महान साहित्यकार प्रेमचन्द का साहित्य दर्शन भाग – 2

– कुलदीप मेहंदीरत्ता

महात्मा गांधी के जीवन दर्शन से प्रभावित प्रेमचन्द : महात्मा गाँधी के प्रभाव से न केवल भारतीय बल्कि पाश्चत्य जगत के लेखक और विद्वान प्रभावित हुए। प्रेमचन्द के साहित्य के रचाव का काल लगभग वही (1906-36) है जिस समय महात्मा गाँधी ने सम्पूर्ण भारत को अंग्रेजों के विरुद्ध आंदोलित कर दिया था। एक परतंत्र देश का विचारशील व्यक्ति भला कैसे अपने युग की महान घटनाओं की अवहेलना कैसे कर सकता है। प्रेमचन्द पर गाँधी जी के सत्य, अहिंसा, अस्तेय, हृदय परिवर्तन आदि तत्वों और असहयोग तथा सविनय अवज्ञा आंदोलनों का प्रभाव स्पष्ट देखा जा सकता है। प्रसिद्ध साहित्यकार डॉ. कमल किशोर गोयनका कहते हैं कि “गांधी जी के स्वराज्य आंदोलनों, घटनाक्रमों तथा विचारों ने उनकी अनेक कहानियों की आधारभूमि तैयार की है। प्रेमचंद हिंदी के एकमात्र ऐसे कहानीकार हैं जिनकी लगभग 25 कहानियां प्रत्यक्षत: गांधी-दर्शन एवं गांधी-आंदोलनों आदि पर मिलती हैं और वे 1921 से उनके अंतिम समय तक मिलती हैं। इन कहानियों में गांधी-संघर्ष एवं गांधीवाद की जीवंत अनुभूतियां हैं जो एक प्रकार से प्रेमचंद को गांधीवाद का साहित्यिक संस्करण बना देती है”।

“प्रेमचंद और गांधी में पश्चिमी सभ्यता, औद्योगीकरण, ईसाईकरण, अंग्रेजी साम्राज्यवाद, ग्राम्य-चेतना आदि में वैचारिक एकरूपता दिखाई देती है और प्रेमचंद कारखाने की स्थापना के विरुद्ध सूरदास द्वारा गांव की जमीन की रक्षा का संघर्ष चित्रित करते हैं जो गांधी के समान ही धर्म और नीति का सहारा लेता है। इस प्रकार सूरदास का संघर्ष स्वभूमि, स्वराज्य तथा स्वसंस्कृति की रक्षा का संघर्ष बनता है और ‘रंगभूमि’ को महाकाव्यात्मक उपन्यास बना देता है। प्रेमचंद का ‘कर्मभूमि’ (सितंबर, 1932) भी गांधी जी की स्वराज्य-दृष्टि और उनके व्यावहारिक कार्यक्रमों पर आधारित है। इस पर गांधी का नमक-कर कानून तोड़ना, नेताओं की गिरफ्तारी, गांधी-इर्विन पैक्ट, किसानों का लगान-बंदी आंदोलन आदि घटनाओं का सीधा प्रभाव है”।

भविष्यमूलक दूरदर्शी प्रेमचन्द : उन्होंने स्वतन्त्रता पश्चात राजनीतिक परिवर्तनों की सम्भावित कल्पना कर ली थी और वे सुराज और स्वराज्य को लेकर बहुत आशावान नहीं दिखाई पड़ते थे। अपने प्रसिद्ध उपन्यास ‘गबन’ में देवीदीन नामक पात्र के माध्यम से प्रेमचन्द कहते हैं कि “जब तुम सुराज का नाम लेते हो, उसका कौनसा स्वरूप तुम्हारी आँखों के सामने आता है? तुम भी बड़े- बड़े तलब लोगे, तुम भी अंग्रेजों की तरह महलों में रहोगे, पहाड़ों की हवा खाओगे, अंग्रेजी ठाठ बनाये घूमोगे। इस सुराज से देश का क्या कल्याण होगा। तुम्हरी और तुम्हारे भाई बन्धुओं की जिन्दगी भले आराम और ठाठ से गुजरे……अभी तुम्हारा राज नहीं है, तब तो तुम भोग-विलास पर इतना मरते हो, जब तुम्हारा राज हो जायेगा, तब तो तुम गरीबों को पीस कर पी जाओगे।”

सबसे पहले मानवतावादी हैं प्रेमचन्द :

प्रेमचन्द को ‘वाद’ के दायरे में घसीटने की बहुत कोशिश की जाती है, लेकिन वे सबसे पहले मानवतावादी हैं। महेंद्र भटनागर लिखते हैं कि “ प्रेमचंद मानवतावादी लेखक थे। गांधीवादी या साम्यवादी सिद्धान्तों से उन्होंने सीधी प्रेरणा ग्रहण नहीं की। उन्होंने जो कुछ जाना, सीखा, लिया; वह सब अपने अनुभव मात्र से। इसीलिए उनके साहित्य में अपरास्त शक्ति है। गांधीवाद और साम्यवाद कोई मानवता के विरोधी नहीं हैं; अतः प्रेमचंद के विचारों में जगह-जगह दोनों की झलक मिल जाती है। लेकिन उनका मानवतावाद सर्वत्र उभरा दीखता है”। प्रेमचन्द को मार्क्सवाद के खेमे की ओर ले जाने के प्रयासों पर चंदन श्रीवास्तव अपनी समीक्षा में लिखते हैं कि ‘खुर्शीद अनवर ने 11 अगस्त 2013 के अपने ‘प्रेमचंद को साम्यवादी बनाने की कवायद’ शीर्षक लेख ध्यान दिलाया कि बेशक यह पंक्ति प्रेमचंद की है कि ‘धन्य है वह सभ्यता जो मालदारी और व्यक्तिगत संपत्ति का अंत कर रही है और जल्दी ही या देर से दुनिया उसका पदानुसरण करेगी।’ ‘लेकिन प्रेमचंद को साम्यवादी ठहराने के लिए इतना कहना काफी नहीं’।

चंदन श्रीवास्तव लिखते है कि “मार्क्सवाद से प्रेमचंद के अलगाव को दिखाने के लिए गोयनका ने तर्क दिया कि “प्रेमचंद ने ‘हंस’ के उसी अंक में 1936 में प्रकाशित एक लेख में लंदन से आया घोषणा-पत्र भी प्रकाशित किया है। इसमें एक भी शब्द, एक भी उद्देश्य का संबंध मार्क्सवाद से दूर तक नहीं है। इस घोषणा-पत्र में चार प्रमुख उद्देश्य हैं- सांस्कृतिक और सामाजिक उत्थान, भारतीय स्वाधीनता, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और इंडो-रोमन लिपि की स्वीकृति। प्रेमचंद ने अंतिम को अस्वीकार करते हुए लिखा कि शेष तीन तो उन्हें आदर्श ही रहे हैं, पर इनमें कहीं भी मार्क्सवाद नहीं है और स्पष्ट है कि प्रेमचंद ने समर्थन इसलिए किया कि वे तीस-पैंतीस वर्षों से इन्हीं उद्देश्यों को लेकर चल रहे थे और वे स्वराज और भारतीय आत्मा की रक्षा के ही उपकरण थे”।

धर्म के कर्मकांड और जाति विभेद आधारित स्वरूप के विरोधी : प्रेमचन्द सर्व-धर्म स्वभाव के समर्थक थे, इसलिए उनके विचारों में सभी धर्मों की स्वीकार्यता का भाव दिखाई पड़ता है। अपने पात्रों के चयन से लेकर उनके चरित्र-चित्रण तथा सम्वादों में ये तत्त्व सर्वत्र दर्शित होते हैं। उनके लिए “राष्ट्रीयता की पहली शर्त वर्ण-व्यवस्था, ऊँच-नीच के भेद और धार्मिक पाखण्ड की जड़ खोदना है”। प्रेमचन्द लिखते हैं कि “हम जिस राष्ट्रीयता का स्वप्न देख रहे हैं उसमें जन्मजात वर्णों की तो गंध तक न होगी, वह हमारे श्रमिकों और किसानों का साम्राज्य होगा, जिसमें न कोई ब्राह्मण होगा, न कोई हरिजन, न कायस्थ, न क्षत्रिय। उसमें सभी भारतवासी होंगे, सभी बर्कहमान होंगे या सभी हरिजन”। वास्तव में हमारे देश का सामाजिक रूप से जितना नुकसान जाति विभेद ने किया है शायद ही किसी अन्य ने किया हो। प्रेमचन्द इस मायने में सही प्रगतिशील हैं।

प्रेमचन्द के लेखन में स्त्री, कृषक मजदूर और दलित (सामाजिक त्रिकोण) भावनाओं  की अभिव्यक्ति  :  नीरज अपने लेख प्रेमचंद और राष्ट्रवाद में लिखते हैं कि “प्रेमचन्द के पूरे कथा साहित्य में एक त्रिकोण उभर कर आता है, जिसके तीनों छोर पर क्रमशः स्त्री, दलित और किसान/मजदूर हैं। प्रेमचन्द के सम्पूर्ण साहित्य, चाहे वह कहानी हो या उपन्यास, सभी में किसानों/मजदूरों का दुःख-दर्द व उसकी अभिव्यक्ति प्रमुखतया हुई है”। आदि से अंत तक कृषक जीवन के अभाव को चित्रित करता उनका महाकाव्यात्मक उपन्यास ‘गोदान’ समस्त भारत के ग्राम जीवन, विषम स्त्री जीवन, हरिजन व्यथा, पूंजीवादी सूदखोरी के भावपूर्ण चित्रण में सक्षम है इसलिए कालजयी रचनाओं की श्रेणी में आता है। हरिजन व्यथा को केंद्र में रखकर उनकी कुछ कहानियाँ (ठाकुर का कुआँ, मंदिर, कफन, सद्गति) और कुछ उपन्यास (रंगभूमि, गोदान) तत्कालीन सामाजिक दुर्दशा और पतन का चित्रण करते हैं। ‘यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः’ के देश में नारी की दारुण स्थिति से प्रेमचन्द ने निरंतर मुठभेड़ की है ।

प्रश्न ये उठता है कि क्या शोषित मजदूरों, किसानों, कामगारों, भूमिहीनों, पीड़ित महिलाओं और निर्धनों की बात करना क्या किसी एक विचार अथवा वाद का विशेषाधिकार है? क्या यह मानवतावाद का क्षेत्र नहीं है? क्या कोई भी सहृदयी व्यक्ति किसी मानव की ऐसी स्थिति देख कर द्रवित नहीं होगा? मानव को छोड़िये हमारी संस्कृति और हमारे परिवार में तो कीड़ी मर जाये तो माता उस पाप की मुक्ति के लिए कितना उद्योग करती हैं, इस बात से हम सब भली भांति परिचित हैं। प्रेमचन्द वाद से बहुत ऊपर हैं, उन पर वैचारिक वाद का ठप्पा लगाना उनकी साहित्यिक महत्ता का उचित मूल्यांकन नहीं हैं। उनका विश्लेष्ण एक सच्चे मानवतावादी, संस्कृति और सभ्यता निष्ठ, आदर्श, साहित्यकार के रूप में किया जाना अपेक्षित है।

(लेखक चौधरी बंसीलाल विश्वविद्यालय, भिवानी (हरियाणा) में राजनीति शास्त्र के प्रोफेसर और विभागाध्यक्ष है।)

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