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	<title>राष्ट्रीय शिक्षा, Author at राष्ट्रीय शिक्षा : शिक्षा में समाज प्रबोधन rashtriyashiksha.com</title>
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	<description>सा विद्या या विमुक्तये</description>
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	<title>राष्ट्रीय शिक्षा, Author at राष्ट्रीय शिक्षा : शिक्षा में समाज प्रबोधन rashtriyashiksha.com</title>
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		<title>रावण भी मुस्कुरा दिया</title>
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		<dc:creator><![CDATA[राष्ट्रीय शिक्षा]]></dc:creator>
		<pubDate>Tue, 20 Oct 2026 02:57:13 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[कथा-कहानी]]></category>
		<category><![CDATA[गोपाल माहेश्वरी]]></category>
		<category><![CDATA[नवीनतम]]></category>
		<category><![CDATA[IKS]]></category>
		<category><![CDATA[Rashtriya shiksha]]></category>
		<category><![CDATA[भारतीय ज्ञान परम्परा]]></category>
		<category><![CDATA[राम-रावण संवाद]]></category>
		<category><![CDATA[राष्ट्रीय शिक्षा]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>&#8211; गोपाल माहेश्वरी रघुवीर के विद्यालय में दशहरा अवकाश आरंभ होने के पूर्व शिक्षिका ने कुछ गृहकार्य करने के लिए दिए। इस वर्ष दशहरा और दीपावली एक ही माह में&#8230; </p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: right;">&#8211; गोपाल माहेश्वरी</p>
<p style="text-align: justify;">रघुवीर के विद्यालय में दशहरा अवकाश आरंभ होने के पूर्व शिक्षिका ने कुछ गृहकार्य करने के लिए दिए। इस वर्ष दशहरा और दीपावली एक ही माह में आने वाले थे और इसके बाद एक माह छोड़कर ही तो अर्धवार्षिक परीक्षाएं होने वाली हैं यह समझते हुए शिक्षिका चाहती थीं कि पाठ्यक्रम समय पर पूरा हो जाए और बच्चों को पढ़ने समझने का समय भी मिल सके।</p>
<p style="text-align: justify;">घर आते ही रघुवीर ने बस्ता पटका और मित्रों के साथ रावण का पुतला बनाने चल पड़ा। माधुरी स्वयं भी एक शिक्षिका थीं बेटे को पुकार कर पूछा “रघू! विद्यालय से आते ही खेल में लग गए?”</p>
<p style="text-align: justify;">“माँ! चार दिन अवकाश है अब।”</p>
<p style="text-align: justify;">“कुछ गृहकार्य नहीं मिला विद्यालय से?” माधुरी ने अपने अनुभव के आधार पर पूछा।</p>
<p style="text-align: justify;">“कुछ दिया तो है पर अभी चार दिन है माँ! कर लूँगा।” रघुवीर ने ठुनकते हुए कहा और रावण बनाने की जुगाड़ में लग गया। माधुरी उस समय चुप रह गई।</p>
<p style="text-align: justify;">एक घंटे बाद उसने बेटे से पूछा “एक कहानी सुनोगे रघू!”</p>
<p style="text-align: justify;">रघुवीर ने कहा “हाँ पर एक नई कहानी सुनाना।”</p>
<p style="text-align: justify;">“कहानी तो पुरानी है पर तुमने नहीं सुनी होगी इससे तुम्हारे लिए नई है। सुनोगे?”</p>
<p style="text-align: justify;">रघुवीर पास आकर बैठ गया। माधुरी ने शाम के भोजन के लिए तरकारी काटते हुए कहना प्रारंभ किया “कहानी उसी रावण की है जिसका पुतला दशहरे के दिन जलाया जाएगा। हुआ यों कि जब रामचंद्र जी ने रावण को इकतीस बाण एक-साथ मारकर गिरा दिया तब उसकी कुछ सांसें शेष रहते ही रामचंद्र जी ने अपने छोटे भाई लक्ष्मण से कहा कि लक्ष्मण! आज राजनीति का महापंडित रावण यमलोक जाने को तैयार है जाओ इससे कुछ नीति उपदेश ले लो। फिर कौन जाने ऐसा विद्वान संसार में कब जन्म लेगा।</p>
<p style="text-align: justify;">भाई की आज्ञा मानकर लक्ष्मण रावण के पास पहुँचे और हाथ जोड़कर नीति उपदेश देने की प्रार्थना की।</p>
<p style="text-align: justify;">रावण बोला “बहुत विलंब हुआ है लक्ष्मण, अब मेरे जीवन की कुछ ही घड़ियां शेष हैं, अब उपदेश  का समय कहाँ है?”</p>
<p style="text-align: justify;">“लेकिन भैया राम ने भेजा है मुझे तो कृपया कुछ तो उपदेश दीजिए, उनकी आज्ञा का पालन कर पाऊंगा।”</p>
<p style="text-align: justify;">रावण ने पीड़ा से कराहते हुए कहा “लक्ष्मण! मेरी संपूर्ण विद्वत्ता और अनुभव का सार है कि आज का कम कल पर मत छोड़ो। मैंने तीन बड़े काम करने का विचार किया था। पहला अग्नि में से धुआं समाप्त कर दूंगा, देख रहे हो मेरी सोने की चमचमाती लंका कैसी काली पड़ गई है। दूसरा मैंने सोचा था समुद्र का पानी मीठा बना दूंगा। इसके खारे जल से मेरे घावों में कितनी पीड़ा हो रही है। तीसरा काम था स्वर्ग तक सीढियाँ बना दूंगा, काश आज इस तरह छटपटाते हुए देह छोड़कर स्वर्ग नहीं जाना पड़ता। तीनों काम मैं आसानी से कर सकता था। मेरे बल, बुद्धि, प्रभाव सब इसके लिए सक्षम थे, पर मैंने सोचा कर लूँगा, कल कर लूँगा और तुम देख ही रहे हो वह कल नहीं आया, आज काल ही आ गया। इसलिए आज का काम कल पर न छोड़ो यही मेरा उपदेश है।”</p>
<p style="text-align: justify;">माधुरी कहानी पूरी कर मौन हो गई। उसने देखा रघुवीर अपना बस्ते से कापी निकाल रहा है अपना गृहकार्य पूरा करने के लिए।</p>
<p style="text-align: justify;">माधुरी मुस्कुराते हुए उसकी दृढ़ता परखने के लिए बोली “कुछ ही देर में रात होने वाली है गृहकार्य कल कर लेना।”</p>
<p style="text-align: justify;">“नहीं माँ, मुझे रावण नहीं बनना है।”</p>
<p style="text-align: justify;">माँ-बेटे खिलखिलाकर हँस पड़े। अचानक रघुवीर को लगा जमीन पर पड़ा अधबना रावण का पुतला भी मुस्कुरा रहा है शायद।</p>
<p><span style="color: #ff0000;">और पढ़े:</span> <span style="color: #3366ff;"><strong><a style="color: #3366ff;" href="https://rashtriyashiksha.com/impact-of-ramleela-drama-staging/" target="_blank" rel="noopener">रामायण सत कोटि अपारा-2 (‘रामलीला’ नाट्य मंचन का प्रभाव)</a></strong></span></p>
<p style="text-align: justify;">(लेखक इंदौर से प्रकाशित ‘देवपुत्र’ बाल मासिक पत्रिका के संपादक है।)</p>
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		<title>नवरात्र और भारतीय ज्ञान परंपरा-९</title>
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		<dc:creator><![CDATA[राष्ट्रीय शिक्षा]]></dc:creator>
		<pubDate>Mon, 19 Oct 2026 02:21:27 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[अवनीश भटनागर]]></category>
		<category><![CDATA[नवीनतम]]></category>
		<category><![CDATA[लेख]]></category>
		<category><![CDATA[IKS]]></category>
		<category><![CDATA[Rashtriya shiksha]]></category>
		<category><![CDATA[नवरात्र]]></category>
		<category><![CDATA[भारतीय ज्ञान परम्परा]]></category>
		<category><![CDATA[राष्ट्रीय शिक्षा]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>॥ॐ॥ नमो देव्यै महादेव्यै शिवायै सततं नमः। नम: प्रकृत्यै भद्रायै नियता: प्रणता: स्म ताम् (श्रीदुर्गासप्तशती ५/९) माँ भगवती के श्रीचरणों में नमन करते हुए शारदेय नवरात्र के अंतिम नौवें दिन&#8230; </p>
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]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: center;"><strong>॥ॐ॥</strong></p>
<p style="text-align: center;"><strong>नमो देव्यै महादेव्यै शिवायै सततं नमः।</strong><br />
<strong>नम: प्रकृत्यै भद्रायै नियता: प्रणता: स्म ताम्</strong></p>
<p style="text-align: right;">(श्रीदुर्गासप्तशती ५/९)</p>
<p style="text-align: justify;">माँ भगवती के श्रीचरणों में नमन करते हुए शारदेय नवरात्र के अंतिम नौवें दिन सभी स्नेही मित्रों, ज्ञानसाधक बन्धु-बहनों को नमस्कार।</p>
<p style="text-align: justify;">विश्व के आदि ग्रंथ ऋग्वेद के ज्ञानसूक्त में कहा गया, &#8220;प्रारंभिक स्थिति में पदार्थों के नाम रखे गए। यह ज्ञान का प्रथम चरण था। दोषरहित ज्ञान, पदार्थों का गुण -धर्म अनुभूति की कंदरा में आवेष्टित था जो अंत: प्रेरणा से प्रकट हुआ।&#8221;</p>
<p style="text-align: justify;">कहा गया, <strong>&#8220;ऋषय: मन्त्रदृष्टार:&#8221;</strong>। अर्थात् ऋषियों ने मंत्रों के दर्शन किए। तो मंत्र कोई मनुष्य थे क्या? समाधि की परमावस्था में जब ऋषियों की चेतना विश्व चैतन्य से एकाकार हो जाती थी, उस समय जिन तत्त्वों की आंतरिक अनुभूति उन्हें हुई, उस तत्त्व चिंतन को ही दर्शन कहा गया। इस प्रकार की पारलौकिक क्षमता सभी में नहीं थी, इसलिए सबके कल्याण के निमित्त उन ऋषियों ने उन आधिदैविक अनुभूतियों का संकलन और लेखन किया जिसे कालांतर में &#8216;वेद&#8217; संज्ञा दी गई। इसीलिए वेदों को &#8216;अपौरुषेय&#8217; कहा गया अर्थात् जिनका मूल स्रोत कोई व्यक्ति नहीं है। यह संकलित ज्ञान अव्यवस्थित स्वरूप में था जिसे विषयानुसार वर्गीकृत एवं क्रमबद्ध किया अनेक शताब्दियों बाद कृष्ण द्वैपायन नामक ऋषि ने, जिन्हें इसी कारण &#8216;वेदव्यास&#8217; कहा गया क्योंकि उन्होंने इस संकलित ज्ञान को विभाजित कर उसको अपने चार अलग-अलग शिष्यों को एक-एक वेद के विषय में पारंगत होने और उसे अपने-अपने शिष्यों को अध्ययन-अभ्यास कराने की प्रेरणा दी। इस प्रकार वेदों की शाखाएं बनीं।</p>
<p style="text-align: justify;">वेदों के उच्च स्तरीय ज्ञान और भाषा को समझना सामान्य जन के स्तर से ऊपर था। अगली पीढ़ी को सुलभ कराने और अन्तर्निहित ज्ञान को विस्तार देने के उद्देश्य से परवर्ती ऋषियों ने उनके भाष्य लिखे, व्याख्याएं कीं। उत्तर-वैदिक काल में उपनिषद् रचना हुई। षड्दर्शन में जिज्ञासा और तर्क को स्थान दिया गया।</p>
<p style="text-align: justify;">कालान्तर में इसी के विकास क्रम में ज्ञान की विभिन्न शाखाओं और विधाओं का जन्म हुआ। पाणिनि का व्याकरण शास्त्र और पिंगल का छन्दशास्त्र रचा गया। पतञ्जलि ने योगसूत्र और भाषा-अनुशासन दिया। भरत मुनि का नाट्यशास्त्र, वात्स्यायन का कामसूत्र, चरक-सुश्रुत-वाग्भट की आयुर्विज्ञान संहिताएं और कौटिल्य का अर्थशास्त्र &#8211; इन सबकी रचना के काल खण्ड अलग-अलग, पहले-बाद में हो सकते हैं परन्तु सभी भारतीय ज्ञान परम्परा की विविध शाखाएं हैं।</p>
<p style="text-align: justify;">ऋग्वेद में सृष्टि रचना प्रक्रिया का उल्लेख है। यजुर्वेद में यज्ञ विधान, ज्यामिति और छंद विधान है। सामवेद वेदमन्त्र गायन की विधि बताता है, सप्त स्वर का वर्णन करता है। &#8216;कमलपत्र पर वर्षा की बूंदें गिरने की ध्वनि सुन कर तालवाद्यों के निर्माण की कल्पना आई। माता सरस्वती और देवर्षि नारद की वीणा का वर्णन हम सुनते-पढ़ते हैं। अथर्ववेद का अर्थ है दोषरहित ज्ञान। मीमांसा &#8211; ब्राह्मण ग्रन्थ &#8211; आरण्यक की रचना ज्ञान परम्परा को सुगम बनाने के लिए हुई। स्मृतियां आचरण संहिताओं के रूप में लिखी गईं, इसीलिए देश-काल-परिस्थिति के अनुरूप उनकी विषयवस्तु में अलग-अलग विधान हैं। जो विषय मनुस्मृति में हैं, वे पराशर, याज्ञवल्क्य, कात्यायन अथवा देवल स्मृति में नहीं हैं।</p>
<p style="text-align: justify;">वाल्मीकि रामायण में किष्किंधा नगरी में नृत्य-संगीत का उल्लेख है। महाभारत में अर्जुन अज्ञातवास में नृत्य-संगीत सीखते हैं। भगवान सदाशिव के ताण्डव नृत्य और श्रीकृष्ण की नृत्य प्रियता से अपने ग्रंथ भरे हुए हैं।</p>
<p style="text-align: justify;">यूरोप में लोकतंत्र में किए गए प्रयासों से हजारों वर्ष पूर्व भारत में राज्य व्यवस्था, सभा-समितियों और उनके लिए चयन-निर्वाचन के उल्लेख मिलते हैं। &#8216;राष्ट्र&#8217; शब्द का कहीं उल्लेख नहीं मिलता, ऐसा कहने वाले पाश्चात्य लेखन से प्रभावित विद्वान <strong>&#8216;श्री देवीअथर्वशीर्षम्&#8217;</strong> (७) में माँ भगवती की घोषणा देख सकते हैं &#8211; <strong>&#8220;अहं राष्ट्री सङ्ममनी वसूनां चिकितुषी प्रथमा यज्ञियानाम्।&#8221;</strong></p>
<p style="text-align: justify;">श्रीमद्भगवद्गीता के महत्व का वर्णन करते हुए कहा गया &#8211; <strong>&#8220;सर्वोपनिषदो गावो, दोग्धा गोपाल &#8211; नन्दन:। पार्थो वत्स: सुधीर्भोक्ता, दुग्धं गीतामृतं महत्॥</strong> &#8211; सब उपनिषद् गाय हैं, उनको दुह कर गोपालनन्दन श्रीकृष्ण ने गीतामृत रूपी दूध निकाला जिसे अर्जुन रूपी बछड़े ने पिया और सुधीजन जिसके भोक्ता हैं।&#8221; ऐसे गीता ज्ञान का उल्लेख किए बिना भारत की ज्ञान परम्परा की चर्चा अपूर्ण है। श्रीमद्भगवद्गीता के चतुर्थ अध्याय के प्रारंभ में श्रीकृष्ण कहते हैं &#8211;</p>
<p style="text-align: center;"><strong>इमं विवस्वते योगं प्रोक्तवानहमव्ययम्।</strong><br />
<strong>विवस्वान् मनवे प्राह मनुरिक्ष्वाकवेऽब्रवीत्॥४/१॥</strong><br />
<strong>एवं परम्पराप्राप्तमिमं राजर्षयो विदु:।</strong><br />
<strong>से कालेनेह महता योगो नष्ट: परन्तप॥४/२॥</strong></p>
<p style="text-align: justify;">&#8211; हे परन्तप ! सृष्टि के आदिकाल में यह ज्ञान मैंने सूर्य को दिया था, उन्होंने अपने पुत्र मनु और मनु ने इक्ष्वाकु को, परम्परा से प्राप्त इसे राजर्षियों ने जाना परन्तु कालान्तर में यह लुप्त हो गया।<br />
अर्जुन को यह बात नहीं जंचती &#8211; <strong>&#8220;अपरं भवतो जन्म परं जन्म विवस्वत:। कथमेतद्विजानीयां त्वमादौ प्रोक्तवानिति॥४/४॥</strong> &#8211; सूर्य के जन्म के बाद आपका जन्म हुआ फिर कल्प के आदिकाल में आपने सूर्य को बताया, यह मैं कैसे जान सकता हूँ?&#8221;</p>
<p style="text-align: justify;">उत्तर में श्रीकृष्ण कहते हैं &#8211; <strong>&#8220;बहूनि मे व्यतीतानि जन्मानि तव चार्जुन। तान्यहं वेद सर्वाणि न त्वं वेत्थ परन्तप॥&#8221;(४/५)</strong></p>
<p style="text-align: justify;">मेरे और तेरे अनेक जन्म हो चुके हैं, उनका तुझे स्मरण नहीं है परन्तु मैं जानता हूँ।&#8221;</p>
<p style="text-align: justify;">द्वितीय श्लोक में आया<strong> &#8216;एवं परम्पराप्राप्तमिमं&#8217;</strong> अंश हम ज्ञानसाधकों के लिए महत्वपूर्ण है। भारतीय तत्व चिंतन की विस्तीर्ण परम्परा आदिकाल से चली आ रही है, कोई आधुनिक विद्वानों ने नहीं रची। दूसरी बात, भारतीय संस्कृति में स्थापित कर्मफल और तदनुसार पुनर्जन्म अथवा मोक्ष की संकल्पना केवल <strong>&#8216;वासांसि जीर्णानि यथा विहाय&#8217;</strong> अर्थात् देह परिवर्तन की प्रकृति प्रदत्त व्यवस्था नहीं है। अपने लिए इसका अर्थ है कि ज्ञानार्जन प्रक्रिया एक जन्म में पूर्ण नहीं होती। जितना इस जन्म में अर्जित हो सका, उससे आगे अगले जन्म में होगा परन्तु पिछले जन्म में जहां तक पहुंच गये थे, उस क्रम को इस जन्म में जारी रखना है।</p>
<p style="text-align: justify;">अन्ततः,<strong> &#8220;वयं राष्ट्रे जागृयाम् पुरोहिता:&#8221;</strong> के संकल्प के लिए प्रतिबद्ध हम ज्ञान साधकों को विदेशी दासता से प्राप्त औपनिवेशिक दास्यभाव से मुक्त होकर पुनः भारत को विश्वगुरु के स्थान पर आसीन करना है। ऐसी सामर्थ्य देने वाली माँ भगवती के श्रीचरणों में विनयपूर्वक प्रणाम और क्षमायाचना सहित यह नव-दिवसीय ज्ञानदीप माला को पूर्ण करता हूँ &#8211;</p>
<p style="text-align: center;"><strong>अज्ञानाद्विस्मृतेर्भ्रान्त्या यन्यूनमधिकं कृतम्।</strong><br />
<strong>तत्सर्वं क्षम्यतां देवि प्रसीद परमेश्वरि॥</strong></p>
<p style="text-align: justify;">&#8211; अज्ञान से, भूल से या बुद्धि की भ्रान्ति के कारण मैंने (इस ज्ञान दीपमाला में) जो न्यूनता या अधिकता की हो, उसे क्षमा करें और प्रसन्न होकर कृपा बनाए रखें, क्योंकि &#8211;</p>
<p style="text-align: center;"><strong>पृथिव्यां पुत्रास्ते जननि बहव: सन्ति सरला:,</strong><br />
<strong>परं तेषां मध्ये विरलतरलोऽहं तव सुत:।</strong><br />
<strong>मदीयोऽयं त्याग: समुचितमिदं नो तव शिवे,</strong><br />
<strong>कुपुत्रो जायेत क्वचिदपि कुमाता न भवति॥</strong></p>
<p style="text-align: justify;">&#8211; धरती पर अनेक सीधे-सादे तुम्हारे पुत्रों में मैं अधिक चपल हूँ, तो भी हे शिवे! मुझे त्यागना समुचित नहीं है क्योंकि संसार में कुपुत्र तो हैं परन्तु कुमाता नहीं हो सकती।</p>
<p style="text-align: justify;">इस ज्ञानयात्रा को विराम देते हुए सभी को नमस्कार करता हूँ।<strong> &#8216;कल्याणै प्रणतां, विष्णुमायेति शब्दिता&#8217;</strong> उन महामाया की कृपा सबको प्राप्त हो, इसी मंगलकामना सहित,</p>
<p style="text-align: justify;">सहयात्री रहा,</p>
<p style="text-align: right;">&#8211; अवनीश भटनागर</p>
<p style="text-align: justify;">(लेखक विद्या भारती के अखिल भारतीय उपाध्यक्ष है।)</p>
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		<title>नवरात्र और भारतीय ज्ञान परंपरा-८</title>
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		<dc:creator><![CDATA[राष्ट्रीय शिक्षा]]></dc:creator>
		<pubDate>Sun, 18 Oct 2026 02:41:38 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[अवनीश भटनागर]]></category>
		<category><![CDATA[नवीनतम]]></category>
		<category><![CDATA[लेख]]></category>
		<category><![CDATA[IKS]]></category>
		<category><![CDATA[Rashtriya shiksha]]></category>
		<category><![CDATA[नवरात्र]]></category>
		<category><![CDATA[भारतीय ज्ञान परम्परा]]></category>
		<category><![CDATA[राष्ट्रीय शिक्षा]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>॥ श्रीनारायणि नमोस्तुते ॥ विद्या तथैव क्रियते भगवद्विष्णुमायया। तया त्वमेष वैश्यश्च तथैवान्ये विवेकिन:॥ (श्रीदुर्गासप्तशती १३/३) भगवान विष्णु की माया स्वरूपा भगवती ही विद्या उत्पन्न करने वाली हैं और उन्हीं की&#8230; </p>
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]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: center;"><strong>॥ श्रीनारायणि नमोस्तुते ॥</strong></p>
<p style="text-align: center;"><strong>विद्या तथैव क्रियते भगवद्विष्णुमायया।</strong><br />
<strong>तया त्वमेष वैश्यश्च तथैवान्ये विवेकिन:॥</strong><br />
<strong>(श्रीदुर्गासप्तशती १३/३)</strong></p>
<p style="text-align: justify;">भगवान विष्णु की माया स्वरूपा भगवती ही विद्या उत्पन्न करने वाली हैं और उन्हीं की माया से विवेकी पुरुष भी मोह ग्रस्त हो जाते हैं।</p>
<p style="text-align: justify;">यदि विद्या को उत्पन्न करने वाली महामाया ही मोहाविष्ट करें तो उससे कौन उबारे? &#8220;प्राधानिकं रहस्यम् &#8221; (१५-१६) में उस स्वरूप का वर्णन है &#8211;</p>
<p style="text-align: center;"><strong>अक्षमाला अंकुशधरा वीणापुस्तकधारिणी।</strong><br />
<strong>महाविद्या महावाणी भारती वाक् सरस्वती।</strong></p>
<p style="text-align: justify;">हाथों में अक्षमाला, अंकुश, वीणा और पुस्तक धारण करने वाली महाविद्या, महावाणी, भारती, वाक् और सरस्वती जिनके नाम हैं।</p>
<p style="text-align: justify;">हम सरस्वती साधकों के लिए विचारणीय है कि माता सरस्वती की कृपा प्राप्त होगी कैसे? सामान्य संसारी जीव कैसे कृपा प्राप्त कर सकता है ?</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>&#8216;नास्ति विद्या समं चक्षु:&#8217;</strong> विद्या के समान कोई नेत्र नहीं। इन नेत्रों को &#8216;ज्ञानाञ्जनशलाकया&#8217; ज्ञान रूपी सुरमे की सलाई से खोलने वाले <strong>&#8216;चक्षुरुन्मीलन्तिनैव तस्मै श्री गुरुवे नमः&#8217;</strong>, माँ सरस्वती के प्रतिनिधि के रूप में ज्ञान का वितरण करते हैं। भारतीय संस्कृति में <strong>&#8216;गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुर्गुरुर्देवो महेश्वर:&#8217;</strong> के स्थान पर विराजित गुरु को अनेक प्रकार से महिमान्वित किया गया है।</p>
<p style="text-align: justify;">शिक्षा ज्ञानार्जन की प्रक्रिया है। शिक्षा भाववाचक संज्ञा है, अमूर्त है परन्तु उसका मूर्त रूप हैं शिक्षक। शिक्षा के केन्द्र (जिसे आज कक्षा कक्ष तक सीमित मान लिया गया है) में केवल दो ही होते हैं &#8211; शिक्षक और विद्यार्थी। तैत्तिरीय उपनिषद् (शीक्षावल्ली द्वितीय अनुवाक) में कहा गया &#8211;</p>
<p style="text-align: center;"><strong>आचार्य: पूर्वरूपम्। अन्तेवास्युत्तररूपम्। विद्या संधि:। प्रवचनं संधानम्।</strong></p>
<p style="text-align: justify;">जिस प्रकार वर्णमाला के वर्णों की संधि से नये शब्द की रचना होती है, वैसे ही पूर्व वर्ण आचार्य और परवर्ती वर्ण शिष्य के मिलने से उत्पन्न होने वाली संधि विद्या है। आचार्य का प्रवचन और शिष्य द्वारा उसे धारण करने की, उनके बीच संवाद की प्रक्रिया ही संधान है।</p>
<p style="text-align: justify;">मनुस्मृति (अध्याय २/१४०-१४१-१४२) में शिक्षक के तीन प्रकार बताए गए हैं &#8211; आचार्य, उपाध्याय और गुरु। सामान्य तौर पर इन तीनों को पर्यायवाची माना जाता है किन्तु भगवान स्वायंभुव मनु द्वारा दी गई व्यवस्था देखें &#8211;</p>
<p style="text-align: center;"><strong>उपनीय तु य: शिष्यं वेदमध्यापयेद् द्विज:।</strong><br />
<strong>साङ्गम् च सरहस्यम् च तमाचार्य प्रचक्षते॥</strong></p>
<p style="text-align: justify;">उपनयन संस्कार करने वाले और अंगों तथा रहस्यों की व्याख्या सहित वेदज्ञान का अध्ययन कराने वाले &#8211; आचार्य।</p>
<p style="text-align: center;"><strong>एकदेशं तु वेदस्य वेदाङ्गान्यपि वा पुनः।</strong><br />
<strong>यो अध्यापयति वृत्यर्थम् उपाध्याय: स उच्यते॥</strong></p>
<p style="text-align: justify;">आजीविका उपार्जन के उद्देश्य से वेदज्ञान के किसी एक अंश या वेदांग की शिक्षा देने वाले &#8211; उपाध्याय।</p>
<p style="text-align: center;"><strong>निषेकादीनि कर्माणि य: करोति यथाविधि।</strong><br />
<strong>सम्भावयति चान्नेन से विप्रो गुरुरुच्यते॥</strong></p>
<p style="text-align: justify;">अपने यजमान के यहां विविध संस्कारों को विधिपूर्वक कराते हैं और अपने गुरुकुल में शिष्यों के लिए अन्न आदि की व्यवस्था करते हैं &#8211; गुरु।</p>
<p style="text-align: justify;">वायु पुराण (५९/३०) &#8216;आचार्य&#8217; की व्याख्या इस प्रकार करता है &#8211;</p>
<p style="text-align: center;"><strong>स्वयमाचरते यस्माद् आचारं स्थापयत्यपि।</strong><br />
<strong>आचिनोति च शास्त्रार्थान् यमै: सनियमैर्युत:॥</strong></p>
<p style="text-align: justify;">जो स्वयं अपनी विद्या के अनुरूप आचरण करें, शिष्यों में आचार की स्थापना करें, और यम-नियम का पालन करते हुए शास्त्रों के अर्थ की उपपत्ति करें, वे आचार्य हैं।</p>
<p style="text-align: justify;">भारतीय ज्ञान परम्परा में किसी ब्रहमविद् को भी तब तक आचार्य नहीं माना जाता था जब तक वह श्रोत्रिय, आचरणशील और अपने मत की उपपत्ति करने में सक्षम न हो। आचार्य अपने शास्त्र के लिए आप्त होते थे। उनके द्वारा उद्घोषित आप्त वचनों को आज तक शब्द प्रमाण के रूप में स्वीकार किया जाता है, उनके संदर्भ दिए जाते हैं। वेद &#8211; उपनिषद &#8211; दर्शन &#8211; मीमांसा- ब्राह्मण &#8211; आरण्यक &#8211; पुराण &#8211; इतिहास के ग्रंथ तथा द्वैत &#8211; अद्वैत &#8211; द्वैताद्वैत &#8211; शुद्धाद्वैत आदि की संकल्पना इन महान आचार्यों की वाणी है, उनके द्वारा स्थापित ज्ञान परम्परा है।</p>
<p style="text-align: justify;">महाकवि कालिदास के प्रसिद्ध महाकाव्य &#8216;रघुवंशम्&#8217; (सर्ग ५/२०) में महाराज रघु से अपने गुरु को दक्षिणा रूप में अर्पित करने हेतु धन की याचना करने आए कौत्स नामक स्नातक का उल्लेख है &#8211;</p>
<p style="text-align: center;"><strong>समाप्तविद्येन मया महर्षिर्विज्ञापितोऽभूत् गुरुदक्षिणाय।</strong><br />
<strong>समे चिरायास्खलितोपचारां तां भक्तिमेवागणयत महात्मा॥</strong></p>
<p style="text-align: justify;">अर्थात् विद्या पूर्ण होने पर मैंने महर्षि से गुरु दक्षिणा में क्या अर्पित करूं, ऐसा प्रश्न किया। उन महात्मा ने मेरी अविचल चिरकालिक गुरु भक्ति को ही मेरी दक्षिणा मान लिया।</p>
<p style="text-align: justify;">अथर्ववेद (११/३/५) में गुरु-शिष्य सम्बन्ध पर एक सूत्र है जो शिक्षा शास्त्र के विश्व साहित्य में अप्रतिम उदाहरण है &#8211;</p>
<p style="text-align: center;"><strong>आचार्य उपनयमानो ब्रहमचारिणं कृणुते गर्भमन्त:।</strong><br />
<strong>तं रात्रिस्त्रि उदरे बिभर्ति तं जातं दृष्टुमभिसंयन्ति देवा:॥</strong></p>
<p style="text-align: justify;">अर्थात उपनयन संस्कार करने वाले आचार्य बालक को उसी प्रकार अपने पास रखते थे जैसे माता गर्भ में धारण करती है। तीन रात्रि तक आचार्य उसे आश्रम में अपने समीप रखकर बाद में उसे शिक्षा देकर इस योग्य बना देते थे कि देवता भी उसे देखने आयें।</p>
<p style="text-align: justify;">भारत की वैदिक शिक्षा व्यवस्था में यह श्रेष्ठ कल्पना &#8211; गुरु-शिष्य सम्बन्ध की तुलना माता-पुत्र के सम्बन्ध से, इससे बेहतर और क्या हो सकता है? जैसे माँ गर्भ में धारण करती, जन्म देती, रक्षण-पोषण और संवर्द्धन करती है उसी प्रकार उपनयन संस्कार से समावर्तन तक आचार्य भी शिष्य के प्रति दायित्व निर्वाह करते हैं।</p>
<p style="text-align: justify;">समावर्तन उपदेश की चर्चा किए बिना संपूर्ण ज्ञान परम्परा का वर्णन पूर्ण नहीं हो सकता। तैत्तिरीय उपनिषद् के एकादश अनुवाक में गुरुकुल में अध्ययन पूर्ण कर गृहस्थ आश्रम में प्रवेश करने जा रहे शिष्य को गुरु जीवन व्यवहार की शिक्षा देते हैं &#8211; सत्य बोलना, धर्म का आचरण करना, स्वाध्याय &#8211; प्रवचन &#8211; धर्मानुष्ठान &#8211; देवपितृकार्य में प्रमाद न करना के अतिरिक्त कुछ विशेष बातें सिखाते हैं, जैसे -&#8216;प्रजातन्तुं मा व्यवच्छेत्सी:&#8217; अर्थात् सृष्टि के क्रम प्रजा उत्पत्ति को बाधित न करना।</p>
<p style="text-align: justify;">इसी प्रकार, <strong>&#8220;मातृदेवो भव। पितृदेवो भव। आचार्यदेवो भव। अतिथिदेवो भव।&#8221;</strong> में इन्हें देवता स्वरूप मानो, इसके साथ गुरु जी सावधान भी करते हैं। ये भी मनुष्य हैं, गुण &#8211; दोष सबमें होते हैं, इसलिए बताया &#8211; <strong>&#8220;नान्यनवद्यानि कर्माणि। तानि सेवितव्यानि। नो इतराणि। यान्यस्माकं सुचरितानि। तानि त्वयोपास्यानि। नो इतराणि।&#8221;</strong> अर्थात् हमारे भी निर्दोष कर्मों और श्रेष्ठ आचरणों का ही अनुसरण &#8211; अनुपालन करना, हमारे दोषों को मत अपनाना। अपने भी दोष होना स्वाभाविक है किन्तु शिष्य के जीवन में वे दोष अनुकरण न किए जाएं, ऐसा स्वीकार करने &#8211; बोलने का साहस केवल भारत के गुरु में है।</p>
<p style="text-align: justify;">शिक्षा क्षेत्र के हम साधक अपने पूर्ववर्ती उन महान आचार्यों की परम्परा के वाहक बन सकें, यही प्रार्थना उस &#8220;महाविद्या &#8211; महामाया &#8211; महामेधा &#8211; महास्मृति जगन्माता&#8221; के श्रीचरणों में।</p>
<p style="text-align: justify;">ज्ञान मार्ग में आपका सहयात्री,</p>
<p style="text-align: right;">&#8211; अवनीश भटनागर</p>
<p style="text-align: justify;">(लेखक विद्या भारती के अखिल भारतीय उपाध्यक्ष है।)</p>
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		<title>नवरात्र और भारतीय ज्ञान परंपरा-७</title>
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		<dc:creator><![CDATA[राष्ट्रीय शिक्षा]]></dc:creator>
		<pubDate>Sat, 17 Oct 2026 02:35:53 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[अवनीश भटनागर]]></category>
		<category><![CDATA[नवीनतम]]></category>
		<category><![CDATA[लेख]]></category>
		<category><![CDATA[IKS]]></category>
		<category><![CDATA[Rashtriya shiksha]]></category>
		<category><![CDATA[नवरात्र]]></category>
		<category><![CDATA[भारतीय ज्ञान परम्परा]]></category>
		<category><![CDATA[राष्ट्रीय शिक्षा]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>॥ श्री महादेव्या: प्रसादत:॥ मन्त्राणां मातृका देवी शब्दानां ज्ञानरूपिणी। ज्ञानानां चिन्मयातीता शून्यानां शून्यसाक्षिणी॥ ( श्रीदेवी अथर्वशीर्षम् /२४) जो मंत्रों में मातृका अर्थात् मूलाक्षर रूप में, शब्दों में ज्ञान (अर्थ) रूप&#8230; </p>
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]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: center;"><strong>॥ श्री महादेव्या: प्रसादत:॥</strong></p>
<p style="text-align: center;"><strong>मन्त्राणां मातृका देवी शब्दानां ज्ञानरूपिणी।</strong><br />
<strong>ज्ञानानां चिन्मयातीता शून्यानां शून्यसाक्षिणी॥</strong><br />
<strong>( श्रीदेवी अथर्वशीर्षम् /२४)</strong></p>
<p style="text-align: justify;">जो मंत्रों में मातृका अर्थात् मूलाक्षर रूप में, शब्दों में ज्ञान (अर्थ) रूप में, ज्ञान में चिन्मयातीत (विशुद्ध चेतना से परे &#8211; beyond pure consciousness) तथा शून्य में शून्यसाक्षिणी (प्रलयकाल में जब सृष्टि समाप्त हो जाने पर सब कुछ &#8216;शून्य&#8217; हो जाता है, उसे भी जो साक्षी भाव से देखती हैं) रूप में स्थित हैं, उन भगवती दुर्गा को प्रणाम करता हूँ।</p>
<p style="text-align: justify;">मंत्र रचना मूलाक्षरों से, उन शब्दों के अर्थ से प्राप्त ज्ञान, ज्ञान की परमोच्च अवस्था चिन्मयातीत और सर्वत्र शून्य की साक्षी&#8230; यह भारतीय तत्व चिंतन में ज्ञान के क्रमिक विकास का स्वरूप है। गोस्वामी तुलसीदास जी भी श्रीरामचरितमानस का प्रारंभ करते हैं &#8211;</p>
<p style="text-align: center;"><strong>वर्णानां अर्थसंघानां रसानां छन्दसामपि।</strong></p>
<p style="text-align: justify;">वर्ण (अक्षर), उनसे मिलने पर बने शब्दों में वर्णित अर्थ समूह और उससे नि:सृत रसानुभूति और फिर छन्दरचना, इस मंगलकारी वाणी-विनायक स्वरूप की वन्दना।</p>
<p style="text-align: justify;">&#8220;स्मृति चन्द्रिका&#8221; में ज्ञानार्जन के क्रमिक अंगों का वर्णन इस प्रकार है &#8211;</p>
<p style="text-align: center;"><strong>शुश्रूषा श्रवणं चैव ग्रहणं धारणं तथा।</strong><br />
<strong>ऊहापोहार्थविज्ञानं तत्त्वज्ञानं च धीगुणा:॥</strong></p>
<p style="text-align: justify;">गुरु की सेवा, उनके शब्दों का श्रवण, उनका अर्थ ग्रहण कर मन में धारण, स्वयं खोजना और अन्य से जिज्ञासा समाधान कर तत्त्वज्ञान की पूर्णता।</p>
<p style="text-align: justify;">बृहदारण्यक उपनिषद् में ज्ञानार्जन की श्रवण-मनन-निदिध्यासन प्रक्रिया का उल्लेख है अर्थात् शब्द सुनकर मनन द्वारा बौद्धिक परिग्रहण और निदिध्यासन द्वारा आत्मानुभूतिजन्य ग्राह्यता।</p>
<p style="text-align: justify;">छान्दोग्योपनिषद् में श्वेतकेतु नामक युवक और उसके पिता ऋषि आरुणि के मध्य हुए संवाद के माध्यम से इस प्रक्रिया को विविध प्रयोगों तथा उदाहरणों द्वारा स्पष्ट किया गया है, जैसे,&#8221;मन अन्नमय है, प्राण जलमय है तथा वाणी तेजोमय है&#8221; के शब्दों के वास्तविक अर्थ को समझाने के लिए पिता उसे एक पक्ष (१५ दिन) केवल जल पीकर रहने का निर्देश देते हैं। इसी प्रकार देह और आत्मा के बीच सम्बन्ध स्पष्ट करने के लिए वटवृक्ष के फल को तोड़ कर उसके निरीक्षण-परीक्षण द्वारा सामने खड़ा वटवृक्ष कहां से आया, इस प्रश्न का उत्तर खोजने के माध्यम से आत्मतत्व की व्यापकता समझाते हैं।</p>
<p style="text-align: justify;">श्रीमद्भगवद्गीता (४/३४) में श्रीकृष्ण कहते हैं &#8211;</p>
<p style="text-align: center;"><strong>तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया।</strong><br />
<strong>उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानं ज्ञानिस्तत्त्वदर्शिन:॥</strong></p>
<p style="text-align: justify;">तत्त्वज्ञान से युक्त मनीषियों को भली-भांति प्रणाम कर, उनकी सेवा कर और निष्कपट भाव से किए गए प्रश्नों द्वारा उनके उपदेश से ज्ञान प्राप्त कर।</p>
<p style="text-align: justify;">प्रश्नोत्तर, कथा कथन, दृष्टांत, जीवनवृत्त वर्णन आदि शिक्षण शैली ही आजकल परिचर्चा, परिसंवाद (seminar) आदि में प्रचलित है। महाभारत युद्ध के बाद उत्पन्न परिस्थितियों में समाज व्यवस्था को पुनर्स्थापित करने के लिए नैमिषारण्य में आयोजित 88 हजार ऋषि-मुनियों के परिसंवाद का वर्णन स्कंद पुराण के रेवाखण्ड में आता है। समाज की परिस्थितियों पर विचार कर दिशा निर्देश करने के लिए समाज के नीति निर्धारकों ने निश्चित अंतराल पर देश के चार स्थानों &#8211; हरिद्वार, प्रयागराज, उज्जयिनी तथा नासिक में कुम्भ मेला क्षेत्र में विद्वत् संसद की परम्परा इसी विचार-विमर्श के लिए प्रारंभ की थी।</p>
<p style="text-align: justify;">ये सब उदाहरण तत्वचिंतन को एक पीढ़ी से अगली पीढ़ी को हस्तांतरण करने, ज्ञान को संक्रमित करने की प्रक्रिया थी जिससे ज्ञान परम्परा सतत, सबल और समृद्ध होती गई।</p>
<p style="text-align: justify;">वेद- उनके उपवेद &#8211; वेदांत अर्थात् उपनिषद &#8211; षड्दर्शन &#8211; मीमांसा &#8211; ब्राह्मण ग्रन्थ &#8211; आरण्यक &#8211; पुराणेतिहास आदि की रचना इसी ज्ञान परम्परा के स्रोत हैं। प्रायः ये सभी ग्रंथ संवाद शैली में रचित हैं। भारत में ग्रंथ लेखन पाठ्य-पुस्तकों (textbook) के स्वरूप में नहीं किया गया, संवाद &#8211; प्रश्नोत्तर &#8211; कथोपकथन &#8211; जिज्ञासा समाधान की शैली में हुआ इसलिए पाश्चात्य विद्वानों को यह कहना सर्वथा सरल हो गया कि भारत में शिक्षा प्रसार या ज्ञानार्जन की कोई परम्परा थी ही नहीं।</p>
<p style="text-align: justify;">अपनी अगली पीढ़ियों को भारत के ज्ञान भण्डार को हस्तांतरित कर उनके मन में अपने ज्ञानवान् पूर्वजों के प्रति गौरव भाव जाग्रत करना, इसके लिए शिक्षा क्षेत्र से जुड़े हुए हम साधकों को ही दायित्व लेना होगा। इस दायित्व के निर्वहन में हम सफल हों, यही प्रार्थना &#8216;वाणी विद्यादायिनी&#8217; से।</p>
<p style="text-align: justify;">ज्ञान पथ पर आपका सहयात्री,</p>
<p style="text-align: right;">&#8211; अवनीश भटनागर</p>
<p style="text-align: justify;">(लेखक विद्या भारती के अखिल भारतीय उपाध्यक्ष है।)</p>
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		<title>नवरात्र और भारतीय ज्ञान परंपरा-६</title>
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		<dc:creator><![CDATA[राष्ट्रीय शिक्षा]]></dc:creator>
		<pubDate>Fri, 16 Oct 2026 02:23:47 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[अवनीश भटनागर]]></category>
		<category><![CDATA[नवीनतम]]></category>
		<category><![CDATA[लेख]]></category>
		<category><![CDATA[IKS]]></category>
		<category><![CDATA[Rashtriya shiksha]]></category>
		<category><![CDATA[नवरात्र]]></category>
		<category><![CDATA[भारतीय ज्ञान परम्परा]]></category>
		<category><![CDATA[राष्ट्रीय शिक्षा]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>॥ शरण्यां शिवदां शिवाम् ॥ या श्री: स्वयं सुकृतिनां भवनेष्वलक्ष्मी:, पापात्मनां कृतधियां हृदयेषु बुद्धि:। श्रद्धा सतां कुलजनप्रभवस्य लज्जा, त्वां त्वां नता: स्म परिपालय देवि विश्वम्॥ (श्री दुर्गा सप्तशती ४/५) जो&#8230; </p>
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]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: center;"><strong>॥ शरण्यां शिवदां शिवाम् ॥</strong></p>
<p style="text-align: center;"><strong>या श्री: स्वयं सुकृतिनां भवनेष्वलक्ष्मी:,</strong><br />
<strong>पापात्मनां कृतधियां हृदयेषु बुद्धि:।</strong><br />
<strong>श्रद्धा सतां कुलजनप्रभवस्य लज्जा,</strong><br />
<strong>त्वां त्वां नता: स्म परिपालय देवि विश्वम्॥</strong><br />
<strong>(श्री दुर्गा सप्तशती ४/५)</strong></p>
<p style="text-align: justify;">जो सुकृत्य करने वालों के घर में लक्ष्मी रूप में, पापात्मा के घर दरिद्रता रूप में, शुद्ध अंतःकरण वालों के हृदय में विवेकयुक्त बुद्धि रूप में, सज्जनों में श्रद्धा रूप में तथा कुलीनजनों में लज्जा रूप में विराजमान हैं, ऐसी देवी भगवती को प्रणाम है। हे देवि! आप सम्पूर्ण विश्व का परिपालन कीजिए।</p>
<p style="text-align: justify;">कहां और किस स्वरूप में निवास करती हैं भगवती, इस श्लोक में वर्णन किया गया है। वह सब व्यक्तिगत गुणों पर आधारित है। परन्तु अंत में, &#8216;त्वां त्वां नता: स्म&#8217; में नमन करने तक तो ठीक, &#8216;परिपालय देवि विश्वम्&#8217; क्यों जोड़ना? मेरे घर में इस रूप में रहो, यह इच्छा रखना तो सही है किन्तु विश्व का परिपालन? यह किसी साधक की चिंता का विषय क्यों होना चाहिए ?</p>
<p style="text-align: justify;">भारत में ज्ञान का उद्देश्य तीन स्तरों पर कहा गया है। सबसे ऊपरी स्तर है, विश्व का कल्याण। शिक्षा की व्यवस्था ज्ञानार्जन प्रक्रिया में सहायक है। हम सुनते हैं कि शिक्षा रोजगारपरक होनी चाहिए अर्थात् जीविका उपार्जन और परिवार के पालन-पोषण और वित्तीय आवश्यकताओं की पूर्ति करने में सहायक। कहा गया,&#8221;विद्या अर्थकरी यश: सुखकरी&#8221;! परन्तु क्या शिक्षा द्वारा अर्जित ज्ञान का एकमात्र उद्देश्य पेट पालने योग्य बन जाने तक सीमित है? भारतीय तत्व चिंतन में ज्ञान के इस प्रथम लक्ष्य को अत्यंत व्यापक स्वरूप में वर्णित किया गया है &#8211; विश्व का कल्याण।</p>
<p style="text-align: justify;">आज का विद्यार्थी विश्व का कल्याण करने में सक्षम कैसे हो सकता है? &#8216;उद्देश्य&#8217; का शाब्दिक अर्थ है &#8216;उच्च दिशा की ओर संकेत&#8217;। यह आज ही पूरा हो जाएगा, आवश्यक नहीं परन्तु आज के विद्यार्थी की मानसिक सिद्धता कि उसे विश्व का कल्याण करने में सक्षम बनना है, के लिए आज से यह लक्ष्य उसके सम्मुख प्रस्तुत करना होगा।</p>
<p style="text-align: justify;">मोहल्ले-बस्ती के मंदिर में या घर-परिवार में सुबह-शाम होने वाली नियमित-नैमित्तिक पूजा की प्रक्रिया में अंत में नैवेद्य और आरती का क्रम आता है। आरती के बाद जयघोष होता है। परमात्मा के विभिन्न स्वरूपों और देवी-देवताओं की जय-जयकार की पूर्णता होती है चार स्थायी जयघोषों से &#8211; &#8220;धर्म की जय हो। अधर्म का नाश हो। प्राणियों में सद्भावना हो। विश्व का कल्याण हो!</p>
<p style="text-align: justify;">जयकारा बुलवाने वाले पुरोहित जी और प्रत्युत्तर देने वाले उपस्थित भक्तों ने शिक्षाशास्त्र नहीं पढ़ा-पढ़ाया होगा, वेद-उपनिषद के अध्येता नहीं होंगे, बड़े ज्ञानी-विज्ञानी, संत-महात्मा नहीं होंगे, फिर भी उनके मानस पटल पर प्रतिदिन एक संस्कार अंकित हो रहा है &#8211; विश्व का कल्याण हो। यह केवल शब्द का संस्कार नहीं, साथ में इसके उपाय और हमारी भूमिका के संकल्प के रूप में, विश्व के कल्याण की पूर्व &#8211; शर्त के रूप में बताया जाता है &#8211; प्राणियों में सद्भावना हो।</p>
<p style="text-align: justify;">प्राणियों के बीच सद्भावना के बिना विश्व कल्याण की कल्पना करना संभव है क्या? देशों &#8211; प्रदेशों &#8211; सभ्यताओं &#8211; जातियों &#8211; संप्रदायों &#8211; भाषाओं &#8211; लिंगों &#8211; परिवारों के मध्य यदि विभेद हैं, विरोध है, शत्रुभाव है, प्रतिशोध के प्रयास हैं अथवा &#8216;मेरे विचार के अनुरूप चलो तो ठीक अन्यथा तुम्हें जीवित रहने का अधिकार नहीं&#8217;&#8230; यदि ऐसा वातावरण होगा तो विश्व कल्याण का उद्देश्य सफल हो सकता है क्या? वैमनस्य, हिंसा, विद्वेष से कल्याण या विकास संभव नहीं हो सकता।</p>
<p style="text-align: justify;">विश्व कल्याण के उच्चतम लक्ष्य और उसकी प्राथमिक शर्त प्राणियों में सद्भावना से जुड़ा है, भारतीय ऋषि &#8211; मनीषियों द्वारा बताया गया ज्ञान का दूसरा उद्देश्य &#8211; राष्ट्र की उन्नति। भारतीय मनीषा ने राष्ट्र को भौगोलिक क्षेत्र या राजनीतिक इकाई, भूखण्ड मात्र नहीं माना। &#8220;माताभूमि: पुत्रोऽहं पृथिव्या:&#8221; ( अथर्ववेद) की भावना के अनुसार यह मातृभूमि जीवंत सांस्कृतिक इकाई है। पश्चिम से प्राप्त राष्ट्र-राज्य सिद्धांत (Nation &#8211; State Theory) के अनुसार जो राज्य है, वही राष्ट्र है, यह अवधारणा भारत में स्वीकार्य नहीं है। पिछले लगभग एक हजार वर्षों में अनेक आक्रांता आए, कुछ केवल लूट-पाट करके चले गए, कुछ ने किसी क्षेत्र में सत्ता भी स्थापित कर ली। अंग्रेजी राज्य प्रायः दो सौ वर्ष रहा परन्तु राष्ट्र तो भारत ही था, राज्य भले ही ब्रिटिश रहा हो।</p>
<p style="text-align: justify;">यह राष्ट्र मेरा है, इसके प्रति मेरा कर्तव्य है, इसकी सुरक्षा तथा प्रगति में योगदान करने का दायित्व मेरा है, इस प्रकार का भाव जागरण करना, शिक्षा का उद्देश्य है। इस राष्ट्र का भविष्य ही मेरा भविष्य है, इसकी आर्थिक-सामाजिक स्थिति में प्रगति से ही मेरी प्रगति है, इस धारणा को पुष्ट करने वाली शिक्षा की आवश्यकता है। एक सुरक्षित &#8211; समृद्ध &#8211; समरस &#8211; सर्वांग सुन्दर &#8211; आत्मनिर्भर राष्ट्र के रूप में विकसित करने में मेरी भूमिका क्या रहेगी, इसकी स्पष्ट संकल्पना देने वाली शिक्षा ही वास्तविक स्वरूप है शिक्षा का।</p>
<p style="text-align: justify;">पहले दोनों उद्देश्य, अर्थात् विश्व का कल्याण तथा राष्ट्र की उन्नति के लिए जो आवश्यकता है, वही भारत के चिंतन के अनुसार शिक्षा का तीसरा उद्देश्य है, इस सोपान की सबसे निचली सीढ़ी है और जिसके माध्यम से ये दोनों उद्देश्य पूर्ण होने हैं, वह है, &#8216;राष्ट्र के नागरिकों के व्यक्तित्व का सर्वांगीण और समग्र विकास।&#8217;</p>
<p style="text-align: justify;">यहां दो शब्दों का उल्लेख है &#8211; &#8216;सर्वांगीण&#8217; और &#8216;समग्र&#8217;। भारतीय तत्व चिंतन में सर्वाङ्गीण विकास की संकल्पना पंचकोशात्मक विकास के रूप में बताई गयी है &#8211; अन्नमयकोश (शरीर), प्राणमयकोश ( प्राणशक्ति ), मनोमयकोश (मन), विज्ञानमयकोश ( बुद्धि) तथा आनन्दमयकोश (आत्मशक्ति)। इन सबका समेकित विकास ही व्यक्ति के व्यक्तित्व का सर्वाङ्गीण विकास है।</p>
<p style="text-align: justify;">यह एक व्यक्ति का व्यक्तिगत विकास तो हुआ किन्तु इससे अन्य सबका क्या सम्बन्ध? इस व्यापक दृष्टिकोण के साथ समग्र विकास की संकल्पना जुड़ी &#8211; व्यष्टिगत &#8211; समष्टिगत &#8211; सृष्टिगत &#8211; परमेष्ठीगत विकास अर्थात् व्यष्टि (व्यक्ति) के स्वयं के व्यक्तित्व का विकास एकांगी नहीं हो सकता, वह फलीभूत होना चाहिए अर्थात् उसके माध्यम से उसके परिवार, समष्टि (समाज), संपूर्ण चराचर सृष्टि &#8211; जीव-जगत , वृक्ष -वनस्पति, वायु- जलस्रोत, पर्यावरण आदि का संरक्षण &#8211; संवर्द्धन हो और अंततः परमेष्ठि के समरूप बनने यानी दैवीय गुणों का विकास करने में सक्षम हो। यह ज्ञान अर्जन के माध्यम से समग्र विकास की प्रक्रिया है।</p>
<p style="text-align: justify;">तैत्तिरीय उपनिषद् (१/३) में कहा गया &#8211;<br />
<strong>&#8220;सह नौ यश:। सह नौ ब्रह्मवर्चसम्।&#8221;</strong> अर्थात् हम दोनों (गुरु-शिष्य) का यश एक साथ बढ़े। हम दोनों का ब्राह्मतेज एक साथ बढ़े। विद्या के साधक हम सबके अध्ययन-अभ्यास से हमारा यश और ब्रह्मवर्चस में अभिवृद्धि हो, यही प्रार्थना उस <strong>&#8216;सर्वमंत्रमयी सत्ता सत्यानंदस्वरूपिणी&#8217;</strong> के श्रीचरणों में।</p>
<p style="text-align: justify;">ज्ञान मार्ग में आपका सहयात्री,</p>
<p style="text-align: right;">&#8211; अवनीश भटनागर</p>
<p style="text-align: justify;">(लेखक विद्या भारती के अखिल भारतीय उपाध्यक्ष है।)</p>
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		<title>नवरात्र और भारतीय ज्ञान परंपरा-५</title>
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		<dc:creator><![CDATA[राष्ट्रीय शिक्षा]]></dc:creator>
		<pubDate>Thu, 15 Oct 2026 05:16:16 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[अवनीश भटनागर]]></category>
		<category><![CDATA[नवाचार]]></category>
		<category><![CDATA[लेख]]></category>
		<category><![CDATA[IKS]]></category>
		<category><![CDATA[Rashtriya shiksha]]></category>
		<category><![CDATA[नवरात्र]]></category>
		<category><![CDATA[भारतीय ज्ञान परम्परा]]></category>
		<category><![CDATA[राष्ट्रीय शिक्षा]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>॥ नमस्ते रुद्ररूपिण्यै॥ चिताभस्मालेपो गरलमशनं दिक्पटधरो, जटाधारी कण्ठे भुजगपतिहारी पशुपति:। कपाली भूतेशो भजति जगदीशैकपदवीं, भवानि ! त्वत्पाणिग्रहणपरिपाटी फलमिदम् ॥ (देव्यपराधक्षमापनस्तोत्रम् /७॥ अंगों में चिता भस्म लपेटे, विषपायी, नग्न, मस्तक पर&#8230; </p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: center;"><strong>॥ नमस्ते रुद्ररूपिण्यै॥</strong></p>
<p style="text-align: center;"><strong>चिताभस्मालेपो गरलमशनं दिक्पटधरो,</strong><br />
<strong>जटाधारी कण्ठे भुजगपतिहारी पशुपति:।</strong><br />
<strong>कपाली भूतेशो भजति जगदीशैकपदवीं,</strong><br />
<strong>भवानि ! त्वत्पाणिग्रहणपरिपाटी फलमिदम् ॥</strong><br />
<strong>(देव्यपराधक्षमापनस्तोत्रम् /७॥</strong></p>
<p style="text-align: justify;">अंगों में चिता भस्म लपेटे, विषपायी, नग्न, मस्तक पर जटाएं और गले में सर्प, हाथ में कपालरूपी भिक्षापात्र, ऐसे भूतनाथ, पशुपति को &#8216;जगदीश&#8217; की पदवी का महत्व कैसे मिला? हे देवि! यह तुम्हारे साथ हुए पाणिग्रहण का फल है!</p>
<p style="text-align: justify;">अद्भुत रूपक! विनोद में लिपटी हुई भक्ति!! और उसके मूल में बसी भारत की शिक्षा दृष्टि का आधार हमारी अनोखी परिवार परम्परा। अन्य देशों में तो शायद संभव नहीं और भारतीय समाज की सोच और व्यवहार में गतिपूर्वक हो रहे परिवर्तन के कालखण्ड में, जब परिवार संस्था का क्षरण हो रहा है, सनातन संस्कृति को व्यक्त करने वाले इस श्लोक में विद्यार्जन के उद्देश्यों का ही समावेश है।</p>
<p style="text-align: justify;">जिस प्रकार हिन्दू जीवन दर्शन में पुरुषार्थ चतुष्टय को जीवन का परम लक्ष्य माना गया है वैसे ही तीन प्रकार के ऋण की भी अवधारणा है &#8211; पितृऋण, ऋषिऋण तथा देव ऋण। अपने जीवन काल में, अपने प्रयासों से इन तीनों ऋणों का उन्मोचन करने को जीवन के परम लक्ष्य के रूप में बताया गया है।</p>
<p style="text-align: justify;">संतान अपने पितृकुल का प्रतिनिधित्व करती है। सृष्टि रचना के अंतर्गत वंश-क्रम को सातत्यपूर्वक चलाए रखना प्रत्येक संतान का कर्तव्य माना गया है। पितृवंश अर्थात पिता से पूर्व की सात पीढ़ी और माता की पांच पूर्ववर्ती पीढ़ी के वंशानुगत गुण-दोष संतान की प्रकृति में आते हैं जिन्हें आज की वैज्ञानिक भाषा में डी एन ए कहा जाता है। यह एक प्रकार से व्यक्ति पर अपने पूर्वजों का ऋण है जिससे उऋण होने का उपाय है, संतानोत्पत्ति करना, समाज को अपने वंशज देना, सृष्टि की सृजन परम्परा को सतत चलाए रखना।</p>
<p style="text-align: justify;">श्रीमद् भगवद्गीता के प्रथम अध्याय के श्लोक 37 से 44 में अर्जुन अपनी यही चिंता श्रीकृष्ण के सम्मुख व्यक्त करता है, &#8220;युद्ध के परिणामस्वरूप कुल का नाश होगा, सनातन काल से चला आ रहा कुलधर्म नष्ट हो जाएगा, धर्म के नष्ट होने से संपूर्ण कुल को पाप लगेगा, पाप के बढ़ जाने से कुल की स्त्रियां दूषित हो जाएंगी और संतान वर्णसंकर उत्पन्न होगी। वर्णसंकर संतान द्वारा पितरों को दिए गए जल और पिंडदान से पितृ भी अपने स्थान से भ्रष्ट हो जाएंगे।&#8221;</p>
<p style="text-align: justify;">अर्जुन की चिंता केवल अपने परिवार के संबंध में नहीं है। समाज की संरचना को व्यवस्थित रूप से युगानुयुग चलाए रखने के लिए सृष्टि के क्रम को सतत रखना प्रत्येक मनुष्य का कर्तव्य है। सृष्टि के अन्य प्राणी, जीव &#8211; जंतु, वृक्ष &#8211; वनस्पति, कीट- पतंग भी अपनी वंश वृद्धि की प्राकृतिक प्रक्रिया को अपनाते हैं जिस कारण युगों से यह सृष्टि समाप्त नहीं हुई है।</p>
<p style="text-align: justify;">अर्जुन की चिन्ता को वर्तमान समाज में पाश्चात्य सभ्यता के प्रभाव के कारण आ रही विकृतियों के संदर्भ में विचार करना प्रासंगिक होगा। बिखरते हुए परिवार, टूटते हुए सम्बन्ध, बढ़ते हुए विवाह- विच्छेद, एकल परिवार, बच्चों के केवल माता या पिता होना (single parents), लिव-इन रिलेशनशिप और DINK परिवार अर्थात पति-पत्नी दोनों अर्थार्जन तो करेंगे परंतु संतानोत्पत्ति नहीं करेंगे आदि को सहजता से स्वीकार कर रही समाज की वर्तमान स्थिति सृष्टि के क्रम को जारी रखने और पितृ ऋण के उन्मोचन के लिए किस प्रकार उपाय कर सकती है?</p>
<p style="text-align: justify;">सृष्टि की व्यवस्थाओं को समुचित रूप से चलाए रखने के लिए केवल संतान उत्पत्ति से नहीं चलता। जिस संतान को जन्म दिया उसको सुयोग्य बनाने का उत्तरदायित्व भी वर्तमान पीढ़ी का है।जैसे व्यक्ति के ऊपर अपने पितरों का ऋण है, उसी प्रकार जिनसे व्यक्ति ने जीवन चलाने के लिए योग्य बनने की शिक्षा प्राप्त की, उन गुरुजनों का भी प्रत्येक व्यक्ति के ऊपर ऋण होता है। भारत की परंपरा में इसे ऋषि ऋण कहा गया है।ज्ञान का सृजन करने वाले ऋषियों-मनीषियों के योगदान के बिना जिस प्रकार यह पीढ़ी अपने जीवन में सफल नहीं हो सकती थी, उसी प्रकार की योग्यता अगली पीढ़ी को देना अर्थात उनको सुशिक्षित -सभ्य तथा दायित्ववान् बनाना, यह इस पीढ़ी का कर्तव्य है। इसे ही ऋषि ऋण का उन्मोचन कहा गया है। भारत की समृद्ध ज्ञान परंपरा इसी ऋषि ऋण को अगली पीढ़ी को हस्तांतरण के माध्यम से निर्मित और विकसित हुई है। जिस प्रकार ऊपर पितृ कुल का उल्लेख आया है उसी प्रकार जीवन में गुरुकुल भी महत्वपूर्ण है जहां से प्राप्त ज्ञान को हमें अगली पीढ़ियों को हस्तांतरित करना होता है।</p>
<p style="text-align: justify;">ऋण का तीसरा प्रकार है देव ऋण। &#8216;देव&#8217; अर्थात देने वाला। हमारा जीवन विभिन्न दैवीय शक्तियों की कृपा से संचालित होता है। यहां दैवीय शक्तियों का अर्थ मंदिरों अथवा चित्रों में दिखाई देने वाली प्रतिमाओं से नहीं है। हिंदू संस्कृति में सृष्टि के समस्त तत्वों को देवता माना गया है। पञ्च महाभूतों में पृथ्वी को देवी और माता तथा अग्नि -जल -वायु आदि को देवता कहा गया है। यह केवल नामकरण नहीं है और न ही किसी प्रकार का अंधविश्वास। वास्तव में, सृष्टि की रचना और हमारे शरीर की रचना भी इन्हीं पांच तत्वों से मिलकर हुई है और इसलिए इन देवताओं का ऋण भी हमारे ऊपर है।</p>
<p style="text-align: justify;">प्रकृति प्रदत्त संसाधनों के अतिरिक्त यह समाज भी जीवन में हमें अनेक प्रकार से सहयोग करता है। यह मनुष्य के ऊपर समाज देवता का ऋण ही है जिसका उन्मोचन करने का एकमात्र उपाय है कि जितना हम इन दैवीय शक्तियों से प्राप्त करते हैं उतना ही परिश्रम उनके संरक्षण- संवर्धन और उनको उपयोगी बनाए रखने के लिए हमको करना होगा। हिंदू तत्त्वचिंतन में इसीलिए पर्यावरण संरक्षण पर अलग से ग्रंथ लिखने या गुरुकुल/ विद्यापीठ के पाठ्यक्रम में सम्मिलित करने की आवश्यकता नहीं हुई क्योंकि पर्यावरण संरक्षण हमारे जीवन व्यवहार का अंग था। ईशावास्योपनिषद् के प्रथम श्लोक में कहा गया &#8211;</p>
<p style="text-align: center;"><strong>ईशावास्यमिदं सर्वम् यत्किंचित् जगत्यांजगत्।</strong><br />
<strong>तेन त्यक्तेनभुञ्जीथा मागृध: कस्यस्विद्धनम्॥</strong></p>
<p style="text-align: justify;">सृष्टि के कण -कण में व्याप्त परमेश्वर की अनुभूति और त्यागपूर्वक भोग करना अर्थात् जितना आवश्यक है उतना ही लेना। प्रकृति प्रदत्त संसाधनों का आवश्यकता अनुसार दोहन करना, शोषण नहीं करना। सदुपयोग करना, नष्ट-भ्रष्ट नहीं करना।</p>
<p style="text-align: justify;">ऐसा विचारवान् मनुष्य निर्माण करना, यही भारत में शिक्षा का मूलभूत उद्देश्य है। इसके लिए वांछित शिक्षा केवल विद्यालय के कक्षा कक्षों में, एक निर्धारित पाठ्यक्रम तथा पाठ्य-पुस्तकों के माध्यम से नहीं हो सकती। शिक्षक और अभिभावक अर्थात् परिवार परस्पर सहयोगात्मक संयुक्त प्रयास से ही ऐसा समाज गढ़ सकते हैं।</p>
<p style="text-align: justify;">हम स्वयं ऐसे बन सकें और अपनी अगली पीढ़ियों को ऐसा गढ़ सकें, ऐसी सामर्थ्य वह आद्य परिवार &#8211; जटाधारी, निर्वस्त्र, श्मशानवासी, वीतरागी भगवान विश्वनाथ और &#8216; नानाभरणशोभाढ्या नानारत्नोपशोभिता&#8217; माता भगवती हमें प्रदान करें, यही प्रार्थना।</p>
<p style="text-align: justify;">भारतीय ज्ञान परम्परा का जिज्ञासु और आपका सहयात्री,</p>
<p style="text-align: right;">&#8211; अवनीश भटनागर</p>
<p style="text-align: justify;">(लेखक विद्या भारती के अखिल भारतीय उपाध्यक्ष है।)</p>
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		<title>नवरात्र और भारतीय ज्ञान परंपरा-४</title>
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		<dc:creator><![CDATA[राष्ट्रीय शिक्षा]]></dc:creator>
		<pubDate>Wed, 14 Oct 2026 03:01:49 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[अवनीश भटनागर]]></category>
		<category><![CDATA[नवीनतम]]></category>
		<category><![CDATA[लेख]]></category>
		<category><![CDATA[IKS]]></category>
		<category><![CDATA[Rashtriya shiksha]]></category>
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		<category><![CDATA[भारतीय ज्ञान परम्परा]]></category>
		<category><![CDATA[राष्ट्रीय शिक्षा]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>॥ॐ महादेव्यै नमः॥ भारत में अध्यात्म ज्ञान को विद्या का आधार कहा गया है और आध्यात्मिक भाव के जागरण को ही विद्या का अंतिम निकष माना गया है। अध्यात्म की सरलतम व्याख्या है, सर्वत्र ईश्वर की उपस्थिति की अनुभूति और उस विश्वास के परिणमस्वरूप जीवन में तामसिक आचरण का परित्यागऔर दैवीय गुणों का विकास। आद्य शंकराचार्य&#8230; </p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: center;" data-placeholder="true" data-pm-slice="1 1 []"><strong>॥ॐ महादेव्यै नमः॥</strong></p>
<p style="text-align: justify;" data-placeholder="true">भारत में अध्यात्म ज्ञान को विद्या का आधार कहा गया है और आध्यात्मिक भाव के जागरण को ही विद्या का अंतिम निकष माना गया है।</p>
<p style="text-align: justify;" data-placeholder="true">अध्यात्म की सरलतम व्याख्या है, सर्वत्र ईश्वर की उपस्थिति की अनुभूति और उस विश्वास के परिणमस्वरूप जीवन में तामसिक आचरण का परित्यागऔर दैवीय गुणों का विकास। आद्य शंकराचार्य ने कहा, <strong>&#8220;विद्या फलं स्यात् असतोनिवृत्ति:&#8221;।</strong></p>
<p style="text-align: justify;" data-placeholder="true">ज्ञानार्जन के करणों की सक्रियता भी बिना दैवीय शक्तियों की कृपा हुए संभव नहीं होती। नवरात्र में माँ भगवती के साधक जिन स्तोत्रों का पाठ करते हैं, उनमें भी मनुष्य के ज्ञानार्जन के करणों के संरक्षण की प्रार्थना की जाती है। श्रीदेव्या: कवचम् में ज्ञानेंद्रियों से जिनकी अनुभूतियां अर्जित की जाती हैं, उन तन्मात्राओं तथा उनसे उत्पन्न होने वाले सत्-रजस्-तमस् गुणों की रक्षा की प्रार्थना की गई है &#8211;</p>
<p style="text-align: center;" data-placeholder="true"><strong>रसे रूपे च गन्धे च शब्दे स्पर्शे च योगिनी।सत्त्वं रजस्तमश्चैव रक्षेन्नारायणी सदा॥ ३८॥</strong></p>
<p style="text-align: justify;" data-placeholder="true">जिव्हा से प्राप्त रस या स्वाद, आंखों से देखा जाने वाला रूप, नाक से अनुभूत गन्ध, कानों से सुनाई देने वाले शब्द और त्वचा से अनुभव किए जाने वाले स्पर्श की क्षमताओं की रक्षा यदि दैवीय शक्तियां नहीं करेंगी तो मनुष्य के अपने सामर्थ्य से संभव नहीं हो सकता।</p>
<p style="text-align: justify;" data-placeholder="true">शरीर को संचालित करने वाली प्राणशक्ति है। प्राण न रहने पर शरीर शव हो जाता है। शव के सभी अंगों के होने पर भी किसी का उपयोग नहीं किया जा सकता, जैसे बिजली चले जाने पर कोई विद्युत उपकरण काम नहीं कर सकता। शरीर के विभिन्न भागों में स्थित पञ्चवायु (प्राण-अपान-व्यान-उदान-समान) की देह संचालन में अलग-अलग भूमिका होती है। इन्हें ही पञ्चप्राण कहते हैं जिनकी सुरक्षा की प्रार्थना देवी मां से की जाती है &#8211;</p>
<p style="text-align: center;" data-placeholder="true"><strong>प्राणापानौ तथा व्यानमुदानं च समानकम्।</strong></p>
<p style="text-align: center;" data-placeholder="true"><strong>वज्रहस्ता च मे रक्षेत्प्राणं कल्याणशोभना॥३७॥</strong></p>
<p style="text-align: justify;" data-placeholder="true">शरीर में स्थित कर्मेंद्रियों की सक्रियता और ज्ञानेंद्रियों में संवेदनशीलता प्राणशक्ति के प्रबल होने पर ही संभव है। परन्तु इन बहि:करणों द्वारा अर्जित ज्ञान की ग्रहणशीलता तथा परिपक्वता तो अन्त:करण की क्षमताऔर सक्रियता पर ही निर्भर है।अंत:करण चतुष्टय धर्माधारित हो, इसके लिए भी दैवीय शक्ति की कृपा आवश्यक है &#8211;</p>
<p style="text-align: center;" data-placeholder="true"><strong>अहंकारं मनो बुद्धिं रक्षेन्मे धर्मधारिणी॥३६॥</strong></p>
<p style="text-align: justify;" data-placeholder="true">मां पराम्बाशक्ति हमारी कर्मेंद्रियों-ज्ञानेन्द्रियों को सबल, प्राणशक्ति को प्रबल, मन को शांत-एकाग्र-अनासक्त, बुद्धि को विवेकपूर्ण, अहंकार को सकारात्मक और चित्त को संस्कारयुक्त बना कर हमारे वास्तविक आत्मस्वरूप का दर्शन करने में सक्षम बनने का आशीर्वाद दें, इसी प्रार्थना के साथ,</p>
<p style="text-align: justify;" data-placeholder="true">ज्ञान मार्ग के पथिक के रूप में आपका सहयात्री,</p>
<p style="text-align: right;" data-placeholder="true">&#8211; अवनीश भटनागर</p>
<p style="text-align: justify;" data-placeholder="true">(लेखक विद्या भारती के अखिल भारतीय उपाध्यक्ष है।)</p>
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		<title>नवरात्र और भारतीय ज्ञान परंपरा-३</title>
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		<dc:creator><![CDATA[राष्ट्रीय शिक्षा]]></dc:creator>
		<pubDate>Tue, 13 Oct 2026 02:13:10 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[अवनीश भटनागर]]></category>
		<category><![CDATA[नवीनतम]]></category>
		<category><![CDATA[लेख]]></category>
		<category><![CDATA[IKS]]></category>
		<category><![CDATA[Rashtriya shiksha]]></category>
		<category><![CDATA[भारतीय ज्ञान परम्परा]]></category>
		<category><![CDATA[राष्ट्रीय शिक्षा]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>॥ॐ नमः विश्वेश्वरीम्॥ शारदेय नवरात्रि के तृतीय दिवस पर ज्ञान-विज्ञान रूपिणी माँ भगवती को प्रणाम तथा सभी स्नेहीश्री ज्ञानसाधकों को सादर नमस्कार। ॐ विशुद्धज्ञानदेहाय त्रिवेदीदिव्यचक्षुषे। श्रेय:प्राप्तिनिमित्ताय नमः सोमार्धधारिणे॥ (श्रीदेवीकीलकम्/१) विशुद्ध ज्ञान ही जिनकी देह है, तीन वेद तीन दिव्य नेत्र हैं, जो कल्याण के निमित्त हैं तथा मस्तक पर अर्द्धचंद्र धारण करते हैं ऐसे भगवान सदाशिव और देवी शिवा को प्रणाम। विशुद्ध ज्ञान तथा उसका&#8230; </p>
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]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: center;" data-placeholder="true" data-pm-slice="1 1 []"><strong>॥ॐ नमः विश्वेश्वरीम्॥</strong></p>
<p style="text-align: justify;" data-placeholder="true">शारदेय नवरात्रि के तृतीय दिवस पर ज्ञान-विज्ञान रूपिणी माँ भगवती को प्रणाम तथा सभी स्नेहीश्री ज्ञानसाधकों को सादर नमस्कार।</p>
<p style="text-align: center;" data-placeholder="true"><strong>ॐ विशुद्धज्ञानदेहाय त्रिवेदीदिव्यचक्षुषे।</strong></p>
<p style="text-align: center;" data-placeholder="true"><strong>श्रेय:प्राप्तिनिमित्ताय नमः सोमार्धधारिणे॥</strong></p>
<p style="text-align: right;" data-placeholder="true">(श्रीदेवीकीलकम्/१)</p>
<p style="text-align: justify;" data-placeholder="true">विशुद्ध ज्ञान ही जिनकी देह है, तीन वेद तीन दिव्य नेत्र हैं, जो कल्याण के निमित्त हैं तथा मस्तक पर अर्द्धचंद्र धारण करते हैं ऐसे भगवान सदाशिव और देवी शिवा को प्रणाम।</p>
<p style="text-align: justify;" data-placeholder="true">विशुद्ध ज्ञान तथा उसका आदि स्रोत वेद, यह किस प्रकार किसी की देह अथवा नेत्र हो सकते हैं? सांकेतिक रूप में इसका अर्थ ज्ञानार्जन की प्रक्रिया के करणों से जुड़ा हुआ है। कोई भी व्यक्ति कुछ भी सीखता है तो उसके शरीर में स्थित कर्मेन्द्रियों (अर्थात् हाथ, पैर, वाणी, उपस्थ तथा पायु) एवं ज्ञानेंद्रिय (अर्थात् आँख-नाक-कान-जिह्वा और त्वचा) का प्रयोग किए बिना सीखना संभव नहीं है। शरीर के ये अंग प्रत्यक्ष दिखाई देते हैं अत: इन्हें बहि:करण या बाह्यकरण कहा गया। कर्मेंद्रियों द्वारा कर्म करके तथा ज्ञानेंद्रियों से प्राप्त अनुभूति (दृश्य-श्रवण-घ्राण-स्पर्श-स्वाद के आधार पर अर्थात् देखकर-सुनकर-सूंघकर-छूकर-चखकर) के आधार पर ज्ञान अर्जन की प्रक्रिया संपन्न होती है; परंतु इस प्रक्रिया की पूर्णता में दूसरा पक्ष मनुष्य शरीर के अंदर स्थित अंत:करण चतुष्टयहै, जिसके बिना जुड़े यह प्रक्रिया पूर्ण नहीं होती।</p>
<p style="text-align: justify;" data-placeholder="true">अंत:करण के चार रूप हैं &#8211; मन-बुद्धि-अहंकार और चित्त। इन चारों के कार्यों का विवरण इस श्लोक में है &#8211;</p>
<p style="text-align: center;" data-placeholder="true"><strong>मनोबुद्धिरहंकारश्चित्तं करणमन्तरम्।</strong></p>
<p style="text-align: center;" data-placeholder="true"><strong>संशयो निश्चयो गर्व: स्मरणं विषया इमे॥</strong></p>
<p style="text-align: justify;" data-placeholder="true">मन से वितर्क, संशय और संकल्प -विकल्प होता है। बुद्धि निश्चयात्मक होती है, वह अवलोकन-अनुमान-तुलना-तर्क-संश्लेषण तथा विश्लेषण के माध्यम से निष्कर्ष तक पहुंचती है। अहंकार के माध्यम से गर्व अर्थात् अहंभाव की अभिव्यक्ति होती है। चित्त का कार्य स्मरण करना है। इसी चित्त पर सभी प्रकार के संस्कार स्थिर होते हैं जो कालांतर में हमें विभिन्न विषयों का सम्यक् ज्ञान कराते हैं। इस अंत:करण चतुष्टय के माध्यम से आत्मा के प्रकाश में ज्ञानार्जन प्रक्रिया संपन्न होती है।</p>
<p style="text-align: justify;" data-placeholder="true">श्रीमद्भगवद्गीता के तृतीय अध्याय में श्रीकृष्ण कहते हैं &#8211;</p>
<p style="text-align: center;" data-placeholder="true"><strong>इन्द्रियाणि पराण्याहुरिन्द्रियेभ्य: परं मन:।</strong></p>
<p style="text-align: center;" data-placeholder="true"><strong>मनसस्तु परा बुद्धिर्यो बुद्धे परतस्तु स:॥(३/४२)</strong></p>
<p style="text-align: justify;" data-placeholder="true">अर्थात शरीर की तुलना में इंद्रियां &#8216;पर&#8217; अर्थात श्रेष्ठ, बलवान और सूक्ष्म हैं। इन इंद्रियों से भी &#8216;पर&#8217; मन है। मन से भी &#8216;पर&#8217; बुद्धि है और जो बुद्धि से भी अत्यंत &#8216;पर&#8217; है, वही &#8216;वह&#8217; अर्थात मनुष्य में विराजमान परमात्मा का अंश आत्मा है। बुद्धि से पर अर्थात सूक्ष्म, बलवान और श्रेष्ठ अपनी आत्मा को जानकर और बुद्धि के द्वारा मन को वश में करके व्यक्ति ज्ञान प्राप्त करता है।</p>
<p style="text-align: justify;" data-placeholder="true">भगवान सदाशिव, देवी भगवती शिवा और लीला पुरुषोत्तम श्रीकृष्ण हमारी बुद्धि को शुद्ध रखकर मन को उसके नियंत्रण में रखने की सामर्थ्य प्रदान करें, यही विनय।</p>
<p style="text-align: justify;" data-placeholder="true">ज्ञान मार्ग में आपका सहयात्री,</p>
<p style="text-align: right;" data-placeholder="true">&#8211; अवनीश भटनागर</p>
<p style="text-align: justify;" data-placeholder="true">(लेखक विद्या भारती के अखिल भारतीय उपाध्यक्ष है।)</p>
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		<title>नवरात्र और भारतीय ज्ञान परंपरा-२</title>
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		<dc:creator><![CDATA[राष्ट्रीय शिक्षा]]></dc:creator>
		<pubDate>Mon, 12 Oct 2026 01:51:34 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[अवनीश भटनागर]]></category>
		<category><![CDATA[नवीनतम]]></category>
		<category><![CDATA[लेख]]></category>
		<category><![CDATA[IKS]]></category>
		<category><![CDATA[Rashtriya shiksha]]></category>
		<category><![CDATA[नवरात्र]]></category>
		<category><![CDATA[भारतीय ज्ञान परम्परा]]></category>
		<category><![CDATA[राष्ट्रीय शिक्षा]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>॥ श्रीदुर्गादेव्यै नमः॥ शारदेय नवरात्र के द्वितीय दिवस पर पराम्बा आदिशक्ति के श्रीचरणों में नमन और सभी ज्ञानसाधक बन्धु-बहनों को सादर नमस्कार। सर्वरूपमयी देवी, सर्वं देवीमयं जगत। अतोऽहं विश्वरूपां तां नमामि परमेश्वरीम्॥ &#8220;देवी सर्वरूपों से युक्त हैं तथा संपूर्ण जगत देवीमय है अतः मैं उन विश्वरूपा परमेश्वरी को नस्कार करता हूँ।&#8221; ( मूर्ति रहस्यम् ) भारतीय तत्व चिंतन के अनुसार मनुष्य&#8230; </p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: center;" data-placeholder="true" data-pm-slice="1 1 []"><strong>॥ श्रीदुर्गादेव्यै नमः॥</strong></p>
<p style="text-align: justify;" data-placeholder="true">शारदेय नवरात्र के द्वितीय दिवस पर पराम्बा आदिशक्ति के श्रीचरणों में नमन और सभी ज्ञानसाधक बन्धु-बहनों को सादर नमस्कार।</p>
<p style="text-align: center;" data-placeholder="true"><strong>सर्वरूपमयी देवी, सर्वं देवीमयं जगत।</strong></p>
<p style="text-align: center;" data-placeholder="true"><strong>अतोऽहं विश्वरूपां तां नमामि परमेश्वरीम्॥</strong></p>
<p style="text-align: justify;" data-placeholder="true">&#8220;देवी सर्वरूपों से युक्त हैं तथा संपूर्ण जगत देवीमय है अतः मैं उन विश्वरूपा परमेश्वरी को नस्कार करता हूँ।&#8221;</p>
<p style="text-align: right;" data-placeholder="true">( मूर्ति रहस्यम् )</p>
<p style="text-align: justify;" data-placeholder="true">भारतीय तत्व चिंतन के अनुसार मनुष्य की मूल प्रकृति आध्यात्मिक है परंतु मनुष्य प्रायः इसकी ओर सचेत नहीं रहता। आत्मा सत्-चित् आनंद स्वरूप है। मानव अपने मूल स्वरूप की खोज करता है, परम सत्य को जानने की जिज्ञासा रखता है। इसी खोजी प्रवृत्ति के कारण मनुष्य ने स्वयं को साहित्य-संगीत-कला-धर्म आधारित सदाचरण आदि के विभिन्न रूपों में अभिव्यक्त किया है।</p>
<p style="text-align: justify;" data-placeholder="true">आत्मा को ज्ञान स्वरूप कहा गया। समस्त ज्ञान मनुष्य के अंतर में निहित है और उसके अनावरण से ज्ञान का प्रकटीकरण होता है। मनुष्य को ऐसा कुछ नहीं सिखाया जा सकता जो जीव की आत्मा में सुप्त रूप से पहले से स्थित न हो। इसी अंतर्निहित पूर्णता की अभिव्यक्ति शिक्षा है। &#8216;जानने&#8217; का अर्थ है, आविष्कार करना, अनावरण करना, प्रकट करना। जैसे-जैसे यह आवरण हटता जाता है, हम कहते हैं कि हम सीख गए हैं।स्वामी विवेकानंद इसे ही &#8220;manifestation of perfection already in man&#8221; कहते हैं।</p>
<p style="text-align: justify;" data-placeholder="true">श्रीमद्भगवद्गीता में श्रीकृष्ण इसका कारण बताते हैं &#8211;</p>
<p style="text-align: center;" data-placeholder="true"><strong>धूम्रेनाव्रियते वह्निर्यथादर्शो मलेन च।</strong></p>
<p style="text-align: center;" data-placeholder="true"><strong>यथोल्बेनावृत्तो गर्भस्तथा तेनेदमावृतम्॥ ३/३८॥</strong></p>
<p style="text-align: center;" data-placeholder="true"><strong>आवृत्तं ज्ञानमेतेन ज्ञानिनो नित्यवैरिणा।</strong></p>
<p style="text-align: center;" data-placeholder="true"><strong>कामरूपेण कौन्तेय दुष्पूरेणानलेन च॥३/३९॥</strong></p>
<p style="text-align: justify;" data-placeholder="true">&#8220;जैसे धुंए से अग्नि, मल से दर्पण तथा जेर से गर्भ ढका रहता है, उसी प्रकार काम से ज्ञान ढक जाता है जो ज्ञानियों के ज्ञान मार्ग में शत्रु है, अग्नि की भांति उनका मार्ग अवरुद्ध करता है।&#8221; जैसे धुंए का कारण हटा दें तो अग्नि प्रकट हो जाती है, दर्पण पर जमा हो गई धूल हटा दें तो उसमें प्रतिच्छवि दिखाई देने लगती है, वैसे ही कामनाओं का, माया का आवरण मनुष्य के अंतःकरण से हट जाए तो ज्ञान अनावृत्त हो जाता है।</p>
<p style="text-align: justify;" data-placeholder="true">इस अनावरण की प्रक्रिया, जिसे ज्ञानार्जन कहते है, इसमें गुरु मार्गदर्शन और सहयोग करते हैं परन्तु शिष्य की पात्रता और प्रयास के बिना ज्ञान अर्जन होता नहीं। श्रीकृष्ण कहते हैं &#8211; <strong>&#8220;श्रद्धावांल्लभते ज्ञानं तत्पर: संयतेन्द्रिय:।&#8221; (गीता ४/३९)</strong> अर्थात् श्रद्धा, ज्ञानार्जन के लिए तत्परता और इंद्रियों का संयम होने पर ही ज्ञान का लाभ मिलता है।</p>
<p style="text-align: justify;" data-placeholder="true">आजकल के शिक्षा विचार में बताया जाता है कि बालक कोरी स्लेट के समान होता है, शिक्षक जैसाचाहे लिखकर उसे भर सकता है।</p>
<p style="text-align: justify;" data-placeholder="true">भारतीय शिक्षा दर्शन का कहना है &#8211;</p>
<p style="text-align: center;" data-placeholder="true"><strong>आचार्यात् पादमादत्ते, पादं शिष्य स्वमेधया।</strong></p>
<p style="text-align: center;" data-placeholder="true"><strong>पादं सब्रह्मचारिभ्य:, पादं कालक्रमेण च॥</strong></p>
<p style="text-align: justify;" data-placeholder="true">शिष्य एक चतुर्थांश आचार्य से, एक चौथाई अपनीबुद्धि का प्रयोग कर के, अगला चतुर्थांश अपने सहपाठियों से और शेष ज्ञान कालक्रम में अपने जीवनके अनुभवों से ग्रहण करता है।</p>
<p style="text-align: justify;" data-placeholder="true">जीवनपर्यंत हम जिज्ञासु साधक बने रहें, अपने अंत:करण पर पड़े माया के आवरण को हटाने और ज्ञान को विस्तार देने में प्रयासरत रहें, माँ भगवती से यही प्रार्थना।</p>
<p style="text-align: justify;" data-placeholder="true">ज्ञान मार्ग में आपका सहयात्री,</p>
<p style="text-align: right;" data-placeholder="true">&#8211; अवनीश भटनागर</p>
<p style="text-align: justify;" data-placeholder="true">(लेखक विद्या भारती के अखिल भारतीय उपाध्यक्ष है।)</p>
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		<title>नवरात्र और भारतीय ज्ञान परंपरा-१</title>
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		<dc:creator><![CDATA[राष्ट्रीय शिक्षा]]></dc:creator>
		<pubDate>Sun, 11 Oct 2026 02:06:19 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[अवनीश भटनागर]]></category>
		<category><![CDATA[नवीनतम]]></category>
		<category><![CDATA[लेख]]></category>
		<category><![CDATA[IKS]]></category>
		<category><![CDATA[Rashtriya shiksha]]></category>
		<category><![CDATA[नवरात्र]]></category>
		<category><![CDATA[भारतीय ज्ञान परम्परा]]></category>
		<category><![CDATA[राष्ट्रीय शिक्षा]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>॥ ॐ नमश्चण्डिकायै ॥ शारदेय नवरात्र के प्रथम दिवस पर सभी आदरणीय, स्नेहीश्री ज्ञानसाधकों तथा विद्या अनुरागियों को सादर प्रणाम। ॐ ज्ञानिनामपि चेतांसि, देवी भगवती हि सा। बलादाकृष्य मोहाय महामाया&#8230; </p>
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]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: center;"><strong>॥ ॐ नमश्चण्डिकायै ॥</strong></p>
<p style="text-align: justify;">शारदेय नवरात्र के प्रथम दिवस पर सभी आदरणीय, स्नेहीश्री ज्ञानसाधकों तथा विद्या अनुरागियों को सादर प्रणाम।</p>
<p style="text-align: center;"><strong>ॐ ज्ञानिनामपि चेतांसि, देवी भगवती हि सा।</strong><br />
<strong>बलादाकृष्य मोहाय महामाया प्रयच्छति॥</strong></p>
<p style="text-align: justify;">श्री दुर्गा सप्तशती के प्रथम अध्याय के 55वें श्लोक में वर्णन है कि श्रीहरिविष्णु की योगनिद्रारूपा भगवती ज्ञानियों के भी चित्त को बलपूर्वक आकर्षित कर मोह में डाल देती हैं, इसीलिए वे महामाया कही जाती हैं। सप्तश्लोकी दुर्गापाठ के प्रथम श्लोक के रूप में भी इसी का पारायण किया जाता है।</p>
<p style="text-align: justify;">ज्ञानियों के चित्त को मोहित करना कैसे संभव है? हिंदू तत्त्वचिंतन में जीव और ब्रह्म के लौकिक भेद को मिथ्या और अज्ञानजनित कहा गया है। ब्रह्म के वास्तविक स्वरूप को जानने तथा उसे स्वयं में अंतर्भूत करने की सामर्थ्य पाने के लिए अंतःकरण की शुद्धि आवश्यक है। वास्तव में, ब्रह्म &#8211; जीव &#8211; जगत की इस त्रिपुटी के तात्विक संबंध के परिज्ञान का नाम ही विद्या है। यही वास्तविक ज्ञान है, जिसकी अनुभूति इंद्रियजनित बाह्य ज्ञान से संभव नहीं। यह केवल साधना के माध्यम से किए गए &#8216;चित्तवृत्ति निरोध&#8217; से ही संभव है।</p>
<p style="text-align: justify;">शुक रहस्य (३/१३) में कहा गया है &#8211;</p>
<p style="text-align: center;"><strong>श्रवणं तु गुरो: पूर्वम्,</strong><br />
<strong>मननं तदनन्तरम्।</strong><br />
<strong>निदिध्यासनमित्येत्,</strong><br />
<strong>पूर्णम् बोधस्यकारणम्॥</strong></p>
<p style="text-align: justify;">अर्थात सुयोग्य गुरु के उपदेश का श्रवण, मनन तथा निदिध्यासन द्वारा आत्मानुभूतिजन्य ज्ञान दीप को प्रदीप्त कर , नित्यबोधमय निज स्वरूप में प्रतिष्ठित होकर, सर्वत्र सच्चिदानंद परमात्मा की उपस्थिति की अनुभूति करता हुआ साधक जीवन्मुक्त होकर परमब्रह्म की चिन्मय सत्ता में प्रवेश कर जाता है।</p>
<p style="text-align: right;">(बृहदारण्यक उपनिषद् ४/४/६)</p>
<p style="text-align: justify;">यही जीवन का परम लक्ष्य है, शिक्षा का उद्देश्य है और विद्या का वास्तविक तात्पर्य है। यह लौकिक नहीं, अध्यात्म विद्या है। श्रीमद् भगवद्गीता में स्वयं श्रीकृष्ण उद्घोष करते हैं &#8211; &#8221; अध्यात्मविद्या विद्यानां वादं प्रवदतामहम्।&#8221; अर्थात मैं विद्याओं में अध्यात्म विद्या अर्थात ब्रह्म विद्या तथा वादों (विचार पद्धति) में तत्व निर्णय के लिए उपयोग किया जाने वाला वाद हूँ।</p>
<p style="text-align: justify;">भारतीय जीवन दर्शन में पुरुषार्थ चतुष्टय को जीवन का लक्ष्य कहा गया है, अर्थात धर्म का आचरण करते हुए अर्जित अर्थ द्वारा वैध कामनाओं की पूर्ति करना, यही वांछित कर्म है, जो अंततः मोक्ष के मार्ग में सहायक होता है । यह कर्म जीवन को जगत के बंधनों में बांधने के लिए नहीं, बल्कि विमुक्त करने के लिए है । इसीलिए विष्णु पुराण में विद्या का लक्ष्य कहा गया &#8211;</p>
<p style="text-align: center;"><strong>&#8220;तत्कर्म यन्न बंधाय सा विद्या या विमुक्तये &#8220;</strong></p>
<p style="text-align: justify;">मां भगवती हमें इस मार्ग पर सतत चलने की सामर्थ्य प्रदान करें, यही प्रार्थना।</p>
<p style="text-align: right;">&#8211; अवनीश भटनागर</p>
<p style="text-align: justify;">(लेखक विद्या भारती में अखिल भारतीय उपाध्यक्ष है।)</p>
<p>The post <a href="https://rashtriyashiksha.com/navratra-and-the-bharatiya-tradition-of-knowledge/">नवरात्र और भारतीय ज्ञान परंपरा-१</a> appeared first on <a href="https://rashtriyashiksha.com">राष्ट्रीय शिक्षा : शिक्षा में समाज प्रबोधन</a>.</p>
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