<?xml version="1.0" encoding="UTF-8"?><rss version="2.0"
	xmlns:content="http://purl.org/rss/1.0/modules/content/"
	xmlns:wfw="http://wellformedweb.org/CommentAPI/"
	xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/"
	xmlns:atom="http://www.w3.org/2005/Atom"
	xmlns:sy="http://purl.org/rss/1.0/modules/syndication/"
	xmlns:slash="http://purl.org/rss/1.0/modules/slash/"
	>

<channel>
	<title>वासुदेव प्रजापति Archives - राष्ट्रीय शिक्षा : शिक्षा में समाज प्रबोधन rashtriyashiksha.com</title>
	<atom:link href="https://rashtriyashiksha.com/category/author/vasudev-prajapati/feed/" rel="self" type="application/rss+xml" />
	<link>https://rashtriyashiksha.com/category/author/vasudev-prajapati/</link>
	<description>सा विद्या या विमुक्तये</description>
	<lastBuildDate>Fri, 18 Sep 2026 06:24:28 +0000</lastBuildDate>
	<language>en-US</language>
	<sy:updatePeriod>
	hourly	</sy:updatePeriod>
	<sy:updateFrequency>
	1	</sy:updateFrequency>
	

<image>
	<url>https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2026/05/cropped-Logo-Hindi-32x32.png</url>
	<title>वासुदेव प्रजापति Archives - राष्ट्रीय शिक्षा : शिक्षा में समाज प्रबोधन rashtriyashiksha.com</title>
	<link>https://rashtriyashiksha.com/category/author/vasudev-prajapati/</link>
	<width>32</width>
	<height>32</height>
</image> 
	<item>
		<title>वन्देमातरम् का 150वां जयन्ती वर्ष – भाग तीन</title>
		<link>https://rashtriyashiksha.com/the-150th-anniversary-year-of-vande-mataram-part-three/</link>
					<comments>https://rashtriyashiksha.com/the-150th-anniversary-year-of-vande-mataram-part-three/#respond</comments>
		
		<dc:creator><![CDATA[राष्ट्रीय शिक्षा]]></dc:creator>
		<pubDate>Fri, 18 Sep 2026 06:24:28 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[नवीनतम]]></category>
		<category><![CDATA[लेख]]></category>
		<category><![CDATA[वासुदेव प्रजापति]]></category>
		<category><![CDATA[IKS]]></category>
		<category><![CDATA[Rashtriya shiksha]]></category>
		<category><![CDATA[vande mataram]]></category>
		<category><![CDATA[भारतीय ज्ञान परम्परा]]></category>
		<category><![CDATA[राष्ट्रीय शिक्षा]]></category>
		<category><![CDATA[वन्दे मातरम्]]></category>
		<guid isPermaLink="false">https://rashtriyashiksha.com/?p=9426</guid>

					<description><![CDATA[<p>– वासुदेव प्रजापति नेहरु व सरकार की बेतुकी सफाई सभी लोग राष्ट्रगान की सच्चाई जानने को उत्सुक थे। इसलिए बाध्य होकर पं. नेहरु को संविधान सभा में यह सफाई देनी&#8230; </p>
<p>The post <a href="https://rashtriyashiksha.com/the-150th-anniversary-year-of-vande-mataram-part-three/">वन्देमातरम् का 150वां जयन्ती वर्ष – भाग तीन</a> appeared first on <a href="https://rashtriyashiksha.com">राष्ट्रीय शिक्षा : शिक्षा में समाज प्रबोधन</a>.</p>
]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: right;">– वासुदेव प्रजापति</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>नेहरु व सरकार की बेतुकी सफाई</strong></p>
<p style="text-align: justify;">सभी लोग राष्ट्रगान की सच्चाई जानने को उत्सुक थे। इसलिए बाध्य होकर पं. नेहरु को संविधान सभा में यह सफाई देनी पड़ी, जिसकी मुख्य बात यह है। “सन् 1947 को न्यूयार्क में संयुक्त राष्ट्र की जनरल एसेंबली में हमारे प्रतिनिधि से राष्ट्रगान की रिकॉर्डिंग मांगी गई थी। हमारे पास उस समय किसी उपयुक्त राष्ट्रगान की रिकार्डिंग नहीं थी, जिसे हम न्यूयार्क भेज सकते। संयोग से उस समय हमारे प्रतिनिधि के पास जन-गण-मन की रिकॉर्ड थी जिसे आर्केस्ट्रा को दे दी गई। जब आर्केस्ट्रा पर इसे बजाया गया तो अनेक देशों के विदेशी प्रतिनिधियों ने इसे बहुत पसंद किया। इस नई तर्ज का रिकॉर्ड बनाकर भारत भेज दिया गया, तब से यही हमारी सेना, विदेशी दूतावासों आदि में आवश्यक अवसरों पर बजाया जाता है। मंत्रिमंडल ने निर्णय लिया है कि संविधान सभा में अंतिम निर्णय न होने तक जन-गण-मन ही राष्ट्रगान के रूप में गाया जाता रहेगा। इसके बाद में पश्चिम बंगाल सरकार का संदेश मिला है कि वन्देमातरम् को ही राष्ट्रगान बनाए रखा जाए।</p>
<p style="text-align: justify;">भारत सरकार के सूचना और प्रसारण विभाग ने दो पुस्तिकाएँ, ‘फेक्ट्स एबाउट इंडिया’ और ‘अवर नेशनल सोंग्स’ प्रकाशित की थीं। इन दोनों में राष्ट्रगान से सम्बन्धित कुछ विचारणीय बिन्दु निम्नलिखित हैं –</p>
<p style="text-align: justify;">“वन्देमातरम् और जन-गण-मन दोनों का ही आभायुक्त इतिहास है, अतः दोनों ही पुरानी स्मृतियाँ जगाते हैं। दोनों ही महान लेखकों की कृतियाँ हैं। राष्ट्रगान में राष्ट्रीय भावना होनी चाहिए और वह गेय होना चाहिए। यद्यपि वन्देमातरम् ने देशभक्तों को महानतम बलिदान देने हेतु प्रेरित किया है, तथापि इसको राष्ट्रगान के रूप में स्वीकार करने में कठिनाई यह है कि इसका ‘हार्मोनाइजेशन’ नहीं हो सकता। विशेषज्ञों का मत है कि यह गीत कुछ आकारहीन और आनन्ददायी गुण के विषय में संदिग्ध है। और वन्देमातरम् में संगीत की दृष्टि से लय, ताल व सुर का भी अभाव है।”</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>सफाई से उभरे प्रश्न व उनका समाधान</strong><strong>?</strong></p>
<p style="text-align: justify;">उपर्युक्त सफाई में तनिक भी सच्चाई नहीं है, इसलिए अनेक ज्वलन्त प्रश्न उभरे हैं, जो अधोलिखित हैं &#8211;</p>
<ol style="text-align: justify;">
<li>राष्ट्रगान पर संविधान सभा में प्रस्ताव द्वारा निर्णय क्यों नहीं लिया गया? बार बार इस विषय को टालने के पीछे किसका हाथ था और क्यों?</li>
</ol>
<p style="text-align: justify;">राष्ट्रगान के विषय को स्वयं नेहरु जी ने उलझाए रखा। वे अपनी सत्ता को बनाए रखने के लिए मुसलमानों को नाराज नहीं करना चाहते थे। मुसलमानों की वाहवाही लूटने तथा रवीन्द्र समर्थकों को खुश करने के लिए पं. नेहरु ने ‘टैगोर शतवार्षिकी ग्रंथमाला की भूमिका में लिखा था कि &#8211;</p>
<p style="text-align: justify;">“कविगुरु के साथ मेरी अंतिम मुलाकात के मौके पर मैंने उनसे नये भारत के लिए नया राष्ट्रगान लिखने का अनुरोध किया था, जिसे उन्होंने आंशिक रूप से स्वीकार भी किया था। तब हमारे दिमाग में जन-गण-मन की बात नहीं आई थी। उसके बाद में कविगुरु दिवंगत हो गए। इसलिए अब मुझे यह बताने में अत्यन्त प्रसन्नता हो रही है कि कुछ वर्षों के बाद भारत के आजाद हो जाने पर हमने उनके ‘जन-गण-मन’ को ही राष्ट्रगान के पद पर अभिषिक्त किया है। मुझे सन्तोष है कि मैं स्वयं काफी हद तक इस निर्णय के लिए जिम्मेदार रहा। यह एक महान राष्ट्रगान तो है ही, साथ में यह हमें कविगुरु रवीन्द्रनाथ का स्मरण भी करवाता रहेगा। “नेहरुजी की यह गर्वोक्ति स्वयं उनको वन्देमातरम् के विरुद्ध मुख्य षडयंत्रकारी सिद्ध करने हेतु पर्याप्त है।</p>
<ol style="text-align: justify;" start="2">
<li>दि. 24 जनवरी 1950 की संविधान सभा में अन्तिम समय में अध्यक्ष द्वारा घोषणा करने के पीछे किसकी योजना थी? घोषणा में कहा गया कि ‘यह उचित समझा गया’ तो यह किसने समझा?</li>
</ol>
<p style="text-align: justify;">उक्त दिन संविधान सभा के अन्तिम समय में अध्यक्ष द्वारा घोषणा करवाने के पीछे नेहरुजी की योजना थी, उन्होंने ही ऐसा करना उचित समझा था। यदि योजना सबकी सहमति से बनी होती तो पुरुषोत्तमदास जी टण्डन कांग्रेस के अध्यक्ष पद से त्यागपत्र नहीं देते।</p>
<ol style="text-align: justify;" start="3">
<li>न्यूयार्क स्थित हमारे प्रतिनिधि के पास जन-गण-मन की रिकार्ड कहाँ से आई? वन्देमातरम् की रिकॉर्ड प्राप्त करने के प्रयास क्यों नहीं किए गए?</li>
</ol>
<p style="text-align: justify;">नेहरु जी शुरु से ही मुस्लिम तुष्टिकरण की नीति पर चल रहे थे। इसलिए उन्होंने योजनापूर्वक जन-गण-मन की रिकॉर्ड ही भिजवाई थी। तब 15 अगस्त 47 को राष्ट्रसंघ की जनरल एसेंबली में जन-गण-मन की रिकॉर्ड बजी थी। यदि प्रयत्न किया जाता तो उस समय अनेक देशभक्त बंगाली परिवार न्यूयार्क में रहते थे, उनसे वन्देमातरम् की रिकॉर्ड लेकर बजवाई जा सकती थी।</p>
<ol style="text-align: justify;" start="4">
<li>नेहरु जी ने अज्ञान का परिचय देते हुए कहा कि न्यूयार्क में उपस्थित संभ्रांत विदेशी प्रतिनिधियों ने जन-गण-मन धुन की बहुत सराहना की थी। क्या राष्ट्रगान के चयन की कसौटी विदेशी प्रतिनिधि होते हैं?</li>
</ol>
<p style="text-align: justify;">कितनी हास्यास्पद बात है कि जन-गण-मन की धुन विदेशियों को पसन्द आई इसलिए उसे राष्ट्रगान बना दिया गया। राष्ट्रगान राष्ट्र की आत्मा का प्रतीक होता है और राष्ट्र के धर्म व संस्कृति का परिचायक होता है। किसी राष्ट्रगान का पूर्व इतिहास, स्वतंत्रता संग्राम में उसकी महत्वपूर्ण भूमिका सर्वाधिक मायने रखती है। जिस गान की धुन एवं शब्द स्वदेशवासियों को स्वदेशप्रेम का पाठ सिखाए, उसके गान से देशभक्तों की धमनियों में खून खोलने लगे, वही राष्ट्रगान की सही कसौटी होती है। अमरीका में बैठे कुछ विदेशियों की पसन्द हमारे राष्ट्रगान के चयन की कसौटी कैसे हो सकती है? किसी भी राष्ट्र में विदेशियों की पसन्द का राष्ट्रगान चुना जाना, आज तक किसी भी व्यक्ति ने नहीं सुना होगा।</p>
<ol style="text-align: justify;" start="5">
<li>राष्ट्रगान के विषय पर अनेक संस्थाओं ने जनमत संग्रह क्यों करवाया था?</li>
</ol>
<p style="text-align: justify;">संविधान सभा में राष्ट्रगान का निर्णय होने से पहले ही नेहरुजी ने अपनी मर्जी से वन्देमातरम् को हटाकर एक बिल्कुल नये गान को राष्ट्रगान के पद पर अभिषिक्त कर दिया, जो नेहरुजी की तानाशाही थी। इस तानाशाही के विरुद्ध सांकेतिक जनमत संग्रह किया गया था। सन् जुलाई 1949 में ‘अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद’ ने जो जनमत संग्रह आयोजित किया था, उसमें 5,19,435 लोगों ने भाग लिया था। उस जनमत संग्रह में 95% लोगों ने राष्ट्रगान के रूप में वन्देमातरम् के पक्ष में अपना मत डाला था। अतः पूरा देश वन्देमातरम् को ही राष्ट्रगान बनाना चाहता था, परन्तु नेहरुजी की तानाशाही जीत गई।</p>
<ol style="text-align: justify;" start="6">
<li>सरकारी सूचना पुस्तिकाओं में हास्यास्पद जानकारी क्यों दी गई?</li>
</ol>
<p style="text-align: justify;">दोनों पुस्तिकाओं में लिखी बातें मनघडंत थी। सरकार के सूचना और प्रसारण विभाग को जन-गण-मन का कौनसा आभायुक्त इतिहास दिखाई दे गया और इसने कौनसी पुरानी स्मृतियों को जगा दिया? जबकि वास्तविकता यह है कि वन्देमातरम् का इतिहास तो आभायुक्त है, परन्तु जन-गण-मण का तो कोई आभायुक्त इतिहास ही नहीं है। फिर भी जन-गण-मन को महान बताने वाली मिथ्या बातें हास्यास्पद नहीं तो ओर क्या है।</p>
<ol style="text-align: justify;" start="7">
<li>वन्देमातरम् के लिए आकारहीन व आनन्ददायी गुणों का अभाव जैसी बातें क्यों कही गई?</li>
</ol>
<p style="text-align: justify;">वन्देमातरम् को पदच्युत करने के लिए ऐसे असत्य विमर्श गढ़े गए, अन्यथा जिसने भी इसका भावार्थ समझा है, वह तो आनन्दित हो नाच उठा था। स्वयं गांधीजी ने कहा है कि “मैंने जब वन्देमातरम् को गाए जाते हुए सुना तो मैं आत्मविभोर हो गया।” फिर इसमें आनन्ददायी गुणों का अभाव कहाँ से आ गया।</p>
<ol style="text-align: justify;" start="8">
<li>वन्देमातरम् पर महत्वपूर्ण यह आपत्ति क्यों उठाई गई कि इसका हार्मोनाइजेशन नहीं हो पाता? इसमें सुर, ताल व लय का अभाव है तथा पाश्चात्य आर्केस्ट्रा पर इसकी धुन नहीं बैठती।</li>
</ol>
<p style="text-align: justify;">उनका यह आरोप भी मिथ्या व दुराग्रहपूर्ण है। तत्कालीन सुविख्यात संगीतज्ञ मास्टर कृष्णराव ने सन् 1940 से पहले ही वन्देमातरम् को स्वरबद्ध करके झिंझोटी राग में उसकी रिकॉर्डिंग तैयार कर एक पत्र के साथ भारत सरकार को भेज दी थी। उस पत्र में उन्होंने दावा किया था कि इस सरल धुन पर चालीस-पच्चास हजार लोगों के मुख से गवाकर देख लिया है, अनुभव बहुत अच्छा रहा। अनुभव के आधार पर मैं कह सकता हूँ कि लाखों मनुष्य इसे समवेत स्वर में गा सकते हैं। इस तर्ज पर गाने से वातावरण भी अत्यंत गरिमामय बन जाता है। इसे पुलिस परेड के कदमों के साथ भी गाया जा सकता है। सरदार पटेल के आदेश पर उन्हें रेडियो पर भी गाया था। अनेक संवाददाताओं के दबाव से स्वयं नेहरु ने इन्हें अपने सामने गाने का अवसर दिया था। जनरल करिअप्पा के आदेश पर बैंड चीफ लाजपत सिंह के सम्मुख इस धुन को बैंड पर बजाया गया, उन्होंने सन्तुष्ट होकर अपनी सहमति दी। ब्रिटिश बैंड कमांडर सी.आर. गार्डन ने स्वयं बजाकर देखा और प्रसन्नतापूर्वक प्रमाणपत्र दिया कि यह धुन ब्रिटिश बैंड पर बहुत बढ़िया बैठती है। कहने का अर्थ यही है कि वन्देमातरम् पर जो जो मिथ्या आरोप लगाए गए थे उन्हें मास्टर कृष्णराव ने गलत सिद्ध कर दिया था, फिर भी नेहरुजी ने उनके अथक परिश्रम पर पानी फेर दिया। अतः यह कहा जा सकता है कि असंदिग्ध रूप से यह नेहरुजी प्रदत्त वन्देमातरम् को अपदस्थ करने का एक पूर्वनियोजित नाटक मात्र था।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>हमारी अभिलाषा&#8230;</strong></p>
<p style="text-align: justify;">राष्ट्रगान राष्ट्र का अनन्य प्रतीक होता है। इस पवित्र प्रतीक का प्रथमतः अंगभंग करके, द्वितीयत: इसको पदच्युत करके हमने जननी जन्मभूमि के प्रति जो जघन्य अपराध किया है, उसका प्रायश्चित करने से ही राष्ट्र की चिति एवं विराट का जागरण होगा, परिणामस्वरूप राष्ट्र अपना सर्वतोमुखी अभ्युदय करेगा। सम्पूर्ण वन्देमातरम् को पुनः राष्ट्रगान के पद पर अभिषिक्त करके जब राष्ट्र की आबाल-वृद्ध सभी सन्तानें इस मातृस्तोत्र के नित्य गान द्वारा ज्ञान, शक्ति व समृद्धि की प्रतीक स्वदेश माता की, इन विभूतियों को प्राप्त करने हेतु संकल्प करेंगी, तभी ये हमें प्राप्त होंगी।</p>
<p style="text-align: justify;">सुखदा, वरदा माता प्रसन्न होकर हमें निश्चित रूप से सम्पूर्ण विश्व को धारण और भरण करने योग्य ज्ञान, शक्ति व समृद्धि प्रदान करेंगी। हमें इस सनातन राष्ट्र के स्वर्णिम भविष्य में अटल विश्वास है, अतः भविष्य में हम अपने इन्हीं चर्मचक्षुओं से पुनः वन्देमातरम् के उत्कर्ष को देखेंगे।</p>
<p style="text-align: center;"><strong>राष्ट्र की जय चेतना का गान वन्देमातरम्।</strong></p>
<p style="text-align: center;"><strong>राष्ट्र भक्ति प्रेरणा का गान वन्दे मातरम्।।</strong></p>
<p><strong><span style="color: #ff0000;">और पढ़े:</span></strong><span style="color: #3366ff;"><strong> <a style="color: #3366ff;" href="https://rashtriyashiksha.com/the-150th-anniversary-year-of-vande-mataram-part-two/" target="_blank" rel="noopener">वन्देमातरम् का 150वां जयन्ती वर्ष – भाग दो</a></strong></span></p>
<p style="text-align: justify;">(लेखक शिक्षाविद् है, भारतीय शिक्षा ग्रन्थमाला के सह संपादक है और विद्या भारती संस्कृति शिक्षा संस्थान के पूर्व सचिव है।)</p>
<p>The post <a href="https://rashtriyashiksha.com/the-150th-anniversary-year-of-vande-mataram-part-three/">वन्देमातरम् का 150वां जयन्ती वर्ष – भाग तीन</a> appeared first on <a href="https://rashtriyashiksha.com">राष्ट्रीय शिक्षा : शिक्षा में समाज प्रबोधन</a>.</p>
]]></content:encoded>
					
					<wfw:commentRss>https://rashtriyashiksha.com/the-150th-anniversary-year-of-vande-mataram-part-three/feed/</wfw:commentRss>
			<slash:comments>0</slash:comments>
		
		
			</item>
		<item>
		<title>वन्देमातरम् का 150वां जयन्ती वर्ष – भाग दो</title>
		<link>https://rashtriyashiksha.com/the-150th-anniversary-year-of-vande-mataram-part-two/</link>
					<comments>https://rashtriyashiksha.com/the-150th-anniversary-year-of-vande-mataram-part-two/#respond</comments>
		
		<dc:creator><![CDATA[राष्ट्रीय शिक्षा]]></dc:creator>
		<pubDate>Fri, 18 Sep 2026 06:06:59 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[नवीनतम]]></category>
		<category><![CDATA[लेख]]></category>
		<category><![CDATA[वासुदेव प्रजापति]]></category>
		<category><![CDATA[IKS]]></category>
		<category><![CDATA[Rashtriya shiksha]]></category>
		<category><![CDATA[vande mataram]]></category>
		<category><![CDATA[भारतीय ज्ञान परम्परा]]></category>
		<category><![CDATA[राष्ट्रीय शिक्षा]]></category>
		<category><![CDATA[वन्दे मातरम्]]></category>
		<guid isPermaLink="false">https://rashtriyashiksha.com/?p=9423</guid>

					<description><![CDATA[<p>– वासुदेव प्रजापति कांग्रेस अधिवेशनों में वन्देमातरम् गान यह बात सबके ध्यान में रखने योग्य है कि आनंदमठ के प्रकाशन के पूर्व ही संपूर्ण बंगाल में वंदे मातरम् गीत का&#8230; </p>
<p>The post <a href="https://rashtriyashiksha.com/the-150th-anniversary-year-of-vande-mataram-part-two/">वन्देमातरम् का 150वां जयन्ती वर्ष – भाग दो</a> appeared first on <a href="https://rashtriyashiksha.com">राष्ट्रीय शिक्षा : शिक्षा में समाज प्रबोधन</a>.</p>
]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: right;">– वासुदेव प्रजापति</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>कांग्रेस अधिवेशनों में वन्देमातरम् गान</strong></p>
<p style="text-align: justify;">यह बात सबके ध्यान में रखने योग्य है कि आनंदमठ के प्रकाशन के पूर्व ही संपूर्ण बंगाल में वंदे मातरम् गीत का प्रचार हो चुका था। इस गीत को प्रथम स्वर दिया था रविंद्र नाथ ठाकुर के संगीत शिक्षक श्री यदु भट्ट ने। इसी धुन पर  स्वयं बंकिम बाबू और उनके मित्र यह गीत गाया करते थे। तत्पश्चात सन 1886 में ठाकुर परिवार की ‘बालक पत्रिका’ में श्रीमती प्रभा सुंदरी देवी रचित स्वरलिपि प्रकाशित हुई थी। सन् 1889 में कलकत्ता में हुए कांग्रेस अधिवेशन में बंकिम के साथी कवि हेमचन्द्र ने अपनी कविता ‘राखी’ में वन्देमातरम् का कुछ भाग जोड़कर गाया था। स्वयं कविगुरु रवींद्रनाथ ने 1896 में कांग्रेस अधिवेशन में वंदेमातरम् अपनी ही स्वरलिपि में गया था। सन् 1901 के बाद तो नियमित रूप से कांग्रेस के अधिवेशन में पूरा वंदेमातरम् गाया जाता रहा। पहली बार सन 1923 के काकीनाड़ा अधिवेशन में अध्यक्ष मौलाना मोहम्मद अली ने आपत्ति की। अध्यक्ष की आपत्ति के पश्चात भी देशभक्त पंडित विष्णु दिगंबर पलुस्कर ने पूरा वंदेमातरम् उल्लास पूर्वक गाया था। अध्यक्ष मोहम्मदअली वंदेमातरम् गान के शुरु होते ही उठकर पंडाल से बाहर चले गए और जब गान पूरा हुआ, तब आकर पुनः अध्यक्ष की कुर्सी पर बैठ गए। उपस्थित किसी भी व्यक्ति ने अध्यक्ष के इस अशोभनीय आचरण के लिए नहीं टोका। सभी लोग स्तब्ध तो थे, अध्यक्ष की इस आपत्ति ने भारत के मुसलमानों में राष्ट्रीय धारा से अलग होने के भाव का बीजारोपण कर दिया था। सन 1937 में ही प्रान्तीय विधानसभाओं के चुनावों में कांग्रेस भारी बहुमत से जीती थी और विधानसभाओं की कार्यवाही वन्देमातरम् गान से आरम्भ की जाने लगी। इससे मुस्लिम लीग बौखला गई और मुस्लिम विधायक आपत्ति स्वरूप विधानसभाओं का बहिष्कार करने लगे। वही मनोवृत्ति आज भी चल रही है, जो देश विघातक है।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>वन्देमातरम् का अंगभंग किया जाना</strong></p>
<p style="text-align: justify;">सन् 1937 में मुस्लिम लीग ने अपना पृथक अधिवेशन कोलकाता में किया था। उस अधिवेशन में एक प्रस्ताव पास करके वंदेमातरम् को राष्ट्रगान बनाना मुसलमानों की धार्मिक भावनाओं का निरादर करना तथा उनके हितों के विरुद्ध साजिश रचना बताया था। मुस्लिम विधायकों द्वारा वंदेमातरम् गाए जाने पर नित्य नए-नए विवाद उत्पन्न किए जाने के कारण कांग्रेस उनके दबाव में आ गई। अतः दि. 26 से 31 अक्टूबर सन 1937 के कांग्रेस कार्यकारिणी एवं अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी में वंदेमातरम् का अंग-भंग करके उसे सर्वजनग्राह्य बनाया जा सकता है या नहीं, इस बात पर निर्णय होना था। उन्हीं दिनों सुभाष चंद्र बोस विदेश से लौट कर आए थे और कर्सियांग में स्वास्थ्य लाभ कर रहे थे। वे वंदेमातरम् के विवाद से अत्यधिक दुखी थे। सुभाष बाबू ने 16 अक्टूबर को कविगुरु रवीन्द्रनाथ को वन्देमातरम् विवाद के सम्बन्ध में एक मार्मिक पत्र लिखा। किन्तु उस समय कविगुरु गंभीर अस्वस्थता की दशा में चिकित्सालय में भर्ती थे। दूसरा पत्र उन्होंने ‘मॉडर्न रिव्यू’ और ‘प्रवासी’ के संपादक रामानंद चट्टोपाध्याय को लिखकर, उन्हें यह विषय महात्मा गांधी को लिखने का अनुरोध किया था। संयोग से गांधी जी भी उस समय अस्वस्थ थे, इसलिए गांधी जी तक सुभाष बाबू का वह संदेश नहीं पहुँच पाया। इस स्थिति में वह संदेश मॉडर्न रिव्यू और प्रवासी में छापकर प्रचारित किया गया था।</p>
<p style="text-align: justify;">इस अधिवेशन से ठीक एक दिन पहले 25 अक्टूबर को जवाहरलाल नेहरू कविगुरु रवीन्द्रनाथ जी से एकांत में मिलकर आ गए थे। इसलिए कविगुरु ने अधिवेशन के दिन 26 अक्टूबर को एक विस्तृत पत्र कांग्रेस सभापति जवाहर लाल जी को अपने अभिमत सहित लिखा। उस पत्र का सार यह था &#8211;</p>
<p style="text-align: justify;">“निस्संदेह वन्देमातरम् एक अत्यन्त सुन्दर स्वदेश प्रेम की प्रेरणा देने वाला गान है। इसी वन्देमातरम् गान ने बंग-भंग आन्दोलन को अपनी अन्तर्निहित शक्ति के द्वारा सफल बनाया था। परन्तु पूरा वन्देमातरम् मुसलमानों की भावनाओं को आहत कर सकता है, उसके प्रथम दो स्तवक निर्विवाद रूप से राष्ट्रगान होने योग्य हैं। उनमें आपत्तिजनक कुछ भी नहीं हैं।”  रवीन्द्रनाथजी के इस समर्थन से उत्साहित होकर कांग्रेस कार्यकारिणी ने अध्यक्ष जवाहरलाल नेहरु द्वारा प्रस्तुत राष्ट्रगान सम्बन्धित एक प्रस्ताव पारित किया, उसका सार निम्नलिखित है &#8211;</p>
<p style="text-align: justify;">“वन्देमातरम् विगत 32 वर्षों से देशभक्तों को स्वाधीनता संग्राम में ब्रिटिश साम्राज्यवाद के विरुद्ध अपनी लड़ाई में अमानुषिक अत्याचारों को सहते हुए अपना सर्वस्व यहाँ तक की प्राणों का बलिदान देने के लिए प्रेरित करता आया है। हमारे राष्ट्रीय संग्राम का यह जीवंत एवं अभिन्न अंग है और हमारे श्रद्धा व प्रेम का पूर्ण अधिकारी है। अतः इसके प्रथम दो स्तवक राष्ट्रीय सम्मेलनों में गाए जाते रहेंगे, कारण कि इनमें ऐसा कुछ भी नहीं है जिस पर कोई आपत्ति उठा सके। हमारे मुस्लिम बंधुओं द्वारा इस गान के कुछ अंशों पर आपत्ति उठाने के कारण ही यह निर्णय लिया गया है।”</p>
<p style="text-align: justify;">तत्कालीन कांग्रेस नेतृत्व इस महान स्वदेश गान का केवल ऊपरी रूप ही देख पाया। इसके भावार्थ में प्रवेश न कर पाने के कारण गान के मूल आशय को समझ नहीं पाया। दूसरा कारण भारत के अहिन्दू सम्प्रदायों के प्रति अतिरिक्त उदारता ने उन्हें यह करने हेतु प्रेरित किया और तीसरा कारण शायद कांग्रेस यह प्रमाणित करना चाहती थी कि वह साम्प्रदायिक नहीं है। इन्हीं कारणों से कांग्रेस ने वन्देमातरम् का अंगभंग कर दिया। वास्तविक अर्थ में वन्देमातरम् का यह अंगभंग ही देश विभाजन की पूर्व सूचना थी। अन्यथा राष्ट्रगान और राष्ट्रध्वज तो राष्ट्र के प्रतीक होते हैं, उनका अंगभंग नहीं किया जाता। यह स्पष्ट है कि उन्होंने देश के साथ छलावा किया। उन्होंने अपने प्रस्ताव में कहा था कि “इन दो स्तवकों में किसी के द्वारा भी आपत्ति योग्य कुछ भी नहीं है। तथा यह हमारे राष्ट्रीय संग्राम का अविच्छेद्य अंग है।” यदि ये दोनों वाक्य निष्कपट होते तो वन्देमातरम् के स्थान पर अन्य गान के गाये जाने का प्रश्न ही पैदा नहीं होता। मुस्लिम तुष्टिकरण के लिए कांग्रेस नेतृत्व विभ्रांत होकर इस परम सत्य को ही भूल गया कि राष्ट्रगान देशवासियों के अन्त:करण में देशप्रेम और देशहित जीवन उत्सर्ग की प्रेरक ज्वाला की सहज अभिव्यक्ति होता है। यह बात कांग्रेसी नेता उस दिन भूल गए थे। उन्हें यदि फ्रांस के राष्ट्रगान ‘मार्सिलेज’ का इतिहास ज्ञात होता तो यह बात अवश्य समझ में आ जाती कि “राष्ट्रगान ऐसा होना चाहिए जिसके श्रवण मात्र से देशवासियों की धमनियों में खून खौलने लगे।” हमारा वन्देमातरम् इस कसौटी पर खरा उतरता है, फिर भी इसको काट दिया गया, क्यों?</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>प्रबुद्धजनों द्वारा वन्देमातरम् की प्रशंसा</strong></p>
<p style="text-align: justify;">उस समय के सभी प्रमुख लोग वन्देमातरम् का यशोगान करते थे और चाहते थे कि वन्देमातरम् ही भारतराष्ट्र का राष्ट्रगान होना चाहिए। प्रशंसा करने वालों में प्रमुख थे, महात्मा गांधी। गांधीजी ने अपने पत्र ‘हरिजन’ में सन् 1939 की एक जुलाई के दिन लिखा था, “मैंने जब पहली बार वन्देमातरम् को गाए जाते हुए सुना तो मैं आत्मविभोर हो गया, उसका मुझ पर जादू सा असर हुआ था। हमारा झण्डा और यह गीत तब तक जिन्दा रहेंगे जब तक यह राष्ट्र जिन्दा है।” देश की आजादी के लगभग एक सप्ताह बाद 23 व 29 अगस्त 1947 को गांधीजी ने कलकत्ता की सभा में, वह भी सुहारावर्दी की उपस्थिति में वन्देमातरम् गाया था। उस सभा में गांधीजी ने इस गान को देशमाता की अति सुन्दर वन्दना बताते हुए मुस्लिमलीगियों से अपना दुराग्रह त्यागने का आग्रह किया था। उन्होंने इस तथ्य को फिर दोहराया कि “रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने भी राष्ट्रगान के रूप में वन्देमातरम् के पक्ष में अपना मत दिया है।”</p>
<p style="text-align: justify;">यशस्वी पत्रकार श्री रामानन्द चट्टोपाध्याय का स्पष्ट मत था कि सरसरी दृष्टि से देखने पर वन्देमातरम् प्रतिमाव्यंजक लग सकता है, किन्तु असल में ऐसा नहीं है। वन्देमातरम् गान में कहीं भी मुस्लिम विद्वेष नहीं है, यहाँ तक कि इसमें मुसलमानों का उल्लेख तक नहीं है। इसमें जो ‘रिपुदल वारिणीम्’ पद आया है, उसमें रिपुदल का अर्थ मुसलमानों से नहीं अंग्रेजों से है। आनन्दमठ में वर्णित युद्ध मुसलमानों से नहीं था अपितु संन्यासियों का अंग्रेज सेनापतियों के विरुद्ध हुआ युद्ध था। अतः मुसलमानों को कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए।</p>
<p style="text-align: justify;">उधर विपिनचन्द्र पाल ने सन् 1919 में ही वन्देमातरम् का अपूर्व और दीर्घ विश्लेषण कर दिया था, जो महर्षि अरविन्द घोष की ‘धर्म पत्रिका’ में छपा था। उसका सार यही था कि, “वन्देमातरम् में स्वदेश मातृका का स्थूल, सूक्ष्म और कारण रूप में समग्र प्रकटीकरण हुआ है।”</p>
<p style="text-align: justify;">मौलाना रेजाउल करीम तो वन्देमातरम् के अंगभंग से बहुत दुखी हुए थे। उन्होंने अपने ग्रंथ ‘बंकिम ओ मुसलमान समाज’ में निर्भीकतापूर्वक इस गान के विरोधियों की धज्जियाँ उड़ाई थीं। मातृभूमि को नमस्कार करना इस्लाम विरोधी नहीं है। क्या मुसलमान अपने मुल्ला-मौलवियों को, अपने आकाओं को झुककर सलाम नहीं करते? यदि कांग्रेस जिन्नापंथियों को खुश करने के लिए वन्देमातरम् को पूर्णतः हटा भी देती है, तब भी उनमें से एक भी मुसलमान कांग्रेस में शामिल नहीं होगा। क्योंकि उनका असली उद्देश्य वन्देमातरम् को हटाना नहीं है, अपितु अंग्रेज प्रेरित देश विभाजन के षडयंत्र को सफल बनाने का एक बहाना मात्र है। अन्यथा ‘वन्देमातरम्’ भी वैसा ही शब्द है, जैसा ‘मादरे वतन’। जो वन्देमातरम् का अर्थ है, वही अर्थ मादरे वतन का है, मैं अपने वतन को सलाम करता हूँ। अतः किसी भी इस्लामी आदर्श के तहत इसमें आपत्ति जनक कुछ भी नहीं है।</p>
<p style="text-align: justify;">मौलाना अकरम खाँ ने अरब देश का भौगोलिक वर्णन करते हुए लिखा है, “हे अरब मानवेर आदि मातृभूमि” कवि ने अरब को माँ कहकर पुकारा है। जब अरब को मानव की आदि मातृभूमि स्वीकार करने वाले मुसलमान भारत में बस गए, तब भारत को माँ कहने में इस्लाम क्यों आड़े आता है? अतः सत्य यही है कि वन्देमातरम् का विरोध करना तो मात्र एक बहाना मात्र था। वास्तविकता यही है कि कांग्रेस ने मुसलमानों के तुष्टिकरण का आत्मघाती मार्ग अपनाकर भारत विभाजन का बीजारोपण कर दिया था। कांग्रेस देश की आजादी तक इसी मार्ग पर चलती रही। मुस्लिमलीग के द्विराष्ट्र सिद्धांत को नाम मात्र का अमान्य करते हुए भी उसके घातक परिणाम कांग्रेस ने मान लिए। वन्देमातरम् का अंगभंग जैसी घुटनाटेक पराजयवृत्ति को भाँपकर लीग ने सत्तालोलुप बूढ़े कांग्रेसी नेताओं को देश का विभाजन स्वीकार करने के लिए बाध्य कर दिया था। फलतः वन्देमातरम् के अंगभंग के मात्र दस वर्ष बाद ही सन 1947 में कृतघ्न कांग्रेसियों ने भारत माता को भी अंगभंग कर दिया।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>वन्देमातरम् को पदच्युत करना</strong></p>
<p style="text-align: justify;">जिस दिन वन्देमातरम् को पदच्युत करने का षडयंत्र रचा गया वह दिन था, 24 जनवरी 1950 का। और उपलक्ष्य था, उस दिन स्वतंत्र भारत के नव-निर्मित संविधान पर संविधान-निर्मात्री सभा के सदस्यों के हस्ताक्षर करने का। सभा की कार्यवाही शुरू हुई। सभी सदस्यों ने हस्ताक्षर किए, अन्य औपचारिक कार्य भी सम्पन्न कर लिए गए। जब सभा समाप्त होने वाली थी, तब अचानक सभापति बाबू राजेन्द्र प्रसाद ने खड़े होकर राष्ट्रगान के सम्बन्ध में एक घोषणा की। उस घोषणा का सार था कि “वैसे तो निश्चय यही किया गया था कि राष्ट्रगान के बारे में संविधान सभा में एक प्रस्ताव द्वारा निर्णय किया जायेगा, परन्तु यह निर्णय करना छूट गया। आज ही यह बिन्दु याद आया, परन्तु अब प्रस्ताव द्वारा निर्णय लेने का समय नहीं रहा। अतः उचित यही समझा गया कि इस विषय पर मैं एक घोषणा कर दूँ। अब से ‘जन गण मन अधिनायक’ को राष्ट्रगान एवं ‘वन्देमातरम्’ को राष्ट्रगीत के रूप में स्वीकार किया जाता है। दोनों को बराबर सम्मान प्राप्त होगा। आशा है इससे सभी सदस्य सहमत होंगे।”</p>
<p style="text-align: justify;">इस असंवैधानिक निर्णय को सुनकर वन्देमातरम् के सभी भक्त अवाक् रह गए। राजर्षि पुरुषोत्तम दास टंडन तो इतने दुखी हुए कि उन्होंने कांग्रेस के अध्यक्ष पद से ही त्यागपत्र दे दिया। क्योंकि इस घोषणा का समय अत्यन्त चालाकी से चुना गया था, और अब बोलने का कोई अर्थ ही नहीं रह गया था। इस अप्रत्याशित निर्णय के फलस्वरूप जो वन्देमातरम् फाँसी के तख्ते पर झूलने वाले शहीदों के कंठों से गर्व के साथ गूँजा था, जो जयघोष पूरे स्वाधीनता संग्राम में देशभक्तों की प्रेरणा एवं श्रद्धा का प्रतीक बना रहा था, उसे सत्तालोलुपों की साजिश से तिरस्कृत होकर नीचे गिरना पड़ा। यह एक ऐसी कटु सत्यकथा है, जिसमें खून से की गई मातृभूमि की वंदना को स्याही से मिटा देने का षडयंत्र दिखाई देता है।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>सम्पूर्ण भारत में नेहरु की तीखी आलोचना</strong></p>
<p style="text-align: justify;">उपर्युक्त असंवैधानिक व अप्रत्याशित निर्णय पर सभी इसलिए आश्चर्यचकित थे कि इस दिन भी सभा के प्रारम्भ में सभापति के आदेश से लक्ष्मीकांत मैत्र ने वन्देमातरम् गाया था। सभी देशभक्त यह मानते थे कि राष्ट्रगान तो वन्देमातरम् ही होगा। इससे पूर्व भी 14 अगस्त 1947 की मध्य रात्रि में जब देश को आजादी मिली थी, उस समय भी स्वतंत्रता के स्वागत में श्रीमती सुचेता कृपलानी ने वन्देमातरम् गाया था। दूसरे दिन 15 अगस्त को प्रातःकाल आकाशवाणी से भारत के महान गायक पंडित ओंकारनाथ ठाकुर ने पूरा वन्देमातरम् गान अपने हृदयद्रावी रोमांचक स्वर में भारतीय स्वतंत्रता के स्वर्णिम विहान में मुक्त विहंग की भाँति पूरे उल्लास के साथ गाया था। यहाँ यह बात भी स्मरण रखने योग्य है कि पं.ओंकारनाथ ठाकुर बड़े स्वाभिमानी थे। जब 1937 में कांग्रेस ने वन्देमातरम् गान का अंगभंग किया था, वह इन्हें मान्य नहीं था। इसलिए जब इन्हें हरिपुरा कांग्रेस अधिवेशन में वन्देमातरम् गाने के लिए बुलाया गया तो इन्होंने खंडित वन्देमातरम् गाने से स्पष्ट मना कर दिया और पूरा वन्देमातरम् गाकर ही माने थे। इसलिए वे उप प्रधानमंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल से पूरा वन्देमातरम् गाने का पक्का आश्वासन लेकर ही मद्रास से दिल्ली आए थे और 15 अगस्त की प्रातः आकाशवाणी पर पूरा वन्देमातरम् गाया था। अतः सब देशभक्त यही आशा लगाए बैठे थे कि वन्देमातरम् ही राष्ट्रगान होगा। जब-जब भी संविधान सभा में राष्ट्रगान के विषय को लाने का प्रयत्न किया गया, तब-तब ही इस पर प्रस्ताव लाने को स्थगित किया गया था। इस सारे षडयंत्र के पीछे नेहरु स्वयं थे, इसलिए पूरे भारत में नेहरु की तीखी आलोचना हुई थी।</p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>और पढ़े:</strong></span> <span style="color: #0000ff;"><strong><a style="color: #0000ff;" href="https://rashtriyashiksha.com/the-150th-anniversary-year-of-vande-mataram/" target="_blank" rel="noopener">वन्देमातरम् का 150वां जयन्ती वर्ष – भाग एक</a></strong></span></p>
<p>(लेखक शिक्षाविद् है, भारतीय शिक्षा ग्रन्थमाला के सह संपादक है और विद्या भारती संस्कृति शिक्षा संस्थान के पूर्व सचिव है।)</p>
<p>The post <a href="https://rashtriyashiksha.com/the-150th-anniversary-year-of-vande-mataram-part-two/">वन्देमातरम् का 150वां जयन्ती वर्ष – भाग दो</a> appeared first on <a href="https://rashtriyashiksha.com">राष्ट्रीय शिक्षा : शिक्षा में समाज प्रबोधन</a>.</p>
]]></content:encoded>
					
					<wfw:commentRss>https://rashtriyashiksha.com/the-150th-anniversary-year-of-vande-mataram-part-two/feed/</wfw:commentRss>
			<slash:comments>0</slash:comments>
		
		
			</item>
		<item>
		<title>वन्देमातरम् का 150वां जयन्ती वर्ष – भाग एक</title>
		<link>https://rashtriyashiksha.com/the-150th-anniversary-year-of-vande-mataram/</link>
					<comments>https://rashtriyashiksha.com/the-150th-anniversary-year-of-vande-mataram/#respond</comments>
		
		<dc:creator><![CDATA[राष्ट्रीय शिक्षा]]></dc:creator>
		<pubDate>Thu, 21 May 2026 06:55:13 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[नवीनतम]]></category>
		<category><![CDATA[लेख]]></category>
		<category><![CDATA[वासुदेव प्रजापति]]></category>
		<category><![CDATA[आज़ाद_हिंद_फौज]]></category>
		<category><![CDATA[क्रांतिकारी_इतिहास]]></category>
		<category><![CDATA[देशभक्ति_लेख]]></category>
		<category><![CDATA[नेताजी_सुभाषचंद्र_बोस]]></category>
		<category><![CDATA[बंकिमचंद्र_चट्टोपाध्याय]]></category>
		<category><![CDATA[भारत_माता]]></category>
		<category><![CDATA[भारतीय_स्वतंत्रता_संग्राम]]></category>
		<category><![CDATA[राष्ट्रभक्ति]]></category>
		<category><![CDATA[वन्देमातरम्]]></category>
		<category><![CDATA[स्वदेश_मंत्र]]></category>
		<guid isPermaLink="false">https://rashtriyashiksha.com/?p=9313</guid>

					<description><![CDATA[<p> &#8211; वासुदेव प्रजापति आज की नई पीढ़ी भारत के स्वतंत्रता संग्राम से अनभिज्ञ है। उसने न जवाहरलाल नेहरु को देखा है न उसे सुभाषचन्द्र बोस के दर्शन का सौभाग्य मिला&#8230; </p>
<p>The post <a href="https://rashtriyashiksha.com/the-150th-anniversary-year-of-vande-mataram/">वन्देमातरम् का 150वां जयन्ती वर्ष – भाग एक</a> appeared first on <a href="https://rashtriyashiksha.com">राष्ट्रीय शिक्षा : शिक्षा में समाज प्रबोधन</a>.</p>
]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: right;"> &#8211; वासुदेव प्रजापति</p>
<p><img fetchpriority="high" decoding="async" class="alignnone wp-image-9314" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2026/05/63254656-300x199.jpg" alt="" width="1538" height="1020" srcset="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2026/05/63254656-300x199.jpg 300w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2026/05/63254656-1024x680.jpg 1024w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2026/05/63254656-768x510.jpg 768w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2026/05/63254656.jpg 1198w" sizes="(max-width: 1538px) 100vw, 1538px" /></p>
<p style="text-align: justify;">आज की नई पीढ़ी भारत के स्वतंत्रता संग्राम से अनभिज्ञ है। उसने न जवाहरलाल नेहरु को देखा है न उसे सुभाषचन्द्र बोस के दर्शन का सौभाग्य मिला है। स्वाधीन भारत के शासकों ने देश की नई पीढ़ी को नेताजी सुभाषचंद्र बोस के विषय में कुछ भी नहीं बताया, फिर भी भारत की वर्तमान तरुण पीढ़ी को नेहरुजी व नेताजी में से किसी एक को चुनने के लिए कहा जाए तो निश्चय ही सुभाषचन्द्र बोस को ही वे सर्वप्रिय नेता के रूप में चुनेंगे। क्योंकि नेताजी का नाम लेने मात्र से आधुनिक भारत के तरुणों और किशोरों के हृदयों में जैसा विद्युत-संचार होता है, वैसा जवाहरलाल नेहरू का नाम लेने से नहीं होता। ठीक यही स्थिति हमारे देश के राष्ट्रगीत वंदे मातरम की है। स्वाधीन भारत ने कभी भी वंदे मातरम् का सत्य इतिहास नई पीढ़ी को नहीं बताया। “कोटि-कोटि हृदयों के प्राण स्पंदन और सहस्रों हुतात्माओं का चेतना मंत्र है, वंदे मातरम्।” वन्देमातरम् के उत्कर्ष और अपमान के इतिहास से आज की पीढ़ी पूर्णतया अनभिज्ञ है। जबकि जवाहरलाल नेहरू द्वारा लाया गया राष्ट्रगान, जन गण मन सबको याद है। अतः नई पीढ़ी को वन्देमातरम् का सत्य इतिहास बताना इस गोष्ठी का उद्देश्य है।</p>
<p style="text-align: justify;">हमारे देश की अनेक बातें हमसे छुपाई गई हैं। जैसे हमें बताया गया कि देश को आजादी बिना खड्ग और बिना ढाल के अहिंसात्मक आंदोलनों से मिली है। जबकि वास्तविकता यह है कि अनेक देशभक्तों ने देश को स्वतंत्र करवाने के लिए फाँसी के फंदों को चूमा था, अपना रक्त बहाया था, अपना बलिदान दिया था तब जाकर हमें आजादी मिली है। आजादी से पहले वन्देमातरम् ही देश के लिए उत्सर्ग का पवित्र भाव भरने वाला स्वदेश मंत्र था। इस पवित्र मंत्र से प्रेरणा लेकर ही देशभक्त जब मिलते थे, तब परस्पर वन्देमातरम् का सम्बोधन करते थे। प्रत्येक छोटे-बड़े समारोह में वन्देमातरम् गाया जाता था। सभी बड़े बड़े राजनेता वन्देमातरम् को ही देश का राष्ट्रगान मानते थे। स्वतंत्रता से पूर्व तक जन-गण-मन को गाया नहीं जाता था। “वन्देमातरम् की व्यथा-कथा” पुस्तक के लेखक श्री चतुर्भुज जी तोषनीवाल लिखते हैं कि मैं कलकत्ता में अनेक वर्ष रहा हूँ, अतः बंगाली भाषी हूँ। अनेक सामाजिक व राजनैतिक कार्यक्रमों में जाना होता था। वन्देमातरम् गान को असंख्य बार सुना, परन्तु जन-गण-मन केवल एक बार ही सुनने को मिला। फिर क्यों पहले वन्देमातरम् का अंगभंग किया और बाद में इसको पदच्युत् कर दिया? क्यों वन्देमातरम् के स्थान पर अचानक जन-गण-मन को राष्ट्रगान बना दिया गया? इस षड्यंत्र के पीछे कौन था? ऐसे सभी प्रश्नों के उत्तर इस लेख में आपको सुनने को मिलेंगे। यहाँ एक बात की ओर आप सबका ध्यान आकृष्ट करना चाहता हूँ कि मैं जन-गण-मन का विरोधी नहीं हूँ और न इसका अपमान करना चाहता हूँ। मैं तो केवल इतना चाहता हूँ कि वन्देमातरम् के साथ जो षडयंत्र किया गया है, उसे उजागर करूँ। अन्यथा आज भी मैं जन-गण-मन को राष्ट्रगान होने के नाते उसका श्रद्धापूर्वक गान करता हूँ और उसके सम्मान में खड़ा होता हूँ और चाहता हूँ कि सभी देशवासी जन-गण-मन को वैसा ही सम्मान दें।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>स्वदेश मंत्र वन्देमातरम् का अवतरण</strong></p>
<p style="text-align: justify;">वन्देमातरम् राजर्षि बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय की चेतना में अवतीर्ण हुआ पवित्र मंत्र है। हमारे देश में ऋषि मंत्र द्रष्टा होते हैं। मंत्र वह होता है जो ऋषियों की चेतना में स्वयं अवतीर्ण होता है। इस कसौटी पर वंदे मातरम् खरा उतरता है वन्देमातरम् शुद्ध रूप में भारतमाता के लिए गाया गया पवित्र गान है। वन्देमातरम् गाने से देशभक्तों के हृदयों में भारतमाता के लिए सर्वस्व न्यौछावर करने का भाव स्वत: स्फूर्त होता है।</p>
<p style="text-align: justify;">वन्देमातरम् का अर्थ है, मैं माता की वंदना करता हूँ, अर्थात मैं भारत माता को प्रणाम करता हूँ। हम वैदिक काल से पृथ्वी माता की वंदना करते आए हैं। पृथ्वी को माता मानकर उसकी वंदना करना हम भारतीयों की रग-रग में रचा-बसा है। वैदिक साहित्य में मातृ वंदना गायी गई है। ऋग्वेद में “बन्धुर्मेमाता पृथिवी महीयम्” कहा गया है। जिसका भाव है, यह विशाल पृथ्वी मेरी माता है। यजुर्वेद कहता है, “नवो मातरे पृथिव्यै” का भाव भी यही है कि पृथ्वी हमारी माता है। और अथर्ववेद का यह प्रसिद्ध सूक्त हम सबने सुना है, “माता भूमि: पुत्रोंsहं पृथिव्या:” भूमि मेरी माता है और मैं उसका पुत्र हूँ। वेदों के अतिरिक्त भी संस्कृत साहित्य में मातृभूमि की वंदना अनेक शास्त्रों में वर्णित हैं। जैसे हमने लक्ष्मण व राम का वह संवाद सुन रखा है कि लंका विजय के पश्चात् लक्ष्मण राम से कहते हैं कि भैया! अयोध्या में तो भरत राज्य कर ही रहे हैं। क्यों न हम अपने हाथों से विजित इस स्वर्णनगरी लंका में ही रह जायें। प्रत्युत्तर में श्रीराम कहते हैं –</p>
<p style="text-align: center;"><strong>“अपि स्वर्णमयी लंका न में लक्ष्मण रोचते।</strong></p>
<p style="text-align: center;"><strong>जननी  जन्मभूमिश्च  स्वर्गादपि  गरीयसी।।”</strong></p>
<p style="text-align: justify;">हे लक्ष्मण! यह सत्य है कि लंका सोने की है, परन्तु यह मुझे नहीं रुचती। क्योंकि जन्म देने वाली माँ और जन्मभूमि मेरे लिए स्वर्ग से भी बढ़कर है। स्पष्ट है कि जन्मभूमि की मातृरूप में वंदना करने की भारत में परंपरा रही है। इसी परंपरा में अनेक बंगाली लेखकों जैसे माइकेल मधुसूदन दत्त, भूदेव मुखोपाध्याय एवं बंकिम चन्द्र चट्टोपाध्याय ने अपनी-अपनी कृतियों में जन्मभूमि का मातृरूप में दर्शन किया है। बंकिम बाबू ने अपनी कृति ‘मेरा दुर्गोत्सव’ में अपनी दिव्य दृष्टि से सप्तमी पूजा के दिन जन्मभूमि का दशभुजा देवी दुर्गा के रूप में अपूर्व दर्शन किया था। कुछ समय के उपरान्त उनकी लेखनी से उसी दिव्य दृष्टि द्वारा आकारित दुर्गा माता का रूप सन् 1875 में ‘वन्देमातरम्’ गान के रूप में अवतरित हुआ। तब से लेकर अब तक 150 वर्ष पूर्ण हुए हैं, इसलिए 2026 में हम वन्देमातरम् का 150वाँ जयन्ती वर्ष मना रहे हैं। बंकिम बाबू ने 8 वर्ष बाद सन् 1883 में इस गान को अपने उपन्यास ‘आनन्द मठ’ में प्रकाशित किया था। तब वन्देमातरम् गान के सम्बन्ध में उन्होंने अपनी पुत्री से कहा था &#8211; “देखना! एक दिन ऐसा आएगा कि बंगभूमि इस गान को सुनकर नाचने लगेंगी, केवल बंगाल ही नहीं सारा भारतवर्ष इस गान से प्रेरणा ग्रहण करेगा।” इतना ही नहीं, वन्देमातरम् के व्याख्याकार श्री अरविन्द घोष ने अपने प्रबन्ध ‘ऋषि बंकिम चंद्र’ में तीन बातों पर विशेष बल दिया है। “पहली बंकिम बाबू की समस्त रचनाओं का श्रेष्ठ भाव है, स्वदेश धर्म। दूसरी, जिस नवीन प्रेरणा से ओत-प्रोत होकर हम स्वाधीनता की दिशा में अग्रसर हो रहे हैं, उसके प्रेरणादाता एवं राष्ट्रगुरु हैं, बंकिमचंद्र। और तीसरी बात, उनका सर्वोत्कृष्ट योगदान है, जननी जन्मभूमि का मातृरूप में दर्शन करना।”</p>
<p><img decoding="async" class="alignnone  wp-image-9318" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2026/05/Subhas-Chandra-Bose-Indian-National-Army-219x300.webp" alt="" width="1371" height="1878" srcset="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2026/05/Subhas-Chandra-Bose-Indian-National-Army-219x300.webp 219w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2026/05/Subhas-Chandra-Bose-Indian-National-Army-748x1024.webp 748w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2026/05/Subhas-Chandra-Bose-Indian-National-Army-768x1052.webp 768w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2026/05/Subhas-Chandra-Bose-Indian-National-Army-1121x1536.webp 1121w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2026/05/Subhas-Chandra-Bose-Indian-National-Army.webp 1168w" sizes="(max-width: 1371px) 100vw, 1371px" /></p>
<p style="text-align: justify;"><strong>बंगभंग आन्दोलन में वन्देमातरम्</strong></p>
<p style="text-align: justify;">अंग्रेजों ने देश के स्वाधीनता आन्दोलन को कमजोर करने के लिए पहले बंगाल का विभाजन किया था। उस समय बंगाल क्रान्तिकारी गतिविधियों का गढ़ था। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापक डॉ. हेडगेवार भी डाक्टरी की पढ़ाई करने कलकत्ता गए थे और पढ़ाई के साथ-साथ क्रान्तिकारी गतिविधियों में सक्रिय भाग लिया था। वे क्रान्तिकारी संस्था अनुशीलन समिति के सदस्य थे। उनका गुप्त नाम कोकेन था। ऐसे सभी क्रांतिकारियों की कमर तोड़ने के लिए उन्होंने सन् 1905 में बंग-भंग का निर्णय लिया था। 7 अगस्त 1905 के दिन कलकत्ता के टाउन हॉल में बंग-भंग के विरोध में एक बहुत बड़ी सभा हुई। उस सभा में पहली बार वन्देमातरम् का जयघोष लगा और उसी दिन से यह जयघोष देशभक्तों का स्वदेश मंत्र बन गया। उस दिन से लेकर आजादी पाने तक न जाने कितने ही हजारों आबाल-वृद्ध स्वतंत्रता के पुजारियों ने वन्देमातरम् के सात्त्विक बल के सहारे असंख्य व अमानुषिक अत्याचार सहते हुए फाँसी के फन्दों को चूमा था। अंग्रेजों के द्वारा साम-दाम-दण्ड-भेद रूपी सभी दाँव-पेच लगाने के बाद भी वे आन्दोलन को समाप्त नहीं कर पाए। अन्ततः विवश होकर उन्हें सन् 1911 में अपना बंग-भंग का निर्णय वापस लेना पड़ा। अर्थात् अंग्रेजों द्वारा किए गए बंगाल-विभाजन को देशभक्तों ने रोक दिया। अंग्रेजों की इस विफलता के मूल में देशभक्तों को मर मिटने की प्रेरणा देने वाला यह स्वदेश मंत्र, वन्देमातरम् ही प्रमुख शस्त्र था।</p>
<p style="text-align: justify;">स्वतन्त्रता संग्राम में वन्देमातरम् देशभक्तों का प्रमुख शस्त्र बन गया था। फलतः अंग्रेजों ने इस स्वदेश मंत्र से भयभीत होकर वन्देमातरम् बोलने पर ही प्रतिबन्ध लगा दिया। परन्तु देशभक्तों ने वंदे मातरम् जयघोष के प्रतिबन्ध को अमान्य कर दिया, हमें अपनी माता की जय बोलने से कोई नहीं रोक सकता। यहाँ मुझे पुनः डॉ.हेडगवार के विद्यार्थी काल का एक प्रसंग याद आता है। वे नागपुर की नीलसिटी हाईस्कूल में पढ़ रहे थे। उन्हें ज्ञात हुआ कि निरीक्षक महोदय निरीक्षण करने हेतु उनके स्कूल में आने वाले हैं। तब उन्होंने अपने विश्वस्त साथियों के साथ वन्देमातरम् जयघोष की योजना बनाई। इस योजना की कानोंकान किसी को भनक तक नहीं लगने दी। निर्धारित दिन निरीक्षक महोदय स्कूल में आए और उनकी कक्षा में ज्योंही पैर रखा त्योंही पूरी कक्षा ने खड़े होकर वन्देमातरम् से उनका स्वागत किया। निरीक्षक महोदय क्रोधित हुए और दूसरी कक्षा में चले गए। वहाँ भी उनका स्वागत वन्देमातरम् जयघोष से ही हुआ। अब तो निरीक्षक आग बबूला हो गए और प्रधानाध्यापक को तुरन्त अनुशासन हीनता के लिए कठोर कार्यवाही करने का आदेश देकर चले गए। प्रधानाचार्य ने सबसे पूछताछ की परन्तु किसी भी बालक ने कुछ भी नहीं बताया। जब उन्होंने निर्दोष बालकों को पीटना शुरु किया तब डाक्टर जी आगे आए और स्वीकार किया कि यह सारी योजना मेरी थी। प्रधानाचार्य ने डाक्टरजी को उसी समय स्कूल से निष्कासित कर दिया। यह सजा पाकर भी डाक्टरजी प्रसन्न थे क्योंकि भारतमाता की जय बोलने में उन्हें गौरव एवं स्वाभिमान की अनुभूति होती थी।</p>
<p style="text-align: justify;">ऐसा ही प्रसंग कलकत्ता के नेशनल कॉलेज के एक विद्यार्थी सुशील सेन का है। एक आन्दोलन में उसने अंग्रेज सार्जेंट के दुर्व्यवहार से क्रोधित होकर उसे जोर का घूँसा मार दिया। सिपाहियों ने उसे पकड़ लिया और जज के सामने पेश किया। जज किंग्सफोर्ड ने सुशीलसेन को पन्द्रह बेंतों की सजा सुनाई। ज्योंही उसकी नंगी पीठ पर बेंत पड़ती वह जोर से वन्देमातरम् जयघोष लगाता। पन्द्रह ही बेंतों पर वह बड़े गर्व से वन्देमातरम् जयघोष लगाता रहा। यह तो कुछ भी नहीं, अंग्रेज वन्देमातरम् घोष से इतने अधिक भयभीत थे कि अमानवीय अत्याचारों से कुछ क्रांतिकारियों की मृत्यु हो जाने पर भी भयभीत और आतंकित अंग्रेजों ने उनके शवों को गहरे समुद्र में डूबोया था। इसी तरह क्रांतिकारी सूर्यसेन जिन्हें फाँसी की सजा मिली थी, उन्हें वधस्थल ले जाते समय वे वंदेमातरम का जयघोष लगाते जा रहे थे, इसलिए उनको इतनी निर्दयतापूर्वक लाठियों से पीटा गया कि वे बेहोश हो गए और बेहोशी की हालत में ही उन्हें फाँसी दे दी गई। स्वदेश के लिए सर्वस्व बलिदान करने की प्रेरणा देने वाले शक्तिशाली स्वदेश मंत्र का स्वाधीनता प्राप्ति के पश्चात् तत्कालीन सत्ताधीशों ने तिरस्कार करके अपने मस्तक पर जो कलंक का टीका लगाया है, वह सदियों तक अमिट रहेगा।</p>
<p style="text-align: justify;">क्रमशः</p>
<p style="text-align: justify;">(लेखक शिक्षाविद् है, भारतीय शिक्षा ग्रन्थमाला के सह संपादक है और विद्या भारती संस्कृति शिक्षा संस्थान के पूर्व सचिव है।)</p>
<p><strong>और पढ़ें : <span style="color: #0000ff;"><a style="color: #0000ff;" href="https://rashtriyashiksha.com/national-song-vande-mataram/" target="_blank" rel="noopener">राष्ट्र गीत – वन्दे मातरम्</a></span></strong></p>
<p>The post <a href="https://rashtriyashiksha.com/the-150th-anniversary-year-of-vande-mataram/">वन्देमातरम् का 150वां जयन्ती वर्ष – भाग एक</a> appeared first on <a href="https://rashtriyashiksha.com">राष्ट्रीय शिक्षा : शिक्षा में समाज प्रबोधन</a>.</p>
]]></content:encoded>
					
					<wfw:commentRss>https://rashtriyashiksha.com/the-150th-anniversary-year-of-vande-mataram/feed/</wfw:commentRss>
			<slash:comments>0</slash:comments>
		
		
			</item>
		<item>
		<title>देश की बात-1 :  अपनी बात</title>
		<link>https://rashtriyashiksha.com/country-talk/</link>
					<comments>https://rashtriyashiksha.com/country-talk/#respond</comments>
		
		<dc:creator><![CDATA[राष्ट्रीय शिक्षा]]></dc:creator>
		<pubDate>Thu, 22 May 2025 03:45:28 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[देश की बात]]></category>
		<category><![CDATA[नवीनतम]]></category>
		<category><![CDATA[वासुदेव प्रजापति]]></category>
		<category><![CDATA[Bhartiya Education]]></category>
		<category><![CDATA[country talk]]></category>
		<category><![CDATA[Desh ki baat]]></category>
		<category><![CDATA[IKS]]></category>
		<category><![CDATA[Rashtriya shiksha]]></category>
		<category><![CDATA[भारतीय ज्ञान परम्परा]]></category>
		<category><![CDATA[राष्ट्रीय शिक्षा]]></category>
		<guid isPermaLink="false">https://rashtriyashiksha.com/?p=8736</guid>

					<description><![CDATA[<p>-वासुदेव प्रजापति बात आज से लगभग बीस-बाईस वर्ष पुरानी है। विद्या भारती जोधपुर प्रांत का अध्यक्ष-व्यवस्थापक सम्मेलन, बच्छराज व्यास आदर्श विद्या मंदिर डीडवाना में था। इस सम्मेलन में आदरणीया इंदुमति&#8230; </p>
<p>The post <a href="https://rashtriyashiksha.com/country-talk/">देश की बात-1 :  अपनी बात</a> appeared first on <a href="https://rashtriyashiksha.com">राष्ट्रीय शिक्षा : शिक्षा में समाज प्रबोधन</a>.</p>
]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: right;">-वासुदेव प्रजापति</p>
<p><img decoding="async" class="wp-image-8737 aligncenter" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2025/05/OIP-300x205.jpeg" alt="" width="562" height="384" srcset="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2025/05/OIP-300x205.jpeg 300w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2025/05/OIP.jpeg 440w" sizes="(max-width: 562px) 100vw, 562px" /></p>
<p style="text-align: justify;">बात आज से लगभग बीस-बाईस वर्ष पुरानी है। विद्या भारती जोधपुर प्रांत का अध्यक्ष-व्यवस्थापक सम्मेलन, बच्छराज व्यास आदर्श विद्या मंदिर डीडवाना में था। इस सम्मेलन में आदरणीया इंदुमति जी काटदरे, जोधपुर प्रान्त के प्रवास पर पधारीं थीं। वे उस समय विद्या भारती की अखिल भारतीय सह मंत्री थीं। विद्या मन्दिर के प्रागंण में ब्रह्ममुहूर्त में सर्वप्रथम दैनिक यज्ञ हुआ। यज्ञ के उपरान्त वहीं पर इन्दुमति जी का व्याख्यान आरम्भ हुआ। शीतल मंद पवन और यज्ञ की भीनी-भीनी सुगन्ध ने वातावरण को पवित्र बनाया हुआ था। ऐसे पवित्र वातावरण में जोधपुर प्रान्त के सभी प्रमुख कार्यकर्ता इन्दुमति जी को पहली बार सुन रहे थे। उनके व्याख्यान का विषय भारतीय शिक्षा की पुनर्प्रतिष्ठा था। जब उन्होंने भारतीय शिक्षा को चरणबद्ध समझाना आरम्भ किया तो सभी आश्चर्यचकित एवं दत्तचित्त हो सुनने में लीन हो गए। सबको ऐसा अनुभव हो रहा था कि उनकी मधुर व सारगर्भित वाणी में विद्या दायिनी मां सरस्वती स्वयं विराजमान हैं। सबने पहली बार ज्ञानार्जन के साधन &#8211; करण, बाह्य करण व अन्त:करण, करणों का विकास एवं उनसे होने वाला ज्ञानार्जन का विषय सुना। एक घंटे का व्याख्यान इतना शीघ्र पूर्ण हो गया कि पता ही नहीं चला। सबकी और सुनने की लालसा अभी भी बनी हुई थीं।</p>
<p style="text-align: justify;">इस व्याख्यान को सुनने वालों में विद्या भारती जोधपुर प्रान्त के तत्कालीन उपाध्यक्ष श्रीमान कपूरचंद जी बेताला भी थे। वे डीडवाना के समीप ही छोटी खाटू के निवासी थे। व्याख्यान से अभिभूत बेतालाजी ने उसी समय इन्दूमति जी को छोटी खाटू चलने का निमंत्रण दिया। उनके निमंत्रण पर विचार करते हुए यह निर्णय हुआ कि छोटी खाटू होते हुए जोधपुर लौटा जाए। इन्दुमति जी के साथ हम दो-तीन कार्यकर्ता भी छोटी खाटू आए। बेताला जी ने सबको जलपान करवाकर और बताया कि छोटी खाटू में एक प्राचीन व समृद्ध पुस्तकालय है, जिसमें अनेक महत्वपूर्ण पुस्तकों का संग्रह है। इन्दुमति जी तो स्वयं स्वाध्यायी थीं, उन्होंने पुस्तकालय देखने की इच्छा व्यक्त की। बेताला जी हमें पुस्तकालय ले गए, वहां अनेक पुरानी पुस्तकें भी थीं। जोधपुर लौटने की शीघ्रता थी इसलिए अधिक नहीं रुक सकते थे। हमने जाने की इच्छा जताई, बेताला जी ने हमें बताया कि इस पुस्तकालय मैं “दैशिक शास्त्र” नामक एक दुर्लभ पुस्तक है। तिलक जी उसकी प्रस्तावना लिखने वाले थे, मेरी जानकारी में देशभक्तों के लिए इससे श्रेष्ठ कोई दूसरी पुस्तक नहीं है। यह बताते हुए वे दो पुस्तकें लेकर आए, एक इन्दुमति जी को भेंट की और दूसरी मुझे। भेंट स्वीकार कर हम जोधपुर के लिए चल पड़े।</p>
<p style="text-align: justify;">प्रवास पूर्णकर इन्दुमति जी के लौट जाने के पश्चात् मैंने दैशिक शास्त्र को पहली बार पढ़ा, मन रोमांच से भर गया। सच में देशभक्ति से परिपूर्ण ऐसी कोई दूसरी पुस्तक मेरे पढ़ने में नहीं आई थी। कुछ समय बाद एक कार्यक्रम हेतु अहमदाबाद गया तब इन्दुमति जी से फिर दैशिक शास्त्र के सम्बन्ध में वार्ता हुई। यह ध्यान में आया कि यह पुस्तक सब कार्यकर्ताओं को अवश्य पढ़नी चाहिए, परन्तु वर्तमान में यह अप्राप्य है। इसलिए पुनरुत्थान ट्रस्ट को इसे पुनर्प्रकाशित करना चाहिए। पुस्तक इतनी पुरानी थी कि बार-बार पृष्ठ पलटने से कागज फट रहा था, फिर भी इन्दुमति जी ने सावधानी पूर्वक एवं अपने अथक परिश्रम से इसे पुनः प्रकाशित किया। आज यह पुस्तक सबके स्वाध्याय हेतु सहज सुलभ है। सहज सुलभ होने के पश्चात् भी मेरा अनुभव यही है कि बहुत कम लोगों ने इसे पढ़ा है। अधिकांश तो आज भी दैशिक शास्त्र नाम से भी अनभिज्ञ हैं। अतः मुझे अनुभव हुआ कि सौ वर्ष पूर्व की शब्दावली एवं भाषा-शैली में लिखित इस पुस्तक का सार “देश की बात” नामक शीर्षक से देशभक्तों के लिए सरल व सुबोध भाषा में पुनः लिखना समीचीन होगा।</p>
<p style="text-align: justify;">अतः देश की बात में सबसे पहले दैशिक शास्त्र से आपका परिचय  करवा रहा हूँ। इस पुस्तक का परिचय इसलिए आवश्यक है कि दैशिक शास्त्र आज भी उतनी ही प्रासंगिक है जितनी अपने प्रकाशन के समय थीं। इसका प्रकाशन समय जानकर आप आश्चर्यचकित होंगे। आज से एक सौ चार वर्ष पूर्व अर्थात् संवत् 1978, तदनुसार ईस्वी सन् 1921 में इसका प्रथम प्रकाशन हुआ था। उस समय देश स्वतन्त्रता संग्राम की लड़ाई लड़ रहा था। स्वतन्त्रता संग्राम के अग्रणी नेताओं में लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक और महात्मा गांधी प्रमुख थे। इन दोनों ही नेताओं ने इस पुस्तक को पढ़कर इसकी भूरी-भूरी प्रशंसा की थी। पुस्तक के प्रकाशन से पूर्व ही इसका एक अंश जो बहुत पहले लिखा जा चुका था, उसे तिलक महाराज को भेजा गया था। जिसे पढ़कर तिलक महाराज बहुत प्रसन्न हुए और उन्होंने इस पुस्तक के विषय में यह लिखा &#8211;</p>
<p style="text-align: justify;"><em><strong>“I have read your &#8216;Daishik Shastra&#8217; with great pleasure, my view is entirely in accord with yours and I am glad to find that it has been so forcibly put forward by you in Hindi.”</strong></em></p>
<p style="text-align: justify;">लोकमान्य तिलक स्वयं इसकी प्रस्तावना लिखने वाले थे। परन्तु सन् 1920 में उनका स्वर्गवास हो जाने के कारण, वे लिख नहीं पाए। बाद में ‘बाल गंगाधर तिलक स्मारक समिति’ ने सन् 1921 में इसे प्रकाशित किया था।</p>
<p style="text-align: justify;">दैशिक शास्त्र भारतीय सभ्यता, संस्कृति, दर्शन, राजनीति शास्त्र, समाजशास्त्र व धर्मशास्त्र का सार तत्त्व प्रस्तुत करने वाला अनुपम ग्रंथ है। जब पाश्चात्य सभ्यता और संस्कृति ने इस देश को आक्रांत करना आरंभ किया और देश की जनता दासता से मुक्त होने के लिए संघर्ष कर रही थी, तब श्री बद्रीशाह ठुलघरिया जी ने दैशिक  शास्त्र की रचना कर देशवासियों को स्वत्व का बोध करवाते हुए भारतीय जीवन का आदर्श प्रस्तुत किया, ताकि अपने देश की वैचारिक और जीवनगत विशिष्टता उनके सामने रहे, उन्हें प्रेरणा देता रहे और उन्हें अपने संघर्ष का आगामी स्वरूप निश्चित करने में सहायता मिले, यही दैशिक शास्त्र का उद्देश्य था।</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="wp-image-8738 aligncenter" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2025/05/high-resolution-satellite-image-of-india-isolated-imagery-of-india-elements-of-this-image-furnished-by-nasa-400-209749811-300x245.jpg" alt="bharat " width="564" height="461" srcset="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2025/05/high-resolution-satellite-image-of-india-isolated-imagery-of-india-elements-of-this-image-furnished-by-nasa-400-209749811-300x245.jpg 300w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2025/05/high-resolution-satellite-image-of-india-isolated-imagery-of-india-elements-of-this-image-furnished-by-nasa-400-209749811.jpg 400w" sizes="auto, (max-width: 564px) 100vw, 564px" /></p>
<p style="text-align: justify;">इसके प्रकाशन के लगभग दो वर्ष पश्चात महात्मा गांधी ने भी यह पुस्तक पढ़ी और इसके संबंध में अपनी संस्तुति दी, जिसे 8 फरवरी 1923 को दैनिक समाचार पत्र ‘नवजीवन’ ने इन शब्दों में छापा था –</p>
<p style="text-align: justify;">“दैशिक शास्त्र” यह नाम पढ़कर पहले पहल हमें आश्चर्य हुआ पर जब पुस्तक को शुरू से अंत तक हमने पढ़ डाला तब आश्चर्य का स्थान आदर और प्रशंसा ने ले लिया। प्राच्य राजनीति पर इतनी उत्कृष्ट पुस्तक हिंदी में हमने यह पहली ही देखी। इसके अवलोकन से एक और जहां भारतीय राजनीति विज्ञान के मर्ममूल, सहज गंभीरता, सनातन तत्त्व और उपयोग का बोध होता है, वहां दूसरी ओर पश्चिमी राजनीति में उपलब्ध अस्थिरता और अपरिपक्वता का परिचय मिलता है। राजनीति की भाषा में धर्म और अध्यात्म तत्त्वों की इतनी सुंदर विवेचना करने के लिए लेखक श्री बद्री शाह ठुलघरिया अल्मोड़ा, हिंदी और देशभक्तों के अभिनंदन के पात्र हैं। भगवद् गीता और उपनिषदों को यदि कोई राजनीति की भाषा में पढ़ाना चाहे तो वह इस ग्रंथ को जरूर पढ़ें, पुस्तक की भाषा प्रौढ़ और सूत्रात्मक है तथा विवेचन शैली शास्त्रीय। जिन-जिन राष्ट्रीय विद्यालयों में राजनीति शास्त्र पढ़ाया जाता है उसमें तो यह पुस्तक के तौर पर रखे जाने योग्य है।”</p>
<p style="text-align: justify;">बापू की इस सम्मति से इस पुस्तक को पर्याप्त प्रचार-प्रसार मिला। पुस्तक की विषयवस्तु ने सबको आकृष्ट किया तथा तत्कालीन शीर्षस्थ राजनेताओं तथा विचारकों ने उसका समादर किया। विषयवस्तु की दृष्टि से इसमें पांच भाग हैं, प्रथम भाग देशभक्ति विभूति का है। दूसरे भाग में दैशिक धर्म की महत्ता बताते हुए चिति और विराट की विशद विवेचना है। तीसरे भाग में सभी प्रकार की स्वतन्त्रता को समझाया गया है। चौथे भाग में राज्य का अध्याय है, जिसमें वर्णाश्रम, अर्थायाम, व्यवस्था धर्म तथा देश-काल को समाहित किया है और पांचवें भाग का शीर्षक दैवी सम्पद योगक्षेम है। इस अन्तिम भाग में अधिजनन, अध्यापन व अधिलवन की भारतीय अवधारणा को स्पष्ट किया गया है। इस प्रकार यह पुस्तक दिशाबोध रूपी उपसंहार के साथ पूर्णता प्राप्त करती है।</p>
<p style="text-align: justify;">अंग्रेजों की कुदृष्टि के फलस्वरूप यह पुस्तक कुछ वर्षों तक अनुपलब्ध रही। आजादी के पश्चात सन् 1959 में दैशिक शास्त्र को पांचजन्य ने एक लेखमाला के रूप में पुनः प्रकाशित किया। लेखमाला की पूर्णता पर पं. दीनदयालजी उपाध्याय ने देशवासियों से अनुरोध किया कि “वे दैशिक शास्त्र का बहुत ध्यानपूर्वक अध्ययन करें क्योंकि आर्ष एवं सामयिक भारतीय सिद्धान्तों का विवेचन करने वाली यह एकमात्र पुस्तक है। इसे एक तप:पूत तत्वदर्शी महात्मा श्री 108 सोम्बारी बाबा के आशीर्वाद से स्व. श्री बद्री शाह ठुलघरिया ने दैशिक शास्त्र के गूढ़ सिद्धान्तों का ज्ञान प्राप्त कर इस पुस्तक का लेखन किया। भारतीय संस्कृति के सत्य तत्त्वों को नगाधिराज हिमालय की कन्दरा से निकालकर जीवन के दोराहे पर खड़ा कर दिया, जिसने भारत के राष्ट्रीय आन्दोलन को अनन्त शक्ति का स्रोत प्रदान किया। गीता का कर्मयोग शास्त्र और दैशिक शास्त्र पूरक ग्रन्थ हैं।”</p>
<blockquote><p>दीनदयालजी स्वयं इस पुस्तक का नियमित मनन एवं अनुशीलन करते थे, उसे अपना प्रेरणास्रोत मानते थे। इसीलिए तो पंडित दीनदयाल जी ने दैशिक शास्त्र में आई शब्दावली तथा विचार यथा, चिति, विराट, अर्थायाम आदि का प्रयोग अपने एकात्म दर्शन में किया है।</p></blockquote>
<p>यह पुस्तक वेद और पुराण कब लिखे गए? उस समय की खोज करने वाले पुरातात्त्विकों के मनोविलास के लिए नहीं लिखी गई है, यह तो देश के लिए मर मिटने वाले देशभक्तों के लिए लिखी है। इसे पढ़कर वे देश की रक्षा के लिए सदैव सन्नद्ध रहे, इस हेतु से लिखी है। “दैशिक शास्त्र” का अर्थ भी देश की जानकारी देने वाला शास्त्र मात्र नहीं है। महर्षि पाणिनि के ‘रक्षति’ सूत्र के अनुसार देश शब्द में ‘ठक’ प्रत्यय लगाने से ‘दैशिक’ शब्द बनता है, जिसका अर्थ होता है देश की रक्षा करने वाला। अतः दैशिक शास्त्र का अर्थ हुआ, देश की रक्षा करने वाला शास्त्र। वर्तमान में देश की भावी पीढ़ी देश के सम्बन्ध में बहुत कम जानकारी रखती है। पाश्चात्य विचारों से प्रभावित युवा अपना हित साधने में लगे हैं, देश हित उनके लिए गौण है। ऐसे समय में यह पुस्तक देशहित सर्वोपरि रखने की प्रेरणा देती हुई, उन्हें देश की रक्षा करना मेरा परम कर्तव्य है का पाठ पढ़ाती है।</p>
<p style="text-align: justify;">अतः दैशिक शास्त्र के विचारों को नई पीढ़ी के समक्ष “देश की बात” नामक पुस्तक में पुनः व्याख्यायित करने का एक लघु प्रयास है। सभी देशभक्त स्वयं देश की बात को पढ़ें व अन्य बन्धु-बान्धवों को इसे पढ़ने हेतु प्रेरित करें। मेरा पूर्ण विश्वास है कि इसे पढ़ने वालों तथा उनकी सन्तानों का जीवन देशभक्ति से ओत-प्रोत होगा और वे देश हितार्थ अपना तन-मन-धन भारत माता की सेवा में समर्पित करेंगें। इसके साथ ही स्वाध्यायी पाठकों से मेरा विनम्र निवेदन है कि वे मेरी त्रुटियों की ओर इंगित करते हुए, अपने अमूल्य सुझाव मुझे अवश्य दें। इसी आशा और विश्वास के साथ।</p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>और पढ़े:</strong></span><span style="color: #000080;"><strong> <a style="color: #000080;" href="https://rashtriyashiksha.com/indian-knowledge-tradition-and-national-education-policy/" target="_blank" rel="noopener">भारतीय ज्ञान परम्परा और राष्ट्रीय शिक्षा नीति</a></strong></span></p>
<p>(लेखक शिक्षाविद् है, भारतीय शिक्षा ग्रन्थमाला के सह संपादक है और विद्या भारती संस्कृति शिक्षा संस्थान के सचिव है।)</p>
<p>The post <a href="https://rashtriyashiksha.com/country-talk/">देश की बात-1 :  अपनी बात</a> appeared first on <a href="https://rashtriyashiksha.com">राष्ट्रीय शिक्षा : शिक्षा में समाज प्रबोधन</a>.</p>
]]></content:encoded>
					
					<wfw:commentRss>https://rashtriyashiksha.com/country-talk/feed/</wfw:commentRss>
			<slash:comments>0</slash:comments>
		
		
			</item>
		<item>
		<title>भारतीय शिक्षा &#8211; ज्ञान की बात-121 (भारतीय शिक्षा की पुनर्प्रतिष्ठा हेतु परिवर्तन के बिन्दु-3)</title>
		<link>https://rashtriyashiksha.com/points-of-change-for-revival-of-bhartiya-education-3/</link>
					<comments>https://rashtriyashiksha.com/points-of-change-for-revival-of-bhartiya-education-3/#respond</comments>
		
		<dc:creator><![CDATA[राष्ट्रीय शिक्षा]]></dc:creator>
		<pubDate>Fri, 28 Feb 2025 05:37:57 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[ज्ञान की बात]]></category>
		<category><![CDATA[नवीनतम]]></category>
		<category><![CDATA[वासुदेव प्रजापति]]></category>
		<guid isPermaLink="false">https://rashtriyashiksha.com/?p=8411</guid>

					<description><![CDATA[<p> &#8211; वासुदेव प्रजापति आज शिक्षा का प्रश्न इतना अधिक उलझ गया है कि उसे सुलझाना किसी एक व्यक्ति या एक संस्था के बस की बात नहीं है। इसे सुलझाने के&#8230; </p>
<p>The post <a href="https://rashtriyashiksha.com/points-of-change-for-revival-of-bhartiya-education-3/">भारतीय शिक्षा &#8211; ज्ञान की बात-121 (भारतीय शिक्षा की पुनर्प्रतिष्ठा हेतु परिवर्तन के बिन्दु-3)</a> appeared first on <a href="https://rashtriyashiksha.com">राष्ट्रीय शिक्षा : शिक्षा में समाज प्रबोधन</a>.</p>
]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: right;"> &#8211; वासुदेव प्रजापति</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone wp-image-8412" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2025/02/4569-300x200.jpg" alt="" width="1287" height="858" srcset="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2025/02/4569-300x200.jpg 300w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2025/02/4569.jpg 626w" sizes="auto, (max-width: 1287px) 100vw, 1287px" /></p>
<p style="text-align: justify;">आज शिक्षा का प्रश्न इतना अधिक उलझ गया है कि उसे सुलझाना किसी एक व्यक्ति या एक संस्था के बस की बात नहीं है। इसे सुलझाने के लिए किसी अखिल भारतीय स्तर के शैक्षिक संगठन की आवश्यकता है। इसका तात्पर्य यह है कि शैक्षिक संगठनों का सबसे प्रमुख कार्य शिक्षा की समस्या सुलझाना है। छोटे-मोटे विद्यालय चलाना, छोटे-बड़े सेमिनार करना, प्रकल्प खड़े करना, शिक्षकों का या अभिभावकों का प्रबोधन करना, सरकार का मार्गदर्शन करना आदि कार्य दूसरे क्रम पर हैं। ये सभी कार्य शिक्षा की समस्या सुलझाने के साधन हो सकते हैं। साधनों की ओर देखने की दृष्टि भी वैसी ही होनी चाहिए। यदि समस्या सुलझाना प्रथम कार्य नहीं रहा और उसके साधन रूप इन कार्यों की ही प्राथमिकता रही तो मुख्य समस्या कभी भी नहीं सुलझेगी। इसलिए प्रथम तो समस्या को ही समझने की आवश्यकता है। आज दिखाई देता है कि शिक्षा के भावात्मक पक्ष में ही सारी शक्ति केंद्रित की जाती है और उसे अधिक से अधिक प्रभावी बनाने के प्रयास होते हैं। परंतु मूल समस्या का जब तक निराकरण नहीं होता तब तक भावात्मक कार्य भी प्रभावी नहीं हो सकता।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>शैक्षिक संगठन की भूमिका</strong></p>
<p style="text-align: justify;">शिक्षा की मूल समस्या उसके पश्चिमीकरण की है। इसे आज जिस स्वरुप में देखा जाता है उससे कहीं अधिक गहरी और व्यापक यह समस्या है। संगठनों ने इसका बहुत छोटा हिस्सा पकड़ रखा है परंतु अत्यंत छोटा हिस्सा होने के कारण ही वह परिणामकारी नहीं होता। शिक्षा की व्यापक और गहरी समस्या को समझने के लिए हर संगठन में एक व्यवस्था होनी चाहिए। संगठन के प्रमुख कार्यकर्ताओं को इसकी समझ होनी चाहिए। जिन्हें ऐसी समझ है, ऐसे बाहर के लोग सहायक तो हो सकते हैं परंतु प्रमुख भूमिका संगठन के लोगों की ही रहनी चाहिए। आज संगठनों में भी संरचनात्मक और विचारात्मक ऐसे दो भाग बन गए हैं। दो व्यवस्थाएं भिन्न-भिन्न लोगों के पास होने से क्रियान्वयन के स्तर पर कठिनाई खड़ी होती है।</p>
<p style="text-align: justify;">शिक्षा के पश्चिमीकरण की प्रक्रिया, उसके उद्देश्य, उसके परिणाम आदि ठीक से समझने के बाद संगठन के विभिन्न कार्यों और रचनाओं का उसके साधन के रूप में क्या स्वरूप रहेगा, इसका विचार करना भी उतना ही महत्वपूर्ण है। यह कार्य बहुत कठिन है क्योंकि व्यावहारिक है। वैचारिक की तुलना में व्यावहारिक कार्य अधिक कठिन होता है। संगठनों का कार्य इसलिए भी कठिन हो जाता है कि वह वर्तमान प्रवाह के विपरीत दिशा में जाने का है। प्रवाह के विपरीत जाने पर विस्तार कार्य प्रभावित होता है। विस्तार और व्याप कम होना किसी भी संगठन को स्वीकार्य नहीं होता। अतः यह बात भी विचारणीय हो जाती है कि विस्तार और विकास का संतुलन कैसे बिठाया जाए। दोनों में पूर्ण शक्ति की आवश्यकता होती है, दोनों का समान महत्व है, एक के बिना दूसरा प्रभावी नहीं बन सकता। परंतु विस्तार के प्रति संगठन का आकर्षण अधिक रहता है। विस्तार को संगठन का मूल कार्य माना जाता है जबकि विकास को आनुषांगिक। इसलिए अधिक शक्ति विस्तार कार्य में लगती है और विकास उपेक्षित हो जाता है।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>अध्ययन-अनुसंधान आवश्यक </strong></p>
<p style="text-align: justify;">अध्ययन, चिंतन व अनुसंधान करने की प्रवृत्ति सबकी नहीं होती। इसलिए संगठनों में इसकी ओर ध्यान देना कठिन हो जाता है। परंतु इससे मूल समस्या ज्यों कि त्यों बनी रहती है। अध्ययन व चिन्तन आदि न होने के कारण बढ़ते हुए विस्तार को दिशा देना कठिन हो जाता है और सारा कार्य प्रवाह पतित हो जाता है। इस प्रकार कार्य स्वयं समस्या बन जाता है। विस्तार की समस्याएं असीमित होती हैं। उसका आकर्षण भी अपरिहार्य होता है। वह अपेक्षाकृत सरल भी होता है। इसलिए संगठन का मूल उद्देश्य ही विस्मृत हो जाता है और जिन्हें परिवर्तन करना है उनका ही परिवर्तन हो जाता है। अतः संगठनों का प्रमुख कार्य अपनी नित्य परिष्कृति करते रहना है। यह तो जीने के लिए शरीर स्वास्थ्य बनाए रखने जैसी बात है। स्वस्थ शरीर धर्माचरण के लिए होता है, निरुद्देश्य नहीं। संगठन भी शिक्षा की समस्या सुलझाने के लिए होता है, केवल बने रहने के लिए नहीं।</p>
<p style="text-align: justify;">शैक्षिक संगठनों को अपना तंत्र ठीक से बिठाने के बाद शिक्षा के क्षेत्र में कार्यरत अन्य संगठनों के साथ संवाद स्थापित करना चाहिए। संवाद स्थापित करने का कार्य केवल संगठनों तक सीमित नहीं रखना चाहिए। देश भर में अनेक व्यक्तियों के मन में शिक्षा का भारतीयकरण करने की आकांक्षा है। वे प्रयोग भी करते हैं परंतु उनके प्रयोग व्यक्तिगत स्तर पर होने के कारण अच्छी शिक्षा के नमूने बनकर रह जाते हैं, शिक्षा की गहरी और व्यापक समस्या सुलझाने की दृष्टि से प्रभावी नहीं होते। इन सभी प्रयासों को एक माला में पिरोने के लिए शैक्षिक संगठनों को सूत्र बनना चाहिए। सार रूप में कहें तो शिक्षा के भारतीयकरण हेतु संगठन अनिवार्य है और संगठनों को भारतीयकरण के निहितार्थ समझ कर अपनी योजना लागू करनी चाहिए। संगठनों के बिना देश की अपेक्षा पूर्ण नहीं हो सकती। संगठनों में ही देश की अपेक्षा पूर्ण करने की क्षमता है। अतः शैक्षिक संगठन अपनी भूमिका स्मरणकर भारतीय शिक्षा की पुनर्प्रतिष्ठा हेतु कटिबद्ध हों।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>अनौपचारिक शिक्षा का महत्व </strong></p>
<p style="text-align: justify;">चरित्र निर्माण की शिक्षा, परिवार सुदृढ़ीकरण की शिक्षा, मन को संयम में रखने की शिक्षा, शरीर को स्वस्थ और बलवान बनाने की शिक्षा आदि का परीक्षा में उत्तीर्ण होने व अच्छे अंक मिलने से तथा अर्थार्जन के अच्छे अवसर मिल जाने से कोई संबंध नहीं है, फिर भी वह अनिवार्य है। अतः इन सभी बातों का शिक्षा में समावेश करना, इन बातों की परीक्षा नहीं होना, इनसे अर्थार्जन नहीं होना फिर भी इनको विकास के मुख्य लक्षण मानना, व्यक्ति और समाज को सुसंस्कृत बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम होगा। आज हम इसे अनौपचारिक शिक्षा कहते हैं। करियर बनाने की दौड़ में इसकी कोई गणना नहीं है। इसे अधिक महत्वपूर्ण मानकर, अधिक अर्थपूर्ण बनाकर, हमारे सब प्रकार के संसाधनों का विनियोग इसमें करने की आवश्यकता है। सूत्र तो यह कहता है कि शिक्षा का संबंध अर्थार्जन से नहीं अपितु ज्ञानार्जन से होता है। इसलिए हमें शिक्षा को ज्ञानार्जन से जोड़ने के लिए विविध तरीके अपनाने चाहिए। ऐसी शिक्षा देने में माता-पिता सक्षम हों, इस दृष्टि से माता-पिता की शिक्षा भी प्रारंभ करनी चाहिए। इसे हम परिवार की शिक्षा भी कह सकते हैं। अतः परिवार शिक्षा को महत्व प्रदान करना चाहिए।</p>
<p style="text-align: justify;">हर बालक को अच्छा पुरुष, अच्छा पति, अच्छा गृहस्थ और अच्छा पिता बनना है। इसी प्रकार प्रत्येक बालिका को अच्छी स्त्री, अच्छी पत्नी, अच्छी गृहिणी और अच्छी माता बनना सिखाने हेतु परिवार विषयक विद्यालय भी होने चाहिए। शिक्षा का संबंध ज्ञानार्जन से जोड़ना और अर्थार्जन को महत्व न देना है तो अर्थार्जन की एक अलग, स्वतंत्र और अच्छी योजना बनानी चाहिए। अर्थशास्त्र और समाजशास्त्र को इस बात का विचार करना पड़ेगा, क्योंकि बिना अर्थ के न तो ज्ञानार्जन संभव होता है और न जीवन ही जीया जा सकता है। अतः ज्ञानार्जन के साथ-साथ वह अर्थार्जन की क्षमता भी प्राप्त करे, यह भी आवश्यक है।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>परंपरागत ज्ञान की प्रतिष्ठा करना </strong></p>
<p style="text-align: justify;">शिक्षा को सही पटरी पर लाने के लिए एक बात और विचारणीय है। हमारी वर्तमान औपचारिक शिक्षा व्यवस्था के बाहर भी ज्ञान का समृद्ध भंडार है। सामान्य लोगों के पास परंपरागत ज्ञान आज भी सुरक्षित है। गांव में वनवासी क्षेत्र में स्थापत्य, शिल्प, तकनीक, कला-कारीगरी, वनस्पति, प्राणी, औषधि, उपचार, मंत्र चिकित्सा, खगोल ज्ञान आदि अनेक विद्याओं के जानकार लोग हैं। इन्हें लिखना-पढ़ना भले ही न आता होगा परंतु इन व्यावहारिक कौशलों के साथ-साथ प्रकृति प्रेम, प्रामाणिकता, विद्या का सम्मान जैसे सद्गुण विपुल मात्रा में होते हैं। हमें इन विद्याओं को स्वीकार करना चाहिए, उनका सम्मान करना चाहिए और उनका समर्थन करना चाहिए। इसके साथ ही परंपरागत ज्ञान को शास्त्रीय आधार देने हेतु अनुसंधान की योजना भी बननी चाहिए। शास्त्र शिक्षा और लोक शिक्षा का समन्वय करने से ही परंपरागत ज्ञान की प्रतिष्ठा होगी। भारतीय शिक्षा की प्रतिष्ठा हेतु यह सब करना आवश्यक मानना चाहिए।</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone wp-image-8413" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2025/02/789456123-300x225.jpg" alt="" width="1417" height="1063" srcset="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2025/02/789456123-300x225.jpg 300w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2025/02/789456123.jpg 626w" sizes="auto, (max-width: 1417px) 100vw, 1417px" /></p>
<p style="text-align: justify;"><strong>परिवर्तन का संदर्भ देशव्यापी हो</strong></p>
<p style="text-align: justify;">परिवर्तन की किसी भी योजना का संदर्भ देशव्यापी होना आवश्यक है। परिवर्तन किसी एक स्थान तक सीमित नहीं रहना चाहिए। यह बात ठीक है कि प्रत्यक्ष कार्य तो किसी छोटे स्थान या स्थानों पर ही हो सकता है, परंतु परिणाम की दृष्टि से, लागू होने की संभावना की दृष्टि से, उसका स्वरूप राष्ट्रीय होना आवश्यक है। इसके साथ ही समग्रता में विचार करना भी अनिवार्य है। समग्रता और व्यापकता के लिए योजना भी दीर्घकालीन बनानी पड़ेगी। इन तीनों कार्यों में समग्रता सबसे अहम कार्य है। समग्रता में विचार करने से ही आमूलचूल परिवर्तन संभव है।</p>
<p style="text-align: justify;">सारांश में कहें तो समग्र परिवर्तन के प्रयासों के चरण कुछ इस प्रकार होंगे &#8211;</p>
<ul style="text-align: justify;">
<li>हमें शिक्षा का सैद्धांतिक प्रतिमान गढ़ना होगा।</li>
<li>इस प्रतिमान के आधार पर विपुल मात्रा में अध्ययन और अध्यापन की सामग्री का निर्माण करना होगा।</li>
<li>इस सामग्री का प्रयोग करने के लिए स्वतंत्र विद्याकेंद्रों की रचना करनी होगी।</li>
<li>अनौपचारिक शिक्षा व्यवस्था का महत्व बढ़ाना होगा।</li>
<li>परिवार शिक्षा और लोक शिक्षा की अच्छी व्यवस्था करनी होगी।</li>
<li>ग्रामों, वनों एवं गिरिकंदराओं में निवास करने वाले सामान्य लोगों के पारंपरिक ज्ञान को मान्यता देनी होगी।</li>
<li>परंपरागत ज्ञान को मान्यता देने हेतु उसे शास्त्रीय आधार देना होगा। इस दिशा में अध्ययन और अनुसंधान की गतिविधियों को उस दिशा में मोड़ना होगा। इससे न केवल उसे प्रतिष्ठा प्राप्त होगी अपितु वह परिष्कृत होगा और आधुनिक भी बनेगा।</li>
<li>शिक्षा को भारतीय अर्थ में, भारतीय पद्धति से स्वायत्त बनाने हेतु शिक्षकों को दायित्वबोध से युक्त बनाना होगा, इसके साथ ही उन्हें सुरक्षा देनी होगी और उनको सम्मानित भी करना होगा।</li>
<li>परिवर्तन की योजना समग्रता में विचारित हो, इस योजना का संदर्भ देशव्यापी हो और यह योजना दीर्घकालीन बनाई जाए।</li>
<li>इन प्रयासों का नामाभिधान &#8216;समग्र शिक्षा योजना&#8217; करना चाहिए। शिक्षा क्षेत्र में सभी संगठनों के परिवर्तन के प्रयासों का ध्रुवीकरण इस बिंदु पर होना अपेक्षित है।</li>
<li>समाज का मानस परिवर्तन तथा शासन का नीति परिवर्तन संगठित प्रयास से ही संभव हो सकता है। संगठनों का यही प्रमुख दायित्व भी है। उन्हें अपने इस दायित्व को निभाने हेतु सिद्ध होना चाहिए।</li>
<li>वर्तमान में देश के विद्वानों के पास ज्ञान शक्ति है और संगठनों के पास लोकसंग्रह की शक्ति है। दोनों को केवल उसे जानने और व्यवस्थित करने की आवश्यकता है।</li>
</ul>
<p style="text-align: justify;">        आज विश्व में भारत की स्थिति ऐसी बनी हुई है की विश्व भारत से मार्गदर्शन की अपेक्षा रखता है। यह कोई आश्चर्य की बात नहीं है क्योंकि युगों-युगों से भारत विश्वगुरु के नाते सम्पूर्ण विश्व का मार्गदर्शन करता आया है। भारत के अस्तित्व की सार्थकता भी इसी में है। अतः हम भारतीय शिक्षा की पुनर्प्रतिष्ठा का यह  ईश्वर प्रदत्त दायित्व निभाने में अवश्य सफल होंगे।</p>
<p style="text-align: justify;">(लेखक शिक्षाविद् है, भारतीय शिक्षा ग्रन्थमाला के सह संपादक है और विद्या भारती संस्कृति शिक्षा संस्थान के सचिव है।)</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>और पढ़ें : <a href="https://rashtriyashiksha.com/points-of-change-for-revival-of-bharatiya-education-2/" target="_blank" rel="noopener">भारतीय शिक्षा – ज्ञान की बात-120 (भारतीय शिक्षा की पुनर्प्रतिष्ठा हेतु परिवर्तन के बिन्दु-2)</a></strong></p>
<p>The post <a href="https://rashtriyashiksha.com/points-of-change-for-revival-of-bhartiya-education-3/">भारतीय शिक्षा &#8211; ज्ञान की बात-121 (भारतीय शिक्षा की पुनर्प्रतिष्ठा हेतु परिवर्तन के बिन्दु-3)</a> appeared first on <a href="https://rashtriyashiksha.com">राष्ट्रीय शिक्षा : शिक्षा में समाज प्रबोधन</a>.</p>
]]></content:encoded>
					
					<wfw:commentRss>https://rashtriyashiksha.com/points-of-change-for-revival-of-bhartiya-education-3/feed/</wfw:commentRss>
			<slash:comments>0</slash:comments>
		
		
			</item>
		<item>
		<title>भारतीय शिक्षा &#8211; ज्ञान की बात-120 (भारतीय शिक्षा की पुनर्प्रतिष्ठा हेतु परिवर्तन के बिन्दु-2)</title>
		<link>https://rashtriyashiksha.com/points-of-change-for-revival-of-bharatiya-education-2/</link>
					<comments>https://rashtriyashiksha.com/points-of-change-for-revival-of-bharatiya-education-2/#comments</comments>
		
		<dc:creator><![CDATA[राष्ट्रीय शिक्षा]]></dc:creator>
		<pubDate>Fri, 31 Jan 2025 11:21:15 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[ज्ञान की बात]]></category>
		<category><![CDATA[नवीनतम]]></category>
		<category><![CDATA[वासुदेव प्रजापति]]></category>
		<category><![CDATA[bhartiya shiksha]]></category>
		<category><![CDATA[gyan ki baat]]></category>
		<category><![CDATA[indian education]]></category>
		<category><![CDATA[भारतीय शिक्षा]]></category>
		<guid isPermaLink="false">https://rashtriyashiksha.com/?p=8250</guid>

					<description><![CDATA[<p> &#8211; वासुदेव प्रजापति शिक्षा में परिवर्तन करने से पूर्व हमें एक और सूत्र को ध्यान में रखने की आवश्यकता है। &#8216;शिक्षा व्यक्तिगत नहीं होती राष्ट्रीय होती है।&#8217; व्यक्ति कभी अकेला&#8230; </p>
<p>The post <a href="https://rashtriyashiksha.com/points-of-change-for-revival-of-bharatiya-education-2/">भारतीय शिक्षा &#8211; ज्ञान की बात-120 (भारतीय शिक्षा की पुनर्प्रतिष्ठा हेतु परिवर्तन के बिन्दु-2)</a> appeared first on <a href="https://rashtriyashiksha.com">राष्ट्रीय शिक्षा : शिक्षा में समाज प्रबोधन</a>.</p>
]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: right;"> &#8211; वासुदेव प्रजापति</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone wp-image-8252" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2025/01/images-300x156.jpeg" alt="" width="1302" height="677" srcset="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2025/01/images-300x156.jpeg 300w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2025/01/images.jpeg 311w" sizes="auto, (max-width: 1302px) 100vw, 1302px" /></p>
<p style="text-align: justify;">शिक्षा में परिवर्तन करने से पूर्व हमें एक और सूत्र को ध्यान में रखने की आवश्यकता है। &#8216;शिक्षा व्यक्तिगत नहीं होती राष्ट्रीय होती है।&#8217; व्यक्ति कभी अकेला नहीं जी सकता, बिना समाज के और बिना सृष्टि के उसका जीवन संभव ही नहीं है। व्यष्टि, समष्टि और सृष्टि में जीवन एक और अखंड है। इस अखंड जीवन में आत्मतत्व अनुस्यूत है। भारतीय समाज जीवन की रचना इस सूत्र के आधार पर हुई है। शिक्षा के माध्यम से इस सूत्र को विचार और व्यवहार में, एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुंचाने की व्यवस्था की गई है। शिक्षा का वर्तमान स्वरूप इस सूत्र के अनुरूप नहीं है। वर्तमान शिक्षा व्यक्ति का लाभ और उस लाभ के लिए अन्यों का उपयोग कैसे हो, यह सिखाती है। इस प्रकार की शिक्षा न तो व्यक्ति के लिए और न समाज के लिए लाभकारी होती है। कुछ लाभ यदि दिखाई देता भी है तो वह बहुत कम और बहुत अल्पकालिक होता है। ऐसी शिक्षा राष्ट्र को समृद्ध, सुसंस्कृत, ज्ञानवान और पराक्रमी नहीं बना सकती। परिवर्तन की योजना करते समय हमें व्यक्तिगत संदर्भ को छोड़कर राष्ट्रीय संदर्भ स्वीकार करना होगा। व्यावहारिक चिंतन के इतने पहलू देखने के बाद हमें प्रत्यक्ष योजना पर विचार करना है। योजना करते समय हमें निम्नलिखित बिन्दुओं पर विचार करना होगा।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>परिवर्तन का ज्ञानात्मक पक्ष</strong></p>
<p style="text-align: justify;">हमें सर्वप्रथम परिवर्तन का ज्ञानात्मक पक्ष ध्यान में रखना होगा। विद्यालयों, महाविद्यालय में जो पढ़ाया जाता है उसका स्वरूप भारतीय नहीं है। सामाजिक शास्त्र ग्रंथों के सिद्धांत, प्राकृतिक विज्ञानों की दृष्टि, व्यक्तिगत विकास की संकल्पना, जीवन रचना और सृष्टि रचना की समझ आदि बातें जडवादी और अनात्मवादी जीवन दृष्टि के आधार पर विकसित हुई हैं। इन्हें हम विगत आठ-दस पीढ़ियों से पढ़ते आए हैं। हमारा अनुभव कहता है कि छोटी आयु में जो पढ़ाया जाता है, उसके अनुसार ही मानस बनता है, विचार और व्यवहार बनते हैं। ऐसा मानस फिर व्यक्तिगत और सामुदायिक जीवन की व्यवस्थाएं बनाते हैं। देश इसी आधार पर चलता है। धीरे-धीरे देश की जीवन रचना में परिवर्तन होने लगता है, यह परिवर्तन जब पूर्ण हो जाता है तब देश का चरित्र पूर्ण रूप से बदल जाता है। जब तक यह परिवर्तन पूर्ण नहीं होता तब तक देश की मूल जीवन रचना और शिक्षा के माध्यम से बदलने वाली नई रचना में संघर्ष होता रहता है। देश की मूल रचना अपने आप को बचाने के लिए प्रयास करती रहती है। वह सरलता से स्वयं को हारने नहीं देती। हमारे देश की जितनी भी अधिकृत ताकते हैं वे सब विपरीत दिशा की शिक्षा के पक्ष में हैं। परंतु हमारे पूर्वजों की महान तपश्चर्या, जीवन रचना और जीवन दृष्टि की आंतरिक ताकत के बल पर हम इतने शतकों में भी नष्ट नहीं हुए हैं। हम क्षीणप्राण अवश्य हुए हैं परंतु गतप्राण नहीं हुए हैं। हम गतप्राण न हों, इसलिए हमें अपना ध्यान कक्षाकक्ष में पढ़ाए जाने वाले विषयों के विषयवस्तु की ओर केंद्रित करना होगा। हमें विषयों की संकल्पनाएं बदलनी होगी, आधारभूत परिभाषाएं बदलनी होगी, पाठ्यक्रम बदलने होंगे, पठन-पाठन की पद्धति बदलनी होगी। इन सब के लिए हमें अपने अध्ययन-अनुसंधान और अध्ययन की पद्धतियों को भी बदलना होगा। यह एक महान शैक्षिक प्रयास होगा। इसे सबसे पहले करना होगा क्योंकि इसके बिना शेष सारे परिवर्तन पाश्चात्य ढांचे को ही मजबूत बनाने वाले सिद्ध होंगे। आज लगभग वही हो रहा है, इसलिए प्रयास तो हम बहुत कर रहे हैं परंतु रचना नहीं बदल रही है।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>स्वतंत्र और स्वायत्त रचना का निर्माण</strong></p>
<p style="text-align: justify;">हमें वर्तमान रचना के समानांतर एक स्वतंत्र और स्वायत्त रचना का निर्माण करना होगा। अध्ययन और अनुसंधान करने वाले बुद्धिमान और राष्ट्रभक्त तरूणों को ज्ञान साधना करने हेतु आवाह्न करना होगा यह कार्य सरल नहीं है क्योंकि वर्तमान स्थिति में पद-प्रतिष्ठा और धन छोड़कर ही ज्ञान साधना हो सकती है। दूसरी और ज्ञान साधना करने वालों का पूर्ण सम्मान करना होगा और उनकी सुरक्षा, प्रतिष्ठा व आर्थिक आवश्यकताओं की पूर्ति कर सके ऐसे धनवान लोगों का भी सहयोग लेना होगा। &#8216;अर्थ से विद्याश्रेष्ठ है&#8217; इस सूत्र को स्वीकृत बनाने से ही यह कार्य संभव हो सकेगा। नए पाठ्यक्रमों के लिए हमें नई अध्ययन सामग्री तैयार करनी होगी। हमारे शाश्वत सिद्धांत को समाहित करने वाले शास्त्र ग्रन्थों का अध्ययन कर उनके आधार पर वर्तमान युग के अनुरूप साहित्य का निर्माण करना होगा। वर्तमान विश्व के ज्ञान प्रवाहों से अवगत होते हुए उनका समायोजन हमारी ज्ञान धारा से कर उसे समृद्ध भी बनाना होगा। संक्षेप में कहें तो विपुल मात्रा में साहित्य निर्माण करना हमारा दूसरा कार्य होगा।</p>
<p style="text-align: justify;">हमें शिक्षा को स्वायत्त बनाने की दिशा में मजबूत प्रयास करने की आवश्यकता है। शासन निरपेक्ष शिक्षा व्यवस्था ही समाज का सही मार्गदर्शन कर सकती है। शिक्षा शिक्षकों के बल पर चलनी चाहिए, जहां शिक्षक कर्मचारी होते हैं वहां वे गुरु नहीं बन सकते, गुरुत्व एक मानसिकता होती है। जब शिक्षक अपने आप को गुरु मानता है तब वह दायित्वबोध से युक्त होता है। ऐसा शिक्षक यदि छात्र का चरित्र अच्छा नहीं है, समाज सुसंस्कृत नहीं है तो वह अपने आप को इन सबका जिम्मेदार मानता है। समाज यदि शिक्षक को गुरु मानता है तो उसे धनवानों से और सत्तावानों  से अधिक आदर देता है। ऐसा समाज शिक्षक को कभी भी दीन-हीन नहीं रहने देता। जब समाज शिक्षक को गुरु मानकर उनका सम्मान करता है परंतु शिक्षक अपने आप को गुरु नहीं मानता तब वह समाज को गलत रास्ते पर ले जाकर भटका देता है और उसकी हानि करता है। यदि शिक्षक अपने आप को गुरु मानता है परंतु समाज उसे गुरु नहीं मानता तो शिक्षक को अनेक कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है और अवमानना भी सहनी पड़ती है। ऐसी स्थिति में विरले शिक्षक ही अपना गुरुत्व बनाए रख पाते हैं, अधिकांश शिक्षक तो कर्मचारी बन जाते हैं। तब ज्ञान की, शिक्षक की और समाज की क्षति होती है। जब समाज और शिक्षक दोनों ही शिक्षक को गुरु नहीं मानते तब समाज की अधोगति की कोई रोक नहीं सकता। ऐसा समाज सुसंस्कृत नहीं रह पाता, प्रथम तो वह पशु प्रवृत्ति की ओर बढ़ता है, फिर पशु से भी नीचे गिरकर विकृति की ओर गति करता है। कहने की आवश्यकता नहीं है कि आज हम ऐसी ही स्थिति में जी रहे हैं।</p>
<p style="text-align: justify;">इस स्थिति से ऊपर उठने के लिए हमें शिक्षा को स्वायत्त बनाने की दिशा में गंभीर रूप से प्रयास करने होंगे। यह कार्य कोई भी व्यक्ति या संस्था अकेले नहीं कर सकते, इसके लिए अनिवार्य रूप से संगठन चाहिए। व्यक्ति या संस्था शैक्षिक कार्य कर सकते हैं। देश में अनेक व्यक्ति और संस्थाएं आज भी मूल्यवान शैक्षिक कार्य कर रहे हैं। परंतु समाज के मानस को बदलना और शासन को प्रभावित करने का कार्य संगठित शक्ति ही कर सकती है। संगठित शक्ति भी दो प्रकार की है, एक तो शिक्षा के ही क्षेत्र में कार्यरत संगठन की शक्ति और दूसरे धर्म सत्ता की नैतिक शक्ति। वास्तव में शिक्षा धर्म सत्ता का ही प्रतिनिधित्व करती है। समाज को शिक्षित करने का कार्य धर्म सत्ता का होता है। यह शिक्षा धर्म की शिक्षा नहीं होती अपितु धर्म आधारित शिक्षा होती है। अतः धर्म की नैतिक शक्ति और शैक्षिक संगठनों की संगठित शक्ति ही समाज के मानस को बदलकर शासन को प्रभावित कर सकती है, तथा शिक्षा को स्वायत्त बना सकती है। आज देश में ऐसे संगठन अस्तित्व में हैं और धर्म सत्ता भी है,बस उन्हें इस कार्य को अपनी वरीयता सूची में लाने की आवश्यकता है।</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone wp-image-8253" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2025/01/hq720-300x169.jpg" alt="" width="1418" height="799" srcset="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2025/01/hq720-300x169.jpg 300w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2025/01/hq720.jpg 686w" sizes="auto, (max-width: 1418px) 100vw, 1418px" /></p>
<p style="text-align: justify;"><strong>शिक्षा के स्थापित ढांचे से बाहर निकलना</strong></p>
<p style="text-align: justify;">तनिक विचार करने पर ध्यान में आता है कि हमें शिक्षा के स्थापित ढांचे से बाहर निकलना होगा। बात व्यक्ति विकास की हो या राष्ट्र निर्माण की, चरित्र निर्माण की हो या कौशल विकास की, अर्थार्जन के लायक बनाने की हो या व्यवहार ज्ञान की, ऐसी सभी प्रकार की शिक्षा परिवार में होती है। चरित्र निर्माण की शिक्षा तो गर्भावस्था और शिशु अवस्था में ही हो जाती है। इस शिक्षा को देने वाले माता और पिता होते हैं। हमारे शास्त्र, हमारी परंपरा, हमारा अनुभव और हमारी सामान्य बुद्धि कहती है कि माता बालक की प्रथम गुरु है, दूसरा स्थान पिता का है और शिक्षक का स्थान तीसरा है। अधिकांश शिक्षा घर में ही, शिशु अवस्था में मिलने वाले संस्कारों के माध्यम से होती है। यह परिवार का एक बड़ा महत्वपूर्ण योगदान है। वंश परंपरा के माध्यम से और भी अनेक प्रकार की परंपराएं बनाए रखने का कार्य भी परिवार में ही होता है। अतः परिवार संस्कृति रक्षा व संस्कृति संवर्धन का प्रमुख केंद्र है। परिवार व्यवस्था विश्व के समाज जीवन को भारत की दी हुई अनुपम देन है। जीवन का समग्रता में आकलन करने वाली भारतीय बुद्धि की देन यह परिवार व्यवस्था है। हमारे पूर्वजों का मानना है कि माता-पिता का स्थान शिक्षक नहीं ले सकता और घर का स्थान विद्यालय नहीं ले सकता। इस सूत्र की पालना करते हुए वर्तमान समय में ऐसे अनेक माता-पिता हैं जो अपने बालकों को विद्यालय न भेजकर घर में ही पढ़ाते हैं। &#8216;घर ही विद्यालय&#8217; इस संकल्पना को साकार बनाने वाले अभिभावक अपनी सन्तानों को संस्कारों के साथ साथ जीवन जीना सिखाते हैं। क्या पढ़ाना और क्या नहीं पढ़ाना, कब पढ़ाना, कितना पढ़ाना और उनका सतत मूल्यांकन कैसे करना, इन सभी बातों का निर्णय वे स्वयं ही करते हैं। इन्हें न सरकारी मान्यता चाहिए और न प्रमाणपत्र चाहिए। घर ही विद्यालय का यह प्रयोग सही अर्थ में स्वतंत्र व स्वायत्त शिक्षा का नमूना है। भारतीय शिक्षा की पुनर्प्रतिष्ठा की ओर बढ़ने वाला एक कदम है।</p>
<p style="text-align: justify;">आज परिवार व्यवस्था कुछ शिथिल पड़ गई है और परिवार में मिलने वाली शिक्षा भी प्रभावी नहीं है। इसलिए हमें परिवार व्यवस्था को सुदृढ़ बनाने की योजना शिक्षा के माध्यम से करनी होगी। परिवार भारतीय समाज रचना की मूल इकाई है, अतः परिवार के सुदृढ़ीकरण से राष्ट्र जीवन भी सुव्यवस्थित होगा। राष्ट्रीय शिक्षा पर आधारित ऐसे नए विद्यालय भी हमें प्रारंभ करने होंगे जहां हम पूर्ण रूप से भारतीय ज्ञान धारा पर आधारित शिक्षा दे सकें। ऐसे विद्यालय चलाने के लिए संस्था संचालक, शिक्षक और अभिभावकों का परस्पर अनुकूल मानस वाला एक समूह होना आवश्यक है। ऐसे विद्यालय प्रथम तो प्रयोग के रूप में ही चलेंगे परंतु समाज स्वीकृत होने के उपरांत स्थान स्थान पर ऐसे नए विद्यालय स्थापित करने होंगे, जो अनेक लोगों के द्वारा, अनेक स्थानों पर विभिन्न प्रकार की परिस्थितियों में भी चलाएं जा सकें। ऐसे विद्यालय व्यावहारिक और लचीलापन लिए तथा सर्व सामान्य और सर्व स्वीकृत होने की क्षमता वाले होने चाहिए।</p>
<p style="text-align: justify;">अब तक हम यह मानकर कर चल रहे हैं कि सरकारी मान्यता प्राप्त विद्यालय में ही शिक्षा प्राप्त की जा सकती है। शिक्षा का यह वर्तमान ढ़ांचा समाज स्वीकृत हो चुका है। सामान्य व्यक्ति क्या बड़े बड़े शिक्षाविद् भी इससे बाहर निकलकर शिक्षा में परिवर्तन का विचार ही नहीं करते। जब तक हम इस वर्तमान ढ़ांचे से चिपके रहेंगे, तब तक भारतीय शिक्षा की पुनर्प्रतिष्ठा सम्भव नहीं होगी। अतः वर्तमान अंग्रेजी ढांचे से बाहर निकलकर परिवर्तन तो करना ही होगा।</p>
<p style="text-align: justify;">(लेखक शिक्षाविद् है, भारतीय शिक्षा ग्रन्थमाला के सह संपादक है और विद्या भारती संस्कृति शिक्षा संस्थान के सचिव है।)</p>
<p><strong>और पढ़ें : <span style="color: #0000ff;"><a style="color: #0000ff;" href="https://rashtriyashiksha.com/points-of-change-for-re-establishing-bhartiya-education-1/" target="_blank" rel="noopener">भारतीय शिक्षा – ज्ञान की बात-119 (भारतीय शिक्षा की पुनर्प्रतिष्ठा हेतु परिवर्तन के बिंदु-1)</a></span></strong></p>
<p>The post <a href="https://rashtriyashiksha.com/points-of-change-for-revival-of-bharatiya-education-2/">भारतीय शिक्षा &#8211; ज्ञान की बात-120 (भारतीय शिक्षा की पुनर्प्रतिष्ठा हेतु परिवर्तन के बिन्दु-2)</a> appeared first on <a href="https://rashtriyashiksha.com">राष्ट्रीय शिक्षा : शिक्षा में समाज प्रबोधन</a>.</p>
]]></content:encoded>
					
					<wfw:commentRss>https://rashtriyashiksha.com/points-of-change-for-revival-of-bharatiya-education-2/feed/</wfw:commentRss>
			<slash:comments>2</slash:comments>
		
		
			</item>
		<item>
		<title>भारतीय शिक्षा &#8211; ज्ञान की बात-119  (भारतीय शिक्षा की पुनर्प्रतिष्ठा हेतु परिवर्तन के बिंदु-1)</title>
		<link>https://rashtriyashiksha.com/points-of-change-for-re-establishing-bhartiya-education-1/</link>
					<comments>https://rashtriyashiksha.com/points-of-change-for-re-establishing-bhartiya-education-1/#comments</comments>
		
		<dc:creator><![CDATA[राष्ट्रीय शिक्षा]]></dc:creator>
		<pubDate>Sun, 26 Jan 2025 08:33:12 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[ज्ञान की बात]]></category>
		<category><![CDATA[नवीनतम]]></category>
		<category><![CDATA[वासुदेव प्रजापति]]></category>
		<category><![CDATA[gyan ki baat]]></category>
		<category><![CDATA[indian education]]></category>
		<category><![CDATA[Rashtriya shiksha]]></category>
		<category><![CDATA[vidya bharati]]></category>
		<guid isPermaLink="false">https://rashtriyashiksha.com/?p=8225</guid>

					<description><![CDATA[<p> &#8211; वासुदेव प्रजापति हम भारतीय शिक्षा की पुनर्प्रतिष्ठा चाहते हैं। भारतीय शिक्षा की पुनर्प्रतिष्ठा तभी संभव है जब आज की व्यवस्था में आमूलचूल परिवर्तन किया जाए। यह परिवर्तन स्थाई हो&#8230; </p>
<p>The post <a href="https://rashtriyashiksha.com/points-of-change-for-re-establishing-bhartiya-education-1/">भारतीय शिक्षा &#8211; ज्ञान की बात-119  (भारतीय शिक्षा की पुनर्प्रतिष्ठा हेतु परिवर्तन के बिंदु-1)</a> appeared first on <a href="https://rashtriyashiksha.com">राष्ट्रीय शिक्षा : शिक्षा में समाज प्रबोधन</a>.</p>
]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: right;"> &#8211; वासुदेव प्रजापति</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone wp-image-8226" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2025/01/images-1-300x168.jpg" alt="" width="1418" height="794" srcset="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2025/01/images-1-300x168.jpg 300w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2025/01/images-1.jpg 739w" sizes="auto, (max-width: 1418px) 100vw, 1418px" /></p>
<p style="text-align: justify;">हम भारतीय शिक्षा की पुनर्प्रतिष्ठा चाहते हैं। भारतीय शिक्षा की पुनर्प्रतिष्ठा तभी संभव है जब आज की व्यवस्था में आमूलचूल परिवर्तन किया जाए। यह परिवर्तन स्थाई हो और सर्वजन हिताय हो, तभी इसकी सार्थकता है। परिवर्तन संसार का नियम है, यह बात हम भली भांति जानते हैं। परंतु आज की शिक्षा में जो परिवर्तन अपेक्षित है वह छोटा-मोटा अथवा काल के प्रवाह में होने वाला परिवर्तन नहीं है। यह परिवर्तन भारतीय चिंतन व दर्शन के अनुसार होना चाहिए। वर्तमान शिक्षा व्यवस्था को समग्रता में देखकर शिक्षा के संपूर्ण तंत्र-मंत्र और यंत्र को परिवर्तित करने की आवश्यकता है। समग्रता में परिवर्तन किए बिना हम शिक्षा की जिन समस्याओं से जूझ रहे हैं उनका निराकरण होना संभव नहीं है।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>समग्र परिवर्तन करना होगा </strong></p>
<p style="text-align: justify;">हमें छोटे-छोटे परिवर्तनों की बात तुरंत समझ में आ जाती है। जैसे की हम पाठ योजना में नवाचार की बात करते हैं और पाठ्य पुस्तकों में समय-समय पर परिवर्तन करते रहते हैं। कभी कुछ नए विषय जोड़ते हैं तो कभी पुराने विषयों को हटा देते हैं। पाठ्यक्रमों में परिवर्तन करते हैं, परीक्षा की पद्धतियों में नई-नई बातें जोड़ते हैं, इत्यादि। अब तो संस्कारों की शिक्षा जैसी बातें भी आग्रह पूर्वक जोड़ने लगे हैं। फिर भी हम शिक्षा के वर्तमान स्वरूप से संतुष्ट नहीं हैं, क्योंकि मूल बातों पर विचार किए बिना हम ऊपर-ऊपर के परिवर्तनों में ही लगे रहते हैं। भारतीय शिक्षा की पुनर्प्रतिष्ठा हेतु शिक्षा के सभी पहलुओं का समग्रता में विचार करने की आवश्यकता है।</p>
<p style="text-align: justify;">परिवर्तन करने के लिए हमें सबसे पहले अपना चिंतन बदलने की आवश्यकता है, क्योंकि चिंतन ही शेष सभी बातों का आधार है। आधार होने के बाद भी चिंतन केवल प्रथम चरण है, वह केवल नींव है। नींव मजबूत होनी चाहिए यह भी सत्य है, नींव शुद्ध होनी चाहिए यह भी सत्य है, परंतु केवल नींव से भवन नहीं होता यह भी उतना ही सत्य है। इसलिए केवल चिंतन नहीं, व्यवहार की बात होना भी आवश्यक है। अतः चिंतन के बाद, चिंतन के साथ, चिंतन के अनुरूप क्रियान्वयन की बात भी होनी चाहिए। जब हम व्यवहार के स्तर पर परिवर्तन की बात करते हैं तब अनेक बातों का विचार करना आवश्यक है। क्रियान्वयन के लिए एक रचना चाहिए, रणनीति चाहिए, ठोस योजना भी चाहिए। इन सबके लिए हमारी क्षमताओं और व्यापक मानसिकता का विचार करना होगा। हमारी तत्काल और दूरगामी आवश्यकताओं का तथा संसाधनों की उपलब्धता का विचार करना होगा। हमें एक संपूर्ण प्रतिमान का, एक संपूर्ण ढांचे का विचार करना होगा। भले ही समय लगे हमें पूरा एक साथ समग्रता में विचार किए बिना परिवर्तन का प्रारंभ नहीं करना चाहिए।</p>
<p style="text-align: justify;">अपने अतीत का स्मरण करना होगा</p>
<p style="text-align: justify;">हमें अपने संदर्भ और अपनी पृष्ठभूमि पर विचार करना होगा। हम तात्विक रूप से और भावात्मक रूप से अपने अतीत से जुड़े हैं। हमें उपनिषदों का तत्वज्ञान सही लगता है। हम आत्मतत्व की एकात्मता की बात करते हैं। हमें ऐसे मूल्य अच्छे और सही लगते हैं, जिनका अधिष्ठान आध्यात्मिक है। हम त्याग, समर्पण, सेवा और निष्ठा आदि बातों की सृष्टि में विहार करना पसंद करते हैं। हमारे राष्ट्रीय आदर्श भी त्यागी, बलिदानी, सेवाभावी और लोक कल्याण हेतु जीवन देने वाले महापुरुषों के हैं। जहां-जहां हमें इन आदर्शों के अनुरूप उदाहरण देखने को मिलते हैं, हमें प्रसन्नता होती है। परंतु हमारा आसन्न भूतकाल ध्यान में लेने की आवश्यकता है। विगत 200 वर्षों की घटनाएं हमारी वर्तमान समस्याओं की जड़ है। यह 200 वर्ष हमारे चिंतन और रचना के परिवर्तन का काल है। व्यवहार के जितने भी पक्ष होते हैं उन सब में परिवर्तन हुआ है। इन 200 वर्षों में एक पूर्ण रूप से अभारतीय प्रतिमान को हमारे मन-मस्तिष्क में बिठाने का अंग्रेजी प्रयास हुआ है। अंग्रेजी शिक्षा की सहायता से उनका यह प्रयास अप्रत्याशित रूप से सफल एवं यशस्वी भी हुआ है।</p>
<p style="text-align: justify;">यह केवल शिक्षा क्षेत्र का परिवर्तन नहीं है अपितु संपूर्ण जीवन रचना का परिवर्तन है। अंग्रेजों के द्वारा लादे गए इस अभारतीय ढांचे का प्रभाव इतना गहरा है कि स्वतंत्रता के बाद भी हमने उस ढांचे को आधुनिक और अनिवार्य समझ कर अपना लिया है। इसलिए परिवर्तन करते समय हमें वर्तमान वैचारिक, मानसिक और व्यावहारिक संदर्भों को ध्यान में लेना पड़ेगा। इन सभी संदर्भों को लेकर हम शिक्षा क्षेत्र का विचार करेंगे तो हमें कुछ समस्याओं का निराकरण प्राप्त होगा।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>हमें अंग्रेजी व्यवस्थाओं को छोड़ना होगा</strong></p>
<p style="text-align: justify;">हमने अंग्रेजी शिक्षा पद्धति की कुछ व्यवस्थाओं को मन से स्वीकार कर लिया है, हम उन्हें गृहीत मानकर चलते हैं। जैसे शिक्षा संस्थान चलाने के लिए शासन की मान्यता अनिवार्य है। यह बात आज जन-मन में इतनी गहरी बैठ गई है कि शिक्षा के लिए शासन की मान्यता अनिवार्य है। जबकि भारत में केवल 150 वर्ष पहले शासन का कोई शिक्षा विभाग ही नहीं था। शिक्षा के संबंध में आज जो कानून और नियम हैं, जो विभिन्न प्रकार के नियंत्रणों की व्यवस्था है, पाठ्यक्रम निर्माण, पाठ्यपुस्तक निर्माण, परीक्षा, प्रवेश और अनुदान आदि का जो तंत्र है उसका सर्वथा अभाव था। इसका अर्थ यह भी नहीं है कि यह सारी बातें हमारे यहां नहीं थी। शिक्षा विषयक ये सारी बातें हमारे यहां भी थीं किन्तु उनका नियंत्रण शासन का न होकर शिक्षकों का था और शिक्षक शासन के प्रति उत्तरदायी न होकर समाज के प्रति उत्तरदायी था।</p>
<p style="text-align: justify;">इस भारतीय व्यवस्था के अनेक सुपरिणाम थे। विद्या और विद्यावान सत्ता और अर्थ के अधीन न होकर उसके मार्गदर्शक, निर्देशक और आवश्यकता पड़ने पर नियंत्रक के रूप में काम कर सकते थे। शिक्षा ज्ञान सत्ता का एक हिस्सा थी जो धर्म सत्ता के रूप में व्यवहार करती थी। इस व्यवस्था के बदलने के फलस्वरूप अनेक दुष्परिणाम हुए। शासन के नियंत्रण में आते ही शिक्षा ने अपना गौरव और गुरुता खो दी। ज्ञान सत्ता के ऊपर अर्थ और शासन का प्रभुत्व हो जाने से समाज सही मार्गदर्शन से वंचित हो गया। साथ ही अर्थ सत्ता और राज्य सत्ता बिना मार्गदर्शन के सही रास्ते से भटकने लगे और बिना नियंत्रण के निरंकुश होकर शासन में परिणत हो गए।</p>
<p style="text-align: justify;">दूसरा दुष्परिणाम यह हुआ कि शिक्षक स्वयं गुरु न रहकर लघु बन गया, कर्मचारी बन गया और राष्ट्र निर्माण के अपने दायित्व से विमुख हो गया। शिक्षा में सभी गैर शैक्षिक नियंत्रण बढ़ गए। सारे तंत्र में एक प्रकार की व्यक्ति निरपेक्षता समा गई, जहां किसी की जिम्मेदारी निश्चित करना कठिन हो गया। तंत्र का चेहरा निर्जीव बन गया और प्रेम, आनंद, रस, कृतज्ञता जैसे तत्वों का अभाव हो गया। हम आचार्य चाणक्य का स्मरण करते हुए कहते हैं कि &#8220;शिक्षक राष्ट्र का निर्माता होता है&#8221;, परंतु वर्तमान स्थिति में न तो शिक्षा राष्ट्र निर्माणकारी हो सकती है और न शिक्षक राष्ट्र निर्माता बन सकता है। अतः परिवर्तन का यह एक महत्वपूर्ण क्षेत्र है जिसकी हमें चिंता करनी होगी। शिक्षा में स्वायत्तता का संपूर्ण विचार करते हुए, शासन का नियंत्रण कैसे दूर किया जाए, इसका विचार हो। स्वायत्तता का यह विचार और प्रयास स्वयं शिक्षकों की और से होना चाहिए।</p>
<p style="text-align: justify;">आज शिक्षा अप्रत्याशित रूप से संस्थागत बन गई है। इसलिए संस्था को आर्थिक दृष्टि से और प्रशासनिक दृष्टि से शासन की मान्यता चाहिए। संस्था किसी न किसी रूप में पंजीकृत हुए बिना चल नहीं सकती, और पंजीकृत होते ही उसमें वस्तुनिष्ठता आ जाती है। वस्तुनिष्ठता का अर्थ हम पक्षपात रहित लगाते हैं परंतु व्यवहार में वस्तुनिष्ठता यांत्रिकता बन जाती है। आज वस्तुनिष्ठता,मूल्यांकन, प्रमाण पत्र, पदवी आदि का महत्व इतना बढ़ गया है कि विद्यालय नामक संस्था से बाहर बिना परीक्षा उत्तीर्ण किए, बिना प्रमाण पत्र प्राप्त किए भी शिक्षा हो सकती है, इस बात को हम भूल गए हैं। इसका दुष्परिणाम यह हुआ है कि अब प्रमाण पत्र भी अर्थार्जन का साधन है, ज्ञानवान होने का प्रमाण नहीं। शिक्षा अपने स्वभाव से ही इतनी अधिक संस्थागत नहीं हो सकती, क्योंकि वह जन्म से पहले ही शुरु हो जाती है। शिक्षा घर में, आंगन में, खेल के मैदान में, मंदिर में, बाजार में अर्थात सर्वत्र होती है, वह जीवन क्रम के साथ जुड़ी हुई रहती है और जीवन के हर पहलू में समा जाती है। संस्थागत स्वरूप तो उसके पूर्ण स्वरूप का एक छोटा सा भाग है, वह भी हमेशा अनिवार्य नहीं होता। वर्तमान में हमने शिक्षा के केवल संस्थागत स्वरूप को मान्यता देकर अपने आप को संकट में डाल दिया है। अतः परिवर्तन का हमारा दूसरा प्रयास शिक्षा को इस संस्थाकरण से मुक्त करवाना है।</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone wp-image-8227" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2025/01/jui-300x158.jpg" alt="" width="1257" height="662" srcset="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2025/01/jui-300x158.jpg 300w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2025/01/jui.jpg 600w" sizes="auto, (max-width: 1257px) 100vw, 1257px" /></p>
<p style="text-align: justify;"><strong>आधुनिकता व वैश्विकता को सही अर्थ में समझना</strong></p>
<p style="text-align: justify;">आधुनिकता व वैश्विकता ने हमें गहरे संकट में डाल दिया है। इन दोनों शब्दों के सही अर्थ को छोड़कर हमने इनका पाश्चात्य अर्थ ले लिया है। आधुनिक  संस्कृत शब्द &#8216;अधुना&#8217; से बना है। अधुना का अर्थ है &#8216;अब&#8217; या &#8216;अभी&#8217; अर्थात वर्तमान। शाश्वत सिद्धांतों का वर्तमान स्वरूप कैसा होता है, इसका चिंतन भारत में प्राचीन काल से अर्थात जब से चिंतन शुरू हुआ है, तब से होता रहा है। इसी प्रक्रिया में हमारे स्मृति साहित्य की रचना हुई है, जिसे हम युगानुकूल चिंतन कहते हैं। युगानुकूल का अर्थ आधुनिकता है। आधुनिकता भारतीय भी हो सकती है और पाश्चात्य भी। इसलिए परिवर्तन का विचार करते समय हमें पाश्चात्य ही आधुनिक है, इस धारणा से मुक्त होना होगा। इससे मुक्त होकर ही हम पाश्चात्यीकरण से मुक्त हो पाएंगे। हमें इस बात से भी स्पष्ट होना होगा कि भारतीयता और वैश्विकता में कोई अंतर नहीं है। भारत ने हमेशा वैश्विक संदर्भ में ही विचार और व्यवहार किया है। भारत की आकांक्षा &#8220;सर्वे भवंतु सुखिन:&#8221; की रही है। भारत हमेशा मानव धर्म के संदर्भ में ही विचार करता है। अपने ध्येय को भारत &#8220;कृण्वन्तो विश्वमार्यम्&#8221; कह कर ही प्रस्तुत करता है। अत: भारत के लिए वैश्विकता नई बात नहीं है। वैश्विकता का संबंध केवल पाश्चात्य के साथ नहीं है, भारत के साथ भी है।</p>
<p style="text-align: justify;">शिक्षा के परिवर्तन का विचार करते समय हमें भारतीय अध्यात्म का विचार करना होगा। आज हमारा सारा चिंतन बुद्धिनिष्ठ हो गया है, बुद्धिनिष्ठ चिंतन के आधार पर देश की सारी व्यवस्थाएं और व्यवहार की रचना हुई है। परंतु भारतीय चिंतन बुद्धिनिष्ठ न होकर आत्मनिष्ठ है। श्रीमद् भागवत गीता में भगवान से कृष्ण कहते हैं</p>
<p style="text-align: center;">इंद्रियाणिपराण्याहु: इंद्रियेभ्य: परं मन:।</p>
<p style="text-align: center;">मनसस्तु परा बुद्धि: यो बुद्धे: परतस्तु स:।</p>
<p style="text-align: justify;">अर्थात इन्द्रियां विषयों से परे हैं, मन इंद्रियों से परे है, मन से परे बुद्धि है और बुद्धि से परे जो है, वह आत्मतत्व है,परमात्मा है।</p>
<p style="text-align: justify;">अनेक लोग समझते हैं कि अध्यात्म और भौतिकता में अंतर है, इनमें परस्पर विरोध है। भौतिक अथवा दैनन्दिन व्यवहारों में आध्यात्मिकता बाधा बनती है। यदि आध्यात्मिक बनना है तो भौतिकता छोड़नी पड़ती है। वास्तव में इस प्रकार का विभाजन ही ठीक नहीं है। आध्यात्मिकता का अधिष्ठान लेकर भौतिक जीवन की रचना करना भारतीय जीवन रचना का विशिष्टय रहा है। अतः अध्यात्म विचार को समझना और उसे शिक्षा का अधिष्ठान बनाना, भारतीय शिक्षा की पुनर्प्रतिष्ठा हेतु हमारे लिए प्रथम करणीय कार्य है। शेष अगले अध्याय में&#8230;&#8230;</p>
<p style="text-align: justify;">(लेखक शिक्षाविद् है, भारतीय शिक्षा ग्रन्थमाला के सह संपादक है और विद्या भारती संस्कृति शिक्षा संस्थान के सचिव है।)</p>
<p><strong>और पढ़ें : <span style="color: #0000ff;"><a style="color: #0000ff;" href="https://rashtriyashiksha.com/measures-to-be-taken-for-re-establishing-bharatiya-knowledge/" target="_blank" rel="noopener">भारतीय शिक्षा – ज्ञान की बात 118 (भारतीय ज्ञान की पुनर्प्रतिष्ठा हेतु करणीय उपाय)</a></span></strong></p>
<p>The post <a href="https://rashtriyashiksha.com/points-of-change-for-re-establishing-bhartiya-education-1/">भारतीय शिक्षा &#8211; ज्ञान की बात-119  (भारतीय शिक्षा की पुनर्प्रतिष्ठा हेतु परिवर्तन के बिंदु-1)</a> appeared first on <a href="https://rashtriyashiksha.com">राष्ट्रीय शिक्षा : शिक्षा में समाज प्रबोधन</a>.</p>
]]></content:encoded>
					
					<wfw:commentRss>https://rashtriyashiksha.com/points-of-change-for-re-establishing-bhartiya-education-1/feed/</wfw:commentRss>
			<slash:comments>1</slash:comments>
		
		
			</item>
		<item>
		<title>भारतीय शिक्षा &#8211; ज्ञान की बात 118 (भारतीय ज्ञान की पुनर्प्रतिष्ठा हेतु करणीय उपाय)</title>
		<link>https://rashtriyashiksha.com/measures-to-be-taken-for-re-establishing-bharatiya-knowledge/</link>
					<comments>https://rashtriyashiksha.com/measures-to-be-taken-for-re-establishing-bharatiya-knowledge/#comments</comments>
		
		<dc:creator><![CDATA[राष्ट्रीय शिक्षा]]></dc:creator>
		<pubDate>Thu, 09 Jan 2025 04:26:02 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[ज्ञान की बात]]></category>
		<category><![CDATA[नवीनतम]]></category>
		<category><![CDATA[वासुदेव प्रजापति]]></category>
		<guid isPermaLink="false">https://rashtriyashiksha.com/?p=8191</guid>

					<description><![CDATA[<p> ✍ वासुदेव प्रजापति भारतीय ज्ञान का अर्थ होता है, हमारे देश का ज्ञान अर्थात हमारा देशीय ज्ञान। भारत भूमि में जन्मा हमारा अपना ज्ञान। भारत के द्रष्टा ऋषियों ने जिसकी&#8230; </p>
<p>The post <a href="https://rashtriyashiksha.com/measures-to-be-taken-for-re-establishing-bharatiya-knowledge/">भारतीय शिक्षा &#8211; ज्ञान की बात 118 (भारतीय ज्ञान की पुनर्प्रतिष्ठा हेतु करणीय उपाय)</a> appeared first on <a href="https://rashtriyashiksha.com">राष्ट्रीय शिक्षा : शिक्षा में समाज प्रबोधन</a>.</p>
]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: right;"> <img src="https://s.w.org/images/core/emoji/17.0.2/72x72/270d.png" alt="✍" class="wp-smiley" style="height: 1em; max-height: 1em;" /> वासुदेव प्रजापति</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone wp-image-8193" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2025/01/Learn-Ancient-Scriptures-768x664-1-300x259.jpeg" alt="" width="1229" height="1061" srcset="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2025/01/Learn-Ancient-Scriptures-768x664-1-300x259.jpeg 300w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2025/01/Learn-Ancient-Scriptures-768x664-1.jpeg 768w" sizes="auto, (max-width: 1229px) 100vw, 1229px" /></p>
<p style="text-align: justify;">भारतीय ज्ञान का अर्थ होता है, हमारे देश का ज्ञान अर्थात हमारा देशीय ज्ञान। भारत भूमि में जन्मा हमारा अपना ज्ञान। भारत के द्रष्टा ऋषियों ने जिसकी अनुभूति की, वह अनुभूत ज्ञान। इसलिए भारत में भारतीय ज्ञान की प्रतिष्ठा होनी ही चाहिए।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>हमारा ज्ञान अनुभूतिजन्य है </strong></p>
<p style="text-align: justify;">भारतीय ज्ञान की विशेषता यह है कि वह अनुभूतिजन्य ज्ञान है। वह केवल बुद्धि से या निरीक्षण से या भौतिक विज्ञान की प्रयोगशाला में जन्मा हुआ ज्ञान नहीं है। इसलिए भारतीय ज्ञान अधिक यथार्थ है और एकात्म भाव को पुष्ट करने वाला है। ऐसा नहीं है कि भारत के अतिरिक्त और किसी देश में दर्शन अर्थात अनुभूति नहीं हो हुई है। आइंस्टीन की अनुभूति का उदाहरण इतिहास में प्रसिद्ध है परंतु वह अपवाद मात्र है।</p>
<p style="text-align: justify;">भारत में अनुभूतिजन्य ज्ञान की ही प्रतिष्ठा है। जब तक अनुभूति का प्रमाण नहीं है तब तक उसे मान्यता नहीं है। अनुभूति के आधार पर ही शास्त्र प्रामाण्य की प्रतिष्ठा होती है। अनुमान या तर्क को भी अनुभूति का आधार होना चाहिए। अनुभूति नहीं होती है तब तक तर्क भी अप्रतिष्ठित हो जाता है। परंतु वर्तमान भारत के बौद्धिक जगत में अनुभूत ज्ञान की प्रतिष्ठा नहीं है। सर्वत्र तर्क की प्रतिष्ठा ही दिखाई दे रही है। इसका कारण यह है कि हमने यूरोप और अमेरिका की ज्ञान प्रक्रिया को स्वीकार कर लिया है। जो हमारा हीनता बोध है।</p>
<p style="text-align: justify;">श्री रमन महर्षि, महर्षि अरविंद, स्वामी विवेकानंद और स्वामी रामतीर्थ आदि वर्तमान समय के ऐसे उदाहरण है, जिन्हें अनुभूतिजन्य ज्ञान प्राप्त हुआ था। इतिहास में तो ऐसे अनेक उदाहरण हैं। जब तक इन सब के ज्ञान की प्रतिष्ठा नहीं होगी तब तक भारतीय ज्ञान की प्रतिष्ठा हुई, ऐसा नहीं माना जाएगा। आज की स्थिति में विश्वविद्यालयों में अथवा संसद में भारतीय अनुभूत ज्ञान की प्रतिष्ठा होने की संभावना दिखाई नहीं देती। क्योंकि उनकी ऐसी मानसिकता ही नहीं है। जब तक शासन की मान्यता नहीं मिलती तब तक लोक में उसकी प्रतिष्ठा नहीं होती। यह एक मनोवैज्ञानिक समस्या है।</p>
<p style="text-align: justify;">जब तक शासन की मान्यता नहीं तब तक कोई शिक्षित नहीं माना जाता। उसे सरकारी तो क्या निजी नौकरी भी नहीं मिलती। बिना नौकरी के भी अर्थाजन हो सकता है, ऐसी कल्पना भी लोगों के मन में नहीं आती। आज एक ऐसा चक्र बना दिया गया है जिसमें पहले शासकीय मान्यता वाले विद्यालय में प्रवेश फिर विश्वविद्यालय का प्रमाण पत्र, उस प्रमाण पत्र पर आधारित नौकरी और नौकरी ही अर्थार्जन का मुख्य साधन, ऐसा एक चक्र बना हुआ है। इस चक्र में शासन के द्वारा जो ज्ञान प्रमाणित नहीं है, ऐसे किसी भी ज्ञान की प्रतिष्ठा होना असंभव है।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>भारतीय ज्ञान की प्रतिष्ठा हेतु उपाय </strong></p>
<p style="text-align: justify;">वर्तमान में ज्ञान की यात्रा का चक्र उलटा चला है। वह मार्ग प्रदक्षिणा का न होकर उलटी दिशा में चलने वाला है। प्रदक्षिणा का मार्ग हमेशा भगवान को दाहिनी ओर रख कर चलता है। इसका संकेत यह है कि हमारे मार्गक्रमण में भगवान हमेशा हमारे साथ रहते हैं। अर्थात हमारे ज्ञान क्षेत्र का अधिष्ठान अध्यात्म है। वर्तमान के ज्ञान क्षेत्र को ठीक करने के लिए हमें दिशा बदलनी पड़ेगी। सर्वप्रथम हमें अपनी गति को रोक कर अर्धवृत्त करना होगा। उसके बाद जो सही मार्ग है उस पर चलना होगा। इस प्रकार दिशा बदलने के बाद ही हम शिक्षा को भारतीय बना सकेंगे और भारतीय ज्ञान की प्रतिष्ठा कर पाएंगे।</p>
<p style="text-align: justify;">वर्तमान समय में समाजमन पर टीवी के विज्ञापनों का अत्यधिक प्रभाव है। छोटे बच्चे और अबोध लोग टीवी में जिस पदार्थ का विज्ञापन आता है उससे प्रभावित होकर वस्तुएं खरीदते हैं। दैनन्दिन उपयोग की वस्तुओं पर इसका सर्वाधिक प्रभाव होता है। टीवी के विज्ञापन हमारे उपभोग का नियमन करते हैं। इसलिए कुछ लोगों का अभिप्राय बनता है कि हमें जो भी बात समाजमन तक पहुँचानी है उसे टीवी के माध्यम से पहुंचाने का प्रयास करना चाहिए। केवल विज्ञापन ही नहीं तो विभिन्न प्रकार के कार्यक्रम हम टीवी के माध्यम से प्रस्तुत करें तो समाजमन को प्रभावित कर सकते हैं।</p>
<p style="text-align: justify;">इस प्रकार से समाज प्रबोधन करने में दो अवरोध आएंगे। एक यह कि टीवी के माध्यम से जो प्रभाव होता है वह बहुत ऊपर-ऊपर का अस्थाई होता है। दैनन्दिन उपयोग की वस्तुओं के लिए भले ही उसका तात्कालिक प्रभाव होता हो परंतु गंभीर और दूरगामी परिणामों के लिए टीवी का उतना उपयोग नहीं होता जितना हमें लगता है। दूसरा अवरोध यह है कि टीवी का और उसके जैसे माध्यमों का उपयोग इतना अधिक खर्चीला होता है और टीवी की दुनिया इतनी अधिक स्पर्धा से भरी हुई है कि उसका उपयोग करते-करते हम थक जाते हैं। बहुत प्रयास करने के बाद भी अपेक्षित परिणाम नहीं मिलते। बाजार में जिसे पैसा कमाना है उसके लिए टीवी का उपयोग लाभदायक है।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>ज्ञान साधना आवश्यक है </strong></p>
<p style="text-align: justify;">ज्ञान के क्षेत्र की प्रतिष्ठा के लिए तपश्चर्या करनी होती है, साधना करनी पड़ती है। देशभर में ऐसे तपस्वी और साधक स्वभाव के लोगों को निवेदन करना होगा कि समाज हित के लिए और ज्ञान की प्रतिष्ठा के लिए वे साधना करें। यह साधना ज्ञान की साधना होगी। गंभीर अध्ययन करने वाले लोगों द्वारा यह साधना संभव हो सकती है। आज समाज में साधक लोग भी हैं और गंभीर अध्ययन करने वाले लोग भी हैं। परंतु होता यह है कि जो साधना करते हैं वे अध्ययन नहीं करते और जो अध्ययन करते हैं वे साधना नहीं करते। फलस्वरूप दोनों में से एक का भी प्रभाव नहीं होता।</p>
<p style="text-align: justify;">गंभीर स्वरूप का अध्ययन करने वाले लोग पद और पैसे से मिलने वाले सम्मान की अपेक्षा रखते हैं। ऐसी सुविधा नहीं मिली तो वह अपने आप को असुरक्षित अनुभव करते हैं। परंतु ऐसा करने में उन्हें व्यवस्था पर निर्भर करना पड़ता है और अपने हिसाब से वे अध्ययन नहीं कर पाते। किसी के अधीन होकर और सुविधा की चिंता करते-करते साधना नहीं हो सकती। जो वास्तव में साधक होते हैं उन्हें शिक्षा का विषय, भारतीय ज्ञान का विषय ध्यान में ही नहीं आता। उन्होंने कभी इस विषय में गंभीरता पूर्वक सोचा भी नहीं होता। वे अधिकांश अपनी ही मुक्ति के लिए या अपने ही कल्याण के लिए साधना करते हैं।</p>
<p style="text-align: justify;">अतः दोनों बातें जिनके पास हैं ऐसे लोगों को निवेदन करना होगा। पूर्व में भी विश्व कल्याण हेतु अनेक तपस्वियों को देवताओं ने निवेदन किया था और उन तपस्वियों ने लोक कल्याणार्थ अपने आप को प्रस्तुत किया था। मुनि दधीचि का उदाहरण हमारे सामने है। उन्होंने अपने तपोबल से अपने ही शरीर को विसर्जित कर वृत्रासुर का नाश कर सके ऐसा वज्र बनाने के लिए अपनी हड्डियां दे दी थीं। ऐसे और भी अनेक उदाहरण हमारे इतिहास में मिलते हैं। आज भी ऐसे लोग अवश्य मिलेंगे, ऐसे लोगों को पुनः लोक कल्याण की दृष्टि से गहन अध्ययन में लगना चाहिए।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>हमारे शास्त्र ग्रंथों का सार्थक अध्ययन हो</strong></p>
<p style="text-align: justify;">आज के विश्वविद्यालयों में भारतीय शास्त्र ग्रंथों का अध्ययन तो होता है परंतु वह अध्ययन केवल डिग्री प्राप्त करने के उद्देश्य से होता है। उदाहरण के लिए कौटिल्य का अर्थशास्त्र हो या पतंजलि के योग सूत्र हों या ईशावास्य उपनिषद हो इनका अध्ययन तो होता है परंतु वह अध्ययन सार्थक नहीं होता। फलस्वरूप विश्वविद्यालयों में होने वाला भारतीय शास्त्र ग्रंथों का अध्ययन भारतीय शिक्षा की प्रतिष्ठा कराने वाला नहीं है। वह अधिक से अधिक उनके बारे में थोड़ी-बहुत जानकारी अवश्य देता है। परंतु वह समाज के लिए उपयोगी कैसे बनेगा इसका विचार ही नहीं होता।</p>
<p style="text-align: justify;">उदाहरण के लिए बृहदारण्यक उपनिषद में मनुष्य के व्यक्तित्व के विषय में या आत्मा के विषय में क्या लिखा है? इसकी जानकारी मिल जाती है। परंतु व्यक्तित्व की जानकारी, विद्यार्थियों के व्यक्तित्व विकास की संकल्पना स्पष्ट कर, शिक्षा के माध्यम से व्यक्तित्व विकास कैसे होगा? यह बताने में अध्येता अक्षम होता है। कदाचित यह उसका विषय ही नहीं है।</p>
<p style="text-align: justify;">वेदों में पंचमहाभूतों को देवता कह कर उनकी स्तुति की गई है। मनुष्यों के द्वारा किए जाने वाले यज्ञों में देवताओं का हिस्सा रखा जाता है और उन्हें स्वीकार करने के लिए उनकी स्तुति की जाती है। आज संपूर्ण विश्व में पर्यावरण की बड़ी समस्या इन पंचमहाभूतों के संबंध में ही है। परंतु इस समस्या के समाधान के लिए वेदों में हल ढूंढने की कल्पना भी नहीं की जाती, होता इसका विपरीत है। जो देश पर्यावरण के प्रदूषण की समस्या निर्माण करते हैं वे ही देश समस्या निर्माण नहीं करने वाले देशों को परामर्श देते हैं।</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone wp-image-8192" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2025/01/e75ea900d257ef7cc15a31e1b8395692-300x214.jpg" alt="" width="1277" height="911" srcset="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2025/01/e75ea900d257ef7cc15a31e1b8395692-300x214.jpg 300w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2025/01/e75ea900d257ef7cc15a31e1b8395692.jpg 672w" sizes="auto, (max-width: 1277px) 100vw, 1277px" /></p>
<p style="text-align: justify;"><strong>हिंदू शास्त्र ग्रंथ ही भारतीय ग्रंथ हैं </strong></p>
<p style="text-align: justify;">भारतीय शास्त्र ग्रंथों को ये हमारे शास्त्र ग्रंथ हैं ऐसा कहने का साहस बहुत कम लोग कर पाते हैं। ये शास्त्र ग्रंथ प्राचीन हैं, वे इतना ही कह पाते हैं। इन्हें हिंदू शास्त्र ग्रंथ तो कोई नहीं कहता। क्योंकि धर्म के समान ही हिंदू शब्द को भी विवाद का विषय बना दिया गया है। उच्चतम न्यायालय ने भले ही कहा हो कि हिंदू संज्ञा का प्रचलित पंथ संकल्पना से कोई संबंध नहीं है। वह तो भारतीय जीवन दृष्टि पर आधारित एक जीवन शैली है। तब भी बौद्धिक जगत इसे स्वीकार करने को तैयार नहीं है।</p>
<p style="text-align: justify;">हिंदू कहकर उसे धर्मनिरपेक्ष भारत में आधिकारिक स्थान नहीं दिया जा सकता, यह उनका तर्क होता है। इस तर्क के पीछे भी उनकी बौद्धिक निष्ठा नहीं होती अर्थात इस विषय में शास्त्रार्थ करने के लिए वे कभी तैयार नहीं होते। जिन शास्त्रों का वे अध्ययन और अध्यापन करवाते हैं उन शास्त्रों का पक्ष लेकर वे कुछ भी करना नहीं चाहते। इस अर्थ में भारतीय शास्त्र ग्रंथ आज अनाथ से हो गए हैं। विश्वविद्यालयों ने ही उनकी ऐसी स्थिति की है।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>मठ-मंदिरों में शास्त्र ग्रंथों का अध्ययन </strong></p>
<p style="text-align: justify;">हमारे देश में भारतीय शास्त्र ग्रंथों का अध्ययन करने का एक और प्रयास भी हो रहा है। देश के मठ और मंदिरों में तथा संन्यासियों के मिशन में यह अध्ययन होता है। संन्यासियों के लिए अभी भी दर्शन शास्त्रों का अध्ययन करना अनिवार्य है। साथ ही उनके अनुयायियों के लिए भी इन ग्रंथों के अध्ययन का आयोजन होता है। यह अध्ययन अधिकांश दर्शनों का होता है, उसमें भी विशेष रूप से वेदान्त दर्शन का अधिक होता है। परंतु यह अध्ययन भी औपचारिक स्वरूप का ही सिद्ध होता है। संन्यासी अपनी मुक्ति के लिए या साधकों की मुक्ति के लिए अध्ययन करते हैं और करवाते हैं। परंतु मुक्ति का अर्थ क्या है इस विषय में किसी की स्पष्टता नहीं है। उनकी जीवन शैली और कार्यशैली मुक्ति के मार्ग को प्रशस्त करने वाली नहीं दिखाई देती। इसी प्रकार हमारे देश में सहस्रों वेद पाठशालाएं चलती हैं। जहां वेदों का अध्ययन होता है। परंतु वहां केवल वेदों का कंठस्थिकरण होता है, वेद मंत्रों का अर्थ समझना नहीं होता। इसलिए उन्हें लागू करने का विचार करना तो बहुत दूर की बात है। वेद पाठशाला में पढ़कर छात्र या तो दूसरी पाठशाला में पढ़ाते हैं या पौरोहित्य का कार्य करते हैं या ज्योतिष आदि का व्यवसाय करते हैं। देश में बदलाव कैसे आ सकता है? इसका विचार करना नहीं सिखाया जाता।</p>
<p style="text-align: justify;">इस प्रकार के अनेक प्रयास देश भर में चलते हैं। परंतु वे अपने आप में आधे-अधूरे ही हैं। वे भारतीय ज्ञानधारा को टिकाए हुए हैं। इनके कारण से ही ज्ञान धारा पूर्णतया लुप्त नहीं हुई है। यह उनका समाज पर बहुत बड़ा उपकार है। अतः इनके आधार पर अभी बहुत कुछ करने की आवश्यकता है।</p>
<p style="text-align: justify;">(लेखक शिक्षाविद् है, भारतीय शिक्षा ग्रन्थमाला के सह संपादक है और विद्या भारती संस्कृति शिक्षा संस्थान के सचिव है।)</p>
<p><strong>और पढ़ें : <span style="color: #0000ff;"><a style="color: #0000ff;" href="https://rashtriyashiksha.com/re-establishment-of-bhartiya-education-dharmacharya-and-education-2/" target="_blank" rel="noopener">भारतीय शिक्षा – ज्ञान की बात 117 (भारतीय शिक्षा की पुनर्प्रतिष्ठा – धर्माचार्य और शिक्षा-2)</a></span></strong></p>
<p>The post <a href="https://rashtriyashiksha.com/measures-to-be-taken-for-re-establishing-bharatiya-knowledge/">भारतीय शिक्षा &#8211; ज्ञान की बात 118 (भारतीय ज्ञान की पुनर्प्रतिष्ठा हेतु करणीय उपाय)</a> appeared first on <a href="https://rashtriyashiksha.com">राष्ट्रीय शिक्षा : शिक्षा में समाज प्रबोधन</a>.</p>
]]></content:encoded>
					
					<wfw:commentRss>https://rashtriyashiksha.com/measures-to-be-taken-for-re-establishing-bharatiya-knowledge/feed/</wfw:commentRss>
			<slash:comments>1</slash:comments>
		
		
			</item>
		<item>
		<title>भारतीय शिक्षा &#8211; ज्ञान की बात 117 (भारतीय शिक्षा की पुनर्प्रतिष्ठा – धर्माचार्य और शिक्षा-2)</title>
		<link>https://rashtriyashiksha.com/re-establishment-of-bhartiya-education-dharmacharya-and-education-2/</link>
					<comments>https://rashtriyashiksha.com/re-establishment-of-bhartiya-education-dharmacharya-and-education-2/#comments</comments>
		
		<dc:creator><![CDATA[राष्ट्रीय शिक्षा]]></dc:creator>
		<pubDate>Fri, 20 Dec 2024 05:45:54 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[ज्ञान की बात]]></category>
		<category><![CDATA[नवीनतम]]></category>
		<category><![CDATA[वासुदेव प्रजापति]]></category>
		<category><![CDATA[Dharma Indian Education]]></category>
		<category><![CDATA[gyan ki baat]]></category>
		<category><![CDATA[Rashtriya shiksha]]></category>
		<category><![CDATA[student]]></category>
		<category><![CDATA[विद्यार्थी]]></category>
		<guid isPermaLink="false">https://rashtriyashiksha.com/?p=8156</guid>

					<description><![CDATA[<p> ✍ वासुदेव प्रजापति हमारे देश में धर्माचार्यों की बहुत बड़ी संख्या है। उनके बड़े-बड़े आश्रम चलते हैं। उन आश्रमों में धार्मिक कार्यक्रमों के अतिरिक्त भी अनेक प्रकार के कार्य संचालित&#8230; </p>
<p>The post <a href="https://rashtriyashiksha.com/re-establishment-of-bhartiya-education-dharmacharya-and-education-2/">भारतीय शिक्षा &#8211; ज्ञान की बात 117 (भारतीय शिक्षा की पुनर्प्रतिष्ठा – धर्माचार्य और शिक्षा-2)</a> appeared first on <a href="https://rashtriyashiksha.com">राष्ट्रीय शिक्षा : शिक्षा में समाज प्रबोधन</a>.</p>
]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: right;"> <img src="https://s.w.org/images/core/emoji/17.0.2/72x72/270d.png" alt="✍" class="wp-smiley" style="height: 1em; max-height: 1em;" /> वासुदेव प्रजापति</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone  wp-image-8158" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2024/12/12-300x196.jpg" alt="" width="1312" height="857" srcset="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2024/12/12-300x196.jpg 300w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2024/12/12-768x503.jpg 768w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2024/12/12.jpg 840w" sizes="auto, (max-width: 1312px) 100vw, 1312px" /></p>
<p style="text-align: justify;">हमारे देश में धर्माचार्यों की बहुत बड़ी संख्या है। उनके बड़े-बड़े आश्रम चलते हैं। उन आश्रमों में धार्मिक कार्यक्रमों के अतिरिक्त भी अनेक प्रकार के कार्य संचालित होते हैं। कुछ आश्रमों का कार्यक्षेत्र केवल भारत है तो कुछ का कार्यक्षेत्र विदेश भी है।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>विभिन्न आश्रमों के विविध कार्य</strong></p>
<p style="text-align: justify;">कुछ आश्रमों में सेवा कार्य संचालित किए जाते हैं। अन्नसत्र चलाया जाता है, धर्मादाय चिकित्सालय चलाया जाता है। इनके साथ साथ शिक्षा का प्रबन्ध भी किया जाता है। जहां शिक्षा का प्रबन्ध है वहां प्राथमिक से लेकर उच्च शिक्षा के अनेक केन्द्र चलते हैं। उनका अपना विश्वविद्यालय भी चलता है। वहां उत्तम शिक्षा दी जाती है। राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त श्रेष्ठ शिक्षक भी हैं। भारत के महामहिम राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री भी उनके विश्वविद्यालय में आते हैं।</p>
<p style="text-align: justify;">कुछ आश्रमों में विश्व शांति के लिए बड़े-बड़े यज्ञ आयोजित किए जाते हैं। अनेक मंत्री, विधायक, सचिव स्तर के अधिकारी अनेक उद्योगपति इन यज्ञों के आयोजन में यजमान बनकर सहभागी होते हैं। इनके महात्माजी विदेश यात्रा भी करते हैं। वैदिक धर्म में यज्ञों को बहुत महत्त्वपूर्ण माना गया है इसलिए इनका यज्ञों पर बल रहता है। इनका तो मानना है कि अभी भी पर्याप्त मात्रा में यज्ञ-याग नहीं हो रहे हैं। ये चाहते हैं कि सरकार को हमारे काम में सहयोग करना चाहिए।</p>
<p style="text-align: justify;">कुछ धर्माचार्यों का मानना है कि उच्च शिक्षित लोगों को उपनिषद का ज्ञान देने की आवश्यकता है, इसलिए वे उपनिषद के वर्ग चलाते हैं। ये वर्ग अंग्रेजी में चलते हैं। ऊंचा शुल्क देकर समाज के उच्च वर्ग के लोग उपनिषद पढ़ने के लिए आते हैं। उपनिषद के साथ-साथ वे वेदान्त दर्शन और श्रीमद्भगवद्गीता भी पढ़ते हैं। संस्कृत न जानने वाले, केवल अंग्रेजी भाषी लोग भी उपनिषद, गीता व वेदान्त पढ़ रहे हैं, यह शुभ संकेत है। परंतु यह सब करना ही धर्म है? आओ इसे जानते हैं।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>धर्म आचरण का विषय है </strong></p>
<p style="text-align: justify;">धर्म कहने का नहीं करने का विषय है। स्वयं सत्य बोलने वाले लोग सत्यवादी हरिश्चंद्र या युधिष्ठिर की कथा सुनकर धार्मिक नहीं हो जाते। अपना कर्तव्य ठीक से न निभाने वाले अथवा जानबूझकर छोड़ देने वाले केवल भजन सुनकर या भजन गाकर भक्त नहीं हो जाते। अपने स्वार्थ के लिए मंदिरों में जाने वाले दर्शनार्थी नहीं होते वे केवल प्रयोजनार्थी होते हैं। यह बात धर्माचार्य को समझनी चाहिए।</p>
<p style="text-align: justify;">गोस्वामी तुलसीदास जी ने परहित को सबसे बड़ा धर्म और परपीड़ा को सबसे बड़ा अधर्म कहा है। परहित ना करके केवल भजन-पूजन करने वाले धार्मिक नहीं हो सकते। लोगों का भला किस में है यह नहीं जानने वाले और अपने शिष्यों का या अनुयायियों को नहीं समझने वाले धर्माचार्य कैसे हो सकते हैं? आचरण यदि पवित्र नहीं है लोगों की सेवा करने हेतु जो कभी कष्ट नहीं सहते, कर्तव्य का पालन करने के लिए जब त्याग करने की आवश्यकता हो तब त्याग नहीं करते और अपने स्वार्थ के लिए लोगों का उपयोग करते हैं, संयम का पालन नहीं करते, वे केवल रामायण या महाभारत की कथा सुनकर धार्मिक नहीं हो जाते।</p>
<p style="text-align: justify;">सभी प्राणियों में एक ही आत्मतत्व है इस सिद्धांत के अनुसार व्यवहार न करने वाले केवल उपनिषद पढ़कर या वेदांत दर्शन का अध्ययन कर धार्मिक नहीं हो जाते, वे पंडित हो सकते हैं परंतु धार्मिक नहीं। व्यक्ति पहले धार्मिक होना चाहिए बाद में पंडित। परंतु यह बात उन्हें समझ में नहीं आती। सत्संग, कथा-वार्ता, यज्ञ-याग, तीर्थ-यात्रा, दर्शन-पूजन, धर्म ग्रंथों का अध्ययन यह सब धर्म के अंग तभी सार्थक होते हैं जब व्यवहार और विचार भी उनके अनुकूल हो। सत्य तो यह है कि ये सारी बातें धार्मिक आचरण के परिणाम स्वरूप होती है। बिना आचरण के ये केवल निरर्थक ही नहीं अनर्थक हो जाती है। क्योंकि यह आभासी विश्व निर्माण करती है, जिसमें सत्य इनके पीछे ढक जाता है।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>धर्म अंतःकरण का विषय है </strong></p>
<p style="text-align: justify;">भूमि , भवन,  सुविधा, कार्यक्रम आदि में धर्म नहीं होता। भजन-पूजन, संगीत, नृत्य-कीर्तन में भी धर्म नहीं होता। अध्ययन और प्रवचन में भी धर्म नहीं होता। सफेद या भगवे वस्त्रों में भी धर्म नहीं होता। यह सब अत्यंत भौतिक स्वरूप के पदार्थ हैं। धर्म तो अंतःकरण की प्रवृत्तियों में होता है।</p>
<p style="text-align: justify;">मन, बुद्धि, अहंकार और चित्त मिलकर अंत:करण कहलाता है। जब मन सद्गुणी बनता है, बुद्धि और अहंकार आत्मनिष्ठ बनते हैं, चित्त शुद्ध बनता है तब जाकर व्यक्ति धार्मिक बनता है। ऐसा व्यक्ति भजन-पूजन, कीर्तन और सत्संग करें या ना करें वह धार्मिक ही बना रहता है। वास्तव में धर्म की रक्षा तो ऐसा व्यक्ति ही करता है, ऐसे व्यक्ति का संग ही वास्तव में सत्संग है।</p>
<p style="text-align: justify;">लोग अपना अंत:करण पवित्र कैसे बनाएं यह सीखाना ही धर्म सीखाना है। यह धर्माचार्य का कर्तव्य है। ऐसा करने से धर्म की रक्षा होती है। ऐसा धर्म ही फिर समाज की रक्षा करता है। आज इस बात का विस्मरण हुआ है, गाड़ी उलटी पटरी पर चल पड़ी है। धर्म का विचार वास्तव में व्यवहार, व्यवस्था और वातावरण के संदर्भ में करना चाहिए। इन सब के साथ यदि संबंध विच्छेद हो गया तो धर्म धर्म नहीं रहता वह धर्म का आभास मात्र होता है जो अधर्म से भी अधिक हानिकारक होता है।</p>
<p style="text-align: justify;">धर्म की परीक्षा धारणा से होती है। जो धारण करता है वह धर्म है। जो जो बातें धारण नहीं करती वह धर्म नहीं है। धारण करने का अर्थ किसी भी पदार्थ, स्थिति या रचना को बनाए रखना, नष्ट नहीं होने देना, विकृत नहीं होने देना धारणा है। इस एक मापदंड पर मूल्यांकन करने से कोई भी क्रिया धार्मिक है अथवा नहीं और है तो कितनी धार्मिक है, इसका पता चलता है।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>धर्माचार्यों की भूमिका </strong></p>
<p style="text-align: justify;">शिक्षाविद कहते हैं कि शिक्षा धर्म सिखाती है। जब शिक्षा धर्मानुसारी न रहकर अर्थानुसारी बन जाती है तब समाज जीवन उलटी दिशा में चलने लगता है। जीवन की सारी बातें उलटी ही होने लगती हैं। वर्तमान समय ऐसा ही है, पश्चिमी जीवन दृष्टि के प्रभाव के कारण भारत की सारी व्यवस्थाएं अर्थानुसारी बन गई हैं, इस कारण ही सारे संकट उत्पन्न हुए हैं।</p>
<p style="text-align: justify;">इस स्थिति में धर्माचार्यों को शिक्षा और शिक्षा के माध्यम से समाज को धर्मनिष्ट बनाने का दायित्व अपने ऊपर लेना चाहिए। उनके अतिरिक्त यह कार्य कोई भी नहीं कर सकता। ऐसा करने के लिए धर्माचार्यों को अपनी संप्रदाय दृष्टि से मुक्त होकर धर्म दृष्टि अपनाने की आवश्यकता है। हम जानते हैं कि संप्रदाय धर्म का एक आयाम है। केवल संप्रदाय ही धर्म नहीं है, धर्म संप्रदाय से अधिक व्यापक है। व्यापक धर्म के प्रकाश में संप्रदाय भी अपनी सार्थकता प्राप्त करता है।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>धर्माचार्यों का प्रथम कर्तव्य </strong></p>
<p style="text-align: justify;">आज समाज में धर्म को अत्यंत संकुचित बना दिया है। विशेष रूप से राजनीति के प्रभाव से धर्म विवाद के घेरे में आ गया है। इस विवाद से उसे मुक्त करने की महती आवश्यकता है। इस काम को धर्माचार्य ही कर सकते हैं। धर्म को विवाद के घेरे में फंसाने का काम साम्यवादियों ने किया है। धर्म अफीम की गोली है, ऐसा कहने से उनकी तोड़फोड़ वाली गतिविधियां शुरू हुई है जो अब कहीं पर भी धर्म नहीं चाहिए कहने तक पहुंच गई है। राजनीति इससे बहुत प्रभावित हो गई है जिससे धर्म संबंधित सारा मामला उलझ गया है।</p>
<p style="text-align: justify;">धर्म को राजनीति और साम्यवाद के घेरे से बाहर निकलना धर्माचार्यों का प्रथम कर्तव्य है। धर्मनिरपेक्षता जैसी संकल्पना कितनी हास्यास्पद व अनर्थक है, यह भी स्पष्ट करने की आवश्यकता है। इस दृष्टि से धर्माचार्यों को धर्म सभाओं का आयोजन करना चाहिए। देश के सभी धर्माचार्यों को अपना-अपना अहम् भूलाकर परस्पर संवाद बढ़ाना चाहिए। सांप्रदायिक सद्भाव बढ़ाने के लिए भी आपसी संवाद आवश्यक है।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>धर्म सर्वप्रथम विश्व धर्म है और मानव धर्म है।</strong></p>
<p style="text-align: justify;">विश्व की व्यवस्था विश्व धर्म है। मानव मात्र का कर्तव्य मानव धर्म है। व्यवस्था धर्म के अनुकूल होना ही कर्तव्य धर्म है। हमने आज कानून को धर्म बनाया है, यह विपरीत गति है। इसके स्थान पर धर्म को कानून बनना चाहिए। धर्म का क्षेत्र राजनीति के क्षेत्र से अधिक व्यापक है और प्रभावी है। वह राजनीति से परे भी है इसलिए जीवन का संचालन राजनीति से नहीं अपितु धर्म से होना चाहिए। इन तथ्यों को जनमानस में बिठाने हेतु धर्माचार्यों को अपनी भूमिका सक्रियता पूर्वक निभानी चाहिए।</p>
<p style="text-align: justify;">अपनी अपनी कमाई धर्म के आधार पर करने की बहुत बड़ी आवश्यकता है। इसे अधिक व्यापकता से समझने और समझाने की आवश्यकता रहेगी। व्यक्तिगत स्तर पर अर्थ व्यवहार में नीतिमत्ता होना आवश्यक है। परंतु इससे भी अधिक व्यापक स्तर पर अर्थ दृष्टि और अर्थ नीति बदलने की आवश्यकता है। जब तक सरकारी स्तर पर और सामाजिक स्तर पर अर्थ नीति धर्म के अनुकूल नहीं बनती तब तक व्यक्तिगत स्तर पर नैतिक आचरण करना संभव नहीं है।</p>
<p style="text-align: justify;">केवल अर्थ नीति ही नहीं समाज व्यवस्था में भी धर्म दृष्टि होना अत्यावश्यक है। आज अनेक धर्माचार्य, मठपति, संन्यासी आदि हिंदू धर्म की वर्ण व्यवस्था बहुत अच्छी है और उसकी पुनः स्थापना होनी चाहिए ऐसा कहते हैं। परंतु उसकी सांगोपांग चर्चा के बिना उसे पुनर्स्थापित करना संभव नहीं होगा। यह व्यापक मूलगत और वर्तमान संदर्भ के प्रकाश में अध्ययन करने का विषय है। इसे ही हमारी परंपरा में स्मृति की रचना करना कहा है। आज ऐसी स्मृति की रचना करना इस युग की बहुत बड़ी आवश्यकता है।</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone  wp-image-8159" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2024/12/121-1-300x169.jpg" alt="" width="1344" height="757" srcset="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2024/12/121-1-300x169.jpg 300w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2024/12/121-1-1024x576.jpg 1024w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2024/12/121-1-768x432.jpg 768w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2024/12/121-1-1536x864.jpg 1536w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2024/12/121-1.jpg 1920w" sizes="auto, (max-width: 1344px) 100vw, 1344px" /></p>
<p style="text-align: justify;"><strong>नए शास्त्रों की रचना आवश्यक </strong></p>
<p style="text-align: justify;">आज विभिन्न विषयों के नए शास्त्रों की रचना करने की आवश्यकता प्रतीत हो रही है। ऐसी रचना करने के लिए वर्तमान शास्त्रों का अध्ययन करना कदाचित व्यावहारिक नहीं होगा। विश्वविद्यालय में ये सभी विषय पढ़ाए जाते हैं। इन्हें पढ़ाने वाले प्राध्यापक होते हैं। इन प्राध्यापकों के साथ संवाद करने की आवश्यकता रहेगी। प्राध्यापक इन विषयों का वर्तमान स्वरूप क्या है, यह बता सकते में समर्थ हैं। धर्म दृष्टि और विषयों का ज्ञान दोनों को मिलकर विषय का नया स्वरूप ला सकते हैं। उदाहरण के लिए शिक्षा शास्त्र शिक्षा के विभिन्न आयाम के संदर्भ में आज क्या कहता है? यह जानने के पश्चात उसमें धर्म दृष्टि का कितना अभाव है और धर्म दृष्टि से शिक्षा के विभिन्न पहलुओं में क्या परिवर्तन करना चाहिए यह सब उन्हें धर्माचार्य बता सकते हैं। संवाद का यह स्वरूप पूरे देश भर में चलाना चाहिए।</p>
<p style="text-align: justify;">धर्माचार्यों को अध्यापकों, माता-पिताओं, उद्योजकों, राजनीतिज्ञों तथा कारीगरों के साथ इस प्रकार के संवाद करने चाहिए। धर्म समाज जीवन से कटा हुआ नहीं रह सकता। वह केवल वैराग्य की बात नहीं कर सकता। उसे हितकारक सांसारिक समृद्धि की बात भी बतानी होगी। हितकारक समृद्धि, सर्वजन समाज का विषय है। यह विचार सर्वजन समाज के मानस में संक्रांत करना होगा जो धर्माचार्य ही कर सकते हैं।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>अपने संप्रदाय की शिक्षा देना </strong></p>
<p style="text-align: justify;">धर्म का एक आयाम संप्रदाय है। संप्रदायों के संबंध में दो बातों का विचार करने की आवश्यकता है। प्रथम है सांप्रदायिक विद्वेष को समाप्त करने हेतु धर्माचार्यों को ही प्रयास करने होंगे। आज यह काम वे स्वयं नहीं करते इसलिए अन्य लोगों को करने पड़ते हैं। जबकि अन्य लोगों का यह अधिकार क्षेत्र नहीं है। दूसरी बात है अपने संप्रदाय के विधि-विधानों की शिक्षा देना। इस शिक्षा में क्रिया, भावना और ज्ञान तीनों पक्ष जुड़े होने चाहिए। उदाहरण के लिए शिव के उपासकों को शिव की पूजा कैसे करना यह क्रियात्मक रूप से सीखना चाहिए। शिव के गुण अपने में आने चाहिए, ऐसी कामना करना भी सीखना चाहिए और शिवतत्व क्या है? यह भी सीखाना चाहिए। इसके साथ ही एक शैव भक्त का व्यक्तिगत और सामाजिक व्यवहार कैसा होना चाहिए, इसकी भी शिक्षा अवश्य देनी चाहिए।</p>
<p style="text-align: justify;">इन आधारभूत सूत्रों पर जब धर्माचार्य चलना प्रारम्भ करेंगे तब उन्हें अपना कार्य स्वयं स्पष्ट हो जाएगा। वे जब भी इस दिशा में अपना कदम बढ़ाएंगे  तो शीघ्र ही कल्याणकारी परिणाम देखने को मिलेंगे, इसमें कोई संदेह नहीं है।</p>
<p style="text-align: justify;">(लेखक शिक्षाविद् है, भारतीय शिक्षा ग्रन्थमाला के सह संपादक है और विद्या भारती संस्कृति शिक्षा संस्थान के सचिव है।)</p>
<p><strong>और पढ़ें : <span style="color: #0000ff;"><a style="color: #0000ff;" href="https://rashtriyashiksha.com/re-establishment-of-bhartiya-education-dharmacharya-and-education-1/" target="_blank" rel="noopener">भारतीय शिक्षा – ज्ञान की बात 116 (भारतीय शिक्षा की पुनर्प्रतिष्ठा – धर्माचार्य और शिक्षा-1)</a></span></strong></p>
<p>The post <a href="https://rashtriyashiksha.com/re-establishment-of-bhartiya-education-dharmacharya-and-education-2/">भारतीय शिक्षा &#8211; ज्ञान की बात 117 (भारतीय शिक्षा की पुनर्प्रतिष्ठा – धर्माचार्य और शिक्षा-2)</a> appeared first on <a href="https://rashtriyashiksha.com">राष्ट्रीय शिक्षा : शिक्षा में समाज प्रबोधन</a>.</p>
]]></content:encoded>
					
					<wfw:commentRss>https://rashtriyashiksha.com/re-establishment-of-bhartiya-education-dharmacharya-and-education-2/feed/</wfw:commentRss>
			<slash:comments>1</slash:comments>
		
		
			</item>
		<item>
		<title>भारतीय शिक्षा &#8211; ज्ञान की बात 116 (भारतीय शिक्षा की पुनर्प्रतिष्ठा – धर्माचार्य और शिक्षा-1)</title>
		<link>https://rashtriyashiksha.com/re-establishment-of-bhartiya-education-dharmacharya-and-education-1/</link>
					<comments>https://rashtriyashiksha.com/re-establishment-of-bhartiya-education-dharmacharya-and-education-1/#comments</comments>
		
		<dc:creator><![CDATA[राष्ट्रीय शिक्षा]]></dc:creator>
		<pubDate>Fri, 13 Dec 2024 06:34:37 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[ज्ञान की बात]]></category>
		<category><![CDATA[नवीनतम]]></category>
		<category><![CDATA[वासुदेव प्रजापति]]></category>
		<category><![CDATA[bhagwan shankrya charya]]></category>
		<category><![CDATA[bhartiya shiksha]]></category>
		<category><![CDATA[gyan ki baat]]></category>
		<category><![CDATA[indian educaton]]></category>
		<category><![CDATA[Rashtriya shiksha]]></category>
		<category><![CDATA[school]]></category>
		<guid isPermaLink="false">https://rashtriyashiksha.com/?p=8151</guid>

					<description><![CDATA[<p> ✍ वासुदेव प्रजापति भारत एक धर्मप्राण देश है। सम्पूर्ण देश में धर्माचार्यों की विशेष ख्याति है। लोग उनकी बात मानते हैं। उनकी तपश्चर्या और उनके स्वाध्याय के कारण उनके प्रति&#8230; </p>
<p>The post <a href="https://rashtriyashiksha.com/re-establishment-of-bhartiya-education-dharmacharya-and-education-1/">भारतीय शिक्षा &#8211; ज्ञान की बात 116 (भारतीय शिक्षा की पुनर्प्रतिष्ठा – धर्माचार्य और शिक्षा-1)</a> appeared first on <a href="https://rashtriyashiksha.com">राष्ट्रीय शिक्षा : शिक्षा में समाज प्रबोधन</a>.</p>
]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: right;"> <img src="https://s.w.org/images/core/emoji/17.0.2/72x72/270d.png" alt="✍" class="wp-smiley" style="height: 1em; max-height: 1em;" /> वासुदेव प्रजापति</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone wp-image-8152" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2024/12/Bhagwan-Adi-Shankara-Full-8c86da05-300x192.jpeg" alt="" width="1156" height="740" srcset="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2024/12/Bhagwan-Adi-Shankara-Full-8c86da05-300x192.jpeg 300w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2024/12/Bhagwan-Adi-Shankara-Full-8c86da05-1024x655.jpeg 1024w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2024/12/Bhagwan-Adi-Shankara-Full-8c86da05-768x492.jpeg 768w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2024/12/Bhagwan-Adi-Shankara-Full-8c86da05.jpeg 1200w" sizes="auto, (max-width: 1156px) 100vw, 1156px" /></p>
<p style="text-align: justify;">भारत एक धर्मप्राण देश है। सम्पूर्ण देश में धर्माचार्यों की विशेष ख्याति है। लोग उनकी बात मानते हैं। उनकी तपश्चर्या और उनके स्वाध्याय के कारण उनके प्रति श्रद्धा से नतमस्तक होते हैं। इनके शिष्य भी इनकी प्रेरणा से जप, तप और स्वाध्याय में निरत रहते हैं। समाज धर्माचार्यों को अपना मार्गदर्शक मानता है। ऐसे धर्माचार्यों से समाज भारतीय शिक्षा की पुनर्प्रतिष्ठा करने की अपेक्षा रखता है।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>भगवान शंकराचार्य की परम्परा</strong></p>
<p style="text-align: justify;">भारत में सभी धर्माचार्य भगवान शंकराचार्य की समृद्ध ज्ञान परम्परा में दीक्षित हैं। यह गुरु परम्परा अनेक पीढ़ियों से चली आ रही है। इनके आज के आश्रम भी उसी परम्परा में चल रहे हैं। सभी धर्माचार्य शंकराचार्य का आदर्श ही मानते हैं।</p>
<p style="text-align: justify;">शंकराचार्य ने धर्म के क्षेत्र में बड़ा पराक्रम किया था। उस समय धर्म में विकृति आ गई थी, वह अव्यवस्थित हो गया था। धर्म के नाम पर विकृत कर्मकाण्डों से ग्रस्त था, तब शंकराचार्य ने धर्म को शुद्ध स्वरूप प्रदान कर उसे पुनः प्रतिष्ठित करने का पराक्रम किया था। छोटी आयु में ही अनेक कष्टों को झेलते हुए उन्होंने विरोधियों के साथ शास्त्रार्थ किया और सबको परास्त कर दिग्विजयी बने। इस प्रकार उन्होंने ज्ञान की सर्वोपरिता सिद्ध की। उनके अद्वैत के सिद्धान्त पर ही आज के सभी संन्यासी सम्प्रदाय चलते हैं। शंकराचार्य ने धर्म को केवल शास्त्रार्थ का विषय बनाकर नहीं रखा। उसे पंचायतन पूजा के रूप में घर-घर में स्थापित किया। अनेक स्तोत्रों की रचना की और व्यक्ति-व्यक्ति के कंठ और हृदय में उसे प्रस्थापित किया। ज्ञान, भक्ति और क्रिया का समन्वय कर धर्म की पुनः स्थापना की।</p>
<p style="text-align: justify;">सभी धर्माचार्य भी धर्म की प्रतिष्ठा चाहते हैं। यह सब मानते हैं कि धर्म व शिक्षा का अटूट सम्बन्ध है। धर्म के बिना शिक्षा को सही सन्दर्भ प्राप्त नहीं होता और शिक्षा के बिना धर्म को सुयोग्य साधन प्राप्त नहीं होता। दोनों का सम्बन्ध विच्छेद दोनों की हानि करता है। इसलिए धर्म और शिक्षा के विच्छेद को समाप्त कर संकटों का निवारण करना सभी धर्माचार्यों के अधिकार का विषय है। धर्माचार्यों के बिना यह कार्य और कोई कर भी नहीं सकता। यह साधारण कार्य नहीं है, इसके लिए सामर्थ्य चाहिए। यह सामर्थ्य तप व ज्ञान का है, यह सामर्थ्य निष्ठा का है। ऐसा सामर्थ्य धर्माचार्यों के पास है, इसलिए धर्माचार्य ही राष्ट्र के इस संकट को दूर कर सकते हैं।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>धर्म आचरण का विषय है</strong></p>
<p style="text-align: justify;">धर्म जीवन का आधार है। धर्म से ही राष्ट्र जीवन बना रहता है। धर्म से ही समृद्धि आती है। धर्म से ही कल्याण होता है। धर्म से ही सुख मिलता है। धर्म से यश है, धर्म से ही सार्थकता है। ऐसे धर्म की उपेक्षा होने से आधार नष्ट होता है और बिना आधार के सब कुछ नष्ट हो जाता है। इस धर्म का पालन करने से धर्म जीवित रहता है। धर्म आचरण का विषय है। धर्म का वाचिक स्वरूप सत्य है। धर्म का आचरण न करने से सत्य भी मिथ्या हो जाता है। अतः सत्य और धर्म के बिना मनुष्य मनुष्य नहीं रहता पशु समान बन जाता है। मनुष्य केवल पशु ही नहीं बनता, वह पशु से भी नीचे गिर जाता है। पशु को नियंत्रित करने वाली तो प्रकृति होती है परन्तु मनुष्य को नियंत्रित करने वाला स्वयं मनुष्य होता है। जब मनुष्य स्वेच्छा से धर्म का नियंत्रण स्वीकार करता है तभी वह नियंत्रित होता है।</p>
<p style="text-align: justify;">राष्ट्र जीवन के लिए धर्म की जो व्यवस्था होती है वह धर्माचार्यों के अधीन होती है। वे ही सामान्य जन को धर्म का पालन करने का निर्देश देते हैं। वे ही व्यवहार शास्त्रों की रचना करते हैं। उन शास्त्रों के अनुसार चलने से श्रेय व प्रेय दोनों की प्राप्ति होती है। सत्ययुग में धर्म का पालन करवाने के लिए किसी दण्ड विधान की आवश्यकता नहीं थी, किसी शास्त्र की भी आवश्यकता नहीं थी। धर्म लोगों के अन्त: करणों में स्वत: ही रहता था और मनुष्य के जीवन को निर्देशित करता था। उस समय जीवन सुखमय था। परन्तु अब कलियुग है, बिना दण्ड विधान और बिना शास्त्र के धर्म का पालन नहीं हो सकता। इनमें भी शास्त्र अधिक महत्त्वपूर्ण है क्योंकि राज्य भी शास्त्र के अनुसार ही चलता है। बिना राज्य के शास्त्र तो हो सकता है परन्तु बिना शास्त्र के राज्य नहीं चल सकता। अर्थात धर्म स्वयं शासन करने वालों का शासक है।</p>
<p style="text-align: justify;">धर्म की बात करने वाला, धर्म की प्रतिष्ठा के लिए प्रयास करने वाला भी यदि ये नहीं करेगा तो समाज कैसे चल पाएगा? अतः धर्माचार्य यह नहीं करेंगे तो कौन करेगा? समाज की वर्तमान स्थिति में धर्माचार्य उदासीन नहीं रह सकते, वे भी धर्म की प्रतिष्ठा चाहते हैं। इसलिए सामान्य जन की अपेक्षा धर्माचार्यों से है।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>शिक्षा धर्मानुसारी बननी चाहिए </strong></p>
<p style="text-align: justify;">धर्म को जनसाधारण तक ले जाने के लिए शिक्षा एक सशक्त माध्यम है। परन्तु जब शिक्षा धर्मक्षेत्र से विस्थापित होकर राज्य के अधीन कर ली जाती है तब अनर्थ होने लगता है। शिक्षा धर्मानुसारी बने यह काम शिक्षकों का है, परन्तु आज के शिक्षकों को धर्माचार्यों का मार्गदर्शन और सहयोग चाहिए।</p>
<p style="text-align: justify;">आज शिक्षा और धर्म दोनों का सन्दर्भ कुछ बदला हुआ है। शिक्षक ज्ञान की चिन्ता कम और छात्र की चिन्ता अधिक करता है। इसी प्रकार धर्माचार्य भी धर्म की चिन्ता कम और समाज की चिन्ता अधिक करते हैं। वैसे ऊपरी तौर पर तो यह चिन्ता ठीक लगती है परन्तु वास्तविकता में यह ठीक नहीं है। क्योंकि धर्म समाज के लिए नहीं होता अपितु समाज धर्म के लिए होता है। इसी प्रकार ज्ञान छात्र के लिए नहीं अपितु छात्र ज्ञान के लिए होता है। धर्माचार्य समाज को धर्म के अनुकूल बनाता है और शिक्षक छात्र को ज्ञान के अनुकूल बनाता है। छात्र ज्ञाननिष्ठ होना चाहिए, ज्ञान छात्रनिष्ठ नहीं। ठीक वैसे ही समाज धर्मनिष्ठ होना चाहिए, धर्म समाजनिष्ठ नहीं। यह सीधी-सी बात हमारी समझ में आनी चाहिए।</p>
<p style="text-align: justify;">धर्माचारी को ज्ञानवान होना चाहिए और शिक्षक को धार्मिक होना चाहिए। धर्म और ज्ञान का सम्बन्ध विच्छेद कभी नहीं हो सकता। धर्म और ज्ञान एक सिक्के के दो पक्ष हैं। इसलिए वे एक-दूसरे से अलग नहीं हो सकते। शिक्षक में ज्ञान का पक्ष ऊपर दिखाई देता है तो धर्माचार्य में धर्म का पक्ष ऊपर रहता है। शिक्षा को धर्मानुसारी बनाने के लिए धर्माचार्यों को नेतृत्व अपने हाथ में लेना चाहिए। यह उनका अधिकार और कर्तव्य दोनों है। शिक्षक वर्ग आपके नेतृत्व में चलने और सहयोगी बनने के लिए कटिबद्ध है।</p>
<p style="text-align: justify;">यह कार्य एक भगीरथ कार्य है। यह सहज साध्य भी नहीं है। दो-चार व्यक्तियों का कार्य भी नहीं है। बहुत विचारपूर्वक अनेक समर्थ लोगों द्वारा करने योग्य काम है। अतः हम सबको दृढ़ निश्चय कर योजना बनानी चाहिए। अब तक बहुत विलम्ब हो चुका है, अब और विलम्ब नहीं करना चाहिए।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>धार्मिक कर्मकाण्डों में वृद्धि </strong></p>
<p style="text-align: justify;">धर्मक्षेत्र में कार्यरत धर्माचार्य समझते हैं कि शिक्षा हमारा विषय नहीं है। शिक्षा राज्य की व्यवस्था में चलती है और चलनी भी चाहिए, ऐसा उनका अभिप्राय बना हुआ है। इसलिए वे शास्त्रों के अध्ययन व धर्मोपदेश को ही अपना मुख्य कार्य मानते हैं। परन्तु इस विषय में उन्हें पुनर्विचार करना चाहिए। क्योंकि शिक्षा ही धर्म को लोगों तक ले जाने का सशक्त माध्यम है।</p>
<p style="text-align: justify;">धर्माचार्यों की यह अपेक्षा तो रहती है कि लोग धर्म के मार्ग पर चलें, परन्तु उनकी यह अपेक्षा पूरी नहीं होती। लोगों पर धर्माचार्यों के उपदेश का स्थायी प्रभाव नहीं होता। लोग उनका उपदेश सुनते हैं और शीघ्र ही भूल जाते हैं। दूसरी ओर आज धार्मिक कर्मकांडों में अत्यधिक वृद्धि हुई है। देश के सभी विख्यात मन्दिरों में दर्शन हेतु लम्बी-लम्बी कतारें लगी रहती हैं। बारह मास ये मन्दिर दर्शनार्थियों से भरे रहते हैं। तीर्थस्थलों पर भी हमेशा भीड़ दिखाई देती है। लोग पदयात्रा करके भी तीर्थों पर दर्शन करने जाते हैं। कथाओं व सत्संगों के आयोजन भी पहले की अपेक्षा आज अधिक हो रहे हैं।</p>
<p style="text-align: justify;">इसी प्रकार साधु-सन्तों की संख्या में भी पर्याप्त वृद्धि हुई है। टीवी में अनेक वाहिनियों पर पुराण कथाएं देखने को मिलती हैं। अनेक धारावाहिक पौराणिक कथाओं पर आधारित होते हैं। कुल मिलाकर धार्मिक आयोजनों की संख्या में वृद्धि हुई है। परन्तु लोग धार्मिक नहीं हुए हैं। सामान्य व्यवहार में नीतिमत्ता का ह्रास हुआ है। उपदेश, तीर्थयात्रा, सत्संग आदि का कोई प्रभाव दिखाई नहीं दे रहा है। इसके विपरीत दुराचार और अनाचार में वृद्धि देखने को मिल रही है। लोग सभ्यता भूलकर असभ्य होते जा रहे हैं।</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone wp-image-8153" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2024/12/things-to-avoid-while-going-temple-300x169.jpg" alt="" width="1393" height="785" srcset="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2024/12/things-to-avoid-while-going-temple-300x169.jpg 300w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2024/12/things-to-avoid-while-going-temple-1024x576.jpg 1024w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2024/12/things-to-avoid-while-going-temple-768x432.jpg 768w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2024/12/things-to-avoid-while-going-temple.jpg 1200w" sizes="auto, (max-width: 1393px) 100vw, 1393px" /></p>
<p style="text-align: justify;"><strong>धर्म नित्य जीवन के साथ जुड़ना चाहिए </strong></p>
<p style="text-align: justify;">लोग धार्मिक नहीं हो रहे हैं, इसका कारण यही है कि धर्म का नित्य जीवन के साथ सम्बन्ध विच्छेद हो गया है। धर्म एक तरफ और व्यवहार दूसरी तरफ की स्थिति बनी हुई है। वास्तव में धर्म नित्य जीवन के साथ जुड़ा होना चाहिए, परन्तु आज ऐसा होता नहीं है। होता इसलिए नहीं है कि नित्य जीवन के सारे कार्य किसी अन्य पद्धति से चलते हैं। जैसे शासन चलाने के लिए संसद से लेकर ग्राम पंचायत तक जनप्रतिनिधि होते हैं। उनके लिए चुनाव होते हैं, आज की स्थिति ऐसी है कि धर्म के द्वारा दिए गए नीतिगत उपदेश से चुनाव नहीं जीते जा सकते। इसका अर्थ यह लिया जाता है कि चुनाव जीतना है तो अनीति के मार्ग पर चलना पड़ेगा।</p>
<p style="text-align: justify;">जीवन की आवश्यकताओं को पूरी करने के लिए विविध वस्तुओं का उत्पादन, वितरण, उपभोग आदि के क्षेत्र में नीति का कोई स्थान नहीं है। धर्म जिसे भ्रष्टाचार कहता है उस भ्रष्ट व्यवहार के बिना आज का अर्थ-तंत्र चलता ही नहीं। कानून भ्रष्टाचार को समर्थन नहीं देता परन्तु वास्तविकता यही है कि भ्रष्टाचार के बिना न उद्योग चलते हैं और न बाजार ही चलते हैं। लोगों के घरों में अनाचार सहज हो गया है। भोजन अपवित्र, वाणी अशुद्ध, इच्छाएं पशुवत और इच्छापूर्ति के तरीके भी निकृष्ट, दिनचर्या और जीवनचर्या अत्यन्त अधार्मिक और अवैज्ञानिक है। आचार विचार में दिखावा अधिक और सच्चाई कम दिखाई देती है। एक ओर धार्मिक कर्मकांडों की भरमार, दूसरी ओर अधार्मिक आचार-विचारों का बोलबाला। सामान्य लोगों का जीवन दुभर हो गया है।</p>
<p style="text-align: justify;">इस समस्या को कैसे दूर किया जाय इस पर विचार करने की आवश्यकता है। हमें समस्या का कारण और स्वरूप ठीक से समझना चाहिए। इस समस्या का मूल कारण धर्म और शिक्षा का सम्बन्ध टूट जाना है। शिक्षा मनुष्य को दूसरी दिशा में ले जा रही है जबकि धर्म दूसरी दिशा में जाने के लिए निर्देश दे रहा है। ये दोनों दिशाएं एक दूसरे से सर्वथा विपरीत हैं। दो विपरीत दिशाओं में मनुष्य एकसाथ चल नहीं सकता। अतः हमें आभासी मार्ग पर न चलकर सदैव वास्तविक मार्ग पर ही चलना चाहिए।</p>
<p style="text-align: justify;">(लेखक शिक्षाविद् है, भारतीय शिक्षा ग्रन्थमाला के सह संपादक है और विद्या भारती संस्कृति शिक्षा संस्थान के सचिव है।)</p>
<p><strong>और पढ़ें : <span style="color: #0000ff;"><a style="color: #0000ff;" href="https://rashtriyashiksha.com/re-establishing-bhartiya-education-efforts-to-be-made-at-social-level-3/" target="_blank" rel="noopener">भारतीय शिक्षा – ज्ञान की बात 115 (भारतीय शिक्षा की पुनर्प्रतिष्ठा – सामाजिक स्तर पर करणीय प्रयास-3)</a></span></strong></p>
<p>The post <a href="https://rashtriyashiksha.com/re-establishment-of-bhartiya-education-dharmacharya-and-education-1/">भारतीय शिक्षा &#8211; ज्ञान की बात 116 (भारतीय शिक्षा की पुनर्प्रतिष्ठा – धर्माचार्य और शिक्षा-1)</a> appeared first on <a href="https://rashtriyashiksha.com">राष्ट्रीय शिक्षा : शिक्षा में समाज प्रबोधन</a>.</p>
]]></content:encoded>
					
					<wfw:commentRss>https://rashtriyashiksha.com/re-establishment-of-bhartiya-education-dharmacharya-and-education-1/feed/</wfw:commentRss>
			<slash:comments>1</slash:comments>
		
		
			</item>
	</channel>
</rss>
