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	<title>नवाचार Archives - राष्ट्रीय शिक्षा : शिक्षा में समाज प्रबोधन rashtriyashiksha.com</title>
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	<description>सा विद्या या विमुक्तये</description>
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	<title>नवाचार Archives - राष्ट्रीय शिक्षा : शिक्षा में समाज प्रबोधन rashtriyashiksha.com</title>
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		<title>भारतीय शिक्षा की सनातन दृष्टि</title>
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		<dc:creator><![CDATA[राष्ट्रीय शिक्षा]]></dc:creator>
		<pubDate>Wed, 24 Jul 2024 06:51:39 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[नवाचार]]></category>
		<category><![CDATA[लेख]]></category>
		<category><![CDATA[bhartiya shiksha]]></category>
		<category><![CDATA[education]]></category>
		<category><![CDATA[hindi]]></category>
		<category><![CDATA[Rashtriya shiksha]]></category>
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					<description><![CDATA[<p> ✍ शिरोमणि दुबे कोई भी देश बदलाव-विकास के रास्ते पर सरपट दौड़ता है जब उस देश की शिक्षा व्यवस्था में उस देश के साहित्य में युवाओं को संभालने-संवारने के बीज&#8230; </p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: right;"> <img src="https://s.w.org/images/core/emoji/17.0.2/72x72/270d.png" alt="✍" class="wp-smiley" style="height: 1em; max-height: 1em;" /> शिरोमणि दुबे</p>
<p><img fetchpriority="high" decoding="async" class="alignnone wp-image-7824" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2024/07/hindi-300x169.jpg" alt="" width="1331" height="750" srcset="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2024/07/hindi-300x169.jpg 300w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2024/07/hindi-1024x576.jpg 1024w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2024/07/hindi-768x432.jpg 768w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2024/07/hindi-1536x864.jpg 1536w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2024/07/hindi.jpg 1920w" sizes="(max-width: 1331px) 100vw, 1331px" /></p>
<p style="text-align: justify;">कोई भी देश बदलाव-विकास के रास्ते पर सरपट दौड़ता है जब उस देश की शिक्षा व्यवस्था में उस देश के साहित्य में युवाओं को संभालने-संवारने के बीज निहित होते हैं। आज शिक्षा के क्षेत्र में जो चुनौतियाँ दिखाई देती हैं उनको भी आमंत्रण हमने ही दिया है। यदि 15 अगस्त 1947 को देश ने गरजकर बोल दिया होता कि नर्सरी से सर्जरी तक तथा ओलम से अनुसंधान तक परायी भाषा के चलन को समाप्त किया जाता है। मीर कासिम से लेकर जिन्ना जैसे लीगियों का झूठ की बुनियाद पर गढे़ गये इतिहास के पाठों को हटाने का फरमान सुना दिया होता तो देश का चित्र और चरित्र बहुत उजला होता बहुत चमकदार होता। हमने संकल्प लिया है कि वर्तमान में अभारतीयता को मस्तिष्क में ठूंस-ठूंस कर भरने वाले शिक्षा के ढर्रे में आंशिक नहीं आमूलचूल परिवर्तन किया जायेगा और शिक्षा का ऐसा स्वदेशी प्रादर्श-प्रतिमान खड़ा करेंगे जिसके द्वारा ऐसी युवा पीढ़ी का निर्माण हो सके जो आत्म विकास तथा विश्व मानवता के कल्याण में अपनी सार्थक भूमिका निभा सके। ऐसे ही विरल, विरले व्यक्तित्वों को गढ़ने का कार्य ही शिक्षा का वास्तविक हेतु है। किसी साहित्यकार ने लिखा है-</p>
<p style="text-align: center;"><strong>है समय नदी की धार कि अक्सर सब बह जाया करते हैं।</strong></p>
<p style="text-align: center;"><strong>है समय बड़ा तूफान प्रबल पर्वत भी झुक जाया करते हैं।।</strong></p>
<p style="text-align: center;"><strong>अक्सर दुनिया के लोग समय में चक्कर खाया करते हैं।</strong></p>
<p style="text-align: center;"><strong>पर कुछ ऐसे भी होते जो इतिहास बनाया करते हैं।।</strong></p>
<p style="text-align: justify;">जीवन का सही अर्थ क्या है? जीवन का अभीष्ट क्या है? जीवन के गहरे गूढ़ रहस्यों को शिक्षा उद्घाटित करती है। शिक्षक कक्षा में प्रश्न उठाते है बताओ! आप में से स्वर्ग कौन-कौन जाना चाहता है? नरेन्द्र को छोड़कर सभी छात्र हाथ खड़ा करते हैं। शिक्षक नरेन्द्र से पूछते है- क्या तुम नर्क में जाना चाहते हो? नरेन्द्र उत्तर देते हैं- गुरूवर! न मैं स्वर्ग में जाना चाहता हूँ और न नर्क में जाना चाहता हूँ, मैं स्वर्ग को धरती पर उतार लाना चाहता हूँ। मेरे जीते जी धरती कैसे स्वर्ग बन सकती है यही सनातन जीवन दृष्टि एवं विवेक दृष्टि निर्माण करना शिक्षा का वास्तविक लक्ष्य है। राष्ट्र बलिदान मांगता है। राष्ट्र के नवनिर्माण के लिए त्याग करने वाले बलिदानी चाहिए। वही देश दुनिया में टिक सके जिनके नागरिकों का अपने देश के लिए जीने का जज्बा कायम रहा। मैं इतिहास की क्रूर सच्चाई को जरूर उद्घाटित करना चाहता हूँ। जब-जब भारत में सुभद्राएं सो जाया करतीं हैं तब-तब किसी अभिमन्यु को मरना पड़ता हैं, किसी महापुरूष को दुनिया से जाना पड़ता है। इसीलिए कन्हैयालाल सेठिया लिखते है-</p>
<p style="text-align: center;"><strong>किसी के स्वर्ण पर हमने नहीं अधिकार चाहा है।</strong></p>
<p style="text-align: center;"><strong>न सीमा पर हमारे देश ने विस्तार चाहा है।।</strong></p>
<p style="text-align: center;"><strong>पर यह बात कहने में न चूके है न चूकेंगे।</strong></p>
<p style="text-align: center;"><strong>लहू देंगे मगर इस देश की मिट्टी नहीं देंगे।।</strong></p>
<p style="text-align: justify;">भारत इसलिए बड़ा नहीं है कि यहाँ आकाश की ऊँचाई वाला हिमालय है। भारत इसलिए भी महान नहीं है कि यहाँ अतल गहराई वाला सागर है। यहाँ पतित पावनी गंगा बहती है इतना भर नहीं है। भारत इसलिए जगत का सिरमौर नहीं है कि यहाँ दुनिया का सबसे बड़ा जनतन्त्र है। इस सबसे इतर देश महान तब बनता है जब कोई विष्णुगुप्त शिखा में गांठ बांधकर ललकारता है सुनो घनानंद, “शिक्षक साधारण नहीं होता, सृजन और विनाश उसकी गोद में खेलते है।” उसे सत्ता की कोई चाह नहीं होती। कलश-कगूरे नुमा प्रासाद-परकोटे उसकी नियति का हिस्सा नहीं बनते। सदियों से चलती आयी आचार्य परंपरा देश को आश्वासन है, उस अध्यात्म का जिसमें राष्ट्र के चिरंजीवी होने का स्वर अनंतकाल तक सुना जाता रहेगा-</p>
<p style="text-align: center;"><strong>ध्येय की देवी मगन हो बोलती है।</strong></p>
<p style="text-align: center;"><strong>पुण्य के प्रासाद का पट खोलती है।।</strong></p>
<p style="text-align: center;"><strong>त्याग के पथ पर मशालों सा जिया जो।</strong></p>
<p style="text-align: center;"><strong>लेखनी भी जय उसी की बोलती है।।</strong></p>
<p style="text-align: justify;">आचार्य कोई पद नहीं है, पदवी भी नहीं है। वह ओढ़ा हुआ आवरण-अलंकरण भी नहीं है। वह टीचर-मास्टर तो कतई नहीं है। आचार्य उपदेशक भी नहीं है। “आचरति इति आचार्यः” आचरण का नाम आचार्य है। जो अपने जीवन से सिखाता है, वह आचार्य है। हमारे देश में आचार्यों की दो धाराएं प्रचलित रही है। पहली आचार्य द्रौण की परंपरा है जो सिंहासनों से बंधकर साम्राज्यों की चौखट पर नाक रगड़ने के लिए विवशश-परवश दिखाई देती है। दूसरी चाणक्य की परंपरा है जो सत्ता सिंहासनों को ठोकर मारकर सामान्य परिवार में जन्मे चन्द्रगुप्त को मगध का साम्राज्य सौप देती है। अनादिकाल से चलती आयी चाणक्य परंपरा के खरल में कुटे हुए संन्यासी सूरमा देश के लिए अपना सर्वोत्तम न्योछावर करने लिए आतुर दिखाई देते है। समाधियां उन्हीं की महकती है जो समिधा बनकर देश के लिए खर्च हो जाते हैं-</p>
<p style="text-align: center;"><strong>इस अर्पण में कुछ और नहीं केवल उत्सर्ग छलकता है।</strong></p>
<p style="text-align: center;"><strong>मैं दे दूं और न फिर कुछ लूं इतना ही तरल छलकता है।।</strong></p>
<p style="text-align: justify;">महापुरूष पैदा नहीं होते, वे तो आचार्यों-उपाध्यायों के चरणों में बैठकर महामानव बनते हैं। लेकिन देश की विडम्बना यह है कि आज वे आचार्यकुल दिखाई नहीं देते हैं। सृजन के संस्थान सहमें से लगते है। चेतना की शताब्दी का स्वर कहीं गहरे मौन में खो गया प्रतीत होता है। आज विश्वविद्यालयों को एक अदद वशिष्ठ की तलाश हो जो धनुर्धारी राम दे सके। सान्दीपनी कुल की प्यास है जहाँ अध्यात्म के तपोवन का कृष्ण कुरूक्षेत्र में अर्जुन को धर्मयुद्ध का पाठ सिखाता है। मेरे मन में एक प्रश्न उमड़ रहा है, कहीं ऐसा न हो कि शिक्षा का राहुकाल पूरे शिक्षा तन्त्र को ही निगल जाये। इसलिए शिक्षा में पसरे पडे़ वामपंथियों तथा विदेशी बिरादरियों से गलबहियां करने वाले कथित सैक्युलर ईकोसिस्टम को ध्वस्त करना होगा। अन्यथा-</p>
<p style="text-align: center;"><strong>निकले थे कहां जाने के लिए पहुँचे हैं कहां मालूम नहीं।</strong></p>
<p style="text-align: center;"><strong>अब अपने भटकते कदमों को मंजिल का निशां मालूम नहीं।।</strong></p>
<p><img decoding="async" class="alignnone wp-image-7825" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2024/07/atiti-devo-bhava-300x225.jpg" alt="" width="1171" height="878" srcset="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2024/07/atiti-devo-bhava-300x225.jpg 300w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2024/07/atiti-devo-bhava-1024x769.jpg 1024w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2024/07/atiti-devo-bhava-768x577.jpg 768w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2024/07/atiti-devo-bhava.jpg 1200w" sizes="(max-width: 1171px) 100vw, 1171px" /></p>
<p style="text-align: justify;">समय कम है, कार्य बहुत बड़ा है। चुनौतियां स्वीकार करने से ही जीवन पुष्प महकता है तथा सदियां भी उसी का गुणगान करती हैं जो समाज का जीवनपंथ बुहारनें में खुद को खपा देते हैं। अन्यथा कविवर नीरज बार-बार याद आयेंगे-</p>
<p style="text-align: center;"><strong>जो लूट ले कहार दुल्हन की पालकी।</strong></p>
<p style="text-align: center;"><strong>हालात यही है आज कल हिन्दुस्थान की।</strong></p>
<p style="text-align: center;"><strong>कारवां गुजर गया गुवार देखते रहे।</strong></p>
<p style="text-align: center;"><strong>हम खड़े-खडे़ बहार देखते रहे।</strong></p>
<p style="text-align: center;"><strong>उम्र के चढ़ाव का उतार देखते रहे।।</strong></p>
<p style="text-align: justify;">अन्ततः अंतर्मन की गहराई से आप से बात करना चाहता हूँ। आज भी माँ की आंखां में आंसू है। एक वक्त था जब माँ हाथ में प्लेट लेकर घूमती थी, मेरा छोरा खाता नहीं है। अब स्थितियां बदल गई है, मेरा बेटा खिलाता नहीं है। ये स्थितियां स्पष्ट संकेत दे रही है कि हमारे समाज में करूणा का स्त्रोत कहीं सूखता जा रहा है। भारतीय दर्शन में मातृदेवो भवः, पितृदेवो भवः, अतिथिदेवो भवः की परंपरा रही है। हम घर के बाहर अपने मित्रों से खूब बतियाते है, घण्टों बातें करते है। लेकिन जब घर में आते है माँ इंतजार कर रही होती है। मेरा बेटा ऑफिस से आया है, बाजार से आया है, दुकान से आया है। मेरे पास बैठेगा, मुझसे बात करेगा। बेटा घर में आता तो है लेकिन स्नान करता है, टी. वी. देखते हुए भोजन करता है और बेडरूम में चला जाता है। माँ सोचती है कि बेटा थक गया होगा। कल ऑफिस से आने के बाद मेरे पास आयेगा। लेकिन माँ के इंतजार की घड़ियां कभी समाप्त नहीं होती, क्योंकि बेटे के पास वक्त नहीं है। वास्तव में ये हमारे देश के संस्कार नहीं है। हमारे देश की संस्कृति भी नहीं है।</p>
<p style="text-align: justify;">जिन परिसरों में, विश्वविद्यालयों में ‘स्व’ का संगीत बजना चाहिए, आज भी वहां पर आजादी-आजादी के नारे लगते हैं। ए.एम.यू. से जे.एन.यू. तक “अफजल हम शर्मिदा है, तेरे कातिल जिन्दा है” जैसे श्लोगन सुनाई देते है। तब किसी साहित्यकार की पीड़ा बरबस छलक जाती है-</p>
<p style="text-align: center;"><strong>लेखनी के पास हस्ताक्षर नहीं है।</strong></p>
<p style="text-align: center;"><strong>यक्ष प्रश्नों के उत्तर नहीं है।</strong></p>
<p style="text-align: center;"><strong>अग्निगर्भा कोख बंध्या लग रही है।</strong></p>
<p style="text-align: center;"><strong>अक्षरों के बंश में दिनकर नहीं है।।</strong></p>
<p style="text-align: justify;">बंधुओं, आज देश को ऐसे ही दिनकरों की तलाश है। तो घटाटोप अधियारों में उजाला बिखेर सकें।</p>
<p style="text-align: justify;">(लेखक विद्या भारती मध्यभारत प्रान्त के प्रदेश सचिव है।)</p>
<p><strong>और पढ़ें : </strong><strong><span style="color: #0000ff;"><a style="color: #0000ff;" href="https://rashtriyashiksha.com/education-reforms-needed-curriculum-awaits-change/" target="_blank" rel="noopener">शिक्षा में सुधारों की आवश्यकता – परिवर्तन की प्रतीक्षा में पाठ्यक्रम</a></span></strong></p>
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		<title>महान साहित्यकार प्रेमचन्द का साहित्य दर्शन भाग – 2</title>
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		<dc:creator><![CDATA[राष्ट्रीय शिक्षा]]></dc:creator>
		<pubDate>Mon, 02 Aug 2021 05:44:18 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[कुलदीप मेहंदीरत्ता]]></category>
		<category><![CDATA[नवाचार]]></category>
		<category><![CDATA[व्यक्तित्व]]></category>
		<category><![CDATA[Bhartiya Education]]></category>
		<category><![CDATA[indian education]]></category>
		<category><![CDATA[Munshi Prem chand]]></category>
		<category><![CDATA[Rashtriya shiksha]]></category>
		<category><![CDATA[vidya bharati]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>&#8211; कुलदीप मेहंदीरत्ता महात्मा गांधी के जीवन दर्शन से प्रभावित प्रेमचन्द : महात्मा गाँधी के प्रभाव से न केवल भारतीय बल्कि पाश्चत्य जगत के लेखक और विद्वान प्रभावित हुए। प्रेमचन्द&#8230; </p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: right;">&#8211; कुलदीप मेहंदीरत्ता</p>
<p style="text-align: justify;"><strong><img decoding="async" class="wp-image-3793 alignleft" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2021/08/Presentation1-300x169.jpg" alt="" width="904" height="509" srcset="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2021/08/Presentation1-300x169.jpg 300w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2021/08/Presentation1-1024x576.jpg 1024w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2021/08/Presentation1-768x432.jpg 768w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2021/08/Presentation1.jpg 1280w" sizes="(max-width: 904px) 100vw, 904px" />महात्मा गांधी के जीवन दर्शन से प्रभावित प्रेमचन्द </strong>: महात्मा गाँधी के प्रभाव से न केवल भारतीय बल्कि पाश्चत्य जगत के लेखक और विद्वान प्रभावित हुए। प्रेमचन्द के साहित्य के रचाव का काल लगभग वही (1906-36) है जिस समय महात्मा गाँधी ने सम्पूर्ण भारत को अंग्रेजों के विरुद्ध आंदोलित कर दिया था। एक परतंत्र देश का विचारशील व्यक्ति भला कैसे अपने युग की महान घटनाओं की अवहेलना कैसे कर सकता है। प्रेमचन्द पर गाँधी जी के सत्य, अहिंसा, अस्तेय, हृदय परिवर्तन आदि तत्वों और असहयोग तथा सविनय अवज्ञा आंदोलनों का प्रभाव स्पष्ट देखा जा सकता है। प्रसिद्ध साहित्यकार डॉ. कमल किशोर गोयनका कहते हैं कि “गांधी जी के स्वराज्य आंदोलनों, घटनाक्रमों तथा विचारों ने उनकी अनेक कहानियों की आधारभूमि तैयार की है। प्रेमचंद हिंदी के एकमात्र ऐसे कहानीकार हैं जिनकी लगभग 25 कहानियां प्रत्यक्षत: गांधी-दर्शन एवं गांधी-आंदोलनों आदि पर मिलती हैं और वे 1921 से उनके अंतिम समय तक मिलती हैं। इन कहानियों में गांधी-संघर्ष एवं गांधीवाद की जीवंत अनुभूतियां हैं जो एक प्रकार से प्रेमचंद को गांधीवाद का साहित्यिक संस्करण बना देती है”।</p>
<p style="text-align: justify;">“प्रेमचंद और गांधी में पश्चिमी सभ्यता, औद्योगीकरण, ईसाईकरण, अंग्रेजी साम्राज्यवाद, ग्राम्य-चेतना आदि में वैचारिक एकरूपता दिखाई देती है और प्रेमचंद कारखाने की स्थापना के विरुद्ध सूरदास द्वारा गांव की जमीन की रक्षा का संघर्ष चित्रित करते हैं जो गांधी के समान ही धर्म और नीति का सहारा लेता है। इस प्रकार सूरदास का संघर्ष स्वभूमि, स्वराज्य तथा स्वसंस्कृति की रक्षा का संघर्ष बनता है और ‘रंगभूमि’ को महाकाव्यात्मक उपन्यास बना देता है। प्रेमचंद का ‘कर्मभूमि’ (सितंबर, 1932) भी गांधी जी की स्वराज्य-दृष्टि और उनके व्यावहारिक कार्यक्रमों पर आधारित है। इस पर गांधी का नमक-कर कानून तोड़ना, नेताओं की गिरफ्तारी, गांधी-इर्विन पैक्ट, किसानों का लगान-बंदी आंदोलन आदि घटनाओं का सीधा प्रभाव है”।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>भविष्यमूलक दूरदर्शी प्रेमचन्द</strong> : उन्होंने स्वतन्त्रता पश्चात राजनीतिक परिवर्तनों की सम्भावित कल्पना कर ली थी और वे सुराज और स्वराज्य को लेकर बहुत आशावान नहीं दिखाई पड़ते थे। <em>अपने प्रसिद्ध उपन्यास ‘गबन’</em> में देवीदीन नामक पात्र के माध्यम से प्रेमचन्द कहते हैं कि &#8220;जब तुम सुराज का नाम लेते हो, उसका कौनसा स्वरूप तुम्हारी आँखों के सामने आता है? तुम भी बड़े- बड़े तलब लोगे, तुम भी अंग्रेजों की तरह महलों में रहोगे, पहाड़ों की हवा खाओगे, अंग्रेजी ठाठ बनाये घूमोगे। इस सुराज से देश का क्या कल्याण होगा। तुम्हरी और तुम्हारे भाई बन्धुओं की जिन्दगी भले आराम और ठाठ से गुजरे&#8230;&#8230;अभी तुम्हारा राज नहीं है, तब तो तुम भोग-विलास पर इतना मरते हो, जब तुम्हारा राज हो जायेगा, तब तो तुम गरीबों को पीस कर पी जाओगे।&#8221;</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>सबसे पहले मानवतावादी हैं प्रेमचन्द : </strong></p>
<p style="text-align: justify;">प्रेमचन्द को ‘वाद’ के दायरे में घसीटने की बहुत कोशिश की जाती है, लेकिन वे सबसे पहले मानवतावादी हैं। महेंद्र भटनागर लिखते हैं कि “ प्रेमचंद मानवतावादी लेखक थे। गांधीवादी या साम्यवादी सिद्धान्तों से उन्होंने सीधी प्रेरणा ग्रहण नहीं की। उन्होंने जो कुछ जाना, सीखा, लिया; वह सब अपने अनुभव मात्र से। इसीलिए उनके साहित्य में अपरास्त शक्ति है। गांधीवाद और साम्यवाद कोई मानवता के विरोधी नहीं हैं; अतः प्रेमचंद के विचारों में जगह-जगह दोनों की झलक मिल जाती है। लेकिन उनका मानवतावाद सर्वत्र उभरा दीखता है”। प्रेमचन्द को मार्क्सवाद के खेमे की ओर ले जाने के प्रयासों पर चंदन श्रीवास्तव अपनी समीक्षा में लिखते हैं कि ‘खुर्शीद अनवर ने 11 अगस्त 2013 के अपने ‘प्रेमचंद को साम्यवादी बनाने की कवायद’ शीर्षक लेख ध्यान दिलाया कि बेशक यह पंक्ति प्रेमचंद की है कि ‘धन्य है वह सभ्यता जो मालदारी और व्यक्तिगत संपत्ति का अंत कर रही है और जल्दी ही या देर से दुनिया उसका पदानुसरण करेगी।’ ‘लेकिन प्रेमचंद को साम्यवादी ठहराने के लिए इतना कहना काफी नहीं’।</p>
<p style="text-align: justify;">चंदन श्रीवास्तव लिखते है कि “मार्क्सवाद से प्रेमचंद के अलगाव को दिखाने के लिए गोयनका ने तर्क दिया कि “प्रेमचंद ने ‘हंस’ के उसी अंक में 1936 में प्रकाशित एक लेख में लंदन से आया घोषणा-पत्र भी प्रकाशित किया है। इसमें एक भी शब्द, एक भी उद्देश्य का संबंध मार्क्सवाद से दूर तक नहीं है। इस घोषणा-पत्र में चार प्रमुख उद्देश्य हैं- सांस्कृतिक और सामाजिक उत्थान, भारतीय स्वाधीनता, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और इंडो-रोमन लिपि की स्वीकृति। प्रेमचंद ने अंतिम को अस्वीकार करते हुए लिखा कि शेष तीन तो उन्हें आदर्श ही रहे हैं, पर इनमें कहीं भी मार्क्सवाद नहीं है और स्पष्ट है कि प्रेमचंद ने समर्थन इसलिए किया कि वे तीस-पैंतीस वर्षों से इन्हीं उद्देश्यों को लेकर चल रहे थे और वे स्वराज और भारतीय आत्मा की रक्षा के ही उपकरण थे”।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>धर्म के कर्मकांड और जाति विभेद आधारित स्वरूप के विरोधी : </strong>प्रेमचन्द सर्व-धर्म स्वभाव के समर्थक थे, इसलिए उनके विचारों में सभी धर्मों की स्वीकार्यता का भाव दिखाई पड़ता है। अपने पात्रों के चयन से लेकर उनके चरित्र-चित्रण तथा सम्वादों में ये तत्त्व सर्वत्र दर्शित होते हैं। उनके लिए “राष्ट्रीयता की पहली शर्त वर्ण-व्यवस्था, ऊँच-नीच के भेद और धार्मिक पाखण्ड की जड़ खोदना है”। प्रेमचन्द लिखते हैं कि “हम जिस राष्ट्रीयता का स्वप्न देख रहे हैं उसमें जन्मजात वर्णों की तो गंध तक न होगी, वह हमारे श्रमिकों और किसानों का साम्राज्य होगा, जिसमें न कोई ब्राह्मण होगा, न कोई हरिजन, न कायस्थ, न क्षत्रिय। उसमें सभी भारतवासी होंगे, सभी बर्कहमान होंगे या सभी हरिजन”। वास्तव में हमारे देश का सामाजिक रूप से जितना नुकसान जाति विभेद ने किया है शायद ही किसी अन्य ने किया हो। प्रेमचन्द इस मायने में सही प्रगतिशील हैं।</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone wp-image-3792" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2021/08/vvih3e28_munshi-premchand-650_625x300_31_July_20-300x185.jpg" alt="" width="992" height="612" /></p>
<p style="text-align: justify;"><strong>प्रेमचन्द के लेखन में स्त्री</strong><strong>, कृषक मजदूर और दलित (सामाजिक त्रिकोण) भावनाओं  की अभिव्यक्ति  :  </strong>नीरज अपने लेख प्रेमचंद और राष्ट्रवाद में लिखते हैं कि “प्रेमचन्द के पूरे कथा साहित्य में एक त्रिकोण उभर कर आता है, जिसके तीनों छोर पर क्रमशः स्त्री, दलित और किसान/मजदूर हैं। प्रेमचन्द के सम्पूर्ण साहित्य, चाहे वह कहानी हो या उपन्यास, सभी में किसानों/मजदूरों का दुःख-दर्द व उसकी अभिव्यक्ति प्रमुखतया हुई है”। आदि से अंत तक कृषक जीवन के अभाव को चित्रित करता उनका महाकाव्यात्मक उपन्यास ‘गोदान’ समस्त भारत के ग्राम जीवन, विषम स्त्री जीवन, हरिजन व्यथा, पूंजीवादी सूदखोरी के भावपूर्ण चित्रण में सक्षम है इसलिए कालजयी रचनाओं की श्रेणी में आता है। हरिजन व्यथा को केंद्र में रखकर उनकी कुछ कहानियाँ (ठाकुर का कुआँ, मंदिर, कफन, सद्गति) और कुछ उपन्यास (रंगभूमि, गोदान) तत्कालीन सामाजिक दुर्दशा और पतन का चित्रण करते हैं। ‘यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः’ के देश में नारी की दारुण स्थिति से प्रेमचन्द ने निरंतर मुठभेड़ की है ।</p>
<p style="text-align: justify;">प्रश्न ये उठता है कि क्या शोषित मजदूरों, किसानों, कामगारों, भूमिहीनों, पीड़ित महिलाओं और निर्धनों की बात करना क्या किसी एक विचार अथवा वाद का विशेषाधिकार है? क्या यह मानवतावाद का क्षेत्र नहीं है? क्या कोई भी सहृदयी व्यक्ति किसी मानव की ऐसी स्थिति देख कर द्रवित नहीं होगा? मानव को छोड़िये हमारी संस्कृति और हमारे परिवार में तो कीड़ी मर जाये तो माता उस पाप की मुक्ति के लिए कितना उद्योग करती हैं, इस बात से हम सब भली भांति परिचित हैं। प्रेमचन्द वाद से बहुत ऊपर हैं, उन पर वैचारिक वाद का ठप्पा लगाना उनकी साहित्यिक महत्ता का उचित मूल्यांकन नहीं हैं। उनका विश्लेष्ण एक सच्चे मानवतावादी, संस्कृति और सभ्यता निष्ठ, आदर्श, साहित्यकार के रूप में किया जाना अपेक्षित है।</p>
<p style="text-align: justify;">(लेखक चौधरी बंसीलाल विश्वविद्यालय, भिवानी (हरियाणा) में राजनीति शास्त्र के प्रोफेसर और विभागाध्यक्ष है।)</p>
<p>और पढ़ें : <strong><span style="color: #003366;"><a style="color: #003366;" href="https://rashtriyashiksha.com/literature-philosophy-of-the-great-writer-premchand/" target="_blank" rel="noopener">महान साहित्यकार प्रेमचन्द का साहित्य दर्शन भाग – 1</a></span></strong></p>
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		<title>सांस्कृतिक नेतृत्व तैयार करने का अभिनव प्रयोग है वेदविज्ञान गुरुकुलम्</title>
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		<dc:creator><![CDATA[राष्ट्रीय शिक्षा]]></dc:creator>
		<pubDate>Thu, 08 Aug 2019 11:43:57 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[नवाचार]]></category>
		<category><![CDATA[नवीनतम]]></category>
		<category><![CDATA[श्री विजय नड्डा]]></category>
		<category><![CDATA[Rashtriya shiksha]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>&#8211; विजय नड्डा स्वास्थ्य लाभ हेतु दो सप्ताह के लिए &#8216;प्रशांत कुटीर&#8217; बंगलोर  में रहना हुआ । प्रशांत कुटीर में शुक्रवार को छुट्टी जैसा माहौल रहता है । शुक्रवार को&#8230; </p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: right;"><img loading="lazy" decoding="async" class=" wp-image-539 aligncenter" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2019/08/gurukul_3224728_835x547-m-300x197.jpg" alt="" width="896" height="588" srcset="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2019/08/gurukul_3224728_835x547-m-300x197.jpg 300w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2019/08/gurukul_3224728_835x547-m-768x503.jpg 768w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2019/08/gurukul_3224728_835x547-m.jpg 835w" sizes="auto, (max-width: 896px) 100vw, 896px" />&#8211; विजय नड्डा</p>
<p>स्वास्थ्य लाभ हेतु दो सप्ताह के लिए &#8216;प्रशांत कुटीर&#8217; बंगलोर  में रहना हुआ । प्रशांत कुटीर में शुक्रवार को छुट्टी जैसा माहौल रहता है । शुक्रवार को कहीं आस-पास घूमने की योजना बना ही रहे थे कि श्री श्रीनिवास मूर्ति जी का चेन्नलहल्ली आने का आग्रह ध्यान आया । बस फिर क्या था! चेन्नलहल्ली जाने का कार्यक्रम बन गया । सौभाग्य से गुरुकुल की आत्मा और वर्तमान में प्रशांत कुटीरम में स्थित स्वामी विवेकानन्द विश्वविद्यालय के उपकुलपति डॉ रामचंद भट्ट जी की कार में ही गुरुकुल तक की यात्रा करने का सुअवसर मिल गया । और इस कारण उनके साथ गुरुकुल और गुरुकुल के सम्बद्ध में उनकी कल्पना को लेकर कुछ चर्चा-वार्ता भी हो गयी । वेद विज्ञान गुरुकुलम् प्रकल्प और वहां का प्राकृतिक दृश्य देख कर मन आनंदित हो गया । प्राचीन गुरुकुल का दृश्य ही आँखों के सामने साकार दिख जाता है यहां! देश की समस्याओं का रोना-धोना, उनके लिए नेताओं या प्रशासनिक अधिकारियों को दोषी ठहरा कर अपना आक्रोश निकाल लेना एक बात है । यह आज सहजक्रम है भी लेकिन भारत के सुखद भविष्य के लिए अपने आप को बीज में  बोने वाले, अपना रक्त-पसीना बहाने वाले विरले ही होते हैं । ऐसे ही देवदुर्लभ लोग यहां पर साधनारत हैं ।</p>
<p><strong>प्रकृति की गोद में बसा है आश्रम-</strong> बंगलोर से लगभग 50 किलोमीटर दूर चेन्नलहल्ली गांव में मेट्रो सिटी की भागदौड़ व आपाधापी से दूर एकांत में नए भारत और सम्पूर्ण विश्व के लिए सांस्कृतिक नेतृत्व गढ़ने का एक अभिनव प्रयोग चल रहा है । सम्पूर्ण भारत से लगभग 35 युवक यहां स्वयं को अध्यात्म और संस्कृति में रंग रहे हैं । बारह शिक्षक इन्हें अनेक विषयों में पारंगत कर रहे हैं । जनसेवा ट्रस्ट बंगलोर द्वारा प्रचार प्रसिद्धि से दूर धैर्यपूर्वक यह साहसिक प्रयोग लगभग दो दशकों से अर्थात सन् 1997 से चल रहा है । साहसिक प्रयोग इस अर्थ में है कि यहां औपचारिक पढ़ाई, परीक्षा व प्रमाण पत्र आदि कुछ भी नहीं  । इसके साथ ही भविष्य में रोजी-रोटी की भी कोई गारन्टी नहीं रहती है । अर्थात् यहां अध्ययन केवल और केवल आत्मविकास के लिए चलता है जीविका मात्र के लिए कतई नहीं । यह अलग बात है कि अगर आत्मविकास हो गया तो रोजी रोटी तो क्या सारी सृष्टि पीछे दौड़ पड़ती है । हाँ इतना धैर्य और आत्म्विश्वास अवश्य चाहिए । गुरुकुलम् में व्याकरण और वेदांत का सात वर्षीय कोर्स चलता है । हमारे प्राचीन शास्त्र वेद, गीता, रामायण, पुराणों व उपनिषद का पठन और कण्ठस्थीकरण चलता है । ऊँचे-ऊँचे नारियल के पेड़, छोटे-2 से कुटियानुमे कमरे तथा संन्यासी वेश में छात्र कुल मिलाकर प्राचीन गुरुकुल का दृश्य आँखों के सामने साकार हो जाता है । इस परिसर में वेदविज्ञान गुरुकुलम् के अतिरिक्त औपचारिक शिक्षा दे रहे दो अन्य शिक्षण संस्थाएं एक हाई स्कूल तथा जमा दो का आवासीय विद्यालय भी चल रहे हैं । यह ट्रस्ट आधुनिक मैत्रयी व गार्गी तैयार करने के लिए लड़कियों के लिए ऐसा ही गुरुकुल &#8216;मैत्रयी&#8217; नाम से मंगलोर के पास चला रहा है ।</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class=" wp-image-540 aligncenter" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2019/08/Parmarth4-300x214.jpg" alt="" width="831" height="593" srcset="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2019/08/Parmarth4-300x214.jpg 300w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2019/08/Parmarth4-768x549.jpg 768w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2019/08/Parmarth4-1024x732.jpg 1024w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2019/08/Parmarth4.jpg 1199w" sizes="auto, (max-width: 831px) 100vw, 831px" /></p>
<p><strong>आधुनिक चाणक्य कुलपति डॉ. रामचन्द भट्ट :</strong> किसी भी प्रकल्प या संस्था की सफलता उसके पीछे किसी व्यक्ति की साधना और दूरदृष्टि रहती है । ऐसे ही आधुनिक चाणक्य दिखते हैं डॉ. रामचंद्र भट्ट । अनेक भाषाओं के ज्ञाता, राष्ट्रीय अंतर्राष्ट्रीय सम्मानप्राप्त डॉ. रामचंद्र भट्ट जनसेवा ट्रस्ट द्वारा चलाये जा रहे शिक्षण संस्थाओं के प्रमुख हैं । कुछ समय पहले ही प्रशांत कुटीरम् में चल रहे स्वामी विवेकानन्द शिक्षण एवम् अनुसन्धान विश्वविद्यालय के उपकुलपति बनाये गए हैं । लेकिन विश्वविद्यालय में इनका कार्यालय किसी ऑफिस जैसा नहीं बल्कि कार्यालय से अधिक क्लास रूम ही अधिक लगता है । बात करने पर बोले कि आज कुलपति का काम अकादमिक (शैक्षिणक) से अधिक फाइल क्लियर करना ही अधिक हो गया है । वास्तव में यह कार्य रजिस्ट्रार का होता है । उपकुलपति होने के बाद भी ये पढाने में ही अधिक समय लगाते हैं । साधारण सी कार में ये प्रतिदिन गुरुकुल से ही यहां आते हैं । और गुरुकुल में भी ये एक साधारण से कमरे में रहते हैं । सज्जनता और सादगी की इस मूर्ति को मिलकर मन में विचार आया कि हमारे शिक्षा जगत को पद से नहीं बल्कि अपने चरित्र और व्यवहार से प्रेरणा देने वाले महानुभाव कब बिभूषित करेंगे? आपकी प्रेरणा का स्रोत क्या है? यह पूछने पर बोले कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का स्वयंसेवक हूँ । देश व समाज की निश्वार्थ व पूरे मन से सेवा की प्रेरणा संघ से ही मिली है ।</p>
<p><strong>कठोर शिक्षण से निखरते हैं युवा :</strong> गुजरात के सोमनाथ से कर्मेश व हरियाणा से कमल ने उत्साहपूर्वक सारे परिसर में घुमाया । उन्होंने बताया कि आश्रम में कठोर दिनचर्या का पालन करना होता है । सुबह चार बजे जगने से लेकर रात दस बजे तक अनेक विषयों का औपचारिक एवम् अनोपचारिक शिक्षण चलता है । आधुनिक जगत से जोड़ने के लिए कम्प्यूटर,  इंग्लिश के साथ-साथ आधुनिक विज्ञान के विषयों का शिक्षण तथा टीवी पर समाचार दिखाने की व्यवस्था रहती है । शाम को शारीरिक, मानसिक विकास तथा राष्ट्रभक्ति के भाव जागरण के लिए संघ की शाखा भी लगती है । यहां कक्षाएं कमरे से लेकर किसी पेड़ के नीचे सब जगह चलती रहती हैं । पहले तीन साल छात्रों को सब शास्त्रों का अध्ययन करना होता है । इसके बाद वेदांत और व्याकरण ऐसे दो विभाग रहते हैं जिनमें छात्र को कोई एक विभाग अपने लिए चुनना होता है । वर्ष के अंत में देश के प्रमुख विद्वान व शंकराचार्य इनकी मौखिक और लिखित परीक्षा लेते हैं । इस प्रकार इन्हें अगली कक्षा में प्रवेश मिलता है ।</p>
<p><strong>हमारी आध्यात्मिक जगत की चुनौतियों का सटीक उत्तर :</strong>  आज अधिकांश साधु-सन्त करोड़ों देशवासियों की श्रद्धा-आस्था का केंद्र होने के बाद भी नई पीढ़ी के अनेक प्रश्नों का उत्तर नहीं दे पाते हैं । कारण युवा भावावेश में संन्यास तो ले लेते हैं लेकिन संन्यासी जीवन के महान उद्देश्य के लिए स्वयं को तैयार करने के लिए कठोर साधना, योग्य वातावरण और प्रेरक शिक्षक नहीं मिल पाते हैं । हमारे बहुत से सन्तों और मठ मन्दिर प्रमुखों का अपनी संस्कृति, धर्मग्रथों का ज्ञान और उस स्तर का व्यवहार आज की युवा पीढ़ी को आकर्षित और प्रेरित नहीं कर पा रहा है । वेदविज्ञान गुरुकुलम हमारे अध्यात्म जगत की आज की बड़ी जरूरत को पूरा का एक लघु ही क्यों न हो लेकिन एक ठोस प्रयास है ।</p>
<p><strong>तैयार हो रहा है आधुनिक एवं शास्त्र पारंगत नेतृत्व :</strong> डॉ. रामचन्द भट्ट के अनुसार यह संस्थान अभी तक 60 से अधिक सांस्कृतिक राजदूत तैयार कर समाज में भेज चुका है । ये स्नातक किसी न किसी मठ या संस्था का सफलतापूर्वक नेतृत्व कर रहे हैं । यह संस्थान दसवीं पास विद्यार्थी को अपने यहां प्रवेश देता है । इनका रहना, खाना और पढ़ाई सब नि:शुल्क रहता है । आज जब युवा पीढ़ी में सब तरफ करियर और पैकेज का भूत सवार दिखाई देता है ऐसे में इन युवाओं का अपने आप को इस साधना को समर्पित कर देना अत्यंत साहस का कार्य है । यद्यपि आधुनिक संन्यासी इन युवाओं की संख्या काफी कम है तो भी अँधेरे में छोटा ही क्यों न हो एक प्रकाश पुंज का कार्य तो हो ही रहा है । आवश्यकता है कि ऐसे संस्थान हर राज्य में कम से कम एक तो हों । माता-पिताओं को अपने बच्चों को इस दिशा में आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करना चाहिए । आखिर विश्व का नेतृत्व करने के लिए अपनी संस्कृति का केवल अभिमान ही नहीं तो ज्ञान और आचरण से ओतप्रोत युवाओं की जरूरत तो रहेगी ही न ! जब तक सब राज्यों में ऐसे संस्थान नहीं खुलते तब तक वहीं युवकों को जाकर शिक्षण लेकर जीवन सार्थक करना चाहिए । गुरुकुल में पंजाब, हिमाचल और जम्मूकश्मीर की अनुपस्थिति जरूर खटकी । आशा है हमारे युवा भी अध्यात्म और संस्कृति की इस बहती गंगा में डुबकी लगाने गुरुकुल में अवश्य दस्तक देंगे ।</p>
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		<title>बाल केन्द्रित क्रिया आधारित शिक्षा – 6 (नवाचार)</title>
		<link>https://rashtriyashiksha.com/innovation/</link>
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		<dc:creator><![CDATA[रवि कुमार]]></dc:creator>
		<pubDate>Mon, 20 May 2019 06:47:37 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[अध्यापक शिक्षा]]></category>
		<category><![CDATA[नवाचार]]></category>
		<category><![CDATA[नवीनतम]]></category>
		<category><![CDATA[बाल केन्द्रित क्रिया आधारित शिक्षा]]></category>
		<category><![CDATA[श्री रवि कुमार जी]]></category>
		<category><![CDATA[Innovation]]></category>
		<category><![CDATA[Rashtriya shiksha]]></category>
		<category><![CDATA[आधुनिक शिक्षा]]></category>
		<category><![CDATA[समाज में नवाचार]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>नवाचार यानि कक्षा शिक्षण में नया क्या है? बालक कक्षा में पढ़ता है । बालक से पूछो कि आज नया क्या पढ़ा? तो वह बताएगा कि आज मैंने इस विषय&#8230; </p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p><img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone wp-image-378" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2019/05/06_02_2017-mathslab-300x249.jpg" alt="बाल केन्द्रित क्रिया आधारित शिक्षा" width="899" height="746" srcset="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2019/05/06_02_2017-mathslab-300x249.jpg 300w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2019/05/06_02_2017-mathslab.jpg 650w" sizes="auto, (max-width: 899px) 100vw, 899px" /></p>
<p>नवाचार यानि कक्षा शिक्षण में नया क्या है? बालक कक्षा में पढ़ता है । बालक से पूछो कि आज नया क्या पढ़ा? तो वह बताएगा कि आज मैंने इस विषय में यह पढ़ा है, नया जैसा तो कुछ नहीं था । सामान्यतः कक्षा शिक्षण में एक परम्परागत शैली विकसित हो गई है । एक अधिकारी बड़ा रोचक उदाहरण देते हैं । आचार्य कक्षा में आकर पूछता है, बच्चों कल हम कहां थे? बच्चे सोचते है, कल हम जहन्नुम में थे । बालकों को या कहीं भी यदि कहानी सुनानी हो तो कहानी सुनाने का नियम है और श्रोता भी अपेक्षा करता है कि हर कहानी और हर बात में कुछ नया हो । यदि नया नहीं है और पुनरावृत्ति अधिक है तो श्रोता ऊब जाते हैं । यदि नया है तो वही कहानी श्रोताओं को अच्छी लगती है । कक्षा-कक्ष में नवाचार भी ऐसा ही है ।</p>
<p>इस विषय को हम तीन भागों में बाटेंगे । पहला है, <strong>कक्षा में विषय प्रारम्भ करने से पूर्व क्या करते हैं</strong><strong>?</strong> पिछले कालांश में जो विषय पढ़ा उसका असर मस्तिष्क पर प्रायः रहता है । अगला विषय पढ़ने से पूर्व मानसिक सिद्धता चाहिए । अब क्योंकि विषय अधिगम करना है तो मानसिक सिद्धता के साथ एकाग्रता भी चाहिए । मानसिक सिद्धता एवं एकाग्रता के लिए कुछ करवाना । जैसे तीन बार ब्रह्मनाद करेंगे । कोई ताली बजवाकर गतिविधि (Clapping Activity) भी करवा सकते हैं अथवा एक-दो मिनट का कोई खेल या गतिविधि । ऐसे करने से Mind Refresh हो जाता है और अगला विषय पढ़ने के लिए मानसिक सिद्धता व एकाग्रता भी बनती है । इस एक-दो मिनट के लिए नई-नई गतिविधि खोजनी चाहिए ।</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone wp-image-383" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2019/05/d2202c47-ca45-40a9-bc7c-55d00f7a6c4a-300x169.jpg" alt="बाल केन्द्रित क्रिया आधारित शिक्षा" width="889" height="501" srcset="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2019/05/d2202c47-ca45-40a9-bc7c-55d00f7a6c4a-300x169.jpg 300w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2019/05/d2202c47-ca45-40a9-bc7c-55d00f7a6c4a-768x432.jpg 768w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2019/05/d2202c47-ca45-40a9-bc7c-55d00f7a6c4a-1024x576.jpg 1024w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2019/05/d2202c47-ca45-40a9-bc7c-55d00f7a6c4a.jpg 1032w" sizes="auto, (max-width: 889px) 100vw, 889px" /></p>
<p>दूसरा है, <strong>आज जो विषय आपने पढ़ाना है वह</strong> <strong>कौन-से</strong> <strong>नए तरीके से आप पढ़ाते है</strong>, जिससे अधिगम अधिकतम हो । एक कार्यकर्ता ने एक सुन्दर प्रसंग का वर्णन किया । CCERT से एक एक्सपर्ट एक विद्यालय में गए । उस एक्सपर्ट कई प्रकार के फल व सब्जियाँ मँगवाई । प्राचार्य को थोड़ा अजीब-सा लगा । फल व सब्जियाँ लेकर वो एक्सपर्ट एक कक्षा में गए । कक्षा में मध्य का स्थान खाली करवाया और सभी बालकों को कहा &#8211; चारों तरफ खड़े हो जाओ । बालकों को ऐसा लगा कि कोई खेल प्रारम्भ हो रहा है । एक्सपर्ट ने सौरमंडल पढ़ाना शुरू किया । मध्य में एक संतरा रखा और कहा &#8211; यह सूर्य है । अब सूर्य के लिए संतरा ही क्यों रखा क्योंकि उसका रंग सूर्य जैसा है । क्रमशः इसी प्रकार से छोटे बड़े आकार और रंग से जोड़ते हुए शेष ग्रहों के लिए भी कोई भी फल अथवा सब्जी रखी । कितना रोचक रहा होगा और इसके कारण बालक कभी भी नहीं भूल सकते कि सौरमंडल क्या होता है । ऐसे अनेकों तरीके पढ़ाने के हो सकते हैं ।</p>
<p>तीसरा है, <strong>सीमा रहित कक्षा-कक्ष</strong> । कक्षा-कक्ष की कल्पना करते हैं तो चार दीवारों के मध्य चाकबोर्ड के सामने डेस्कों पर बैठे बालक ऐसा ध्यान में आता है । लेकिन कभी-कभी विषय को पढ़ाने के लिए सीमाओं से बाहर भी निकलना चाहिए । वनस्पति विज्ञान पढ़ाना है तो पेड़-पौधों के निकट जाकर भी पढ़ा सकते हैं । गणित पढ़ाना है तो मैदान में गणित का खेल खिलाकर भी सिखाया जा सकता है । यही नहीं किसी विषय के लिए विद्यालय परिसर से बाहर भी ले जाया जा सकता है । प्राथमिक कक्षाओं में फल-सब्जी के लिए सब्जी मण्डी ले जाया जा सकता है ।</p>
<p>कक्षा-कक्ष में नवाचार के और भी कई तरीके सोचे जा सकते हैं । <strong>आचार्य द्वारा किया गया नवाचार बालकों के अधिगम में वृद्धि करेगा । नवाचार एक प्रकार की वृत्ति है । वृत्ति विकसित होने से तरीके व विधियाँ स्वतः खोजी जाती हैं और क्रियान्वयन का रास्ता भी स्वतः मिलता रहता है ।</strong></p>
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		<title>अभिनव प्रयोग से समृद्धि का सफर</title>
		<link>https://rashtriyashiksha.com/abhinav-prayog-se-samriddhi/</link>
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		<dc:creator><![CDATA[डेस्क]]></dc:creator>
		<pubDate>Fri, 08 Mar 2019 13:35:07 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[नवाचार]]></category>
		<category><![CDATA[विशेष]]></category>
		<category><![CDATA[abhinav pryog]]></category>
		<category><![CDATA[Child Education]]></category>
		<category><![CDATA[indian education]]></category>
		<category><![CDATA[Kids Education]]></category>
		<category><![CDATA[Rashtriya shiksha]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>लखीमपुर खीरी। आज भले ही इंटरनेट का दौर है। पुस्तकालयों के प्रति लोगों का आकर्षण कम हो रहा है। लोग घंटों कंप्यूटर और टीवी से चिपके रहते हैं। ऐसे में&#8230; </p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p>लखीमपुर खीरी। आज भले ही इंटरनेट का दौर है। पुस्तकालयों के प्रति लोगों का आकर्षण कम हो रहा है। लोग घंटों कंप्यूटर और टीवी से चिपके रहते हैं। ऐसे में राजकीय पुस्तकालय अध्यक्ष संजय कुमार साह ने अपने अभिनव प्रयोगों से इस लाइब्रेरी को प्रदेश में नंबर एक की श्रेणी में खड़ा कर दिया है। यही वजह है कि अमेरिका की संस्था मिलिंडा बिल गेट्स फाउंडेशन की नजर इस लाइब्रेरी पर पड़ी है। मिलिंडा बिल गेट्स फाउंडेशन ने उत्तर प्रदेश में इस लाइब्रेरी को सहायता देने के लिए चयनित किया है।</p>
<p>इस लाइब्रेरी के संचालक संजय कुमार साह इसकी पाठक संख्या बढ़ाने के लिए नित नए प्रयोग कर रहे हैं। उनके अभिनव प्रयोगों का ही नतीजा है इस लाइब्रेरी के हजारों की संख्या में नियमित पाठक हैं। पिछले महीने उन्होंने ग्रामीण क्षेत्रों के तीन हजार बच्चों को एक साथ पुस्तकें पढ़वाईं। विद्यालयों में घूम-घूम कर वे विद्यार्थियों को लाइब्रेरी की पुस्तकें पढ़ने के लिए प्रेरित करते हैं। उनके इन प्रयासों ने जिले की लाइब्रेरी को प्रदेश में नंबर एक पर लाकर खड़ा कर दिया है। यहां की लाइब्रेरी के कार्यों की खबर अमेरिका संस्था मिलिंडा बिल गेट्स फउडेशन तक पहुंच गई है। मिलिंडा बिल गेट्स फाउडेशन ने इस लाइब्रेरी का चयन सहायता देने के लिए किया है।</p>
<p>मिलिंड बिलगेट्स फाउंडेशन ने मांगे प्रस्ताव अमेरिका की संस्था मिलिंडा बिलगेटस फाउंडेशन ने प्रदेश में लखीमपुर की लाइब्रेरी का चयन सहायता देने के लिए किया है। इस लाइब्रेरी को समृद्ध बनाने के लिए बिल गेटस फाउंडेशन ने स्वयं सेवी संस्था प्रथम के माध्यम से राजकीय पुस्तकालय अध्यक्ष संजय कुमार साह से लाइब्रेरी को समृद्ध बनाने के लिए प्रस्ताव मांगा है। संस्था प्रथम के लोग लाइब्रेरी आकर पूरी रिपोर्ट बनाकर ले गए हैं इसे बिल गेट्स फाउंडेशन को भेजेगें।</p>
<p>यह दिए प्रस्ताव जिला पुस्ताकालयध्यक्ष संजयकुमार साह ने लाइब्रेरी को समृद्ध बनाने के साथ यहां के लोगों को विभिन्न भाषाएं सिखाने के लिए लैंग्वेज लर्निंग लैबोरेटरी लैब, इनफारमेशन लिटरेसी लैब बनाने के अलावा मोबाइल वैन के माध्यम से जिले के विभिन्न कस्बों, तहसील और ब्लाक मुख्यालयों पर लोगों को पुस्तकें पढ़ाने की व्यवस्था करने का प्रस्ताव किया है। यह प्रस्ताव मिलिंडा बिल गेट्स फाउडेंशन को भेज दिए गए हैं।<br />
साभार अमरउजाला</p>
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		<title>गीतों के जरिए छात्रों को गणित के पहाड़े याद करवाते हैं टीचर्स, टॉप करवाने की गारंटी</title>
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		<dc:creator><![CDATA[डेस्क]]></dc:creator>
		<pubDate>Wed, 06 Mar 2019 12:10:39 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[नवाचार]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>कैथल: जिले के एक शिक्षक ने सरकारी स्कूलों में शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए गीतों और खेलों के माध्यम से बच्चों को पढ़ाने का नायाब तरीका ढूंढ निकाला है.&#8230; </p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p>कैथल: जिले के एक शिक्षक ने सरकारी स्कूलों में शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए गीतों और खेलों के माध्यम से बच्चों को पढ़ाने का नायाब तरीका ढूंढ निकाला है.</p>
<p>कैथल के एक सरकारी स्कूल के अध्यापक मनोज कुमार ने गीतों के माध्यम से छात्रों को गणित के पहाड़े, नियम और सूत्रों को याद करवाने का एक अनोखा तरीका ढुंढ निकाला है.</p>
<p>अध्यापक के गानों के द्वारा बच्चों को गणित के सूत्र खेल-खेल में ही याद हो जाते हैं. इस गीत को बनाने वाले अध्यापक मनोज कुमार ने बताया कि पहले वो खुद मैथ विषय से नफरत करते थे. यहां तक तो वो इस विषय में बार-बार फेल भी हुए हैं.जिसके बावजूद अध्यापक मनोज ने गणित विषय में MSC की परीक्षा पास की और गणित के अध्यापक बन गए. उसके बाद से वो सरकारी स्कूलों को बढ़ावा देने के साथ-साथ बच्चों के गणित विषय को गीतों के माध्यम से गणित के सूत्रों को समझाते हैं. जिसके लिए अध्यापक ने अपने पैसों से मैथ की एक प्रयोगशाला भी बनाई है.</p>
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