप जी संस्कृत भारती के उत्तर क्षेत्र के संगठन मंत्री रहे और सन 2009 में अपने प्रवास की योजना में गुरुग्राम आएं। गुरुग्राम में साउथ सिटी में एक सम्भाषण शिविर की योजना हुई। प्रतिदिन सायंकाल दो घंटे की कक्षा लगती थी और सभी आयु वर्ग के लोग उस शिविर में आते थे। एक दिन श्री प्रताप जी कार्यालय की रसोई में उपयोग होने वाले बर्तनों को थैले में डाल रहे थे। मेरे मन में जिज्ञासा हुई कि वे ऐसा क्यों कर रहे है? मेरे पूछने पर उन्होंने कहा – आज शिविर में इस विषय का शिक्षण है कि रसोई में उपयोग होने वाले बर्तनों को संस्कृत में क्या कहते है और सामान्य व्यवहार में रसोई से जुड़ा संवाद संस्कृत में कैसे होता है। यह है संभाषण पद्धति।</p>
<p>भाषा रटने से नहीं आती, परीक्षा देने से नहीं आती, अधिकाधिक उपयोग से आती है। कक्षा कक्ष में भाषा सिखानी है तो अधिकाधिक उपयोग कैसे होगा, इसका विचार व क्रियान्वयन करने की आवश्यकता है अतः संभाषण (संवाद) पद्धति सर्वाधिक उपयुक्त है। इस दृष्टि से आचार्य का संवाद कौशल संस्कृत में अच्छा होगा तो विद्यार्थियों पर भी प्रभाव पढ़ेगा। आचार्य यदि यह निश्चित कर ले कि कक्षा व विद्यालय परिसर में वह संस्कृत में ही संवाद करेगा और संस्कृत कक्षा में विद्यार्थी अधिकधिक संस्कृत में संवाद करेंगे तो ‘सोने पर सुहागा’ होगा।</p>
<p><strong>संस्कृत आधारित विभिन्न गतिविधियाँ : </strong>संस्कृत भाषा को केंद्र में रखकर अनेक प्रकार की गतिविधियाँ कक्षा-कक्ष व विद्यालय परिसर में कर सकते है। इन गतिविधियों से भाषा के प्रति रूचि निर्माण होती है और प्रतिभागिता करते करते सुगमता से अधिगम स्तर बढ़ता है।</p>
<p><strong>वंदना सभा</strong> : विद्यालय की वंदना सभा में अनेक बातें जोड़ सकते है। वंदना सभा का संचालन विद्यार्थियों द्वारा होता है। सप्ताह में दो दिन संस्कृत भाषा में वंदना सभा का संचालन हो। उन्हीं दो दिनों में संस्कृत सम्भाषण के कुछ शब्द बताना, उससे सम्बंधित प्रश्नोत्तर आदि में संस्कृत विषय को जोड़ सकते है। वंदना सभा में जन्म दिवस शुभकामना के रूप में वैदिक मंत्रोच्चारण किया जाए। साप्ताहिक योजनानुसार संस्कृत में कथा वाचन तथा समाचार वाचन हो एवं सुभाषित कंठस्थ करवाया जाएँ। नित्य पंचांग कथन व श्यामपट्ट लेखन हो।</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone wp-image-1719" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2020/07/IMG-20180808-WA0008-300x92.jpg" alt="" width="907" height="278" srcset="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2020/07/IMG-20180808-WA0008-300x92.jpg 300w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2020/07/IMG-20180808-WA0008-1024x314.jpg 1024w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2020/07/IMG-20180808-WA0008-768x236.jpg 768w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2020/07/IMG-20180808-WA0008.jpg 1033w" sizes="auto, (max-width: 907px) 100vw, 907px" /></p>
<p>किसी एक प्रदर्शन बोर्ड को संस्कृत बोर्ड बनाकर विद्यार्थियों द्वारा नियमित दैनिक अथवा साप्ताहिक सामग्री उस पर प्रदर्शित कर सकते है। विद्यालय में वर्ष में एक बार संस्कृत सप्ताह मनाया जाए। इस सप्ताह के दौरान विभिन्न प्रकार के क्रियाकलाप, प्रतियोगिताएँ, नाट्य मंचन, सांस्कृतिक कार्यक्रम यथा श्लोकोच्चारणम्, सुक्तिलेखनम्, संवाद, भाषण, निबंध लेखन  आदि की योजना हो। वर्षभर में विभिन्न आयोजनों में मंच संचालन संस्कृत में भी हो। विभिन्न मांगलिक कार्यक्रमों पर यज्ञ आदि का सम्पादन आचार्य व विद्यार्थियों द्वारा करवाया जाएँ। विद्यालय वार्षिकोत्सव में संस्कृत भाषा में भी कार्यक्रम हो। भित्ति लेखन में संस्कृत के आदर्श वाक्यों, सुभाषित, गीता श्लोकों, वेद मन्त्रों आदि का लेखन हो। संस्कृत विषय की कक्षा आरम्भ पर संस्कृत  गीत/सुभाषित आदि करवाया जाएँ।</p>
<p>विद्यालय में विद्यार्थियों की संस्कृत भाषा परिषद बनाई जाएँ जिसका संरक्षक संस्कृत आचार्य हो। उपरोक्त वर्णित गतिविधियों की योजना संस्कृत भाषा परिषद द्वारा योजित हो और इन गतिविधियों में प्रयासपूर्वक अधिकतम विद्यार्थियों की सहभागिता करवाई जाएँ।</p>
<p><em><strong>उपसंहार रूप में संस्कृत भाषा शिक्षा क्षेत्र में सामान्य संवाद का विषय बने और इसके माध्यम से विद्यार्थी के अधिगम व बौद्धिक स्तर का उन्नयन हो, ऐसी भारतीय शिक्षा की वर्तमान आवश्यकता है। इस आवश्यकता की पूर्ति में हम सभी शिक्षा क्षेत्र के कार्यकर्त्ता अपनी भूमिका सुनिश्चित करे ऐसी अपेक्षा है।</strong></em></p>
<p>और पढ़ें : <a href="https://rashtriyashiksha.com/child-centered-activity-based-education-hindi-subject-teaching/" target="_blank" rel="noopener noreferrer">बाल केन्द्रित क्रिया आधारित शिक्षा – 11 (हिन्दी भाषा शिक्षण)</a></p>
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		<title>बाल केंद्रित क्रिया आधारित शिक्षा-21 (गृहकार्य)</title>
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		<dc:creator><![CDATA[राष्ट्रीय शिक्षा]]></dc:creator>
		<pubDate>Thu, 07 May 2020 11:31:52 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[अध्यापक शिक्षा]]></category>
		<category><![CDATA[नवीनतम]]></category>
		<category><![CDATA[बाल केन्द्रित क्रिया आधारित शिक्षा]]></category>
		<category><![CDATA[श्री रवि कुमार जी]]></category>
		<category><![CDATA[Home Work]]></category>
		<category><![CDATA[indian education]]></category>
		<category><![CDATA[Kriya Aadharit shikshan]]></category>
		<category><![CDATA[Rashtriya shiksha]]></category>
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					<description><![CDATA[<p> &#8211; रवि कुमार विद्यालयीन शिक्षा में बालक को दो प्रकार के कार्य करने होते है, एक कक्षा कार्य, दूसरा गृहकार्य। कक्षा कार्य में आचार्य द्वारा पढ़ाया गया पाठ समझना, कक्षा&#8230; </p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: right;"> &#8211; रवि कुमार</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone wp-image-1449" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2020/05/handwriting-child-school-Indian-woman-helping-her-daughter-with-homework-shut-300x175.jpg" alt="" width="823" height="480" srcset="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2020/05/handwriting-child-school-Indian-woman-helping-her-daughter-with-homework-shut-300x175.jpg 300w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2020/05/handwriting-child-school-Indian-woman-helping-her-daughter-with-homework-shut.jpg 760w" sizes="auto, (max-width: 823px) 100vw, 823px" /></p>
<p>विद्यालयीन शिक्षा में बालक को दो प्रकार के कार्य करने होते है, एक कक्षा कार्य, दूसरा गृहकार्य। कक्षा कार्य में आचार्य द्वारा पढ़ाया गया पाठ समझना, कक्षा के दौरान गतिविधियों में भाग लेना, यूनिट टेस्ट आदि। गृहकार्य में जो पाठ विद्यालय में पढ़ाया गया उस पर आधारित कार्य जैसे प्रश्नोत्तर लिखना, याद करना, प्रश्न हल करना आदि। गृहकार्य के विषय में आचार्य व अभिभावक विशेष आग्रही रहते है। आचार्य समझता है कि गृहकार्य देना आवश्यक है और अभिभावक समझता है कि यह अति आवश्यक है। इस ‘आवश्यक’ व ‘अति आवश्यक’ के चक्कर में बेचारा बालक! उसकी स्थिति अजीब-सी होती है।</p>
<p>एक स्थान पर गृहकार्य के विषय में आचार्यों से चर्चा हुई तो अजीब बात ध्यान में आई। एक आचार्य द्वारा एक कक्षा में कम गृह कार्य दिया गया। बाद में दो-तीन अभिभावकों द्वारा इस विषय में शिकायत की गई कि गृहकार्य कम क्यों दिया गया। अभिभावकों को पुनः शिकायत का अवसर न मिले इसलिए तब के बाद उस आचार्य द्वारा अधिक गृहकार्य दिया जाने लगा। यह केवल उस कक्षा की बात नहीं होगी, अनेकानेक कक्षाओं में ऐसा ही होता होगा।</p>
<p>परिवार में छोटी बहन से फोन पर चर्चा हुई। कुशलक्षेम पूछने के पश्चात् बेटी (भांजी) से बात करवाने को कहा। बेटी बात नहीं करना चाहती थी। पूछने पर बहन ने बताया कि आज गृहकार्य पूर्व दिनों की अपेक्षा अधिक मिला है। वह काफी देर से गृहकार्य कर रही है, परन्तु पूर्ण ही नहीं हो रहा। उसका मन चिड़चिड़ा-सा हो गया है। छोटी कक्षाओं में अधिक गृहकार्य मिलने पर बालक का मन ऐसे ही चिड़चिड़ा होता होगा।</p>
<p><strong>क्या करें : </strong>गृहकार्य देते समय ये विचार करे कि कक्षा स्तर अनुसार कितना देना है। गृहकार्य पूर्ण करने में बालक को औसतम कितना समय लगेगा। तीन प्रकार का गृहकार्य<strong> – </strong>लिखित, याद करना और यूनिट टेस्ट की तैयारी। छह मुख्य विषय है – एक दिन में सभी विषयों का लिखित गृहकार्य न दिया जाएँ। इसी प्रकार एक दिन में सभी विषयों का याद करने का गृहकार्य और न ही एक दिन सभी विषयों का यूनिट टेस्ट हो। तीनों प्रकार के गृहकार्य में संतुलन बनाना आवश्यक है। तीनों प्रकार के गृहकार्य को छह विषयों में सप्ताह के छह दिनों में बाँट कर संतुलन बन सकता है। सोम-मंगल को दो विषयों का लिखित कार्य, बुध-वीर को दूसरे दो विषयों का व शुक्र-शनि को तीसरे दो विषयों का लिखित कार्य दिया जाएँ। इसी प्रकार शेष दोनों प्रकार के गृहकार्यों के सम्बन्ध में भी ऐसा हो सकता है।</p>
<p>कला, संगीत व कम्यूटर विषय गतिविधि के रूप में पढ़ाया जाए। उसमें जो भी कार्य है वह कक्षाकक्ष में ही करवाया जाएँ। इन विषयों का गृहकार्य न दिया जाएँ। ऐसा करने से इन विषयों के बारे में रूचि और आनंद बढ़ेगा।</p>
<p><strong>गृहकार्य में रचनात्मकता एवं नवीनता :</strong> बालक ने जो पाठ पढ़ा, उसी के प्रश्नोत्तर लिखे, उन्हीं प्रश्नोत्तर को याद किया और उन्हीं की परीक्षा दी गयी। आजकल प्रायः यही चलता है! कोई पूछेगा कि और क्या चलना चाहिए? क्या यही शिक्षा हैं?</p>
<p><strong>स्वामी विवेकानन्द जी ने कहा है, “शिक्षा केवल सूचनाओं का एकत्रीकरण मात्र नहीं है, यह तो जीवन का गहन प्रशिक्षण है।”</strong></p>
<blockquote><p><strong><em>“</em></strong><strong><em>जीवन में रचनात्मकता व नवीनता आवश्यक है। गृहकार्य में रचनात्मकता एवं नवीनता आएं इसके लिए भी गहन चिंतन करने की एवं उस चिंतन को क्रियान्वयन में लाने की आवश्यकता है। एक ही प्रकार का गृहकार्य देते रहने से बोरियत आती है। घर में क्रिया आधारित, कौशल विकास आधारित एवं अनुभव आधरित सीखा जा सके ऐसा गृहकार्य देने की योजना हो। </em></strong></p></blockquote>
<p>जो पाठ कक्षाकार्य में सीखा है, उसे विस्तार दिया जा सके – ऐसा गृहकार्य दिया जाए। उदहारण स्वरुप – यदि गिनती सिखाई गई तो घर में कौन-सी वस्तु कितनी संख्या में है, गृहकार्य दिया जाए। भाषा में संज्ञा सिखाई गई तो घर में संज्ञा – नाम, वस्तु आदि प्रकार सहित क्या-क्या है, ऐसी सूची बनाएं करने को कहा जाए। गाँव पढ़ाया गया तो गृहकार्य में अपने गाँव का वर्णन लिखे, कहा जाए। ऐसे अनेक आयाम हो सकते है जो गृहकार्य के विषय में नई दिशा प्रदान कर सकते है।</p>
<p><strong>गृह कार्य ऐसा भी :</strong> बिना पुस्तक के व गत पाठ्यक्रम के आधार पर गृहकार्य सोचेंगे तो ध्यान में आएगा कि घर एक विद्यालय कैसे बनेगा। जैसे –</p>
<p>चाय बनाना &#8211; बालक द्वारा घर में 4 कप चाय बनाई गई। चार कप चाय में कितना मि०ली० पानी, दूध, कितने ग्राम चीनी, चायपत्ती डली, कितना समय लगा?  इससे गणित की गणना, मापन, जोड़, समय गणना व चाय बनाने का कौशल सीख सकते है।</p>
<p>रसोई में कितने प्रकार के बर्तन, कितनी प्रकार की धातु के बर्तन, उनके हिंदी, अंग्रेजी व संस्कृत नाम, कौन सा बर्तन (गिलास, थाली, चम्मच आदि) कितनी संख्या में है? धातु के रासायनिक नाम कौन से है? अनाज व दालों की सूची बनाएं, इन पदार्थों के रासायनिक नाम, निहित पौष्टिक तत्व एवं इनके उत्पन्न होने की प्रक्रिया लिखे आदि।</p>
<p>बेस्ट आउट ऑफ वेस्ट क्या-क्या बना सकते है? घर में सफाई करते है, प्रति वर्ग फुट या प्रति वर्ग मीटर कितना समय लगता है?</p>
<p>कहानी पढ़कर घर में सुनाओ व अपनी आवाज में रिकॉर्ड कर आचार्य को व्हाट्सएप्प पर भेजों। घर में बड़ों से कहानी सुनो फिर उसे अपनी आवाज में रिकॉर्ड कर भेजों। अपने रिश्तेदारों से बात कर हालचाल पूछों, उस बातचीत व अनुभव पर प्रस्ताव लिखो। इससे बालक तकनीक, कथा कथन व संस्कार सीखेंगे। भाषा विकास की दृष्टि से लेख लिखना, समाचार पत्र पढ़ना, कंठस्थ करने के लिए श्लोक, गीत, दोहे आदि देना।</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone wp-image-1448" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2020/05/indian-education-overview-300x152.jpg" alt="" width="809" height="410" srcset="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2020/05/indian-education-overview-300x152.jpg 300w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2020/05/indian-education-overview-768x389.jpg 768w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2020/05/indian-education-overview.jpg 800w" sizes="auto, (max-width: 809px) 100vw, 809px" /></p>
<p>बड़ी कक्षाओं के लिए घर का बजट बनाओ, घर के बैंक अकाउंट की स्टेटमेंट अध्ययन करो, रसोई के मसालों में क्या-क्या मेडिसिन है, घर में भौतिक, रसायन एवं जीव विज्ञान कहाँ-कहाँ है, अपने परिवार की टाइमलाइन बनाओ, घर प्रयोग होने वाले कपड़ों के ब्रांड व कंपनी डिटेल्स बनाओ, एक सप्ताह का भौगोलिक वातावरण, तापमान आदि का चार्ट एक्सेल में बनाओं व अध्ययन करो।</p>
<p>उपरोक्त सब पाठ्यक्रम का भाग है।</p>
<p>गृहकार्य के सम्बन्ध में कुछ बातें और ध्यान देने की आवश्यकता है। गृहकार्य से बालक की स्वछंदता तो समाप्त नहीं हो रही। गृहकार्य बालक के लिए है या अभिभावक के लिए है? गृहकार्य कर्मकांड तो नहीं हो गया है। गृहकार्य से सीखना-सिखाना वाला विषय गौण तो नहीं हो गया है।</p>
<blockquote><p><strong><em>घर में बालक नियमित खेले – यह स्वस्थ एवं सामाजिक जीवन की अनिवार्यता है। बालक घर में उद्योग करे अर्थात् घर के विभिन्न प्रकार के कार्य करे, उससे बालक का कौशल विकसित होगा। बालक घर में स्वाध्याय कर ज्ञानवर्धन करे। घर में बालक अपने बड़ों का स्नेह व मार्गदर्शन सहज संवाद से प्राप्त करे। वह बड़ों से कथा सुनकर संस्कार ग्रहण करे। बालक आयु अनुसार विश्राम एवं नींद ले। यह सब बालक के सर्वांगीण विकास के लिए आवश्यक है। कहीं गृहकार्य का बोझ इन सब में बाधक तो नहीं बन रहा?</em></strong></p></blockquote>
<p>और पढ़ें : <a href="https://rashtriyashiksha.com/what-time-should-study-in-student-life/" target="_blank" rel="noopener noreferrer">पढ़ें कब अर्थात् विद्यार्थी जीवन में अध्ययन किस समय करे?</a></p>
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