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	<title>राष्ट्रीय शिक्षा : शिक्षा में समाज प्रबोधन</title>
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	<description>सा विद्या या विमुक्तये</description>
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	<title>राष्ट्रीय शिक्षा : शिक्षा में समाज प्रबोधन</title>
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		<title>रामायण सत कोटि अपारा-7 (जनजातीय क्षेत्रों में राम कथा)</title>
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		<dc:creator><![CDATA[राष्ट्रीय शिक्षा]]></dc:creator>
		<pubDate>Sat, 15 Aug 2026 04:58:12 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[नवीनतम]]></category>
		<category><![CDATA[रामायण सत कोटि अपारा]]></category>
		<category><![CDATA[श्री रवि कुमार जी]]></category>
		<category><![CDATA[Rashtriya shiksha]]></category>
		<category><![CDATA[भारतीय ज्ञान परम्परा]]></category>
		<category><![CDATA[रामकथा]]></category>
		<category><![CDATA[राष्ट्रीय शिक्षा]]></category>
		<category><![CDATA[श्रीराम]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>Ram katha in tribal area&#x270d; रवि कुमार “राम आव्या जंगल मां, लक्ष्मण संग चाल्या। शबरी माय बेर लई, प्रेम थी थाळ भराल्या॥” “मीठा बेर चाखी-चाखी, राम ने अर्पण काया। जात&#8230; </p>
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]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: right;">Ram katha in tribal area<img src="https://s.w.org/images/core/emoji/17.0.2/72x72/270d.png" alt="✍" class="wp-smiley" style="height: 1em; max-height: 1em;" /> रवि कुमार</p>
<p style="text-align: center;"><strong>“राम आव्या जंगल मां</strong><strong>, लक्ष्मण संग चाल्या। </strong></p>
<p style="text-align: center;"><strong>शबरी माय बेर लई, प्रेम थी थाळ भराल्या॥”</strong></p>
<p style="text-align: center;"><strong>“मीठा बेर चाखी-चाखी</strong><strong>, राम ने अर्पण काया। </strong></p>
<p style="text-align: center;"><strong>जात न पूछे रामजी, प्रेम देख राजी थाया॥”</strong></p>
<p style="text-align: justify;">उपरोक्त गीत भील जनजाति में गाया जाने वाला भीली लोकभाषा का गीत है जो वहाँ विवाह आदि प्रसंग पर गाया जाता है। इस प्रसंग में शबरी माता व श्रीराम का उल्लेख है।</p>
<p style="text-align: justify;">रामकथा भारत की सांस्कृतिक परम्परा का जनजातीय आधार भी है। जनजाति क्षेत्रों में रामकथा लिपिबद्ध नहीं है। उसका स्वरूप मौखिक है। रामकथा का यह मौखिक स्वरूप श्रुति-स्मृति के आधार पर पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ता रहा है। जनजाति समाज ने राम को वन का नायक माना है। अलग अलग जनजाति में रामकथा के अलग अलग प्रसंग प्रचलित है। सम्पूर्ण रामकथा किसी जनजाति में प्रचलित है, ऐसा कहना संभव नहीं होगा और इसे खोज पाना भी अत्यंत दुर्लभ है।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>भारत में जनजातीय क्षेत्र</strong></p>
<p style="text-align: justify;">भारत में लगभग 11 करोड़ जनजाति समाज है। ये 11 करोड़ लोग भारत के लगभग 1।5 लाख ग्रामों में बसते हैं। भारत की जनजातियाँ 800+ भाषाई रूपों से जुड़ी हैं और लगभग 90% जनजातियाँ ग्रामीण व वन्य क्षेत्रों में रहती हैं। भारत में जनजातियाँ मुख्यतः तीन बड़े भौगोलिक क्षेत्रों में केंद्रित हैं – 1. <strong>मध्य भारतीय जनजातीय पट्टी</strong> (राजस्थान, गुजरात, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, झारखंड, ओडिशा, महाराष्ट्र – यहाँ लगभग 55-60% जनजातियाँ) 2. <strong>पूर्वोत्तर जनजातीय क्षेत्र </strong>(असम, नागालैंड, मिजोरम, मेघालय, अरुणाचल, त्रिपुरा, मणिपुर &#8211; कई राज्यों में जनजातियाँ बहुसंख्यक) 3. <strong>दक्षिण भारतीय जनजातीय क्षेत्र (</strong>आंध्रप्रदेश, तेलंगाना, कर्नाटक, तमिलनाडु, केरल)। भारत में 705 जनजातियाँ मान्यता प्राप्त है। भारत की प्रमुख जनजातियों में भील, गोंड, संथाल, मीणा, मुंडा, उरांव, नागा समूह, खासी, बोडो, हो, कोय, गरासिया, टोडा, चेचु, अंडमानी जनजातियाँ है। सामान्यतः सभी जनजातियाँ अपनी आजीविका के लिए कृषि व वन उत्पाद पर निर्भर हैं। जनजातीय क्षेत्रों में शिक्षा का स्तर राष्ट्रीय औसत से कम है, परन्तु यहाँ की संस्कृति अत्यंत समृद्ध है और इनका प्रकृति से संबंध उच्च स्तर का है। दण्डकारण्य क्षेत्र (छत्तीसगढ़, ओड़िसा, महाराष्ट्र, आंध्रप्रदेश के हिस्सों में फैला हुआ) रामकथा व जनजातीय संस्कृति का प्रमुख क्षेत्र है।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>रामकथा की मौखिक-वाचिक परम्परा</strong></p>
<p style="text-align: justify;">मौखिक-वाचिक स्वरुप में रामकथा भारत के जनजाति समाज में व्याप्त होकर भारत की सांस्कृतिक परम्परा को आगे बढ़ाती है और वहाँ के समाज में जीवन मूल्यों को खड़ा करती है। रामकथा से उपजे व जनजाति समाज में व्याप्त हुए जीवन मूल्य सर्वदूर अभिव्यक्त हो रहे हैं। रामकथा का यह स्वरूप वहाँ की स्थानीय लोकभाषा/बोली में विभिन्न अवसरों पर गए जाने वाले गीतों, भजनों, नृत्य गीतों, कथा प्रसंगों, दन्त कथाओं, नाटकों, धार्मिक अनुष्ठानों आदि रूपों  में प्रकट होता है। मूलतः जनजाति समाज धर्म परायण है। मातृभूमि के प्रति उसके मन में गहरा लगाव है। भारत भक्ति उसके कण कण में व्याप्त है। वह प्रकृति का पूजक व संवर्धक है। यह धर्म परायणता, मातृभूमि प्रेम, भारत भक्ति, प्रकृति संवर्धन का स्रोत राम कथा ही है, ऐसा कहा जाए तो अतिशयोक्ति नहीं होगी।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>रामकथा की विविधता</strong></p>
<p style="text-align: justify;">जनजातीय क्षेत्रों में रामकथा ने स्थानीय जीवनशैली, संस्कृति, भाषा और संवेदना के अनुरूप स्वरूप ग्रहण किया है। इन क्षेत्रों में राम केवल एक ईश्वर नहीं, बल्कि मानव, वीर, बंधु, लोकनायक और कभी-कभी एक सहज ग्रामीण के रूप में भी प्रकट होते हैं।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>गोंड समाज</strong> में राम वीर पुरुष हैं। वे गोंड परंपरा के ‘संघर्षशील योद्धा’ के रूप में प्रतिष्ठित हैं। सीता को ‘धरती की पुत्री’ और राम को ‘वन का रक्षक’ कहा जाता है। <strong>उरांव समाज</strong> में राम न्यायप्रिय राजा हैं। यहाँ शबरी प्रसंग विशेष रूप से लोकप्रिय है, जिसमें शबरी को ‘माता’ के रूप में सम्मानित किया जाता है। राम वनवासी नहीं, ‘जनप्रिय अतिथि’ के रूप में आते हैं। <strong>रामकथा संथाल</strong> लोकगीतों में ‘सोहराय’ पर्व के समय गाई जाती है। <strong>भीलों की रामकथा</strong> में राम वन का अतिथि नहीं, बल्कि भील समाज का सदस्य है। <strong>निषादराज</strong> और <strong>शबरी प्रसंग</strong> को विशेष महत्व दिया गया है। <strong>कोलाम समाज</strong> राम को ‘रामा’ नाम से पुकारता है। उनकी कथा में सीता और लक्ष्मण के पात्र गौण हैं, जबकि राम का संघर्षपूर्ण जीवन केंद्रीय बिंदु होता है। <strong>कोया जनजातियों</strong> में राम और सीता की पूजा जंगल के देवता और देवी के रूप में की जाती है। राम को ईश्वर नहीं, बल्कि लोक रक्षक के रूप में माना जाता है। <strong>डांग समाज</strong> में रामलीला ‘डांग दरबार’ के समय होती है। यह केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि सामाजिक उत्सव होता है। <strong>बैगा जनजाति </strong>की रामकथा में <strong>लव-कुश</strong> की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण है। लव-कुश को स्वतंत्र योद्धा, लोकनायक और अपने माँ के रक्षक के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। <strong>राभा जनजाति</strong> समाज में भारीगान के नाट्य मंचन में ‘रावण वध’ और ‘लक्ष्मणार शक्तिसेल’ सम्मिलित हैं। इन दोनों कथाओं में राम की सामाजिक जिम्मेदारी अपने अनुगामियों के प्रति स्नेह और देशभक्ति को प्रस्तुत किया जाता है। <strong>मिजो रामकथा</strong> में अपनी अलग कथावस्तु है। जो वाल्मीकी रामायण का सारांश ग्रहण करती है, परंतु उसमें वन्य तत्व अधिक विद्यमान हैं।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>रामकथा इन नामों से प्रचलित</strong></p>
<p style="text-align: justify;">राजस्थान तथा गुजरात के भीलांचल में <strong>‘राम-सीतामानी वारता’</strong> के नाम से रामकथा की वाचिक परंपरा रही है। ‘भीलों के भारथ’ की ही तरह से इस कथा का संकलन भगवानदास पटेल ने किया है। इसमें कुल तीस सर्ग हैं। मुण्डारी रामायण पूर्वी भारत के मुंडा जनजाति में रामकथा का एक अनूठा रूपभेद है। यह मुंडारी साहित्य की मौखिक-वाचिक परंपरा को समृद्ध करता है। कार्बी समुदाय के लोग असम, अरुणाचल, मेघालय, मिजोरम एवं नागालैंड के कुछ हिस्सों में रहते हैं। कालांतर में वैष्णव प्रभाव स्वरूप इनकी मौखिक परंपरा में ‘कार्बी रामायण’ रामकथा का प्रवेश हुआ। बिरहोर रामायण के अनुसार राजा जनक के राज्य में भीषण अकाल पड़ा। गोंड समुदाय में प्रचलित राम कथा में राम की तुलना में सीता को महत्व दिया गया है और उसके बाद लक्ष्मण को। बंजारा (लंबाणी) रामायण में वाल्मीकि और तुलसी कृति राम-कथाओं का एक तरह से ‘जनजातिकरण’ हो गया है।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>रामकथा के जनजातीय पात्र</strong></p>
<p style="text-align: justify;">श्रीराम की वन गमन यात्रा में जनजातीय पात्र है। इन्हीं जनजातीय पात्रों से जुड़े प्रसंगों के कारण भी रामकथा जनजाति क्षेत्रों में प्रचलित है। ये पात्र है- निषादराज गुह, केवट, शबरी, गिद्धराज जटायु, सुग्रीव, हनुमान, जाम्बवन्त, अंगद।</p>
<p style="text-align: justify;">भीली–निषादी लोकगीत के रूप में प्रचलित है &#8211; “गुहा राजा घाट खड़ा, राम लियो अंग लाइ। वन औ नगर एक भए, मित्रता री छाँव छाई॥” केवट लोकभजन के रूप में पूर्वी भारत में गाया जाता है &#8211; “पहिले पाँव पखारब राम, तब नैया चढ़इब हो। मोरे घाट पधारे आज, भाग जगइब हो॥” भील शबरी गीत में राम के वन आगमन को बताया है &#8211; “शबरी रै बेर सजाया, राम आवे वनमां। मीठा-तीता परख परख, धर्या प्रेम थाल मां॥” गोंडी वीरगाथा में जटायु का वर्णन है &#8211; “जटायु पंख पसार उड़े, सीता राखन जाय। प्राण दिए वन धर्म खातिर, राम नाम सुनाय॥” गोंड जनजाति में राम-सुग्रीव मित्रता का उल्लेख आता है &#8211; “सुग्रीवा टोला बोलाया, राम संग हाथ मिलाया। जंगल जन सब साथ चले, रावन राज गिराया॥” गोंड–भील वीर गीत में हनुमान की वीरता को दर्शाया है &#8211; “हनुमंत जंगल रो वीर, राम दूत कहाय। डोंगर फांदी उड़ चल्यो, सीता खबर लाय॥” लोककथा गीत जाम्बवंत के बारे में बताया है &#8211; “जामवंत बूढ़ा ज्ञानी, वीरन राह बताय। भूल गयो बल हनुमंत, शक्ति याद दिलाय॥” युद्ध गीत के रूप में अंगद &#8211; “अंगद पांव जमाय खड़ा, लंका डोले सारी। वन के बालक शक्ति देख, डरी रावन सवारी॥”</p>
<p style="text-align: justify;">स्वामी विवेकानंद ने उदधृत किया &#8211; “भारत की आत्मा ग्रामों और वनों में निवास करती है; रामायण इसी जीवित भारत की कथा है।” आचार्य विनोबा भावे में ‘<em>गीता प्रवचन एवं रामायण चिंतन व्याख्यान’ </em>में कहा है- “रामायण भारत की लोक आत्मा है। इसे जनजातियों ने गाया, जिया और पीढ़ी-दर-पीढ़ी सुरक्षित रखा।” रामधारी सिंह दिनकर अपनी कृति ‘संस्कृति के चार अध्याय’ में कहते है &#8211; “राम केवल अयोध्या के नहीं, वन और पर्वतों के भी नायक हैं।”</p>
<p><span style="color: #0000ff;"><strong>और पढ़े: <a style="color: #0000ff;" href="https://rashtriyashiksha.com/shri-ram-van-gaaman-sthal/" target="_blank" rel="noopener">रामायण सत कोटि अपारा-6 (श्रीराम वन गमन स्थल)</a></strong></span></p>
<p style="text-align: justify;">(लेखक विद्या भारती जोधपुर प्रान्त के संगठन मंत्री है।)</p>
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		<title>सौम्या की सखी</title>
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		<dc:creator><![CDATA[राष्ट्रीय शिक्षा]]></dc:creator>
		<pubDate>Sat, 15 Aug 2026 04:04:48 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[कथा-कहानी]]></category>
		<category><![CDATA[कथा/कहानी]]></category>
		<category><![CDATA[गोपाल माहेश्वरी]]></category>
		<category><![CDATA[नवीनतम]]></category>
		<category><![CDATA[Rashtriya shiksha]]></category>
		<category><![CDATA[भारतीय ज्ञान परम्परा]]></category>
		<category><![CDATA[राष्ट्रीय शिक्षा]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>&#8211; गोपाल माहेश्वरी सौम्या आज बहुत उदास थी। आज उसके विद्यालय के छात्रावास में विभिन्न प्रतियोगिताओं में विद्यालय का प्रतिनिधित्व करने हेतु चयन प्रक्रिया चल रही थी। गीत गायन, कहानी&#8230; </p>
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]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: right;">&#8211; गोपाल माहेश्वरी</p>
<p style="text-align: justify;">सौम्या आज बहुत उदास थी। आज उसके विद्यालय के छात्रावास में विभिन्न प्रतियोगिताओं में विद्यालय का प्रतिनिधित्व करने हेतु चयन प्रक्रिया चल रही थी। गीत गायन, कहानी कथन, श्लोक वाचन, तत्काल भाषण, वाद प्रतिवाद चित्रकला आदि कितनी ही प्रतियोगिताओं के लिए बच्चों का चयन हो रहा था। लेकिन उसका चयन तो किसी में भी नहीं हुआ।</p>
<p style="text-align: justify;">विद्यालय में ही एक ओर कुछ बच्चे रंगोली, चित्रकला और मूर्तिकला का अभ्यास कर रहे थे। सौम्या ठिठकी फिर स्वयं ही बुदबुदाते हुए आगे बढ़ गई। इनमें से कुछ भी उससे हो पाएगा ऐसा उसे स्वयं नहीं लगा। वह अपने विचारों में उलझी विद्यालय के मैदान की ओर बढ़ चली।</p>
<p style="text-align: justify;">मैदान में एक ओर गोला फेंक, चक्का फेंक, भाला फेंक की चयन परीक्षा चल रही थी। सुधीर जी बच्चों को अवसर दे रहे थे। उन्होंने सौम्या से भी पूछा “सौम्या! तुम भी प्रयास करोगी?” सौम्या के मन पर पड़ी निराशा की कठोर परत में जैसे एक दरार सी बनी। उसे लगा कुछ ऐसा है जो उसके मन में बाहर निकलने को छटपटा रहा है। उसने भाला पकड़ा और उछाल दिया लेकिन यह क्या! वह सीधे जाने की अपेक्षा वहाँ खड़े बच्चों की ओर जाकर गिर गया। सब उपहासपूर्वक  हँस पड़े।</p>
<p style="text-align: justify;">“लक्ष्मीबाई राणा प्रताप बनने का प्रयास करें तो ऐसा ही होता है।” पता नहीं बच्चों की भीड़ में से किसने मुंह छुपाकर यह जुमला उछाला था पर व्यंग्य का यह भाला पहले से निराश सौम्या के मन में गहरे धंस गया। वह संभवतः रो देती पर तभी परिदृश्य बदल गया। सहपाठियों में हास्यविनोद चलता रहता है लेकिन कोई महापुरुषों को लेकर उपहास करे यह सुधीर जी को बिल्कुल पसंद न था। वे खेल और अनुशासन का संबंध बहुत गहरा मानते थे। खेल यानी उद्दंडता कभी नहीं, जरा भी नहीं।</p>
<p style="text-align: justify;">वे क्रोध से आगबबूला बने बच्चों की भीड़ में घुसे और पीछे खिसक चुके लक्षित को पकड़ कर सबके बीच ले आए। वे आवाज से पहचान चुके थे कि यह उद्दंडता उसी की है। अब लक्षित थरथर काँप रहा था।</p>
<p style="text-align: justify;">कान पकड़ कर गिड़गिड़ाने लगा “अब नहीं करूंगा, माँ कसम।”</p>
<p style="text-align: justify;">एक झन्नाटेदार थप्पड़ और पड़ा “माँ की कसम खाते हो? निभा पाओगे? माँ का महत्व समझते हो?” बात बढ़ती देख सुशांत जी ने उसे छुड़वाया “माफी मांगों सौम्या से और अब कभी मैदान में दिखना मत। समझे?”</p>
<p style="text-align: justify;">लक्षित ने सौम्या से क्षमा तो मांगी पर जाते-जाते धीरे से फुसफुसाता गया “देख लूँगा तुझे तो।”</p>
<p style="text-align: justify;">सौम्या डरी। उसकी तो कोई गलती ही न थी। प्रतियोगिता में चयन तो दूर एक नया ही बखेड़ा खड़ा हो गया था।</p>
<p style="text-align: justify;">वह आशंका और अनमनेपन के साथ वहाँ से चल पड़ी। एक एकांत कोने में खड़े बूढ़े पीपल के नीचे बने चबूतरे की धूल झाड़ कर बैठ गई। पतझर आरंभ हो चुका था। पीपल के सूखे पत्ते हवा से टूटकर गिर रहे थे। चारों ओर सूखे पत्ते बिखरे थे। सौम्या अपने ही विचारों में उलझी उन पर चलने लगी। चरमर चरमर की आवाज से उसके पैरों के नीचे आने वाले पत्ते चूरचूर हो रहे थे। उसने झुककर थोड़ा चूरा हथेली पर रखा और फूंक से उड़ाते हुए बोली “सौम्या”। उसे लगा उसका भविष्य भी इन सूखे पत्तों जैसा ही है। उसका यह विद्यालय में अंतिम वर्ष था। क्या उसे खाली हाथ ही विद्यालयीन जीवन को विदा देनी है? उसे खोजते हुए उसकी सहेली स्वरिता उधर आ गई। सौम्या का ध्यान नहीं था वह तो अपने विचारों के शोर में ऐसी खोई हुई थी कि उसे स्वरिता के आने की आहट भी न सुनाई दी।</p>
<p style="text-align: justify;">स्वरिता ने उसे पत्तों का चूरा उड़ाते देख लिया था। उसे मैदान वाली घटना भी पता लगी थी। वह सौम्या के कांधे पर हाथ रखे बोली “पतझर हमेशा नहीं रहता।” सौम्या चुपचाप रही। स्वरिता ने अपनी सहेली का हाथ हाथों में लिया और बोली “भगवान ने सबके हाथ में कोई न कोई रेखा बनाई है सौम्या! ऐसा कोई भी नहीं जिसके हाथ में कुछ भी नहीं।” तभी पेड़ पर कोई अनजानी-सी चिड़िया ने अलग-सी आवाज निकाली। पीपल की एक कोमल कोंपल टूटकर अपनी हथेली गिरी।</p>
<p style="text-align: justify;">“लो, ईश्वर ने संकेत भी दे दिया।” सौम्या की अंगुली उस तांबे जैसे रंग के रेशम जैसे सुकोमल कोमल पत्ते पर घूमने लगी।</p>
<p style="text-align: justify;">चिड़िया फिर बोली। स्वरिता ने कहा “यह कौनसी चिड़िया है?”</p>
<p style="text-align: justify;">“पता नहीं।” सौम्या का मौन टूटा। वह उस पत्ते को डंडी से पकड़ चुटकी में पकड़ घुमाते हुए बोली।</p>
<p style="text-align: justify;">स्वरिता कहने लगी “यह मैना नहीं, कोयल या बुलबुल नहीं, न ही गौरैया या श्यामा है। इसका नाम मुझे नहीं पता, तुम्हें नहीं पता, शायद इसे भी पता न हो, पर यह इस पतझड़ में इस पेड़ पर गाने चली आयी। कौन सुनेगा इसे यहाँ? पर इसे गाना है। कोई सुने तो शायद इसे गाना भी न माने क्योंकि यह कोयल, मैना या बुलबुल जैसी नहीं है।”</p>
<p style="text-align: justify;">“फिर कैसी है?” सौम्या के मुख से उदासी दूर जाती दिखी।</p>
<p style="text-align: justify;">“यह इसी के जैसी है। इसका नाम प्रसिद्ध नहीं। इसकी विशेषता यहाँ कोई नहीं जानता। इसकी योग्यता का अभी कोई नाम नहीं पर यह अपने को व्यक्त कर रही है। परमात्मा के प्रति इस विश्वास के साथ कि उसे भी खाली नहीं भेजा है उसने इस संसार में।”</p>
<p style="text-align: justify;">सौम्या मुस्कुराई। चिड़िया फिर बोली जैसे उसका समर्थन कर रही हो। दोनों सहेली अपने छात्रावास के कक्ष की ओर चल पड़ीं। पर मन का क्षोभ अभी पूरा हटा न था। उसने पानी की बोतल ली, अपनी साइकिल उठाई और स्वरिता को पीछे केरियर पर बिठाकर घूमने चल दी।</p>
<p style="text-align: justify;">छात्रावास से थोड़ी ही दूर चौराहे पर दाहिनी ओर मोटर साइकिल से कोई गिरा हुआ था तीन-चार लोग उसे घेरे खड़े थे। पास से गुजरते हुए इन सहेलियों ने उसे पहचान लिया तो साइकिल में ब्रेक जैसे अपने आप लग गए। यह तो लक्षित ही था। उसकी दशा बता रही थी कि न केवल वह दुर्घटनाग्रस्त था बल्कि उसकी धुनाई भी हुई थी। कोई संदेह नहीं कि यह महाशय ही किसी से भिड़े हों और बदले में अच्छी पूजापत्री हो गई हो। स्वरिता ने सुशांत जी को मोबाइल पर सूचना दी। वे तीन-चार विद्यार्थियों को लेकर पहुँचे तब तक स्वरिता ने उसे पानी की बोतल से पानी पिलाया। लक्षित के सिर से खून बह रहा था। सौम्या को कुछ उपाय न सूझा तो अपनी चुन्नी ही उसके सिर पर कसकर बांध दी। तमाशा देख रहे लोगों में से किसी लड़के ने जुमला कसा “ओऽऽहो”।</p>
<p style="text-align: justify;">अधलेटे लक्षित के दाएं हाथ का भरपूर वार उस लड़के के पैरों पर पड़ा वह लड़खड़ाकर घुटनों पर आ गया और एक भरपूर झन्नाटेदार थप्पड़ खाकर वह भौचक्का रह गया।</p>
<p style="text-align: justify;">सुशांत जी के साथ ही सुधीर जी भी आ चुके थे।</p>
<p style="text-align: justify;">सुधीर जी ने एंबुलेंस में चढ़ाते हुए लक्षित से पूछा “देख लिया सौम्या को?”</p>
<p style="text-align: justify;">“क्षमा कर दो सौम्या आज से तुम्हारी इज्जत मेरी पगड़ी है बहन!” उसने सिर पर बंधी सौम्या की चुन्नी को छूकर कहा। उसकी आँखें बरस पड़ी। एंबुलेंस उसे चिकित्सा के लिए ले जा रही थी पर उसकी सोच की चिकित्सा हो चुकी थी।</p>
<p style="text-align: justify;">मानव में प्रतिभा होना प्रशंसनीय है पर सकारात्मक और संवेदनशीलता मानव की सबसे उत्तम प्रतिभा है। जिनके बिना प्रत्येक विशेषता कांतिहीन है, फीकी है।</p>
<p style="text-align: justify;">विद्यालय के दीक्षांत समारोह में लक्षित अपने अनुभव कथन के लिए खड़ा हुआ तो साथियों ने सोचा अब यह कुछ ऊटपटांग हास्य-व्यंग्य भरी बातें कहेगा। लेकिन वह पूरी गंभीरता से यह घटना सुनाते हुए रो पड़ा। अपनी बात पूरी करते-करते वह सौम्या के पैरों छूकर क्षमा मांगने बढ़ा तो सौम्या ने उसे बीच में ही रोक लिया “नहीं भैया! तुमने मुझे मुझसे मिलने का अवसर दिया है। मैं कोई कलाकार या खिलाड़ी नहीं तो क्या अच्छी से अच्छी मानव बनने का प्रयास करूंगी।” तालियों की गड़गड़ाहट से सबने लक्षित और सौम्या का स्वागत किया।</p>
<p style="text-align: justify;">प्राचार्य जी के दीक्षांत उद्बोधन के भी अंतिम वाक्य थे “मानव में प्रतिभा होना प्रशंसनीय है पर सकारात्मक और संवेदनशीलता मानव की सबसे उत्तम प्रतिभा है। जिनके बिना प्रत्येक विशेषता कांतिहीन है, फीकी है। मैं शुभकामनाएं करता हूँ कि तुम सब अपनी-अपनी योग्यतानुसार कीर्ति अर्जित करो, जो चाहो सो बनो पर मानव अवश्य बने रहो।”</p>
<p style="text-align: justify;">जाने कहाँ से वह पीपल वाली चिड़िया आकर सौम्या के हाथ पर बैठ गयी। स्वरिता ने पूछा “पहचाना सौम्या कौन है यह?” सौम्या खिलखिलाकर हँसी और बोली “ मैं इसका नाम रख ही हूँ ‘सौम्या की सखी’।”</p>
<p style="text-align: justify;">दोनों सहेलियां हाथों पर ताली देकर हँस पड़ी। चिड़िया भी अपने नाम से प्रसन्न होकर पेड़ पर ऊँचे जा बैठी।</p>
<p><span style="color: #0000ff;"><strong>और पढ़े: <a style="color: #0000ff;" href="https://rashtriyashiksha.com/the-village-of-younger/" target="_blank" rel="noopener">छोटे का गांव</a></strong></span></p>
<p style="text-align: justify;">(लेखक इंदौर से प्रकाशित ‘देवपुत्र’ बाल मासिक पत्रिका के संपादक है।)</p>
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		<title>व्यक्तित्व विकास की भारतीय संकल्पना</title>
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		<dc:creator><![CDATA[राष्ट्रीय शिक्षा]]></dc:creator>
		<pubDate>Sat, 15 Aug 2026 03:23:22 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[दिलीप बेतकेकर]]></category>
		<category><![CDATA[नवीनतम]]></category>
		<category><![CDATA[हम सरस्वती पुत्र]]></category>
		<category><![CDATA[Personality development]]></category>
		<category><![CDATA[Rashtriya shiksha]]></category>
		<category><![CDATA[राष्ट्रीय शिक्षा]]></category>
		<category><![CDATA[व्यक्तित्व विकास]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>-दिलीप बेतकेकर गोवा के एक उच्चतर माध्यमिक विद्यालय के कक्षा ग्यारह में अध्ययनरत एक विद्यार्थी को प्राचार्य ने घर वापिस जाने को कहा। कारण क्या था? उस विद्यार्थी ने सिर&#8230; </p>
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]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: right;">-दिलीप बेतकेकर</p>
<p style="text-align: justify;">गोवा के एक उच्चतर माध्यमिक विद्यालय के कक्षा ग्यारह में अध्ययनरत एक विद्यार्थी को प्राचार्य ने घर वापिस जाने को कहा। कारण क्या था? उस विद्यार्थी ने सिर के ऊपर चोटी (शिखा) रखी हुई थी। मैं उस विद्यार्थी को माध्यमिक शाला में अध्ययन करते समय से जानता हूँ। जनेऊ संस्कार के पश्चात उसके सिर पर शिखा (चोटी) रखी गई थी। उसे इससे कोई अटपटा अनुभव नहीं होता था किन्तु प्राचार्य को वह अटपटा सा लगता था। प्राचार्य जी तो ग्रीष्म ट्टतु में भी गले में ‘टाई’ बांधकर आते हैं। उनकी इस प्रतिष्ठा में विद्यार्थी की चोटी बाधा बन रही थी।</p>
<p style="text-align: justify;">वर्तमान में प्रचलित रौबीले व्यक्तित्व की कल्पना में, उनकी दृष्टि में ‘चोटी’ अर्थात्, कालबाह्य, कालविसंगत, व्यक्तित्व में बाधा लाने वाली बात थी। जबकि ‘टाई’ अर्थात् व्यक्तित्व को उभारने वाली, सुशोभित करने वाली बात। किसी व्यक्ति के ‘व्यक्तित्व’ का मापन करने के लिये कौन-कौन सी बातें ध्यान में रखते हैं? उस व्यक्ति का रंग, ऊँचाई, पहनावा, इन्हीं बातों पर सामान्यतः निष्कर्ष निकाला जाता है कि ‘व्यक्तित्व’ कैसा है? आकर्षक, प्रभावी व्यक्तित्व, अर्थात ऊंचा, गोरा, ऐसी ही साधारणतः कल्पना की जाती है। ‘व्यक्तित्व विकास’ कार्यक्रमों में भी सामने वाले व्यक्ति पर किस प्रकार प्रभाव डाला जाए, इसी के संबंध में ‘टिप्स’ अधिकतर दिये जाते है। अपने पाल्य को ‘व्यक्तित्व विकास’ की कक्षाओं अथवा शिविरों में पालकगण इस अपेक्षा के साथ भेजते हैं कि आजकल के स्पर्धा युग में हमारा पाल्य पिछड़ न जाए, वह ‘गँवार’ न दिखते हुए एक ‘स्मार्ट’ व्यक्ति दिखे। अधिक महत्व ‘दिखने’ पर दिया जाता है।</p>
<p style="text-align: justify;">कुछ अंश तक ‘व्यक्तित्व’ दिखने पर आंका जाए, यह सही है, परन्तु ‘दिखने’ के साथ ‘होने’ पर अधिक प्रभावी होता है।</p>
<p style="text-align: justify;">अंग्रेजी में ‘पर्सनॉलिटी’ शब्द ग्रीक भाषा के ‘पर्सोना’ शब्द से आया है जहाँ ‘मुखौटा’ को ‘पर्सोना’ कहते हैं अर्थात् दूसरों को दिखने वाला चेहरा। डॉ. अशोक निरपफराके के अनुसार किसी व्यक्ति का ‘व्यक्तित्व’ उसके शारीरिक और मानसिक घटकों का अनन्य साधारण एकात्म संघटन होता है। व्यक्तित्व का गठन जन्म पूर्व से होता है। उसमें कुछ भाग आनुवंशिक और कुछ भाग परिवार, परिसर, विद्यालय, मित्र, समाज आदि के द्वारा गठित होता है।</p>
<blockquote>
<p style="text-align: justify;">व्यक्तित्व अर्थात् जिससे कुछ व्यक्त होता है। विविध कृतियों द्वारा विविध पहलू द्वारा जो व्यक्त होता है। भारतीय कल्पना के अनुसार मानव का व्यक्तित्व पांच कोशों से बना हैः- ‘अन्नमय’, ‘प्राणमय’, ‘मनोमय’, ‘विज्ञानमय’ और ‘आनंदमय’। इन पांचों कोशों का संतुलित विकास अर्थात् संतुलित व्यक्तित्व विकास।</p>
</blockquote>
<p style="text-align: justify;">आजकल अधिक महत्व अन्नमय कोश को दिया जा रहा है। अन्नमय कोश अर्थात् शारीरिक भाग। इस विषय में लोग अत्यंत जागरुक हैं, किन्तु शरीर के आरोग्य के विषय में जागरुक नहीं। संपूर्ण ध्यान शारीरिक सौंदर्य की ओर रहता है। इस हेतु पहनने के कपडे़, सौंदर्य प्रसाधन, ब्यूटी पार्लर, क्रीम, साबुन, शैम्पू आदि का अविवेकी उपयोग करने पर सारा ध्यान दिया जाता है। आजकल कुछ नई कहावतें, वाक्प्रचार चलन में दिखते हैं &#8211;</p>
<p style="text-align: justify;">(1) ‘खिसा फाटका, मोबाईल नेट का’- (जेब फटी हो फिर भी नेट वाला मोबाईल चाहिये।)</p>
<p style="text-align: justify;">(2) ‘खायला कोंडा, फिरायला होंडा’ (खाने को तो भूसा है फिर भी घूमने के लिये महंगी ‘होंडा’ हो।)</p>
<p style="text-align: justify;">(3) ‘रिकाम्या पर्सला झटके फार’ (पर्स खाली है फिर भी भरी होने जैसे झटके दिखाना।)</p>
<p style="text-align: justify;">ये कहावतें आजकल की मानसिकता की ओर इशारा करती हैं। व्यक्तित्व विकास के विषय में भी ऐसा ही देखने को मिलता है।</p>
<p style="text-align: justify;">‘शॉर्टकट’ से तुरत-फुरत कोई शॉर्टकोर्स करके व्यक्तित्व विकास का दिखावा करने की आजकल की परिपाटी बनी है। वास्तव में व्यक्तित्व विकास थोड़े समय में, कुछ ही घंटों, छुट्टियों की अवधि में होने वाला विषय नहीं है। यह एक दीर्घकालीन प्रक्रिया है। व्यक्तित्व विकास धीमे-धीमे प्रगत होता है।</p>
<p style="text-align: justify;">इस विकास में केवल शारीरिक विकास अभिप्रेत नहीं। मानव का अर्थ केवल शरीर नहीं। व्यक्तित्व के अंतर्गत प्राण, मन, बुद्धि, आत्मा घटकों का भी समावेश है। इन सभी घटकों का विकास होना आवश्यक है, वरना एकांगी वृद्धि होगी।</p>
<p style="text-align: justify;">शरीर व्यक्त होने वाला साधन होने के कारण उसका सुदृढ़, निरोगी, शक्तिशाली, होना आवश्यक है। शरीर संगोपन ठीक से हो इस हेतु पौष्टिक आहार और नियमित व्यायाम, ये दो बातें महत्पूर्ण हैं। आजकल विज्ञापनों का चलन बहुत अधिक है। उसमें बार बार खाद्य पदार्थों के विषय में विज्ञापित करने से खरीदने की जिद बच्चे करते हैं। प्रतिष्ठा रखने हेतु उन्हें खरीदना उचित और हितकर नहीं। व्यायाम के विषय में भी केवल स्नायु प्रदर्शन हेतु व्यायामशाला जाने वाले अनेक लोग हैं। उनमें निरंतरता कम ही होती है। अन्नमय कोश के विकास हेतु कुछ शारीरिक आदतों की ओर ध्यान देना चाहिये अन्यथा कभी-कभी व्यंग्य और अन्य समस्याएं निर्मित होती हैं। कभी कुछ व्यक्तियों में शरीर गठन अच्छा होने पर भी उनमें जोश, उमंग, उत्साह, चापल्य आदि गुणों की कमी दिखती है। चलने-फिरने में आत्मविश्वास में कमी, बोलने में अस्पष्टता, आवाज कमजोर। ये बातें अप्रभावी रहती है। चेहरा भावहीन, हास्यहीन, ऐसा क्यों? प्राणमय कोश का दुर्बल, कमजोर, उपेक्षित रहना। ज्ञान और जानकारी का भंडार होना ही पर्याप्त नहीं, उसका दर्शन, ‘प्रेजेंटेशन’ अच्छा होना भी जरूरी है।</p>
<p style="text-align: justify;">शरीर दृश्य है, स्थूल है, किन्तु मन, बुद्धि न दिखने वाले, अर्थात् सूक्ष्म कोश है। भारतीय दृष्टि केवल बाह्य दृश्य बातों को महत्वपूर्ण नहीं मानती। केवल बाह्य बातों पर ध्यान देने से धोखा हो जाता है। इस भ्रम के संबंध में संत चोखामेला कहते हैं – “ऊस डोंगा परि रस नेहि डोंगा, काय भुललासी वरलिया रंगा?” (गन्ना दिखने में ऊपर से अच्छा नहीं फिर भी अंदर से उसका रस मीठा होता है।) इस प्रकार ऊपर-ऊपर की भूलभुलैया से बहुत नुकसान चारों ओर दिखाई देता है।</p>
<p style="text-align: justify;">“नाही निर्मल मन, काय करील साबण”? (मन ही साफ नहीं तो साबुन क्या करेगा?) ऐसा संत लोग कहते हैं। शांत, स्वस्थ, संतुलित मन पर अनेक बातें निर्भर करती हैं। शरीर के लिये जैसे आहार, व्यायाम महत्वपूर्ण है, मन के लिये भी संस्कार, सुसंगति, स्वाध्याय, प्रार्थना आदि का अत्यंत महत्व है। शरीर को जैसे कपड़े, स्वर्ण अलंकार, आभूषण आदि से सुशोभित करते हैं वैसे ही अंतरंग को सुशोभित करने हेतु विवेक, विचार, संयम आदि है। समर्थ रामदास कहते हैं &#8211;</p>
<p style="text-align: center;"><strong>नानारत्ने आभूषणे</strong><strong>, शरीर श्रृंगारिले।</strong></p>
<p style="text-align: center;"><strong>विवेक</strong><strong>, विचारे, राजकारणे अंतर श्रृंगारिले।।</strong></p>
<p style="text-align: justify;">विज्ञानमय कोश का विकास, अर्थात् बौद्धिक विकास।</p>
<p style="text-align: justify;">ग्रहण शक्ति, स्मरणशक्ति, विचारशक्ति, कल्पनाशक्ति आदि क्षमताएँ विज्ञानमय कोश के अंतर्गत होती हैं। जितने अधिक गहराई में जायेंगे उतनी अधिक क्षमता ध्यान में आती है। प्रत्येक व्यक्ति के पास कम से कम आठ-दस क्षमताएं होती है। ये सभी एक समान मात्रा में नहीं होती। अपने स्वयं के पास ऐसी कौनसी क्षमताएं हैं जो अपने लिए बलस्थान हों और उनका विकास कैसे हो, इस संबंध में प्रथमतः पालक, तत्पश्चात् विद्यार्थी को ही तय करना पड़ेगा। उनके विकास हेतु कौन से मार्ग और अवसर उपलब्ध हैं इसको समझ लेना आवश्यक है। ये निश्चित होने पर एकलव्य, अर्जुन जैसी साधना करनी होगी। “असेल माझा हरि तर देईल खाटलयावरी”, (यदि परमेश्वर चाहेंगे, भाग्य में होगा तो बैठे ठाले अपने आप प्राप्त हो जायेगा।) ऐसा कहकर काम चलने वाला, या कुछ प्राप्त होने वाला नहीं है। ‘एकलव्य’ प्रवृत्ति आजकल कम ही दिखाई देती है।</p>
<p style="text-align: justify;">‘आनंदमय कोश’ अन्य की अपेक्षा अत्यंत सूक्ष्म है। अपना अहंभाव, अस्मिता, मैं ही सब कुछ, जो सब व्यक्तित्व के केंद्र बिंदु हैं, उनका समावेश आनंदमय कोश के अन्तर्गत आता है। मैं कौन? मेरे जीवन का उद्देश्य क्या है? मेरे आस पास की सृष्टि से मेरा क्या संबंध है? उनसे मेरा क्या रिश्ता है? परमेश्वर से क्या रिश्ता है? ऐसे सवालों के उत्तर खोजने में निरंतर कार्यरत रहते हुए इस कोश का विकास होता है। आद्य शंकराचार्य जी कहते हैं,- “मैं प्रत्यक्ष शिव हूँ, चैतन्य हूँ, इसकी अनुभूति होना, ये सारी यात्रा ही ‘आनंदमय कोश’ का विकास है।”</p>
<p style="text-align: justify;">व्यक्तित्व का विकास किसलिये? क्यों करें ये सब प्रयास? एक कवि ने सुंदर उत्तर दिया है- “सुंदर मी परि नच शोभेस्तव, जनहित हेतुक मम बलवैभव” (मैं केवल शोभा के लिये नहीं हूँ, मेरे जो भी वैभव हैं वे जनहित के लिये है। स्वयं को विकसित करते हुए समाज हित में, ईश्वर चरण में अर्पण करना है। वह विकसित हो और अर्पित हो।”)</p>
<p style="text-align: justify;">गोमंतकीय कवि बा.भ.बोरकर ने अपनी एक कविता द्वारा एक आदर्श सुंदर, व्यक्तित्व की सुंदर प्रस्तुति की है। कौनसा चेहरा सुंदर मानें? आंखें और होंठ का सौंदर्य किस पर निर्भर है, सुंदर हाथ, पैर और कंधे कौन से? इसका अप्रतिम वर्णन उन्होंने किया है :</p>
<p style="text-align: center;"><strong>देखणे ते चेहरे जे प्रांजलाचे आरसे</strong><strong>,</strong></p>
<p style="text-align: center;"><strong>गोरटे की सांवले याला मोल नाहीं फारसे।</strong></p>
<p style="text-align: center;"><strong>देखणा देहात तो जो सागरी सूर्यास्त सा</strong><strong>,</strong></p>
<p style="text-align: center;"><strong>अग्निचा पेरून जातो राज गर्भी वारसा।</strong></p>
<p style="text-align: justify;">(चमक चेहरे पर विराजे हृदय स्थित सत्य से। साँवला या गोरापन है अप्रभावित इस तथ्य से।। सागरोन्मुख सूर्य ज्यों द्विगुणित करे जल दीप्ति को तन समर्पित लक्ष्य को मुख प्राप्त अग्नि प्रदीप्ति को।)</p>
<p style="text-align: justify;">संपूर्ण मूल कविता पठनीय है। ऐसे व्यक्तित्व प्रत्येक घर में, शाला में, समाज में मिलें, यही प्रार्थना।</p>
<p><span style="color: #3366ff;"><strong>और पढ़े: <a style="color: #3366ff;" href="https://rashtriyashiksha.com/gyan-ki-baat-person-personality-and-development/" target="_blank" rel="noopener">भारतीय शिक्षा – ज्ञान की बात-26 – (व्यक्ति, व्यक्तित्व और विकास)</a></strong></span></p>
<p style="text-align: justify;">(लेखक शिक्षाविद, स्वतंत्र लेखक, चिन्तक व विचारक है।)</p>
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		<title>अथातो प्रश्न जिज्ञासा</title>
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		<dc:creator><![CDATA[राष्ट्रीय शिक्षा]]></dc:creator>
		<pubDate>Fri, 07 Aug 2026 13:13:32 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[दिलीप बेतकेकर]]></category>
		<category><![CDATA[नवीनतम]]></category>
		<category><![CDATA[लेख]]></category>
		<category><![CDATA[Rashtriya shiksha]]></category>
		<category><![CDATA[राष्ट्रीय शिक्षा]]></category>
		<category><![CDATA[विद्यार्थी प्रश्न पूछे]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>-लेख (मूल मराठी) दिलीप बसंत बेतकेकर -अनुवाद (हिन्दी) डॉ. रमेश चौगांवकर “समझे या नहीं?”, हैव् यू अण्डरस्टेण्ड? कक्षा में पढ़ाते समय ऐसे प्रश्न शिक्षक अपने विद्यार्थियों से अनेक बार पूछते&#8230; </p>
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]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: right;">-लेख (मूल मराठी) दिलीप बसंत बेतकेकर</p>
<p style="text-align: right;">-अनुवाद (हिन्दी) डॉ. रमेश चौगांवकर</p>
<p style="text-align: justify;">“समझे या नहीं?”, हैव् यू अण्डरस्टेण्ड? कक्षा में पढ़ाते समय ऐसे प्रश्न शिक्षक अपने विद्यार्थियों से अनेक बार पूछते रहते हैं। भिन्न-भिन्न प्रान्तों में भाषा अलग होने पर भी प्रश्न पूछते रहते हैं। ‘जी हां’, ‘यस सर’, ‘हो सर’&#8230;&#8230;&#8230; ऐसे ही निश्चित उत्तर विद्यार्थियों से मिलते हैं, और विद्यार्थियों से संयुक्त सुर में ‘हां’ उत्तर मिलने पर तो शिक्षक प्रसन्न होकर दूसरा प्रश्न उछालता हैं।</p>
<p style="text-align: justify;">‘कुछ आशंका?’ ‘कुछ कठिनाई?’, ‘एनी डिफिक्लटी?’&#8230;&#8230; जैसे प्रश्नों का उत्तर भी ‘नो सर’, ‘नहीं सर’ संयुक्त रूप से मिलते ही प्रसन्न शिक्षक आगे पढ़ाना जारी रखते है&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;.</p>
<p style="text-align: justify;">गहराई से परखने पर ध्यान में आता है कि कुछ विद्यार्थियों को कुछ भी समझ में नहीं आया होता है, और कुछ समझ में आने पर भी उत्तर नहीं दे पाते! इसका क्या कारण हो सकता है? गहन अध्ययन पश्चात् जो कारण समझ में आते हैं &#8211; ये हैं &#8211; विद्यार्थियों के मन में उभरते अनेक प्रकार के डर!</p>
<ol style="text-align: justify;">
<li>उत्तर गलत होने का डर: अनेक विद्यार्थियों के मन में एक अदृश्य डर बैठा बैठा रहता है कि गलत उत्तर बताने पर कक्षा में हंसी उड़ेगी, शिक्षक गुस्सा होंगे, डाटेंगे, ये डर भी उन्हें उत्तर देने से रोकता हैं।</li>
<li>परीक्षा केन्द्रित शिक्षा: हमारी शिक्षा पद्धति उत्तर-केन्द्रित अधिक हैं, प्रश्न-केन्द्रित विचारों पर नहीं, परिणामस्वरूप परीक्षा में जो पूछा जाना अपेक्षित नहीं उस सम्बन्ध में प्रश्न क्यों पूछें ऐसी मानसिकता बन जाती हैं।</li>
<li>शिक्षक केन्द्रित कक्षा: शिक्षक ही केवल निरन्तर बोलता जाए और विद्यार्थी केवल सुनते रहे, ऐसी कक्षा में विद्यार्थियों को बोलने-पूछने का अवसर और उनका अधिकार नहीं मिलता हैं।</li>
<li>प्रश्न पूछना भी एक कौशल्य है, जो प्रयास से ही प्राप्त होता है, जहां बाल्यकाल से ही प्रश्नों को दबा दिया जाता है वहां प्रश्न उभरते ही नहीं।</li>
</ol>
<p style="text-align: justify;">‘मुझे उत्तर ज्ञात नहीं, ऐसा कहने में विद्यार्थी शरमाता है, और ज्ञात न होना अर्थात् अपयश यह भावना मन में बैठी होती हैं।</p>
<p style="text-align: justify;">कभी-कभी शिक्षकों के प्रश्न पूछने का सुर विद्यार्थी को अरूचिकर लगता है। कभी शिक्षक उलझन भरे अथवा उपहास करने हेतु प्रश्न पूछते हैं। सदैव कुछ विशेष होशियार विद्यार्थियों को ही प्रश्न पूछे जाए तो अन्य विद्यार्थी मौन बैठने को विवश होते हैं।</p>
<p style="text-align: justify;">पाठ्य पुस्तक और परीक्षा-केन्द्रित अध्यापन के कारण उत्तर महत्वपूर्ण और प्रश्न गौण ऐसी मानसिकता बनती हैं। परिणाम स्वरूप विद्यार्थी की जिज्ञासा अनदेखी रह जाती है। “और कोई प्रश्न तो पूछना नहीं है”? ऐसा शिक्षक के बोलने पर उत्तर मौन होता हैं।</p>
<p style="text-align: justify;">वास्तविकता तो है कि इन्हीं बच्चों ने अपने बाल्यकाल में अपने माता-पिता को हजारों प्रश्न पूछे होते हैं, तो फिर कक्षा में मौन क्यों हो जाते हैं यह प्रश्न पालक गण और शिक्षकों को स्वयं से पूछना होगा। बच्चों द्वारा पूछे प्रश्नों के उत्तर अनेक बार पालकों के पास नहीं होते हैं, उनके प्रश्नों का महत्व और उसकी गंभीरता पालक समझ नहीं पाते हैं, उनके प्रश्न पालकों को उबाऊ, झंझट वाले लगते हैं। इसलिए पालक उन्हें ‘चुप बैठ’, ‘मूर्खो’ जैसे सवाल मत कर, कहते हुए बच्चों को निराश कर देते हैं। परिणाम स्वरूप नये पालकों से प्रश्न पूछना कम कर देते हैं, जैसे-जैसे बच्चे ऊँची कक्षाओं में जाते हैं, जैसे वे अधिक मौन हो जाते हैं &#8211; शिक्षक द्वारा प्रश्न पूछने पर कक्षा में बच्चे मौन रहते हैं, शिक्षक की नजर से हटने का प्रयास होता है, आँखे नीचे की ओर झुका लेते हैं बच्चे! कक्षा में प्रश्नों का अभाव अच्छे अनुशासन की श्रेणी में नहीं रखा जाता है, वह निःशब्दता है, शान्त, मौन कक्षा जीवित कक्षा नहीं कहलाती है।</p>
<p style="text-align: justify;">कक्षा में जब प्रश्न पूछे जाते हैं, तब कक्षा केवल सीखने की जगह न होकर विचारों की कार्यशाला हो जाती है &#8211; शैक्षणिक मानस शास्त्र के अनुसार प्रश्न पूछना उच्च स्तरीय वैचारिक कौशल्य है, विश्लेषण, मूल्यांकन और सृजनशीलता के स्तर पर प्रश्नों की भूमिका निर्णायक होती है, प्रश्नों द्वारा ही संकल्पनाएं स्पष्ट होती है, चिकित्सकीय विचारशक्ति विकसित होकर ज्ञान प्राप्ति की प्रेरणा जागृत होती है।</p>
<p style="text-align: justify;">कुशल प्रश्नोत्तर &#8211; अर्थात् &#8211; अच्छे अध्यापन शास्त्र का धड़कता दिल हैं। भारतीय ज्ञान परम्परा प्रश्नोतरों से ही प्रारम्भ होती है, उपनिषद् के संवाद प्रश्नोत्तरों के रूप में ही हैं।</p>
<p style="text-align: justify;">“कस्मिन्न भगवो विज्ञाते सर्व मिदं विज्ञानतं भवति?” यह मुंडकोपनिषद् का प्रश्न ही सम्पूर्ण मुंडकोपनिषद् का आधार है।</p>
<p style="text-align: justify;">“अथातो ब्रह्म जिज्ञासा, येन ज्ञानं सर्वमिदं ज्ञातं भवति, कोऽहं, तत्वमसि, नायमात्या प्रवचनेन लभ्यो, किम कर्म किमकर्मेति?” यह सब वचन चिंतन को प्रवृत करती हैं। इतनी विशाल ज्ञान परम्परा होते हुए भी आज हमारे विद्यार्थियों में प्रश्न क्यों उभरते नहीं, यह गहन विचारणीय समस्या हैं।</p>
<p style="text-align: justify;">बच्चे कक्षा में क्यों मौन रहते हैं, क्यों उत्तर नहीं देते, प्रश्न पूछते नहीं, यह है शिक्षकों की शिकायत, परन्तु शिकायत करना ही समस्या का हल नहीं। इस हेतु कोई ठोस प्रामाणिक विचार विमर्श आवश्यक हैं।</p>
<p style="text-align: justify;">प्रश्न न पूछने वाला विद्यार्थी समूह एक अनुशासित समूह हैं ऐसा मानना उचित नहीं, वास्तव में देखा जाए तो ऐसे विद्यार्थी विचार शून्य हो सकते हैं। प्रश्न पूछना केवल जिज्ञासा की अभिव्यक्ति नहीं, अपितु ज्ञान प्राप्ति का प्रारम्भ हैं। प्रश्न पूछना अध्ययन प्रक्रिया का प्रथम सोपान है &#8211; प्रश्न से ही ज्ञान निर्मिति और विचार प्रक्रिया प्रारम्भ होती है, जहां प्रश्नों का अभाव वहां विचारों का भी अभाव और विचारों के अभाव में वास्तविक शिक्षा अवरूद्ध होती है।</p>
<p style="text-align: justify;">चीनी भाषा में एक कहावत के अनुसार &#8211; यदि आप प्रश्न पूछते हैं, तो लोग आपको मूर्ख समझेंगे, आपकी हंसी उड़ायेंगे, परन्तु केवल पांच-दस मिनिट! परन्तु यदि आपने प्रश्न पूछा नहीं तो आप आजीवन मूर्ख रहने की सम्भावना हैं।</p>
<p style="text-align: justify;">एक अंगेज लेखक रूड़याई किपलिंग के अनुसार &#8211; “मैंने छह मित्रों को अपने पास जोड़ रखा है, वे मेरे हर कार्य में सहायक होते हैं ओर वे छह मित्र है &#8211; क्या, कौन, कहां, कैसे, कब, और, क्यों?”</p>
<p style="text-align: justify;">साक्रेटिस की प्रश्नोत्तर पद्धति एक प्रभावी प्रक्रिया मानी जाती हैं। जॉन हुई के मतानुसार शिक्षा एक समस्या निवारण की प्रक्रिया है, और समस्या प्रश्नों के अभाव में अस्तित्व में नहीं आती।</p>
<p style="text-align: justify;">अपनी अधिकतर कक्षाओं में मौन संस्कृति ही विद्यमान है &#8211; प्रश्न पूछने की आदत विद्यार्थी में अपने आप ही निर्मित नहीं होती, वरन उसे प्रयास पूर्वक ही विद्यार्थी में निर्माण करनी पड़ती हैं।</p>
<p style="text-align: justify;">इसलिए शिक्षकों से अपेक्षा की जाती है कि वे अध्यापन पद्धति में परिवर्तन लाकर, प्रश्नों को महत्वपूर्ण स्थान दें तभी कक्षा जीवित-संवादमय और विचार-समृद्ध हो सकेगी। प्रश्न पूछने वाला विद्यार्थी ही वास्तव में ज्ञान प्राप्त करने वाला विद्यार्थी होता है, यह शिक्षा का मूल मंत्र स्वीकार करना होगा। प्रश्न पूछने की आदत शिक्षा-प्रक्रिया में से ही विकसित होती है। प्रश्न केन्द्रित अध्यापन पद्धति स्वीकारने से ही विद्यार्थी का सहयोग, आकलन और चिकित्सकीय विचार शक्ति का लाक्षणिक विकास हो पायेगा।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>प्रश्न-संस्कृति निर्मिति</strong></p>
<ol style="text-align: justify;">
<li>सुरक्षित और मित्रता का वातावरण निर्मित कीजिये, प्रश्नों का स्वागत आवश्यक है, प्रश्न पूछना पुलिस अधिकारी जैसा न हो।</li>
<li>विद्यार्थी द्वारा पूछे प्रश्न की खिल्ली न उड़ाए ना ही उसे अनदेखा करें।</li>
<li>स्वयं को उत्तर ज्ञात ना हो तो प्रामाणिकता से स्वीकार कर कहें कि प्रश्न अच्छा है, हम अन्तर के लिए अध्ययन कर बताते हैं।</li>
<li>प्रश्न पूछने का मॉडल बनें, स्वयं मनन करें, स्वयं को प्रश्न पूछे, ऐसा क्यों? प्रश्न का अन्य पर्याय क्या हो सकता है? इस पर भी मंथन करें।</li>
<li>छोटे-छोटे समूहों में चर्चा करें, सम्पूर्ण कक्षा में चर्चा करने से दो-तीन समूहों में चर्चा करने से प्रश्न सहजता से उभरेंगे।</li>
<li>प्रश्न पूछने के लिए पर्याप्त समय दें, जल्दबाजी न करें, अध्यापन में शीघ्रता के कारण प्रश्न पूछने के लिए पर्याप्त समय नहीं दे पाते, विचार करने हेतु शान्ति और समय आवश्यक हैं।</li>
<li>प्रश्न पूछने के लिए भी प्रशिक्षण देना पड़ता है, कौशल्य का पाठ भी पढाएं, समूह चर्चा, प्रकल्प पद्धति, समस्या आधारित शिक्षा द्वारा प्रश्नों की संख्या में वृद्धि होती है, मूल्यांकन केवल उत्तरों का ही नहीं, प्रश्नों को भी महत्व देकर उनका मूल्यांकन करें।</li>
</ol>
<p style="text-align: justify;">अधिकतर विद्यार्थी कक्षा में बोलने में शरमाते है अथवा झिझकते है, या डरते हैं, इसलिए उन्हें उनके प्रश्न कागज पर लिखकर पश्चात् उन्हें पढ़ने को कहें, प्रश्न पूछने की आदत और कौशल्य विकसित करने हेतु अनेक खेल अथवा उपक्रम उपयोग में लाए जा सकते हैं।</p>
<p style="text-align: justify;">शिक्षक अपने एजेण्डा में ‘प्रश्न कोशल्य’ विषय रखें और इस पर क्या कर सकते हैं इसका विचार-विमर्श करें जिससे अनेक उपाय समक्ष आएंगे, परन्तु इस हेतु शिक्षकों के समक्ष ही यह प्रश्न उभरना चाहिये, तभी उत्तर कही अन्य स्थान से न आकर शिक्षक स्वयं से ही प्राप्त होगा। मार्ग प्रशस्त होगा। विद्यार्थी के मन में प्रश्न पूछने की क्षमता निर्मित होना इसी में शिक्षक का सुयश छुपा हुआ हैं।</p>
<p style="text-align: justify;">ब्रह्मसूत्र का सूत्र ‘अथातो जिज्ञासा’ पर आधारित ‘अथातो प्रश्न जिज्ञासा’ अर्थात् अब प्रश्न पूछने की जिज्ञासा जागृत करने का समय आ गया हैं।</p>
<p><span style="color: #0000ff;"><strong>और पढ़े : <a style="color: #0000ff;" href="https://rashtriyashiksha.com/21st-century-teacher-2/" target="_blank" rel="noopener">21वीं शताब्दी के शिक्षक</a></strong></span></p>
<p style="text-align: justify;">(लेखक शिक्षाविद, स्वतंत्र लेखक, चिन्तक व विचारक है।)</p>
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		<title>संत नारायण गिरी जी उर्फ पंडित साधुराम</title>
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		<dc:creator><![CDATA[राष्ट्रीय शिक्षा]]></dc:creator>
		<pubDate>Fri, 31 Jul 2026 03:15:55 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[जीवन दर्शन]]></category>
		<category><![CDATA[नवीनतम]]></category>
		<category><![CDATA[व्यक्तित्व]]></category>
		<category><![CDATA[IKS]]></category>
		<category><![CDATA[Rashtriya shiksha]]></category>
		<category><![CDATA[पंडित साधुराम]]></category>
		<category><![CDATA[भारतीय ज्ञान परम्परा]]></category>
		<category><![CDATA[राष्ट्रीय शिक्षा]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>-सोमदत्त शर्मा भारतीय संस्कृति में संतों का योगदान अद्वितीय रहा है। भारत की यह भूमि युगों-युगों से तप, साधना और मानव कल्याण के लिए समर्पित महान विभूतियों की कर्मभूमि रही&#8230; </p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: right;">-सोमदत्त शर्मा</p>
<p style="text-align: justify;">भारतीय संस्कृति में संतों का योगदान अद्वितीय रहा है। भारत की यह भूमि युगों-युगों से तप, साधना और मानव कल्याण के लिए समर्पित महान विभूतियों की कर्मभूमि रही है। इन्हीं श्रेष्ठ संत परंपराओं में से एक हैं महान संत, दार्शनिक, कवि और अद्वैत साधक ब्रह्मलीन श्री श्री 1008 स्वामी नारायण गिरी जी महाराज, जिन्हें लोक में पंडित साधुराम के रूप में जाना जाता है। उनका जीवन भारतीय आध्यात्मिकता, कर्मयोग, भक्तियोग और ज्ञानयोग का अनुपम उदाहरण है &#8211; एक ऐसा जीवन जो &#8216;नर से नारायण&#8217; की यात्रा का सजीव प्रतीक बन गया।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>आरंभिक जीवन और पारिवारिक पृष्ठभूमि </strong></p>
<p style="text-align: justify;">पंडित साधुराम जी का जन्म हरियाणा राज्य की पवित्र भूमि कुरुक्षेत्र के ग्राम पबनावा में 13 दिसंबर 1904 (मार्गशीर्ष शुक्ल सप्तमी, विक्रम संवत 1960) को पंडित कृष्णलाल जी के घर हुआ। परिवार भगवद्भक्ति और वैदिक संस्कारों से परिपूर्ण था। उनके पिता त्रिकाल संध्या करते थे और दैनिक रूप से श्री आनंद बिहारी जी मंदिर में सेवा करते थे। एक दिव्य स्वप्न अनुभव के अनुसार, उनके पूर्वज पुत्र हरिनारायण ने पुनर्जन्म लिया और वही आत्मा नारायण शर्मा के रूप में वापस परिवार में आई। इस जन्म में वह बालक साधुराम कहलाया, जिसने आगे चलकर संन्यास धारण कर स्वामी नारायण गिरी जी के रूप में प्रसिद्धि पाई।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>शिक्षा और गृहस्थ जीवन</strong></p>
<p style="text-align: justify;">गुरु महाराज ने प्रारंभिक शिक्षा गाँव बारना में आचार्य पंडित श्री भिक्षाराम जी से प्राप्त की। तत्पश्चात रंगवाला एवं दुर्गियाणा संस्कृत विद्यालय अमृतसर से &#8216;आचार्य&#8217; की उपाधि ली और बोर्ड ऑफ आयुर्वेदिक एंड यूनानी सिस्टम ऑफ मेडिसिन, पंजाब से आयुर्वेदिक रजिस्टर्ड मेडिकल प्रैक्टिशनर बने। 1927 ईस्वी में उनका विवाह प्रसिद्ध वैदिक परिवार में हुआ, किंतु उनकी पत्नी कम आयु में ही स्वर्गवासी हो गईं। इस घटना ने उनके भीतर वैराग्य की लौ प्रज्वलित की। गृहस्थ रहते हुए भी वे सत्संग, स्वाध्याय और भजनोपदेश में निरंतर संलग्न रहे और “पबनावा ग्राम भजन मंडली” की स्थापना की।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>संन्यास ग्रहण और देशाटन</strong></p>
<p style="text-align: justify;">समय आने पर पंडित साधुराम जी ने त्याग मूर्ति स्वामी चौदस गिरी महाराज जी से संन्यास दीक्षा प्राप्त की और &#8216;स्वामी नारायण गिरी जी&#8217; बने। बारह वर्षों तक वे चारों धामों सहित भारतवर्ष के अनेक तीर्थों का भ्रमण करते रहे। यह काल उनका आत्मबोध और लोक शिक्षण का काल था। देशाटन के उपरांत जब वे अपने ग्राम पबनावा लौटे तो भव्य शोभायात्रा द्वारा उनका स्वागत हुआ। तत्पश्चात उन्होंने पुनः कुरुक्षेत्र को अपनी कर्मभूमि बनाया और हरियाणा के अनेक ग्रामों जैसे करोड़ा, भाणा, पाई, बरोट, नौच, सालवन, पबाना आदि में सत्संग, प्रवचन और भजनोपदेश के माध्यम से लोकजागरण किया।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>साधु राम आश्रम की स्थापना</strong></p>
<p style="text-align: justify;">अपने ब्रह्मलीन होने से कुछ समय पहले उन्होंने अपने शिष्यों की विनती पर कुरुक्षेत्र में &#8216;साधु राम आश्रम&#8217; की स्थापना 25 फरवरी 1988 को की। यह आश्रम आध्यात्मिक शिक्षा और लोककल्याण का केंद्र बन गया। 19 नवंबर 1989 को स्वामी नारायण गिरी जी ब्रह्मलीन हो गए। आज यह आश्रम सोसाइटी रजिस्ट्रेशन एक्ट 1860 के अंतर्गत पंजीकृत है और हर वर्ष गुरु पूर्णिमा तथा मार्गशीर्ष कृष्ण अष्टमी पर विशाल भजन-कीर्तन व भंडारे आयोजित किए जाते हैं।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>साहित्यिक योगदान</strong></p>
<p style="text-align: justify;">स्वामी नारायण गिरी जी एक ओजस्वी साहित्यकार भी थे। उन्होंने समाज कल्याण और आत्मबोध के उद्देश्य से 17 प्रामाणिक ग्रंथों की रचना की, जिनमें प्रमुख हैं: पं. साधुराम की कापी (भजनोपदेश माला), श्रीमद्भगवद्गीता &#8211; ज्ञान प्रबोधिनी, दशरथ रामायण (तीन भाग), गुरु शिष्य संवाद, राम मिलन की राह, विचार तरंग, संकल्प शक्ति, जीव आत्मा और मन का संवाद, सत्संग महिमा, सतगुरु गीता, गर्भगीता, और श्री दत्तात्रेय जीवन चरित्र। इनकी ‘भजनोपदेश माला’ में 370 से अधिक भजनों का संकलन है। इन भजनों में कर्म, भक्ति, ज्ञान, योग, तथा मानव जीवन के गहन आध्यात्मिक रहस्यों का विवेचन लोकभाषा में किया गया है। इनका प्रमुख प्रभाव श्रीमद्भगवद्गीता पर आधारित है। कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय और महर्षि दयानंद विश्वविद्यालय से संबद्ध महाविद्यालयों में ‘हरियाणवी लोकधारा’ नामक पाठ्यपुस्तक में इनके भजनों को शामिल किया गया। यह मान्यता इस बात का प्रमाण है कि पंडित साधुराम न केवल संत थे, बल्कि हरियाणवी लोकसाहित्य के समृद्ध संवाहक भी थे।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>लोकजागरण और भक्ति परंपरा</strong></p>
<p style="text-align: justify;">पंडित साधुराम जी की भजनोपदेश माला ने साधना और भक्ति के मार्ग को जन-सुलभ बनाया। उनके भजनों में जीवन का तत्वज्ञान, कुसंग से बचने की प्रेरणा, और ईश्वर ध्यान की सरल विधि की व्याख्या है। उन्होंने श्वास-प्रश्वास के वैज्ञानिक रहस्य को &#8216;सोहं&#8217; ध्यान के माध्यम से समझाया तथा कुंडलिनी जागरण के चक्रों का उल्लेख किया। उनके उपदेश साधारण जन के लिए आध्यात्मिक प्रयोगशाला बन गए। उन्होंने कहा कि सत्संग जीवन का सर्वोत्तम साधन है। इसी सिद्धांत पर चलते हुए उन्होंने भजन-मंडली परंपरा को स्थापित किया। परिणामस्वरूप हरियाणा के अनेक गांवों पबनावा, पाई, भाणा, बारना, सालवन, पबाना आदि में भजन मंडलियाँ बनीं, जो समानता व सामाजिक एकता का माध्यम बनीं।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>सामाजिक समरसता और मानवता का संदेश</strong></p>
<p style="text-align: justify;">साधुराम जी जातिगत भेदभाव को नकारने वाले सर्वस्पर्शी संत थे। उनके शिष्यों में ब्राह्मण, राजपूत, गुर्जर, रैबारी, नाई, कुम्हार, अग्रवाल आदि सभी समुदायों के लोग सम्मिलित थे। उन्होंने कहा कि हर वह व्यक्ति “हरिजन” है जिसने काम, क्रोध, लोभ आदि पर विजय पा ली। उनके लिए भक्ति का मार्ग जाति, लिंग, संप्रदाय या सामाजिक स्थिति से ऊपर था।अद्वैत दर्शन की प्रतिष्ठापंडित साधुराम जी के साहित्य में अद्वैत वेदान्त का गहन दर्शन विद्यमान है। शंकराचार्य के कथन “ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या” उनका आध्यात्मिक आधार था। उन्होंने अपनी काव्य रचनाओं और गद्य ग्रंथ “जीवात्मा और मन का संवाद” में स्पष्ट किया कि जीव और ब्रह्म में कोई भेद नहीं। उनके भजनों में प्रश्नोत्तर शैली के माध्यम से तत्वमसि, अहं ब्रह्मास्मि जैसे वेदांत सूत्रों का लोकभाषीय व्याख्यान प्रस्तुत है।</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;"><strong>भारतीय ज्ञान परंपरा और योगविज्ञान</strong></p>
<p style="text-align: justify;">उनकी पुस्तक “राम मिलन की राह” में कर्मयोग, भक्तियोग और ज्ञानयोग का वैज्ञानिक विवेचन है। उन्होंने स्वर-विज्ञान और प्राणविद्या के सूक्ष्म ज्ञान से शरीर के भीतर की नाड़ियों इड़ा, पिंगला व सुषुम्ना के शोधन की प्रक्रिया को सरल भाषा में बताया। उन्होंने प्रतिदिन की 21,600 श्वासों को देवतुल्य माना और प्राणशक्ति के जागरण को आत्म-उत्थान का साधन माना। भक्तियोग में उन्होंने प्रार्थना और नामजप के वैज्ञानिक रहस्य स्पष्ट किए, वहीं ज्ञानयोग में आत्मा को समस्त आनन्द का सार बताया। उनकी दृष्टि में शरीर एक रथ है, जिसकी दस इंद्रियां उसके अंग हैं—यह विचार उन्होंने &#8216;दशरथ रामायण&#8217; में विस्तार से लिखा। भारत बोध और कुरुक्षेत्र महिमा &#8216;कुरुक्षेत्र पथ प्रदर्शक&#8217; पुस्तक में उन्होंने 48 कोस की पवित्र भूमि, 767 तीर्थों और 9 नदियों का वर्णन किया। अपने भजनों में उन्होंने भारत की सांस्कृतिक अखंडता का गौरवपूर्ण चित्रण किया। उनके पदों में अहिंसा, गौ-संरक्षण और करुणा का संदेश झलकता है। वे मानते थे कि वही सच्चा हिंदू है जो जीव-हिंसा से दूर रहे और धर्म को करुणामय आचरण के रूप में जिए।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>भाषा, शैली और काव्य-सौंदर्य</strong></p>
<p style="text-align: justify;">पंडित साधुराम जी की भाषा सरल, संगीतात्मक और लोकानुकूल थी। वे संस्कृत, हिन्दी, उर्दू और अंग्रेज़ी सभी भाषाओं में निपुण थे। उनके भजनों में लय, छंद और अलंकारिक सौंदर्य के साथ हिन्दी-हरियाणवी मिश्रित शैली मिलती है। वे लोक की भाषा में शास्त्र का मर्म समझाने के अद्वितीय प्रतिभाशाली कवि थे। उनके भजनों में तत्सम, तद्भव, देशज, और विदेशी शब्दों का संतुलित प्रयोग दिखाई देता है ।उनके भजनों में कथा-शैली, तुलनात्मक दृष्टान्त, एवं संवादात्मक शैली का प्रयोग पाठक को आत्मानुभूति की ओर खींच लेता है। श्रीकृष्ण, राम और भक्त प्रह्लाद जैसी कथाएं उन्होंने प्रतीक रूप में उपयोग करके जीवन-दर्शन के गूढ़ संदेश को सरलतम भाषा में प्रस्तुत किया।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>निष्कर्ष</strong></p>
<p style="text-align: justify;">संत नारायण गिरी उर्फ पंडित साधुराम जी का संपूर्ण जीवन भारतीय संत परंपरा की उज्ज्वल कड़ी है। उनके भजन, साहित्य, और उपदेश न केवल हरियाणा की लोकसंस्कृति को समृद्ध करते हैं बल्कि भारतीय अध्यात्म के सार्वभौमिक संदेश को पुनः जीवंत करते हैं। उनकी भजनोपदेश माला में लोक और वेद, अध्यात्म और विज्ञान, भक्ति और ज्ञान का सुंदर समन्वय है।वे जीवन के उस परम सत्य के साधक थे जिसे उन्होंने शब्द दिया — “नर से नारायण की यात्रा”। वास्तव में उनका जीवन, साहित्य और साधना उस परंपरा का जीवंत दीप है जो अज्ञान के अंधकार को मिटाकर आत्मज्ञान की पूर्णिमा से लोक को आलोकित करती है।</p>
<p style="text-align: justify;"><span style="color: #0000ff;"><strong>और पढ़े:</strong></span> <span style="color: #3366ff;"><strong><a style="color: #3366ff;" href="https://rashtriyashiksha.com/siddh-shiromani-baba-mastnath/" target="_blank" rel="noopener">सिद्ध शिरोमणि बाबा मस्तनाथ (सन् 1707-1807)</a></strong></span></p>
<p style="text-align: justify;">(लेखक पूर्व प्रधानाचार्य है एवं वर्तमान में विद्या भारती हरियाणा में शिशुवाटिका विभाग में पूर्णकालिक कार्यकर्त्ता है।)</p>
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		<title>वन्देमातरम् का 150वां जयन्ती वर्ष – भाग एक</title>
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		<dc:creator><![CDATA[राष्ट्रीय शिक्षा]]></dc:creator>
		<pubDate>Thu, 21 May 2026 06:55:13 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[नवीनतम]]></category>
		<category><![CDATA[लेख]]></category>
		<category><![CDATA[वासुदेव प्रजापति]]></category>
		<category><![CDATA[आज़ाद_हिंद_फौज]]></category>
		<category><![CDATA[क्रांतिकारी_इतिहास]]></category>
		<category><![CDATA[देशभक्ति_लेख]]></category>
		<category><![CDATA[नेताजी_सुभाषचंद्र_बोस]]></category>
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		<category><![CDATA[वन्देमातरम्]]></category>
		<category><![CDATA[स्वदेश_मंत्र]]></category>
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					<description><![CDATA[<p> &#8211; वासुदेव प्रजापति आज की नई पीढ़ी भारत के स्वतंत्रता संग्राम से अनभिज्ञ है। उसने न जवाहरलाल नेहरु को देखा है न उसे सुभाषचन्द्र बोस के दर्शन का सौभाग्य मिला&#8230; </p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: right;"> &#8211; वासुदेव प्रजापति</p>
<p><img fetchpriority="high" decoding="async" class="alignnone wp-image-9314" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2026/05/63254656-300x199.jpg" alt="" width="1538" height="1020" srcset="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2026/05/63254656-300x199.jpg 300w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2026/05/63254656-1024x680.jpg 1024w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2026/05/63254656-768x510.jpg 768w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2026/05/63254656.jpg 1198w" sizes="(max-width: 1538px) 100vw, 1538px" /></p>
<p style="text-align: justify;">आज की नई पीढ़ी भारत के स्वतंत्रता संग्राम से अनभिज्ञ है। उसने न जवाहरलाल नेहरु को देखा है न उसे सुभाषचन्द्र बोस के दर्शन का सौभाग्य मिला है। स्वाधीन भारत के शासकों ने देश की नई पीढ़ी को नेताजी सुभाषचंद्र बोस के विषय में कुछ भी नहीं बताया, फिर भी भारत की वर्तमान तरुण पीढ़ी को नेहरुजी व नेताजी में से किसी एक को चुनने के लिए कहा जाए तो निश्चय ही सुभाषचन्द्र बोस को ही वे सर्वप्रिय नेता के रूप में चुनेंगे। क्योंकि नेताजी का नाम लेने मात्र से आधुनिक भारत के तरुणों और किशोरों के हृदयों में जैसा विद्युत-संचार होता है, वैसा जवाहरलाल नेहरू का नाम लेने से नहीं होता। ठीक यही स्थिति हमारे देश के राष्ट्रगीत वंदे मातरम की है। स्वाधीन भारत ने कभी भी वंदे मातरम् का सत्य इतिहास नई पीढ़ी को नहीं बताया। “कोटि-कोटि हृदयों के प्राण स्पंदन और सहस्रों हुतात्माओं का चेतना मंत्र है, वंदे मातरम्।” वन्देमातरम् के उत्कर्ष और अपमान के इतिहास से आज की पीढ़ी पूर्णतया अनभिज्ञ है। जबकि जवाहरलाल नेहरू द्वारा लाया गया राष्ट्रगान, जन गण मन सबको याद है। अतः नई पीढ़ी को वन्देमातरम् का सत्य इतिहास बताना इस गोष्ठी का उद्देश्य है।</p>
<p style="text-align: justify;">हमारे देश की अनेक बातें हमसे छुपाई गई हैं। जैसे हमें बताया गया कि देश को आजादी बिना खड्ग और बिना ढाल के अहिंसात्मक आंदोलनों से मिली है। जबकि वास्तविकता यह है कि अनेक देशभक्तों ने देश को स्वतंत्र करवाने के लिए फाँसी के फंदों को चूमा था, अपना रक्त बहाया था, अपना बलिदान दिया था तब जाकर हमें आजादी मिली है। आजादी से पहले वन्देमातरम् ही देश के लिए उत्सर्ग का पवित्र भाव भरने वाला स्वदेश मंत्र था। इस पवित्र मंत्र से प्रेरणा लेकर ही देशभक्त जब मिलते थे, तब परस्पर वन्देमातरम् का सम्बोधन करते थे। प्रत्येक छोटे-बड़े समारोह में वन्देमातरम् गाया जाता था। सभी बड़े बड़े राजनेता वन्देमातरम् को ही देश का राष्ट्रगान मानते थे। स्वतंत्रता से पूर्व तक जन-गण-मन को गाया नहीं जाता था। “वन्देमातरम् की व्यथा-कथा” पुस्तक के लेखक श्री चतुर्भुज जी तोषनीवाल लिखते हैं कि मैं कलकत्ता में अनेक वर्ष रहा हूँ, अतः बंगाली भाषी हूँ। अनेक सामाजिक व राजनैतिक कार्यक्रमों में जाना होता था। वन्देमातरम् गान को असंख्य बार सुना, परन्तु जन-गण-मन केवल एक बार ही सुनने को मिला। फिर क्यों पहले वन्देमातरम् का अंगभंग किया और बाद में इसको पदच्युत् कर दिया? क्यों वन्देमातरम् के स्थान पर अचानक जन-गण-मन को राष्ट्रगान बना दिया गया? इस षड्यंत्र के पीछे कौन था? ऐसे सभी प्रश्नों के उत्तर इस लेख में आपको सुनने को मिलेंगे। यहाँ एक बात की ओर आप सबका ध्यान आकृष्ट करना चाहता हूँ कि मैं जन-गण-मन का विरोधी नहीं हूँ और न इसका अपमान करना चाहता हूँ। मैं तो केवल इतना चाहता हूँ कि वन्देमातरम् के साथ जो षडयंत्र किया गया है, उसे उजागर करूँ। अन्यथा आज भी मैं जन-गण-मन को राष्ट्रगान होने के नाते उसका श्रद्धापूर्वक गान करता हूँ और उसके सम्मान में खड़ा होता हूँ और चाहता हूँ कि सभी देशवासी जन-गण-मन को वैसा ही सम्मान दें।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>स्वदेश मंत्र वन्देमातरम् का अवतरण</strong></p>
<p style="text-align: justify;">वन्देमातरम् राजर्षि बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय की चेतना में अवतीर्ण हुआ पवित्र मंत्र है। हमारे देश में ऋषि मंत्र द्रष्टा होते हैं। मंत्र वह होता है जो ऋषियों की चेतना में स्वयं अवतीर्ण होता है। इस कसौटी पर वंदे मातरम् खरा उतरता है वन्देमातरम् शुद्ध रूप में भारतमाता के लिए गाया गया पवित्र गान है। वन्देमातरम् गाने से देशभक्तों के हृदयों में भारतमाता के लिए सर्वस्व न्यौछावर करने का भाव स्वत: स्फूर्त होता है।</p>
<p style="text-align: justify;">वन्देमातरम् का अर्थ है, मैं माता की वंदना करता हूँ, अर्थात मैं भारत माता को प्रणाम करता हूँ। हम वैदिक काल से पृथ्वी माता की वंदना करते आए हैं। पृथ्वी को माता मानकर उसकी वंदना करना हम भारतीयों की रग-रग में रचा-बसा है। वैदिक साहित्य में मातृ वंदना गायी गई है। ऋग्वेद में “बन्धुर्मेमाता पृथिवी महीयम्” कहा गया है। जिसका भाव है, यह विशाल पृथ्वी मेरी माता है। यजुर्वेद कहता है, “नवो मातरे पृथिव्यै” का भाव भी यही है कि पृथ्वी हमारी माता है। और अथर्ववेद का यह प्रसिद्ध सूक्त हम सबने सुना है, “माता भूमि: पुत्रोंsहं पृथिव्या:” भूमि मेरी माता है और मैं उसका पुत्र हूँ। वेदों के अतिरिक्त भी संस्कृत साहित्य में मातृभूमि की वंदना अनेक शास्त्रों में वर्णित हैं। जैसे हमने लक्ष्मण व राम का वह संवाद सुन रखा है कि लंका विजय के पश्चात् लक्ष्मण राम से कहते हैं कि भैया! अयोध्या में तो भरत राज्य कर ही रहे हैं। क्यों न हम अपने हाथों से विजित इस स्वर्णनगरी लंका में ही रह जायें। प्रत्युत्तर में श्रीराम कहते हैं –</p>
<p style="text-align: center;"><strong>“अपि स्वर्णमयी लंका न में लक्ष्मण रोचते।</strong></p>
<p style="text-align: center;"><strong>जननी  जन्मभूमिश्च  स्वर्गादपि  गरीयसी।।”</strong></p>
<p style="text-align: justify;">हे लक्ष्मण! यह सत्य है कि लंका सोने की है, परन्तु यह मुझे नहीं रुचती। क्योंकि जन्म देने वाली माँ और जन्मभूमि मेरे लिए स्वर्ग से भी बढ़कर है। स्पष्ट है कि जन्मभूमि की मातृरूप में वंदना करने की भारत में परंपरा रही है। इसी परंपरा में अनेक बंगाली लेखकों जैसे माइकेल मधुसूदन दत्त, भूदेव मुखोपाध्याय एवं बंकिम चन्द्र चट्टोपाध्याय ने अपनी-अपनी कृतियों में जन्मभूमि का मातृरूप में दर्शन किया है। बंकिम बाबू ने अपनी कृति ‘मेरा दुर्गोत्सव’ में अपनी दिव्य दृष्टि से सप्तमी पूजा के दिन जन्मभूमि का दशभुजा देवी दुर्गा के रूप में अपूर्व दर्शन किया था। कुछ समय के उपरान्त उनकी लेखनी से उसी दिव्य दृष्टि द्वारा आकारित दुर्गा माता का रूप सन् 1875 में ‘वन्देमातरम्’ गान के रूप में अवतरित हुआ। तब से लेकर अब तक 150 वर्ष पूर्ण हुए हैं, इसलिए 2026 में हम वन्देमातरम् का 150वाँ जयन्ती वर्ष मना रहे हैं। बंकिम बाबू ने 8 वर्ष बाद सन् 1883 में इस गान को अपने उपन्यास ‘आनन्द मठ’ में प्रकाशित किया था। तब वन्देमातरम् गान के सम्बन्ध में उन्होंने अपनी पुत्री से कहा था &#8211; “देखना! एक दिन ऐसा आएगा कि बंगभूमि इस गान को सुनकर नाचने लगेंगी, केवल बंगाल ही नहीं सारा भारतवर्ष इस गान से प्रेरणा ग्रहण करेगा।” इतना ही नहीं, वन्देमातरम् के व्याख्याकार श्री अरविन्द घोष ने अपने प्रबन्ध ‘ऋषि बंकिम चंद्र’ में तीन बातों पर विशेष बल दिया है। “पहली बंकिम बाबू की समस्त रचनाओं का श्रेष्ठ भाव है, स्वदेश धर्म। दूसरी, जिस नवीन प्रेरणा से ओत-प्रोत होकर हम स्वाधीनता की दिशा में अग्रसर हो रहे हैं, उसके प्रेरणादाता एवं राष्ट्रगुरु हैं, बंकिमचंद्र। और तीसरी बात, उनका सर्वोत्कृष्ट योगदान है, जननी जन्मभूमि का मातृरूप में दर्शन करना।”</p>
<p><img decoding="async" class="alignnone  wp-image-9318" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2026/05/Subhas-Chandra-Bose-Indian-National-Army-219x300.webp" alt="" width="1371" height="1878" srcset="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2026/05/Subhas-Chandra-Bose-Indian-National-Army-219x300.webp 219w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2026/05/Subhas-Chandra-Bose-Indian-National-Army-748x1024.webp 748w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2026/05/Subhas-Chandra-Bose-Indian-National-Army-768x1052.webp 768w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2026/05/Subhas-Chandra-Bose-Indian-National-Army-1121x1536.webp 1121w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2026/05/Subhas-Chandra-Bose-Indian-National-Army.webp 1168w" sizes="(max-width: 1371px) 100vw, 1371px" /></p>
<p style="text-align: justify;"><strong>बंगभंग आन्दोलन में वन्देमातरम्</strong></p>
<p style="text-align: justify;">अंग्रेजों ने देश के स्वाधीनता आन्दोलन को कमजोर करने के लिए पहले बंगाल का विभाजन किया था। उस समय बंगाल क्रान्तिकारी गतिविधियों का गढ़ था। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापक डॉ. हेडगेवार भी डाक्टरी की पढ़ाई करने कलकत्ता गए थे और पढ़ाई के साथ-साथ क्रान्तिकारी गतिविधियों में सक्रिय भाग लिया था। वे क्रान्तिकारी संस्था अनुशीलन समिति के सदस्य थे। उनका गुप्त नाम कोकेन था। ऐसे सभी क्रांतिकारियों की कमर तोड़ने के लिए उन्होंने सन् 1905 में बंग-भंग का निर्णय लिया था। 7 अगस्त 1905 के दिन कलकत्ता के टाउन हॉल में बंग-भंग के विरोध में एक बहुत बड़ी सभा हुई। उस सभा में पहली बार वन्देमातरम् का जयघोष लगा और उसी दिन से यह जयघोष देशभक्तों का स्वदेश मंत्र बन गया। उस दिन से लेकर आजादी पाने तक न जाने कितने ही हजारों आबाल-वृद्ध स्वतंत्रता के पुजारियों ने वन्देमातरम् के सात्त्विक बल के सहारे असंख्य व अमानुषिक अत्याचार सहते हुए फाँसी के फन्दों को चूमा था। अंग्रेजों के द्वारा साम-दाम-दण्ड-भेद रूपी सभी दाँव-पेच लगाने के बाद भी वे आन्दोलन को समाप्त नहीं कर पाए। अन्ततः विवश होकर उन्हें सन् 1911 में अपना बंग-भंग का निर्णय वापस लेना पड़ा। अर्थात् अंग्रेजों द्वारा किए गए बंगाल-विभाजन को देशभक्तों ने रोक दिया। अंग्रेजों की इस विफलता के मूल में देशभक्तों को मर मिटने की प्रेरणा देने वाला यह स्वदेश मंत्र, वन्देमातरम् ही प्रमुख शस्त्र था।</p>
<p style="text-align: justify;">स्वतन्त्रता संग्राम में वन्देमातरम् देशभक्तों का प्रमुख शस्त्र बन गया था। फलतः अंग्रेजों ने इस स्वदेश मंत्र से भयभीत होकर वन्देमातरम् बोलने पर ही प्रतिबन्ध लगा दिया। परन्तु देशभक्तों ने वंदे मातरम् जयघोष के प्रतिबन्ध को अमान्य कर दिया, हमें अपनी माता की जय बोलने से कोई नहीं रोक सकता। यहाँ मुझे पुनः डॉ.हेडगवार के विद्यार्थी काल का एक प्रसंग याद आता है। वे नागपुर की नीलसिटी हाईस्कूल में पढ़ रहे थे। उन्हें ज्ञात हुआ कि निरीक्षक महोदय निरीक्षण करने हेतु उनके स्कूल में आने वाले हैं। तब उन्होंने अपने विश्वस्त साथियों के साथ वन्देमातरम् जयघोष की योजना बनाई। इस योजना की कानोंकान किसी को भनक तक नहीं लगने दी। निर्धारित दिन निरीक्षक महोदय स्कूल में आए और उनकी कक्षा में ज्योंही पैर रखा त्योंही पूरी कक्षा ने खड़े होकर वन्देमातरम् से उनका स्वागत किया। निरीक्षक महोदय क्रोधित हुए और दूसरी कक्षा में चले गए। वहाँ भी उनका स्वागत वन्देमातरम् जयघोष से ही हुआ। अब तो निरीक्षक आग बबूला हो गए और प्रधानाध्यापक को तुरन्त अनुशासन हीनता के लिए कठोर कार्यवाही करने का आदेश देकर चले गए। प्रधानाचार्य ने सबसे पूछताछ की परन्तु किसी भी बालक ने कुछ भी नहीं बताया। जब उन्होंने निर्दोष बालकों को पीटना शुरु किया तब डाक्टर जी आगे आए और स्वीकार किया कि यह सारी योजना मेरी थी। प्रधानाचार्य ने डाक्टरजी को उसी समय स्कूल से निष्कासित कर दिया। यह सजा पाकर भी डाक्टरजी प्रसन्न थे क्योंकि भारतमाता की जय बोलने में उन्हें गौरव एवं स्वाभिमान की अनुभूति होती थी।</p>
<p style="text-align: justify;">ऐसा ही प्रसंग कलकत्ता के नेशनल कॉलेज के एक विद्यार्थी सुशील सेन का है। एक आन्दोलन में उसने अंग्रेज सार्जेंट के दुर्व्यवहार से क्रोधित होकर उसे जोर का घूँसा मार दिया। सिपाहियों ने उसे पकड़ लिया और जज के सामने पेश किया। जज किंग्सफोर्ड ने सुशीलसेन को पन्द्रह बेंतों की सजा सुनाई। ज्योंही उसकी नंगी पीठ पर बेंत पड़ती वह जोर से वन्देमातरम् जयघोष लगाता। पन्द्रह ही बेंतों पर वह बड़े गर्व से वन्देमातरम् जयघोष लगाता रहा। यह तो कुछ भी नहीं, अंग्रेज वन्देमातरम् घोष से इतने अधिक भयभीत थे कि अमानवीय अत्याचारों से कुछ क्रांतिकारियों की मृत्यु हो जाने पर भी भयभीत और आतंकित अंग्रेजों ने उनके शवों को गहरे समुद्र में डूबोया था। इसी तरह क्रांतिकारी सूर्यसेन जिन्हें फाँसी की सजा मिली थी, उन्हें वधस्थल ले जाते समय वे वंदेमातरम का जयघोष लगाते जा रहे थे, इसलिए उनको इतनी निर्दयतापूर्वक लाठियों से पीटा गया कि वे बेहोश हो गए और बेहोशी की हालत में ही उन्हें फाँसी दे दी गई। स्वदेश के लिए सर्वस्व बलिदान करने की प्रेरणा देने वाले शक्तिशाली स्वदेश मंत्र का स्वाधीनता प्राप्ति के पश्चात् तत्कालीन सत्ताधीशों ने तिरस्कार करके अपने मस्तक पर जो कलंक का टीका लगाया है, वह सदियों तक अमिट रहेगा।</p>
<p style="text-align: justify;">क्रमशः</p>
<p style="text-align: justify;">(लेखक शिक्षाविद् है, भारतीय शिक्षा ग्रन्थमाला के सह संपादक है और विद्या भारती संस्कृति शिक्षा संस्थान के पूर्व सचिव है।)</p>
<p><strong>और पढ़ें : <span style="color: #0000ff;"><a style="color: #0000ff;" href="https://rashtriyashiksha.com/national-song-vande-mataram/" target="_blank" rel="noopener">राष्ट्र गीत – वन्दे मातरम्</a></span></strong></p>
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		<title>शालेय प्रार्थना सभा</title>
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		<dc:creator><![CDATA[राष्ट्रीय शिक्षा]]></dc:creator>
		<pubDate>Tue, 19 May 2026 04:03:52 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[दिलीप बेतकेकर]]></category>
		<category><![CDATA[नवीनतम]]></category>
		<category><![CDATA[हम सरस्वती पुत्र]]></category>
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					<description><![CDATA[<p> &#8211; दिलीप बेतकेकर किसी शाला की प्रगति कम से कम समय में परखनी हो तो शाला की प्रार्थना सभा में उपस्थित रहें। शाला की प्रार्थना सभा शाला के सभी कार्यक्रम,&#8230; </p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: right;"> &#8211; दिलीप बेतकेकर</p>
<p><img decoding="async" class="alignnone wp-image-9309" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2026/05/481016247_1131898572068376_4842360533609575560_n-300x134.jpg" alt="" width="1399" height="625" srcset="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2026/05/481016247_1131898572068376_4842360533609575560_n-300x134.jpg 300w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2026/05/481016247_1131898572068376_4842360533609575560_n-768x344.jpg 768w" sizes="(max-width: 1399px) 100vw, 1399px" /></p>
<p style="text-align: justify;">किसी शाला की प्रगति कम से कम समय में परखनी हो तो शाला की प्रार्थना सभा में उपस्थित रहें। शाला की प्रार्थना सभा शाला के सभी कार्यक्रम, उपक्रम आदि का प्रतिबिम्ब होती है।</p>
<p style="text-align: justify;">सामान्यतः प्रार्थना सभा 15 से 20 मिनट अवधि की होती है। इस छोटी सी अवधि में भी शाला विकास, शाला का वातावरण, विद्यार्थियों के साथ व्यवहार और शिक्षकों के दृष्टिकोण की जानकारी आसानी से मिल सकती है। इस 15-20 मिनट की सभा का उत्कृष्ट नियोजन कर सकते हैं। कुछ शालाओं में ऐसा नियोजन किया गया है जो अत्यंत प्रभावी है।</p>
<p style="text-align: justify;">कुछ शालाओं में प्रार्थना सभा को एक कर्मकाण्ड की दृष्टि से देखा जाता है। जब किसी बात को उद्देश्य को आंख के समक्ष रखकर, पूर्ण विचार कर, नहीं करते हुए केवल औपचारिकता निभाते हैं, ऐसी सभाओं में जीवन अथवा उद्देश्य दिखाई नहीं देता है। शाला में प्रार्थना सुर-लय विहीन, उदासी लिए हुए चलती है। विद्यार्थियों को भी उसमें कोई गंभीरता नहीं लगती है। शिक्षकों को भी वहां खड़े रहना सजा जैसा लगता है।</p>
<p style="text-align: justify;">प्रस्तुत लेख में कुछ स्थानों की प्रार्थना सभाओं में जो कुछ अनुकरणीय बातें दिखीं अथवा सुनीं उसे दर्शाने का प्रयास है।</p>
<p style="text-align: justify;">शालाओं में नैतिक शिक्षा का पाठ पढ़ाया जाए। इस पर दो राय होने का सवाल ही नहीं। केवल किस प्रकार दी जाए, इसके भिन्न-भिन्न मत हैं। प्रार्थना सभा का उपयोग नैतिक शिक्षा के लिए हो सकता है, नैतिक शिक्षा के लिए कोई अलग से पीरियड की आवश्यकता नहीं है। शिक्षा में नैतिक शिक्षा अंतर्निहित ही है। फिर भी प्रार्थना सभा की अवधि में नैतिक शिक्षा के सम्बन्ध में चर्चा हो सकती है।</p>
<p style="text-align: justify;">शाला प्रारम्भ होने से पूर्व पहली घंटी होते ही सभी छात्रा मैदान में एकत्र हो जाते हैं। अनेक शालाएं ऐसी भी हैं जिनमें खुली जगह/मैदान का अभाव है। शाला में मैदान का होना भी भाग्य की बात है। कुछ शालाओं में प्रार्थना के समय बच्चे कक्षावार कतार में खड़े हो जाते हैं। कहीं ‘हाउस’ अनुसार खड़े होते हैं। सामान्यतः कक्षावार खड़े रहने की ही प्रथा है।</p>
<p style="text-align: justify;">पहली घंटी होने से सभा समाप्त होने तक मौन रखने की प्रथा कुछ शालाएं अपनाती हैं। जिन शिक्षकों, विद्यार्थियों को बोलने का कार्य आवंटित है वे बोलते हैं, शेष मौन रहते हैं। सामान्यतः प्रार्थना सभा का संचालन शारीरिक प्रमुख करता है। कहीं शिक्षक तो कुछ शालाओं में विद्यार्थी संचालन करते हैं। विद्यार्थियों को बदल-बदल कर संचालन का अवसर देना अधिक लाभकारी होगा। प्रार्थना सभा चलते समय कुछ बच्चे पीछे रहकर धींगामस्ती करते हैं, इसलिए आवश्यकतानुसार शिक्षक बच्चों के पीछे खड़े हो जाते हैं। छात्रों का ध्यान भी शिक्षकों की तरफ होता ही है। अनेक बार तो विद्यार्थी शिक्षकों को आपस में बातचीत करते हुए देख लेते हैं। कभी-कभी तो राष्ट्रगीत के चलते भी होता है। ये बातें छात्रों की नजर से छूटती नहीं हैं। कुछ कार्यक्रम प्रतिदिन के निश्चित हैं, जैसे ‘राष्ट्रगीत’! कुछ कार्यक्रम बदलते रहते हैं। ठंड के दिनों में सभा के प्रारंभ में कुछ व्यायाम प्रक्रियाएं अपनाई जाएं तो उपयुक्त रहेगा। प्रार्थना सभा के सभी उपक्रम, कार्यक्रमों का विभाजन, शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक विकास के लिए उपयुक्त होंगे। किसी के द्वारा किए गए अच्छे कार्य के लिए अभिनंदन कार्यक्रम सभा में सभी के समक्ष होने से बच्चे ही क्या बड़े भी आनंदित और उत्साहित होते हैं।</p>
<p style="text-align: justify;">वक्तृत्व, वाचन करने से जनसमूह के समक्ष जाने का अवसर बच्चों को मिलता है। इससे मंचभय या संकोच न रहकर निर्भीक प्रवृत्ति निर्मित होती है। वर्षभर में कभी न कभी प्रत्येक विद्यार्थी को सभा के समक्ष आने का अवसर मिले तो उत्तम है। इस हेतु सुविचार पढ़ना, सुभाषितों का पठन, दिन विशेष बताना, गीत-भजन गा सके, उसे गीत-भजन गाने को कहना, आदि कार्यक्रम सभा में कर सकते हैं। शिक्षकों द्वारा इसकी पूर्व तैयारी करवा लेनी चाहिए।</p>
<p style="text-align: justify;">प्रार्थना सभा में कोई संकल्प, प्रतिज्ञा बोलने की प्रथा कुछ शालाओं में देखी जाती है। एक शाला में विविध भाषाओं में प्रतिज्ञा बोलना होता है जो स्तुत्य है। इससे दूसरी भाषाओं का सम्मान करने की प्रवृत्ति निर्मित होगी। सप्ताह में एक बार बोधकथा कहने का कार्यक्रम रख सकते हैं।</p>
<p style="text-align: justify;">कहा जाता है – “Tell me the songs on the lips of the young people of the country and I will tell you the future of the country.”</p>
<p style="text-align: justify;">आजकल हमारे यहां बच्चों के मुंह से फिल्मी गाने ही गुनगुनाए जाते हैं। ऐसी शिकायत करने की अपेक्षा कुछ शालाएं बच्चों को देशभक्ति परक गीत सिखाने का उपक्रम करती हैं। दस-पंद्रह बार एक ही गीत दोहराने पर याद हो जाता है। वर्षभर की अवधि में न्यूनतम दस गीत शाला द्वारा याद करवाए जा सकते हैं। ये गीत विविध भारतीय भाषाओं के हो सकते हैं।</p>
<p style="text-align: justify;">संस्कृत एक सम्पन्न भाषा है किंतु आज उसका स्थान कहां है? न्यूनतम शब्दों में विचार प्रस्तुत करना संस्कृत सुभाषितां का वैशिष्ट्य है। संस्कृत भाषा के परिचय के लिए दो पंक्तियों के सुभाषित याद करवाने होंगे। पंद्रह दिन में सुभाषित याद हो जाएगा। वर्ष भर में दस-पंद्रह सुभाषित आसानी से याद हो जाएंगे। निबन्ध लिखने या वक्तृत्व स्पर्धा में इन संस्कृत सुभाषितों का उपयोग करना प्रभावी रहेगा।</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone wp-image-9306" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2026/05/5.2-1-300x167.jpg" alt="" width="1412" height="786" srcset="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2026/05/5.2-1-300x167.jpg 300w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2026/05/5.2-1.jpg 688w" sizes="auto, (max-width: 1412px) 100vw, 1412px" /></p>
<p style="text-align: justify;">‘दिन विशेष’ पुस्तक खोलते ही प्रत्येक दिन के महत्व की जानकारी सामने दिखाई देती है। कौन-कौन सी घटनाएं उस दिन हुईं, यह जान सकते हैं। सप्ताह में एक दिन विशेषकर शनिवार को सामूहिक व्यायाम (P.T.) करवाने की प्रथा कुछ शालाओं में है। आज इस भावना को अपनाने की आवश्यकता है। कवायद से शरीर को ही नहीं, मन के लिए भी अच्छा मार्ग प्रशस्त होता है।</p>
<p style="text-align: justify;">अनेक बार देखा जाता है कि कुछ बालक अस्वच्छ हाथ-पैर, नाखून बढ़े हुए, गंदे जूते या चप्पल, बिखरे बाल, ऐसी अवस्था में शाला में आते हैं।</p>
<p style="text-align: justify;">ऐसे विद्यार्थियों का बारीकी से परीक्षण सप्ताह में एक बार होना आवश्यक है। सभी शिक्षक यह कार्य एकत्रित होकर करें तो यह परीक्षण आसानी से हो जाएगा। कम से कम इस ‘रूप’ में शाला आना बंद होगा। वे अपेक्षानुरूप आने लगेंगे। अपेक्षित गणवेश में विद्यार्थी आये हैं अथवा नहीं, यह परीक्षण से स्पष्ट हो जाता है।</p>
<p style="text-align: justify;">सालों-साल एक ही प्रकार से ही प्रार्थना सभा करने से वे निर्जीव, उबाऊ, उदासी भरी, अप्रिय लगने लगती हैं। चैतन्यभरी दिखने के लिए सभा की योजना विचारपूर्वक करनी पड़ेगी।</p>
<p style="text-align: justify;">कुछ शालाएं, शिक्षक इस विषय में जागरुक हैं। क्या करना है, क्या नहीं होना है, इसका विचार वे पूर्व से ही बारीकी से करते हैं। ऐसी शालाएं कम ही हैं। कुछ लोगों को कुछ करने की इच्छा होती है परन्तु कल्पनाशीलता नहीं होती। जिन्हें कुछ करने की इच्छा है, उन्हें अन्य शालाओं का अनुकरण करना चाहिए। प्रार्थना सभा की ओर अर्थपूर्ण दृष्टि से देखा जाए तो अति उत्तम रहेगा।</p>
<p style="text-align: justify;">(लेखक शिक्षाविद, स्वतंत्र लेखक, चिन्तक व विचारक है<strong>।)</strong></p>
<p><strong>और पढ़ें : <a href="https://rashtriyashiksha.com/need-of-teachers-for-students/" target="_blank" rel="noopener">‘विद्यार्थियों’ के शिक्षकों की आवश्यकता</a></strong></p>
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		<title>प्रेरणा के फूल</title>
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		<dc:creator><![CDATA[राष्ट्रीय शिक्षा]]></dc:creator>
		<pubDate>Mon, 18 May 2026 06:43:45 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[कथा-कहानी]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>&#8211; गोपाल माहेश्वरी स्वदेशचंद्र जी आज सुबह से ही कुर्ता धोती पहनकर तैयार हो गए तो बेटे शिरीष ने पूछा &#8220;बाबूजी! आज कहाँ?&#8221; संघ की कोई बैठक है या कोई&#8230; </p>
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]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: right;">&#8211; गोपाल माहेश्वरी</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone  wp-image-9300" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2026/05/5.3-300x200.jpg" alt="" width="1601" height="1067" srcset="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2026/05/5.3-300x200.jpg 300w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2026/05/5.3-768x511.jpg 768w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2026/05/5.3.jpg 1014w" sizes="auto, (max-width: 1601px) 100vw, 1601px" /></p>
<p style="text-align: justify;">स्वदेशचंद्र जी आज सुबह से ही कुर्ता धोती पहनकर तैयार हो गए तो बेटे शिरीष ने पूछा &#8220;बाबूजी! आज कहाँ?&#8221; संघ की कोई बैठक है या कोई कार्यक्रम?&#8221; पिता-पुत्र दोनों ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवक थे पर उनकी शाखाएं अलग अलग। स्वदेश चंद्र जी जिन्हें सब संघी मित्र सुदेश जी पुकारते थे और अन्य मिलने जुलने वाले सुदेश बाबू, वे प्रौढ़ शाखा के स्वयंसेवक थे, जबकि शिरीष जी तरुणों की शाखा के। संघ तो एक ही है बस आयुवर्ग से कार्यालय कालखंड थोड़े अलग रखे जाते हैं। शाखा से लौटकर पिताजी को यह वेश पहनते देखा तो शिरीष को आश्चर्य हुआ उसने जिज्ञासा से ही उन्हें टोका था।</p>
<p style="text-align: justify;">&#8220;हाँ शिरीष! आज देश का एक बहुत बड़ा दिन है। बेटा! बताओ क्या है?&#8221;</p>
<p style="text-align: justify;">शिरीष सोचने लगे &#8221;वर्षप्रतिपदा तो निकल गई और हिन्दू साम्राज्य दिनोत्सव अभी आया नहीं? फिर क्या है आज?&#8221;</p>
<p style="text-align: justify;">&#8220;बहुत बड़ा दिन है बेटा! तारीख कौनसी है आज?&#8221; सुदेश जी अपनी काली टोपी ठीक करते-करते बोले।</p>
<p style="text-align: justify;">&#8220;आज तो दस मई है। आज क्या है? याद नहीं आ रहा।&#8221; शिरीष को कार्यालय जाने का समय हो रहा था वह स्नानघर में घुस गया। सुदेश जी मुस्कुराकर रह गए।</p>
<p style="text-align: justify;">तभी उनकी बहू मालती ने कहा &#8220;बाबूजी! अल्पाहार करके जाइए, पता नहीं आपको किता समय लगेगा। आप अकेले जी जाएँगे या कोई संघी-साथी आ रहे हैं?&#8221; वह मेज पर अल्पाहार लगाते-लगाते पूछ रही थी।</p>
<p style="text-align: justify;">सभी ने एक साथ बैठकर अल्पाहार किया।&#8221; आप अकेले जा रहे हैं कहीं?&#8221; शिरीष ने पूछा।</p>
<p style="text-align: justify;">&#8220;बस यहीं एमवाय तक।&#8221; सुदेश जी ने सहज ही उत्तर दिया पर बेटे-बहू चौंक पड़े। इन्दौर में एमवाय एक बहुत बड़ा अस्पताल है, महाराजा यशवंतराव होलकर चिकित्सालय। लोग संक्षेप में एम वाय एच कहते हैं पर बोलचाल में इंदौरी लोग उसे एमवाय ही कह लेते हैं।</p>
<p style="text-align: justify;">बेटे-बहू का चिंतापूर्ण भाव समझ कर सुदेश जी खिलखिलाकर हँसे और कहने लगे &#8220;बीमार नहीं हूँ, न भर्ती होना है &#8230;. अस्पताल कोई यह वेश पहनकर जाता है क्या?&#8221;</p>
<p style="text-align: justify;">&#8220;तो अस्पताल नहीं जा रहे हैं?&#8221; बहू ने पूछा।</p>
<p style="text-align: justify;">&#8220;जा तो वहीं रहा हूँ।&#8221; वे बातों के रस का आनंद लेने लगे।</p>
<p style="text-align: justify;">शिरीष को जल्दी जाना था। वह उठते हुए बोला &#8220;किसी का स्वास्थ्य  देखने या फल वगैरह बाँटने जाना होगा। अच्छा मैं तो चला, आपको वहाँ तक छोड़ दूँ?&#8221;</p>
<p style="text-align: justify;">&#8220;नहीं नहीं छावनी से एमवाय इतना दूर भी नहीं, मैं पैदल ही जाऊँगा।&#8221; वे बोले।</p>
<p style="text-align: justify;">&#8220;हाँ पर ट्राफिक खूब रहता है, सम्हलकर जाइए। अच्छा राम-राम।&#8221; शिरीष ने प्रतिदिन की भांति जाते समय पिता के चरण छुए।</p>
<p style="text-align: justify;">&#8220;दादाजी! मैं चलूं?&#8221; उनके दस वर्षीय पोते नवीन ने उनका हाथ पकड़कर मनुहार की।</p>
<p style="text-align: justify;">&#8220;चलना है?&#8221; वे सहमत होने के स्वर में बोले।</p>
<p style="text-align: justify;">तभी सात वर्ष की भारती हठ करने लगी &#8220;भैया जाएगा तो मैं भी जाऊँगी, मैं भी जाऊँगी।&#8221;</p>
<p style="text-align: justify;">मालती बोल पड़ी &#8220;बिलकुल नहीं। दादाजी को अपने काम से जाना है। वे अभी मंदिर नहीं जा रहे और बगीचे में शाम को ले जाएँगे। तंग मत करो। यहीं बैठकर ड्राईंग बनाना।&#8221;</p>
<p style="text-align: justify;">&#8220;वैसे बहू! मैं भी बच्चों को वहाँ लेजाना चाहता हूँ।&#8221;</p>
<p style="text-align: justify;">&#8220;येऽऽऽ&#8221; बच्चे ताली बजाकर उछलने लगे।</p>
<p style="text-align: justify;">&#8220;पर बाबूजी! अस्पताल में बच्चों को ले जाना ठीक होगा? उस पर सड़क पर इतना ट्राफिक, आपको परेशानी होगी।&#8221;</p>
<p style="text-align: justify;">&#8220;हम अस्पताल के अंदर रोगियों के बीच नहीं जा रहे और बच्चे जा रहे हैं तो ई-रिक्शा ले लेंगे। निश्चिंत रहो, परेशानी नहीं आनंद होगा। अभी तुम कह रही थी मैं मंदिर नहीं जा रहा हूँ। वैसे जा तो मंदिर ही रहा हूँ पर राम मंदिर या शिव मन्दिर नहीं।&#8221;</p>
<p style="text-align: justify;">&#8220;आप ले जाइए बाबूजी! भोजन के समय तक लौट आएंगे न?&#8221; मालती ने विश्वास और विनम्रतापूर्वक कहा।</p>
<p style="text-align: justify;">घर के सामने से ही जा रहे ई-रिक्शा को रोक कर तीनों में फिर एक रोचक बहस छिड़ गई। बड़ों के साथ जाते हैं तो बच्चों को न उनके न चाहने पर भी सुरक्षा की दृष्टि से बीच में बैठाया जाता था। पर आज तो बड़े केवल एक थे यानि दादाजी और बच्चे दो। नवीन ने मौका देखकर कहा &#8220;भारती सबसे छोटी है वह बीच में बैठेगी।&#8221;</p>
<p style="text-align: justify;">&#8220;नहीं भैया! साइड में, तो मैं भी साइड में ही बैठूंगी।&#8221; भारती ने हठपूर्वक प्रतिवाद किया।</p>
<p style="text-align: justify;">कोई बहुत लंबी दूरी तक तो जाना न था इसलिए सुदेश जी बोले &#8220;अच्छा, बीच में मैं बैठता हूँ।&#8221; उन्होंने सोचा बीच में बैठने से दोनों हाथों से दोनों बच्चों को सम्हालना सरल होगा। पर बच्चे भी नए युग के थे। भारती तपाक् से बोली &#8220;हाँ, दादाजी को सम्हालना हमारी जिम्मेदारी है, हम दोनों उन्हें सम्हाल लेंगे।&#8221;</p>
<p style="text-align: justify;">दादाजी के साथ रिक्शे वाला भी यह सुनकर ठहाका लगाए बिना न रह सका। दस मिनट भी न लगे कि रिक्शा गंतव्य पर आ लगा।</p>
<p style="text-align: justify;">रिक्शेवाले ने पूछा &#8220;बाबूजी! अस्पताल का गेट जरा आगे है, वहाँ उतारू।&#8221;</p>
<p style="text-align: justify;">&#8220;नहीं भाई! हमें यहाँ ही उतार दो। अस्पताल नहीं जाना है।&#8221;</p>
<p style="text-align: justify;">वे सड़क से पंद्रह बीस कदम अंदर चले गए। अंदर एक छोटे से पक्की झोंपड़ी जैसे स्थान में एक शाही पगड़ी पहने रौबीली मूछों वाले किसी महापुरुष की केवल छाती तक की प्रतिमा लगी थी। दादाजी ने उन्हें शीश झुकाया।</p>
<p style="text-align: justify;">बच्चों ने भी प्रणाम किया। नवीन ने पत्थर पर लिखा नाम पढ़ा &#8216;राणा बख्तावर सिंह&#8217;।</p>
<p style="text-align: justify;">भारती ने पूछा &#8220;दादाजी! ये कौन हैं? हम यहाँ क्यों आए हैं?&#8221;</p>
<p style="text-align: justify;">&#8220;बच्चो! ये हैं अमझेरा के राजा राणा बख्तावर सिंह जी। अंग्रेजों के विरुद्ध मालवा व निमाड़ के वनवासियों को संगठित कर स्वतंत्रता की लड़ाई लड़ते-लड़ते बलिदान देने वाले रणबांकुरों में इनका नाम सदैव अमर रहेगा।&#8221;</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone  wp-image-9302" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2026/05/5.4-1-300x225.jpg" alt="" width="1615" height="1211" srcset="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2026/05/5.4-1-300x225.jpg 300w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2026/05/5.4-1.jpg 730w" sizes="auto, (max-width: 1615px) 100vw, 1615px" /></p>
<p style="text-align: justify;">&#8220;लेकिन दादाजी! यहाँ लिखा है कि ये 10 फरवरी को बलिदान हुए थे तो हम आज यहाँ क्यों आए हैं?&#8221; नवीन ने कोतूहल से पूछा।</p>
<p style="text-align: justify;">भारती भैया से पीछे कैसे रहती? उसने भी एक प्रश्न पूछा &#8220;आप कह रहे थे ये अमझेरा के राजा थे तो हम यहाँ क्यों आए हैं?&#8221;</p>
<p style="text-align: justify;">सुदेश जी के लिए उत्तर देना आवश्यक था बल्कि बच्चों को यहाँ लाने का उद्देश्य भी इस बातचीत में पूरा हो रहा था। वे बोले &#8220;यहाँ इसलिए आए हैं कि ये नीम का पेड़ देख रहे हो न?&#8221; सुदेश जी ने पास ही स्थित एक नीम के पुराने पेड़ उस पेड़ के तने को छूकर हाथ मस्तक से लगाया। भावुकता से उनका कंठ भर आया &#8220;दुष्ट अंग्रेजों ने इसी पेड़ पर राणाजी को फांसी दी थी एकबार नहीं दो बार।&#8221;</p>
<p style="text-align: justify;">&#8220;दो बार!! दो बार क्यों? दादाजी!&#8221; नवीन ने पूछ ही लिया।</p>
<p style="text-align: justify;">&#8220;दो बार इसलिए कि राणाजी इतने हृष्ट-पुष्ट और बलशाली थे कि फांसी की रस्सी उनका भार ही न सह पाई, टूट गई।&#8221;</p>
<p style="text-align: justify;">&#8220;अच्छा!!!&#8221; बच्चों ने आश्चर्य प्रकट किया।</p>
<p style="text-align: justify;">&#8220;हाँ, और तब सारे नियम ताक पर रखकर उन्हें दोबारा फांसी दी गई। तब से यह पेड़ यहीं खड़ा, उस महान बलिदानी वीर की याद दिलाता रहता है।&#8221;</p>
<p style="text-align: justify;">भारती के प्रश्न का तो उत्तर मिल गया था पर नवीन का प्रश्न छूट रहा था। उसने प्रश्न दुहराया तो दादाजी बोले &#8220;बेटा! दुःख की बात है कि लाखों की जनसंख्या वाले इस इन्दौर महानगर में अधिकतर लोगों को तो पता भी नहीं है कि यह कितनी ऐतिहासिक जगह है। कुछ देशभक्तों के प्रयत्न से यह पेड़ कटने से बचा है। वे गिनती के लोग आते हैं उनके बलिदान दिवस पर यहाँ। लेकिन&#8230;..&#8221; वे कहते-कहते कहते जैसे वे कहीं खो गए, एमवायएच के सामने के भरपूर भीड़ वाली कोलाहल भरी सड़क का सारा शोर जैसे उनके लिए गायब हो चुका था। वे एक हाथ से उस नीम के वृक्ष को छूते हुए आकाश की ओर देखते कहने लगे &#8220;कैसे कोई बलिदानी इतने व्यस्त और बड़े महानगर में भीड़ में एकांत काट रहा है शताब्दी दर शताब्दी। मनुष्य को फांसी दी जाती है पर उसकी स्मृतियों को भी कोई ऐसे फांसी पर लटकाए रखता है क्या? स्वतंत्रता पाकर इतने कृतघ्न हो गए हैं हम?&#8221; ये उद्गार बच्चों को समझ में नहीं आ सकते पर उन्हें समझाना ही होगा यह हर दादाजी-दादीजी का कर्तव्य है कि अपने पोते-पोतियों को यह समझाएँ कि स्वतंत्रता नहीं मिली है बिना खड्ग बिना ढाल।</p>
<p style="text-align: justify;">वे कहने लगे &#8220;बच्चो! आज दस मई है। अठारह सौ सत्तावन में आज ही हमारी स्वतंत्रता के पहले महासंग्राम का आरंभ हुआ था। इतनी व्यापक क्रांति इसके पहले नहीं हुई थी कि तेरह बरस की मैना से लेकर अस्सी बरस के बाबू कुंवर सिंह एक साथ अपने-अपने स्थान पर लड़े, बलिदान हुए। तुम जानना चाहते हो न कि मैं आज यहाँ क्यों आया हूँ। अलग-अलग शरीर होते हुए भी देश की स्वतंत्रता के लिए मर-मिटने वाले सभी वीरों वीरांगनाओं का ध्येय एक ही था। देहरूप भिन्न पर ध्येयरूप एक ही। इसलिए अपने-अपने क्षेत्र के ऐसे वीर बलिदानियों को आज क्रांति दिवस पर याद कर हम उन एकात्म महापुरुषों को स्मरण करें तो उनके कभी न चुकाए जा सकने वाले ऋण को संभवतः अंशमात्र तो चुका पाएँ।&#8221;</p>
<p style="text-align: justify;">धोती के पल्लू से अपने बहते आंसू पोंछते हुए वे बच्चों सहित राणाजी को प्रणाम करके पैदल ही सड़क की भीड़ में धंस गए। पास ही चौराहे पर हनुमान मंदिर था। वे प्रणाम करने रुके। शीश झुकाए नवीन बुदबुदाते हुए कह रहा था &#8220;हे हनुमानजी महाराज! मुझे भी राणाजी जैसा वीर बनाना।&#8221;</p>
<p style="text-align: justify;">अचानक हवा का एक झोंका नीम के कुछ फूल उड़ाकर नवीन के झुके शीश पर बरसा गया। पता नहीं फूल उसी पेड़ के थे या दूसरे किसी के पर दादाजी को लगा मानो राणाजी की आत्मा आशीष देकर गुजरी है वहाँ से। फूलों की कड़वी शीतलता कितनी आरोग्यकारी थी।</p>
<p style="text-align: justify;">(लेखक इंदौर से प्रकाशित ‘देवपुत्र’ बाल मासिक पत्रिका के संपादक है।)</p>
<p><strong>और पढ़ें : <span style="color: #0000ff;"><a style="color: #0000ff;" href="https://rashtriyashiksha.com/the-resolve-of-new-bharat/" target="_blank" rel="noopener">नए भारत का संकल्प</a></span></strong></p>
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		<title>नए भारत का संकल्प</title>
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		<dc:creator><![CDATA[राष्ट्रीय शिक्षा]]></dc:creator>
		<pubDate>Mon, 18 May 2026 06:23:50 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[<p> &#8211; गोपाल माहेश्वरी &#8220;अरी मीनू! अपने पिताजी को कहना गैस सिलेंडर बुक किया कि नहीं।&#8221; &#8220;क्या माँ! अभी नया सिलेंडर लगाए चार दिन भी नहीं हुए और आपको दूसरा भरवाना&#8230; </p>
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]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: right;"> &#8211; गोपाल माहेश्वरी</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone wp-image-9296" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2026/05/5.1-300x200.jpg" alt="" width="1679" height="1119" srcset="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2026/05/5.1-300x200.jpg 300w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2026/05/5.1-1024x683.jpg 1024w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2026/05/5.1-768x512.jpg 768w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2026/05/5.1.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 1679px) 100vw, 1679px" /></p>
<p style="text-align: justify;">&#8220;अरी मीनू! अपने पिताजी को कहना गैस सिलेंडर बुक किया कि नहीं।&#8221;</p>
<p style="text-align: justify;">&#8220;क्या माँ! अभी नया सिलेंडर लगाए चार दिन भी नहीं हुए और आपको दूसरा भरवाना है!&#8221;</p>
<p style="text-align: justify;">&#8220;रसोई मुझे बनानी पड़ती है बेटी! तुम बाप-बेटी को किसी दिन भोजन एक-आध घंटा देरी से मिले तो ताना मिलता है मुझे, रहने दो, आनलाइन कुछ मंगवा लेते हैं। समझी? लेकिन समझ लो, गैस की कमी होने वाली है और बाजार में भी कई रेस्टोरेंट्स बंद हो गए हैं। गैस न मिली तो क्या पकाएंगे और क्या खाएंगे?&#8221; माँ का स्वर बहुत चिंताभरा था।</p>
<p style="text-align: justify;">&#8220;क्या माँ! ईरान की तरह मिसाइलें दाग रही हो। अरे, ऐसा कोई संकट नहीं है हम चालीस से अधिक देशों से क्रूड आइल खरीदते हैं। प्रधानमंत्री जी ने कहा है, पेनिक न हों, देश में अभी ऊर्जा का ऐसा कोई संकट नहीं है जिसका समाधान नहीं हो सके।&#8221;</p>
<p style="text-align: justify;">&#8220;थोड़ा बहुत मैं भी समझती हूँ बेटी! आज नहीं तो कल, युद्ध लंबा खिंच गया तो प्रधानमंत्री भी क्या कर लेंगे?&#8221;</p>
<p style="text-align: justify;">तभी पिताजी बाहर से आए। उनके हाथों में एक समाचार पत्र था। पहले ही पृष्ठ पर आधे पन्ने का बड़ा-सा चित्र छपा था जिसमें पेट्रोल पंपों पर भारी भीड़ दिख रही थी। वे बोले &#8220;हद है मूर्खता की किसी ने कहा, कौआ कान ले गया तो कान नहीं देखेंगे कौए के पीछे दौड़ने लगेंगे।&#8221;</p>
<p style="text-align: justify;">&#8220;क्या हुआ? किसे मूर्खता का प्रमाणपत्र बांट रहे हो?&#8221; माँ का स्वर थोड़ा व्यंग्य भरा था।</p>
<p style="text-align: justify;">&#8220;ये पेट्रोल डीजल के लिए बिना जरूरत भीड़ लगाने वालों को।&#8221; वे समाचार पत्र पर चित्र दिखाने लगे।</p>
<p style="text-align: justify;">माँ जैसे उनसे सहमत न थी, बोलीं &#8220;जमाने को जाने दो, आपने अपनी कार और दोनों टूव्हीलर में फुलटैंक करवा लिया है न?&#8221;</p>
<p style="text-align: justify;">पिताजी चिढ़ गए &#8220;अच्छा ऐसा करो कुछ ड्रम-कनस्तर भी दे दो, वह भी भरवा लेता हूँ। कहो तो लीटर दो-दो लीटर पी भी लें। थोड़ा स्टोर हो जाएगा।&#8221;</p>
<p style="text-align: justify;">मीना समझ गई। घर में भी पेट्रोल और गैस महायुद्ध मचवा देंगे। अब उसे जैसे युद्धरत देशों में भारत जैसी भूमिका निबाहना थी। वह माता-पिता की चिंता समझ रही थी। लेकिन पिताजी वास्तविक परिस्थिति  से परेशान थे और माँ काल्पनिक चिंता से ग्रसित थीं। तीन दिन का ईंधन उनकी गाड़ियों में भी था और दो महिने की गैस रसोई में भी। लेकिन अफवाहों का बाजार गर्म था एकदम निराधार संकट का आभासी भय अधिकांश को निर्बुद्ध बना रहा था।</p>
<p style="text-align: justify;">मीना ने वातावरण बदलने का प्रयास करते हुए कहा &#8220;माँ! पिताजी! मेरा परीक्षा-परिणाम आ गया है और मैं हमेशा की तरह प्रथम आई हूँ।&#8221;</p>
<p style="text-align: justify;">&#8220;अरे वाह! शाबास बेटी! बधाई, बधाई।&#8221; पिताजी ने उसे बगल में सटाते हुए कहा। माँ भी रसोई से निकलकर हाथ पोंछते हुए आई &#8220;शाबास मेरी बेटी! तेरी सारी मेहनत सफल हुई।&#8221; वे ममता से बेटी के सिर पर हाथ फेर रहीं थीं।</p>
<p style="text-align: justify;">&#8220;ना माँ पिताजी! ऐसे खाली-माली बधाई नहीं, आपने वचन दिया था जो मांगूंगी मिलेगा।&#8221;</p>
<p style="text-align: justify;">&#8220;हाँ हाँ, बता क्या चाहिए?&#8221; पिताजी ने कहा।</p>
<p style="text-align: justify;">माँ ने भी प्रोत्साहित करते हुए बोली &#8220;बता बता, क्या चाहिए?&#8221;</p>
<p style="text-align: justify;">&#8220;मुझे जाना है पूरी छुट्टी कहीं घूमने।&#8221;</p>
<p style="text-align: justify;">&#8220;घूमने? पर बेटा अभी जैसी परिस्थिति चल रही है उसमें बाहर कहीं फंस गए तो गाड़ी का और अपना पेट भरना कठिन हो जाएगा।&#8221;</p>
<p style="text-align: justify;">पिताजी बोले तो मीना के मस्तिष्क ने तुरंत खतरे की घंटी बजा दी कि कहीं फिर वही विषय न छिड़ जाए? क्योंकि पिताजी भी कहीं मन के एक कोने में आशंका तो पाले बैठे ही थे।</p>
<p style="text-align: justify;">&#8220;पिताजी! मैं और मेरे सभी सहपाठियों ने इस बार एक अनोखी योजना बनाई है। हम सब इन छुट्टियों में सपरिवार अपने उन रिश्तेदारों से मिलने जाएंगे जो गांवों में रहते हैं।&#8221;</p>
<p style="text-align: justify;">&#8220;और इससे क्या होगा?&#8221; माँ ने पूछा।</p>
<p style="text-align: justify;">&#8220;इससे मेरे देश को सहायता मिलेगी।&#8221;</p>
<p style="text-align: justify;">&#8220;कैसी सहायता? गाँव जाने से देश की समस्या का क्या संबंध?&#8221;</p>
<p style="text-align: justify;">&#8220;संबंध है। यह ऊर्जा संकट हमेशा नहीं रहेगा। अभी यदि इसके बढ़ने की जितनी भी संभावना है उससे निपटने के लिए हम चलें अपने गांवों की ओर। एक तो वहाँ ऊर्जा के विकल्प सुलभ हैं। हम अपने फ्लेटों में चूल्हा नहीं जला सकते पर गांवों में सब जगह लकड़ी कंडे हैं, चूल्हे हैं। कई जगह गोबर गैस प्लांट है।&#8221;</p>
<p style="text-align: justify;">&#8220;इंडक्शन चूल्हे तो यहाँ भी ले रहे हैं लोग।&#8221; माँ ने कहा।</p>
<p style="text-align: justify;">&#8220;माँ! गर्मियों में वैसे ही बिजली की खपत अधिक होती है। सब गैस की जगह इंडक्शन चलाएंगे तो बिजली का भी संकट होने लगेगा। भोजन बनाने के अलावा कितने ही काम हैं जिनमें बिजली चाहिए ही चाहिए। तब?&#8221;</p>
<p style="text-align: justify;">&#8220;मैं तो सोलर कूकर लाने की भी सोच रहा हूँ।&#8221; पिताजी ने जोड़ा।</p>
<p style="text-align: justify;">&#8220;सोलर कूकर के लिए सबको छत या खुला आँगन चाहिए, वह शहरों में सबको कहाँ मिलेगा? यह एक अच्छा उपाय है पर सबके लिए संभव नहीं।&#8221;</p>
<p style="text-align: justify;">&#8220;ऐसे तो सब शहर छोड़कर गाँव चल दिए तो गाँव इतने मेहमानों के बोझ से ही समाप्त हो जाएंगे। सब लकड़ी जलाएंगे तो बचे-खुचे जंगल भी गंजे हो जाएंगे रेगिस्तान बन जाएंगे।&#8221; पिताजी जैसे बेटी की प्रसन्न होकर परीक्षा ले रहे थे।</p>
<p style="text-align: justify;">मीना ने अपनी तार्किक क्षमता का परिचय देते हुए कहा &#8220;जी नहीं पिताजी! सबको नहीं, जो जा सकते हैं उतनों के ही जाने से काम चल जाएगा। जिन्हें बहुत आवश्यक है या जिनके कोई रिश्तेदार गांवों में नहीं हैं वे यहीं रहें न? पेट्रोल, डीजल, गैस बिल्कुल खत्म तो नहीं हुए हैं। उपयोग कम होगा तो लंबे समय इस बिन बुलाए संकट की घड़ी को पार कर जाएंगे हम। दूसरे आपने कहा पेड़ नहीं बचेंगे। बताइए पिताजी! बिजली तो हर व्यक्ति नहीं बना सकता पर पेड़ तो लगा सकता है न? ठीक है पेड़ दो-चार दिन में नहीं बढ़ते पर दो-चार पीढ़ियों तक चलते हैं, उनसे आवश्यकता भर ईंधन लेना हो तो पूरा काट देना मूर्खता है, जैसे सोने का अंडा देने वाली मुर्गी को लालच में मार डालने वाले मूर्ख की कहानी है। या चमड़े के लिए भैंस मार देने का मुहावरा। हो सकता है गाँव पहुँचने वाले अतिथि न बनकर, अपने बन कर रहें तो उपयोग की गई लकड़ी से अधिक ही पेड़ गांवों को मिल जाएं।&#8221;</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone wp-image-9297" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2026/05/5.2-300x200.jpg" alt="" width="1616" height="1077" srcset="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2026/05/5.2-300x200.jpg 300w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2026/05/5.2-1024x683.jpg 1024w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2026/05/5.2-768x512.jpg 768w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2026/05/5.2-1536x1024.jpg 1536w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2026/05/5.2.jpg 2048w" sizes="auto, (max-width: 1616px) 100vw, 1616px" /></p>
<p style="text-align: justify;">पिताजी संतुष्ट दिखे फिर भी एक प्रश्न और उछाल ही दिया &#8220;लकड़ी, कंडे प्रदूषण नहीं फैलाएंगे?&#8221;</p>
<p style="text-align: justify;">&#8220;हाँ, कुछ प्रदूषण होगा पर शहरों के एसी और वाहनों से कम। फिर ये जो लड़ने वाले देश बारूदी धुंए का जहर हवा में घोल रहे हैं इसे अपने देश की सीमाओं तक ही तो रोके नहीं रहेंगे, यह तो लड़ने, न लड़ने वाले सब देशों के प्राणी मात्र के लिए अचूक खतरा है न पिताजी! चूल्हे का धूंए का प्रदूषण तो किसी सीमा तक तो प्राकृतिक एयर क्यूरीफायर यानि पेड़ सोंख लेंगे पर युद्ध की ये रासायनिक गैसें?&#8221;</p>
<p style="text-align: justify;">&#8220;ठीक है बेटी! तुम्हारा प्रस्ताव उचित है। हम कल ही अपने गाँव चलेंगे। मैं आठ-दस दिन रहकर लौट आऊंगा। तुम पूरी छुट्टियां बिताकर आ सकते हो।&#8221;</p>
<p style="text-align: justify;">&#8220;धन्यवाद पिताजी! मुझे अपना पुरस्कार मिल गया। बहुत-बहुत धन्यवाद।&#8221; मीना ने हर्ष व्यक्त किया।</p>
<p style="text-align: justify;">&#8220;अच्छा आपके विचार से प्रभावित होकर एक आलेख लिखने का मन बना है अनुमति है मीना जी!&#8221; पिताजी थोड़ी नाटकीयता के साथ कहने लगे तो सबके मुखड़े खिल उठे।</p>
<p style="text-align: justify;">उत्साहित मीना ने तपाक् से कहा &#8220;पहले हमें बताइए लेखक महोदय! आप विषय की अभिव्यक्ति कैसे करेंगे, तब अनुमति रहेगी।&#8221;</p>
<p style="text-align: justify;">पिताजी ने हँसते हुए कहा &#8220;जो आपकी इच्छा।&#8221; फिर वे थोड़ी गंभीरतापूर्व क कहने लगे &#8220;देखो, विश्व समस्या में है, हमारा देश संभावित बड़े संकट की आहट अनुभव कर रहा है ऐसे में सरकार को कोसने या उसी के भरोसे बैठे रहने की अपेक्षा हमें अपने स्तर पर कुछ समाधान खोजना चाहिए यह हमारा नागरिक कर्तव्य है। हम प्रकृति की रक्षा और प्रदूषण कम करने के उपाय सोच रहे हैं यह पर्यावरण संरक्षण है। गाँव जाना, परिवार और रिश्तेदारों से मिलना उनके साथ रहना कुटुंब व्यवस्था सुदृढ़ करने का ही महत्वपूर्ण उपक्रम है। हम अपनी परंपराओं में आश्रय खोजें, अपनी धरती, संस्कृति और परंपराओं में रचें-बसें और अपने हर संभव त्याग से जिन्हें अधिक आवश्यकता है उनके लिए सुविधा कर सके यह हमारी संस्कृति है। हम शहरवासी अधिक सभ्य हैं और गांवों में रहने वाले गंवार यह भेद मिटाकर उनकी सरलता, निश्छलता और अपनत्व को अपनाना यह समरसता है। हाँ, यह अपनत्व अभी हम संकट में हैं इसलिए अनुभव करें यह स्वार्थ होगा पर संकट के कारण ही सही इस प्रकार उनका महत्व अनुभव हो, उनसे लगाव बढ़े यह बड़ी महत्वपूर्ण पहल होगी। इसलिए इन छुट्टियों में ऊर्जा संकट से निपटने के बहाने ही सही हमें अपनी ग्रामवासिनी भारत माता की सेवा करने, ममता पाने का अवसर मिल जाए और यह हमारे मन में सच्ची भक्ति और लगाव बन जाए तो भारत को वह अक्षय ऊर्जा प्राप्त रहेगी जो हर संकट पर भारी होगी।&#8230;&#8230;क्या कहतीं हैं आप, ठीक है यह?&#8221;</p>
<p style="text-align: justify;">&#8220;एक बात रेखांकित आप भूल रहे हैं लेखक महोदय! यह उपाय बच्चों ने सुझाया है यानि यह है नए भारत का शुभ संकल्प।&#8221;</p>
<p style="text-align: justify;">सभी ने ताली बजाकर इस परिवार सभा का विसर्जन किया उन्हें गाँव जाने की तैयारी जो करनी थी।</p>
<p style="text-align: justify;">(लेखक इंदौर से प्रकाशित ‘देवपुत्र’ बाल मासिक पत्रिका के संपादक है।)</p>
<p><strong>और पढ़ें : <a href="https://rashtriyashiksha.com/live-for-the-country/" target="_blank" rel="noopener">देश के लिए जियें</a></strong></p>
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		<title>छोटे का गांव</title>
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		<dc:creator><![CDATA[राष्ट्रीय शिक्षा]]></dc:creator>
		<pubDate>Fri, 24 Apr 2026 10:16:27 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[कहानी@पंच परिवर्तन]]></category>
		<category><![CDATA[नवीनतम]]></category>
		<category><![CDATA[श्री रवि कुमार जी]]></category>
		<category><![CDATA[आधुनिकता]]></category>
		<category><![CDATA[किसान]]></category>
		<category><![CDATA[ग्राम्यजीवन]]></category>
		<category><![CDATA[जलसंकट]]></category>
		<category><![CDATA[परंपरा]]></category>
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		<category><![CDATA[मरुभूमि]]></category>
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					<description><![CDATA[<p> &#8211; रवि कुमार मरुभूमि में फलोदी के पास एक गांव में एक किसान रहता था। उसके दो पुत्र व एक पुत्री थी। किसान के पास कृषि योग्य भूमि भी अधिक&#8230; </p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: right;"> &#8211; रवि कुमार</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone wp-image-9289" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2026/04/wgdiCEpUdTfEYEjAxFUBjkkHCjrbgtFKEB7rU2c3-AQ7LnaZq5MTTdBqM0mYT0G0xvo5xsC1EkdfWu4HtHXEXq-KhpsSV-cXgYwk2Z900Vyqn97TEFWxZKYXVCci4qFZMm3VXB_v9I0Y-t1yudc9vDRqxrYp-FUIo3kPdQ2_qxKSZnt6-kbWX39Xv7-tcUW3-300x201.jpg" alt="" width="1624" height="1088" srcset="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2026/04/wgdiCEpUdTfEYEjAxFUBjkkHCjrbgtFKEB7rU2c3-AQ7LnaZq5MTTdBqM0mYT0G0xvo5xsC1EkdfWu4HtHXEXq-KhpsSV-cXgYwk2Z900Vyqn97TEFWxZKYXVCci4qFZMm3VXB_v9I0Y-t1yudc9vDRqxrYp-FUIo3kPdQ2_qxKSZnt6-kbWX39Xv7-tcUW3-300x201.jpg 300w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2026/04/wgdiCEpUdTfEYEjAxFUBjkkHCjrbgtFKEB7rU2c3-AQ7LnaZq5MTTdBqM0mYT0G0xvo5xsC1EkdfWu4HtHXEXq-KhpsSV-cXgYwk2Z900Vyqn97TEFWxZKYXVCci4qFZMm3VXB_v9I0Y-t1yudc9vDRqxrYp-FUIo3kPdQ2_qxKSZnt6-kbWX39Xv7-tcUW3-1024x686.jpg 1024w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2026/04/wgdiCEpUdTfEYEjAxFUBjkkHCjrbgtFKEB7rU2c3-AQ7LnaZq5MTTdBqM0mYT0G0xvo5xsC1EkdfWu4HtHXEXq-KhpsSV-cXgYwk2Z900Vyqn97TEFWxZKYXVCci4qFZMm3VXB_v9I0Y-t1yudc9vDRqxrYp-FUIo3kPdQ2_qxKSZnt6-kbWX39Xv7-tcUW3-768x515.jpg 768w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2026/04/wgdiCEpUdTfEYEjAxFUBjkkHCjrbgtFKEB7rU2c3-AQ7LnaZq5MTTdBqM0mYT0G0xvo5xsC1EkdfWu4HtHXEXq-KhpsSV-cXgYwk2Z900Vyqn97TEFWxZKYXVCci4qFZMm3VXB_v9I0Y-t1yudc9vDRqxrYp-FUIo3kPdQ2_qxKSZnt6-kbWX39Xv7-tcUW3.jpg 1343w" sizes="auto, (max-width: 1624px) 100vw, 1624px" /></p>
<p style="text-align: justify;">मरुभूमि में फलोदी के पास एक गांव में एक किसान रहता था। उसके दो पुत्र व एक पुत्री थी। किसान के पास कृषि योग्य भूमि भी अधिक थी। दोनों पुत्रों व पुत्री की प्रारम्भिक शिक्षा गांव के ही विद्यालय में हुई। आगे की शिक्षा के लिए छोटे पुत्र को बड़े नगर में भेज दिया और बड़ा पुत्र व पुत्री की आगे की शिक्षा फलोदी में हुई।</p>
<p style="text-align: justify;">मरुभूमि में जल की उपलब्धता सीमित ही रहती है। सीमित जल में ही कृषि कार्य, पशुधन का पोषण व जीवनयापन यहां का वैशिष्ट्य है। इस वैशिष्टय के साथ यह किसान परिवार भी जीवन जीता रहा। छोटा पुत्र बड़े नगर से अपनी शिक्षा पूर्ण कर गांव में ही आ गया। दोनों पुत्रों की इच्छा थी कि अपना आगे का जीवन गांव में ही रहकर चलेगा, नगर की ओर प्रस्थान नहीं करेंगे। पुत्री भी बड़ी हो गई, उसका भी विवाह कुशलता से हो गया और वह अपने ससुराल में रहने लगी।</p>
<p style="text-align: justify;">किसान की आयु अधिक होने लगी और आयु का प्रभाव शारीरिक क्षमताओं पर दिखने लगा। उसे लगा कि जीवित रहते दोनों भाइयों में सम्पत्ति का बंटवारा कर दूं ताकि बाद में कोई कठिनाई न हो। इस विषय की चर्चा घर में चलते ही दोनों पुत्र नहीं माने। परिवार व गांव का संस्कार जो उनमें था। पर पिताजी का आज्ञा कैसे टाल सकते थे। पिताजी ने बराबर बराबर संपत्ति का बंटवारा कर दिया।</p>
<p style="text-align: justify;">पिताजी के देहांत के पश्चात दोनों पुत्रों का परिवार अपने अपने भाग में रहने लगा। छोटा पुत्र बड़े नगर में रहकर आया था। कभी कभी उसके मन में वहां की चकाचौंध स्मरण हो आती थी। इस मनोभाव का प्रभाव धीरे धीरे उसके व्यवहार व जीवन पर भी होने लगा था।</p>
<p style="text-align: justify;">बहन जब घर पर आती तो उसे भी वह सब दिखने लगा था। उसका मन छोटे के यहां कम व बड़े के यहां अधिक लगता था। छोटे भाई की तुलना में बड़े भाई का व्यवहार, खान-पान, रहन-सहन, जीवन आदि पर ग्राम्य जीवन की छाप दिखाई देती थी। छोटा कभी कभी बड़े भाई को सुझाव भी दे देता था, &#8220;भैया, दुनिया कहां से कहां पहुंच गई है। आप अभी भी पुराने युग में जी रहे हैं। आधुनिकता को अपनाओ।&#8221; बड़ा मुस्कराकर बात को टाल देता था। कोई उत्तर नहीं देता था।</p>
<p style="text-align: justify;">एक दिन उस गांव में एक संत पधारे। बहुत लंबे समय बाद उस संत का उस गांव में आना हुआ। दोनों भाइयों के पिताजी इन संत के भक्त रहे थे। पिताजी जब जीवित थे तब ये संत उस गांव में पधारे थे और इसी परिवार में उनका आवास, सत्संग-प्रवचन कार्यक्रम हुआ था। इस बार भी यहीं रुके बड़े भाई के घर।</p>
<p style="text-align: justify;">दिन में ग्रामवासियों के साथ भेंट का कार्यक्रम था। इस कार्यक्रम के दौरान छोटा भाई भी दर्शन व सान्निध्य हेतु आया था। संत ने पूछा, &#8220;गांव में कैसा है सब?&#8221; गांव के लोगों ने जैसा जैसा था, वैसा उल्लेख किया। संत ने छोटे भाई से पूछा कि “तुम्हारा कैसा चल रहा है जीवन।” छोटे ने उत्तर दिया, &#8220;बहुत अच्छा चल रहा है।&#8221; संत ने पुनः पूछा, &#8220;सब अच्छा चल रहा है या तुम्हें लगता है कि अच्छा चल रहा है?&#8221; छोटे ने कहा कि गुरुवर आपका आशय मैं समझा नहीं।</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone wp-image-9291" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2026/04/xRkP8Dlp8BAVe7wlSkw3vkCMXrk8qrkWfjTNK1vkaByf6aQQaVScTfG4G7Zts8PfLeUc7Cr_f93JYJR2t9cc9tTF_47hNG2gdQqWIvCRG13CkwMXrn3UaFji4IMhe3-6BY-O-fLtU7lCi7M9K4uibJAwKSuMRvaENOWOq778zc1LMdiYmxlD4tkAnBfuX7k-300x200.jpg" alt="" width="1679" height="1119" srcset="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2026/04/xRkP8Dlp8BAVe7wlSkw3vkCMXrk8qrkWfjTNK1vkaByf6aQQaVScTfG4G7Zts8PfLeUc7Cr_f93JYJR2t9cc9tTF_47hNG2gdQqWIvCRG13CkwMXrn3UaFji4IMhe3-6BY-O-fLtU7lCi7M9K4uibJAwKSuMRvaENOWOq778zc1LMdiYmxlD4tkAnBfuX7k-300x200.jpg 300w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2026/04/xRkP8Dlp8BAVe7wlSkw3vkCMXrk8qrkWfjTNK1vkaByf6aQQaVScTfG4G7Zts8PfLeUc7Cr_f93JYJR2t9cc9tTF_47hNG2gdQqWIvCRG13CkwMXrn3UaFji4IMhe3-6BY-O-fLtU7lCi7M9K4uibJAwKSuMRvaENOWOq778zc1LMdiYmxlD4tkAnBfuX7k-1024x682.jpg 1024w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2026/04/xRkP8Dlp8BAVe7wlSkw3vkCMXrk8qrkWfjTNK1vkaByf6aQQaVScTfG4G7Zts8PfLeUc7Cr_f93JYJR2t9cc9tTF_47hNG2gdQqWIvCRG13CkwMXrn3UaFji4IMhe3-6BY-O-fLtU7lCi7M9K4uibJAwKSuMRvaENOWOq778zc1LMdiYmxlD4tkAnBfuX7k-768x512.jpg 768w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2026/04/xRkP8Dlp8BAVe7wlSkw3vkCMXrk8qrkWfjTNK1vkaByf6aQQaVScTfG4G7Zts8PfLeUc7Cr_f93JYJR2t9cc9tTF_47hNG2gdQqWIvCRG13CkwMXrn3UaFji4IMhe3-6BY-O-fLtU7lCi7M9K4uibJAwKSuMRvaENOWOq778zc1LMdiYmxlD4tkAnBfuX7k.jpg 1180w" sizes="auto, (max-width: 1679px) 100vw, 1679px" /></p>
<p style="text-align: justify;">संत ने कहा, &#8220;मेरा आशय तुम्हारी जीवन शैली से है, खान-पान, रहन-सहन, व्यवहार आदि से। गांव में बड़ी चर्चा है कि तुम बड़े आधुनिक होते जा रहे हो और अन्यों को भी आधुनिक जीवन जीने के लिए प्रेरित करते रहते हो।&#8221;</p>
<p style="text-align: justify;">&#8220;गुरुवर, आपने सही सुना है। मैं तो बड़े भैया को भी निवेदन करता रहता हूँ, पर वे मानते ही नहीं। हंसकर टाल देते है मेरी बात। आप ही समझाइए इन्हें।&#8221; छोटे ने कहा।</p>
<p style="text-align: justify;">संत ने कहा, &#8220;आधुनिक होना गलत नहीं है। पर किस बात को आधुनिक कहा जाए, ये विचारणीय प्रश्न है।” सबने बड़ी जिज्ञासा भरी नजरों से संत की ओर देखा। संत ने आगे कहा, “घर के आंगन व आसपास पेड़-पौधे न होना आधुनिक है? प्रकृति के निकट न होकर प्रकृति से दूर होना आधुनिक है? घर का सौंदर्य अच्छा करने के लिए बड़े-पुराने फलदार व औषधीय पेड़ों को काटकर उस लकड़ी का प्रयोग करना आधुनिक है?&#8221;</p>
<p style="text-align: justify;">उनमें से एक युवा ने प्रश्न किया, “क्या नगरीय जीवन शैली अपनाना गलत है?” संत ने उत्तर दिया, “आप ही सोचो कि ग्राम्य जीवन की परंपराओं को छोड़कर नगरीय जीवन की बातें जो पश्चिम से आई है, उन्हें अपनाना क्या आधुनिक माना जाएगा?”</p>
<p style="text-align: justify;">संत की बातें सुनकर वहां शून्यता छा गई, समय जैसे रुक-सा गया हो। छोटे को भी समझ आ रहा था कि मैंने आधुनिकता के नाम पर क्या किया है और इसी आधुनिकता के लिए गांव में मैं जो प्रेरणा दे रहा था, वह कुछ और ही था। वहां उपस्थित कुछ युवा जो छोटे की बातों से अब तक सहमत होते थे, उनकी आंखें खुल रही थी।</p>
<p style="text-align: justify;">(लेखक विद्या भारती जोधपुर प्रान्त के संगठन मंत्री है।)</p>
<p><strong>और पढ़ें : <span style="color: #0000ff;"><a style="color: #0000ff;" href="https://rashtriyashiksha.com/rally-of-pratap/" target="_blank" rel="noopener">प्रताप की रैली</a></span> </strong></p>
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