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	<title>शिक्षा Archives - राष्ट्रीय शिक्षा : शिक्षा में समाज प्रबोधन</title>
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	<description>सा विद्या या विमुक्तये</description>
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	<title>शिक्षा Archives - राष्ट्रीय शिक्षा : शिक्षा में समाज प्रबोधन</title>
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		<title>शिक्षक साथियों, आओ हम आचार्य बनें</title>
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		<dc:creator><![CDATA[राष्ट्रीय शिक्षा]]></dc:creator>
		<pubDate>Wed, 15 Oct 2025 05:16:54 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[दिलीप बेतकेकर]]></category>
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					<description><![CDATA[<p> &#8211; दिलीप बेतकेकर मैं अभी-अभी एक विद्यालय में शिक्षक पद पर पदस्थ हुआ था। नया ही था विद्यालय में। मेरे से एक-दो वर्ष पूर्व से कार्यरत एक शिक्षक से मैंने&#8230; </p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: right;"> &#8211; दिलीप बेतकेकर</p>
<p><img fetchpriority="high" decoding="async" class="alignnone wp-image-9038" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2025/10/589-1-300x232.jpg" alt="" width="1722" height="1332" srcset="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2025/10/589-1-300x232.jpg 300w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2025/10/589-1-1024x792.jpg 1024w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2025/10/589-1-768x594.jpg 768w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2025/10/589-1-1536x1188.jpg 1536w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2025/10/589-1.jpg 2040w" sizes="(max-width: 1722px) 100vw, 1722px" /></p>
<p style="text-align: justify;">मैं अभी-अभी एक विद्यालय में शिक्षक पद पर पदस्थ हुआ था। नया ही था विद्यालय में। मेरे से एक-दो वर्ष पूर्व से कार्यरत एक शिक्षक से मैंने सहज ही पूछा &#8211; ‘तुम शिक्षक क्यों बने?’</p>
<p style="text-align: justify;">वह बोला, &#8211; ‘‘पूर्वजन्म में किये पाप, मास्टर बना अपने आप’’। उसका ऐसा उत्तर सुनकर मैं हक्का-बक्का सा देखता रह गया। कुछ वर्ष पश्चात उसे ‘और अच्छा’ अवसर’ मिलने पर वह विद्यालय छोड़कर चला गया। उस जैसे अनेक लोग शिक्षा क्षेत्र में होंगे। उस मित्र द्वारा दिये गये उत्तर से मुझे एक मराठी कहावत- ‘मांगता येईना भीक तर मास्टर की शिक’’ (अगर भीख भी मांगना आपको नहीं आता तो मास्टरी करो।) का अर्थ समझ में आया। शिक्षक पेशे के लिये स्वयं शिक्षक का ही इस प्रकार का दृष्टिकोण होगा तो समाज आपका आदर सम्मान करेगा, ऐसी अपेक्षा करना क्या उचित है? जिसे आत्मसम्मान की रक्षा करना नहीं आता उसे अन्य लोग कैसे सम्मान देंगे? इसलिये प्रथमतः हमें अपने द्वारा अंगीकार किये पवित्र कार्य के लिये उचित अभिमान करना आवश्यक है।</p>
<p style="text-align: justify;">मास्टर, शिक्षक, अध्यापक, आचार्य और गुरु, ये शब्द ऊपरी तौर पर देखने से समानार्थी लगते हैं, किन्तु प्रत्येक का अर्थ भिन्न-भिन्न है। वह भेद, अंतर जानते हुए ऊपर के उच्च स्तर पर जाने का निरंतर प्रयास करना आवश्यक है। यही वास्तव में ‘‘उन्नयन’’ है। कुछ परिस्थितिवश हम मास्टर, शिक्षक बने हों, किन्तु एक बार स्वीकारने के पश्चात उस कार्य के प्रति निष्ठा रखना आवश्यक है। ‘आचार्य’ शब्द के उच्चारण से अथवा पढ़ने पर कुछ को अटपटा लगता हो, अथवा कुछ ये समझेंगे कि हमें कोई पुराण युग में ले जा रहा है। ‘आचार्य’ शब्द में ‘चर’ धातु है, ‘आ’ ‘उपसर्ग’ है। अपने आचरण द्वारा विद्यार्थियों को व्यवहार, बोलना आदि की प्रेरणा देने वाला ‘आचार्य’ कभी-कभी तो एक शब्द के भी उच्चारण बिना, केवल मौन रहकर शिष्य को सीख देना, उनके व्यवहार में परिवर्तन लाना, उनकी शंकाओं का निरसन करना, आदि की क्षमता से युक्त होता है।</p>
<p style="text-align: justify;">सच्चा गुरु अपने शिष्य को किसी भी कार्य हेतु, किसी पर भी निर्भर न रहते हुए स्वयं की जिम्मेदारी पर कार्य करना सिखाता है, स्वावलम्बी बनाता है। आचार्य विनोबा जी ने उत्कृष्ट तरीके से समझाया है &#8211; ‘‘सोलह वर्ष तक स्वावलंबी रहकर शिक्षा ग्रहण’’। विद्यार्थी को अन्य किसी पर निर्भर न रहते हुए कार्य करने की क्षमता को विकसित करने का कार्य आचार्य करता है।</p>
<p style="text-align: justify;">“A good teacher has been defined as one who makes himself progressively unnecessary.”</p>
<p style="text-align: justify;">आचार्य मातृहृदयी होता है। एक माँ जितने प्रेम, वात्सल्य से अपने बच्चे के लिए निरपेक्ष भाव से, कष्ट उठाती है, उतने ही प्रेम, ममता से आचार्य अपने विद्यार्थी के विकास के लिये कार्य करता है। इसीलिये आचार्य विनोबा जी का कथन है कि, ‘‘अध्यापन करना मातृधर्म पालन करने वालों का कार्य है।’’</p>
<p style="text-align: justify;">जिसके हृदय में वात्सल्य भाव नहीं वह ‘मास्टर’ तो बन सकता है परन्तु ‘आचार्य’ नहीं। ‘आचार्य’ अपने शिष्य से कभी कोई व्यक्तिगत अपेक्षा नहीं रखता। कबीर ने गुरु-शिष्य के सम्बन्धों पर सुंदर वर्णन किया है &#8211;</p>
<p><img decoding="async" class="alignnone wp-image-9039" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2025/10/896-300x300.jpg" alt="" width="1716" height="1716" /></p>
<p style="text-align: justify;"><strong>सिख तो ऐसा चाहिये गुरु को सब कुछ देय</strong><strong>, गुरु तो ऐसा चाहिये सिख से कुछ भी न लेय।</strong></p>
<p style="text-align: justify;">शिष्य, गुरु के चरणों में सर्वस्व अर्पण करने को तैयार है किन्तु गुरु अपने शिष्य से कुछ भी नहीं लेते। ऐसा अपूर्व रिश्ता है गुरु-शिष्य के बीच का। विद्यार्थी के लिये गुरु का स्थान परमेश्वर समान है। इस हेतु आचार्य भी तपस्वी होना चाहिये। आचार्य उसे ही कह सकते हैं जिनका लक्ष्य सदैव ज्ञानवृद्ध की ओर हो। ज्ञान असीमित है, और जो हमारे पास है वह नगण्य है, इस भावना से सदैव नया प्राप्त करने की जिज्ञासा रहेगी। “He is a good teacher who gives equal exercise to his tongue and ears.” हम जितना अधिक पढ़ते जायेंगे उतना अधिक अपने में ज्ञान की कमी को हम अनुभव करेंगे और इसीलिये अधिक ज्ञान प्राप्ति की लालसा बढ़ेगी &#8211; “The more I read, the more I know, how little I know.”</p>
<p style="text-align: justify;">मेरा सदैव यह प्रयास रहे कि अपने शिष्य को मैं अधिक से अधिक दे सकूं। इस प्रकार आचार्य भी अपने ज्ञान भंडार की वृद्धि करने के लिये अथक परिश्रम करेगा। आचार्य की ये मेहनत ही विद्यार्थी के लिये प्रेरक है। ‘प्रेरणा देना’ ही आचार्य का मुख्य कर्तव्य है &#8211; “He is the best teacher who inspires the child”.</p>
<p style="text-align: justify;">परीक्षा समाप्ति के साथ अध्ययन समाप्त, ऐसी गलतपफहमी समाज में रहती है जो वास्तव में उचित नहीं है। अध्ययन परीक्षा समाप्त होने के साथ समाप्त नहीं वरन् प्रारम्भ होता है। आचार्य की ज्ञानवृद्धि हेतु लालसा विद्यार्थी को भी अधिकाधिक ज्ञान प्राप्ति हेतु प्रवृत्त करती है &#8211; “A lamp cannot give light to others unless it continues to burn. A teacher cannot teach unless he continues to learn.” प्रकाश देने हेतु एक दीपक को स्वयं निरंतर जलते रहना आवश्यक है इसी प्रकार शिष्यों को शिक्षित करने हेतु आचार्य को स्वयं निरंतर ज्ञानवृद्ध करना आवश्यक है। विद्यापीठ से प्राप्त उपाधि से संतुष्ट रहने वाला व्यक्ति ‘आचार्य’ नहीं होता। अलबर्ट आईनन्सटाईन ने कहा है, “Education is what you learn after you have forgotten everything you learnt in school”.</p>
<p style="text-align: justify;">आइन्सटीन का यह कथन पसंद भले ही न आये किन्तु सत्य है। वर्तमान में विद्यालय, महाविद्यालयों में विविध विषयों के शिक्षक तो मिलते हैं किन्तु विद्यार्थियों का शिक्षक उपलब्ध होना कठिन है। विषय से पार जाकर विद्यार्थी का विचार जब शिक्षक करता है तब वह ‘आचार्य’ बनता है।</p>
<p style="text-align: justify;">‘आचार्य’ का कर्तव्य विद्यार्थी को केवल पाठ्यपुस्तक, पाठ्यक्रम के विषय का अध्ययन परीक्षा हेतु करवाना, यहीं तक सीमित नहीं है, वरन् विद्यार्थी के संपूर्ण जीवन से एकरूप होना, उनके सुख-दुःखों से समरस होना है। ये सभी कार्य में जो एकरूप, समरस हो सका वह ‘आचार्य’ हुआ।</p>
<p style="text-align: justify;">सामान्य शिक्षक विद्यार्थी के परीक्षा में प्राप्त अंकों की चिंता करता है जबकि आचार्य परीक्षा के अंकों के पार जाकर विद्यार्थी के व्यवहार &#8211; आदि गुणों की परख कर उनके गुणों का विकास कैसे हो, इसकी चिंता करता है, गुण संवर्धन की चिन्ता करता है।</p>
<p style="text-align: justify;">शिक्षा प्राप्ति से जीवन उद्देश्य समझने की क्षमता निर्मित होती है, होनी भी चाहिये, वरना शिक्षा निरर्थक होगी। विद्यार्थी को शिक्षा द्वारा जीवन उद्देश्य समझा सके वह है ‘आचार्य’। डॉ॰ राधाकृष्णन् के अनुसार, &#8211; “Education is there to help us to find out what we are for in this World.” मैं कौन हूँ? मैं इस जगत में किस लिये आया? मुझे क्या करना है? इन सब प्रश्नों के उत्तर जिसके द्वारा प्राप्त होते हैं वह ‘शिक्षा’ है, और इस कार्य को कार्यान्वित करवाने वाला व्यक्ति है ‘आचार्य’।</p>
<p style="text-align: justify;">शिक्षक साथियों, आज हम शिक्षक हैं, परन्तु ‘नराचा होय नारायण’ (अर्थात मनुष्य भी परमेश्वर हो सकता है) की भांति ही शिक्षक की ‘आचार्य’ बनने की यात्रा भी संभव है। ईश्वर द्वारा इस प्रकार की शक्ति, बुद्धि और युक्ति हम सभी को प्रदत्त है।</p>
<p style="text-align: justify;">(लेखक शिक्षाविद, स्वतंत्र लेखक, चिन्तक व विचारक है।)</p>
<p><strong>और पढ़ें : <span style="color: #0000ff;"><a style="color: #0000ff;" href="https://rashtriyashiksha.com/we-are-all-soldiers/" target="_blank" rel="noopener">हम सब सैनिक हैं</a></span></strong></p>
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		<title>नर गंधर्व पंडित लखमीचंद जी</title>
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		<dc:creator><![CDATA[राष्ट्रीय शिक्षा]]></dc:creator>
		<pubDate>Fri, 25 Jul 2025 05:25:26 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[<p>&#8211; डॉ. सुभाष शर्मा भारत का जीवन लोक परंपराओं में ही दिख जाता है। इन लोक परंपराओं को जन-जन तक पहुंचाने का काम लोक नर्तक, लोक गायक आदि आंचलिक कलाकार&#8230; </p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: right;">&#8211; डॉ. सुभाष शर्मा</p>
<p><img decoding="async" class="alignnone wp-image-8896" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2025/07/517033046_1302781007881146_4408755937234441151_n-300x155.jpg" alt="" width="1682" height="869" srcset="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2025/07/517033046_1302781007881146_4408755937234441151_n-300x155.jpg 300w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2025/07/517033046_1302781007881146_4408755937234441151_n-1024x529.jpg 1024w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2025/07/517033046_1302781007881146_4408755937234441151_n-768x397.jpg 768w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2025/07/517033046_1302781007881146_4408755937234441151_n.jpg 1280w" sizes="(max-width: 1682px) 100vw, 1682px" /></p>
<p style="text-align: justify;">भारत का जीवन लोक परंपराओं में ही दिख जाता है। इन लोक परंपराओं को जन-जन तक पहुंचाने का काम लोक नर्तक, लोक गायक आदि आंचलिक कलाकार करते हैं। प्रत्येक क्षेत्र या प्रदेश में ऐसे कलाकार होते हैं। इनमें से कुछ ऐसे कला-शिल्पी होते हैं जिनका लोक जीवन पर लंबे समय तक प्रभाव रहता है। ऐसे लोग किंवदंती बन जाते हैं और हर प्रसंग में उनकी बातें उद्धृत की जाती हैं। हरियाणा की वेद मंत्रों से गुंजित, महाभारत की साक्षी, लोक संगीत की संरक्षक और राग-रागिनियों की इस स्थली पर भी एक ऐसे ही नर गंधर्व पैदा हुए, जो जीवन रहते जितने प्रसिद्ध हुए जीवन के बाद उससे भी अधिक प्रतिष्ठित हुए। हरियाणा के कालिदास कहे जाने वाले लोक कवि पंडित लख्मीचंद जी ऐसा ही एक मूर्धन्य नाम हैं। परम पावनी यमुना नदी के तट पर वीर प्रसूता धर्मधरा की गोदी में ऐसे महान शब्द शिल्पी पंडित लख्मीचंद जी अवतरित हुए।</p>
<p style="text-align: justify;">सोनीपत जिले के गांव जाटी कला में सन 1901 में (कहीं कहीं इनके जन्म का उल्लेख 1903 मिलता है) एक सामान्य ब्राह्मण परिवार में इनका जन्म हुआ। इनके पिताजी पंडित उदमीराम जी थोड़ी सी भूमि पर कृषि करके जैसे-तैसे अपने परिवार का पालन पोषण करते थे। परिवार की आर्थिक स्थिति निम्न स्तर पर ही थी। ऐसे सामान्य गौड़ ब्राह्मण परिवार में जन्मे इस हीरे के विषय में लिखा गया है कि</p>
<p style="text-align: center;"><strong>&#8220;लख्मीचंद बसे थे जाटी</strong><strong>, जमुना के किनारे नरले तै तीन कोस सड़के आजम के सहारे।</strong></p>
<p style="text-align: center;"><strong>ईसा गवैया कोई भी होया ना सारा देश पुकारे। मेरी तेरी सीख रागनी इब दुनिया रुक्के मारे।&#8221;</strong></p>
<p style="text-align: justify;">परिवार में आर्थिक अभाव तो था किंतु परिवार की सामाजिक प्रतिष्ठा अच्छी थी। समाज में परिवार का अच्छा प्रभाव था। बड़ा परिवार होने के कारण प्रभुत्व भी था। किंतु अभाव की स्थिति के कारण लख्मीचंद को पाठशाला में पढ़ने के स्थान पर गोचारण के लिए खेतों में भेज दिया गया। यहीं से उनको गीत गाने का शौक हुआ। अपने ग्वाले साथियों से टूटे-फूटे गीतों की पंक्तियां गुनगुनाते हुए दिन भर घूमते रहते थे। उनकी बेहतरीन रागनियों का सभी आनंद लेते थे। इस प्रकार अनपढ़ बालक संगीत की दुनिया की ओर चल दिया।</p>
<p style="text-align: center;"><strong>&#8220;पढ़े लिखे और भाव बिना मने छंद का बेरा ना सै।</strong></p>
<p style="text-align: center;"><strong>पर गांवण और बजावण का मनै बालकपन तै चा सै।</strong></p>
<p style="text-align: justify;">ऐसे ही समय बीतता गया और आसपास आने वाले भजनी, जोगी और सागियों को सुनने का वह कोई अवसर नहीं छोड़ते थे। 10 वर्ष की आयु में एक बार प्रसिद्ध सांगी पंडित दीपचंद जी का सांग देखने गए तो एक सप्ताह बाद घर आए। घर वाले उनकी इस आदत से परेशान रहते थे। उनकी मां सीबिया देवी ने उदमीराम जी से आग्रह करके इनका विवाह कर दिया। उनकी पत्नी अल्पना सुहासिनी थी। उनका पुत्र हुआ तुलेराम कौशिक। इन्होंने पंडित लखमी चंद जी के बाद उनकी परंपरा को आगे बढ़ाया। इन सब प्रसंगों के बीच ही पड़ोस के गांव बसोदी के प्रज्ञा चक्षु कवि पंडित मानसिंह को उन्होंने अपना गुरु मान लिया। घर से दूर 6 महीने तक उनकी सेवा करते हुए गायन, वादन और नृत्य सीख लिया। जैसे रामकृष्ण परमहंस का प्रभाव स्वामी विवेकानंद पर रहा वैसे ही सामान्य कवि पंडित मानसिंह जी का प्रभाव जीवन भर पंडित लख्मीचंद पर रहा। उन्होंने भी गुरु प्रतिष्ठा कायम रखने में अपनी साधना और भविष्य तक को दाव पर लगा दिया। एक बार बरेली में जाट रेजीमेंट में सांग करते समय उन्होंने अपने गुरु पंडित मानसिंह का स्मरण किया तो बेड़ेबंद सांगी सोहन कुंडल वाला ने कहा कि वह अंधा क्या जानता है? तुम मुझे अपना गुरु बना लो। लख्मीचंद उसी समय सांग के बेड़े को छोड़कर अपने घर वापस आ गए। इसी कारण उनके कुछ ईर्ष्यालु साथियों ने उनको पारा खिला दिया। इससे उनकी हालत काफी बिगड़ गई। देसी इलाज से प्राण तो बच गए परंतु आवाज खराब हो गई। उन्होंने अपने गुरु को स्मरण करते-करते 11 मास तक एक सूखे कुएं में अभ्यास किया और प्रभु कृपा से उनकी आवाज पूर्ववत हो गई। अब उन्होंने हरियाणा व दिल्ली को अपना कार्य क्षेत्र चुना, अपना अलग सांग का बेड़ा बनाया और दिनोंदिन प्रसिद्ध होते चले गए। प्रारंभिक सांगों में उन्होंने श्रृंगार और विलासिता को प्रमुखता दी। इसी कारण समाज के संभ्रांत लोगों ने उनको सुनना बंद कर दिया। उनके गीतों को द्विअर्थी समझ कर बहिष्कृत किया जाने लगा। यहां तक कि प्रसिद्ध स्वतंत्रता सेनानी पंडित श्रीराम शर्मा भी उन्हें पसंद नहीं करते थे।</p>
<p style="text-align: justify;">इस सबके बावजूद उनको सांग कला के क्षेत्र में आशातीत सफलता मिली परंतु अभी उन्हें संतुष्टि नहीं थी। युवा वर्ग उन्हें खूब सुनता था किंतु प्रतिष्ठित, पढ़ा-लिखा, प्रौढ़ वर्ग और इसके अतिरिक्त साधु-संत, पुजारी जैसा वर्ग अभी उनसे दूर था। यही कसक उन्हें आध्यात्मिक क्षेत्र की ओर ले गई। वह रोहतक जिले के टिटौली गांव में संस्कृत के प्रकांड विद्वान पंडित टीकाराम जी से मिले। दोनों में बातचीत हुई, गहन विमर्श हुआ और पंडित टीकाराम उनसे अत्यंत प्रभावित हुए। इसके बाद पंडित टीकाराम ने उनके साथ रहना स्वीकार किया। पंडित लख्मीचंद पंडित टीकाराम जी से रात-रात भर वेद शास्त्रों, पुराणों, उपनिषदों, रामायण महाभारत और यहां तक कि व्याकरण संबंधी नियम भी सुनते और सुबह उसी को रागिनी के रूप में सांग में गाते थे। सारे आध्यात्मिक साहित्य को उन्होंने लोक परंपराओं से जोड़ते हुए जन जीवन में प्रसारित किया। उनके उत्तरवर्ती सांगों में आध्यात्म गहराता चला गया। इस प्रकार समाज के प्रतिष्ठित वर्ग में उनके प्रति धारणा बदली और उनकी दृष्टि में 20-25 साल का उथला सा कवि अब एक उच्च कोटि का विद्वान बन गया। वह स्वयं एक किंवदंती हो गए। आज भी किसी बात की सत्यता प्रमाणित करने के लिए कहते हैं कि <strong>&#8220;भाई कहणा दादा लखमी का।</strong></p>
<p style="text-align: justify;">उन्होंने शाही लकड़हारा, राजा भोज सरण दे, हीर रांझा, चीर पर्व, विराट पर्व, नल दमयंती, सत्यवान सावित्री, राजा हरिश्चंद्र, सेठ ताराचंद, पद्मावत, हूर मेनका, नरसी का भात, मीराबाई आदि अनेक सांगों की रचना की। और वह ब्रह्म ज्ञान को सहज सरल शब्दों में जन-जन तक पहुंचाने में सफल हुए।</p>
<p style="text-align: justify;">लख्मीचंद जी के हर ऋतु, पर्व, उत्सव, शादी और नीति प्रधानता में साहित्य और शब्द संयोजन से सब अचंभित हैं। उनकी रागनियों में हिंदी, संस्कृत, पंजाबी, उर्दू, फारसी, अंग्रेजी, खड़ी बोली और अन्य स्थानीय शब्दों का समावेश मिलता है। उन्होंने अपनी रचनाओं में व्याकरण का भी भरपूर प्रयोग किया है। जैसे अनुप्रास अलंकार का प्रयोग करके कितनी खूबसूरती से एक रचना रची &#8211;</p>
<p style="text-align: center;"><strong>अलख अगोचर अजर अमर अंतर्यामी असुरारी।</strong></p>
<p style="text-align: center;"><strong>गुण गुण गाऊं गोपाल गरुड़गामी गोविंद गिरधारी।</strong></p>
<p style="text-align: center;">अब उपमा का प्रयोग देखिए &#8211;</p>
<p style="text-align: center;"><strong>कल से नेत्र</strong><strong>, नाक सुवा सा चंदा सा मुख गोल जिसका।</strong></p>
<p style="text-align: center;"><strong>मोर पपैये</strong><strong>, कोयल कैसी मीठी वाणी बोले।</strong></p>
<p style="text-align: center;">और अब रूपक का उपयोग &#8211;</p>
<p style="text-align: center;"><strong>गम-गंगा का नीर नहाण नै</strong><strong>, मुक्ति माखन मिले खाण नै।</strong></p>
<p style="text-align: center;">अतिशयोक्ति अलंकार का उपयोग भी बखूबी किया गया है।</p>
<p style="text-align: center;"><strong>मद जोबन की बलैं अंगीठी</strong><strong>, जाने कब बोले मीठी मीठी,</strong></p>
<p style="text-align: center;"><strong>एक हाथ की घीट्टी मैं कै जाता दिखै नीर।</strong></p>
<p style="text-align: center;">इसके अतिरिक्त एकावली का प्रयोग भी अनूठा है –</p>
<p style="text-align: center;"><strong>हंस फिरे बिना</strong><strong>, तेरा मेरे बिना, मेरा तेरे बिना, जी लागण का कोन्या।</strong></p>
<p style="text-align: center;">विषम अलंकार का उपयोग उनकी रागनियों में देखने को मिलता है &#8211;</p>
<p style="text-align: center;"><strong>हंसणी नै कित संगत ली कागां की।</strong></p>
<p style="text-align: justify;">लख्मीचंद जी के सांगों में लोक जीवन का ऐसा कोई आयाम नहीं, जो उन्होंने उद्घाटित न किया हो। जन्म, विवाह, बुढ़ापा, मृत्यु, मिलन, विदाई यहां तक कि अंतिम संस्कार तक का मार्मिक वर्णन उन्होंने बड़ी सहजता व सरलता से किया है। इस प्रकार भाव, भाषा, गीत-संगीत, शिल्प विधान आदि सभी दृष्टियों में उनका साहित्य बेजोड़ है।</p>
<p style="text-align: justify;">प्रत्येक गायक, लेखक, गीतकार की कुछ विशेष रचना होती है। उसके साहित्य की कोई विशेषता होती है तो साहित्य में भी कुछ विशेष होता है। उसी प्रकार पंडित लखमीचंद जी का ‘ब्रह्मज्ञान’ बहुत प्रसिद्ध है। लोक जीवन की प्रत्येक घटना से आज भी लोग ब्रह्मज्ञान को जोड़कर उदाहरण देते हैं। ब्रह्मज्ञान में संपूर्ण सृष्टि का वर्णन किया गया है। उनकी ब्रह्मज्ञान की एक सर्वप्रसिद्ध रचना 84 लाख योनियों, उनके प्रकार, इहलोक, परलोक, स्वर्ग नरक, कर्मबंधन, मायाजाल, मुक्ति, मोक्ष, आदि को वर्णित करती है।</p>
<p style="text-align: center;"><strong>लाख चौरासी खत्म हुए ना</strong><strong>, बीत कल्प युग चार गए।</strong></p>
<p style="text-align: center;"><strong>नाक में दम आ लिया करें क्या</strong><strong>, मरते मरते हार लिए।।</strong></p>
<p style="text-align: justify;">जब वे सांग में अपने चरित्र को अभिनीत करते थे तो देखने वाले नर-नारी सब जार-जार रोते थे। सांग संपन्न होने के बाद भी लोग बैठे रहते थे। लखमीचंद जी का रचा हुआ ब्रह्मज्ञान जीवन की शुद्धता, शुचिता और सदाचार का सहज और सरल वर्णन है जिसे लोग बात-बात में नसीहत के तौर पर प्रयोग करते हैं।</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone wp-image-8893" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2025/07/images-1.jpeg" alt="" width="1602" height="1624" /></p>
<p style="text-align: justify;">उनकी उस समय कही गई बातें कालांतर में अक्षरशः सत्य सिद्ध हुई जो उनकी दूरदर्शिता का प्रमाण हैं।</p>
<p style="text-align: justify;">सांग के माध्यम से उन्होंने लोक कल्याण के अनेक महत्वपूर्ण कार्य किए। उस समय की परिस्थिति और आवश्यकताओं के अनुसार उन्होंने सभी जाति, मत-पंथ-संप्रदाय के लोगों के कल्याण के लिए अनेक कार्य किए। गांव-गांव में कुएं, तालाब, धर्मशाला, प्याऊ, चौपाल और पाठशालाएं खुलवाने में अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया। उन्होंने गौशालाओं के लिए भी बहुत सांग किए और सांग में आने वाली राशि एवं अनाज को गौशालाओं में दान कर दिया। आज भी हरियाणा और दिल्ली में अनेक स्थानों पर लखमी वाली प्याऊ, लखमी वाली पाठशाला, लखमी वाला जोहड़ और लखमी वाला कुआं देखने को मिल जाता है।</p>
<p style="text-align: justify;">ऐसे महामानव का सान्निध्य उनके जिन शिष्यों को मिला वे सब भी लखमी चंद जी जैसे ही पूजनीय बन गए। उनके प्रमुख व प्रसिद्ध शिष्य पंडित मांगेराम, पंडित रामचंद्र, पंडित रतिराम, पंडित माइचंद, पंडित सुल्तान, पंडित चन्दनलाल, पंडित रामसरुप, फौजी मेहरसिंह, पंडित हवा सिंह, धारा सिंह, धर्म सिंह जोगी, हजूर मीर, सरूपा, तूंगल, हरबख्श, लखीराम, मित्रसैन, चन्दगी, मुंशी, गुलाम रसूल, हैदर है।</p>
<p style="text-align: justify;">यहां तक कि उनके सांग का रसोईया और पानी भरने वाला भी समाज में सम्मान की दृष्टि से देखे जाते हैं। उनके साजिंदे और कारिंदे भी खूब स्वाभिमानी थे। सोनीपत जिले के पुरखास गांव में गोरखा नाम के व्यक्ति ने लखमीचंद के सांग में दो-चार बार पीने का पानी भरा था। उसके 50 साल बाद किसी सांग में उनको पानी भरने के लिए कहा तो गोरखे ने उत्तर दिया कि <strong>&#8220;जिसने लखमी का पानी भर दिया वो किसी और का पानी नहीं भर सकता।&#8221;</strong></p>
<p style="text-align: justify;">श्री रोशन वर्मा ने भी लखमीचंद पर रिसर्च किया हैं उसके आधार पर ‘दादा लखमी’ फिल्म बनी है जिसे 50 के लगभग राष्ट्रीय पुरस्कार मिल चुके हैं। प्रसिद्ध बॉलीवुड अभिनेता यशपाल शर्मा की इस शोधपूर्ण फिल्म ‘दादा लखमी’ ने पूरे देश में धूम मचा रखी है। इसके अतिरिक्त फिल्म समीक्षक व आलोचक डॉ.रक्षा गीता जी ने ‘दादा लखमी ए म्यूजिकल जर्नी’ विषय पर विस्तृत चर्चा हिमाचल साहित्य अकादमी में प्रकाशित की है। लखमीचंद जी पर शोध करने वाले डॉ.हरिचंद लठवाल, डॉ.के.सी.शर्मा, पंडित केशो राम व डॉ.पूर्णचंद शर्मा है।</p>
<p style="text-align: justify;">लख्मीचंद जी पर कुछ विशेष पुस्तकें प्रकाशित हुई जिसमें श्री कृष्ण चंद्र शर्मा कृत ‘कविसूर्य लखमीचंद’, श्री लक्ष्मीनारायण शर्मा ‘वत्स’ द्वारा रचित ‘श्री शुकदेव स्वरूप पंडित लखमीचंद रत्नकोष’ और सर्वाधिक प्रचलित डॉ. पूर्णचंद शर्मा द्वारा संपादित ‘पंडित लखमीचंद ग्रंथावली’ है।</p>
<p style="text-align: justify;">व्यक्तिगत जीवन के संघर्षों से जूझते हुए, लोक कल्याण के कार्य करते हुए, हिंदू जीवन दर्शन, धर्म-कर्म आदि की सब बातें समाज को देते रहे। ऐसे पंडित लख्मीचंद जी की आयु अल्प ही रही। 17 अक्टूबर 1942 को मात्र 41 वर्ष की आयु में उनका शरीर शांत हो गया। उनकी मृत्यु के बाद भी उनके प्रति प्रेम के अनेक किस्से आज भी प्रसिद्ध हैं। 1964 में पंडित जवाहरलाल नेहरू की मृत्यु का समाचार आया तो उनके प्रेमी श्रोताओं ने कहा- <strong>&#8220;फेर के होया जब लखमी ए मर लिया।&#8221;</strong> इतनी गहरी पैठ आज भी उनकी समाज में है। साहित्य में नोबेल पुरस्कार विजेता सर विद्याधर सूरजपाल नायपाल ने कहा कि <strong>&#8220;पश्चिमी जगत का सारा साहित्य पंडित लख्मीचंद जी की एक रागिनी की भी बराबरी नहीं कर सकता।&#8221;</strong> ऐसे मूर्धन्य लोक कवि पंडित लख्मीचंद जी को नर गंधर्व कहना कोई अतिशयोक्ति नहीं है।</p>
<p style="text-align: justify;">(लेखक शिक्षाविद व स्वतंत्र साहित्यकार है और विद्या भारती उत्तर क्षेत्र के सेवा शिक्षा संयोजक है।)</p>
<p><strong>और पढ़ें : <span style="color: #0000ff;"><a style="color: #0000ff;" href="https://rashtriyashiksha.com/great-thinker-revered-lajjaram-tomar/" target="_blank" rel="noopener">महामनीषी श्रद्धेय लज्जा राम तोमर</a></span></strong></p>
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		<title>शिक्षा में सुधारों की आवश्यकता &#8211; परिवर्तन की प्रतीक्षा में पाठ्यक्रम</title>
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		<dc:creator><![CDATA[राष्ट्रीय शिक्षा]]></dc:creator>
		<pubDate>Wed, 24 Jul 2024 06:32:08 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[नवीनतम]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>✍ प्रणय कुमार किसी भी राष्ट्र का भविष्य शिक्षा पर निर्भर करता है। शिक्षा ही वह सुदृढ़ नींव है, जिस पर राष्ट्र रूपी भवन की ऊँचाई और मजबूती टिकी होती&#8230; </p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: right;"><img src="https://s.w.org/images/core/emoji/17.0.2/72x72/270d.png" alt="✍" class="wp-smiley" style="height: 1em; max-height: 1em;" /> प्रणय कुमार</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone wp-image-7820" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2024/07/1720513092_13-300x205.jpg" alt="" width="1421" height="971" srcset="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2024/07/1720513092_13-300x205.jpg 300w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2024/07/1720513092_13.jpg 660w" sizes="auto, (max-width: 1421px) 100vw, 1421px" /></p>
<p style="text-align: justify;">किसी भी राष्ट्र का भविष्य शिक्षा पर निर्भर करता है। शिक्षा ही वह सुदृढ़ नींव है, जिस पर राष्ट्र रूपी भवन की ऊँचाई और मजबूती टिकी होती है। शिक्षा के अभाव में विकास की सारी बातें निरर्थक हैं, बेमानी हैं। पिछले 10 वर्षों में देश ने लगभग हर क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति की, परंतु शिक्षा का क्षेत्र कमोवेश उपेक्षित ही रहा। राष्ट्रीय शिक्षा नीति का प्रचार-प्रसार तो खूब हुआ, परंतु धरातल पर उसका क्रियान्वयन, प्रभाव और परिणाम दिखाई नहीं देता।</p>
<p style="text-align: justify;">प्रधानमंत्री मोदी ने चुनाव-प्रचार के दौरान छोटे-बड़े सभी चैनलों पर दिए गए साक्षात्कार में राष्ट्रीय जीवन के अधिकांश विषयों एवं पहलुओं पर खुलकर बात की। परंतु इसे विडंबना ही कहेंगें कि लोकतंत्र में प्रहरी की भूमिका का दावा करने वाले तमाम चैनलों में से किसी ने भी उनसे शिक्षा में सुधारों से जुड़े प्रश्न नहीं पूछे! यह शिक्षा के प्रति हमारी उपेक्षा एवं सरोकार हीनता को दर्शाता है। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि भावी पीढ़ी के भविष्य व निर्माण से जुड़ा विषय &#8211; समाज और सरकार की प्राथमिकता-सूची में सबसे निचले क्रम पर दिखाई देता है। राजनीतिक दलों के लिए जब सत्ता-प्राप्ति का सीमित और तात्कालिक लक्ष्य सर्वोपरि हो जाता है, तब विचारों के गठन और व्यक्ति-निर्माण का प्रश्न पीछे छूट जाता है।</p>
<p style="text-align: justify;">निःसंदेह मोदी सरकार ने पिछली सरकारों की तुलना में अधिक आईआईटी, आईआईएम, मेडिकल कॉलेज एवं केंद्रीय विश्वविद्यालय आदि खोले हैं। परंतु क्या केवल उतने भर से संतुष्ट हुआ जा सकता है? क्या हमारे विद्यालयों, महाविद्यालयों, विश्वविद्यालयों की शिक्षा की स्थिति, शिक्षण का स्तर, पाठ्यक्रम की गुणवत्ता, विश्व में उसकी साख एवं विश्वसनीयता, वर्षों से लंबित एवं रिक्त पदों पर नई नियुक्ति, मौलिक शोध एवं नवोन्मेष, कौशल एवं तकनीक की दक्षता, अध्यापकों का प्रशिक्षण, नियमित सत्र, अनुशासित शैक्षिक वातावरण, रोजगारपरक शिक्षा, सतत एवं समग्र मूल्यांकन, पारदर्शी एवं कदाचार मुक्त परीक्षा तथा भारी धन खर्च कर भी विदेशी विश्वविद्यालयों में प्रवेश पाने की बढ़ती लालसा आदि पर समाधानपरक काम नहीं किया जाना चाहिए?</p>
<p style="text-align: justify;">आशा थी कि बीते दस वर्षों की पूर्ण बहुमत वाली सरकार में पाठ्यक्रम में सुधार की दृष्टि से ठोस एवं निर्णायक पहल की जाएगी। परंतु इस दिशा में अभी तक खानापूर्ति ही अधिक हुई है। जहाँ बुनियाद बदलने की शर्त हो, क्या वहाँ केवल रंग-रोगन अथवा साज-सज्जा से काम चलाया जा सकता है? आवश्यकता संशोधन-संक्षिप्तीकरण की नहीं, अपितु राष्ट्र की चिर-प्रतीक्षित आकांक्षा के अनुरूप पाठ्यक्रम में आमूल-चूल परिवर्तन किए जाने की थी और है।</p>
<p style="text-align: justify;">क्या इसमें भी कोई दो राय हो सकती है कि भाषा, साहित्य, इतिहास, राजनीति शास्त्र, दर्शन जैसे मानविकी के विभिन्न विषयों के माध्यम से सांस्कृतिक एकता एवं अखंडता को मजबूती मिलनी चाहिए, भारतीय ज्ञान-परंपरा को पोषण मिलना चाहिए, अस्तित्ववादी विमर्श एवं विभाजनकारी प्रवृत्तियों पर विराम लगना चाहिए, सहयोग, समन्वय, संतुलन, सामाजिकता, संवेदनशीलता एवं देशभक्ति जैसे मूल्यों को प्रश्रय एवं प्रोत्साहन मिलना चाहिए, भारतीय संस्कृति में व्याप्त बहुलता, शांति एवं सह-अस्तित्व के मूल स्रोत की खोज व पहचान की जानी चाहिए?</p>
<p style="text-align: justify;">कैसी विचित्र विडंबना है कि हमारे बौद्धिक-राजनीतिक-अकादमिक विमर्श में ‘भारत वर्ष में व्याप्त विविधता में एकता’ का उल्लेख तो भरपूर किया जाता है, पर उस एकत्व को पोषण देने वाले मूल्यों, मान्यताओं, परंपराओं, प्रमुख घटकों, मंदिरों, मठों, तीर्थों, त्योहारों आदि की कोई चर्चा नहीं होती? क्या पाठ्यक्रम में इन्हें यथोचित स्थान नहीं मिलना चाहिए? कौन नहीं जानता कि इतिहास की हमारी पाठ्य पुस्तकों में विदेशी आक्रांताओं की अतिरंजित विवेचना की गई है, भारतीयों के साहस, संघर्ष एवं प्रतिरोध को अपेक्षाकृत कम महत्त्व दिया गया है, संपूर्ण देश के वैशिष्ट्य एवं गौरवशाली अध्यायों की अपेक्षा केवल दिल्ली-केंद्रित इतिहास को केंद्र में रखा गया है तथा देश के अमर सपूतों, बलिदानी धर्मरक्षकों, महान संतों, समन्वयवादी समाज-सुधारकों, साहसी क्रांतिकारियों, राष्ट्रनिष्ठ स्वतंत्रता सेनानियों को नेपथ्य में रख, दो-चार का महिमामंडन किया गया है!</p>
<p style="text-align: justify;">क्या यह सत्य नहीं कि हमारी शिक्षा-व्यवस्था व पाठ्य-सामग्रियों में श्रद्धा, आस्था एवं विश्वास पर संदेह, अनास्था एवं अविश्वास को वरीयता दी गई है। उसमें अधिकार भाव की प्रबलता है, कर्त्तव्य-भावना गौण है, नैतिक मूल्यों एवं संस्कारों का अभाव है तथा सफलता एवं प्रतिस्पर्द्धा का प्राधान्य है? औपनिवेशिक मानसिकता, अस्मितावादी विमर्श एवं वर्गीय चेतना के नाम पर हीन भावनाओं, अलगाववादी वृत्तियों तथा पारस्परिक मतभेद, असहमति एवं संघर्ष को शिक्षा के माध्यम से पाला-पोसा-बढ़ाया गया है। मूल बनाम बाहरी, उत्तर बनाम दक्षिण, राष्ट्रभाषा बनाम क्षेत्रीय भाषा, स्त्री बनाम पुरुष, व्यक्ति बनाम समाज, वर्गीय/जातीय/सामुदायिक अस्मिता बनाम राष्ट्रीय अस्मिता, परंपरा बनाम आधुनिकता, नगरीय बनाम ग्रामीण, मजदूर बनाम किसान, गरीब बनाम अमीर, उपभोक्ता बनाम उत्पादक, उद्योगपति बनाम सर्वहारा, मनुष्य बनाम प्रकृति, विकास बनाम पर्यावरण जैसी मिथ्या एवं कृत्रिम लड़ाइयाँ शिक्षा, साहित्य, कला व संस्कृति के माध्यम से खड़ी की गईं हैं। परिवार, समाज एवं राष्ट्रकी विभिन्न इकाइयों को परस्पर विरोधी मानने वाली ऐसी खंडित एवं विभेदकारी दृष्टि के स्थान पर, क्या शिक्षा-व्यवस्था में समन्वय और समग्रता पर आधारित सनातन दृष्टि को स्थान नहीं मिलना चाहिए?</p>
<p style="text-align: justify;">सच तो यह है कि हमारी पूरी शिक्षा-व्यवस्था व पाठ्य-सामग्रियों में जोड़ने वाले तत्त्वों का अभाव है और तोड़ने वाले तर्कों, कारकों, धारणाओं, पूर्वाग्रहों का प्रभाव है। इतना ही नहीं, हमारी आधुनिक शिक्षा की दृष्टि में रामायण-महाभारत गप हैं, वेद-वेदांग-गीता-उपनिषद-षड्दर्शन वायवीय एवं पारलौकिक हैं, भारत विभिन्न राष्ट्रीयताओं एवं अनेक संस्कृतियों का गठजोड़ है। अब कोई बताए कि ऐसे पाठ्यक्रमों को पढ़कर कैसे नागरिक, कैसे मतदाता, कैसे नौकरशाह, कैसे राजनेता, कैसे न्यायाधीश तैयार होंगें? पराए राग-रंग व सोच में आकंठ डूबे लोगों से स्व के साक्षात्कार व भारत के बोध की भला क्या और कितनी उम्मीद की जा सकती है? क्या यह भी बताने की आवश्यकता है कि स्वतंत्र भारत की अनेक गौरवशाली उपलब्धियाँ पाठ्यक्रम में सम्मिलित किए जाने की बाट जोह रही हैं?</p>
<p style="text-align: justify;">क्या भारत की सफल लोकतांत्रिक यात्रा के क्रमिक सोपानों का उल्लेख पाठ्यक्रम में नहीं होना चाहिए, क्या आपातकाल के दौरान सर्वसाधारण एवं प्रबुद्ध नागरिकों द्वारा किए गए संघर्ष व झेली गई यातनाओं की व्यथा-कथा पढ़कर लोकतंत्र के प्रति भावी पीढ़ी की आस्था मजबूत नहीं होगी, क्या चंद्रयान, मंगलयान की सफलता की गाथा नहीं पढ़ाई जानी चाहिए, क्या उपग्रह, प्रक्षेपास्त्र, तकनीक, प्रौद्योगिकी, संचार-क्रांति एवं सैन्य-क्षेत्र की भारत की नित-नवीन उपलब्धियाँ वर्तमान के लिए प्रेरणादायी नहीं हैं? दुर्भाग्यपूर्ण है कि प्रयोग, अनुसंधान व व्यवहार की कसौटी पर कसे जाने वाले गणित और विज्ञान जैसे विषयों में भी बीते कई दशकों से परिवर्तन नहीं किए गए हैं। हर दस-पंद्रह वर्ष में पीढ़ियाँ बदल जाती हैं, उसकी सोच, स्वप्न, सरोकार व प्रेरणाएँ बदल जाती हैं तो क्या पाठ्यक्रम नहीं बदला जाना चाहिए?</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone wp-image-7817" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2024/07/2022_9image_03_16_49235828100-300x197.jpg" alt="" width="1416" height="930" srcset="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2024/07/2022_9image_03_16_49235828100-300x197.jpg 300w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2024/07/2022_9image_03_16_49235828100.jpg 640w" sizes="auto, (max-width: 1416px) 100vw, 1416px" /></p>
<p style="text-align: justify;">उल्लेखनीय है कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति में अध्ययन-अध्यापन की भाषा के रूप में मातृभाषा एवं भारतीय भाषाओं की पुरजोर पैरवी की गई है। शिक्षाविदों ने इसे राष्ट्रीय शिक्षा नीति की आत्मा के रूप में चिह्नित-प्रतिपादित किया है। परंतु अभी तक इस दिशा में किसी स्तर पर कोई ठोस काम नहीं हुआ है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 में प्राथमिक शिक्षा मातृभाषा में दिए जाने तथा माध्यमिक स्तर पर दो राष्ट्रीय (नैटिव) एवं एक विदेशी (फॉरेन) और उच्चतर माध्यमिक स्तर पर एक भारतीय (नैटिव) एवं एक विदेशी (फॉरेन) भाषा पढ़ाए जाने की संस्तुति की गई है, परंतु विभिन्न बोर्डों की ओर से इस दिशा में अभी तक कोई दिशानिर्देश (गाइडलाइंस) नहीं जारी किए गए हैं। यथार्थ यह है कि हिंदी भाषी राज्यों में कुकरमुत्ते की तरह अंग्रेजी माध्यम के विद्यालय खुलते चले जा रहे हैं। कई निजी विद्यालयों में तो स्थिति इतनी भयावह है कि वहाँ न केवल हिंदी बोलने पर प्रतिबंध है, अपितु दंड का भी प्रावधान है।</p>
<p style="text-align: justify;">उच्च शिक्षा की कौन कहे, ग्यारहवीं-बारहवीं में भी अधिकांश छात्र हिंदी को एक विषय के रूप में नहीं चुनते हैं, क्योंकि उनके पास हिंदी के विकल्प के रूप में अधिक अंक दिलाने वाले अनेक विषयों के विकल्प उपलब्ध हैं। उन्हें हिंदी का पाठ्यक्रम रोचक, ज्ञानवर्द्धक, रोजगारोनुकूल एवं परिवेशगत नहीं लगता। चूँकि हिंदी भाषा व साहित्य को छोड़कर शेष सभी विषयों की पढ़ाई अंग्रेजी में कराई जाती है, इसलिए हिंदी लिखना भी उन्हें कठिन जान पड़ता है। वहीं जेईई, नीट, यूपीएससी, क्लेट, कैट, सीडीएस, एनडीए जैसी प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए हिंदी एवं अन्य भारतीय भाषाओं में पाठ्य-सामग्रियों का अभाव और प्रश्नपत्रों का प्रारूप भी नई पीढ़ी को उनसे दूर ले जाता है। घिसी-पिटी परिपाटी, नौकरशाही एवं राजनीतिक दलों के निहित स्वार्थ तथा सरकार की इच्छाशक्ति की कमी के कारण भारतीय भाषाओं की उपेक्षा का क्रम यथावत जारी है।</p>
<p style="text-align: justify;">हिंदी एवं अन्य भारतीय भाषाओं की स्थिति में तब तक अपेक्षित सुधार नहीं लाया जा सकता, जब तक कि उन्हें विद्यालयी शिक्षा में अनिवार्यतः लागू नहीं किया जाता। विभिन्न स्तरों की परीक्षा-पद्धत्ति, प्रश्नपत्र के प्रारूप, मूल्यांकन की प्रक्रिया आदि में अनेक सुधार अपेक्षित एवं अत्यावश्यक हैं। प्रश्नपत्र लीक होने की समस्या दिन-प्रतिदिन विकराल रूप धारण करती जा रही है। उसके कारण विद्यार्थियों एवं अभिभावकों में व्यवस्था के प्रति अनावश्यक असंतोष पनपता है। चाहे वह राज्यों की सरकार हो या केंद्र की, उन्हें विद्यार्थियों-परीक्षार्थियों के प्रति अतिरिक्त संवेदना दर्शानी होगी और व्यवस्था में व्याप्त ऐसे सभी छिद्रों को अनिवार्यतः बंद करना होगा। संयोग से कुछ दिनों पूर्व ही किए गए मंत्रिमंडल के गठन में निरंतरता का विशेष ध्यान रखा गया है। निःसंदेह इससे शिक्षा-क्षेत्र में भी सुधारों को गति एवं दिशा मिलेगी, नीतियों के क्रियान्वयन में सुविधा होगी तथा समाधान को बल मिलेगा।</p>
<p style="text-align: justify;">(लेखक शिक्षाविद एवं वरिष्ठ स्तंभकार है।)</p>
<p><strong>और पढ़ें : <a href="https://rashtriyashiksha.com/kothari-commission-and-national-education-policy-2020/" target="_blank" rel="noopener">कोठारी आयोग और राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020</a></strong></p>
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		<title>स्वामी दयानंद सरस्वती का जीवन दर्शन</title>
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		<dc:creator><![CDATA[राष्ट्रीय शिक्षा]]></dc:creator>
		<pubDate>Sun, 12 Feb 2023 04:30:45 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[नवीनतम]]></category>
		<category><![CDATA[व्यक्तित्व]]></category>
		<category><![CDATA[education]]></category>
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		<category><![CDATA[Rashtriya shiksha]]></category>
		<category><![CDATA[Swami Dayananad Sarswati]]></category>
		<category><![CDATA[आर्य समाज]]></category>
		<category><![CDATA[शिक्षा]]></category>
		<category><![CDATA[स्वामी दया नन्द सरस्वती]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>&#x270d; धर्मवीर स्वामी दयानंद सरस्वती जी का नाम अग्रणी समाज सुधारकों में आता है। उनके बचपन का नाम मूल शंकर था। स्वामी जी ने वेदों का प्रचार किया, इसके प्रचार&#8230; </p>
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]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: right;"><img src="https://s.w.org/images/core/emoji/17.0.2/72x72/270d.png" alt="✍" class="wp-smiley" style="height: 1em; max-height: 1em;" /> धर्मवीर</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone wp-image-6319" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2023/02/swami-dayanand-saraswati_large_1037_23-300x176.jpeg" alt="" width="1674" height="982" srcset="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2023/02/swami-dayanand-saraswati_large_1037_23-300x176.jpeg 300w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2023/02/swami-dayanand-saraswati_large_1037_23-1024x602.jpeg 1024w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2023/02/swami-dayanand-saraswati_large_1037_23-768x451.jpeg 768w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2023/02/swami-dayanand-saraswati_large_1037_23.jpeg 1200w" sizes="auto, (max-width: 1674px) 100vw, 1674px" /></p>
<p>स्वामी दयानंद सरस्वती जी का नाम अग्रणी समाज सुधारकों में आता है। उनके बचपन का नाम मूल शंकर था। स्वामी जी ने वेदों का प्रचार किया, इसके प्रचार के लिए ही मुम्बई में आर्य समाज की स्थापना की, &#8220;वेदों की ओर लौटो&#8217; ऐसा एक नारा भी स्वामी जी ने दिया जो वेदों के प्रचार व प्रसार का प्रतीक बन गया।</p>
<p>जन्मस्थान टंकारा (गुजरात), व जन्मतिथि 12 फरवरी, 1824 को इस पुण्यात्मा का अवतरण इस पवित्र भारत भूमि पर हुआ। मूल नक्षत्र में जन्म लेने के कारण आपका नाम मूलशंकर रखा गया। इनके पिता का नाम अंबाशंकर तिवारी था। इनका मत था कि ब्राह्मण ज्ञान का उपासक होता है। और दानी वही होता है जो अज्ञानी को ज्ञान देता है।</p>
<p>इनके समय भारत देश परतन्त्र था। अंग्रेजों के शासन के अधीन था। समाज में विदेशी वस्तुओं का प्रचलन था। अंग्रेजों ने बहुत सारी चीजें भारतीयों पर जबरदस्ती थोपी हुई थी। समाज के लोगों में भय व्याप्त था। समाज के लोगों में मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति नहीं होती थी। लोग अभावग्रस्त जीवन व्यतीत करते थे, इसलिए कहीं न कहीं अंधविश्वास, कुरीतियाँ समाज में व्याप्त थी जो दिनोंदिन वृद्धि कर रही थीं। इन्होंने अपनी आवाज बुलंद करते हुए सामाजिक व राजनीतिक दोनों ही विचारों में अपना विशिष्ट स्थान बनाया है। सर्वप्रथम उन्होंने स्वराज्य का उद्घोष किया, ऐसा करके स्वामी जी ने भारतीय जन-जीवन में नवचेतना का संचार किया जिससे राजनीतिक स्वतंत्रता की पृष्ठभूमि तैयार हुई। &#8216;विशासन&#8217; तथा &#8216;स्वराज्य&#8217; की पुकार सर्वप्रथम महर्षि दयानंद के द्वारा उठाई गई थी। जिस समय लोग अंग्रेजों के सामने कुछ भी बोलने में संकोच करते थे, उस समय स्वामी जी ने निडरता से अपनी ये मांगे उठाई थी।</p>
<p>स्वामी जी के विचार राष्ट्रवादी थे। उन्होंने कहा था- &#8220;भारत पर गर्व करो, प्राचीन वैदिक संस्कृति का अनुसरण करो। इन्हीं विचारों का स्वामी दयानन्द ने सम्पूर्ण जनता में प्रचार किया। वे जनता में स्वतन्त्रता के प्रति जागरण लाए।</p>
<p>मुस्लिम काल और ईसाई धर्म प्रचारकों ने पास्परिक फूट, शिक्षा की कमी, जीवन में अशुद्धता, धर्म से विमुखता तथा अन्य धार्मिक कुरीतियों के कारण भारत का पतन हुआ था। स्वामी जी ने समाज में व्याप्त सभी कुरीतियों और पतन से उभारने का कार्य किया। स्वदेशी वस्तुओं से प्रेम का आग्रह भी स्वामी ने भारतीय लोगों को किया। आगे चलकर गाँधी जी ने इस विचार को और आगे बढ़ाया। जोधपुर के तत्कालीन नरेश ने स्वामी जी से प्रभावित होकर स्वदेशी अपनाकर विदेशी वस्तुओं का परित्याग किया।</p>
<p>स्वामी जी भारत में लोकतंत्र की स्थापना करना चाहते थे, जिसका स्पष्ट उल्लेख उन्होने &#8216;सत्यार्थ प्रकाश&#8217; में किया है। स्वामी जी का मानना था कि लोकतंत्र में ही व्यक्ति के अधिकारों और कर्तव्यों में सही संतुलन स्थापित हो सकता है इसलिए उन्होंने अपने ग्रंथ सत्यार्थ प्रकाश में लोकतंत्र के निर्माण, स्वरूप शासन तथा न्याय संबंधी &#8216;धारणाओं&#8217; की विवेचना की है।</p>
<p>स्वामी जी के चिंतन और मनन में तीन आदर्श समान रूप से देखे जा सकते हैं जिन पर वर्तमान लोकतंत्र आधारित है। वे हैं- स्वतंत्रता, समानता और भाईचारा । स्वामी जी के लोकतंत्र में वर्ग, वर्ण, धर्म, जाति और लिंग के आधार पर समानता की बात की है। उनके लोकतंत्र का मूल आधार &#8216;मनुस्मृति&#8217; है।</p>
<p>राष्ट्रभाषा हिन्दी का समर्थन भी स्वामी जी ने किया है। उन्हें अपनी प्रान्तीय भाषा, गुजराती विशेष प्रिय थी लेकिन राष्ट्रवादी होने के कारण प्रांत की संकुचित सोच उनके हृदय में घर नहीं कर पाई और राष्ट्रीय भावना से प्रेरित होकर तथा राष्ट्रीयता को प्रोत्साहित करने हेतु अपनी समस्त टीकाएं एवं ग्रंथ हिन्दी में ही लिखे।</p>
<p>स्वामी जी सभी धर्मों को समान दृष्टि से देखते थे। सभी धर्मों के प्रति प्रेम रखते थे। स्वामी जी धार्मिक एकता के आधार पर विश्व एकता चाहते थे। समाज से स्वामी जी ने जातीय भेदभाव, ऊँच-नीच की भावना, बाल विवाह, सती-प्रथा जैसी कुरीतियों को दूर किया। उन्होंने प्रयास किया कि नारी जाति शिक्षित हो।</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone wp-image-6322" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2023/02/Swami-Dayanand-Saraswati-Biography-स्वामी-दयानंद-सरस्वती-जीवनी-min-300x214.jpg" alt="" width="1674" height="1194" srcset="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2023/02/Swami-Dayanand-Saraswati-Biography-स्वामी-दयानंद-सरस्वती-जीवनी-min-300x214.jpg 300w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2023/02/Swami-Dayanand-Saraswati-Biography-स्वामी-दयानंद-सरस्वती-जीवनी-min.jpg 672w" sizes="auto, (max-width: 1674px) 100vw, 1674px" /></p>
<p>जाति प्रथा के विरोध के साथ-साथ अनेक कुप्रथाओं का विरोध भी स्वामी जी ने किया।  बाल्यकाल में जब मंदिर में बैठे बैठे रात हो गई तो रात को मंदिर में मूर्ति के सामने रखे प्रसाद को चूहे खा रहे थे, ऐसा देखकर उन्होंने उस दिन से मूर्ति पूजा नहीं की और मूर्तिपूजा का विरोध किया। नारी अधिकारों के रक्षक का कार्य भी स्वामी जी ने किया। आर्य भाषा और शिक्षा का प्रचार भी प्रचुर मात्रा में स्वामी जी ने अपनी राष्ट्रवादी सोच, चिंतन के कारण निशदिन किया। राजनीति के क्षेत्र में भी इन्होने बहुत कुछ किया। श्री अरविन्द घोष का कथन है-&#8221; स्वामी दयानंद में राष्ट्रीयता की भावना थी। उस अनुभूति को उन्होंने राष्ट्रीय भावना के संदर्भ में ज्योतिर्मय बना दिया। उनकी कृतियां भले ही कितनी ही मान्यताओं से भिन्न हों, वास्तव में राष्ट्रीय भावना से ओतप्रोत है।&#8221;</p>
<p>बम्बई में आर्य समाज की स्थापना 10 अप्रैल, 1875 को करके स्वामी जी ने बहुत ही महत्वपूर्ण एवं दूरदर्शिता का कार्य किया। उनके पश्चात भी यह संस्था उनके विचारों का सर्वत्र प्रचार कर रही है। उन्हें कार्यरूप में परिणत कर रही है। यह संस्था आज भी भारतीय समाज को जागृत रखने का महत्वपूर्ण कार्य उत्तरदायित्व के साथ कर रही है।</p>
<p>आर्य समाज की स्थापना का उद्देश्य भी एक श्रेष्ठ समाज का निर्माण करना ही था। एक ऐसा समाज जो अपने बलबूते पर ही सारा कार्य करे, स्वावलंबी बने, आत्मनिर्भर भारत बने और आज भारत आत्मनिर्भर बनने के उस मार्ग पर निरंतर अग्रसर है। स्वामी जी के ऐसे कार्यों से यही अनुभव आता है कि वे बहुत बड़े समाज सुधारक, राष्ट्रभक्त, धर्म रक्षक, ईश्वरीय व्रती थे। रोम्मा रोलां ने भी आर्य समाज के कार्य का सच्चा विश्लेषण करते हुए उसे उचित रूप से बहुत सराहा है। उनके अनुसार &#8220;आर्य समाज उस समय राष्ट्रीय पुनर्जागरण एवं राष्ट्रीय चेतना के महत्त्वपूर्ण कार्य में महत्त्वपूर्ण शक्ति थी। स्वामी जी ने राष्ट्रीय संगठन एवं निर्माण पुननिर्माण के लिए यह महान कार्य किया। स्वामी जी के आर्य समाज ने 1905 के बंगाली राष्ट्रवादी आंदोलन का मार्ग प्रशस्त किया।&#8221; आज भी आर्य समाज विभिन्न अवसरों पर विभिन्न समाज की आवश्यकताओं को पूर्ण करने का कार्य विभिन्न प्रकार से विभिन्न क्षेत्रों में कर रहा है।</p>
<p>(लेखक चौधरी बंसीलाल विश्वविद्यालय भिवानी में सहायक प्रोफेसर है।)</p>
<p><strong>और पढ़ें : <span style="color: #000080;"><a style="color: #000080;" href="https://rashtriyashiksha.com/education-philosophy-of-swami-dayanand-ji/" target="_blank" rel="noopener">स्वामी दयानन्द जी का शिक्षा दर्शन</a></span></strong></p>
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		<title>श्रीकृष्ण सच्चे अर्थों में राष्ट्रनायक हैं</title>
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		<pubDate>Thu, 18 Aug 2022 16:32:42 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[<p>&#8211; ललित गर्ग भगवान श्रीकृष्ण हमारी संस्कृति के एक अद्भुत एवं विलक्षण राष्ट्रनायक हैं। श्रीकृष्ण का चरित्र एक लोकनायक का चरित्र है। वह द्वारिका के शासक भी है किंतु कभी&#8230; </p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: right;">&#8211; ललित गर्ग</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="wp-image-5730 aligncenter" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2022/08/krishna_1659790636-300x169.webp" alt="Sri Krishan" width="575" height="324" srcset="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2022/08/krishna_1659790636-300x169.webp 300w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2022/08/krishna_1659790636.webp 414w" sizes="auto, (max-width: 575px) 100vw, 575px" /></p>
<p>भगवान श्रीकृष्ण हमारी संस्कृति के एक अद्भुत एवं विलक्षण राष्ट्रनायक हैं। श्रीकृष्ण का चरित्र एक लोकनायक का चरित्र है। वह द्वारिका के शासक भी है किंतु कभी उन्हें राजा श्रीकृष्ण के रूप में संबोधित नहीं किया जाता। वह तो ब्रजनंदन है। समाज एवं राष्ट्र व्यवस्था उनके लिये कर्त्तव्य थी, इसलिये कर्त्तव्य से कभी पलायन नहीं किया तो धर्म उनकी आत्मनिष्ठा बना, इसलिये उसे कभी नकारा नहीं। वे प्रवृत्ति और निवृत्ति दोनों की संयोजना में सचेतन बने रहे। श्रीकृष्ण के आदर्शों से ही देश एवं दुनिया में शांति स्थापित करने का मार्ग प्रशस्त होगा। इस रहस्य को समझना होगा कि श्रीकृष्ण किस प्रकार आदर्श राजनीति, व्यावहारिक लोकतंत्र, सामाजिक समरसता, एकात्म मानववाद और अनुशासित सैन्य एवं युद्ध संचालन किया। राष्ट्र के सर्वांगीण विकास के लिए किस तरह की नीति और नियत चाहिए- इन सब प्रश्नों के उत्तर श्रीकृष्ण के जीवन से मिलते हैं।</p>
<p>श्रीकृष्ण का संपूर्ण जीवन भारत के सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का पर्याय है। उनके आदर्शों के माध्यम से ही विश्व ने भारत को जाना है। उनके आदर्शों की पुनर्प्रतिष्ठा से विश्व फिर से भारत को जानेगा। राजनैतिक सूक्ष्म दृष्टि, दुष्टों, राष्ट्रद्रोहियों, अपराधियों एवं भ्रष्टाचारियों का दलन, वचन पालन का संकल्प, राष्ट्रहितार्थ आत्मसमर्पण का व्रत, निष्पाप लोगों की मुक्ति, विषमताओं का उन्मूलन, विभेदों में सामंजस्य, परस्पर शत्रुता का निवारण, स्वयं स्वीकृत आत्मसंयम, राष्ट्र कार्यों में सबका सहयोग, राजसत्ता पर धर्मसत्ता का अंकुश और इन सबकी पूर्ति के लिए सत्ता का भी त्याग इत्यादि श्रीकृष्ण के गुण भारत के राष्ट्रीय जीवन एवं सांस्कृतिक मूल्य हैं। वास्तव में श्रीकृष्ण उस कोटि के चिंतक थे, जो काल की सीमा को पार कर शाश्वत और असीम तक पहुंचता है। जब-जब अनीति बढ़ जाती है, तब-तब श्रीकृष्ण जैसे राष्ट्रनायक को अवतीर्ण होना पड़ता है।</p>
<p>जैसा कि स्वयं श्रीकृष्ण ने गीता में कहा है-</p>
<p style="text-align: center;"><strong>यदा-यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारतः।</strong></p>
<p style="text-align: center;"><strong>अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्।।</strong></p>
<p>अर्थात अन्याय के प्रतिकार के लिए ही राष्ट्रनायक को जन्म लेने की आवश्यकता पड़ती है।</p>
<p>जो समूचे जनमानस को इस तरह चेतना से उद्वेलित कर दे कि जिस अभीष्ट दिशा में वह समूचे समाज को ले जाना चाहता है, उस दिशा में सैलाब की तरह समूचा समाज चल पड़े और उसके प्रबल प्रवाह को उन्नत पर्वत शिखर भी न रोक सके। श्रीकृष्ण भी ऐसे ही राष्ट्रनायक थे, जिनके इंगित मात्र पर सभी गोप-गोपियां ब्रज छोड़कर तत्कालीन नरेश कंस के विरुद्ध एकजुट हो गए थे। मध्यकाल में गोस्वामी तुलसीदास हालांकि सत्ता से कोसों दूर थे, लेकिन उनकी रामचरितमानस आज भी जन-जन की कंठहार बनी हुई है और आज भी किसी भी सत्तासीन राजा-महाराजा या सम्राट की अपेक्षा भारत में अधिकांश भागों में तुलसी का नाम गूंज रहा है। लोकनायक या जननायक ही वास्तव में राष्ट्रनायक होता है। श्रीकृष्ण अपने युग के ऐसे ही नायक थे। उस समय विश्वभर के सत्ताधारी उनके इर्द-गिर्द ऐसे मंडराते थे, मानो उनके चतुर्दिक चक्र का वलय हो। श्रीकृष्ण ने अन्य लोगों को सत्ता सौंपी, लेकिन स्वयं सत्ता से विरक्त रहे। वास्तव में श्रीकृष्ण राष्ट्रनायक इसीलिए बन सके, क्योंकि उन्होंने लोकशक्ति को संगठित करने की महती भूमिका निभाई थी।</p>
<p>श्रीकृष्ण का व्यक्तित्व एवं कर्तृत्व नेतृत्व की समस्त विशेषताओं को समेटे बहुआयामी एवं बहुरंगी है, यानी राजनीतिक कौशल, बुद्धिमत्ता, चातुर्य, युद्धनीति, आकर्षण, प्रेमभाव, गुरुत्व, सुख, दुख और न जाने और क्या? एक देशभक्त के लिए श्रीकृष्ण भगवान तो हैं ही, साथ में वे जीवन जीने की कला एवं सफल नागरिकता भी सिखाते है। उन्होंने अपने व्यक्तित्व की विविध विशेषताओं से भारतीय-संस्कृति में महानायक का पद प्राप्त किया। एक ओर वे राजनीति के ज्ञाता, तो दूसरी ओर दर्शन के प्रकांड पंडित थे। धार्मिक, राजनैतिक एवं सामाजिक जगत् में भी नेतृत्व करते हुए ज्ञान-कर्म-भक्ति का समन्वयवादी धर्म उन्होंने प्रवर्तित किया। अपनी योग्यताओं के आधार पर वे युगपुरुष थे, जो आगे चलकर युवावतार के रूप में स्वीकृत हुए। उन्हें हम एक महान् क्रांतिकारी नायक के रूप में स्मरण करते हैं। वे दार्शनिक, चिंतक, गीता के माध्यम से कर्म और सांख्य योग के संदेशवाहक और महाभारत युद्ध के नीति निर्देशक थे किंतु सरल-निश्छल ब्रजवासियों के लिए तो वह रास रचैया, माखन चोर, गोपियों की मटकी फोड़ने वाले नटखट कन्हैया और गोपियों के चितचोर थे।</p>
<p>गीता में इसी की भावाभिव्यक्ति है- हे अर्जुन! जो भक्त मुझे जिस भावना से भजता है मैं भी उसको उसी प्रकार से भजता हूँ। हमारे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी में भी हम इन्हीं विशेषताओं का दर्शन करते है, क्योंकि श्रीकृष्ण के जीवन-आदर्शों को आत्मसात करते हुए वे सशक्त भारत-नया भारत निर्मित कर रहे हैं।</p>
<p>श्रीकृष्ण के जीवन में विभिन्न प्रकार के गुणों का ऐसा सुंदर समन्वय था कि एक ओर जहां वे सामान्य जन में रम सकते थे, वहीं अपने हाथों से कुवलयापीड़ जैसे मदोन्मत्त हाथी के दांतों को भी उखाड़कर फेंक सकते थे। अद्भुत क्षमता का यह समन्वय श्रीकृष्ण को अन्य नायकों से बिल्कुल भिन्न पंक्ति में लाकर खड़ा कर देता है। वैचारिक और व्यावहारिक धरातल को समाविष्ट करने की श्रीकृष्ण की सार्थकता की जो धारा भारतीय समाज में अविछिन्न रूप से प्रवाहित हुई उसी को चाणक्य ने कूटनीति से, तुलसीदास ने भक्ति से, गांधी ने सेवा से, जयप्रकाश ने जनजागरण के माध्यम से, डॉ हेडगेवार ने संगठन से चिंतन की व्यावहारिक उपयोगिता को सिद्ध कर दिखाया। श्रीराम सत्तासीन रहते हुए भी सदैव उससे उसी प्रकार निर्लिप्त रहे, जैसे अहर्निश जल में रहते हुए भी कमल पत्र उससे लिप्त नहीं होता। श्रीराम की इसी परम्परा को श्रीकृष्ण ने और आगे बढ़ाया। श्रीराम तो अपने जीवन में कुछ समय सत्ता पर आसीन भी रहे, लेकिन श्रीकृष्ण हमेशा सत्ता से दूर रहे। उन्होंने अन्य लोगों को तो सत्ता पर बिठाया, लेकिन स्वयं आराधना करते रहे। उनकी विनम्रता इस सीमा तक थी कि राजसूय यज्ञ में जब सभी को काम सौंपा गया तो श्रीकृष्ण ने लोगों को झूठी पत्तलें उठाने का जिम्मा खुद ले लिया। यह थी उनकी विनम्रता। इसी विनम्रता का परिणाम रहा कि सभी नरेशों के मुकुटमणि उनके चरणों पर अवनत होते रहे। उनके इन्हीं गुणों की वजह से आज भी हम उन्हें षोडश कलापूर्ण व्यक्ति मानते हैं। संपूर्ण भारत में प्राचीनकाल से अर्वाचीन काल तक किसी अन्य व्यक्ति को यह सम्मान प्राप्त नहीं हो सका।</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="wp-image-5731 aligncenter" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2022/08/भगवान-श्री-कृष्ण-के-कितने-पुत्र-थे-Bhagwan-Krishna-Ke-Kitne-Putra-The.-300x180.jpg" alt="Sri Krishan" width="582" height="349" srcset="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2022/08/भगवान-श्री-कृष्ण-के-कितने-पुत्र-थे-Bhagwan-Krishna-Ke-Kitne-Putra-The.-300x180.jpg 300w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2022/08/भगवान-श्री-कृष्ण-के-कितने-पुत्र-थे-Bhagwan-Krishna-Ke-Kitne-Putra-The.-768x461.jpg 768w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2022/08/भगवान-श्री-कृष्ण-के-कितने-पुत्र-थे-Bhagwan-Krishna-Ke-Kitne-Putra-The..jpg 800w" sizes="auto, (max-width: 582px) 100vw, 582px" /></p>
<p>सत्ता से जो व्यक्ति दूर रहता है और दूर रहते हुए भी समूचे राष्ट्र को दिशा देता है, वही सच्चा राष्ट्रनायक होता है। राष्ट्रनायक का जीवन त्यागमय होता है। उसके जीवन में पदलिप्सा नहीं होती। भगवान श्रीराम को उनके पिता दशरथ ने सिंहासन सौंपा था। उस सिंहासन पर वे बने रह सकते थे। लेकिन वे सत्ता से अनासक्त थे। श्रीकृष्ण भी उसी परम्परा से जुड़ते हैं। उनके अंदर तीन गुण विशेष रूप से विद्यमान थे- त्याग, सत्ता से अनासक्ति तथा लोकशक्ति को संगठित करने की अद्भुत क्षमता। इन तीनों गुणों के कारण ही श्रीकृष्ण ने अपनी इच्छानुसार युग परिवर्तन लाने में सफलता प्राप्त की। श्रीकृष्ण का वैचारिक धरातल व्यावहारिक धरातल से बहुत ऊंचा था। तथापि वे अपने वैचारिक और व्यावहारिक धरातल के बीच समन्वय इस तरह करते थे कि दोनों धाराएं एक-दूसरे में कहां विलीन होती हैं, उसका पता भी नहीं चलता।</p>
<p>श्रीकृष्ण का राष्ट्रनायक का चरित्र अत्यन्त दिव्य है। हर कोई उनकी ओर खिंचा चला जाता है। जो सबको अपनी ओर आकर्षित करे, भक्ति का मार्ग प्रशस्त करे, भक्तों के पाप दूर करे, वही श्रीकृष्ण है। वह एक ऐसा आदर्श चरित्र है जो अर्जुन की मानसिक व्यथा का निदान करते समय एक मनोवैज्ञानिक, कंस जैसे असुर का संहार करते हुए एक धर्मावतार, स्वार्थ पोषित राजनीति का प्रतिकार करते हुए एक आदर्श राजनीतिज्ञ, विश्व मोहिनी बंसी बजैया के रूप में सर्वश्रेष्ठ संगीतज्ञ, बृजवासियों के समक्ष प्रेमावतार, सुदामा के समक्ष एक आदर्श मित्र, सुदर्शन चक्रधारी के रूप में एक योद्धा व सामाजिक क्रान्ति के प्रणेता हैं। उनके जीवन की छोटी से छोटी घटना से यह सिद्ध होता है कि वे सर्वैश्वर्य सम्पन्न थे, धर्म की साक्षात् मूर्ति थे, कुशल राजनीतिज्ञ थे।</p>
<p>श्रीकृष्ण का प्रशासनिक एवं राजनीतिक चरित्र अत्यन्त अलौकिक है, उनके समग्र विचार दर्शन का संक्षेप में केवल एक संदेश है- कर्म। कर्म के माध्यम से ही समाज की अनिष्टकारी प्रवृत्तियों का शमन करके उनके स्थान पर वरेण्य प्रवृत्तियों को स्थापित करना संभव होता है। श्रीकृष्ण का व्यक्तित्व असीम करुणा से परिपूर्ण है। लेकिन अनीति और अत्याचार का प्रतिकार करने वाला उनसे कठोर व्यक्ति शायद ही कोई मिले। जो श्रीकृष्ण अपने से प्रेम करने वाले के लिए नंगे पांव दौड़े चले जाते थे, वही श्रीकृष्ण दुष्टों को दण्ड देने के लिए अत्यंत कठोर और निर्मम भी हो जाते थे। गीता का उपदेश देते हुए श्रीकृष्ण ने अर्जुन को यही कहा था कि मोह वश होकर रहने का कोई लाभ नहीं। ये सगे संबंधी सब कहने को हैं, लेकिन तुम्हें अपने उद्देश्य को प्राप्त करने के लिए ज्ञान, कर्म और भक्ति के प्रतिपादन पर बल देना है। श्रीकृष्ण के विषय में अनेक किंवदन्तियां और मिथक प्रचलित हैं। लेकिन समकालीन संदर्भ में उनका उचित और युक्तिसंगत ऐतिहासिक मूल्यांकन करने की आवश्यकता है।</p>
<p>श्रीकृष्ण ग्रामीण संस्कृति के पोषक बने हैं। उन्होंने अपने समय में गायों को अभूतपूर्व सम्मान दिया। वे गायों एवं ग्वालों के स्वास्थ्य, उनके खान-पान को लेकर सजग थे। उन्होंने जहां ग्वालों की मेहनत से निकाला गया माखन और दूध-दही को स्वास्थ्य रक्षक के रूप में प्रतिष्ठित किया वही इन अमूल्य चीजों को ‘कर’ के रूप में कंस को देने से रोका। वे चाहते थे कि इन चीजों का उपभोग गांवों में ही हो। श्रीकृष्ण का माखनचोर वाला रूप दरअसल निरंकुश सत्ता को सीधे चुनौती तो था ही, लेकिन साथ ही साथ ग्रामीण संस्कृति को प्रोत्साहन देना भी था। श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव-जन्माष्टमी पर आज भारत का निर्माण उनकी शिक्षाओं, जीवन-आदर्शों एवं सिद्धान्तों पर करने की अपेक्षा है, तभी हिन्दू सशक्त होंगे, तभी भारत सही अर्थों में हिन्दू राष्ट्र बन सकेगा।</p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>ये भी पढ़े: </strong></span><strong><span style="color: #0000ff;"><a style="color: #0000ff;" href="https://rashtriyashiksha.com/kanhas-education-at-srikrishna-birth-special/" target="_blank" rel="noopener">कान्हा की शिक्षा – श्रीकृष्ण जन्म पर विशेष</a></span></strong></p>
<p>(लेखक स्वतंत्र स्तंभकार, पत्रकार एवं सामाजिक कार्यकर्त्ता है और विद्या भारती दिल्ली प्रान्त के संवाददाता है।)</p>
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		<title>रामकृष्ण परमहंस का शिक्षा दर्शन</title>
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		<dc:creator><![CDATA[राष्ट्रीय शिक्षा]]></dc:creator>
		<pubDate>Thu, 18 Aug 2022 16:15:53 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[<p>&#8211; सतीश कुमार इक्कीसवीं शताब्दी में शिक्षा का जितना महत्व है, उससे ज्यादा उतना ही महत्व शिक्षा कहाँ से ग्रहण की जा रही हैं उसका भी है। इसलिए जब हम&#8230; </p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: right;">&#8211; सतीश कुमार</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="wp-image-5725 aligncenter" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2022/08/images-2_copy_1200x675-300x169.jpeg" alt="रामकृष्ण परमहंस" width="602" height="339" srcset="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2022/08/images-2_copy_1200x675-300x169.jpeg 300w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2022/08/images-2_copy_1200x675-1024x576.jpeg 1024w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2022/08/images-2_copy_1200x675-768x432.jpeg 768w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2022/08/images-2_copy_1200x675.jpeg 1200w" sizes="auto, (max-width: 602px) 100vw, 602px" /></p>
<p>इक्कीसवीं शताब्दी में शिक्षा का जितना महत्व है, उससे ज्यादा उतना ही महत्व शिक्षा कहाँ से ग्रहण की जा रही हैं उसका भी है। इसलिए जब हम उन महापुरुषों की बात करते हैं जो यूं तो एक साधारण मानव थे, लेकिन उनका कार्य और उनके व्यक्तित्त्व असाधारण और अभय से परिपूर्ण थे। ऐसे महान पुरुषों ने कहाँ से शिक्षा ग्रहण की, उनके गुरु कौन थे यह जानना बहुत ज़रूरी हो जाता है। इसलिए जब हम स्वामी विवेकानंद को याद करते हैं तो उनके गुरु ठाकुर श्री रामकृष्ण परमहंस के जीवन को जानना उतना ही महत्वपूर्ण है।</p>
<p>ठाकुर श्री रामकृष्ण परमहंस का जन्म 18 फरवरी 1836 को बंगाल के हुगली जिले के कमरपुकुर गांव में हुआ, गधाधर उनके बचपन का नाम था। जन्म ऐसे घर में हुआ जहां उनके पिताजी खुदीराम चट्टोपाध्याय ने एक झूठी गवाही ना बोलने की वजह से अपने पुश्तैनी घर को छोड़ना पड़ा था। ऐसी जीवंत शिक्षा और मां चंद्रा देवी द्वारा रामायण महाभारत की कहानियां सुनकर गधाधर बड़े हो रहे थे।</p>
<p>16 साल की आयु में गधाधर अपने बड़े भाई रामकुमार के पास कोलकाता चले गए। गधाधर का मन पुस्तकीय और मात्र जीवन यापन वाली शिक्षा में बिल्कुल नहीं था। इसलिए उन्होंने अपने भाई से एक बार ऐसा कहा- “भाई मात्र रोटी पाने वाली शिक्षा से मैं क्या करूं? बल्कि मैं उस ज्ञान को प्राप्त करना चाहता हूँ जो मुझे हमेशा के लिए संतुष्टि देगा।” आज के समय में जहाँ शिक्षा का स्तर ग्रेड और नौकरी तक रह गया है जबकि शिक्षा मांगती है श्रद्धा, समर्पण और शुद्धता। यह सब विशेषताएं गधाधर में थी। गधाधर को जब दक्षिणेश्वर के एक मंदिर में एक पुजारी के रूप में काम दिया गया तो ऐसे शुद्ध मन और पवित्र विचार वाले गधाधर को मां काली के दर्शन हुए और वह गधाधर से ठाकुर श्री रामकृष्ण बने। वे ना ही कोई बड़े विद्वान थे और ना ही वेद पुराणों के ज्ञाता लेकिन अपने ज्ञान से उन्होंने ईश्वर को भी देखा। और उन्हें श्रद्धा और पवित्रता से अपने कार्य और मार्ग के प्रति ज्ञान प्राप्त हुआ जो उन्होंने चुना था।</p>
<p>आगे चलकर उसी शिक्षा को ठाकुर रामकृष्ण परमहंस ने गुरु-शिष्य परंपरा के माध्यम से अपने शिष्यों को दिया। जब हम शिक्षा की बात करते हैं तो वह ऐसी शिक्षा होनी चाहिए जो हमें बड़े लक्ष्य तक ले कर जाए। ठाकुर रामकृष्ण ने अपने शिष्य विवेकानंद से पूछा कि तुम्हारे जीवन का लक्ष्य क्या है तो स्वामी जी ने जवाब दिया- ‘मुक्ति’। तब ठाकुर ने उन्हें बताया कि तुम्हारा लक्ष्य इतना स्वार्थी कैसे हो सकता है। तुम्हें तो माँ का कार्य करना है। तब स्वामी जी को एक बड़ी दृष्टि देखने को मिली इसलिए शिक्षा वह जो हमें हमारे जीवन को उच्चतम् लक्ष्य तक लेकर जाए।</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="wp-image-5726 aligncenter" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2022/08/vivekananda-ramakrishna-2-300x169.jpg" alt="Ramkrishna " width="568" height="320" srcset="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2022/08/vivekananda-ramakrishna-2-300x169.jpg 300w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2022/08/vivekananda-ramakrishna-2.jpg 640w" sizes="auto, (max-width: 568px) 100vw, 568px" /></p>
<p>ज्ञान सिर्फ पढ़कर विश्वास करने से अर्जित नहीं होता उसके लिए अनुभूति चाहिए। जो ज्ञान पढ़ और सुन रहे हैं उस पर स्वयं चिंतन और अनुभव करने से ज्ञान व्यक्ति को उच्चतम् आदर्शों तक अवश्य ले जा सकता है। ऐसा ठाकुर ने अपने जीवन से सिद्ध किया था। ठाकुर के जीवन से यह भी सीखा जा सकता है कि उन्होंने अपने हर शिष्य को एक जैसी विद्या देकर एक संक्षिप्त रूप में नहीं डाला बल्कि उन्होंने अपने हर शिष्य को, जो जैसा है वैसे उसे उच्चतम ज्ञान देना चाहा। शिक्षा ग्रहण करने के हर किसी के लिए एक जैसा मापदंड नहीं हो सकता तो हर किसी की प्रतिभा को जानने के लिए एक जैसा मापदंड क्यों?</p>
<p>गुरु से शिष्य तक ज्ञान को संप्रेषित करने में जितनी भूमिका गुरु की होती हैं उससे कई अधिक भूमिका शिष्य की भी होती हैं। शिष्य ऐसा होना चाहिए जो अपने गुरु पर पूरी श्रद्धा से विश्वास करें। जब ठाकुर जी का स्वास्थ्य कैंसर के कारण से ठीक नहीं था और वह अपने अंतिम दिनों में थे, तब लोग उनसे बहुत घृणा करने लगे थे, क्योंकि वह खून और पस की उल्टियां करते थे। उस समय भी नरेन उनके साथ थे और उन्होंने ठाकुर का खून और पस भी पिया ताकि कोई उनसे घृणा न करें।</p>
<p>ठाकुर रामकृष्ण परमहंस का जन्म उस काल खंड में हुआ जब भारत परतंत्रता की बेड़ियों में जकड़ा हुआ था और अंग्रेजों ने भारत को गुलाम बनाने के लिए भारतीय शिक्षा को कुचलने का सोचा। सन् 1836 मैकाले ने ‘मिनट ऑन एजुकेशन’ नामक शिक्षा नीति को प्रस्तुत किया। जिसमें भारतीय विचार और संस्कृति को कुचलने का सोचा; मूर्ति पूजा, धर्म, संस्कृति को गलत बताया। लेकिन यह मात्र कोई संयोग नहीं था कि उसी वर्ष ठाकुर रामकृष्ण परमहंस जी का जन्म हुआ। जिन्होंने मैकाले की इस परतंत्र करने वाली शिक्षा नीति को खंडित किया। ठाकुर को न हीं अंग्रेज़ी आती थीं और न ही उनके पास कोई डिग्री थी। लेकिन फिर भी केशव चंद्र सेन जैसे विद्वानों ने उनके चरणों पर बैठकर ज्ञान अर्जित किया।</p>
<p>ठाकुर रामकृष्ण परमहंस के जीवन से प्रेरणा लेते हुए हम यह कह सकते हैं कि शिक्षा मात्र पुस्तकीय ज्ञान तक सीमित नहीं है अपितु ज्ञान तो स्वयं पर लागू करने और अनुभव करने से अर्जित किया जा सकता है, जो हम ठाकुर के जीवन से देख सकते हैं।</p>
<p><strong><span style="color: #ff0000;">ये भी पढ़े:</span></strong> <span style="color: #0000ff;"><strong><a style="color: #0000ff;" href="https://rashtriyashiksha.com/education-philosophy-of-swami-vivekananda-12-january-birth-anniversary-special/" target="_blank" rel="noopener">स्वामी विवेकानंद का शैक्षिक दर्शन</a></strong></span></p>
<p>(लेखक विवेकानंद केन्द्र कन्याकुमारी के उत्तर प्रान्त में विभाग युवा प्रमुख हैं।)</p>
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		<title>पुस्तक समीक्षा : भारतीय शिक्षा मनोविज्ञान के आधार &#8211; लेखक लज्जाराम तोमर</title>
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		<dc:creator><![CDATA[राष्ट्रीय शिक्षा]]></dc:creator>
		<pubDate>Tue, 20 Aug 2019 08:50:15 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[नवीनतम]]></category>
		<category><![CDATA[पुस्तक समीक्षा]]></category>
		<category><![CDATA[bhartiya shiksha ke manovigyanik]]></category>
		<category><![CDATA[child pedagogy]]></category>
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		<category><![CDATA[भारतीय मनोविज्ञान]]></category>
		<category><![CDATA[मनोविज्ञान]]></category>
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					<description><![CDATA[<p> &#8211; देवेन्द्र प्रताप सिंह पुस्तक का नाम : भारतीय शिक्षा मनोविज्ञान के आधार लेखक : लज्जाराम तोमर प्रकाशक : विद्या भारती संस्कृति शिक्षा संस्थान, कुरुक्षेत्र (हरियाणा), Website : www.samskritisansthan.org संस्करण&#8230; </p>
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]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: right;"> &#8211; देवेन्द्र प्रताप सिंह</p>
<p style="text-align: center;">पुस्तक का नाम : <strong>भारतीय शिक्षा मनोविज्ञान के आधार</strong></p>
<p style="text-align: center;">लेखक : लज्जाराम तोमर</p>
<p style="text-align: center;">प्रकाशक : विद्या भारती संस्कृति शिक्षा संस्थान, कुरुक्षेत्र (हरियाणा), Website : www.samskritisansthan.org</p>
<p style="text-align: center;">संस्करण : द्वितीय संस्करण, युगाब्द 5117, विक्रमी संवत् 2072, सन् 2015</p>
<p style="text-align: center;">शिक्षा मनोविज्ञान पर अनेक पुस्तकें उपलब्ध हैं किन्तु भारतीय दृष्टिकोण समाहित करते हुए संभवत: यह प्रथम प्रयास है।</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="alignleft wp-image-573" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2019/08/WhatsApp-Image-2019-08-20-at-10.34.44-208x300.jpeg" alt="पुस्तक समीक्षा: भारतीय शिक्षा और मनोविज्ञान | लेखक लज्जाराम तोमर" width="289" height="417" srcset="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2019/08/WhatsApp-Image-2019-08-20-at-10.34.44-208x300.jpeg 208w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2019/08/WhatsApp-Image-2019-08-20-at-10.34.44.jpeg 638w" sizes="auto, (max-width: 289px) 100vw, 289px" /></p>
<p>प्राय: यह कहा जाता है कि भारतीय दर्शन तथा पाश्चात्य विज्ञान एक दूसरे के निकट आ रहे हैं। भारतीय दर्शन कल्पना पर आधारित नहीं है अपितु यह विज्ञान ही है। कालांतर में प्रयोग की गई वैज्ञानिक पद्धतियाँ विलुप्त हो गई है। किन्तु उनके निष्कर्ष सूत्रों में आज भी उपलब्ध हैं। मनोविज्ञान भारतीय दर्शन का एक वशिष्ट अंग है तथा शिक्षाशास्त्र का प्रमुख विषय भी है। जिस प्रकार ‘रिलीजन’ धर्म का और ‘कल्चर’ संस्कृति का सामानार्थी नहीं है उसी प्रकार लेखक “फिलॉसफी” को दर्शन का सामानार्थी नहीं मानता है। दर्शन बहुआयामी है तथा मनोविज्ञान उसका एक अंग  है।</p>
<p><em>लेखक ने बड़ी स्पष्टता के साथ पाश्चात्य एवं भारतीय मनोविज्ञान की तुलना की है । भारतीय मनोविज्ञान के सूक्षम तथ्यों की सुन्दर विवेचना प्रस्तुत की गई है । शायद पश्चिम के मनोवैज्ञानिक</em><em>,</em><em> लेखक की इस अवधारणा से सहमत न हों कि मानव की मूल प्रकृति आध्यात्मिक है तथा समस्त ज्ञान उसमें अन्तनिर्हित है किन्तु भारतीय मनीषियों ने इस सत्य को प्रतिपादित किया है।</em></p>
<p>संस्कार की अवधारणा मुख्य रूप से भारत की देन है । संस्कारों द्वारा मनुष्य में अन्तर्निहित गुणों को विकसित करने का प्रयास किया जाता है। संस्कारों का अपना महत्व हैं उन्हें बनाए रखने का प्रयास होना चाहिए। लेखक ने संस्कारों के कारक तत्वों में आनुवांशिकता एवं वातावरण के साथ पूर्व जन्म को भी समाहित किया है। इन्हें अनेक भारतीय विद्वानों ने स्वीकार किया इनमें विशेष रूप से श्री अरविन्द प्रमुख है।</p>
<blockquote><p><strong>व्यक्तित्व के विभिन्न प्रकारों तथा चरित्र विकास के विभिन्न आयामों का वर्णन रोचक एवं तथ्यपरक है। लेखक ने विस्तार के साथ ज्ञान प्राप्ति के मार्ग की चर्चा की है तथा मन</strong><strong>, </strong><strong>बुद्धि</strong><strong>, </strong><strong>चित्त का सूक्ष्मता से विवेचन प्रस्तुत किया है। यह भी प्रतिपादित किया गया है कि भारतीय मनोविज्ञान केवल मन एवं व्यवहार तक ही सीमित नहीं है किन्तु वह मन से परे आत्मत्व तक पहुंचता है।</strong></p></blockquote>
<p>सम्पूर्ण विश्व में योग की चर्चा है । आज के तनावपूर्ण जीवन में इसका विशेष महत्व है। पुस्तक में अष्टांगयोग की विवेचना की गयी है। लेखक ने योग को विज्ञान कहा है। योग द्वारा शिक्षा को रुचिकर, सरल, सुगम एवं सार्थक बनाया जा सकता है।</p>
<p>प्रस्तुत पुस्तक शिक्षा मनोविज्ञान के क्षेत्र में वशिष्ट स्थान रखेगी। पुस्तक की विषय वस्तु मौलिक एवं शोधपूर्ण है। यह शिक्षाशास्त्र से जुड़े हुए लोगो के लिए तो उपयोगी है ही अन्य लोगों द्वारा भी पठनीय है। पुस्तक का महत्व इस कारण भी बढ़ जाता है क्योंकि इसके लेखक एक ऐसे संस्थान के मार्गदर्शक रहे है जिसने भारतीय पद्धति से शिक्षा देने का अद्वितीय कीर्तिमान स्थापित किया है।</p>
<p>(लेखक लखनऊ विश्वविद्यालय के कुलपति रहे है।)</p>
<p><a href="https://rashtriyashiksha.com/bal-kendrit/">और पढ़ें : बाल केन्द्रित क्रिया आधारित शिक्षा – 3 (मनोविज्ञान)</a></p>
<p>The post <a href="https://rashtriyashiksha.com/book-review-indian-education-psychology-base-author-lajjaram-tomar/">पुस्तक समीक्षा : भारतीय शिक्षा मनोविज्ञान के आधार &#8211; लेखक लज्जाराम तोमर</a> appeared first on <a href="https://rashtriyashiksha.com">राष्ट्रीय शिक्षा : शिक्षा में समाज प्रबोधन</a>.</p>
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