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	<title>श्री रवि कुमार जी Archives - राष्ट्रीय शिक्षा : शिक्षा में समाज प्रबोधन rashtriyashiksha.com</title>
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	<description>सा विद्या या विमुक्तये</description>
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	<title>श्री रवि कुमार जी Archives - राष्ट्रीय शिक्षा : शिक्षा में समाज प्रबोधन rashtriyashiksha.com</title>
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		<title>रामायण सत कोटि अपारा-8 (श्रीराम जन्मभूमि आंदोलन से उपजी राम कथा)</title>
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		<dc:creator><![CDATA[राष्ट्रीय शिक्षा]]></dc:creator>
		<pubDate>Thu, 17 Sep 2026 14:03:51 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[<p>&#x270d; रवि कुमार श्रीराम कथा अनंत है। उसके स्वरूप भी विविध है। श्रीराम के काल से आज तक अलग-अलग रूप में रामकथा प्रकट हुई है। एक कथा ऐसी भी है&#8230; </p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: right;"><img src="https://s.w.org/images/core/emoji/17.0.2/72x72/270d.png" alt="✍" class="wp-smiley" style="height: 1em; max-height: 1em;" /> रवि कुमार</p>
<p style="text-align: justify;">श्रीराम कथा अनंत है। उसके स्वरूप भी विविध है। श्रीराम के काल से आज तक अलग-अलग रूप में रामकथा प्रकट हुई है। एक कथा ऐसी भी है जिसका उद्भव एक आंदोलन से हुआ और उस कथा का स्वरूप भी अलग प्रकार का है। यह कथा है श्रीराम जन्मभूमि आंदोलन से उपजी रामकथा।</p>
<p style="text-align: justify;">श्रीराम जन्मभूमि आंदोलन मात्र अयोध्या में राम मंदिर निर्माण का आंदोलन ही नहीं है, यह आंदोलन राष्ट्र जागरण का आंदोलन है, हिंदुत्व शक्ति जागरण का आंदोलन है, श्रीराम भक्ति जागरण का आंदोलन है और सबसे महत्वपूर्ण ‘राम मंदिर से राष्ट्र मंदिर’ निर्माण का आंदोलन है। 1984 में शुरू हुआ आंदोलन, 2019 में मंदिर निर्माण की अनुमति, 2020 में भूमि पूजन और 2024 में मंदिर उद्घाटन में पूर्ण हुआ। 1984-2019 के दौरान संघर्ष का यह आंदोलन भारत में एक नई रामकथा को जन्म देता है जो गीतों के रूप में, वीर रस और ओजपूर्ण कविताओं के रूप में, भाषणों के रूप में, भजनों के रूप में, नए कथाकारों के मुख से निकली रामकथा के रूप में, नारों के रूप में सम्पूर्ण भारत में एक विराट जनजागरण का कार्य करती है। यह रामकथा भारत के हिन्दू समाज के मन में व्याप्त अनन्य राम भक्ति को राष्ट्र भक्ति के रूप में अभिव्यक्त करती है।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>श्रीराम जन्मभूमि आंदोलन के प्रमुख जयघोष</strong></p>
<p style="text-align: justify;">भारत के सर्वदूर ग्रामों में व्याप्त ‘जय सिया राम’, ‘राम-राम’ का अभिवादन इस आंदोलन में ‘जय श्रीराम’ के जयघोष के साथ प्रकट होता है। यह जयघोष भारत में सभी रामभक्तों में, कारसेवकों में एक विशेष प्रकार की ऊर्जा व उत्साह का संचार करता है। आंदोलन के समय कुछ और जयघोष विशेष रूप से प्रचलित हुए, जो उस समय रैलियों व रथ यात्रा में लगते थे और जिन्हें आज भी बोलें तो श्रीराम जन्मभूमि आंदोलन की स्मृतियाँ आँखों के सामने पुनर्जीवित हो उठती हैं। ये जयघोष है- ‘एक ही नारा एक ही नाम जय श्रीराम जय श्रीराम’, जो हिन्दू हित की बात करेगा वही देश पर राज करेगा’, ‘बच्चा बच्चा राम का जन्मभूमि के काम का’। कुछ अति उत्साही युवक ये भी नारे लगाते थे- ‘तेल लगाकर डाबर का नाम मिटा दो बाबर का’, ‘एक धक्का और दो बाबरी ढांचा तोड़ दो’, ‘जय श्रीराम हो गया काम’।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>श्रीराम जन्मभूमि आंदोलन के प्रमुख गीत</strong></p>
<p style="text-align: justify;">आंदोलन के काल में अनेक गीत बने और राष्ट्र व्यापी हुए। इन गीतों ने अपने भावों से समाज को आंदोलन से जोड़ा भी और समाज के मन को उद्वेलित भी किया। ये गीत हर सभा, रथ यात्रा और कार सेवा में लाऊड स्पीकरों पर गूंजते थे। ‘राम लला हम आएँगे, मंदिर वहीं बनायेंगे’, सौगंध राम की खाते हैं मन्दिर वहीं बनायेंगे’, ‘चले अयोध्या, चलें अयोध्या राम काम के काज को’ ये गीत प्रमुख रूप से प्रचलित हुए। ‘राम जी की सेना चली, श्रीराम जी की सेना चली, हर हर महादेव’ यह गीत मूल रूप से रामानन्द सागर की ‘रामायण’ का गीत है, लेकिन जब कारसेवकों के जत्थे निकलते थे तो इस गीत से उनका स्वागत व विदाई होती थी। ‘राम कहानी सुनो रे राम कहानी’ – श्री रविन्द्र जैन के संगीत व आवाज में सजे भजनों ने आंदोलन को गहरा आध्यात्मिक आधार दिया। ‘अयोध्या करती है आह्वान, हाथ से कर मंदिर निर्माण। शिला की जगह लगा दे प्राण, बैठा दे वहाँ राम भगवान।।’ इस प्रकार के गीत ने अयोध्या नगरी व आंदोलन के जीवंत चरित्र को प्रस्तुत किया। भारत की विविध भाषाओं में विभिन्न गीतों की रचना हुई जो समाज व्यापी हुए। राजस्थान में एक गीत बहुत प्रचलित हुआ – ‘कसो लंगोटो ले ल्यो सोटो, अभै अयोध्या जाणो है। बण जाओ बजरंग बली, मन्दिर वहीं बनाणो है।’</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>श्रीराम जन्मभूमि आंदोलन के ऑडियो व वीडियो कैसेट्स</strong></p>
<p style="text-align: justify;">आंदोलन के समय सोशल मीडिया नहीं था और न ही व्हाट्सएप्प, टेलीग्राम जैसे मैसेंजर एप्प थे। देश के कोने-कोने तक वैचारिक सन्देश, ओजस्वी भाषण और प्रेरक गीतों को पहुंचाने का एक मात्र साधन कैसेट्स ही थे। इस आंदोलन में साध्वी ऋतंभरा के ओजस्वी व तीखे भाषणों के ऑडियो कैसेट्स सबसे ज्यादा लोकप्रिय हुए। उनकी ओजपूर्ण वाणी, कविताओं और राष्ट्रवाद से ओत-प्रोत भाषणों ने युवाओं को गहराई से प्रभावित किया। गाँव की चौपालों और नगरों की गलियों में लाऊड स्पीकर लगाकर इनके कैसेट्स बजाए जाते थे। साध्वी ऋतंभरा की तरह प्रखर वक्ता उमा भारती के भाषणों के ऑडियो कैसेट्स भी देशभर में बांटें गए, जिन्होंने धार्मिक व सांस्कृतिक अस्मिता की भावना जगाई। रथ यात्रा व रैलियों में हुए अशोक सिंघल, अटल बिहारी वाजपेयी और लाल कृष्ण आडवानी के वैचारिक भाषणों की रिकार्डेड ऑडियो कैसेट्स को भी प्रसारित किया जाता था।</p>
<p style="text-align: justify;">‘मन्दिर का निर्माण करो’ यह उस समय का सबसे चर्चित ऑडियो एल्बम था। इसमें आंदोलन के मुख्य संकल्प गीत राम लला हम आएँगे.. शामिल थे। कई स्थानों पर प्रतिबन्ध होने के बावजूद इसकी लाखों प्रतियाँ ब्लैक में बिकी। गुलशन कुमार की ‘टी-सीरिज’ कम्पनी ने इस दौर में राम भजनों की बाढ़ ला दी। ‘जय श्री राम’ नाम की ऑडियो कैसेट में शामिल गीतों को उस समय प्रचलित हिंदी फिल्मों के गानों की धुनों पर तैयार किया गया था ताकि वे आम जनता की जुबान पर आसानी से चढ़ सके। उत्तर प्रदेश, बिहार और मध्य प्रदेश के स्थानीय लोक कलाकारों ने स्थानों बोलियों (भोजपुरी, अवधी, बुन्देली) में श्रीराम जन्मभूमि से जुड़े गीतों के कैसेट रिकार्ड कर प्रसारित किए जिससे ग्रामीण भारत इस आंदोलन से सीधे जुड़ गया। कुछ और प्रसिद्ध ऑडियो कैसेट्स हैं- काशी बुल्लू की ‘राम जन्म भूमि अयोध्या’: मैक्स कैसेट्स इंडस्ट्री द्वारा 1991 में जारी यह एक बेहद लोकप्रिय &#8216;बिरहा&#8217; और लोकगीत शैली की ऑडियो कैसेट, कार्यकर्त्ता प्रबोधन की दृष्टि से ‘डॉ. सुब्रमण्यम स्वामी और आचार्य धर्मेंद्र के वक्तव्य’; संतों के संदेश, कारसेवा के निर्देश, अयोध्या पहुँचने के आह्वान गीत के लिए ‘चलो अयोध्या’, भजनों और गीतों के लिए ‘सौगंध राम की खाते हैं’।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>श्रीराम जन्मभूमि</strong> <strong>आंदोलन में काव्य</strong></p>
<p style="text-align: justify;">श्रीराम जन्मभूमि आंदोलन के काल में हिंदी काव्य-जगत में एक समानांतर धारा विकसित हुई, जिसे ‘आंदोलन-काव्य’ कहा जा सकता है। ओज और वीररस प्रधान इन कविताओं में राम को संघर्षशील, न्यायप्रिय और आत्मगौरव के प्रतीक के रूप में चित्रित किया गया। उस समय देश के बड़े-बड़े कवियों की कविताओं को संकलित कर विशेष कैसेट जारी किए जाते थे। इनमें भारत के 500 वर्षों के संघर्ष और हिन्दू मान बिन्दुओं की पुनर्प्रतिष्ठा का वर्णन होता था। साध्वी ऋतंभरा के भाषणों में एक कविता अवश्य रूप में आती थी –</p>
<p style="text-align: center;"><strong>महाकाल बन करके हम दुश्मन से टकराएँगे। जहाँ बनी है मस्जिद, अपना मन्दिर वहीं बनाएंगे।</strong></p>
<p style="text-align: center;"><strong>काशी</strong><strong>, मथुरा, वृन्दावन ने एक साथ हुंकारा है। कहो गर्व से हम हिन्दू है हिन्दुस्थान हमारा है।</strong></p>
<p style="text-align: justify;">वीर रस के कवि हरिओम पंवार ने आंदोलन में अपनी कविताओं से गहरी छाप छोड़ी &#8211;</p>
<p style="text-align: center;"><strong>‘राम दवा है रोग नहीं हैं सुन लेना। राम त्याग है भोग नहीं है सुन लेना।</strong></p>
<p style="text-align: center;"><strong>राम दया है क्रोध नहीं है सुन लेना। राम सत्य है शोध नहीं है जग वालों।</strong></p>
<p style="text-align: center;"><strong>राम हुआ है नाम लोक हितकारी का। रावण से लड़ने वाली खुद्दारी का।’</strong></p>
<p style="text-align: justify;"><strong>श्रीराम जन्मभूमि आंदोलन में रामकथा व कथाकार</strong></p>
<p style="text-align: justify;">रथयात्रा, शिलापूजन और रैली जैसे आयोजनों में दिए गए भाषण रामकथा-प्रसार का सबसे प्रभावी माध्यम सिद्ध हुए। इन भाषणों में वक्ता रामायण के प्रसंगों को ऐतिहासिक-राजनीतिक संदर्भों से जोड़ते थे। राम-वनवास को ‘सांस्कृतिक पराभव’ और राम-राज्याभिषेक को ‘मुक्ति की प्रतीक्षा’ के रूपक के रूप में प्रस्तुत किया जाता था। भाषण-शैली भावना प्रधान व आह्वान करने वाली थी, जिसका उद्देश्य श्रोता को कथा का सक्रिय भागीदार बनाना था। इस आंदोलन में विभिन्न संत-साध्वी ‘राम कथाकार’ के रूप में उभरे। इनमें प्रमुख नाम है- मोरारी बापू, संत आचार्य धर्मेन्द्र, स्वामी रामभद्राचार्य, रमेश भाई ओझा, महंत रामचन्द्र दास परमहंस, स्वामी चिन्मयानन्द सरस्वती, देवराहा बाबा, महंत अवैद्यनाथ, स्वामी वामदेव महाराज, स्वामी परमानन्द गिरी महाराज, साध्वी ऋतंभरा, साध्वी उमाश्री भारती, स्वामी पुरुषोत्तमाचार्य महाराज, स्वामी सत्यमित्रानन्द गिरी महाराज।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>श्रीराम जन्मभूमि आंदोलन पर साहित्य</strong></p>
<p style="text-align: justify;">रामजन्मभूमि आंदोलन के समय ही नरेंद्र कोहली की पूर्व-प्रकाशित रामकथा शृंखला को ‘अभ्युदय’ (1989-1990) नाम से दो वृहद् खंडों में समेकित कर पुनः प्रकाशित किया गया, जो उस समय सांस्कृतिक चेतना का प्रमुख केंद्र बनी। कुछ और प्रमुख पुस्तकें आंदोलन के दौरान प्रकाशित हुई – ‘Ram Janmabhoomi Vs. Babri Masjid: A Case Study in Hindu-Muslim Conflict’ (1990): बेल्जियम के प्रसिद्ध विद्वान डॉ. कोनराड एल्सट द्वारा लिखित, ‘Ayodhya and After: Issues Before Hindu Society’ (1991): डॉ. कोनराड एल्सट की पुस्तक, Hindu Temples: What Happened to Them&#8217; (1990): सीताराम गोयल और सहयोगी लेखकों द्वारा संकलित। कुछ पुस्तकें बाद में प्रषित हुई, पर उनका सम्बन्ध आंदोलन की कड़ियाँ ही थी – मीनाक्षी जैन की ‘राम और अयोध्या’, हेमंत शर्मा की ‘युद्ध में अयोध्या’ और ‘राम फिर लौटे’।</p>
<p style="text-align: justify;">श्रीराम जन्मभूमि आंदोलन का व्याप जितना विस्तृत व व्यापक था, उस समय उपजी रामकथा भी उतनी ही विस्तृत व व्यापक है। वह रामकथा जिसने भारत के जनमानस पर छाप छोड़ी। रामचरितमानस के बालकाण्ड में तुलसीदास जी ने लिखा है – “हरी अनंत हरी कथा अनंता। कहहिं सुनहिं बहुबिधि सब संता॥” इसके अनुसार श्रीराम जन्मभूमि की रामकथा भी अनंत है।</p>
<p><strong><span style="color: #ff0000;">और पढ़े:</span></strong> <span style="color: #0000ff;"><strong><a style="color: #0000ff;" href="https://rashtriyashiksha.com/ram-katha-in-tribal-area/" target="_blank" rel="noopener">रामायण सत कोटि अपारा-7 (जनजातीय क्षेत्रों में राम कथा)</a></strong></span></p>
<p style="text-align: justify;">(लेखक विद्या भारती जोधपुर प्रान्त के संगठन मंत्री है।)</p>
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		<title>रामायण सत कोटि अपारा-7 (जनजातीय क्षेत्रों में राम कथा)</title>
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		<dc:creator><![CDATA[राष्ट्रीय शिक्षा]]></dc:creator>
		<pubDate>Sat, 15 Aug 2026 04:58:12 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[नवीनतम]]></category>
		<category><![CDATA[रामायण सत कोटि अपारा]]></category>
		<category><![CDATA[श्री रवि कुमार जी]]></category>
		<category><![CDATA[Rashtriya shiksha]]></category>
		<category><![CDATA[भारतीय ज्ञान परम्परा]]></category>
		<category><![CDATA[रामकथा]]></category>
		<category><![CDATA[राष्ट्रीय शिक्षा]]></category>
		<category><![CDATA[श्रीराम]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>Ram katha in tribal area&#x270d; रवि कुमार “राम आव्या जंगल मां, लक्ष्मण संग चाल्या। शबरी माय बेर लई, प्रेम थी थाळ भराल्या॥” “मीठा बेर चाखी-चाखी, राम ने अर्पण काया। जात&#8230; </p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: right;">Ram katha in tribal area<img src="https://s.w.org/images/core/emoji/17.0.2/72x72/270d.png" alt="✍" class="wp-smiley" style="height: 1em; max-height: 1em;" /> रवि कुमार</p>
<p style="text-align: center;"><strong>“राम आव्या जंगल मां</strong><strong>, लक्ष्मण संग चाल्या। </strong></p>
<p style="text-align: center;"><strong>शबरी माय बेर लई, प्रेम थी थाळ भराल्या॥”</strong></p>
<p style="text-align: center;"><strong>“मीठा बेर चाखी-चाखी</strong><strong>, राम ने अर्पण काया। </strong></p>
<p style="text-align: center;"><strong>जात न पूछे रामजी, प्रेम देख राजी थाया॥”</strong></p>
<p style="text-align: justify;">उपरोक्त गीत भील जनजाति में गाया जाने वाला भीली लोकभाषा का गीत है जो वहाँ विवाह आदि प्रसंग पर गाया जाता है। इस प्रसंग में शबरी माता व श्रीराम का उल्लेख है।</p>
<p style="text-align: justify;">रामकथा भारत की सांस्कृतिक परम्परा का जनजातीय आधार भी है। जनजाति क्षेत्रों में रामकथा लिपिबद्ध नहीं है। उसका स्वरूप मौखिक है। रामकथा का यह मौखिक स्वरूप श्रुति-स्मृति के आधार पर पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ता रहा है। जनजाति समाज ने राम को वन का नायक माना है। अलग अलग जनजाति में रामकथा के अलग अलग प्रसंग प्रचलित है। सम्पूर्ण रामकथा किसी जनजाति में प्रचलित है, ऐसा कहना संभव नहीं होगा और इसे खोज पाना भी अत्यंत दुर्लभ है।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>भारत में जनजातीय क्षेत्र</strong></p>
<p style="text-align: justify;">भारत में लगभग 11 करोड़ जनजाति समाज है। ये 11 करोड़ लोग भारत के लगभग 1।5 लाख ग्रामों में बसते हैं। भारत की जनजातियाँ 800+ भाषाई रूपों से जुड़ी हैं और लगभग 90% जनजातियाँ ग्रामीण व वन्य क्षेत्रों में रहती हैं। भारत में जनजातियाँ मुख्यतः तीन बड़े भौगोलिक क्षेत्रों में केंद्रित हैं – 1. <strong>मध्य भारतीय जनजातीय पट्टी</strong> (राजस्थान, गुजरात, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, झारखंड, ओडिशा, महाराष्ट्र – यहाँ लगभग 55-60% जनजातियाँ) 2. <strong>पूर्वोत्तर जनजातीय क्षेत्र </strong>(असम, नागालैंड, मिजोरम, मेघालय, अरुणाचल, त्रिपुरा, मणिपुर &#8211; कई राज्यों में जनजातियाँ बहुसंख्यक) 3. <strong>दक्षिण भारतीय जनजातीय क्षेत्र (</strong>आंध्रप्रदेश, तेलंगाना, कर्नाटक, तमिलनाडु, केरल)। भारत में 705 जनजातियाँ मान्यता प्राप्त है। भारत की प्रमुख जनजातियों में भील, गोंड, संथाल, मीणा, मुंडा, उरांव, नागा समूह, खासी, बोडो, हो, कोय, गरासिया, टोडा, चेचु, अंडमानी जनजातियाँ है। सामान्यतः सभी जनजातियाँ अपनी आजीविका के लिए कृषि व वन उत्पाद पर निर्भर हैं। जनजातीय क्षेत्रों में शिक्षा का स्तर राष्ट्रीय औसत से कम है, परन्तु यहाँ की संस्कृति अत्यंत समृद्ध है और इनका प्रकृति से संबंध उच्च स्तर का है। दण्डकारण्य क्षेत्र (छत्तीसगढ़, ओड़िसा, महाराष्ट्र, आंध्रप्रदेश के हिस्सों में फैला हुआ) रामकथा व जनजातीय संस्कृति का प्रमुख क्षेत्र है।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>रामकथा की मौखिक-वाचिक परम्परा</strong></p>
<p style="text-align: justify;">मौखिक-वाचिक स्वरुप में रामकथा भारत के जनजाति समाज में व्याप्त होकर भारत की सांस्कृतिक परम्परा को आगे बढ़ाती है और वहाँ के समाज में जीवन मूल्यों को खड़ा करती है। रामकथा से उपजे व जनजाति समाज में व्याप्त हुए जीवन मूल्य सर्वदूर अभिव्यक्त हो रहे हैं। रामकथा का यह स्वरूप वहाँ की स्थानीय लोकभाषा/बोली में विभिन्न अवसरों पर गए जाने वाले गीतों, भजनों, नृत्य गीतों, कथा प्रसंगों, दन्त कथाओं, नाटकों, धार्मिक अनुष्ठानों आदि रूपों  में प्रकट होता है। मूलतः जनजाति समाज धर्म परायण है। मातृभूमि के प्रति उसके मन में गहरा लगाव है। भारत भक्ति उसके कण कण में व्याप्त है। वह प्रकृति का पूजक व संवर्धक है। यह धर्म परायणता, मातृभूमि प्रेम, भारत भक्ति, प्रकृति संवर्धन का स्रोत राम कथा ही है, ऐसा कहा जाए तो अतिशयोक्ति नहीं होगी।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>रामकथा की विविधता</strong></p>
<p style="text-align: justify;">जनजातीय क्षेत्रों में रामकथा ने स्थानीय जीवनशैली, संस्कृति, भाषा और संवेदना के अनुरूप स्वरूप ग्रहण किया है। इन क्षेत्रों में राम केवल एक ईश्वर नहीं, बल्कि मानव, वीर, बंधु, लोकनायक और कभी-कभी एक सहज ग्रामीण के रूप में भी प्रकट होते हैं।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>गोंड समाज</strong> में राम वीर पुरुष हैं। वे गोंड परंपरा के ‘संघर्षशील योद्धा’ के रूप में प्रतिष्ठित हैं। सीता को ‘धरती की पुत्री’ और राम को ‘वन का रक्षक’ कहा जाता है। <strong>उरांव समाज</strong> में राम न्यायप्रिय राजा हैं। यहाँ शबरी प्रसंग विशेष रूप से लोकप्रिय है, जिसमें शबरी को ‘माता’ के रूप में सम्मानित किया जाता है। राम वनवासी नहीं, ‘जनप्रिय अतिथि’ के रूप में आते हैं। <strong>रामकथा संथाल</strong> लोकगीतों में ‘सोहराय’ पर्व के समय गाई जाती है। <strong>भीलों की रामकथा</strong> में राम वन का अतिथि नहीं, बल्कि भील समाज का सदस्य है। <strong>निषादराज</strong> और <strong>शबरी प्रसंग</strong> को विशेष महत्व दिया गया है। <strong>कोलाम समाज</strong> राम को ‘रामा’ नाम से पुकारता है। उनकी कथा में सीता और लक्ष्मण के पात्र गौण हैं, जबकि राम का संघर्षपूर्ण जीवन केंद्रीय बिंदु होता है। <strong>कोया जनजातियों</strong> में राम और सीता की पूजा जंगल के देवता और देवी के रूप में की जाती है। राम को ईश्वर नहीं, बल्कि लोक रक्षक के रूप में माना जाता है। <strong>डांग समाज</strong> में रामलीला ‘डांग दरबार’ के समय होती है। यह केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि सामाजिक उत्सव होता है। <strong>बैगा जनजाति </strong>की रामकथा में <strong>लव-कुश</strong> की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण है। लव-कुश को स्वतंत्र योद्धा, लोकनायक और अपने माँ के रक्षक के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। <strong>राभा जनजाति</strong> समाज में भारीगान के नाट्य मंचन में ‘रावण वध’ और ‘लक्ष्मणार शक्तिसेल’ सम्मिलित हैं। इन दोनों कथाओं में राम की सामाजिक जिम्मेदारी अपने अनुगामियों के प्रति स्नेह और देशभक्ति को प्रस्तुत किया जाता है। <strong>मिजो रामकथा</strong> में अपनी अलग कथावस्तु है। जो वाल्मीकी रामायण का सारांश ग्रहण करती है, परंतु उसमें वन्य तत्व अधिक विद्यमान हैं।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>रामकथा इन नामों से प्रचलित</strong></p>
<p style="text-align: justify;">राजस्थान तथा गुजरात के भीलांचल में <strong>‘राम-सीतामानी वारता’</strong> के नाम से रामकथा की वाचिक परंपरा रही है। ‘भीलों के भारथ’ की ही तरह से इस कथा का संकलन भगवानदास पटेल ने किया है। इसमें कुल तीस सर्ग हैं। मुण्डारी रामायण पूर्वी भारत के मुंडा जनजाति में रामकथा का एक अनूठा रूपभेद है। यह मुंडारी साहित्य की मौखिक-वाचिक परंपरा को समृद्ध करता है। कार्बी समुदाय के लोग असम, अरुणाचल, मेघालय, मिजोरम एवं नागालैंड के कुछ हिस्सों में रहते हैं। कालांतर में वैष्णव प्रभाव स्वरूप इनकी मौखिक परंपरा में ‘कार्बी रामायण’ रामकथा का प्रवेश हुआ। बिरहोर रामायण के अनुसार राजा जनक के राज्य में भीषण अकाल पड़ा। गोंड समुदाय में प्रचलित राम कथा में राम की तुलना में सीता को महत्व दिया गया है और उसके बाद लक्ष्मण को। बंजारा (लंबाणी) रामायण में वाल्मीकि और तुलसी कृति राम-कथाओं का एक तरह से ‘जनजातिकरण’ हो गया है।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>रामकथा के जनजातीय पात्र</strong></p>
<p style="text-align: justify;">श्रीराम की वन गमन यात्रा में जनजातीय पात्र है। इन्हीं जनजातीय पात्रों से जुड़े प्रसंगों के कारण भी रामकथा जनजाति क्षेत्रों में प्रचलित है। ये पात्र है- निषादराज गुह, केवट, शबरी, गिद्धराज जटायु, सुग्रीव, हनुमान, जाम्बवन्त, अंगद।</p>
<p style="text-align: justify;">भीली–निषादी लोकगीत के रूप में प्रचलित है &#8211; “गुहा राजा घाट खड़ा, राम लियो अंग लाइ। वन औ नगर एक भए, मित्रता री छाँव छाई॥” केवट लोकभजन के रूप में पूर्वी भारत में गाया जाता है &#8211; “पहिले पाँव पखारब राम, तब नैया चढ़इब हो। मोरे घाट पधारे आज, भाग जगइब हो॥” भील शबरी गीत में राम के वन आगमन को बताया है &#8211; “शबरी रै बेर सजाया, राम आवे वनमां। मीठा-तीता परख परख, धर्या प्रेम थाल मां॥” गोंडी वीरगाथा में जटायु का वर्णन है &#8211; “जटायु पंख पसार उड़े, सीता राखन जाय। प्राण दिए वन धर्म खातिर, राम नाम सुनाय॥” गोंड जनजाति में राम-सुग्रीव मित्रता का उल्लेख आता है &#8211; “सुग्रीवा टोला बोलाया, राम संग हाथ मिलाया। जंगल जन सब साथ चले, रावन राज गिराया॥” गोंड–भील वीर गीत में हनुमान की वीरता को दर्शाया है &#8211; “हनुमंत जंगल रो वीर, राम दूत कहाय। डोंगर फांदी उड़ चल्यो, सीता खबर लाय॥” लोककथा गीत जाम्बवंत के बारे में बताया है &#8211; “जामवंत बूढ़ा ज्ञानी, वीरन राह बताय। भूल गयो बल हनुमंत, शक्ति याद दिलाय॥” युद्ध गीत के रूप में अंगद &#8211; “अंगद पांव जमाय खड़ा, लंका डोले सारी। वन के बालक शक्ति देख, डरी रावन सवारी॥”</p>
<p style="text-align: justify;">स्वामी विवेकानंद ने उदधृत किया &#8211; “भारत की आत्मा ग्रामों और वनों में निवास करती है; रामायण इसी जीवित भारत की कथा है।” आचार्य विनोबा भावे में ‘<em>गीता प्रवचन एवं रामायण चिंतन व्याख्यान’ </em>में कहा है- “रामायण भारत की लोक आत्मा है। इसे जनजातियों ने गाया, जिया और पीढ़ी-दर-पीढ़ी सुरक्षित रखा।” रामधारी सिंह दिनकर अपनी कृति ‘संस्कृति के चार अध्याय’ में कहते है &#8211; “राम केवल अयोध्या के नहीं, वन और पर्वतों के भी नायक हैं।”</p>
<p><span style="color: #0000ff;"><strong>और पढ़े: <a style="color: #0000ff;" href="https://rashtriyashiksha.com/shri-ram-van-gaaman-sthal/" target="_blank" rel="noopener">रामायण सत कोटि अपारा-6 (श्रीराम वन गमन स्थल)</a></strong></span></p>
<p style="text-align: justify;">(लेखक विद्या भारती जोधपुर प्रान्त के संगठन मंत्री है।)</p>
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		<title>छोटे का गांव</title>
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		<dc:creator><![CDATA[राष्ट्रीय शिक्षा]]></dc:creator>
		<pubDate>Fri, 24 Apr 2026 10:16:27 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[कहानी@पंच परिवर्तन]]></category>
		<category><![CDATA[नवीनतम]]></category>
		<category><![CDATA[श्री रवि कुमार जी]]></category>
		<category><![CDATA[आधुनिकता]]></category>
		<category><![CDATA[किसान]]></category>
		<category><![CDATA[ग्राम्यजीवन]]></category>
		<category><![CDATA[जलसंकट]]></category>
		<category><![CDATA[परंपरा]]></category>
		<category><![CDATA[प्रकृति]]></category>
		<category><![CDATA[भारतीयसंस्कृति]]></category>
		<category><![CDATA[मरुभूमि]]></category>
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					<description><![CDATA[<p> &#8211; रवि कुमार मरुभूमि में फलोदी के पास एक गांव में एक किसान रहता था। उसके दो पुत्र व एक पुत्री थी। किसान के पास कृषि योग्य भूमि भी अधिक&#8230; </p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: right;"> &#8211; रवि कुमार</p>
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<p style="text-align: justify;">मरुभूमि में फलोदी के पास एक गांव में एक किसान रहता था। उसके दो पुत्र व एक पुत्री थी। किसान के पास कृषि योग्य भूमि भी अधिक थी। दोनों पुत्रों व पुत्री की प्रारम्भिक शिक्षा गांव के ही विद्यालय में हुई। आगे की शिक्षा के लिए छोटे पुत्र को बड़े नगर में भेज दिया और बड़ा पुत्र व पुत्री की आगे की शिक्षा फलोदी में हुई।</p>
<p style="text-align: justify;">मरुभूमि में जल की उपलब्धता सीमित ही रहती है। सीमित जल में ही कृषि कार्य, पशुधन का पोषण व जीवनयापन यहां का वैशिष्ट्य है। इस वैशिष्टय के साथ यह किसान परिवार भी जीवन जीता रहा। छोटा पुत्र बड़े नगर से अपनी शिक्षा पूर्ण कर गांव में ही आ गया। दोनों पुत्रों की इच्छा थी कि अपना आगे का जीवन गांव में ही रहकर चलेगा, नगर की ओर प्रस्थान नहीं करेंगे। पुत्री भी बड़ी हो गई, उसका भी विवाह कुशलता से हो गया और वह अपने ससुराल में रहने लगी।</p>
<p style="text-align: justify;">किसान की आयु अधिक होने लगी और आयु का प्रभाव शारीरिक क्षमताओं पर दिखने लगा। उसे लगा कि जीवित रहते दोनों भाइयों में सम्पत्ति का बंटवारा कर दूं ताकि बाद में कोई कठिनाई न हो। इस विषय की चर्चा घर में चलते ही दोनों पुत्र नहीं माने। परिवार व गांव का संस्कार जो उनमें था। पर पिताजी का आज्ञा कैसे टाल सकते थे। पिताजी ने बराबर बराबर संपत्ति का बंटवारा कर दिया।</p>
<p style="text-align: justify;">पिताजी के देहांत के पश्चात दोनों पुत्रों का परिवार अपने अपने भाग में रहने लगा। छोटा पुत्र बड़े नगर में रहकर आया था। कभी कभी उसके मन में वहां की चकाचौंध स्मरण हो आती थी। इस मनोभाव का प्रभाव धीरे धीरे उसके व्यवहार व जीवन पर भी होने लगा था।</p>
<p style="text-align: justify;">बहन जब घर पर आती तो उसे भी वह सब दिखने लगा था। उसका मन छोटे के यहां कम व बड़े के यहां अधिक लगता था। छोटे भाई की तुलना में बड़े भाई का व्यवहार, खान-पान, रहन-सहन, जीवन आदि पर ग्राम्य जीवन की छाप दिखाई देती थी। छोटा कभी कभी बड़े भाई को सुझाव भी दे देता था, &#8220;भैया, दुनिया कहां से कहां पहुंच गई है। आप अभी भी पुराने युग में जी रहे हैं। आधुनिकता को अपनाओ।&#8221; बड़ा मुस्कराकर बात को टाल देता था। कोई उत्तर नहीं देता था।</p>
<p style="text-align: justify;">एक दिन उस गांव में एक संत पधारे। बहुत लंबे समय बाद उस संत का उस गांव में आना हुआ। दोनों भाइयों के पिताजी इन संत के भक्त रहे थे। पिताजी जब जीवित थे तब ये संत उस गांव में पधारे थे और इसी परिवार में उनका आवास, सत्संग-प्रवचन कार्यक्रम हुआ था। इस बार भी यहीं रुके बड़े भाई के घर।</p>
<p style="text-align: justify;">दिन में ग्रामवासियों के साथ भेंट का कार्यक्रम था। इस कार्यक्रम के दौरान छोटा भाई भी दर्शन व सान्निध्य हेतु आया था। संत ने पूछा, &#8220;गांव में कैसा है सब?&#8221; गांव के लोगों ने जैसा जैसा था, वैसा उल्लेख किया। संत ने छोटे भाई से पूछा कि “तुम्हारा कैसा चल रहा है जीवन।” छोटे ने उत्तर दिया, &#8220;बहुत अच्छा चल रहा है।&#8221; संत ने पुनः पूछा, &#8220;सब अच्छा चल रहा है या तुम्हें लगता है कि अच्छा चल रहा है?&#8221; छोटे ने कहा कि गुरुवर आपका आशय मैं समझा नहीं।</p>
<p><img decoding="async" class="alignnone wp-image-9291" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2026/04/xRkP8Dlp8BAVe7wlSkw3vkCMXrk8qrkWfjTNK1vkaByf6aQQaVScTfG4G7Zts8PfLeUc7Cr_f93JYJR2t9cc9tTF_47hNG2gdQqWIvCRG13CkwMXrn3UaFji4IMhe3-6BY-O-fLtU7lCi7M9K4uibJAwKSuMRvaENOWOq778zc1LMdiYmxlD4tkAnBfuX7k-300x200.jpg" alt="" width="1679" height="1119" srcset="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2026/04/xRkP8Dlp8BAVe7wlSkw3vkCMXrk8qrkWfjTNK1vkaByf6aQQaVScTfG4G7Zts8PfLeUc7Cr_f93JYJR2t9cc9tTF_47hNG2gdQqWIvCRG13CkwMXrn3UaFji4IMhe3-6BY-O-fLtU7lCi7M9K4uibJAwKSuMRvaENOWOq778zc1LMdiYmxlD4tkAnBfuX7k-300x200.jpg 300w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2026/04/xRkP8Dlp8BAVe7wlSkw3vkCMXrk8qrkWfjTNK1vkaByf6aQQaVScTfG4G7Zts8PfLeUc7Cr_f93JYJR2t9cc9tTF_47hNG2gdQqWIvCRG13CkwMXrn3UaFji4IMhe3-6BY-O-fLtU7lCi7M9K4uibJAwKSuMRvaENOWOq778zc1LMdiYmxlD4tkAnBfuX7k-1024x682.jpg 1024w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2026/04/xRkP8Dlp8BAVe7wlSkw3vkCMXrk8qrkWfjTNK1vkaByf6aQQaVScTfG4G7Zts8PfLeUc7Cr_f93JYJR2t9cc9tTF_47hNG2gdQqWIvCRG13CkwMXrn3UaFji4IMhe3-6BY-O-fLtU7lCi7M9K4uibJAwKSuMRvaENOWOq778zc1LMdiYmxlD4tkAnBfuX7k-768x512.jpg 768w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2026/04/xRkP8Dlp8BAVe7wlSkw3vkCMXrk8qrkWfjTNK1vkaByf6aQQaVScTfG4G7Zts8PfLeUc7Cr_f93JYJR2t9cc9tTF_47hNG2gdQqWIvCRG13CkwMXrn3UaFji4IMhe3-6BY-O-fLtU7lCi7M9K4uibJAwKSuMRvaENOWOq778zc1LMdiYmxlD4tkAnBfuX7k.jpg 1180w" sizes="(max-width: 1679px) 100vw, 1679px" /></p>
<p style="text-align: justify;">संत ने कहा, &#8220;मेरा आशय तुम्हारी जीवन शैली से है, खान-पान, रहन-सहन, व्यवहार आदि से। गांव में बड़ी चर्चा है कि तुम बड़े आधुनिक होते जा रहे हो और अन्यों को भी आधुनिक जीवन जीने के लिए प्रेरित करते रहते हो।&#8221;</p>
<p style="text-align: justify;">&#8220;गुरुवर, आपने सही सुना है। मैं तो बड़े भैया को भी निवेदन करता रहता हूँ, पर वे मानते ही नहीं। हंसकर टाल देते है मेरी बात। आप ही समझाइए इन्हें।&#8221; छोटे ने कहा।</p>
<p style="text-align: justify;">संत ने कहा, &#8220;आधुनिक होना गलत नहीं है। पर किस बात को आधुनिक कहा जाए, ये विचारणीय प्रश्न है।” सबने बड़ी जिज्ञासा भरी नजरों से संत की ओर देखा। संत ने आगे कहा, “घर के आंगन व आसपास पेड़-पौधे न होना आधुनिक है? प्रकृति के निकट न होकर प्रकृति से दूर होना आधुनिक है? घर का सौंदर्य अच्छा करने के लिए बड़े-पुराने फलदार व औषधीय पेड़ों को काटकर उस लकड़ी का प्रयोग करना आधुनिक है?&#8221;</p>
<p style="text-align: justify;">उनमें से एक युवा ने प्रश्न किया, “क्या नगरीय जीवन शैली अपनाना गलत है?” संत ने उत्तर दिया, “आप ही सोचो कि ग्राम्य जीवन की परंपराओं को छोड़कर नगरीय जीवन की बातें जो पश्चिम से आई है, उन्हें अपनाना क्या आधुनिक माना जाएगा?”</p>
<p style="text-align: justify;">संत की बातें सुनकर वहां शून्यता छा गई, समय जैसे रुक-सा गया हो। छोटे को भी समझ आ रहा था कि मैंने आधुनिकता के नाम पर क्या किया है और इसी आधुनिकता के लिए गांव में मैं जो प्रेरणा दे रहा था, वह कुछ और ही था। वहां उपस्थित कुछ युवा जो छोटे की बातों से अब तक सहमत होते थे, उनकी आंखें खुल रही थी।</p>
<p style="text-align: justify;">(लेखक विद्या भारती जोधपुर प्रान्त के संगठन मंत्री है।)</p>
<p><strong>और पढ़ें : <span style="color: #0000ff;"><a style="color: #0000ff;" href="https://rashtriyashiksha.com/rally-of-pratap/" target="_blank" rel="noopener">प्रताप की रैली</a></span> </strong></p>
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		<title>प्रताप की रैली</title>
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		<dc:creator><![CDATA[राष्ट्रीय शिक्षा]]></dc:creator>
		<pubDate>Fri, 14 Nov 2025 07:23:05 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[कहानी@पंच परिवर्तन]]></category>
		<category><![CDATA[नवीनतम]]></category>
		<category><![CDATA[श्री रवि कुमार जी]]></category>
		<category><![CDATA[जल दिवस]]></category>
		<category><![CDATA[जल संरक्षण]]></category>
		<category><![CDATA[जैसलमेर]]></category>
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					<description><![CDATA[<p> &#8211; रवि कुमार माँ प्रताप की विद्यालय के लिए तैयारी में सहायता कर रही है। माँ-पुत्र का संवाद भी साथ साथ चल रहा है। माँ ने पूछा, ‘आज विद्यालय में&#8230; </p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: right;"> &#8211; रवि कुमार</p>
<p><img decoding="async" class="alignnone wp-image-9093" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2025/11/85969-e1763104716848-300x201.jpg" alt="" width="1728" height="1158" srcset="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2025/11/85969-e1763104716848-300x201.jpg 300w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2025/11/85969-e1763104716848-1024x685.jpg 1024w" sizes="(max-width: 1728px) 100vw, 1728px" /></p>
<p style="text-align: justify;">माँ प्रताप की विद्यालय के लिए तैयारी में सहायता कर रही है। माँ-पुत्र का संवाद भी साथ साथ चल रहा है। माँ ने पूछा, ‘आज विद्यालय में कुछ विशेष है क्या?’ प्रताप कहता है, ‘कल भैया जी (आचार्य) ने कुछ बताया तो था वंदना सभा में, याद नहीं आ रहा कि क्या है। वापसी आकर बता दूंगा।’ प्रताप याद करने का प्रयास करता है, पर याद आता नहीं।</p>
<p style="text-align: justify;">जैसलमेर नगर के उस विद्यालय में जाकर प्रताप को आज के विशेष कार्यक्रम की तैयारी होते दिखी। आज जल दिवस है। दीदी के साथ विद्यार्थियों का एक दल जल संरक्षण के स्लोगन की पट्टियों को व्यवस्थित करने में लगा था। प्रताप सोचना है कि यह मुझे याद क्यों नहीं रहा। क्योंकि जल सरंक्षण जैसलमेर जैसे क्षेत्र में सामान्य व्यवहार में जो है, इसलिए सहज ही है जल दिवस। यहां प्रतिदिन जल दिवस होता है। इसलिए जल दिवस के आयोजन का विशेष आकर्षण नहीं।</p>
<p style="text-align: justify;">परंतु नवीन पीढ़ी को अपने क्षेत्र की आवश्यकता व व्यवहार को आदत में बनाए रखना है, इसलिए विद्यालय में जल दिवस का आयोजन रखा गया है। वंदना सभा प्रारंभ हुई। सरस्वती वंदना के पश्चात बड़े भैया जी (प्रधानाचार्य) ने जल के महत्व पर छोटा सा बौद्धिक दिया जिसे विद्यार्थियों ने ध्यानपूर्वक सुना। एक-दो कार्यक्रम जल के महत्व को समझाते हुए भी सम्पन्न हुए। अब विज्ञान वाले भैया जी जो आज के कार्यक्रम के संयोजक थे, ने सूचनाएं दी। सूचना जल संरक्षण पर निकाली जाने वाली रैली को लेकर थी। प्रताप भी सुन रहा था। सूरज सिर पर चढ़ आया है, गर्मी बहुत है और नगर भर में पैदल रैली। यह सोचकर प्रताप मन में असहज हो रहा था।</p>
<p style="text-align: justify;">रैली बड़े उत्साह से प्रारम्भ हुई। नगर का भ्रमण हुआ। श्लोगन, बैनर ‘जल है तो कल है’, ‘जल ही जीवन है’, ‘बिन पानी सब सून’ आदि से उल्लेखित थे। विद्यार्थी नारे भी लगा रहे थे। एक दल जल संरक्षण पर गीत भी गा रहा था। बहुत ही भव्य रैली! नगर के लोगों में आज इस रैली के कारण जल के महत्व व संरक्षण की चर्चा रही।</p>
<p style="text-align: justify;">रैली पश्चात प्रतिदिन की तरह कक्षाएं प्रारंभ हुई। प्रताप आज थोड़ा असहज था। रैली में पसीना जो खूब बह गया था। घर जाकर सबसे पहले स्नान करूँगा, ये भाव बार बार मन में आ रहे थे। विद्यालय का समय पूर्ण हुआ और प्रताप घर पहुंचा। घर पहुंचने पर माँ ने प्रताप का स्वागत किया और जिज्ञासा भी व्यक्त की, ‘आज क्या विशेष हुआ विद्यालय में?’ पर प्रताप बिना कोई जवाब दिए, सीधे स्नान घर में। काफी देर हो गई, प्रताप बाहर नहीं आया। पानी बहने की ध्वनि से ध्यान आया कि पानी से खूब नहाया जा रहा है। माँ को पड़ोस से पता चला कि आज नगर में जल संरक्षण पर विद्यार्थियों की रैली हुई है। माँ तुरंत समझ गई।</p>
<p style="text-align: justify;">आज के विशेष कार्यक्रम के बारे में प्रताप बताएं इससे पहले ही माँ ने कहा, ‘जल संरक्षण की रैली का ये अर्थ नहीं कि उसके बाद स्नान करने में जल अधिक बहाया जाए।’ ‘माँ आज रैली में पसीना बहुत बहा।’ प्रताप ने कहा। माँ विद्यालय द्वारा आयोजित अभिभावक गोष्टी के कार्यक्रमों में कई बार सहभागी हुई थी और वहां हुए प्रबोधन को ठीक से आत्मसात भी किया था। माँ ने प्रताप को समझाया कि “जल हमारे जीवन की आवश्यकता है। हम इसका अपव्यय न करके इसका सही व सीमित उपयोग करेंगे तो यह हमारे लिए ही भविष्य में उपलब्ध रहेगा। यदि हम ही इसका अपव्यय करते रहे तो एक समय हम इसके लिए तरसेंगे।”</p>
<p style="text-align: justify;">ईशावास्य उपनिषद में व्यक्त ‘तेन त्यक्तेन भुंजीथा’ अर्थात त्याग की दृष्टि से उपभोग करो, इस जीवन दृष्टि को सरल शब्दों में माँ ने प्रताप को समझाया। प्रताप के मुख के भाव बता रहे थे कि उसे कुछ कुछ समझ आ रहा था।</p>
<p style="text-align: justify;">(लेखक विद्या भारती जोधपुर प्रान्त के संगठन मंत्री है।)</p>
<p><strong>और पढ़ें : <span style="color: #0000ff;"><a style="color: #0000ff;" href="https://rashtriyashiksha.com/pani-puri-thela/" target="_blank" rel="noopener">पानी पूरी का ठेला</a></span></strong></p>
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		<title>2047 का विश्व गुरु भारत</title>
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		<dc:creator><![CDATA[राष्ट्रीय शिक्षा]]></dc:creator>
		<pubDate>Sun, 28 Sep 2025 01:59:39 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[लेख]]></category>
		<category><![CDATA[श्री रवि कुमार जी]]></category>
		<category><![CDATA[2047 का विश्वगुरु भारत]]></category>
		<category><![CDATA[Bharat the Vishwa guru of 2047]]></category>
		<category><![CDATA[Bhartiya Education]]></category>
		<category><![CDATA[IKS]]></category>
		<category><![CDATA[Rashtriya shiksha]]></category>
		<category><![CDATA[भारतीय ज्ञान परम्परा]]></category>
		<category><![CDATA[राष्ट्रीय शिक्षा]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>&#8211; रवि कुमार भारत विश्व गुरु रहा है और 21वीं शताब्दी में पुनः उसी दिशा में अग्रसर है। 2012 के बाद राष्ट्र शक्ति के जनजागरण से धारा 370 हटाने, श्रीराम&#8230; </p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: right;">&#8211; रवि कुमार</p>
<h4 style="text-align: justify;">भारत विश्व गुरु रहा है और 21वीं शताब्दी में पुनः उसी दिशा में अग्रसर है। 2012 के बाद राष्ट्र शक्ति के जनजागरण से धारा 370 हटाने, श्रीराम मंदिर निर्माण और स्वतंत्रता अमृत महोत्सव जैसे बड़े घटनाक्रम हुए। प्रधानमंत्री द्वारा बताए गए <em data-start="230" data-end="239">पंचप्रण</em> और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ द्वारा सुझाए गए सामाजिक-आध्यात्मिक परिवर्तन विश्व गुरु भारत@2047 का आधार हैं। आज भारत आईटी, रक्षा, अंतरिक्ष, अवसंरचना और स्वास्थ्य के क्षेत्र में आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ रहा है। चुनौतियाँ शिक्षा की गुणवत्ता, तकनीकी आत्मनिर्भरता, सामाजिक न्याय, पर्यावरण संरक्षण और नई शिक्षा नीति के प्रभावी क्रियान्वयन की हैं। भारत का मार्ग केवल भौतिक विकास से नहीं, बल्कि मानवीय और आध्यात्मिक मूल्यों से प्रशस्त होगा। प्राचीन ज्ञान व आधुनिक तकनीक के संगम से भारत 2047 तक ‘नया भारत, समर्थ भारत’ बनकर विश्व का नेतृत्व करेगा।</h4>
<p style="text-align: justify;">भारत विश्व गुरु था। अमेरिका के बड़े चिंतक व इतिहासविद् हुए है – Will Durant. उन्होंने भारत के बारे में लिखा है – “India was the Motherland of our race, and Sanskrit, the mother of Europe’s languages, was the mother of our philosophy; mother through the Arabs, of much of our mathematics; mother, through the Buddha, of the ideals embodied in Christianity; mother, through the village community, of self-government and democracy. Mother India is in many ways the mother of us all.” (India Mother of Us All &#8211; Author Chaman Lal). ये शब्द भारत के विश्व गुरु होने की झलक दिखाते हैं।</p>
<p style="text-align: justify;">राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पंचम् सरसंघचालक माननीय सुदर्शन जी कहा करते थे कि सन 2012 और उसके बाद का समय भारत के लिए संधिकाल का समय है। 2012 के बाद भारत में राष्ट्र शक्ति का जनजागरण होगा और भारत विश्व के नेतृत्व की स्थिति की ओर आगे बढ़ेगा। अगर हम 2012 से 2025 का कालखंड देखते है तो माननीय सुदर्शन जी का कहा एकदम सही प्रतीत होता है।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>परिवर्तन</strong> <strong>की दिशा</strong></p>
<p style="text-align: justify;">सन् 2013 में स्वामी विवेकानन्द के जन्म के 150 वर्ष पूर्ण होने पर पूरे देशभर में विवेकानन्द सार्धशती के कार्यक्रमों ने हिंदुत्व के जनजागरण की एक लहर ला दी। सन् 2014 के लोकसभा चुनाव में हिंदुत्व आधारित विचारों को मानने वालों की सरकार बनी। 5 अगस्त 2019 को भारत राष्ट्र की एकता व अखंडता के लिए आवश्यक कदम उठाया गया और धारा 370 को हटा दिया गया। 9 नवम्बर 2019 को श्रीराम मंदिर अयोध्या पर सर्वोच्च न्यायालय का फैसला आया और 5 अगस्त 2020 को मन्दिर निर्माण का कार्य आरम्भ होकर 22 जनवरी 2024 को श्रीराम मंदिर का उद्घाटन हुआ। ये इस शताब्दी में भारत में राष्ट्र शक्ति शक्ति जनजागरण के बड़े चार घटनाक्रम है।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>2047 के विश्व भारत के लिए आह्वान</strong></p>
<p style="text-align: justify;">सन् 2022-23 राष्ट्रीय स्वतंत्रता का अमृत महोत्सव हम सबने मनाया। इसके बाद के 25 वर्ष यानी 2047 तक का कालखंड अमृतकाल घोषित हुआ। इस अमृतकाल के लिए देश के प्रधानमंत्री माननीय श्री नरेन्द्र मोदी ने ‘पंचप्रण’ बताएं – १. विरासत का गौरव २. गुलामी की मानसिकता से मुक्ति ३. विकसित भारत ४. एकता और एकजुटता ५. नागरिकों का कर्त्तव्य। इन ‘पंचप्रण’ को लेकर अगले 25 वर्ष अमृतकाल में कार्य होना है।</p>
<p style="text-align: justify;">राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के वर्तमान सरसंघचालक माननीय डॉ. मोहन भागवत जी ने 2021 के विजयादशमी उद्बोधन में कहा कि अगर व्यक्ति के जीवन, परिवार, आचरण और स्वभाव, राष्ट्र एवं समाज को बदलना है तो शुरुआत स्वयं से करनी होगी। उन्होंने देश के प्रत्येक व्यक्ति, परिवार, समाज एवं जीवन के प्रत्येक घटक में पांच परिवर्तनों की बात कही – १. सामाजिक समरसता युक्त जीवन, २. मूल्य आधारित समाज अर्थात कुटुंब प्रबोधन, ३. पर्यावरण केंद्रित जीवन शैली, ४. नागरिक कर्त्तव्यों का पालन एवं ५. स्वत्व के बोध के आधार पर नव युग निर्माण। इन पांच परिवर्तनों के आधार पर उन्होंने समाज परिवर्तन का आह्वान किया।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>नया भारत समर्थ भारत</strong></p>
<p style="text-align: justify;">भारत अपने इतिहास के महत्वपूर्ण मोड़ पर खड़ा है। 21वीं शताब्दी भारत की शताब्दी है। इस समय भारत सकल घरेलू उत्पाद की दृष्टि से विश्व की चौथी सबसे बड़ी अर्थ व्यवस्था है जबकि क्रय-शक्ति क्षमता की दृष्टि से विश्व की तीसरी सबसे बड़ी अर्थ व्यवस्था है। 2047 में भारत 30 ट्रिलियन डॉलर की अर्थ व्यवस्था के साथ विकसित भारत <strong>‘नया भारत समर्थ भारत’</strong> बनने की दिशा में अग्रसर है। इस शताब्दी के एक चौथाई भाग में भारत ने विभिन्न क्षेत्रों में स्वदेशी तकनीक का विकास, आत्म निर्भरता व निरन्तर प्रगति की ओर सफलता पाई है &#8211;</p>
<ol style="text-align: justify;">
<li>सूचना प्रौद्योगिकी (सॉफ्टवेयर व आउटसोर्सिंग, डिजिटल इंडिया &#8211; UPI, CoWIN, स्टार्टअप इकोसिस्टम)</li>
<li>उद्योग धंधे (इलेक्ट्रॉनिक्स और सेमीकंडक्टर, ऑटोमोबाइल सेक्टर व रक्षा उत्पादन)</li>
<li>भौतिक अवसंरचना (भारतमाला, सागरमाला, मेट्रो नेटवर्क, वन्देभारत एक्सप्रेस, स्मार्ट सिटीज, डिजिटल इंफ्रा)</li>
<li>सैन्य शक्ति और रक्षा प्रौद्योगिकी (स्वदेशी हथियार &#8211; DRDO और ISRO द्वारा अग्नि मिसाइल, पृथ्वी, आकाश, और रुद्र हेलिकॉप्टर; सैन्य निर्यात &#8211; ब्रह्मोस, तेजस, और INS विक्रांत)</li>
<li>आर्थिक क्षेत्र – आधारभूत संरचना के विकास के लिए जीएसटी संग्रह, सकल घरेलू उत्पाद GDP में बढ़ावा, डिजिटल पेमेंट</li>
<li>आंतरिक सुरक्षा &#8211; नक्सलवाद, माओवाद, आतंकवाद व अलगाववाद पर लगाम</li>
<li>विदेश नीति (जी-20, नेबरहुड फर्स्ट पॉलिसी, QUAD व BRICS में सक्रिय भूमिका)</li>
<li>स्वास्थ्य (कोविड-19 वैक्सीन निर्माण, 200+देशों को दवाएं निर्यात, आयुष्मान भारत)</li>
<li>शिक्षा (IITs व IIITs का विस्तार, स्वदेशी एडटेक, ISRO-DRDO-CSIR द्वारा शोध व विकास)</li>
<li>यातायात और परिवहन (मेट्रो व हाइवे, हाई स्पीड रेल, ईवी इंफ्रा)</li>
<li>अंतरिक्ष (मंगल मिशन 2014, चंद्रयान-3 2023, नेविगेशन सिस्टम NAVIC) आदि।</li>
</ol>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="wp-image-9001 aligncenter" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2025/09/पंच-परिवर्तन-300x121.webp" alt="2047 का विश्वगुरु भारत" width="620" height="250" srcset="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2025/09/पंच-परिवर्तन-300x121.webp 300w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2025/09/पंच-परिवर्तन-1024x414.webp 1024w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2025/09/पंच-परिवर्तन-768x311.webp 768w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2025/09/पंच-परिवर्तन.webp 1280w" sizes="auto, (max-width: 620px) 100vw, 620px" /></p>
<p style="text-align: justify;"><strong>विश्व गुरु भारत@2047 के लिए चुनौतियाँ व मार्ग</strong></p>
<ol style="text-align: justify;">
<li>2047 के विश्व गुरु भारत के लिए सबसे पहली व बड़ी चुनौती <strong>गुणवत्तापूर्ण मानव संसाधन विकास</strong> है। ईशावास्य उपनिषद में वर्णन है – <strong>“विद्यां चाविद्यां च यस्तद्वेदोभयं सह। अविद्यया मृत्युं तीर्त्वा विद्ययाऽमृतमश्नुते॥११॥ अर्थात &#8220;जो विद्या (पारलौकिक शिक्षा) और अविद्या (लौकिक शिक्षा) दोनों को एक साथ जानता है</strong><strong>, वह अविद्या से मृत्यु को पार करके विद्या से अमृतत्व (अमरता) को प्राप्तकरता है।&#8221; </strong>इस सिद्धांत के प्रकाश में भारत में शिक्षा की गुणवत्ता बहुत अधिक बढ़ाने का आवश्यकता है। तकनीकी कौशल के लिए व्यावसायिक प्रशिक्षण, डिजिटल साक्षरता अभियान और स्किल इण्डिया मिशन को सुदृढ़ कर रोजगार और शिक्षा में संतुलन बनाना होगा।</li>
<li>2047 के समर्थ भारत के लिए दूसरी बड़ी चुनौती <strong>प्रौद्योगिकी में आत्मनिर्भरता</strong> है। <strong>दीनदयाल जी ने एकात्म मानव दर्शन में कहा है कि पुरानी बातों का युगानुकुल व विदेशी बातों का स्वदेशानुकुल परिवर्तन कर उपयोग करना चाहिए।</strong> इस सिद्धांत के आधार पर हम प्रौद्योगिकी में आत्मनिर्भर बन सकते है। सेमीकंडक्टर, AI, क्वांटम कंप्यूटिंग में निवेश बढ़ाना होगा, बायोटेक्नोलॉजी में स्वदेशी क्षमता विकसित करनी होगी, स्टार्टअप इकोसिस्टम का लाभ मिल रहा है इसे और बढ़ावा देना होगा। विदेशी तकनीक का युगानुकुल स्वदेशीकरण करना होगा।</li>
<li>तीसरी सबसे बड़ी चुनौती <strong>सामाजिक न्याय और समानता</strong> की है। आर्थिक असमानता में कहीं न कहीं वृद्धि हो रही है। लैंगिक असमानता एवं शहरी-ग्रामीण का अंतर एक तरफ कम हो रहा है, दूसरी ओर जाति-पंथ के आधार पर समाज को विभाजित करने का सिद्धांत व षड्यंत्र विकसित हो रहा है। <strong>संविधान की उद्देशिका में न्याय</strong><strong>, स्वतंत्रता, समता और बंधुता शब्दों का प्रयोग किया गया है।</strong> इनमें अंतर्निहित भाव को व्यवहार रूप में लाकर समावेशी विकास मॉडल अपनाना होगा। ‘सबका साथ, सबका विकास’ के साथ महिला सशक्तिकरण कार्यक्रमों को प्रभावी बनाना तथा भारत की अर्थ-व्यवस्था का आधार ग्रामीण विकास में विशेष निवेश के अवसर प्रदान करने होंगे।</li>
<li>चौथी महत्वपूर्ण चुनौती <strong>पर्यावरण संरक्षण</strong> की है। विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन कैसे बने? जलवायु परिवर्तन का प्रभावों का सामना कैसे हो? प्रदूषण की समस्या को कम कैसे किया जाएं? प्राकृतिक संसाधनों का ह्रास न करते हुए विकास की गति कैसे बढाई जाएं? ये बहुत से प्रश्न पर्यावरण संरक्षण की दृष्टि स खड़े है। <strong>ईशावास्य उपनिषद में प्रथम श्लोक में वर्णन है – ‘तेन त्यक्तेन भुंजीथा’ अर्थात त्याग की दृष्टि से उपभोग करो। </strong>यह सूत्र पर्यावरण संबंधी सभी प्रश्नों का उत्तर है। इस प्रकाश में हरित प्रौद्योगिकी का विकास को बढ़ावा, नवीकरणीय ऊर्जा में निवेश, टिकाऊ विकास मॉडल अपनाना, पर्यावरण संरक्षण में जन भागीदारी आदि के द्वारा इस चुनौती का समाधान कर सकते है।</li>
<li><strong>राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020</strong> &#8211; 29 जुलाई 2020 को देश को नई दिशा प्रदान करने वाली भारत केंद्रित राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 लागू की गई जोकि भविष्य में भारत की युवा पीढ़ी को मानसिक गुलामी से छुटकारा दिलाएगी ही, साथ ही साथ 21वीं शताब्दी की युगानुकूल आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए भी नई पीढ़ी को सुसज्ज करेगी। इस नीति के क्रमांक 12.8 में विश्व गुरु शब्द का प्रयोग किया गया है। भारत के सरकारी दस्तावेजों में शायद पहली बार ऐसा हुआ होगा। <strong>अटल</strong> <strong>इन्नोवेशन मिशन (</strong><strong>AIM)</strong><strong>, शिक्षा प्रौद्योगिकी (</strong><strong>EduTech </strong><strong>&#8211; </strong><strong>Education Technology)</strong><strong>, भारतीय भाषाओं को बढ़ावा, भारतीय ज्ञान परंपरा, उच्च शिक्षा में परिवर्तन, कौशल विकास &#8211; ये राष्ट्रीय शिक्षा नीति के आयाम है जो विश्व गुरु भारत@2047 में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले हैं</strong>।</li>
</ol>
<p style="text-align: justify;">डॉ. कलाम ने पुस्तक “भारत 2020: ए विज़न फॉर द न्यू मिलेनियम” की भूमिका के अंत में कहा – “विकसित भारत की कल्पना स्वप्न मात्र नहीं है। यह कुछ गिने-चुने भारतीयों की प्रेरणा मात्र भी नहीं होना चाहिए-यह हम सब भारतीयों का मिशन होना चाहिए, जिसे हमें पूर्ण करना है।”</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>विश्व गुरु की दृष्टि</strong></p>
<p style="text-align: justify;">विश्वगुरु बनने का मार्ग केवल भौतिक-आर्थिक विकास से नहीं बल्कि मानवीय मूल्यों से प्रशस्त होता है। महर्षि अरविंद ने 15 अगस्त 1947 को आकाशवाणी पर कहा कि <strong>&#8220;मनुष्य की तरह हर राष्ट्र की एक नियति होती है। भारत की नियति आध्यात्मिक नियति है और विश्व को आध्यात्मिकता की रोशनी दिखाना भारत का कर्तव्य है।”</strong> भारत की भौतिक समृद्धि के साथ आध्यात्मिक और नैतिक उन्नति पर भी ध्यान देना होगा। स्वामी विवेकानंद जी ने कहा है – <strong>“हर देश के पास देने के लिए एक संदेश है</strong><strong>, पूरा करने के लिए एक मिशन है, एक नियति तक पहुंचने के लिए। भारत का मिशन मानवता का मार्गदर्शन करना रहा है।”</strong> भारत की प्राचीन बुद्धिमत्ता और आधुनिक तकनीक का संयोजन आवश्यक होगा। विश्व गुरु भारत@2047 के लिए राष्ट्रीय संकल्प और तत्काल कार्य योजना बनाने की आवश्यकता है। भारत की सांस्कृतिक धरोहर, युवा शक्ति और तकनीकी क्षमता से इस लक्ष्य की प्राप्ति संभव है।</p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>और पढ़े :</strong></span> <span style="color: #0000ff;"><strong><a style="color: #0000ff;" href="https://rashtriyashiksha.com/bharat-will-become-world-leader-again-with-the-thoughts-of-bharatiya-sages/" target="_blank" rel="noopener">भारतीय मनीषियों के विचारों से भारत पुन: बनेगा विश्वगुरु</a></strong></span></p>
<p style="text-align: justify;">(लेखक विद्या भारती जोधपुर प्रान्त के संगठन मंत्री है।)</p>
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		<title>पानी पूरी का ठेला</title>
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		<dc:creator><![CDATA[राष्ट्रीय शिक्षा]]></dc:creator>
		<pubDate>Sun, 17 Aug 2025 02:23:56 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[कथा-कहानी]]></category>
		<category><![CDATA[कथा/कहानी]]></category>
		<category><![CDATA[कहानी@पंच परिवर्तन]]></category>
		<category><![CDATA[श्री रवि कुमार जी]]></category>
		<category><![CDATA[IKS]]></category>
		<category><![CDATA[Rashtriya shiksha]]></category>
		<category><![CDATA[पंच परिवर्तन]]></category>
		<category><![CDATA[पर्यावरण संरक्षण]]></category>
		<category><![CDATA[भारतीय ज्ञान परम्परा]]></category>
		<category><![CDATA[राष्ट्रीय शिक्षा]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>&#8211; रवि कुमार ‘पानी पूरी’ नाम सुनते ही मुंह में पानी आ जाता है। मारवाड़ के एक नगर के मोहल्ले के नुक्कड़ पर पानी पूरी का ठेला लगता है। मोहल्ले&#8230; </p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: right;">&#8211; रवि कुमार</p>
<p style="text-align: justify;">‘पानी पूरी’ नाम सुनते ही मुंह में पानी आ जाता है। मारवाड़ के एक नगर के मोहल्ले के नुक्कड़ पर पानी पूरी का ठेला लगता है। मोहल्ले के सब लोग बच्चे-बड़े-जवान, महिला-पुरुष अपनी इच्छानुसार उस ठेले से पानी पूरी खाते हैं। पानी पूरी स्वादयुक्त होने के कारण नियमित रूप से बिक्री बढ़ ही रही है। अब आसपास के मोहल्ले के लोग भी आने लगे हैं। अलग-अलग स्थानों पर पानी पूरी को गोल-गप्पे, पानी-पतासे आदि भी कहते हैं।</p>
<p style="text-align: justify;">एक दिन 12 वर्ष की कोमल ठेले के पास आकर खड़ी होती है। ठेले का निरीक्षण करती है और चली जाती है। ठेले वाले का विशेष ध्यान उसकी ओर नहीं जाता। ऐसा सामान्यतः नहीं होता कि ठेले वाले का अपने ग्राहक की ओर ध्यान न जाए।</p>
<p style="text-align: justify;">कोमल अगले दिन, और उससे अगले दिन भी यही करती है और बिना पानी पूरी खाए चली जाती है। पहले दिन भीड़ अधिक थी, अगले दो दिन सामान्य भीड़ थी तो ठेले वाले का ध्यान कोमल की ओर गया। उसके मन में कुछ प्रश्न उठने लगे कि कोमल ऐसा क्यों कर रही है। पूर्व में तो ऐसा किसी व्यक्ति ने नहीं किया। फिर कोमल क्या व क्यों ऐसा कर रही है। अपनी जिज्ञासा शान्त करने के लिए ठेले वाला कोमल की प्रतीक्षा करता है। चौथे दिन कोमल ठेले पर नहीं आती। तब यह जिज्ञासा और बढ़ जाती है। फिर कोमल के आने की प्रतीक्षा&#8230;</p>
<p style="text-align: justify;">पांचवें दिन जैसे ही कोमल ठेले पर आती है तो ठेले वाला तुरन्त प्रश्न पूछ लेता है, &#8220;कोमल! तुम आती हो और बिना पानी पूरी खाए ही चली जाती हो। ऐसा क्यों?&#8221; ‘ऐसा क्यों?’ में मानो बहुत प्रश्न ठेले वाले ने कोमल की ओर बढ़ा दिए हो।</p>
<p style="text-align: justify;">कोमल कुछ कहती नहीं। पुनः निरीक्षण कर चली जाती है। अब जिज्ञासा अपने चरम पर..कल फिर पूछुंगा यह सोचकर ठेले वाला शेष ग्राहकों को पानी पूरी खिलाने लग जाता है।</p>
<p style="text-align: justify;">छठवें दिन, कोमल के आने की प्रतीक्षा..। आज वह प्रतिदिन की बजाय थोड़ी देरी से आई। तब तक ग्राहक बहुत कम हो गए थे। ठेले वाले ने तुरन्त कोमल से पूछा &#8220;मेरे कल के प्रश्न पर तुम कुछ बोली नहीं।&#8221;</p>
<p style="text-align: justify;">कोमल चुप्पी तोड़ती है और कहती है- &#8220;भैया, आपके ठेले पर पहले स्टील की कटोरी में पानी पूरी खिलाते थे। अब डिस्पोजल में क्यों खिलाते है।&#8221; 12 वर्ष की कोमल का यह मात्र प्रश्न नहीं था, बल्कि आज के समाज की वस्तु स्थिति है कि सब ओर डिस्पोजल का ही बोलबाला है।</p>
<p style="text-align: justify;">एक ग्राहक तुरन्त बोला &#8220;आजकल तो सब जगह डिस्पोजल ही चलते हैं।&#8221; ठेले वाले ने उसकी हाँ में अपने स्वर में हाँ मिलाया। फिर कहा- &#8220;स्टील की कटोरी धोने की व्यवस्था भी अलग से करनी पड़ती है। डिस्पोजल में सुविधा है। धोने की जरूरत भी नहीं और उपयोग में सरलता भी।&#8221;</p>
<p style="text-align: justify;">यह सुनकर कोमल ऊंचे स्वर में बोली &#8220;पर भैया, पर्यावरण का क्या होगा इससे! आपने कभी सोचा है?&#8221; यह कहकर कोमल ने बहुत बड़ा प्रश्न ठेले वाले व वहां खड़े ग्राहकों के सामने खड़ा कर दिया। अब इस प्रश्न का उत्तर कौन देवे।</p>
<p style="text-align: justify;">पर्यावरण को सबसे अधिक हानि पहुंचाने का काम प्लास्टिक डिस्पोजल ने किया है। मानव जीवन की निर्भरता इस दानव रूपी तत्व पर बढ़ गई है। पर्यावरण के साथ साथ मानव स्वास्थ्य को यह दानव हानि पहुंचा रहा है। मानव शरीर में माइक्रो प्लास्टिक के कणों के रूप में यह दानव अनेक रोगों व बीमारियों का कारण बन रहा हैं।</p>
<p style="text-align: justify;">उत्तर तो कोमल के इस प्रश्न का किसी ने नहीं दिया, पर उस मोहल्ले में लोगों ने अवश्य सोचना शुरू कर दिया कि डिस्पोजल के प्रयोग से पर्यावरण का क्या होगा!</p>
<p style="text-align: justify;"><span style="color: #ff0000;"><strong>और पढ़े :<span style="color: #0000ff;"> <a style="color: #0000ff;" href="https://rashtriyashiksha.com/path-to-swadeshi/" target="_blank" rel="noopener">स्वदेशी का पथ</a></span></strong></span></p>
<p style="text-align: justify;">(लेखक विद्या भारती जोधपुर प्रान्त के संगठन मंत्री है।)</p>
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		<title>21वीं शताब्दी का भारत</title>
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		<dc:creator><![CDATA[राष्ट्रीय शिक्षा]]></dc:creator>
		<pubDate>Sun, 29 Jun 2025 06:22:04 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[नवीनतम]]></category>
		<category><![CDATA[लेख]]></category>
		<category><![CDATA[श्री रवि कुमार जी]]></category>
		<category><![CDATA[bharat]]></category>
		<category><![CDATA[Digital India]]></category>
		<category><![CDATA[Made In India]]></category>
		<category><![CDATA[Make In India]]></category>
		<category><![CDATA[Rashtriya shiksha]]></category>
		<category><![CDATA[भारत]]></category>
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					<description><![CDATA[<p> -रवि कुमार 21वीं शताब्दी के भारत की चर्चा केवल भारत ही नहीं तो बल्कि विश्व में सर्वत्र है। 21वीं शताब्दी का भारत कैसा होगा, यदि इसकी चर्चा शताब्दी के प्रारंभ&#8230; </p>
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]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: right;"> -रवि कुमार</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone  wp-image-8843" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2025/06/456-300x169.jpg" alt="" width="1725" height="972" srcset="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2025/06/456-300x169.jpg 300w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2025/06/456-1024x576.jpg 1024w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2025/06/456-768x432.jpg 768w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2025/06/456.jpg 1280w" sizes="auto, (max-width: 1725px) 100vw, 1725px" /></p>
<p style="text-align: justify;">21वीं शताब्दी के भारत की चर्चा केवल भारत ही नहीं तो बल्कि विश्व में सर्वत्र है। 21वीं शताब्दी का भारत कैसा होगा, यदि इसकी चर्चा शताब्दी के प्रारंभ में करते थे तो चित्र धुंधला दिखाई पड़ता था। परंतु अब, जब इस शताब्दी का एक चौथाई भाग बीत चुका है तो चित्र एकदम स्पष्ट दिखता है। 21वीं शताब्दी भारत के लिए एक नए सूर्योदय की तरह है।</p>
<p style="text-align: justify;">राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पंचम् सरसंघचालक माननीय सुदर्शन जी कहा करते थे कि सन 2012 और उसके बाद का समय भारत के लिए संधिकाल का समय है। 2012 के बाद भारत में हिंदुत्व की शक्ति का जनजागरण होगा और भारत विश्व के नेतृत्व की स्थिति की ओर आगे बढ़ेगा। अगर हम 2012 से 2025 का कालखंड देखते है तो माननीय सुदर्शन जी का कहा एकदम सही प्रतीत होता है।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>परिवर्तन की दिशा</strong></p>
<p style="text-align: justify;">सन् 2013 में स्वामी विवेकानन्द के जन्म के 150 वर्ष पूर्ण होने पर पूरे देशभर में विवेकानन्द सार्धशती के कार्यक्रमों ने हिंदुत्व के जनजागरण की एक लहर ला दी। सन् 2014 के लोकसभा चुनाव में हिंदुत्व आधारित विचारों को मानने वालों की सरकार बनी। 5 अगस्त 2019 को भारत राष्ट्र की एकता व अखंडता के लिए आवश्यक कदम उठाया गया और धारा 370 को हटा दिया गया। 9 नवम्बर 2019 को श्रीराम मंदिर अयोध्या पर सर्वोच्च न्यायालय का फैसला आया और 5 अगस्त 2020 को मन्दिर निर्माण का कार्य आरम्भ होकर 22 जनवरी 2024 को श्रीराम मंदिर का उद्घाटन हुआ। ये इस शताब्दी में भारत में हिंदुत्व शक्ति जनजागरण के बड़े चार घटनाक्रम है।</p>
<p style="text-align: justify;">इस शताब्दी के एक चौथाई भाग में भारत ने विभिन्न क्षेत्रों में स्वदेशी तकनीक का विकास, आत्म निर्भरता व निरन्तर प्रगति की ओर सफलता पाई है &#8211;</p>
<ol style="text-align: justify;">
<li>सूचना प्रौद्योगिकी (सॉफ्टवेयर व आउटसोर्सिंग, डिजिटल इंडिया &#8211; UPI, CoWIN, स्टार्टअप इकोसिस्टम)</li>
<li>उद्योग धंधे (इलेक्ट्रॉनिक्स और सेमीकंडक्टर, ऑटोमोबाइल सेक्टर व रक्षा उत्पादन)</li>
<li>भौतिक अवसंरचना (भारतमाला, सागरमाला, मेट्रो नेटवर्क, वन्देभारत एक्सप्रेस, स्मार्ट सिटीज, डिजिटल इंफ्रा)</li>
<li>सैन्य शक्ति और रक्षा प्रौद्योगिकी (स्वदेशी हथियार &#8211; DRDO और ISRO द्वारा अग्नि मिसाइल, पृथ्वी, आकाश, और रुद्र हेलिकॉप्टर; सैन्य निर्यात &#8211; ब्रह्मोस, तेजस, और INS विक्रांत)</li>
<li>आर्थिक क्षेत्र – आधारभूत संरचना के विकास के लिए जीएसटी संग्रह, सकल घरेलू उत्पाद GDP में बढ़ावा, डिजिटल पेमेंट</li>
<li>आंतरिक सुरक्षा &#8211; नक्सलवाद, माओवाद, आतंकवाद व अलगाववाद पर लगाम</li>
<li>विदेश नीति (जी-20, नेबरहुड फर्स्ट पॉलिसी, QUAD व BRICS में सक्रिय भूमिका)</li>
<li>स्वास्थ्य (कोविड-19 वैक्सीन निर्माण, 200+देशों को दवाएं निर्यात, आयुष्मान भारत)</li>
<li>शिक्षा (IITs व IIITs का विस्तार, स्वदेशी एडटेक, ISRO-DRDO-CSIR द्वारा शोध व विकास)</li>
<li>यातायात और परिवहन (मेट्रो व हाइवे, हाई स्पीड रेल, ईवी इंफ्रा)</li>
<li>अंतरिक्ष (मंगल मिशन 2014, चंद्रयान-3 2023, नेविगेशन सिस्टम NAVIC) आदि।</li>
</ol>
<p style="text-align: justify;">सन् 2022-23 राष्ट्रीय स्वतंत्रता का अमृत महोत्सव हम सबने मनाया। इसके बाद के 25 वर्ष यानी 2047 तक का कालखंड अमृतकाल घोषित हुआ। इस अमृतकाल के लिए देश के प्रधानमंत्री माननीय श्री नरेन्द्र मोदी ने ‘पंचप्रण’ बताएं &#8211; १. विरासत का गौरव २. गुलामी की मानसिकता से मुक्ति ३. विकसित भारत ४. एकता और एकजुटता ५. नागरिकों का कर्त्तव्य। इन ‘पंचप्रण’ को लेकर अगले 25 वर्ष अमृतकाल में कार्य होना है।</p>
<p style="text-align: justify;">राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक माननीय डॉ. मोहन भागवत जी ने 2021 के विजयादशमी उद्बोधन में कहा कि अगर व्यक्ति के जीवन, परिवार, आचरण और स्वभाव, राष्ट्र एवं समाज को बदलना है तो शुरुआत स्वयं से करनी होगी। उन्होंने देश के प्रत्येक व्यक्ति, परिवार, समाज एवं जीवन के प्रत्येक घटक में पांच परिवर्तनों की बात कही &#8211; १. सामाजिक समरसता युक्त जीवन, २. मूल्य आधारित समाज अर्थात कुटुंब प्रबोधन, ३. पर्यावरण केंद्रित जीवन शैली, ४. नागरिक कर्त्तव्यों का पालन एवं ५. स्वत्व के बोध के आधार पर नव युग निर्माण। इन पांच परिवर्तनों के आधार पर उन्होंने समाज परिवर्तन का आह्वान किया।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 का प्रभाव</strong></p>
<p style="text-align: justify;">29 जुलाई 2020 को देश को नई दिशा प्रदान करने वाली भारत केंद्रित राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 लागू की गई जोकि भविष्य में भारत की युवा पीढ़ी को मानसिक गुलामी से छुटकारा दिलाएगी ही, साथ ही साथ 21वीं शताब्दी की युगानुकूल आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए भी नई पीढ़ी को सुसज्ज करेगी।</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone  wp-image-8844" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2025/06/Atal_Innovation_Mission_2570-300x200.jpg" alt="" width="1724" height="1149" srcset="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2025/06/Atal_Innovation_Mission_2570-300x200.jpg 300w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2025/06/Atal_Innovation_Mission_2570-768x512.jpg 768w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2025/06/Atal_Innovation_Mission_2570.jpg 860w" sizes="auto, (max-width: 1724px) 100vw, 1724px" /></p>
<p style="text-align: justify;"><strong>अटल इन्नोवेशन मिशन (AIM)</strong></p>
<p style="text-align: justify;">सन् 2016 में नीति आयोग के तत्वाधान में अटल इन्नोवेशन मिशन की शुरुआत हुई जिसके अंतर्गत विद्यालयी शिक्षा स्तर के लिए अटल टिंकरिंग लैब (ATL) तथा महाविद्यालय व विश्वविद्यालय स्तर पर अटल इन्क्यूबेशन केंद्र (AIC) का प्रावधान किया गया जिसमें विद्यार्थी टेक्नोलॉजी व रोबॉटिक्स के क्षेत्र में प्रशिक्षण प्राप्त कर रहे हैं। अभी तक देशभर में 10 हजार ATL और 72 AIC स्थापित हो चुके हैं। इन 72 AIC के द्वारा 3500 स्टार्टअप व 32000 रोजगारों का सृजन हुआ हैं।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>शिक्षा प्रौद्योगिकी (</strong><strong>EduTech </strong><strong>&#8211; </strong><strong>Education Technology)</strong></p>
<p style="text-align: justify;">राष्ट्रीय शिक्षा नीति के सब लक्ष्यों को पूर्ण करने व सभी के लिए शिक्षा सुलभ कराने के लिए शिक्षा प्रौद्योगिकी (EduTech &#8211; Education Technology) का विकास किया गया। इसके अंतर्गत एक पारितंत्र (ecosystem) खड़ा किया जा रहा है जिससे शिक्षा की पहुंच सभी तक सुनिश्चित हो। दूरस्थ क्षेत्र जहाँ इंटरनेट नहीं है वहां भी सेटेलाइट टीवी ‘स्वयंप्रभा’ के माध्यम से शिक्षा पहुंचे। शिक्षक-शिक्षा की दृष्टि से ‘दीक्षा’ DIKSHA व ‘निष्ठा’ NISHTHAजैसे प्लेटफॉर्म बनाए गए है। कौशल विकास की दृष्टि से ऑनलाइन कोर्सेज डिज़ाइन किए गए हैं। इस प्रकार के अनेक कदम EduTech के अंतर्गत प्रारम्भ किए हुए हैं और सफलतापूर्वक कार्य कर रहे हैं।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>भारतीय भाषाओं को बढ़ावा</strong></p>
<p style="text-align: justify;">भारतीय भाषाओं को बल व बढ़ावा देने का प्रयास हो रहा है फिर चाहे विद्यालयीन शिक्षा का क्षेत्र हो, चाहे महाविद्यालयी व व्यावसायिक शिक्षा का क्षेत्र हो, न्याय का क्षेत्र हो या प्रतियोगी परीक्षा का क्षेत्र हो। इससे हर भाषा में छिपे ज्ञान को सबको जानने का अवसर मिलेगा। साथ ही छिपी हुई वे प्रतिभाएं भी सबके सामने आएगी जो अंग्रेजी के कारण कहीं न कहीं पिछड़ जाती है और वे स्वयं आगे बढ़कर देश की प्रगति को आगे बढ़ाएगी।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>भारतीय ज्ञान परंपरा</strong></p>
<p style="text-align: justify;">‘<strong>भद्रायां सुमतौ यतेम।’ </strong>ऋग्वेद (६.१.१०) ।। का भावार्थ है कि हम उस ज्ञान के लिए प्रयास करें जो सबके लिए कल्याणकारी हो।</p>
<p style="text-align: justify;">‘भारतीय ज्ञान परंपरा’ (IKS) राष्ट्रीय शिक्षा नीति में सम्मिलित होने से नई पीढ़ी भारतीय ज्ञान को पढ़-लिख-सुन व समझ पाएगी जिससे उनके मन-मस्तिष्क में भारतीय ज्ञान के प्रति गौरव का भाव, उससे जानने की इच्छा व उत्सुकता, उसे जानकर युगानुकूल परिष्कृत करने का भाव जागृत होगा। परिणाम स्वरूप ज्ञान-विज्ञान के क्षेत्र में पश्चिम की मानसिक गुलामी से बाहर आकर स्वत्व के भाव को आगे बढ़ाते हुए देश के विकास की गति को तीव्र करने का कार्य नई युवा पीढ़ी करेगी।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>उच्च शिक्षा में परिवर्तन</strong></p>
<p style="text-align: justify;">21वीं शताब्दी के प्रारंभ में भारत में उच्च शिक्षा संस्थानों की संख्या कम थी जोकि बढ़कर AISHE 2021-22 के अनुसार 1,168 विश्वविद्यालय, 45,473 महाविद्यालय और 12,002 स्वतंत्र संस्थान, हो गई है। यह संख्या तब की तुलना में 400% बढ़ी है जो इसे विश्व के सबसे बड़े उच्च शिक्षा वाले क्षेत्रों में से एक बनाते हैं। 17-23 वर्ष के युवाओं का उच्च शिक्षा में प्रवेश (GER) 28.4% है। दो बड़े परिवर्तन उच्च शिक्षा में हुए है जो देश के विकास की प्रगति को तीव्र करने वाले हैं। एक है, उच्च शिक्षा संस्थानों के पाठ्यक्रमों का प्रायोगिक उन्मुख होना। दूसरा, व्यावसायिक व अन्य उच्च शिक्षा संस्थानों का उद्योगों के साथ समन्वय होना जो पास आउट विद्यार्थियों के लिए रोजगार के बेहतर विकल्प उपलब्ध करवाएगा साथ ही देश के उद्योगों की आवश्यकतानुरूप मानवीय संसाधन की भी आपूर्ति करेगा।</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone  wp-image-8845" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2025/06/image_1608359788-300x225.jpg" alt="" width="1719" height="1289" srcset="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2025/06/image_1608359788-300x225.jpg 300w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2025/06/image_1608359788.jpg 730w" sizes="auto, (max-width: 1719px) 100vw, 1719px" /></p>
<p style="text-align: justify;"><strong>कौशल विकास</strong></p>
<p style="text-align: justify;">21वीं शताब्दी की आवश्यकता ‘योग्यता’ है, डिग्री अथवा प्रमाण पत्र नहीं। यदि देश के विकास की गति तेज करनी है तो यहां के युवाओं की कुशलता बढ़ानी होगी। इसी उद्देश्य को ध्यान में रखकर कौशल विकास की दिशा में अनेक कदम उठाए गए है। नई युवा पीढ़ी को रोजगारपरक शिक्षा मिल सके, इसलिए राष्ट्रीय शिक्षा नीति में विद्यालय स्तर से ही कौशल को शिक्षा का भाग बनाया है। कक्षा 6 से गतिविधि के रूप में प्रारंभ होकर कक्षा 9-12 में एक व्यावसायिक विषय के रूप में कौशल शिक्षा को प्राप्त करने का अवसर विद्यार्थी को मिलना प्रारंभ हुआ है। कौशल विकास के नवीनतम पाठ्यक्रम, ओपन सोर्स के रूप में इंटरनेट पर सरलता के लिए उपलब्ध है, जिसमें औपचारिक प्रमाण-पत्र (8, 10 व 12वीं) की अनिवार्यता नहीं है। ऑनलाइन शिक्षा के साथ निकटतम किसी भी व्यावसायिक प्रतिष्ठान से प्रायोगिक अनुभव का प्रावधान भी इन पाठ्यक्रमों में जोड़ा गया है।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>21वीं शताब्दी की चुनौतियाँ</strong></p>
<p style="text-align: justify;">जहां 21वीं शताब्दी में भारत में प्रगति के अवसर बढ़े हैं, वहां 21वीं शताब्दी कुछ चुनौतियां भी साथ लेकर आई हैं &#8211;</p>
<ol style="text-align: justify;">
<li>आधुनिकता के बढ़ते प्रभाव के कारण भारतीय संस्कृति व जीवन मूल्यों का जीवन संस्कार व व्यवहार पर प्रभाव</li>
<li>टेक्नॉलॉजी के बढ़ते उपयोग के कारण आंख, कान, एकाग्रता में कमी, मानसिक स्वास्थ्य की समस्या</li>
<li>भौतिक संसाधनों के बढ़ते उपयोग के कारण मेहनत के स्वभाव में कमी</li>
</ol>
<p style="text-align: justify;">इनके समाधान के लिए सांस्कृतिक जागरूकता, टेक्नोलॉजी का संतुलित उपयोग, योग-ध्यान और नियमित शारीरिक श्रम को अपनाना आवश्यक है। संतुलित दृष्टिकोण अपनाकर हम आधुनिकता के लाभ उठाते हुए भी अपने स्वास्थ्य और संस्कृति की रक्षा कर सकते हैं।</p>
<p style="text-align: justify;">डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम द्वारा लिखित पुस्तक <strong>“भारत 2020: ए विज़न फॉर द न्यू मिलेनियम”</strong> की भूमिका में उन्होंने भारत को एक ज्ञान-आधारित महाशक्ति बनाने की प्रेरणादायक दृष्टि प्रस्तुत की है। डॉ. कलाम ने जोर देकर कहा कि भारत को एक विकसित राष्ट्र बनाने के लिए वैज्ञानिक सोच, तकनीकी नवाचार और शिक्षा को प्राथमिकता देनी होगी। भारत के पास मानवीय संसाधन और बौद्धिक क्षमता की कोई कमी नहीं है, बस इसे सही दिशा में लगाने की आवश्यकता है।</p>
<p style="text-align: justify;">डॉ. कलाम ने पुस्तक की भूमिका के अंत में कहा – “विकसित भारत की कल्पना स्वप्न मात्र नहीं है। यह कुछ गिने-चुने भारतीयों की प्रेरणा मात्र भी नहीं होना चाहिए-यह हम सब भारतीयों का मिशन होना चाहिए, जिसे हमें पूर्ण करना है।”</p>
<p style="text-align: justify;">(लेखक विद्या भारती जोधपुर प्रान्त के संगठन मंत्री है।)</p>
<p><strong>और पढ़ें : <span style="color: #0000ff;"><a style="color: #0000ff;" href="https://rashtriyashiksha.com/artificial-intelligence/" target="_blank" rel="noopener">कृत्रिम बुद्धिमत्ता (Artificial Intelligence)</a></span></strong></p>
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			</item>
		<item>
		<title>पुस्तक समीक्षा : भारतीय शिक्षा दृष्टि &#8211; डॉ मोहन भागवत</title>
		<link>https://rashtriyashiksha.com/book-review-bharatiya-shiksha-drishti-dr-mohan-bhagwat/</link>
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		<dc:creator><![CDATA[राष्ट्रीय शिक्षा]]></dc:creator>
		<pubDate>Thu, 27 Feb 2025 10:33:30 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[नवीनतम]]></category>
		<category><![CDATA[पुस्तक समीक्षा]]></category>
		<category><![CDATA[श्री रवि कुमार जी]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>संपादक &#8211; रवि कुमार समीक्षक &#8211; डॉ उदय भान सिंह &#8220;भारतीय शिक्षा दृष्टि&#8221; पुस्तक राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत द्वारा शिक्षा के विभिन्न आयामों पर व्यक्त विचारों&#8230; </p>
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]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: right;"><strong>संपादक &#8211; रवि कुमार </strong></p>
<p style="text-align: right;">समीक्षक &#8211; डॉ उदय भान सिंह</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone  wp-image-8384" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2025/02/789-300x210.jpg" alt="" width="1417" height="992" srcset="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2025/02/789-300x210.jpg 300w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2025/02/789-1024x717.jpg 1024w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2025/02/789-768x538.jpg 768w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2025/02/789-1536x1075.jpg 1536w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2025/02/789.jpg 2000w" sizes="auto, (max-width: 1417px) 100vw, 1417px" /></p>
<p style="text-align: justify;"><strong>&#8220;भारतीय शिक्षा दृष्टि&#8221;</strong> पुस्तक राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत द्वारा शिक्षा के विभिन्न आयामों पर व्यक्त विचारों और उद्बोधनों का संकलन है, जिसे विद्या भारती के जोधपुर प्रांत के संगठन मंत्री श्री रवि कुमार ने संपादित किया है। यह शिक्षा के ज्ञान, कौशल, मूल्यों और दृष्टिकोण को अर्जित करने की सतत प्रक्रिया पर प्रकाश डालती है। पुस्तक को प्रसिद्ध राष्ट्रवादी <strong>सुरुचि प्रकाशन</strong> ने प्रकाशित किया है। प्रस्तुत पुस्तक में डॉ. मोहन भागवत जी द्वारा सन् 2010 से 2020 तक विभिन्न अवसरों पर शिक्षा विषय पर व्यक्त विचारों को समाहित किया गया है। मूलतः आठ भागों में विभाजित यह पुस्तक भारतीय ‘स्व’ के आधार  पर शिक्षा के विभिन्न आयामों पर केंद्रित है। पुस्तक की सम्पूर्ण विषयवस्तु में डॉ. भागवत जी के कुल 29 उद्बोधन व तीन प्रस्ताव शामिल हैं।</p>
<p style="text-align: justify;">वसुधैव कुटुंबकम, अहिंसा, विश्व शांति और साहचर्य जैसे सिद्धांतों पर आधारित भारत की प्राचीन और सनातन शिक्षा परंपरा आक्रमणों और षड्यंत्रों के बावजूद संरक्षित रही। स्वतंत्रता के बाद भी इसे कमजोर करने के प्रयास हुए, किंतु राष्ट्रनिष्ठ संत-मनीषियों ने इसे सहेजने और अगली पीढ़ियों तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इसी कड़ी का स्तुत्य प्रयास इस पुस्तक की विषयवस्तु का संकलन, सम्पादन, प्रकाशन व पाठकों तक सहज ही सुलभ करवाना भी सम्मिलित है, यदि यह कहा जाए तो इसमें कोई भी अतिश्योक्ति नही होगी।</p>
<p style="text-align: justify;">‘भारतीय शिक्षा दृष्टि’ पुस्तक के पहले भाग में सम्पादक ने डॉ. मोहन भागवत जी के विजयादशमी उद्बोधनों (2014-2020) में भारतीय शिक्षा के उद्देश्यों और आयामों पर चर्चा की गई है। वे शिक्षा को सर्वसुलभ, संस्कारयुक्त और स्वाभिमान से जीवन संघर्ष करने योग्य बनाने पर बल देते हैं। शिक्षा के वैश्विक प्रयोगों का संज्ञान लेते हुए, वे भारतीय शिक्षा को सकारात्मक रूप देने का आह्वान करते हैं। शिक्षकों व अभिभावकों की भूमिका को महत्वपूर्ण मानते हुए, वे दायित्व बोध की आवश्यकता बताते हैं। शिक्षा के व्यापारीकरण से बचने और ‘स्व’ आधारित शिक्षा प्रणाली अपनाने की वकालत करते हैं। वे शैक्षिक ढांचे से इतर पाठ्यक्रम और शिक्षकों के प्रशिक्षण में आमूल-चूल परिवर्तन की आवश्यकता पर बल देते हैं।</p>
<p style="text-align: justify;">पुस्तक के दूसरे भाग “धर्म और शिक्षा” में पुस्तक के सम्पादक रवि कुमार ने डॉ. मोहन भागवत जी के द्वारा 9 अक्टूबर 2020 को लोकप्रिय हिन्दी पत्रिका ‘विवेक’ को दिए गए गए साक्षात्कार का सन्दर्भ लेते हुए बताया है कि धर्म के बिना शिक्षा अधूरी है। धर्म हमें सन्मार्ग दिखाता है और शिक्षा हमें उसके लिए सक्षम बनाती है। पुस्तक के इसी भाग में सम्पादक ने राजकोट (गुजरात ) गुरुकुल में डॉ. भागवत द्वारा 28 जनवरी को ‘धर्म, राष्ट्र और राष्ट्रधर्म’ पर व्यक्त विचारों को शामिल किया है।</p>
<p style="text-align: justify;">पुस्तक के तीसरे भाग में “गुरुकुल शिक्षा पद्धति” के अंतर्गत 29अप्रैल 2018 को अन्तर्राष्ट्रीय विराट गुरुकुल सम्मेलन में तथा 10 फ़रवरी 2021 को हरिपुर स्थित प्रबोधिनी गुरुकुल में आयोजित अर्ध-मण्डलोत्सव कार्यक्रम में डॉ. मोहन भागवत के द्वारा दिए गए उद्बोधनों की चर्चा की गई है। आज हम अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों की चकाचौंध में बच्चों को अपनी जड़ों से काट रहे हैं, जिससे उनका भविष्य संकट में पड़ रहा है। ऐसे में भारत की प्राचीन गुरुकुल शिक्षा पद्धति ही सर्वांगीण विकास का समाधान है। डॉ. भागवत के अनुसार, 21वीं शताब्दी में भी यह पद्धति प्रासंगिक है और भारत को विश्व का मार्गदर्शक बना सकती है, क्योंकि “सा विद्या या विमुक्तये” – विद्या ही सच्ची मुक्ति और दिशा प्रदान करती है।</p>
<p style="text-align: justify;">पुस्तक के चौथे और पाँचवे भाग में सम्पादक रवि जी ने विद्या भारती के अनेक आयोजनों /कार्यक्रमों तथा विद्या भारती के ही पूर्व विद्यार्थियों के बीच दिए गए डॉ. भागवत जी के व्याख्यानों में शिक्षा दृष्टि के बिंदुओं को रेखांकित किया है। इन व्याख्यानों में भी स्थान-स्थान पर भागवत जी ने विद्यालय-महाविद्यालयों के विद्यार्थियों के भटकाव, शिक्षक-अभिभावकों की भूमिका, शिक्षा में युगानुकूल परिवर्तन, संस्कारवान शिक्षा की आवश्यकता, विद्या भारती के विद्यालयों की भूमिका तथा पूर्व विद्यार्थियों की सामाजिक सक्रियता व भागीदारी की अपेक्षा जैसे अनेक महत्वपूर्ण विषयों पर प्रकाश डाला है।</p>
<p style="text-align: justify;">शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास शिक्षा के क्षेत्र में भारतीयकरण के अभियान में प्रमुखता से कार्य करने वाले संगठन है। न्यास के द्वारा आयोजित ज्ञानोत्सव 2018, भारतीय भाषा अभियान 2018, शिक्षाविद् गोष्ठी 2019, ज्ञानोत्सव 2019 तथा इसी वर्ष अगस्त में शिक्षा में भारतीयता विषय पर अनेक आयोजन हुए हैं, जिनमें  डॉ. मोहन भागवत जी के उद्बोधनों को पुस्तक के इस छठे भाग में संकलित करते हुए संपादक ने उनके शिक्षा के विविध आयामों पर डाले गए प्रकाश की चर्चा की है। शिक्षा के क्षेत्र में प्रयोगधर्मिता की आवश्यकता, समाज आधारित शिक्षा की पुर्नस्थापना, भाषा में स्व व अपनी भाषा, भारत की भाषा तथा मातृभाषा का महत्व जैसे बिंदुओं पर बल दिया गया है। वास्तव में यही समय की आवश्यकता भी है। नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 में भी इसकी स्पष्ट झलक दिखाई भी देती है।</p>
<p style="text-align: justify;">पुस्तक के अगले भाग में डॉ. मोहन भागवत जी के द्वारा विभिन्न कार्यक्रम अवसरों पर दिए गए शिक्षा सम्बन्धी उद्बोधनों को संग्रहित किया गया है। इन उद्बोधनों में मुख्यतः शिक्षकों को कर्तृत्व उदाहरण बनने, ग्रन्थ लेखन का उद्देश्य व महत्व, शिक्षा में अपेक्षित परिवर्तन के लिए शोध की महती आवश्यकता, पाठ्यक्रम परिवर्तन, शिक्षा क्षेत्र में नव चिंतन का महत्व, शिक्षा क्षेत्र में मातृ शक्ति की भूमिका तथा विद्या-अविद्या की समझ, जैसे महत्वपूर्ण बिन्दुओं की चर्चा है। इन बिंदुओं पर व्यापक चर्चा कर व्यवहार के धरातल पर उतारने की तुरंत आवश्यकता है।</p>
<p style="text-align: justify;">“भारतीय शिक्षा दृष्टि” पुस्तक के अंतिम खंड में सम्पादक ने उन विषयों को समाहित किया है जिन्हें संघ ने अपने वार्षिक प्रतिवेदन में प्रस्ताव के रूप में सम्मुख रखा है। इस दृष्टि से पुस्तक के इस भाग में संपादक ने संघ की तीन अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा यथा, मार्च-2016 नागौर, मार्च-2018 नागपुर एवं मार्च-2019 ग्वालियर में पारित प्रस्तावों का उल्लेख किया है। इन प्रस्तावों में गुणवत्ता पूर्ण एवं सस्ती शिक्षा सबको सुलभ हो, भारतीय भाषाओं के संरक्षण एवं संवर्धन की आवश्यकता तथा भारतीय परिवार व्यवस्था-मानवता के लिए अनुपम देन जैसे अत्यंत महत्वपूर्ण विषय प्रस्तावों में शामिल हैं। यदि गहनता से देखा जाए तो यह सब विषय न केवल भारतीय सन्दर्भ में ही आवश्यक हैं अपितु वैश्विक दृष्टि से भी नितांत महत्वपूर्ण हैं।</p>
<p style="text-align: justify;">यह पुस्तक शिक्षा के सभी प्रमुख आयामों को समेटते हुए इसके उपविषयों व महत्व को रेखांकित करती है। इसमें प्रस्तुत सुझाव यदि क्रियान्वित हो सकें, तो भारतीय शिक्षा प्रणाली में व्यापक परिवर्तन संभव है, जिससे शिक्षा में भारतीयता का समावेश होगा। राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 ने कई महत्वपूर्ण बिंदुओं को अपनाया है, लेकिन क्रियान्वयन में अभी चुनौतियाँ बनी हुई हैं। यह पुस्तक शिक्षाविदों, शोधार्थियों व शिक्षा सुधार से जुड़े कार्यकर्ताओं के लिए उपयोगी सिद्ध होगी।</p>
<p style="text-align: justify;">पुस्तक का मूल्य भी अपेक्षाकृत काफ़ी कम है। इसलिए सर्व सुलभता की राह में कोई अड़चन नही होगी, ऐसा लगता है। आशा है आगामी संस्करण में संपादक पुस्तक में राष्ट्रीय शिक्षा नीति के प्रासंगिक प्रावधानों तथा चित्रों या रेखाचित्रों का यथोचित समावेशन करेंगे जिससे इस पुस्तक की विषयवस्तु और अधिक प्रभावी बन पड़ेगी। पुस्तक की विषयवस्तु पठनीय है, कलेवर व आवरण आकर्षक है तथा भाषा सरल है। इसलिए पाठकों के मध्य पुस्तक लोकप्रिय होगी, ऎसी अपेक्षा की जानी चाहिए।</p>
<p style="text-align: justify;">(लेखक, दीनदयाल उपाध्याय अध्ययन केंद्र, हिमाचल प्रदेश केंद्रीय विश्वविद्यालय में सह आचार्य है।)</p>
<p style="text-align: justify;">पुस्तक का नाम : भारतीय शिक्षा दृष्टि &#8211; डॉ. मोहन भागवत</p>
<p style="text-align: justify;">संपादक : श्री रवि कुमार</p>
<p style="text-align: justify;">प्रकाशक : सुरुचि प्रकाशन, केशव कुंज झंडेवाला, नई दिल्ली-110055</p>
<p style="text-align: justify;">प्रथम संस्करण : अक्टूबर 2024</p>
<p style="text-align: justify;">मूल्य : 235 रुपए</p>
<p style="text-align: justify;">पृष्ठ संख्या : 204</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>और पढ़ें : <a href="https://rashtriyashiksha.com/bhartiya-jeevan-shaily/" target="_blank" rel="noopener">पुस्तक समीक्षा: भारतीय जीवन शैली</a></strong></p>
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		<title>रामायण सत कोटि अपारा-6 (श्रीराम वन गमन स्थल)</title>
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		<dc:creator><![CDATA[राष्ट्रीय शिक्षा]]></dc:creator>
		<pubDate>Thu, 27 Feb 2025 09:07:55 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[नवीनतम]]></category>
		<category><![CDATA[रामायण सत कोटि अपारा]]></category>
		<category><![CDATA[श्री रवि कुमार जी]]></category>
		<category><![CDATA[bhartiya shiksha]]></category>
		<category><![CDATA[indian education]]></category>
		<category><![CDATA[loard ram]]></category>
		<category><![CDATA[rama]]></category>
		<category><![CDATA[Ramayan]]></category>
		<category><![CDATA[Rashtriya shiksha]]></category>
		<category><![CDATA[राम]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>✍ रवि कुमार श्रीराम भारत की आत्मा है। श्रीराम भारत के प्राण है। श्रीराम भारत के जन जन के राम है। वे जन जन के राम तब बने, जब वन&#8230; </p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: right;"><img src="https://s.w.org/images/core/emoji/17.0.2/72x72/270d.png" alt="✍" class="wp-smiley" style="height: 1em; max-height: 1em;" /> रवि कुमार</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone wp-image-8368" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2025/02/22_07_2022-ald_ram_van_gaman_22914268-300x169.jpg" alt="" width="1424" height="802" srcset="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2025/02/22_07_2022-ald_ram_van_gaman_22914268-300x169.jpg 300w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2025/02/22_07_2022-ald_ram_van_gaman_22914268-1024x576.jpg 1024w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2025/02/22_07_2022-ald_ram_van_gaman_22914268-768x432.jpg 768w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2025/02/22_07_2022-ald_ram_van_gaman_22914268.jpg 1200w" sizes="auto, (max-width: 1424px) 100vw, 1424px" /></p>
<p style="text-align: justify;">श्रीराम भारत की आत्मा है। श्रीराम भारत के प्राण है। श्रीराम भारत के जन जन के राम है। वे जन जन के राम तब बने, जब वन के राम बने! श्रीराम का चरित्र जो सर्व व्याप्त है, उसका अधिक भाग वनवासी राम का ही है। तुलसीदास जी ने लिखा है – ‘निसिचर हीन करउँ महि भुज उठाइ पन कीन्ह’ &#8211; राम ने दोनों हाथ उठाकर प्रतिज्ञा की थी कि इस पृथ्वी को राक्षस विहीन कर दूँगा। और राम ने यह प्रतिज्ञा पूर्ण की। वनवासी राम इस दौरान जहां जहां गए उसे श्रीराम वन गमन मार्ग कहा जाता है, जिसके अवशेष आज भी उपलब्ध है। आइए इनके बारे में जानने का प्रयास करते हैं।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>वाल्मीकि रामायण</strong></p>
<p style="text-align: justify;">वाल्मीकि रामायण के अयोध्या काण्ड में श्रीराम वन गमन का वर्णन आता है &#8211;</p>
<p style="text-align: center;"><strong>इयमद्य निशा पूर्वा सौमित्रे प्रहिता वनम्।</strong></p>
<p style="text-align: center;"><strong>वनवासस्य भद्रं ते न चोत्कण्ठितुमर्हसि॥ </strong>अयोध्या काण्ड -४६.२<strong> ॥</strong></p>
<p style="text-align: justify;">अर्थात ‘सुमित्रानन्दन! तुम्हारा कल्याण हो। हम लोग जो वन की ओर प्रस्थित हुए हैं, हमारे उस वनवास की आज यह पहली रात प्राप्त हुई है; अतः अब तुम्हें नगर के लिये उत्कण्ठित नहीं होना चाहिए।’</p>
<p style="text-align: justify;">इसी प्रकार युद्धकाण्ड में लंका विजय पश्चात अयोध्या आगमन का भी वर्णन है –</p>
<p style="text-align: center;"><strong>स्वागतं ते महाबाहो कौसल्यानन्दवर्धन। </strong></p>
<p style="text-align: center;"><strong>इति प्राञ्जलयः सर्वे नागरा राममब्रुवन्॥ </strong>युद्धकाण्ड- १२७.५२<strong> ॥</strong></p>
<p style="text-align: justify;">अर्थात उस समय अयोध्या के समस्त नागरिक हाथ जोड़कर श्रीरामचन्द्र जी से एक साथ बोल उठे- ‘माता कौसल्या का आनन्द बढ़ाने वाले महाबाहु श्रीराम! आपका स्वागत है, स्वागत है’।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>तुलसीदासकृत रामचरितमानस</strong></p>
<p style="text-align: justify;">तुलसीकृत रामचरितमानस के अयोध्या काण्ड में श्रीराम वनगमन का वर्णन आता है –</p>
<p style="text-align: center;"><strong>बालक बृद्ध बिहाइ गृहँ लगे लोग सब साथ।</strong></p>
<p style="text-align: center;"><strong>तमसा तीर निवासु किय प्रथम दिवस रघुनाथ ॥ </strong>अयोध्या काण्ड &#8211; दोहा ८४<strong> ॥</strong></p>
<p style="text-align: justify;">अर्थात ‘बच्चों और बूढ़ों को घरों में छोड़कर सब लोग साथ हो लिए। पहले दिन श्रीरघुनाथ जी ने तमसा नदी के तीर पर निवास किया।’</p>
<p style="text-align: justify;">रामचरितमानस के उत्तरकाण्ड में अयोध्या आगमन का वर्णन है –</p>
<p style="text-align: center;"><strong>प्रभु बिलोकि हरषे पुरबासी। </strong><strong>जनित बियोग बिपति सब नासी ।। </strong></p>
<p style="text-align: center;"><strong>प्रेमातुर सब लोग निहारी। कौतुक कीन्ह कृपाल खरारी ।। </strong>उत्तरकाण्ड &#8211; दोहा २<strong> ।।</strong></p>
<p style="text-align: justify;">अर्थात ‘प्रभु को देखकर अयोध्यावासी सब हर्षित हुए। वियोग से उत्पन्न सब दुःख नष्ट हो गए। सब लोगों को प्रेमविह्वल (और मिलने के लिये अत्यन्त आतुर) देखकर खर के शत्रु कृपालु श्रीराम जी ने एक चमत्कार किया।’</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>श्रीराम वन गमन मार्ग</strong></p>
<p style="text-align: justify;">श्रीराम वन में दो बार गए। एक बार विश्वामित्र जी के साथ गए, यह यात्रा अयोध्या से मिथिला तक की है। दूसरी बार चौदह वर्ष के वनवास के दौरान गए। दोनों मार्ग अलग अलग है। दोनों मार्ग आज की भौगोलिक रचना के अनुसार उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखण्ड, उड़ीसा, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र, आंध्रप्रदेश, तमिलनाडु और श्रीलंका इन क्षेत्रों से होकर निकलता है। यह इतना लंबा मार्ग है, जिसे चौदह वर्ष के दौरान श्रीराम, जानकी व लक्ष्मण ने पैदल ही पूर्ण किया था।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>श्रीराम वन गमन स्थल</strong></p>
<p style="text-align: justify;">श्रीराम की वन यात्रा के दौरान कुल कितने स्थान होंगे इसके लिए अलग अलग मत आते हैं। दिल्ली के शोधकर्त्ता डॉ. रामअवतार ने स्वयं जाकर उनके आज के अवशेषों आदि को खोजकर कुल २९० स्थानों के बारे में बताया है जोकि ज्ञात है। पहले वर्ग में ४१ स्थल है जो अयोध्या से मिथिला के मार्ग में है। और २४९ स्थल चौदह वर्ष के वनवास के दौरान अयोध्या से श्रीलंका मार्ग में है। चौदह वर्ष, इतना लंबा मार्ग और भी स्थान रहे होंगे जोकि अभी अज्ञात है।</p>
<p style="text-align: justify;">‘चित्रकूट के घाट पर, भई संतन की भीर, तुलसीदास चंदन घिसे, तिलक देत रघुवीर’। चित्रकूट वह स्थान है जहाँ पर तुलसीदास जी को प्रभु राम के दर्शन हुए थे। आज भी यह चौपाई मन्दाकिनी नदी तट पर स्थित घाट पर लिखी हुई मिलती है। श्रीराम वन यात्रा के दौरान भरत श्रीराम से मिलने चित्रकूट ही आए थे और उनकी पादुका लेकर गए थे। इन पादुकाओं को सिंहासन पर रखकर चौदह वर्षों तक साधुवेश में कुटिया में रहकर राम का राज्य मानकर शासन चलाया। इस प्रसंग का वाल्मीकि रामायण में बड़ा ही सुंदर वर्णन है &#8211;</p>
<p style="text-align: center;"><strong>अधिरोहार्य पादाभ्यां पादुके हेमभूषिते।</strong></p>
<p style="text-align: center;"><strong>एते हि सर्वलोकस्य योगक्षेमं विधास्यतः॥</strong> अयोध्याकाण्ड &#8211; ११२.२१॥</p>
<p style="text-align: justify;">अर्थात भरत श्रीराम से बोले – ‘आर्य! ये दो सुवर्णभूषित पादुकाएँ आपके चरणों में अर्पित हैं, आप इन पर अपने चरण रखें। ये ही सम्पूर्ण जगत् के योगक्षेम का निर्वाह करेंगी’।</p>
<p style="text-align: center;"><strong>सोऽधिरुह्य नरव्याघ्रः पादुके व्यवमुच्य च।</strong></p>
<p style="text-align: center;"><strong>प्रायच्छत् सुमहातेजा भरताय महात्मने॥ </strong>अयोध्याकाण्ड &#8211; ११२.२२ ॥</p>
<p style="text-align: justify;">अर्थात ‘तब महातेजस्वी पुरुषसिंह श्रीराम ने उन पादुकाओं पर चढ़कर उन्हें फिर अलग कर दिया और महात्मा भरत को सौंप दिया’।</p>
<p style="text-align: justify;">कर्नाटक में पंपा सरोवर के निकट शबरी आश्रम है। इस आश्रम में प्रभु श्रीराम व लक्ष्मण पधारे थे जिसका बड़ा भव्य वर्णन रामचरितमानस के आरण्यक काण्ड में किया गया है –</p>
<p style="text-align: center;"><strong>ताहि देइ गति राम उदारा। सबरी के आश्रम पगु धार ॥</strong></p>
<p style="text-align: center;"><strong>सबरी देखि राम गृहँ आए। मुनि के बचन समुझि जियँ भाए॥ </strong>आरण्यक काण्ड &#8211; दोहा – ३३.३॥</p>
<p style="text-align: justify;">अर्थात उदार श्रीरामजी जटायु गति देकर शबरी जी के आश्रम में पधारे। शबरी जी ने श्रीरामचन्द्र जी को घर में आये देखा, तब मुनि मतङ्ग जी के वचनों को याद करके उनका मन प्रसन्न हो गया॥</p>
<p style="text-align: center;"><strong>सरसिज लोचन बाहु बिसाला। जटा मुकुट सिर उर बनमाला॥</strong></p>
<p style="text-align: center;"><strong>स्याम गौर सुंदर दोउ भाई। सबरी परी चरन लपटाई॥ </strong>आरण्यक काण्ड &#8211; दोहा – ३३.४ ॥</p>
<p style="text-align: justify;">अर्थात कमल-सदृश नेत्र और विशाल भुजा वाले, सिर पर जटाओं का मुकुट और हृदय पर वनमाला धारण किये हुए सुन्दर साँवले और गोरे दोनों भाइयों के चरणों में शबरी जी लिपट पड़ीं ॥</p>
<p style="text-align: justify;">आज की भौगिलिक रचना अनुसार कुछ ज्ञात स्थानों की जानकारी निम्न है –</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>पहला वर्ग (अयोध्या से मिथिला व जनकपुर)</strong></p>
<p style="text-align: justify;">ताल सलोना (अजमगढ़), बारदुअरिया (मऊ), लखनेश्वरडीह (बलिया), भरोली (बलिया), परेव (पटना), त्रिगना घाट (पटना), रामचौरा मंदिर (वैशाली), गौतम आश्रम (दरभंगा), विश्वामित्र आश्रम (मधुबनी), गिरिजा मंदिर फुलहर (मधुबनी), जनकपुर (नेपाल), मणिमंडप (जनकपुर), सीताकुंड वेदीवन (पूर्वी चंपारण), डेरवां (गोरखपुर), दोहरीघाट (मऊ)।</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone  wp-image-8372" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2025/02/wpid-wp-1421687430691-300x228.jpeg" alt="" width="1418" height="1078" srcset="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2025/02/wpid-wp-1421687430691-300x228.jpeg 300w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2025/02/wpid-wp-1421687430691.jpeg 480w" sizes="auto, (max-width: 1418px) 100vw, 1418px" /></p>
<p style="text-align: justify;"><strong>दूसरा वर्ग (अयोध्या से श्रीलंका)</strong></p>
<p style="text-align: justify;"><strong>उत्तर प्रदेश</strong> &#8211; तमसा नदी तट पर मंडार गाँव, बेसुई नाला, गोमती नदी- सुल्तानपुर, सई नदी &#8211; भगवान कीनाराम आश्रम रायबरेली, शृंगवेरपुर (सिंगरौर) गंगा तट, कुराई घाट, खुरई गाँव टापू, प्रयाग वन, वाल्मीकि आश्रम लालापुर, चित्रकूट कामदगिरि- मंदाकिनी नदी, भरत कूप, राजपुर प्रभुघाट।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>मध्यप्रदेश</strong> &#8211; शरभंग आश्रम सतना, सुतीक्ष्णआश्रम, अत्रि ऋषि का आश्रम सतना, दंडकारण्य, शहडोल (अमरकंटक), रामवन (सतना), रक्सैलवा &#8211; रामशैल, नचना चौमुखनाथ धाम पन्ना, सिद्धाश्रम (जिला पन्ना), चरणतीर्थ (विदिशा), लक्ष्मण पहाड़ी।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>छत्तीसगढ़</strong> &#8211; दंडकारण्य का क्षेत्र, सीतामढ़ी गंधिया, सीतामढ़ी हरचौका, सीतामढ़ी, विश्रामपुर &#8211; अम्बिकापुर, लक्ष्मणगढ़, रायगढ़, दमाली गाँव (अंविकापुर), बन्दरकोट, राजिम &#8211; लोमस ऋषि आश्रम, सिहावा, कांकेर-नारायणपुर, राकसहाड़ा, गीदम दंतेवाड़ा, इंजरम।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>झारखण्ड</strong> – सिमडेगा-गुमला।</p>
<p style="text-align: justify;">उड़ीसा – कोरापुट, मलकानगिरी क्षेत्र।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>महाराष्ट्र</strong> &#8211; अगस्ती &#8211; मनमाड, पंचवटी (नासिक), सर्वतीर्थ, लक्ष्मण सरोवर मुम्बई सह्याद्रि, नांदेड़, उमरधा (होशंगाबाद)।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>गुजरात</strong> &#8211; सापुतारा जिला डांग।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>आंध्रप्रदेश</strong> &#8211; भद्राचलम, तुंगभद्रा व कावेरी नदी क्षेत्र, तिरुपति-कोदंड, कोनावरम।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>तेलंगाना</strong> &#8211;  खम्मम, पर्णशाला, इलेन्तु कोंटा करीम नगर, कंदकुर्ती (निजामाबाद), बासर।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>कर्नाटक</strong> &#8211; ऋष्यमूक पर्वत, बेलगाम, हम्पी, रामनाथपुरम, चुनचुन कट्टे (कृष्ण राजघाट), भुंभा-भुंभी मंदिर रामनगर (बैंगलुरु), शबरी आश्रम पम्पा सरोवर।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>तमिलनाडु </strong>&#8211; कोड़ीकरई, रामेश्वरम, धनुषकोटि, गंधमादन पर्वत, मंडपम।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>श्रीलंका</strong> – ‘नुवारा एलिया’ पर्वत शृंखला।</p>
<p style="text-align: justify;">श्रीराम वन गमन यात्रा के स्थलों का आज भी धार्मिक, सांस्कृतिक, ऐतिहासिक व धार्मिक महत्व है। हर स्थान का अपना एक कथा-प्रसंग है जो वहाँ के स्थानीय समाज को राम और इस भूमि के साथ जोड़े हुए है। किसी अज्ञात कवि ने कुछ पंक्तियों में इस भाव को प्रकट करते हुए कहा है &#8211; “चलो चलें उन पथों पर आज, जहाँ चले थे प्रभु रघुराज। वन-वन भटके, कण-कण में बसे, हर पग पावन, हर स्थल विराज॥” “वन गमन के पथ पर चलकर, समझें राम का त्याग महान। धर्म, कर्तव्य, मर्यादा का, करें सदैव हम सब सम्मान॥”</p>
<p style="text-align: justify;">तुलसीदास जी ने लिखा है – “राम वन गमन कथा अति पावन, करत चरित जग मंगल दावन। पिता वचन पालन की रीती, सिखवत सकल धरम की नीती॥” महात्मा गाँधी जी ने श्रीराम वन गमन के बारे कहा है – “श्रीराम का वनगमन त्याग और कर्तव्य का सर्वोच्च उदाहरण है। उन्होंने राजसी वैभव को त्यागकर पिता की आज्ञा का पालन किया, जो सच्चे नेतृत्व का आदर्श है।” स्वामी विवेकानंद जी ने कहा है – “श्रीराम का वनगमन केवल एक घटना नहीं, बल्कि त्याग, तपस्या और कर्तव्य का महान पाठ है। यह दर्शाता है कि जीवन में सुख-सुविधाओं से बड़ा धर्म का पालन है।”</p>
<p style="text-align: justify;">(लेखक विद्या भारती जोधपुर प्रान्त के संगठन मंत्री है।)</p>
<p><strong>और पढ़ें : <span style="color: #0000ff;"><a style="color: #0000ff;" href="https://rashtriyashiksha.com/rama-katha-in-sanskrit-literature/" target="_blank" rel="noopener">रामायण सत कोटि अपारा-5 (संस्कृत साहित्य में रामकथा)</a></span></strong></p>
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		<title>रामायण सत कोटि अपारा-5 (संस्कृत साहित्य में रामकथा)</title>
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		<dc:creator><![CDATA[राष्ट्रीय शिक्षा]]></dc:creator>
		<pubDate>Sat, 19 Oct 2024 06:12:50 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[नवीनतम]]></category>
		<category><![CDATA[रामायण सत कोटि अपारा]]></category>
		<category><![CDATA[श्री रवि कुमार जी]]></category>
		<category><![CDATA[Bhartiya Education]]></category>
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		<category><![CDATA[Ramayan]]></category>
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		<category><![CDATA[भारतीय शिक्षा]]></category>
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		<category><![CDATA[रामायण]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>✍ रवि कुमार रामकथा का आदि स्रोत ‘रामायण’ ही है। राष्ट्रकवि रवींद्रनाथ ठाकुर ‘रामायण’ के भारतीय जन-मानस में व्याप्ति पर लिखते हैं, “रामायण की कथा से भारतवर्ष के क्या बालक,&#8230; </p>
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]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: right;"><img src="https://s.w.org/images/core/emoji/17.0.2/72x72/270d.png" alt="✍" class="wp-smiley" style="height: 1em; max-height: 1em;" /> रवि कुमार</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone  wp-image-8043" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2024/10/valmiki-ramayana-in-hindi-300x169.jpg" alt="" width="1367" height="770" srcset="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2024/10/valmiki-ramayana-in-hindi-300x169.jpg 300w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2024/10/valmiki-ramayana-in-hindi-1024x576.jpg 1024w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2024/10/valmiki-ramayana-in-hindi-768x432.jpg 768w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2024/10/valmiki-ramayana-in-hindi-1536x864.jpg 1536w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2024/10/valmiki-ramayana-in-hindi.jpg 1920w" sizes="auto, (max-width: 1367px) 100vw, 1367px" /></p>
<p style="text-align: justify;">रामकथा का आदि स्रोत ‘रामायण’ ही है। राष्ट्रकवि रवींद्रनाथ ठाकुर ‘रामायण’ के भारतीय जन-मानस में व्याप्ति पर लिखते हैं, “रामायण की कथा से भारतवर्ष के क्या बालक, क्या वृद्ध, क्या स्त्रियां सब को केवल शिक्षा ही नहीं मिलती है, शिक्षा के साथ-साथ उन्हें आनन्द भी मिलता है। भारतवासियों ने रामायण को शिरोधार्य ही नहीं माना है, उन्होंने उसको अपने हृदय सिंहासन पर स्थापित किया है।”</p>
<p style="text-align: justify;">संस्कृत साहित्य में महर्षि वाल्मीकि आदिकवि हैं और उनकी कालजयी कृति ‘रामायण’ रामकथा की आदि रचना है। संस्कृत साहित्य में ‘रामायण’ को आदि काव्य का स्थान प्राप्त है। संस्कृत साहित्य के साथ दूसरी भारतीय भाषाओं में रचित रामकथा का आदि स्रोत रामायण ही है। प्रो. राधावल्लभ त्रिपाठी इस विषय मे लिखते हैं, “वाल्मीकि की रचना प्रथम उपलब्ध ‘रामायण’ है। आगे चलकर इससे प्रेरित होकर संस्कृत, प्राकृत तथा अन्य भारतीय भाषाओं में अनेक ‘रामायणों’ की रचना हुई। योगवशिष्ठ, अध्यात्मरामायण, आनन्दरामायण, अद्भुदरामायण, मंत्ररामायण, भुशुंडिरामायण आदि रामकाव्य वाल्मीकि रामायण की प्रत्यक्ष परंपरा से ही है। जैन परंपरा में विमलसूरि का पउमचरित्र (प्राकृत में) तथा रविषेण का पद्मचरित्र भी रामायण काव्य है।”</p>
<p style="text-align: center;"><strong>वाल्मीकि कृत </strong><strong>‘रामायण’</strong></p>
<p style="text-align: center;"><strong>चतुर्विंशत्सहस्राणि श्लोकामुक्तवानृषि:।</strong></p>
<p style="text-align: center;"><strong>तथा सर्गशतान् पञ्च षटकाण्डाणि तथोत्तरम्।।</strong></p>
<p style="text-align: justify;">&#8211; रामायण, बालकांड ४.२</p>
<p style="text-align: justify;">इस कालजयी रचना में 24000 श्लोक, पांच सौ सर्ग तथा सात काण्ड हैं। ‘रामायण’ के रचना काल के बारे में विभिन्न विद्वानों के अलग अलग मत है। वाल्मीकि ‘रामायण’ में चौबीस हजार श्लोक है, इसलिए इसे चतुर्विंशति साहस्री-संहिता’ भी कहा जाता है। गायत्री मंत्र भी 24 अक्षरों का ही है। वाल्मीकि रामायण का प्रत्येक हजारवाँ श्लोक इन्हीं मंत्राक्षरों से प्रारंभ होता है। इस आदिकाव्य को समस्त उत्तरवर्ती काव्यों का बीजरूप भी माना जाता है- ‘काव्यबीजं सनातनम्’। महाकवि भास से लेकर गोस्वामी तुलसीदास तक अनेक मूर्धन्य रचनाकार वाल्मीकीय ‘रामायण’ से उपकृत हुए है। ‘रामायण’ का प्रचार-प्रसार श्रीराम के दोनों पुत्रों कुश और लव द्वारा किया गया। महर्षि वाल्मीकि ने इन दोनों को महाकाव्य के श्लोकों का सस्वर अभ्यास करवाया और उन्होंने गायन कर जनमानस में रामकथा को प्रसारित किया।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>वैदिक युग में रामकथा</strong></p>
<p style="text-align: justify;">वैदिक युग से ही राम शब्द का उल्लेख मिलता है। ऋग्वेद में ‘राम’ शब्द का स्पष्ट उदाहरण मिलता है। ब्राह्मण ग्रंथों में ऐतरेय, शतपथ और उपनिषदों में प्रश्नोपनिषद में ‘रामायण’ के पात्रों का नामोल्लेख मिलता है। पुराणों में राम को भगवान विष्णु का अवतार माना गया है। पुराणों में रामकथा अलग अलग रूपों में व्याप्त है। मार्कण्डेय, ब्राह्मण, वायु, विष्णु, श्रीमद्भागवत, ब्रह्म, गरुड़, हरिवंश, नारदीय, स्कन्द, आदि, और कल्कि पुराण में रामकथा के अंश व्याप्त है। भारतीय इतिहास लेखन की परंपरा में ज्ञान और ग्रंथ की परंपरा व्यक्ति से अधिक प्रभावी रही है। वैदिकयुग, ब्राह्मण, आरण्यक, रामायण और महाभारत युग, सूत्र-युग, ग्रंथ के आधार पर किए गए नामकरण हैं। ‘रामायण’के बाद रामकथा की दृष्टि से सर्वाधिक प्रमुख आख्यान ‘महाभारत’ है। महाभारत के वनपर्व (अध्याय २७३-९३) में ‘रामोपाख्यान’ में ‘रामायण’ की कथा का सार है। इस ‘रामोपाख्यान’ में महाभारत युगीन परिवेश का प्रभाव है।</p>
<p style="text-align: justify;">स्वर्गीय श्री रामदास जी गौड़ ने हिन्दुत्व नामक पत्रिका में 18 रामायणों का उल्लेख किया है। 1. संवृत रामायण, 2. अगस्त्य रामायण, 3. लोमक्ष रामायण, 4. मंजुल रामायण, 5. सौपय रामायण, 6. महामाला रामायण, 7. सौहार्द रामायण, 8. मणिरत्न रामायण, 9. सौर रामायण, 10. चान्द्र रामायण, 11. मैंद रामायण, 12. स्वायं मुव रामायण, 13. मुब्रल रामायण, 14. सुवर्चस रामायण, 15. देव रामायण, 16. श्रावण रामायण, 17. दुरंत रामायण तथा चम्पू रामायण। इसके अतिरिक्त, ‘रामचरितम्’ शीर्षक से संस्कृत में आठ महाकाव्य उपलब्ध है जिनके रचयिता क्रमश: काशीनाथ, अभिनंद, संध्याकार, नंदिन, कामाक्षी, देवविजय, रामवर्मन तथा गो दवर्मन हैं।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>वाल्मीकि </strong><strong>‘रामायण’ का सृजनात्मक विकास</strong></p>
<p style="text-align: justify;">संस्कृत के लौकिक और ललित साहित्य में रूपांतरित हुआ। भास और कालिदास के  साथ रामचरितात्मक महाकाव्य, नाटक, खण्डकाव्य, चम्पूकाव्य और कथा-साहित्य में रामकथा का विस्तार हुआ। फादर कामिल बुल्के ने अपने प्रसिद्ध शोध ‘रामकथा’ में संस्कृत के ललित साहित्य में रामकथा के विस्तार का उल्लेख लिया है। उन्होंने अपने ग्रंथ में जिन महाकाव्यों में ‘रामकथा’ सर्जनात्मक उपस्थिति का उल्लेख किया है उनमें प्रमुख है &#8211; कालिदास का ‘रघुवंश’ (400 ई.), भट्टि का भट्टिकाव्य अथवा रावणवध (500 से 650 ई. के मध्य), कुमारदास का ‘जानकीहरण’ (800 ई.), अभिनन्द का ‘रामचरित’ (9वीं शताब्दी), साकल्यमल्ल का ‘उदासराघव’ (14वीं शताब्दी), वामन भट्टबाण का ‘रघुनाथ चरित’ (15वीं शताब्दी) चक्रकवि का ‘जानकी परिणय (17वीं शताब्दी), बनारस निवासी अद्वैत कवि का ‘रामलिंगामृत’ (17वीं शताब्दी) और मोहन स्वामी का ‘रामरहस्य’ (18वीं शताब्दी)। 20वीं शताब्दी में भी रामकथा पर आधारित संस्कृत महाकाव्य लिखे गए। प्रमुख महाकाव्यों में आचार्य रेवाप्रसाद द्विवेदी का ‘उत्तरसीताचरितम्’ और ‘अभिराज’ राजेन्द्र मिश्र का ‘जानकीजीवनम्’ विशेष प्रशंसित हुए।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>नाट्यलेखन में रामकथा</strong></p>
<p style="text-align: justify;">वाल्मीकि रामायण की कथा को संस्कृत-नाट्य साहित्य में रूपायित करने वाले नाटककारों में भास का नाम लिया जाता है। भास कालिदास के पूर्ववर्ती साहित्यकार हैं। ‘प्रतिमा’ और ‘अभिषेक’ दो नाटकों में उन्होंने रामकथा को संजोया है। ‘प्रतिमनाटक’ में कुल सात अंक है जिसमें अयोध्याकांड की कथावस्तु और सीताहरण का चित्रण किया गया है। ‘अभिषेकनाटक’ ‘प्रतिमा’ का पूरक नाटक है। अभिषेक नाटक में बाली वध से लेकर श्रीराम के अभिषेक तक की कथा का वर्णन है। दिंगनाग का ‘कुंदमाला’ नाटक भास के रूपकों की तरह रचा गया। ‘कुंदमाला’ के छह अंक है। नाट्यशिल्प और रंगमंचीय दृष्टि से यह उल्लेखनीय नाट्य रचना है।</p>
<p style="text-align: justify;">भवभूति का नाम संस्कृत के महत्वपूर्ण नाट्यकारों में लिया जाता है। उनके तीन नाटक हैं &#8211; ‘महावीरचरितम्’, ‘मालतीमाधवम्’ और ‘उत्तररामचरित्तम्’। ‘महावीरचरितम्’ और ‘उत्तररामचरितम’ रामकथा पर आधारित नाटक है। इनका रचना काल 8वीं शताब्दी का प्रारंभ है। दोनों में ही सात अंक है। ‘उत्तररामचरितम्’ भवभूति की प्रसिद्धि का आधार है। इस नाटक से भवभूति को वैश्विक नाटककार का स्थान प्राप्त हुआ। सात अंकों के इस नाटक में राम-राज्याभिषेक, सीता-परित्याग और राम-सीता मिलन की कथा है। नाटक का प्रधान रस ‘करुण-रस’है।</p>
<p style="text-align: justify;">अनंगहर्ष मायूराज का ‘उदात्तराघव’ (900 ई.), मुरारी का ‘अनर्घराघव’, राजशेखर का ‘बाल रामायण’ (10वीं शताब्दी), रामभक्त हनुमान द्वारा रचित ‘हनुमन्नाटक’, दक्षिण भारतीय नाटककार शक्तिभद्र का ‘आश्चर्यचूड़ामणि’ (9वीं शताब्दी), जयदेव का ‘प्रसन्नराघव’ (1200-1250 ई.) की गणना प्रमुख रामकथा नाटकों में होती है।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>स्फुट काव्य और कथा साहित्य</strong></p>
<p style="text-align: justify;">साहित्य-दर्पण के रचयिता विश्वनाथकृत ‘राघवविलास’, मुद्गलभट्ट कृत ‘रामार्यशतक’, कृष्णेन्द्र कृत ‘आर्यारामायण’ प्रसिद्ध स्फुट-काव्य है। कथा-साहित्य की सबसे प्राचीन रचना गुणाढ्यकृत ‘बृहत्कथा’ (प्रथम शतब्दी ई.पू.) में रामकथा भी वर्णित थी। इसके दो विस्तृत रूपांतर मिलते हैं &#8211; जैनियों का ‘वसुदेवहिण्डि’ (5वीं शताब्दी) तथा  सोमदेवकृत ‘कथा-सरित्सागर’। गुणाढ्य की रचना का संक्षेप क्षेमेन्द्र द्वारा ‘बृहत्कथा-मंजरी’ में किया गया है, जिसमें रामकथा अति संक्षिप्त रूप से वर्णित है।</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone  wp-image-8044" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2024/10/मराठी-वाल्मीकि-रामायण-Marathi-Valmiki-Ramayan-5-300x223.jpg" alt="" width="1417" height="1053" srcset="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2024/10/मराठी-वाल्मीकि-रामायण-Marathi-Valmiki-Ramayan-5-300x223.jpg 300w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2024/10/मराठी-वाल्मीकि-रामायण-Marathi-Valmiki-Ramayan-5.jpg 490w" sizes="auto, (max-width: 1417px) 100vw, 1417px" /></p>
<p style="text-align: justify;"><strong>रागकाव्य व चम्पूकाव्य</strong></p>
<p style="text-align: justify;">तीन प्रमुख रागकाव्य भी रचित हुए &#8211; १. रामपाणिवाद रचित ‘गीतारामम्’, २. विश्वनाथसिंह रचित ‘संगीतरघुनन्दनम्’ और ३. गंगाधरशास्त्री कृत ‘संगीतराघवम्’। काव्य व नाट्य के अतिरिक्त चम्पूविधा में भी रामकथा का वर्णन आता है। इनकी संख्या अधिक नहीं है। इसमें प्रमुख है- मालवेश्वर भोजदेव (1005-55 ई.) द्वारा प्रणीत ‘रामायणचम्पू’ जो किष्किंधाकाण्ड तक ही लिखा जा सका। इस चम्पू का युद्धकाण्ड बाद में अनेक कवियों ने लिखा &#8211; १. भारतचम्पू टीकाकार लक्ष्मणसूरि, २. राजचूड़ामणिदीक्षित, ३. घनश्याम कवि, ४. मुक्तिश्वर दीक्षित, ५. गरलपूरी शास्त्री। भोजदेव के अनन्तर वेंकटाध्वरी ने 17वीं शताब्दी में रामकथापरक दो चम्पूकाव्य लिखे &#8211; उत्तरामचरितचम्पू तथा यादवराघवीयचम्पू।</p>
<p style="text-align: justify;"><em>राष्ट्रकवि रविन्द्रनाथ ठाकुर ने अपने ‘रामायण’ शीर्षक लेख में यह उल्लेख किया है, “शताब्दियों पर शताब्दियाँ बीतती चली गईं, तथापि ‘रामायण</em><em>’ का स्रोत भारतवर्ष में तनिक नहीं सूखा है।</em> <em>आज भी प्रतिदिन गाँव-गाँव</em><em>, घर-घर में इसे पढ़ा-सुना जा रहा है” यह तथ्य ब्रह्मा के उसी वचन का सत्यापन करता है कि जब तक पृथ्वी लोक पर पर्वत नदियाँ रहेंगी, तब तक यहाँ रामायण-कथा प्रचारित होती रहेगी- </em></p>
<p style="text-align: center;"><strong>यावत् स्थास्यन्ति गिरयः सरितश्च महीतले।</strong></p>
<p style="text-align: center;"><strong>तावद् रामायणकथा लोकेषु प्रचरिष्यति ॥ वाल्मीकि रामयण १.२.३५ ॥</strong></p>
<p style="text-align: justify;">(लेखक विद्या भारती जोधपुर (राजस्थान) प्रान्त के संगठन मंत्री है।)</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>और पढ़ें : <span style="color: #0000ff;"><a style="color: #0000ff;" href="https://rashtriyashiksha.com/impact-of-ram-katha-in-foreign-countries/" target="_blank" rel="noopener">रामायण सत कोटि अपारा-4 (विदेशों में रामकथा का प्रभाव)</a></span></strong></p>
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