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	<title>लेखक Archives - राष्ट्रीय शिक्षा : शिक्षा में समाज प्रबोधन rashtriyashiksha.com</title>
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	<description>सा विद्या या विमुक्तये</description>
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	<title>लेखक Archives - राष्ट्रीय शिक्षा : शिक्षा में समाज प्रबोधन rashtriyashiksha.com</title>
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		<title>पंचमुख से पंच परिवर्तन</title>
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		<dc:creator><![CDATA[राष्ट्रीय शिक्षा]]></dc:creator>
		<pubDate>Wed, 30 Sep 2026 02:55:09 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[कथा-कहानी]]></category>
		<category><![CDATA[गोपाल माहेश्वरी]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>&#8211; गोपाल माहेश्वरी पूरा पूजा घर मोगरे के ताजे फूलों की सुगन्ध से महक रहा था। एक सुंदर सिंहासन पर शिव, विष्णु, गणेश, सूर्य और देवी की उज्ज्वल प्रतिमाएँ विराजमान&#8230; </p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: right;">&#8211; गोपाल माहेश्वरी</p>
<p style="text-align: justify;">पूरा पूजा घर मोगरे के ताजे फूलों की सुगन्ध से महक रहा था। एक सुंदर सिंहासन पर शिव, विष्णु, गणेश, सूर्य और देवी की उज्ज्वल प्रतिमाएँ विराजमान थी। पं.अभिनव शुक्ल मंद्र गंभीर स्वरों में मंत्रोच्चारण कर रहे थे। उनका व्यक्तित्व बड़ा ही प्रभावशाली था। ऊँची-पूरी सुगठित गौरांग देह जिस पर सफेद धोती और वैसा ही उत्तरीय ओढ़े वक्ष पर रुद्राक्ष माला धारण किए शुभ्र चमकदार दाढ़ी-मूंछों और कांधे तक लंबे बाल एक अद्भुत आकर्षण रखते थे। मस्तक पर सुंदर सा भस्म त्रिपुण्ड्र उनमें किसी प्राचीन ऋषि जैसी आभा प्रकट कर रहा था। इस समय उन्हें देखकर कौन कह सकता था कि वे पर्यावरण विषय के जाने-माने प्राध्यापक हैं।</p>
<p style="text-align: justify;">ग्रीष्मावकाश होने से उनकी नातिन पल्लवी और नाती सौरभ भी आए हुए थे। अपने ममेरे भाई बहिन साधना, लता और पुष्प से उनकी जोड़ी खूब बैठती थी। पूजा घर से आरती की घंटी बज उठी तो घर के सभी सदस्य अपने हाथों के काम तत्काल छोड़कर पूजा घर की ओर चल पड़े। अभिनव जी की पत्नी तुलजा अपनी पंचानवे वर्षीय बूढ़ी सास को व्हीलचेयर पर ले आई।</p>
<p style="text-align: justify;">सभी ने ताली बजाते हुए आरती गाई, पुष्पांजलि अर्पित की और प्रसाद के लिए हथेली फैला दीं। प्रसाद लेकर अभिनव जी ने अपनी माँ के चरण छुए फिर सब छोटों ने अपने से बड़ों के चरण छुए। समवयस्क बच्चों में आपस में पैर छूने छुलवाने का यह संस्कार बड़ा विनोद उत्पन्न करता था।</p>
<p style="text-align: justify;">अब सभी एक साथ अल्पाहार करने बैठे। यह समय एक प्रकार से परिवार की मुक्त चर्चा का समय होता था। गरमागरम हलुआ और दो तीन तरह के पापड़ का अल्पाहार करते हुए चर्चा चल पड़ी।</p>
<p style="text-align: justify;">पल्लवी ने पूछा “नानाजी! हमारे विद्यालय में सब बच्चों को एक पुस्तक दी गई है ‘पंच परिवर्तन’। आचार्य जी ने इसके संबंध में हमें समझाया भी।”</p>
<p style="text-align: justify;">“अरे वाह! क्या तुम वह पुस्तक साथ लाई हो? क्या विषय है उसका? पंच परिवर्तन क्या हैं?”</p>
<p style="text-align: justify;">यद्यपि अभिनव जी पहले से जानते थे कि पंच परिवर्तन से क्या तात्पर्य है लेकिन विषय बच्चों ने कितना समझा यह जानने का सुंदर अवसर जानकर वे अनजान बन रहे थे।</p>
<p style="text-align: justify;">पंच परिवर्तन यानि पांच ऐसे कर्तव्य या कहिये महत्वपूर्ण बिन्दु जिन पर आज हमें सबसे अधिक ध्यान देना आवश्यक है। इनकी उपेक्षा की तो हम पर और सब पर भी इसका बुरा प्रभाव होगा।”</p>
<p style="text-align: justify;">“अच्छा!! और वह भला कैसे?” अभिनव जी बोले।</p>
<p style="text-align: justify;">“वह ऐसे कि इन पांच बातों का संबंध हमारे स्वयं से है हमारे परिवार, समाज, देश और सारी धरती से भी है।” सौरभ ने भी चर्चा में सम्मिलित होते हुए कहा। वे दोनों ही सरस्वती शिशु मंदिर के छात्र थे और दोनों को यह पुस्तक मिली थी।</p>
<p style="text-align: justify;">“ऐसे क्या विषय हैं?” पुष्प ने जिज्ञासा प्रकट की।</p>
<p style="text-align: justify;">“पहला है पर्यावरण संरक्षण दूसरा परिवार प्रबोधन।” पल्लवी ने कहा तो सौरभ ने टोका।</p>
<p style="text-align: justify;">“गलत ,गलत। पहला है स्व का बोध फिर सामाजिक समरसता फिर पर्यावरण।”</p>
<p style="text-align: justify;">“वैसे पुस्तक में तीसरे क्रम पर नागरिक कर्तव्य है भाई!” पल्लवी ने उसे टोका।</p>
<p style="text-align: justify;">तभी अभिनव जी उठे और अपने कक्ष से एक पुस्तक उठा लाए। मुस्कुराते हुए बच्चों को दिखाते हुए पूछा “वह यही पुस्तक है क्या?”</p>
<p style="text-align: justify;">“अरे! यह आपके पास भी है? हम तो समझे थे यह हम शिशु मंदिर के बच्चों के लिए ही है।”</p>
<p style="text-align: justify;">“हाँ हाँ, यह हमने भी पढ़ी है।” पुष्प और साधना एक-साथ चहककर बोल पड़े। अब उनका यह संकोच छूमंतर हो गया था कि पल्लवी और सौरभ किसी ऐसे विषय पर बात कर रहे हैं जिसे वे नहीं जानते।</p>
<p style="text-align: justify;">अब अभिनव जी ने समझाना आरंभ किया “देखो इन विषयों में कोई पहले दूसरे चौथे पांचवें नहीं है। तुमने पूजा घर में देखा न, गणेश जी को केन्द्र में बैठा दो तो गणेश पंचायतन और दुर्गा जी को बैठा दो तो देवी पंचायतन। ऐसा ही बाकी देवताओं के लिए भी।”</p>
<p style="text-align: justify;">बच्चों के हाव-भाव से लगा कि विषय अधिक स्पष्ट नहीं हुआ। वे भी पक्के शिक्षक थे। हार कैसे मानते तत्काल प्रयोग बदला। बोले लता तुम उठो यहाँ खड़ी रहो, पल्लवी इसके पास फिर सौरभ फिर पुष्प और साधना। चलो अब सब अपने पास वाले के हाथ पकड़ लो और घेरा बना लो फिर एक-साथ&#8230;..”</p>
<p style="text-align: justify;">“उपविश” बच्चों ने ही कह दिया और खिलखिलाते हुए हँसकर बैठ गए। अभिनव जी भी अब बच्चे ही बन गए थे जैसे वे उनके बीच बैठ गए और बोले अच्छा अब मैं जो क्रम कहूँ वह बच्चा मुझे छुए। सही निकला तो दो आम पुरस्कार मिलेगा और गलती हुई तो एक ही। ठीक है?” उन्होंने सामने पानी भरे बड़े भगौने में डूब रहे देसी आमों की ओर अंगुली दिखाकर कहा। बच्चों के हर्षनाद से घर गूंज उठा।</p>
<p style="text-align: justify;">अभिनव जी बोले “तीन”</p>
<p style="text-align: justify;">पल्लवी ने उन्हें छुआ और पुष्पा ने भी।</p>
<p style="text-align: justify;">“दोनों सही जाओ दो दो आम ले लो।” यह कैसे दादाजी लता ने आपत्ति ली।</p>
<p style="text-align: justify;">“अरे! गलत हुआ क्या? बैठो बैठो वापस बैठो।” बच्चे बैठ गए तो उन्होंने साधना से आरंभ किया “एक दो तीन। हुई न पल्लवी तीसरी?”</p>
<p style="text-align: justify;">“फिर पुष्प कैसे तीसरा हुआ?” सौरभ रूठे स्वर में बोला।</p>
<p style="text-align: justify;">अभिनव जी ने पल्लवी से गिनना आरंभ किया “एक, दो, यह पुष्प तीन।”</p>
<p style="text-align: justify;">“ऐसे तो सभी तीसरे हैं।” पल्लवी बोली।</p>
<p style="text-align: justify;">“और सभी पहले या दूसरे, चौथे, पांचवें भी।”</p>
<p style="text-align: justify;">“यही तो पंच परिवर्तन भी ऐसे ही तो हैं।” अभिनव जी ठहाका लगाकर बोले।” अच्छा चलो पहले आम सभा हो जाए फिर आम सभा करेंगे।”</p>
<p style="text-align: justify;">“मतलब?” लता ने चौंककर कहा।</p>
<p style="text-align: justify;">“मतलब आम चूसते चूसते बातें करेंगे।”</p>
<p style="text-align: justify;">“जो अधिक बात बताएगा उसे अधिक आम &#8230;” सौरभ उत्साह से बोला।</p>
<p style="text-align: justify;">“नहीं सबसे कम आम मिलेंगे!” साधना बोली।</p>
<p style="text-align: justify;">“अरे! ऐसा कैसे?” पुष्प ने पूछा।</p>
<p style="text-align: justify;">“अरे, जो जितनी देर बोलेगा उतनी देर आम कैसे चूसेगा?” पल्लवी ने सोचकर बताया।</p>
<p style="text-align: justify;">“तब कोई बोलेगा ही क्यों?” सौरभ ने हाथ हिलाकर कर कहा।</p>
<p style="text-align: justify;">“पास आओ एक रहस्य है” पाँचों के सिर पलभर भिड़े फिर एक सामूहिक ठहाके साथ अलग हुए। तय हुआ कि दादाजी अधिक बोलेंगे हम बात शुरू कर रस लेते हुए सुनेंगे तो आम के आम और गुठलियों के दाम।</p>
<p style="text-align: justify;">बाल योजना को सफल बनाने में सहयोग देते हुए अभिनव जी ने कहना आरंभ किया “देखो जैसे हमने नागरिक कर्तव्य बोध लिया तो एक अच्छे नागरिक को अपनी संस्कृति, अपनी परंपरा, अपने राष्ट्र का बोध होना चाहिए यानि स्व का बोध। फिर वही संस्कृति बताती है कि प्रकृति को माता मानो उसकी सेवा करो राष्ट्र की प्रकृति और पर्यावरण की रक्षा नागरिक कर्तव्य है ही। समाज में ऊँच-नीच का भाव समाप्त हों सब एकात्म हों समरस हों यह संविधान भी कहता है और संस्कृति तो समझाती ही है तो सामाजिक समरसता भी नागरिक कर्तव्य है तथा कर्तव्य पालन की पहली पाठशाला और कार्यशाला भी।”</p>
<p style="text-align: justify;">“और सामाजिक समरसता से आरंभ करें तो।” अंगुलियों और अंगूठे से ऊपर नीचे से पकड़े दूसरे हाथ से घुमा घुमाकर नया आम घुलाते हुए सौरभ ने पूछा।</p>
<p style="text-align: justify;">“समरसता अपने को और अपनों को एक समान अनुभव करने से होती है अर्थात् स्व का बोध व्यापक होकर समरसता में बदलता है। यह बन्धु भाव आरंभ तो पारिवारिक संस्कार से ही होता है और जब सारे नागरिक परस्पर बन्धुभाव से एकात्म होते हैं तो अधिकारों से कर्तव्य प्रथम का भाव नागरिक कर्तव्य की धुरी बनता है। यह समरसता सामाजिकता से और व्यापक होकर आध्यात्मिकता बन जाती है तब पर्यावरण से समरसता भी सहज ही स्थापित हो जाती न? अभिनव जी रुके।</p>
<p style="text-align: justify;">अब साधना ने जिज्ञासा की “मानो हमने आरंभ परिवार प्रबोधन से करना हो?”</p>
<p style="text-align: justify;">“करना ही होगा शेष चारों परिवर्तन परिवार से ही समाज में प्रभावी हो सकते हैं। परिवार समाज की पहली इकाई जो है?”</p>
<p style="text-align: justify;">अभी कुछ आम शेष थे। पेट भर रहा था पर मन नहीं, इसलिए लता बोली “दादाजी! मुझे तो यह बताइए कि स्व का बोध क्या और वह कैसे इन सबसे जुड़ा है?”</p>
<p style="text-align: justify;">“स्व का बोध यानि अपने को जानना। क्या क्या अपना है यह पहचानना। हमारे आचार, विचार, संस्कार, परंपरा, इतिहास, भाषा, वेश, भोजन पद्धति, शास्त्र, जीवन पद्धति ये अनेक बातें स्व के बोध के रूप में समाहित हैं। इनसे परिवार का, समाज का, राष्ट्रीयता का और संपूर्ण सृष्टि को देखने और उससे व्यवहार का बोध होता है। स्व का बोध होगा तो स्मरण रहेगा कि सारे आम स्वयं ही चट कर जाएं या दादाजी-नानाजी को, या सामने न होते हुए भी हमारे लिए दूसरे कामों में लगे मामा-मामी या माँ पिताजी या बड़ी दादी-नानी और घर में अनाज बीनने आई पड़ौस की मौसियाँ भी इन्हें पा सकें..” अभिनव जी मुस्कुराए तो बच्चे खिसिया गए। वे समझ गए दादाजी-नानाजी से चालाकी छुपी नहीं हमारी। सबके हाथ आम लिए उनकी ओर बढ़ गए।</p>
<p style="text-align: justify;">“ये आम आपने ही तो दिए हैं हमें।” पल्लवी ने दृष्टि झुकाकर कहा।</p>
<p style="text-align: justify;">“जैसे प्रकृति ने हमें सब दिया है। उदास न होओ बच्चों ये तुम्हारे ही लिए हैं।” वे आगे कहने लगे “हमारे राष्ट्र गीत वंदेमातरम् और राष्ट्र गीत में भी भारत की प्रकृति का उल्लेख है। सुजलां सुफलां मलयज शीतलाम् य फुल्ल कुसुमित द्रुमदल शोभिनीम्, अथवा विंध्य हिमाचल यमुना गंगा, उच्छल जलधि तरंग में।</p>
<p style="text-align: justify;">इसलिए इस प्रकृति की रक्षा, पोषण, संरक्षण, संवर्धन हमारा संविधान में भी उल्लिखित नागरिक कर्तव्य है। यह प्रकृति केवल हमारे नहीं अपितु हमारे समान करोड़ों प्रजाति के जीवों के लिए भी है, इसलिए निजी स्वार्थ के लिए ही उसे उपयोग कर अन्य प्राणियों को उससे वंचित करना यह समरसता भाव के विरुद्ध है और यह शोषण, संवेदना और ममता भरा दोहन बने हम प्रकृति माता का प्रसाद मान कर न्यूनतम संसाधन का उपयोग करें, अधिकतम बाकी लोगों के लिए भी बचने दें, यह एक अच्छे हिन्दू परिवार की पहचान हैं जो कि परिवार प्रबोधन से साध्य है। इस प्रकार ‘माताभूमिःपुत्रोऽहम् पृथिव्या:’ का सांस्कृतिक बोध, ‘आत्मवत् सर्वभूतेषु’ का भाव, ‘सर्वभूत हितेरताः’ का सेवाभाव और ‘सर्वं खल्विदं ब्रह्म:’ जैसा स्व का व्यापक भाव स्व का ही व्यापक बोध है। इसलिए पाँचों विषय एकात्म हैं जैसे पंचमुखी शिव या पंचमुखी हनुमान या&#8230;” वे केलेंडर पर छपे पंचमुखी शिव और हनुमान का चित्र बताते हुए बोले।</p>
<p style="text-align: justify;">“बताओ बताओ और कोई उदाहरण?” अभिनव जी ने प्रोत्साहित किया।</p>
<p style="text-align: justify;">बच्चे सोचने लगे फिर लता उठी और अंदर के कमरे से गायत्री माता का चित्र लाकर बोली “पंचमुखी गायत्री माता।”</p>
<p style="text-align: justify;">“बहुत बढ़िया। पर अब मेरा पुरस्कार?” आमों का खाली हो चुका बर्तन देखते हुए अभिनव जी बोले तो बच्चे एक दूसरे का मुंह ताकने लगे।</p>
<p style="text-align: justify;">“आम तो समाप्त।” सौरभ उदास होकर बोला।</p>
<p style="text-align: justify;">अभिनव जी बच्चों को उत्साहित रखना चाहते थे बोले “आम समाप्त पर गुठलियां तो हैं न आओ इन्हें बाहर बो देते हैं।”</p>
<p style="text-align: justify;">सभी गुठलियां बटोरकर बाहर चल दिए मोहित महार के खेत के पास खाली भूमि थी अभिनव जी ने बालमंडली के साथ वहाँ गुठलियां बो दीं।</p>
<p style="text-align: justify;">उधर से गुजरते हुए ठाकुर दादा ने उन्हें देखा तो बोले “बच्चो! इन्हें सींचना भी है। मेरे कुएं से पानी ले लेना।”</p>
<p style="text-align: justify;">“पाय लागीं दादाजी! पर हम तो छुट्टी खत्म होते ही लौट जाएँगे।” सौरभ ने कहा।</p>
<p style="text-align: justify;">“तो मोहित का बेटा राजीव सींचेगा, हम लोग पौधे पेड़ बनने तक देखभाल कर लेंगे।”</p>
<p style="text-align: justify;">तभी मोहित महार वहाँ आ गए। सबने आपस में यथायोग्य राम-राम की।</p>
<p style="text-align: justify;">ठाकुर दादा ने हँसकर कहा “क्यों मोहित तुम्हारे आम तो सबको खिलाओगे न?”</p>
<p style="text-align: justify;">“आम मेरे नहीं भगवान के हैं हाँ मैं उनकी रखवाली करूंगा जिससे पक जाने के बाद ही सबमें बंट सके।”</p>
<p style="text-align: justify;">सभी की सामूहिक हँसी ने जैसे इस सामुहिक निर्णय पर मुहर लगा दी थी।</p>
<p><strong><span style="color: #ff0000;">और पढ़े:</span></strong> <span style="color: #3366ff;"><strong><a style="color: #3366ff;" href="https://rashtriyashiksha.com/panch-parivartan-is-the-basic-foundation-of-developed-bharat/" target="_blank" rel="noopener">पंच परिवर्तन विकसित भारत का मूल आधार</a></strong></span></p>
<p style="text-align: justify;">(लेखक इंदौर से प्रकाशित ‘देवपुत्र’ बाल मासिक पत्रिका के संपादक है।)</p>
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		<title>वन्देमातरम् का 150वां जयन्ती वर्ष – भाग तीन</title>
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		<dc:creator><![CDATA[राष्ट्रीय शिक्षा]]></dc:creator>
		<pubDate>Fri, 18 Sep 2026 06:24:28 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[नवीनतम]]></category>
		<category><![CDATA[लेख]]></category>
		<category><![CDATA[वासुदेव प्रजापति]]></category>
		<category><![CDATA[IKS]]></category>
		<category><![CDATA[Rashtriya shiksha]]></category>
		<category><![CDATA[vande mataram]]></category>
		<category><![CDATA[भारतीय ज्ञान परम्परा]]></category>
		<category><![CDATA[राष्ट्रीय शिक्षा]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>– वासुदेव प्रजापति नेहरु व सरकार की बेतुकी सफाई सभी लोग राष्ट्रगान की सच्चाई जानने को उत्सुक थे। इसलिए बाध्य होकर पं. नेहरु को संविधान सभा में यह सफाई देनी&#8230; </p>
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]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: right;">– वासुदेव प्रजापति</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>नेहरु व सरकार की बेतुकी सफाई</strong></p>
<p style="text-align: justify;">सभी लोग राष्ट्रगान की सच्चाई जानने को उत्सुक थे। इसलिए बाध्य होकर पं. नेहरु को संविधान सभा में यह सफाई देनी पड़ी, जिसकी मुख्य बात यह है। “सन् 1947 को न्यूयार्क में संयुक्त राष्ट्र की जनरल एसेंबली में हमारे प्रतिनिधि से राष्ट्रगान की रिकॉर्डिंग मांगी गई थी। हमारे पास उस समय किसी उपयुक्त राष्ट्रगान की रिकार्डिंग नहीं थी, जिसे हम न्यूयार्क भेज सकते। संयोग से उस समय हमारे प्रतिनिधि के पास जन-गण-मन की रिकॉर्ड थी जिसे आर्केस्ट्रा को दे दी गई। जब आर्केस्ट्रा पर इसे बजाया गया तो अनेक देशों के विदेशी प्रतिनिधियों ने इसे बहुत पसंद किया। इस नई तर्ज का रिकॉर्ड बनाकर भारत भेज दिया गया, तब से यही हमारी सेना, विदेशी दूतावासों आदि में आवश्यक अवसरों पर बजाया जाता है। मंत्रिमंडल ने निर्णय लिया है कि संविधान सभा में अंतिम निर्णय न होने तक जन-गण-मन ही राष्ट्रगान के रूप में गाया जाता रहेगा। इसके बाद में पश्चिम बंगाल सरकार का संदेश मिला है कि वन्देमातरम् को ही राष्ट्रगान बनाए रखा जाए।</p>
<p style="text-align: justify;">भारत सरकार के सूचना और प्रसारण विभाग ने दो पुस्तिकाएँ, ‘फेक्ट्स एबाउट इंडिया’ और ‘अवर नेशनल सोंग्स’ प्रकाशित की थीं। इन दोनों में राष्ट्रगान से सम्बन्धित कुछ विचारणीय बिन्दु निम्नलिखित हैं –</p>
<p style="text-align: justify;">“वन्देमातरम् और जन-गण-मन दोनों का ही आभायुक्त इतिहास है, अतः दोनों ही पुरानी स्मृतियाँ जगाते हैं। दोनों ही महान लेखकों की कृतियाँ हैं। राष्ट्रगान में राष्ट्रीय भावना होनी चाहिए और वह गेय होना चाहिए। यद्यपि वन्देमातरम् ने देशभक्तों को महानतम बलिदान देने हेतु प्रेरित किया है, तथापि इसको राष्ट्रगान के रूप में स्वीकार करने में कठिनाई यह है कि इसका ‘हार्मोनाइजेशन’ नहीं हो सकता। विशेषज्ञों का मत है कि यह गीत कुछ आकारहीन और आनन्ददायी गुण के विषय में संदिग्ध है। और वन्देमातरम् में संगीत की दृष्टि से लय, ताल व सुर का भी अभाव है।”</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>सफाई से उभरे प्रश्न व उनका समाधान</strong><strong>?</strong></p>
<p style="text-align: justify;">उपर्युक्त सफाई में तनिक भी सच्चाई नहीं है, इसलिए अनेक ज्वलन्त प्रश्न उभरे हैं, जो अधोलिखित हैं &#8211;</p>
<ol style="text-align: justify;">
<li>राष्ट्रगान पर संविधान सभा में प्रस्ताव द्वारा निर्णय क्यों नहीं लिया गया? बार बार इस विषय को टालने के पीछे किसका हाथ था और क्यों?</li>
</ol>
<p style="text-align: justify;">राष्ट्रगान के विषय को स्वयं नेहरु जी ने उलझाए रखा। वे अपनी सत्ता को बनाए रखने के लिए मुसलमानों को नाराज नहीं करना चाहते थे। मुसलमानों की वाहवाही लूटने तथा रवीन्द्र समर्थकों को खुश करने के लिए पं. नेहरु ने ‘टैगोर शतवार्षिकी ग्रंथमाला की भूमिका में लिखा था कि &#8211;</p>
<p style="text-align: justify;">“कविगुरु के साथ मेरी अंतिम मुलाकात के मौके पर मैंने उनसे नये भारत के लिए नया राष्ट्रगान लिखने का अनुरोध किया था, जिसे उन्होंने आंशिक रूप से स्वीकार भी किया था। तब हमारे दिमाग में जन-गण-मन की बात नहीं आई थी। उसके बाद में कविगुरु दिवंगत हो गए। इसलिए अब मुझे यह बताने में अत्यन्त प्रसन्नता हो रही है कि कुछ वर्षों के बाद भारत के आजाद हो जाने पर हमने उनके ‘जन-गण-मन’ को ही राष्ट्रगान के पद पर अभिषिक्त किया है। मुझे सन्तोष है कि मैं स्वयं काफी हद तक इस निर्णय के लिए जिम्मेदार रहा। यह एक महान राष्ट्रगान तो है ही, साथ में यह हमें कविगुरु रवीन्द्रनाथ का स्मरण भी करवाता रहेगा। “नेहरुजी की यह गर्वोक्ति स्वयं उनको वन्देमातरम् के विरुद्ध मुख्य षडयंत्रकारी सिद्ध करने हेतु पर्याप्त है।</p>
<ol style="text-align: justify;" start="2">
<li>दि. 24 जनवरी 1950 की संविधान सभा में अन्तिम समय में अध्यक्ष द्वारा घोषणा करने के पीछे किसकी योजना थी? घोषणा में कहा गया कि ‘यह उचित समझा गया’ तो यह किसने समझा?</li>
</ol>
<p style="text-align: justify;">उक्त दिन संविधान सभा के अन्तिम समय में अध्यक्ष द्वारा घोषणा करवाने के पीछे नेहरुजी की योजना थी, उन्होंने ही ऐसा करना उचित समझा था। यदि योजना सबकी सहमति से बनी होती तो पुरुषोत्तमदास जी टण्डन कांग्रेस के अध्यक्ष पद से त्यागपत्र नहीं देते।</p>
<ol style="text-align: justify;" start="3">
<li>न्यूयार्क स्थित हमारे प्रतिनिधि के पास जन-गण-मन की रिकार्ड कहाँ से आई? वन्देमातरम् की रिकॉर्ड प्राप्त करने के प्रयास क्यों नहीं किए गए?</li>
</ol>
<p style="text-align: justify;">नेहरु जी शुरु से ही मुस्लिम तुष्टिकरण की नीति पर चल रहे थे। इसलिए उन्होंने योजनापूर्वक जन-गण-मन की रिकॉर्ड ही भिजवाई थी। तब 15 अगस्त 47 को राष्ट्रसंघ की जनरल एसेंबली में जन-गण-मन की रिकॉर्ड बजी थी। यदि प्रयत्न किया जाता तो उस समय अनेक देशभक्त बंगाली परिवार न्यूयार्क में रहते थे, उनसे वन्देमातरम् की रिकॉर्ड लेकर बजवाई जा सकती थी।</p>
<ol style="text-align: justify;" start="4">
<li>नेहरु जी ने अज्ञान का परिचय देते हुए कहा कि न्यूयार्क में उपस्थित संभ्रांत विदेशी प्रतिनिधियों ने जन-गण-मन धुन की बहुत सराहना की थी। क्या राष्ट्रगान के चयन की कसौटी विदेशी प्रतिनिधि होते हैं?</li>
</ol>
<p style="text-align: justify;">कितनी हास्यास्पद बात है कि जन-गण-मन की धुन विदेशियों को पसन्द आई इसलिए उसे राष्ट्रगान बना दिया गया। राष्ट्रगान राष्ट्र की आत्मा का प्रतीक होता है और राष्ट्र के धर्म व संस्कृति का परिचायक होता है। किसी राष्ट्रगान का पूर्व इतिहास, स्वतंत्रता संग्राम में उसकी महत्वपूर्ण भूमिका सर्वाधिक मायने रखती है। जिस गान की धुन एवं शब्द स्वदेशवासियों को स्वदेशप्रेम का पाठ सिखाए, उसके गान से देशभक्तों की धमनियों में खून खोलने लगे, वही राष्ट्रगान की सही कसौटी होती है। अमरीका में बैठे कुछ विदेशियों की पसन्द हमारे राष्ट्रगान के चयन की कसौटी कैसे हो सकती है? किसी भी राष्ट्र में विदेशियों की पसन्द का राष्ट्रगान चुना जाना, आज तक किसी भी व्यक्ति ने नहीं सुना होगा।</p>
<ol style="text-align: justify;" start="5">
<li>राष्ट्रगान के विषय पर अनेक संस्थाओं ने जनमत संग्रह क्यों करवाया था?</li>
</ol>
<p style="text-align: justify;">संविधान सभा में राष्ट्रगान का निर्णय होने से पहले ही नेहरुजी ने अपनी मर्जी से वन्देमातरम् को हटाकर एक बिल्कुल नये गान को राष्ट्रगान के पद पर अभिषिक्त कर दिया, जो नेहरुजी की तानाशाही थी। इस तानाशाही के विरुद्ध सांकेतिक जनमत संग्रह किया गया था। सन् जुलाई 1949 में ‘अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद’ ने जो जनमत संग्रह आयोजित किया था, उसमें 5,19,435 लोगों ने भाग लिया था। उस जनमत संग्रह में 95% लोगों ने राष्ट्रगान के रूप में वन्देमातरम् के पक्ष में अपना मत डाला था। अतः पूरा देश वन्देमातरम् को ही राष्ट्रगान बनाना चाहता था, परन्तु नेहरुजी की तानाशाही जीत गई।</p>
<ol style="text-align: justify;" start="6">
<li>सरकारी सूचना पुस्तिकाओं में हास्यास्पद जानकारी क्यों दी गई?</li>
</ol>
<p style="text-align: justify;">दोनों पुस्तिकाओं में लिखी बातें मनघडंत थी। सरकार के सूचना और प्रसारण विभाग को जन-गण-मन का कौनसा आभायुक्त इतिहास दिखाई दे गया और इसने कौनसी पुरानी स्मृतियों को जगा दिया? जबकि वास्तविकता यह है कि वन्देमातरम् का इतिहास तो आभायुक्त है, परन्तु जन-गण-मण का तो कोई आभायुक्त इतिहास ही नहीं है। फिर भी जन-गण-मन को महान बताने वाली मिथ्या बातें हास्यास्पद नहीं तो ओर क्या है।</p>
<ol style="text-align: justify;" start="7">
<li>वन्देमातरम् के लिए आकारहीन व आनन्ददायी गुणों का अभाव जैसी बातें क्यों कही गई?</li>
</ol>
<p style="text-align: justify;">वन्देमातरम् को पदच्युत करने के लिए ऐसे असत्य विमर्श गढ़े गए, अन्यथा जिसने भी इसका भावार्थ समझा है, वह तो आनन्दित हो नाच उठा था। स्वयं गांधीजी ने कहा है कि “मैंने जब वन्देमातरम् को गाए जाते हुए सुना तो मैं आत्मविभोर हो गया।” फिर इसमें आनन्ददायी गुणों का अभाव कहाँ से आ गया।</p>
<ol style="text-align: justify;" start="8">
<li>वन्देमातरम् पर महत्वपूर्ण यह आपत्ति क्यों उठाई गई कि इसका हार्मोनाइजेशन नहीं हो पाता? इसमें सुर, ताल व लय का अभाव है तथा पाश्चात्य आर्केस्ट्रा पर इसकी धुन नहीं बैठती।</li>
</ol>
<p style="text-align: justify;">उनका यह आरोप भी मिथ्या व दुराग्रहपूर्ण है। तत्कालीन सुविख्यात संगीतज्ञ मास्टर कृष्णराव ने सन् 1940 से पहले ही वन्देमातरम् को स्वरबद्ध करके झिंझोटी राग में उसकी रिकॉर्डिंग तैयार कर एक पत्र के साथ भारत सरकार को भेज दी थी। उस पत्र में उन्होंने दावा किया था कि इस सरल धुन पर चालीस-पच्चास हजार लोगों के मुख से गवाकर देख लिया है, अनुभव बहुत अच्छा रहा। अनुभव के आधार पर मैं कह सकता हूँ कि लाखों मनुष्य इसे समवेत स्वर में गा सकते हैं। इस तर्ज पर गाने से वातावरण भी अत्यंत गरिमामय बन जाता है। इसे पुलिस परेड के कदमों के साथ भी गाया जा सकता है। सरदार पटेल के आदेश पर उन्हें रेडियो पर भी गाया था। अनेक संवाददाताओं के दबाव से स्वयं नेहरु ने इन्हें अपने सामने गाने का अवसर दिया था। जनरल करिअप्पा के आदेश पर बैंड चीफ लाजपत सिंह के सम्मुख इस धुन को बैंड पर बजाया गया, उन्होंने सन्तुष्ट होकर अपनी सहमति दी। ब्रिटिश बैंड कमांडर सी.आर. गार्डन ने स्वयं बजाकर देखा और प्रसन्नतापूर्वक प्रमाणपत्र दिया कि यह धुन ब्रिटिश बैंड पर बहुत बढ़िया बैठती है। कहने का अर्थ यही है कि वन्देमातरम् पर जो जो मिथ्या आरोप लगाए गए थे उन्हें मास्टर कृष्णराव ने गलत सिद्ध कर दिया था, फिर भी नेहरुजी ने उनके अथक परिश्रम पर पानी फेर दिया। अतः यह कहा जा सकता है कि असंदिग्ध रूप से यह नेहरुजी प्रदत्त वन्देमातरम् को अपदस्थ करने का एक पूर्वनियोजित नाटक मात्र था।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>हमारी अभिलाषा&#8230;</strong></p>
<p style="text-align: justify;">राष्ट्रगान राष्ट्र का अनन्य प्रतीक होता है। इस पवित्र प्रतीक का प्रथमतः अंगभंग करके, द्वितीयत: इसको पदच्युत करके हमने जननी जन्मभूमि के प्रति जो जघन्य अपराध किया है, उसका प्रायश्चित करने से ही राष्ट्र की चिति एवं विराट का जागरण होगा, परिणामस्वरूप राष्ट्र अपना सर्वतोमुखी अभ्युदय करेगा। सम्पूर्ण वन्देमातरम् को पुनः राष्ट्रगान के पद पर अभिषिक्त करके जब राष्ट्र की आबाल-वृद्ध सभी सन्तानें इस मातृस्तोत्र के नित्य गान द्वारा ज्ञान, शक्ति व समृद्धि की प्रतीक स्वदेश माता की, इन विभूतियों को प्राप्त करने हेतु संकल्प करेंगी, तभी ये हमें प्राप्त होंगी।</p>
<p style="text-align: justify;">सुखदा, वरदा माता प्रसन्न होकर हमें निश्चित रूप से सम्पूर्ण विश्व को धारण और भरण करने योग्य ज्ञान, शक्ति व समृद्धि प्रदान करेंगी। हमें इस सनातन राष्ट्र के स्वर्णिम भविष्य में अटल विश्वास है, अतः भविष्य में हम अपने इन्हीं चर्मचक्षुओं से पुनः वन्देमातरम् के उत्कर्ष को देखेंगे।</p>
<p style="text-align: center;"><strong>राष्ट्र की जय चेतना का गान वन्देमातरम्।</strong></p>
<p style="text-align: center;"><strong>राष्ट्र भक्ति प्रेरणा का गान वन्दे मातरम्।।</strong></p>
<p><strong><span style="color: #ff0000;">और पढ़े:</span></strong><span style="color: #3366ff;"><strong> <a style="color: #3366ff;" href="https://rashtriyashiksha.com/the-150th-anniversary-year-of-vande-mataram-part-two/" target="_blank" rel="noopener">वन्देमातरम् का 150वां जयन्ती वर्ष – भाग दो</a></strong></span></p>
<p style="text-align: justify;">(लेखक शिक्षाविद् है, भारतीय शिक्षा ग्रन्थमाला के सह संपादक है और विद्या भारती संस्कृति शिक्षा संस्थान के पूर्व सचिव है।)</p>
<p>The post <a href="https://rashtriyashiksha.com/the-150th-anniversary-year-of-vande-mataram-part-three/">वन्देमातरम् का 150वां जयन्ती वर्ष – भाग तीन</a> appeared first on <a href="https://rashtriyashiksha.com">राष्ट्रीय शिक्षा : शिक्षा में समाज प्रबोधन</a>.</p>
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		<title>वन्देमातरम् का 150वां जयन्ती वर्ष – भाग दो</title>
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		<dc:creator><![CDATA[राष्ट्रीय शिक्षा]]></dc:creator>
		<pubDate>Fri, 18 Sep 2026 06:06:59 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[नवीनतम]]></category>
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		<category><![CDATA[वासुदेव प्रजापति]]></category>
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		<category><![CDATA[भारतीय ज्ञान परम्परा]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>– वासुदेव प्रजापति कांग्रेस अधिवेशनों में वन्देमातरम् गान यह बात सबके ध्यान में रखने योग्य है कि आनंदमठ के प्रकाशन के पूर्व ही संपूर्ण बंगाल में वंदे मातरम् गीत का&#8230; </p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: right;">– वासुदेव प्रजापति</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>कांग्रेस अधिवेशनों में वन्देमातरम् गान</strong></p>
<p style="text-align: justify;">यह बात सबके ध्यान में रखने योग्य है कि आनंदमठ के प्रकाशन के पूर्व ही संपूर्ण बंगाल में वंदे मातरम् गीत का प्रचार हो चुका था। इस गीत को प्रथम स्वर दिया था रविंद्र नाथ ठाकुर के संगीत शिक्षक श्री यदु भट्ट ने। इसी धुन पर  स्वयं बंकिम बाबू और उनके मित्र यह गीत गाया करते थे। तत्पश्चात सन 1886 में ठाकुर परिवार की ‘बालक पत्रिका’ में श्रीमती प्रभा सुंदरी देवी रचित स्वरलिपि प्रकाशित हुई थी। सन् 1889 में कलकत्ता में हुए कांग्रेस अधिवेशन में बंकिम के साथी कवि हेमचन्द्र ने अपनी कविता ‘राखी’ में वन्देमातरम् का कुछ भाग जोड़कर गाया था। स्वयं कविगुरु रवींद्रनाथ ने 1896 में कांग्रेस अधिवेशन में वंदेमातरम् अपनी ही स्वरलिपि में गया था। सन् 1901 के बाद तो नियमित रूप से कांग्रेस के अधिवेशन में पूरा वंदेमातरम् गाया जाता रहा। पहली बार सन 1923 के काकीनाड़ा अधिवेशन में अध्यक्ष मौलाना मोहम्मद अली ने आपत्ति की। अध्यक्ष की आपत्ति के पश्चात भी देशभक्त पंडित विष्णु दिगंबर पलुस्कर ने पूरा वंदेमातरम् उल्लास पूर्वक गाया था। अध्यक्ष मोहम्मदअली वंदेमातरम् गान के शुरु होते ही उठकर पंडाल से बाहर चले गए और जब गान पूरा हुआ, तब आकर पुनः अध्यक्ष की कुर्सी पर बैठ गए। उपस्थित किसी भी व्यक्ति ने अध्यक्ष के इस अशोभनीय आचरण के लिए नहीं टोका। सभी लोग स्तब्ध तो थे, अध्यक्ष की इस आपत्ति ने भारत के मुसलमानों में राष्ट्रीय धारा से अलग होने के भाव का बीजारोपण कर दिया था। सन 1937 में ही प्रान्तीय विधानसभाओं के चुनावों में कांग्रेस भारी बहुमत से जीती थी और विधानसभाओं की कार्यवाही वन्देमातरम् गान से आरम्भ की जाने लगी। इससे मुस्लिम लीग बौखला गई और मुस्लिम विधायक आपत्ति स्वरूप विधानसभाओं का बहिष्कार करने लगे। वही मनोवृत्ति आज भी चल रही है, जो देश विघातक है।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>वन्देमातरम् का अंगभंग किया जाना</strong></p>
<p style="text-align: justify;">सन् 1937 में मुस्लिम लीग ने अपना पृथक अधिवेशन कोलकाता में किया था। उस अधिवेशन में एक प्रस्ताव पास करके वंदेमातरम् को राष्ट्रगान बनाना मुसलमानों की धार्मिक भावनाओं का निरादर करना तथा उनके हितों के विरुद्ध साजिश रचना बताया था। मुस्लिम विधायकों द्वारा वंदेमातरम् गाए जाने पर नित्य नए-नए विवाद उत्पन्न किए जाने के कारण कांग्रेस उनके दबाव में आ गई। अतः दि. 26 से 31 अक्टूबर सन 1937 के कांग्रेस कार्यकारिणी एवं अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी में वंदेमातरम् का अंग-भंग करके उसे सर्वजनग्राह्य बनाया जा सकता है या नहीं, इस बात पर निर्णय होना था। उन्हीं दिनों सुभाष चंद्र बोस विदेश से लौट कर आए थे और कर्सियांग में स्वास्थ्य लाभ कर रहे थे। वे वंदेमातरम् के विवाद से अत्यधिक दुखी थे। सुभाष बाबू ने 16 अक्टूबर को कविगुरु रवीन्द्रनाथ को वन्देमातरम् विवाद के सम्बन्ध में एक मार्मिक पत्र लिखा। किन्तु उस समय कविगुरु गंभीर अस्वस्थता की दशा में चिकित्सालय में भर्ती थे। दूसरा पत्र उन्होंने ‘मॉडर्न रिव्यू’ और ‘प्रवासी’ के संपादक रामानंद चट्टोपाध्याय को लिखकर, उन्हें यह विषय महात्मा गांधी को लिखने का अनुरोध किया था। संयोग से गांधी जी भी उस समय अस्वस्थ थे, इसलिए गांधी जी तक सुभाष बाबू का वह संदेश नहीं पहुँच पाया। इस स्थिति में वह संदेश मॉडर्न रिव्यू और प्रवासी में छापकर प्रचारित किया गया था।</p>
<p style="text-align: justify;">इस अधिवेशन से ठीक एक दिन पहले 25 अक्टूबर को जवाहरलाल नेहरू कविगुरु रवीन्द्रनाथ जी से एकांत में मिलकर आ गए थे। इसलिए कविगुरु ने अधिवेशन के दिन 26 अक्टूबर को एक विस्तृत पत्र कांग्रेस सभापति जवाहर लाल जी को अपने अभिमत सहित लिखा। उस पत्र का सार यह था &#8211;</p>
<p style="text-align: justify;">“निस्संदेह वन्देमातरम् एक अत्यन्त सुन्दर स्वदेश प्रेम की प्रेरणा देने वाला गान है। इसी वन्देमातरम् गान ने बंग-भंग आन्दोलन को अपनी अन्तर्निहित शक्ति के द्वारा सफल बनाया था। परन्तु पूरा वन्देमातरम् मुसलमानों की भावनाओं को आहत कर सकता है, उसके प्रथम दो स्तवक निर्विवाद रूप से राष्ट्रगान होने योग्य हैं। उनमें आपत्तिजनक कुछ भी नहीं हैं।”  रवीन्द्रनाथजी के इस समर्थन से उत्साहित होकर कांग्रेस कार्यकारिणी ने अध्यक्ष जवाहरलाल नेहरु द्वारा प्रस्तुत राष्ट्रगान सम्बन्धित एक प्रस्ताव पारित किया, उसका सार निम्नलिखित है &#8211;</p>
<p style="text-align: justify;">“वन्देमातरम् विगत 32 वर्षों से देशभक्तों को स्वाधीनता संग्राम में ब्रिटिश साम्राज्यवाद के विरुद्ध अपनी लड़ाई में अमानुषिक अत्याचारों को सहते हुए अपना सर्वस्व यहाँ तक की प्राणों का बलिदान देने के लिए प्रेरित करता आया है। हमारे राष्ट्रीय संग्राम का यह जीवंत एवं अभिन्न अंग है और हमारे श्रद्धा व प्रेम का पूर्ण अधिकारी है। अतः इसके प्रथम दो स्तवक राष्ट्रीय सम्मेलनों में गाए जाते रहेंगे, कारण कि इनमें ऐसा कुछ भी नहीं है जिस पर कोई आपत्ति उठा सके। हमारे मुस्लिम बंधुओं द्वारा इस गान के कुछ अंशों पर आपत्ति उठाने के कारण ही यह निर्णय लिया गया है।”</p>
<p style="text-align: justify;">तत्कालीन कांग्रेस नेतृत्व इस महान स्वदेश गान का केवल ऊपरी रूप ही देख पाया। इसके भावार्थ में प्रवेश न कर पाने के कारण गान के मूल आशय को समझ नहीं पाया। दूसरा कारण भारत के अहिन्दू सम्प्रदायों के प्रति अतिरिक्त उदारता ने उन्हें यह करने हेतु प्रेरित किया और तीसरा कारण शायद कांग्रेस यह प्रमाणित करना चाहती थी कि वह साम्प्रदायिक नहीं है। इन्हीं कारणों से कांग्रेस ने वन्देमातरम् का अंगभंग कर दिया। वास्तविक अर्थ में वन्देमातरम् का यह अंगभंग ही देश विभाजन की पूर्व सूचना थी। अन्यथा राष्ट्रगान और राष्ट्रध्वज तो राष्ट्र के प्रतीक होते हैं, उनका अंगभंग नहीं किया जाता। यह स्पष्ट है कि उन्होंने देश के साथ छलावा किया। उन्होंने अपने प्रस्ताव में कहा था कि “इन दो स्तवकों में किसी के द्वारा भी आपत्ति योग्य कुछ भी नहीं है। तथा यह हमारे राष्ट्रीय संग्राम का अविच्छेद्य अंग है।” यदि ये दोनों वाक्य निष्कपट होते तो वन्देमातरम् के स्थान पर अन्य गान के गाये जाने का प्रश्न ही पैदा नहीं होता। मुस्लिम तुष्टिकरण के लिए कांग्रेस नेतृत्व विभ्रांत होकर इस परम सत्य को ही भूल गया कि राष्ट्रगान देशवासियों के अन्त:करण में देशप्रेम और देशहित जीवन उत्सर्ग की प्रेरक ज्वाला की सहज अभिव्यक्ति होता है। यह बात कांग्रेसी नेता उस दिन भूल गए थे। उन्हें यदि फ्रांस के राष्ट्रगान ‘मार्सिलेज’ का इतिहास ज्ञात होता तो यह बात अवश्य समझ में आ जाती कि “राष्ट्रगान ऐसा होना चाहिए जिसके श्रवण मात्र से देशवासियों की धमनियों में खून खौलने लगे।” हमारा वन्देमातरम् इस कसौटी पर खरा उतरता है, फिर भी इसको काट दिया गया, क्यों?</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>प्रबुद्धजनों द्वारा वन्देमातरम् की प्रशंसा</strong></p>
<p style="text-align: justify;">उस समय के सभी प्रमुख लोग वन्देमातरम् का यशोगान करते थे और चाहते थे कि वन्देमातरम् ही भारतराष्ट्र का राष्ट्रगान होना चाहिए। प्रशंसा करने वालों में प्रमुख थे, महात्मा गांधी। गांधीजी ने अपने पत्र ‘हरिजन’ में सन् 1939 की एक जुलाई के दिन लिखा था, “मैंने जब पहली बार वन्देमातरम् को गाए जाते हुए सुना तो मैं आत्मविभोर हो गया, उसका मुझ पर जादू सा असर हुआ था। हमारा झण्डा और यह गीत तब तक जिन्दा रहेंगे जब तक यह राष्ट्र जिन्दा है।” देश की आजादी के लगभग एक सप्ताह बाद 23 व 29 अगस्त 1947 को गांधीजी ने कलकत्ता की सभा में, वह भी सुहारावर्दी की उपस्थिति में वन्देमातरम् गाया था। उस सभा में गांधीजी ने इस गान को देशमाता की अति सुन्दर वन्दना बताते हुए मुस्लिमलीगियों से अपना दुराग्रह त्यागने का आग्रह किया था। उन्होंने इस तथ्य को फिर दोहराया कि “रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने भी राष्ट्रगान के रूप में वन्देमातरम् के पक्ष में अपना मत दिया है।”</p>
<p style="text-align: justify;">यशस्वी पत्रकार श्री रामानन्द चट्टोपाध्याय का स्पष्ट मत था कि सरसरी दृष्टि से देखने पर वन्देमातरम् प्रतिमाव्यंजक लग सकता है, किन्तु असल में ऐसा नहीं है। वन्देमातरम् गान में कहीं भी मुस्लिम विद्वेष नहीं है, यहाँ तक कि इसमें मुसलमानों का उल्लेख तक नहीं है। इसमें जो ‘रिपुदल वारिणीम्’ पद आया है, उसमें रिपुदल का अर्थ मुसलमानों से नहीं अंग्रेजों से है। आनन्दमठ में वर्णित युद्ध मुसलमानों से नहीं था अपितु संन्यासियों का अंग्रेज सेनापतियों के विरुद्ध हुआ युद्ध था। अतः मुसलमानों को कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए।</p>
<p style="text-align: justify;">उधर विपिनचन्द्र पाल ने सन् 1919 में ही वन्देमातरम् का अपूर्व और दीर्घ विश्लेषण कर दिया था, जो महर्षि अरविन्द घोष की ‘धर्म पत्रिका’ में छपा था। उसका सार यही था कि, “वन्देमातरम् में स्वदेश मातृका का स्थूल, सूक्ष्म और कारण रूप में समग्र प्रकटीकरण हुआ है।”</p>
<p style="text-align: justify;">मौलाना रेजाउल करीम तो वन्देमातरम् के अंगभंग से बहुत दुखी हुए थे। उन्होंने अपने ग्रंथ ‘बंकिम ओ मुसलमान समाज’ में निर्भीकतापूर्वक इस गान के विरोधियों की धज्जियाँ उड़ाई थीं। मातृभूमि को नमस्कार करना इस्लाम विरोधी नहीं है। क्या मुसलमान अपने मुल्ला-मौलवियों को, अपने आकाओं को झुककर सलाम नहीं करते? यदि कांग्रेस जिन्नापंथियों को खुश करने के लिए वन्देमातरम् को पूर्णतः हटा भी देती है, तब भी उनमें से एक भी मुसलमान कांग्रेस में शामिल नहीं होगा। क्योंकि उनका असली उद्देश्य वन्देमातरम् को हटाना नहीं है, अपितु अंग्रेज प्रेरित देश विभाजन के षडयंत्र को सफल बनाने का एक बहाना मात्र है। अन्यथा ‘वन्देमातरम्’ भी वैसा ही शब्द है, जैसा ‘मादरे वतन’। जो वन्देमातरम् का अर्थ है, वही अर्थ मादरे वतन का है, मैं अपने वतन को सलाम करता हूँ। अतः किसी भी इस्लामी आदर्श के तहत इसमें आपत्ति जनक कुछ भी नहीं है।</p>
<p style="text-align: justify;">मौलाना अकरम खाँ ने अरब देश का भौगोलिक वर्णन करते हुए लिखा है, “हे अरब मानवेर आदि मातृभूमि” कवि ने अरब को माँ कहकर पुकारा है। जब अरब को मानव की आदि मातृभूमि स्वीकार करने वाले मुसलमान भारत में बस गए, तब भारत को माँ कहने में इस्लाम क्यों आड़े आता है? अतः सत्य यही है कि वन्देमातरम् का विरोध करना तो मात्र एक बहाना मात्र था। वास्तविकता यही है कि कांग्रेस ने मुसलमानों के तुष्टिकरण का आत्मघाती मार्ग अपनाकर भारत विभाजन का बीजारोपण कर दिया था। कांग्रेस देश की आजादी तक इसी मार्ग पर चलती रही। मुस्लिमलीग के द्विराष्ट्र सिद्धांत को नाम मात्र का अमान्य करते हुए भी उसके घातक परिणाम कांग्रेस ने मान लिए। वन्देमातरम् का अंगभंग जैसी घुटनाटेक पराजयवृत्ति को भाँपकर लीग ने सत्तालोलुप बूढ़े कांग्रेसी नेताओं को देश का विभाजन स्वीकार करने के लिए बाध्य कर दिया था। फलतः वन्देमातरम् के अंगभंग के मात्र दस वर्ष बाद ही सन 1947 में कृतघ्न कांग्रेसियों ने भारत माता को भी अंगभंग कर दिया।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>वन्देमातरम् को पदच्युत करना</strong></p>
<p style="text-align: justify;">जिस दिन वन्देमातरम् को पदच्युत करने का षडयंत्र रचा गया वह दिन था, 24 जनवरी 1950 का। और उपलक्ष्य था, उस दिन स्वतंत्र भारत के नव-निर्मित संविधान पर संविधान-निर्मात्री सभा के सदस्यों के हस्ताक्षर करने का। सभा की कार्यवाही शुरू हुई। सभी सदस्यों ने हस्ताक्षर किए, अन्य औपचारिक कार्य भी सम्पन्न कर लिए गए। जब सभा समाप्त होने वाली थी, तब अचानक सभापति बाबू राजेन्द्र प्रसाद ने खड़े होकर राष्ट्रगान के सम्बन्ध में एक घोषणा की। उस घोषणा का सार था कि “वैसे तो निश्चय यही किया गया था कि राष्ट्रगान के बारे में संविधान सभा में एक प्रस्ताव द्वारा निर्णय किया जायेगा, परन्तु यह निर्णय करना छूट गया। आज ही यह बिन्दु याद आया, परन्तु अब प्रस्ताव द्वारा निर्णय लेने का समय नहीं रहा। अतः उचित यही समझा गया कि इस विषय पर मैं एक घोषणा कर दूँ। अब से ‘जन गण मन अधिनायक’ को राष्ट्रगान एवं ‘वन्देमातरम्’ को राष्ट्रगीत के रूप में स्वीकार किया जाता है। दोनों को बराबर सम्मान प्राप्त होगा। आशा है इससे सभी सदस्य सहमत होंगे।”</p>
<p style="text-align: justify;">इस असंवैधानिक निर्णय को सुनकर वन्देमातरम् के सभी भक्त अवाक् रह गए। राजर्षि पुरुषोत्तम दास टंडन तो इतने दुखी हुए कि उन्होंने कांग्रेस के अध्यक्ष पद से ही त्यागपत्र दे दिया। क्योंकि इस घोषणा का समय अत्यन्त चालाकी से चुना गया था, और अब बोलने का कोई अर्थ ही नहीं रह गया था। इस अप्रत्याशित निर्णय के फलस्वरूप जो वन्देमातरम् फाँसी के तख्ते पर झूलने वाले शहीदों के कंठों से गर्व के साथ गूँजा था, जो जयघोष पूरे स्वाधीनता संग्राम में देशभक्तों की प्रेरणा एवं श्रद्धा का प्रतीक बना रहा था, उसे सत्तालोलुपों की साजिश से तिरस्कृत होकर नीचे गिरना पड़ा। यह एक ऐसी कटु सत्यकथा है, जिसमें खून से की गई मातृभूमि की वंदना को स्याही से मिटा देने का षडयंत्र दिखाई देता है।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>सम्पूर्ण भारत में नेहरु की तीखी आलोचना</strong></p>
<p style="text-align: justify;">उपर्युक्त असंवैधानिक व अप्रत्याशित निर्णय पर सभी इसलिए आश्चर्यचकित थे कि इस दिन भी सभा के प्रारम्भ में सभापति के आदेश से लक्ष्मीकांत मैत्र ने वन्देमातरम् गाया था। सभी देशभक्त यह मानते थे कि राष्ट्रगान तो वन्देमातरम् ही होगा। इससे पूर्व भी 14 अगस्त 1947 की मध्य रात्रि में जब देश को आजादी मिली थी, उस समय भी स्वतंत्रता के स्वागत में श्रीमती सुचेता कृपलानी ने वन्देमातरम् गाया था। दूसरे दिन 15 अगस्त को प्रातःकाल आकाशवाणी से भारत के महान गायक पंडित ओंकारनाथ ठाकुर ने पूरा वन्देमातरम् गान अपने हृदयद्रावी रोमांचक स्वर में भारतीय स्वतंत्रता के स्वर्णिम विहान में मुक्त विहंग की भाँति पूरे उल्लास के साथ गाया था। यहाँ यह बात भी स्मरण रखने योग्य है कि पं.ओंकारनाथ ठाकुर बड़े स्वाभिमानी थे। जब 1937 में कांग्रेस ने वन्देमातरम् गान का अंगभंग किया था, वह इन्हें मान्य नहीं था। इसलिए जब इन्हें हरिपुरा कांग्रेस अधिवेशन में वन्देमातरम् गाने के लिए बुलाया गया तो इन्होंने खंडित वन्देमातरम् गाने से स्पष्ट मना कर दिया और पूरा वन्देमातरम् गाकर ही माने थे। इसलिए वे उप प्रधानमंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल से पूरा वन्देमातरम् गाने का पक्का आश्वासन लेकर ही मद्रास से दिल्ली आए थे और 15 अगस्त की प्रातः आकाशवाणी पर पूरा वन्देमातरम् गाया था। अतः सब देशभक्त यही आशा लगाए बैठे थे कि वन्देमातरम् ही राष्ट्रगान होगा। जब-जब भी संविधान सभा में राष्ट्रगान के विषय को लाने का प्रयत्न किया गया, तब-तब ही इस पर प्रस्ताव लाने को स्थगित किया गया था। इस सारे षडयंत्र के पीछे नेहरु स्वयं थे, इसलिए पूरे भारत में नेहरु की तीखी आलोचना हुई थी।</p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>और पढ़े:</strong></span> <span style="color: #0000ff;"><strong><a style="color: #0000ff;" href="https://rashtriyashiksha.com/the-150th-anniversary-year-of-vande-mataram/" target="_blank" rel="noopener">वन्देमातरम् का 150वां जयन्ती वर्ष – भाग एक</a></strong></span></p>
<p>(लेखक शिक्षाविद् है, भारतीय शिक्षा ग्रन्थमाला के सह संपादक है और विद्या भारती संस्कृति शिक्षा संस्थान के पूर्व सचिव है।)</p>
<p>The post <a href="https://rashtriyashiksha.com/the-150th-anniversary-year-of-vande-mataram-part-two/">वन्देमातरम् का 150वां जयन्ती वर्ष – भाग दो</a> appeared first on <a href="https://rashtriyashiksha.com">राष्ट्रीय शिक्षा : शिक्षा में समाज प्रबोधन</a>.</p>
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		<title>रामायण सत कोटि अपारा-8 (श्रीराम जन्मभूमि आंदोलन से उपजी राम कथा)</title>
		<link>https://rashtriyashiksha.com/the-story-of-ram-originated-from-the-shri-ram-janmabhoomi-movement/</link>
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		<dc:creator><![CDATA[राष्ट्रीय शिक्षा]]></dc:creator>
		<pubDate>Thu, 17 Sep 2026 14:03:51 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[नवीनतम]]></category>
		<category><![CDATA[रामायण सत कोटि अपारा]]></category>
		<category><![CDATA[श्री रवि कुमार जी]]></category>
		<category><![CDATA[IKS]]></category>
		<category><![CDATA[Ramayan]]></category>
		<category><![CDATA[Rashtriya shiksha]]></category>
		<category><![CDATA[Shri Ram Janmabhoomi Movement]]></category>
		<category><![CDATA[भारतीय ज्ञान परम्परा]]></category>
		<category><![CDATA[रामायण]]></category>
		<category><![CDATA[रामायण सात कोटि अपारा]]></category>
		<category><![CDATA[राष्ट्रीय शिक्षा]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>&#x270d; रवि कुमार श्रीराम कथा अनंत है। उसके स्वरूप भी विविध है। श्रीराम के काल से आज तक अलग-अलग रूप में रामकथा प्रकट हुई है। एक कथा ऐसी भी है&#8230; </p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: right;"><img src="https://s.w.org/images/core/emoji/17.0.2/72x72/270d.png" alt="✍" class="wp-smiley" style="height: 1em; max-height: 1em;" /> रवि कुमार</p>
<p style="text-align: justify;">श्रीराम कथा अनंत है। उसके स्वरूप भी विविध है। श्रीराम के काल से आज तक अलग-अलग रूप में रामकथा प्रकट हुई है। एक कथा ऐसी भी है जिसका उद्भव एक आंदोलन से हुआ और उस कथा का स्वरूप भी अलग प्रकार का है। यह कथा है श्रीराम जन्मभूमि आंदोलन से उपजी रामकथा।</p>
<p style="text-align: justify;">श्रीराम जन्मभूमि आंदोलन मात्र अयोध्या में राम मंदिर निर्माण का आंदोलन ही नहीं है, यह आंदोलन राष्ट्र जागरण का आंदोलन है, हिंदुत्व शक्ति जागरण का आंदोलन है, श्रीराम भक्ति जागरण का आंदोलन है और सबसे महत्वपूर्ण ‘राम मंदिर से राष्ट्र मंदिर’ निर्माण का आंदोलन है। 1984 में शुरू हुआ आंदोलन, 2019 में मंदिर निर्माण की अनुमति, 2020 में भूमि पूजन और 2024 में मंदिर उद्घाटन में पूर्ण हुआ। 1984-2019 के दौरान संघर्ष का यह आंदोलन भारत में एक नई रामकथा को जन्म देता है जो गीतों के रूप में, वीर रस और ओजपूर्ण कविताओं के रूप में, भाषणों के रूप में, भजनों के रूप में, नए कथाकारों के मुख से निकली रामकथा के रूप में, नारों के रूप में सम्पूर्ण भारत में एक विराट जनजागरण का कार्य करती है। यह रामकथा भारत के हिन्दू समाज के मन में व्याप्त अनन्य राम भक्ति को राष्ट्र भक्ति के रूप में अभिव्यक्त करती है।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>श्रीराम जन्मभूमि आंदोलन के प्रमुख जयघोष</strong></p>
<p style="text-align: justify;">भारत के सर्वदूर ग्रामों में व्याप्त ‘जय सिया राम’, ‘राम-राम’ का अभिवादन इस आंदोलन में ‘जय श्रीराम’ के जयघोष के साथ प्रकट होता है। यह जयघोष भारत में सभी रामभक्तों में, कारसेवकों में एक विशेष प्रकार की ऊर्जा व उत्साह का संचार करता है। आंदोलन के समय कुछ और जयघोष विशेष रूप से प्रचलित हुए, जो उस समय रैलियों व रथ यात्रा में लगते थे और जिन्हें आज भी बोलें तो श्रीराम जन्मभूमि आंदोलन की स्मृतियाँ आँखों के सामने पुनर्जीवित हो उठती हैं। ये जयघोष है- ‘एक ही नारा एक ही नाम जय श्रीराम जय श्रीराम’, जो हिन्दू हित की बात करेगा वही देश पर राज करेगा’, ‘बच्चा बच्चा राम का जन्मभूमि के काम का’। कुछ अति उत्साही युवक ये भी नारे लगाते थे- ‘तेल लगाकर डाबर का नाम मिटा दो बाबर का’, ‘एक धक्का और दो बाबरी ढांचा तोड़ दो’, ‘जय श्रीराम हो गया काम’।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>श्रीराम जन्मभूमि आंदोलन के प्रमुख गीत</strong></p>
<p style="text-align: justify;">आंदोलन के काल में अनेक गीत बने और राष्ट्र व्यापी हुए। इन गीतों ने अपने भावों से समाज को आंदोलन से जोड़ा भी और समाज के मन को उद्वेलित भी किया। ये गीत हर सभा, रथ यात्रा और कार सेवा में लाऊड स्पीकरों पर गूंजते थे। ‘राम लला हम आएँगे, मंदिर वहीं बनायेंगे’, सौगंध राम की खाते हैं मन्दिर वहीं बनायेंगे’, ‘चले अयोध्या, चलें अयोध्या राम काम के काज को’ ये गीत प्रमुख रूप से प्रचलित हुए। ‘राम जी की सेना चली, श्रीराम जी की सेना चली, हर हर महादेव’ यह गीत मूल रूप से रामानन्द सागर की ‘रामायण’ का गीत है, लेकिन जब कारसेवकों के जत्थे निकलते थे तो इस गीत से उनका स्वागत व विदाई होती थी। ‘राम कहानी सुनो रे राम कहानी’ – श्री रविन्द्र जैन के संगीत व आवाज में सजे भजनों ने आंदोलन को गहरा आध्यात्मिक आधार दिया। ‘अयोध्या करती है आह्वान, हाथ से कर मंदिर निर्माण। शिला की जगह लगा दे प्राण, बैठा दे वहाँ राम भगवान।।’ इस प्रकार के गीत ने अयोध्या नगरी व आंदोलन के जीवंत चरित्र को प्रस्तुत किया। भारत की विविध भाषाओं में विभिन्न गीतों की रचना हुई जो समाज व्यापी हुए। राजस्थान में एक गीत बहुत प्रचलित हुआ – ‘कसो लंगोटो ले ल्यो सोटो, अभै अयोध्या जाणो है। बण जाओ बजरंग बली, मन्दिर वहीं बनाणो है।’</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>श्रीराम जन्मभूमि आंदोलन के ऑडियो व वीडियो कैसेट्स</strong></p>
<p style="text-align: justify;">आंदोलन के समय सोशल मीडिया नहीं था और न ही व्हाट्सएप्प, टेलीग्राम जैसे मैसेंजर एप्प थे। देश के कोने-कोने तक वैचारिक सन्देश, ओजस्वी भाषण और प्रेरक गीतों को पहुंचाने का एक मात्र साधन कैसेट्स ही थे। इस आंदोलन में साध्वी ऋतंभरा के ओजस्वी व तीखे भाषणों के ऑडियो कैसेट्स सबसे ज्यादा लोकप्रिय हुए। उनकी ओजपूर्ण वाणी, कविताओं और राष्ट्रवाद से ओत-प्रोत भाषणों ने युवाओं को गहराई से प्रभावित किया। गाँव की चौपालों और नगरों की गलियों में लाऊड स्पीकर लगाकर इनके कैसेट्स बजाए जाते थे। साध्वी ऋतंभरा की तरह प्रखर वक्ता उमा भारती के भाषणों के ऑडियो कैसेट्स भी देशभर में बांटें गए, जिन्होंने धार्मिक व सांस्कृतिक अस्मिता की भावना जगाई। रथ यात्रा व रैलियों में हुए अशोक सिंघल, अटल बिहारी वाजपेयी और लाल कृष्ण आडवानी के वैचारिक भाषणों की रिकार्डेड ऑडियो कैसेट्स को भी प्रसारित किया जाता था।</p>
<p style="text-align: justify;">‘मन्दिर का निर्माण करो’ यह उस समय का सबसे चर्चित ऑडियो एल्बम था। इसमें आंदोलन के मुख्य संकल्प गीत राम लला हम आएँगे.. शामिल थे। कई स्थानों पर प्रतिबन्ध होने के बावजूद इसकी लाखों प्रतियाँ ब्लैक में बिकी। गुलशन कुमार की ‘टी-सीरिज’ कम्पनी ने इस दौर में राम भजनों की बाढ़ ला दी। ‘जय श्री राम’ नाम की ऑडियो कैसेट में शामिल गीतों को उस समय प्रचलित हिंदी फिल्मों के गानों की धुनों पर तैयार किया गया था ताकि वे आम जनता की जुबान पर आसानी से चढ़ सके। उत्तर प्रदेश, बिहार और मध्य प्रदेश के स्थानीय लोक कलाकारों ने स्थानों बोलियों (भोजपुरी, अवधी, बुन्देली) में श्रीराम जन्मभूमि से जुड़े गीतों के कैसेट रिकार्ड कर प्रसारित किए जिससे ग्रामीण भारत इस आंदोलन से सीधे जुड़ गया। कुछ और प्रसिद्ध ऑडियो कैसेट्स हैं- काशी बुल्लू की ‘राम जन्म भूमि अयोध्या’: मैक्स कैसेट्स इंडस्ट्री द्वारा 1991 में जारी यह एक बेहद लोकप्रिय &#8216;बिरहा&#8217; और लोकगीत शैली की ऑडियो कैसेट, कार्यकर्त्ता प्रबोधन की दृष्टि से ‘डॉ. सुब्रमण्यम स्वामी और आचार्य धर्मेंद्र के वक्तव्य’; संतों के संदेश, कारसेवा के निर्देश, अयोध्या पहुँचने के आह्वान गीत के लिए ‘चलो अयोध्या’, भजनों और गीतों के लिए ‘सौगंध राम की खाते हैं’।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>श्रीराम जन्मभूमि</strong> <strong>आंदोलन में काव्य</strong></p>
<p style="text-align: justify;">श्रीराम जन्मभूमि आंदोलन के काल में हिंदी काव्य-जगत में एक समानांतर धारा विकसित हुई, जिसे ‘आंदोलन-काव्य’ कहा जा सकता है। ओज और वीररस प्रधान इन कविताओं में राम को संघर्षशील, न्यायप्रिय और आत्मगौरव के प्रतीक के रूप में चित्रित किया गया। उस समय देश के बड़े-बड़े कवियों की कविताओं को संकलित कर विशेष कैसेट जारी किए जाते थे। इनमें भारत के 500 वर्षों के संघर्ष और हिन्दू मान बिन्दुओं की पुनर्प्रतिष्ठा का वर्णन होता था। साध्वी ऋतंभरा के भाषणों में एक कविता अवश्य रूप में आती थी –</p>
<p style="text-align: center;"><strong>महाकाल बन करके हम दुश्मन से टकराएँगे। जहाँ बनी है मस्जिद, अपना मन्दिर वहीं बनाएंगे।</strong></p>
<p style="text-align: center;"><strong>काशी</strong><strong>, मथुरा, वृन्दावन ने एक साथ हुंकारा है। कहो गर्व से हम हिन्दू है हिन्दुस्थान हमारा है।</strong></p>
<p style="text-align: justify;">वीर रस के कवि हरिओम पंवार ने आंदोलन में अपनी कविताओं से गहरी छाप छोड़ी &#8211;</p>
<p style="text-align: center;"><strong>‘राम दवा है रोग नहीं हैं सुन लेना। राम त्याग है भोग नहीं है सुन लेना।</strong></p>
<p style="text-align: center;"><strong>राम दया है क्रोध नहीं है सुन लेना। राम सत्य है शोध नहीं है जग वालों।</strong></p>
<p style="text-align: center;"><strong>राम हुआ है नाम लोक हितकारी का। रावण से लड़ने वाली खुद्दारी का।’</strong></p>
<p style="text-align: justify;"><strong>श्रीराम जन्मभूमि आंदोलन में रामकथा व कथाकार</strong></p>
<p style="text-align: justify;">रथयात्रा, शिलापूजन और रैली जैसे आयोजनों में दिए गए भाषण रामकथा-प्रसार का सबसे प्रभावी माध्यम सिद्ध हुए। इन भाषणों में वक्ता रामायण के प्रसंगों को ऐतिहासिक-राजनीतिक संदर्भों से जोड़ते थे। राम-वनवास को ‘सांस्कृतिक पराभव’ और राम-राज्याभिषेक को ‘मुक्ति की प्रतीक्षा’ के रूपक के रूप में प्रस्तुत किया जाता था। भाषण-शैली भावना प्रधान व आह्वान करने वाली थी, जिसका उद्देश्य श्रोता को कथा का सक्रिय भागीदार बनाना था। इस आंदोलन में विभिन्न संत-साध्वी ‘राम कथाकार’ के रूप में उभरे। इनमें प्रमुख नाम है- मोरारी बापू, संत आचार्य धर्मेन्द्र, स्वामी रामभद्राचार्य, रमेश भाई ओझा, महंत रामचन्द्र दास परमहंस, स्वामी चिन्मयानन्द सरस्वती, देवराहा बाबा, महंत अवैद्यनाथ, स्वामी वामदेव महाराज, स्वामी परमानन्द गिरी महाराज, साध्वी ऋतंभरा, साध्वी उमाश्री भारती, स्वामी पुरुषोत्तमाचार्य महाराज, स्वामी सत्यमित्रानन्द गिरी महाराज।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>श्रीराम जन्मभूमि आंदोलन पर साहित्य</strong></p>
<p style="text-align: justify;">रामजन्मभूमि आंदोलन के समय ही नरेंद्र कोहली की पूर्व-प्रकाशित रामकथा शृंखला को ‘अभ्युदय’ (1989-1990) नाम से दो वृहद् खंडों में समेकित कर पुनः प्रकाशित किया गया, जो उस समय सांस्कृतिक चेतना का प्रमुख केंद्र बनी। कुछ और प्रमुख पुस्तकें आंदोलन के दौरान प्रकाशित हुई – ‘Ram Janmabhoomi Vs. Babri Masjid: A Case Study in Hindu-Muslim Conflict’ (1990): बेल्जियम के प्रसिद्ध विद्वान डॉ. कोनराड एल्सट द्वारा लिखित, ‘Ayodhya and After: Issues Before Hindu Society’ (1991): डॉ. कोनराड एल्सट की पुस्तक, Hindu Temples: What Happened to Them&#8217; (1990): सीताराम गोयल और सहयोगी लेखकों द्वारा संकलित। कुछ पुस्तकें बाद में प्रषित हुई, पर उनका सम्बन्ध आंदोलन की कड़ियाँ ही थी – मीनाक्षी जैन की ‘राम और अयोध्या’, हेमंत शर्मा की ‘युद्ध में अयोध्या’ और ‘राम फिर लौटे’।</p>
<p style="text-align: justify;">श्रीराम जन्मभूमि आंदोलन का व्याप जितना विस्तृत व व्यापक था, उस समय उपजी रामकथा भी उतनी ही विस्तृत व व्यापक है। वह रामकथा जिसने भारत के जनमानस पर छाप छोड़ी। रामचरितमानस के बालकाण्ड में तुलसीदास जी ने लिखा है – “हरी अनंत हरी कथा अनंता। कहहिं सुनहिं बहुबिधि सब संता॥” इसके अनुसार श्रीराम जन्मभूमि की रामकथा भी अनंत है।</p>
<p><strong><span style="color: #ff0000;">और पढ़े:</span></strong> <span style="color: #0000ff;"><strong><a style="color: #0000ff;" href="https://rashtriyashiksha.com/ram-katha-in-tribal-area/" target="_blank" rel="noopener">रामायण सत कोटि अपारा-7 (जनजातीय क्षेत्रों में राम कथा)</a></strong></span></p>
<p style="text-align: justify;">(लेखक विद्या भारती जोधपुर प्रान्त के संगठन मंत्री है।)</p>
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		<title>संस्कार और साक्षरता</title>
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		<dc:creator><![CDATA[राष्ट्रीय शिक्षा]]></dc:creator>
		<pubDate>Thu, 17 Sep 2026 13:41:22 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[दिलीप बेतकेकर]]></category>
		<category><![CDATA[नवीनतम]]></category>
		<category><![CDATA[हम सरस्वती पुत्र]]></category>
		<category><![CDATA[IKS]]></category>
		<category><![CDATA[Rashtriya shiksha]]></category>
		<category><![CDATA[भारतीय ज्ञान परम्परा]]></category>
		<category><![CDATA[राष्ट्रीय शिक्षा]]></category>
		<category><![CDATA[संस्कार और साक्षरता]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>&#8211; दिलीप बेतकेकर ‘साक्षर जनता &#8211; भूषण भारत’, (जनता साक्षर हो तो भारत विभूषित होगा) ‘साक्षरतेचा दिवा घरोघर लावा’, (साक्षरता का दीपक हर घर में जले), ये और इस जैसी&#8230; </p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: right;">&#8211; दिलीप बेतकेकर</p>
<p style="text-align: justify;">‘साक्षर जनता &#8211; भूषण भारत’, (जनता साक्षर हो तो भारत विभूषित होगा) ‘साक्षरतेचा दिवा घरोघर लावा’, (साक्षरता का दीपक हर घर में जले), ये और इस जैसी अनेक घोषणाएं आजकल सर्वत्र दिखाई-सुनाई पड़ती हैं। प्रचार-प्रसार माध्यमों के द्वारा भी साक्षरता का प्रचार हो रहा है। स्वतंत्रता प्राप्ति पश्चात कितने ही वर्षों की अवधि बीत जाने पर अभी भी जनता निरक्षर है यह बात गौरव के प्रतिकूल है। साक्षरता योजना का प्रभाव शंकास्पद रहा है।</p>
<p style="text-align: justify;">यद्यपि उद्देश्य अच्छा है। सभी स्तरों पर साक्षरता हेतु प्रयास निरंतर चल रहे हैं। यह अच्छी बात है।</p>
<p style="text-align: justify;">आजकल की परिस्थिति को देखते हुए केवल साक्षरता पर ही दबाव बनाना उचित नहीं है। कोई व्यक्ति साक्षर होते हुए भी संस्कारवान न हो तो साक्षर व्यक्ति को राक्षस बनने में देर नहीं लगेगी। अपने देश में कुछ समय पूर्व घटित और अभी भी निरंतर घट रही घटनाएं इस ओर संकेत करती हैं। बड़ी-बड़ी आर्थिक चोरी वाली घटनाओं को अंजाम देने वाले निरक्षर नहीं हैं, उच्च विद्या विभूषित व्यक्ति हैं। बम विस्पफोट घटनाओं में प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से लिप्त व्यक्ति निरक्षर नहीं। अच्छे पदवीधर व्यक्ति, साक्षर व्यक्ति हैं। किन्तु उनका व्यवहार देखते हुए ‘राक्षस’ कहने की इच्छा ही होगी। देशभक्ति का संस्कार नहीं, सामाजिक बंधनों के संस्कार नहीं। परिणामस्वरूप अन्य किसी का कुछ भी हो, मुझे आरामतलब जिंदगी बिताना है, यही उद्देश्य रहता है। सत्ता की कुर्सी हथियाने हेतु प्रयास, एक दूसरे की टांग खींचने की स्पर्धा, ये सब केवल निरक्षर व्यक्ति करते हैं ऐसी बात नहीं। अपनी विद्या का, साक्षरता का, उपयोग (दुरुपयोग) ये साक्षर व्यक्ति स्वयं के भरने हेतु करते हैं। घिन आती है, इन तथाकथित ‘साक्षर’ व्यक्तियों को देखकर।</p>
<p style="text-align: justify;">इसका अर्थ ये नहीं कि साक्षरता के महत्व को कम आंका जाना चाहिए, किन्तु साक्षरता संस्कारों के साथ हुए बिना साक्षरता का कोई अर्थ नहीं। ‘शिक्षा एक द्विधारी तलवार जैसी है’ ऐसा डॉ॰ बाबा साहब अंबेडकर कहते थे। इस शस्त्र का उपयोग सावधानीपूर्वक होना चाहिए। आज हम देखते हैं कि इस शस्त्र का प्रयोग स्वयं के लाभ हेतु और समाज के अहित के लिये हो रहा है। इसीलिए संस्कारों की आवश्यकता पूर्व की अपेक्षा आजकल अधिक हो रही है।</p>
<p style="text-align: justify;">संस्कार और साक्षरता दोनों का सहकार आवश्यक है। हमें केवल ‘शिक्षित’ नहीं, वरन ‘सुशिक्षित’ लोग चाहिए। जब साक्षरता का मेल संस्कारों से होगा तभी ‘सुशिक्षित’ मानव का गठन हुआ माना जायेगा। तब दूध में शक्कर मिलने समान अनुभव होगा, स्वर्ण सुगंधित हो जाएगा।</p>
<p style="text-align: justify;">‘संस्कार’ मतलब क्या? ये संस्कार किसलिये? ऐसे प्रश्न अनेक बार पूछे जाते हैं।</p>
<p style="text-align: justify;">‘संस्कार’ का अर्थ यदि समझ लिया जाये तो ‘किसलिये हैं ये संस्कार?’ ऐसे प्रश्न नहीं पूछे जायेंगे। ‘संस्कार’ शब्द का शब्दकोष में लिखा अर्थ है पूर्णता, शुद्ध, परिणाम, समाप्ति। किसी बात में पूर्णता लाने के लिये जो कुछ किया जाता है उसे संस्कार कह सकते है, अथवा अंतिम परिणाम प्राप्ति के लिये जो रचनात्मक कार्य आवश्यक है उसे संस्कार कहना ठीक होगा। उदाहरण के लिये &#8211; मूर्तिकार को मूर्ति बनानी है। इस हेतु उसे मिट्टी की आवश्यकता है। किन्तु जिस रूप में है वैसी ही मिट्टी लेकर मूर्ति नहीं बन सकती। मूर्ति गढ़ने के लिये उपयुक्त मिट्टी तैयार करनी पड़ेगी। मिट्टी में से कंकर-पत्थर, कचरा आदि अनावश्यक वस्तुओं को अलग करना पड़ता है। मिट्टी को छानना पड़ता है। उचित मात्रा में पानी मिलाकर गूंधना पड़ेगा। मिट्टी अधिक पतली न हो, न ही अधिक कठोर, इसकी सावधानी मूर्तिकार अवश्य रखेगा। मूर्तिकार मिट्टी के साथ जो ये सब प्रक्रियाएं करता है उसे मिट्टी का संस्कार कहते हैं। शिल्पकार भी पत्थर पर इसी प्रकार संस्कार करता है। लेखक भी जो कुछ लिखता है उस पर संस्कार करता है अर्थात् पूर्णता लाने के लिये जो कुछ करना पड़ता है उसे मोटे तौर पर संस्कार कह सकते हैं।</p>
<p style="text-align: justify;">जब निर्जीव वस्तुओं पर संस्कार करने की आवश्यकता होती है तो मनुष्य के लिये संस्कार की कितनी आवश्यकता होगी, इसकी कल्पना कर सकते हैं। निर्जीव के सम्बन्ध में एक सुविधा है। पत्थर को एक आकार दे दिया तो वह बदलता नहीं, परन्तु मनुष्य के सम्बन्ध में ऐसा नहीं है। मनुष्य का मन अति चंचल है। पल-पल मन के विचार बदलते रहते हैं। बुद्धि को रास आई कोई बात प्रत्यक्ष कार्यान्वित होगी या नहीं, कहना कठिन है। इसलिये मानवीय मन पर केवल एक बार संस्कार करना पर्याप्त नहीं होता। संस्कार निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है मानव के समबन्ध में।</p>
<p style="text-align: justify;">‘किसलिये ये संस्कार?’ प्रश्न पूछने वाले व्यक्ति को किसी ने धोखा दिया, लूट लिया, कोई उससे झूठ बोला तो उसे बुरा लगेगा। उसकी अपेक्षा होती है कि सभी लोग उससे सच बोलें, ईमानदारी बरतें, उसे धोखा न दें इत्यादि। अब यदि सच बोलना आदि संस्कार सामने वाले मनुष्य पर नहीं हुआ हो तब वह आपसे अच्छा व्यवहार, ईमानदारी का बर्ताव नहीं कर सकता और इस प्रकार का गलत व्यवहार हमें पसन्द नहीं होगा। इसलिये आवश्यक है संस्कार। ये संस्कार कैसे होते हैं?</p>
<p style="text-align: justify;">शासकीय सेवा में कार्यरत माता-पिता को जब ध्यान में आता है कि उनके पुत्र ने पिता की जेब से 4-5 रुपये की चोरी की है तब वे नाराज होते हैं। उससे भी अधिक उन्हें बुरा लगा, दुःख हुआ। हम अपने बच्चे को प्यार-दुलार करते हैं, उसकी सभी इच्छाएं पूरी करते हैं, उसका कौतुक देखते हैं, फिर भी उनके लाड़ले ने चोरी की। इस घटना से दोनों ही दुःखी हुए। बच्चे को दोबारा ऐसा कार्य नहीं करना चाहिये ऐसा वह सोचने लगे। उन्होंने बच्चे को एक कॉपी-पेन्सिल दी और कॉपी पर ‘चोरी कभी नहीं करना’ वाक्य पांच सौ बार लिखने को कहा। बच्चा लिखने लगा। परन्तु जिस पेन्सिल से वह बच्चा लिख रहा था वह पेन्सिल माता अपने ऑफिस से लायी है और जिस कॉपी पर वह लिख रहा था वह पिताजी के ऑफिस से आयी है ये उस बच्चे को मालूम था। इसलिये ‘चोरी कभी नहीं करना’ वाक्य को वह पांच सौ क्या पांच हजार बार लिखे तब भी चोरी न करने का संस्कार कभी होना संभव नहीं।</p>
<p style="text-align: justify;">‘चोरी कभी नहीं करना’ ये वाक्य बच्चा लिख सकता है, पढ़ सकता है अर्थात् बच्चा ‘साक्षर’ हुआ। किन्तु वैसा व्यवहार करना उसकी आदत में नहीं आया क्योंकि उसका संस्कार नहीं बना अर्थात् बच्चा साक्षर हुआ, शिक्षित हुआ किन्तु सुशिक्षित नहीं।</p>
<p style="text-align: justify;">समाज की गाड़ी ठीक से चले इसलिये कुछ नियम बने हैं। ये नियम लिखने-पढ़ने में आयें इतना पर्याप्त नहीं। प्रश्न उठता है उन नियमों का पालन करने का। यहीं ‘संस्कार’ का विचार करना पड़ता है। सभी कृतियों का उद्गम स्थान ‘मन’ ही होने के कारण उसका संस्कारित होना महत्वपूर्ण है।</p>
<p style="text-align: justify;">साक्षरता का महत्व सभी को ज्ञात है। शाला में क्यों भेजना? क्यों पढ़ाई करना? ऐसे प्रश्न आजकल पूछे नहीं जाते। अशिक्षित व्यक्ति को भी अपने बच्चे की पढ़ाई होना आवश्यक है, ऐसा समझ में आता है। किन्तु संस्कारों का अभाव रहता है। अनेक शिक्षित पालकों को अपने बच्चे का परीक्षा में प्रथम आना भाता है और वे यह समझते हैं कि सब कुछ पा लिया। वह प्रथम स्थान किसी भी प्रकार से प्राप्त हो, इसका विचार वे नहीं करते।</p>
<p style="text-align: justify;">एक परीक्षा केन्द्र पर निरीक्षक को बड़े पैमाने पर ‘नकल’ के सम्बन्ध में पता चला। उन्होंने ऐसे छात्रों पर कठोर कार्यवाही करते हुए सभी नकलची छात्रों को बाहर कर दिया। वे लड़के बाहर चले गये। कुछ देर पश्चात वे और उनके पालक आ गये और उस परीक्षा केन्द्र पर पथराव करने लगे। अंत में पुलिस की सुरक्षा में निरीक्षक शिक्षा अधिकारियों को वापिस भेजना पड़ा। ये साक्षरता देश को कहां पहुंचाएगी।</p>
<p style="text-align: justify;">एक चीनी कहावत है, ‘आपको एक वर्ष की व्यवस्था करनी है तो अनाज बोएं, दस वर्ष की व्यवस्था करनी है तो वृक्षारोपण करो और सौ वर्ष की व्यवस्था करनी है तो मनुष्य का गढ़न करो।’</p>
<p style="text-align: justify;">और ऐसे मनुष्य गढ़ने के लिए ‘संस्कार और साक्षरता’ दोनों ही अत्यंत आवश्यक हैं।</p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>और पढ़े:</strong></span> <strong><span style="color: #0000ff;"><a style="color: #0000ff;" href="https://rashtriyashiksha.com/bharatiya-concept-of-personality-development/" target="_blank" rel="noopener">व्यक्तित्व विकास की भारतीय संकल्पना</a></span></strong></p>
<p style="text-align: justify;">(लेखक शिक्षाविद, स्वतंत्र लेखक, चिन्तक व विचारक है।)</p>
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		<title>रामायण सत कोटि अपारा-7 (जनजातीय क्षेत्रों में राम कथा)</title>
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		<dc:creator><![CDATA[राष्ट्रीय शिक्षा]]></dc:creator>
		<pubDate>Sat, 15 Aug 2026 04:58:12 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[नवीनतम]]></category>
		<category><![CDATA[रामायण सत कोटि अपारा]]></category>
		<category><![CDATA[श्री रवि कुमार जी]]></category>
		<category><![CDATA[Rashtriya shiksha]]></category>
		<category><![CDATA[भारतीय ज्ञान परम्परा]]></category>
		<category><![CDATA[रामकथा]]></category>
		<category><![CDATA[राष्ट्रीय शिक्षा]]></category>
		<category><![CDATA[श्रीराम]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>Ram katha in tribal area&#x270d; रवि कुमार “राम आव्या जंगल मां, लक्ष्मण संग चाल्या। शबरी माय बेर लई, प्रेम थी थाळ भराल्या॥” “मीठा बेर चाखी-चाखी, राम ने अर्पण काया। जात&#8230; </p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: right;">Ram katha in tribal area<img src="https://s.w.org/images/core/emoji/17.0.2/72x72/270d.png" alt="✍" class="wp-smiley" style="height: 1em; max-height: 1em;" /> रवि कुमार</p>
<p style="text-align: center;"><strong>“राम आव्या जंगल मां</strong><strong>, लक्ष्मण संग चाल्या। </strong></p>
<p style="text-align: center;"><strong>शबरी माय बेर लई, प्रेम थी थाळ भराल्या॥”</strong></p>
<p style="text-align: center;"><strong>“मीठा बेर चाखी-चाखी</strong><strong>, राम ने अर्पण काया। </strong></p>
<p style="text-align: center;"><strong>जात न पूछे रामजी, प्रेम देख राजी थाया॥”</strong></p>
<p style="text-align: justify;">उपरोक्त गीत भील जनजाति में गाया जाने वाला भीली लोकभाषा का गीत है जो वहाँ विवाह आदि प्रसंग पर गाया जाता है। इस प्रसंग में शबरी माता व श्रीराम का उल्लेख है।</p>
<p style="text-align: justify;">रामकथा भारत की सांस्कृतिक परम्परा का जनजातीय आधार भी है। जनजाति क्षेत्रों में रामकथा लिपिबद्ध नहीं है। उसका स्वरूप मौखिक है। रामकथा का यह मौखिक स्वरूप श्रुति-स्मृति के आधार पर पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ता रहा है। जनजाति समाज ने राम को वन का नायक माना है। अलग अलग जनजाति में रामकथा के अलग अलग प्रसंग प्रचलित है। सम्पूर्ण रामकथा किसी जनजाति में प्रचलित है, ऐसा कहना संभव नहीं होगा और इसे खोज पाना भी अत्यंत दुर्लभ है।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>भारत में जनजातीय क्षेत्र</strong></p>
<p style="text-align: justify;">भारत में लगभग 11 करोड़ जनजाति समाज है। ये 11 करोड़ लोग भारत के लगभग 1।5 लाख ग्रामों में बसते हैं। भारत की जनजातियाँ 800+ भाषाई रूपों से जुड़ी हैं और लगभग 90% जनजातियाँ ग्रामीण व वन्य क्षेत्रों में रहती हैं। भारत में जनजातियाँ मुख्यतः तीन बड़े भौगोलिक क्षेत्रों में केंद्रित हैं – 1. <strong>मध्य भारतीय जनजातीय पट्टी</strong> (राजस्थान, गुजरात, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, झारखंड, ओडिशा, महाराष्ट्र – यहाँ लगभग 55-60% जनजातियाँ) 2. <strong>पूर्वोत्तर जनजातीय क्षेत्र </strong>(असम, नागालैंड, मिजोरम, मेघालय, अरुणाचल, त्रिपुरा, मणिपुर &#8211; कई राज्यों में जनजातियाँ बहुसंख्यक) 3. <strong>दक्षिण भारतीय जनजातीय क्षेत्र (</strong>आंध्रप्रदेश, तेलंगाना, कर्नाटक, तमिलनाडु, केरल)। भारत में 705 जनजातियाँ मान्यता प्राप्त है। भारत की प्रमुख जनजातियों में भील, गोंड, संथाल, मीणा, मुंडा, उरांव, नागा समूह, खासी, बोडो, हो, कोय, गरासिया, टोडा, चेचु, अंडमानी जनजातियाँ है। सामान्यतः सभी जनजातियाँ अपनी आजीविका के लिए कृषि व वन उत्पाद पर निर्भर हैं। जनजातीय क्षेत्रों में शिक्षा का स्तर राष्ट्रीय औसत से कम है, परन्तु यहाँ की संस्कृति अत्यंत समृद्ध है और इनका प्रकृति से संबंध उच्च स्तर का है। दण्डकारण्य क्षेत्र (छत्तीसगढ़, ओड़िसा, महाराष्ट्र, आंध्रप्रदेश के हिस्सों में फैला हुआ) रामकथा व जनजातीय संस्कृति का प्रमुख क्षेत्र है।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>रामकथा की मौखिक-वाचिक परम्परा</strong></p>
<p style="text-align: justify;">मौखिक-वाचिक स्वरुप में रामकथा भारत के जनजाति समाज में व्याप्त होकर भारत की सांस्कृतिक परम्परा को आगे बढ़ाती है और वहाँ के समाज में जीवन मूल्यों को खड़ा करती है। रामकथा से उपजे व जनजाति समाज में व्याप्त हुए जीवन मूल्य सर्वदूर अभिव्यक्त हो रहे हैं। रामकथा का यह स्वरूप वहाँ की स्थानीय लोकभाषा/बोली में विभिन्न अवसरों पर गए जाने वाले गीतों, भजनों, नृत्य गीतों, कथा प्रसंगों, दन्त कथाओं, नाटकों, धार्मिक अनुष्ठानों आदि रूपों  में प्रकट होता है। मूलतः जनजाति समाज धर्म परायण है। मातृभूमि के प्रति उसके मन में गहरा लगाव है। भारत भक्ति उसके कण कण में व्याप्त है। वह प्रकृति का पूजक व संवर्धक है। यह धर्म परायणता, मातृभूमि प्रेम, भारत भक्ति, प्रकृति संवर्धन का स्रोत राम कथा ही है, ऐसा कहा जाए तो अतिशयोक्ति नहीं होगी।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>रामकथा की विविधता</strong></p>
<p style="text-align: justify;">जनजातीय क्षेत्रों में रामकथा ने स्थानीय जीवनशैली, संस्कृति, भाषा और संवेदना के अनुरूप स्वरूप ग्रहण किया है। इन क्षेत्रों में राम केवल एक ईश्वर नहीं, बल्कि मानव, वीर, बंधु, लोकनायक और कभी-कभी एक सहज ग्रामीण के रूप में भी प्रकट होते हैं।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>गोंड समाज</strong> में राम वीर पुरुष हैं। वे गोंड परंपरा के ‘संघर्षशील योद्धा’ के रूप में प्रतिष्ठित हैं। सीता को ‘धरती की पुत्री’ और राम को ‘वन का रक्षक’ कहा जाता है। <strong>उरांव समाज</strong> में राम न्यायप्रिय राजा हैं। यहाँ शबरी प्रसंग विशेष रूप से लोकप्रिय है, जिसमें शबरी को ‘माता’ के रूप में सम्मानित किया जाता है। राम वनवासी नहीं, ‘जनप्रिय अतिथि’ के रूप में आते हैं। <strong>रामकथा संथाल</strong> लोकगीतों में ‘सोहराय’ पर्व के समय गाई जाती है। <strong>भीलों की रामकथा</strong> में राम वन का अतिथि नहीं, बल्कि भील समाज का सदस्य है। <strong>निषादराज</strong> और <strong>शबरी प्रसंग</strong> को विशेष महत्व दिया गया है। <strong>कोलाम समाज</strong> राम को ‘रामा’ नाम से पुकारता है। उनकी कथा में सीता और लक्ष्मण के पात्र गौण हैं, जबकि राम का संघर्षपूर्ण जीवन केंद्रीय बिंदु होता है। <strong>कोया जनजातियों</strong> में राम और सीता की पूजा जंगल के देवता और देवी के रूप में की जाती है। राम को ईश्वर नहीं, बल्कि लोक रक्षक के रूप में माना जाता है। <strong>डांग समाज</strong> में रामलीला ‘डांग दरबार’ के समय होती है। यह केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि सामाजिक उत्सव होता है। <strong>बैगा जनजाति </strong>की रामकथा में <strong>लव-कुश</strong> की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण है। लव-कुश को स्वतंत्र योद्धा, लोकनायक और अपने माँ के रक्षक के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। <strong>राभा जनजाति</strong> समाज में भारीगान के नाट्य मंचन में ‘रावण वध’ और ‘लक्ष्मणार शक्तिसेल’ सम्मिलित हैं। इन दोनों कथाओं में राम की सामाजिक जिम्मेदारी अपने अनुगामियों के प्रति स्नेह और देशभक्ति को प्रस्तुत किया जाता है। <strong>मिजो रामकथा</strong> में अपनी अलग कथावस्तु है। जो वाल्मीकी रामायण का सारांश ग्रहण करती है, परंतु उसमें वन्य तत्व अधिक विद्यमान हैं।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>रामकथा इन नामों से प्रचलित</strong></p>
<p style="text-align: justify;">राजस्थान तथा गुजरात के भीलांचल में <strong>‘राम-सीतामानी वारता’</strong> के नाम से रामकथा की वाचिक परंपरा रही है। ‘भीलों के भारथ’ की ही तरह से इस कथा का संकलन भगवानदास पटेल ने किया है। इसमें कुल तीस सर्ग हैं। मुण्डारी रामायण पूर्वी भारत के मुंडा जनजाति में रामकथा का एक अनूठा रूपभेद है। यह मुंडारी साहित्य की मौखिक-वाचिक परंपरा को समृद्ध करता है। कार्बी समुदाय के लोग असम, अरुणाचल, मेघालय, मिजोरम एवं नागालैंड के कुछ हिस्सों में रहते हैं। कालांतर में वैष्णव प्रभाव स्वरूप इनकी मौखिक परंपरा में ‘कार्बी रामायण’ रामकथा का प्रवेश हुआ। बिरहोर रामायण के अनुसार राजा जनक के राज्य में भीषण अकाल पड़ा। गोंड समुदाय में प्रचलित राम कथा में राम की तुलना में सीता को महत्व दिया गया है और उसके बाद लक्ष्मण को। बंजारा (लंबाणी) रामायण में वाल्मीकि और तुलसी कृति राम-कथाओं का एक तरह से ‘जनजातिकरण’ हो गया है।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>रामकथा के जनजातीय पात्र</strong></p>
<p style="text-align: justify;">श्रीराम की वन गमन यात्रा में जनजातीय पात्र है। इन्हीं जनजातीय पात्रों से जुड़े प्रसंगों के कारण भी रामकथा जनजाति क्षेत्रों में प्रचलित है। ये पात्र है- निषादराज गुह, केवट, शबरी, गिद्धराज जटायु, सुग्रीव, हनुमान, जाम्बवन्त, अंगद।</p>
<p style="text-align: justify;">भीली–निषादी लोकगीत के रूप में प्रचलित है &#8211; “गुहा राजा घाट खड़ा, राम लियो अंग लाइ। वन औ नगर एक भए, मित्रता री छाँव छाई॥” केवट लोकभजन के रूप में पूर्वी भारत में गाया जाता है &#8211; “पहिले पाँव पखारब राम, तब नैया चढ़इब हो। मोरे घाट पधारे आज, भाग जगइब हो॥” भील शबरी गीत में राम के वन आगमन को बताया है &#8211; “शबरी रै बेर सजाया, राम आवे वनमां। मीठा-तीता परख परख, धर्या प्रेम थाल मां॥” गोंडी वीरगाथा में जटायु का वर्णन है &#8211; “जटायु पंख पसार उड़े, सीता राखन जाय। प्राण दिए वन धर्म खातिर, राम नाम सुनाय॥” गोंड जनजाति में राम-सुग्रीव मित्रता का उल्लेख आता है &#8211; “सुग्रीवा टोला बोलाया, राम संग हाथ मिलाया। जंगल जन सब साथ चले, रावन राज गिराया॥” गोंड–भील वीर गीत में हनुमान की वीरता को दर्शाया है &#8211; “हनुमंत जंगल रो वीर, राम दूत कहाय। डोंगर फांदी उड़ चल्यो, सीता खबर लाय॥” लोककथा गीत जाम्बवंत के बारे में बताया है &#8211; “जामवंत बूढ़ा ज्ञानी, वीरन राह बताय। भूल गयो बल हनुमंत, शक्ति याद दिलाय॥” युद्ध गीत के रूप में अंगद &#8211; “अंगद पांव जमाय खड़ा, लंका डोले सारी। वन के बालक शक्ति देख, डरी रावन सवारी॥”</p>
<p style="text-align: justify;">स्वामी विवेकानंद ने उदधृत किया &#8211; “भारत की आत्मा ग्रामों और वनों में निवास करती है; रामायण इसी जीवित भारत की कथा है।” आचार्य विनोबा भावे में ‘<em>गीता प्रवचन एवं रामायण चिंतन व्याख्यान’ </em>में कहा है- “रामायण भारत की लोक आत्मा है। इसे जनजातियों ने गाया, जिया और पीढ़ी-दर-पीढ़ी सुरक्षित रखा।” रामधारी सिंह दिनकर अपनी कृति ‘संस्कृति के चार अध्याय’ में कहते है &#8211; “राम केवल अयोध्या के नहीं, वन और पर्वतों के भी नायक हैं।”</p>
<p><span style="color: #0000ff;"><strong>और पढ़े: <a style="color: #0000ff;" href="https://rashtriyashiksha.com/shri-ram-van-gaaman-sthal/" target="_blank" rel="noopener">रामायण सत कोटि अपारा-6 (श्रीराम वन गमन स्थल)</a></strong></span></p>
<p style="text-align: justify;">(लेखक विद्या भारती जोधपुर प्रान्त के संगठन मंत्री है।)</p>
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		<title>सौम्या की सखी</title>
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		<dc:creator><![CDATA[राष्ट्रीय शिक्षा]]></dc:creator>
		<pubDate>Sat, 15 Aug 2026 04:04:48 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[कथा-कहानी]]></category>
		<category><![CDATA[कथा/कहानी]]></category>
		<category><![CDATA[गोपाल माहेश्वरी]]></category>
		<category><![CDATA[नवीनतम]]></category>
		<category><![CDATA[Rashtriya shiksha]]></category>
		<category><![CDATA[भारतीय ज्ञान परम्परा]]></category>
		<category><![CDATA[राष्ट्रीय शिक्षा]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>&#8211; गोपाल माहेश्वरी सौम्या आज बहुत उदास थी। आज उसके विद्यालय के छात्रावास में विभिन्न प्रतियोगिताओं में विद्यालय का प्रतिनिधित्व करने हेतु चयन प्रक्रिया चल रही थी। गीत गायन, कहानी&#8230; </p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: right;">&#8211; गोपाल माहेश्वरी</p>
<p style="text-align: justify;">सौम्या आज बहुत उदास थी। आज उसके विद्यालय के छात्रावास में विभिन्न प्रतियोगिताओं में विद्यालय का प्रतिनिधित्व करने हेतु चयन प्रक्रिया चल रही थी। गीत गायन, कहानी कथन, श्लोक वाचन, तत्काल भाषण, वाद प्रतिवाद चित्रकला आदि कितनी ही प्रतियोगिताओं के लिए बच्चों का चयन हो रहा था। लेकिन उसका चयन तो किसी में भी नहीं हुआ।</p>
<p style="text-align: justify;">विद्यालय में ही एक ओर कुछ बच्चे रंगोली, चित्रकला और मूर्तिकला का अभ्यास कर रहे थे। सौम्या ठिठकी फिर स्वयं ही बुदबुदाते हुए आगे बढ़ गई। इनमें से कुछ भी उससे हो पाएगा ऐसा उसे स्वयं नहीं लगा। वह अपने विचारों में उलझी विद्यालय के मैदान की ओर बढ़ चली।</p>
<p style="text-align: justify;">मैदान में एक ओर गोला फेंक, चक्का फेंक, भाला फेंक की चयन परीक्षा चल रही थी। सुधीर जी बच्चों को अवसर दे रहे थे। उन्होंने सौम्या से भी पूछा “सौम्या! तुम भी प्रयास करोगी?” सौम्या के मन पर पड़ी निराशा की कठोर परत में जैसे एक दरार सी बनी। उसे लगा कुछ ऐसा है जो उसके मन में बाहर निकलने को छटपटा रहा है। उसने भाला पकड़ा और उछाल दिया लेकिन यह क्या! वह सीधे जाने की अपेक्षा वहाँ खड़े बच्चों की ओर जाकर गिर गया। सब उपहासपूर्वक  हँस पड़े।</p>
<p style="text-align: justify;">“लक्ष्मीबाई राणा प्रताप बनने का प्रयास करें तो ऐसा ही होता है।” पता नहीं बच्चों की भीड़ में से किसने मुंह छुपाकर यह जुमला उछाला था पर व्यंग्य का यह भाला पहले से निराश सौम्या के मन में गहरे धंस गया। वह संभवतः रो देती पर तभी परिदृश्य बदल गया। सहपाठियों में हास्यविनोद चलता रहता है लेकिन कोई महापुरुषों को लेकर उपहास करे यह सुधीर जी को बिल्कुल पसंद न था। वे खेल और अनुशासन का संबंध बहुत गहरा मानते थे। खेल यानी उद्दंडता कभी नहीं, जरा भी नहीं।</p>
<p style="text-align: justify;">वे क्रोध से आगबबूला बने बच्चों की भीड़ में घुसे और पीछे खिसक चुके लक्षित को पकड़ कर सबके बीच ले आए। वे आवाज से पहचान चुके थे कि यह उद्दंडता उसी की है। अब लक्षित थरथर काँप रहा था।</p>
<p style="text-align: justify;">कान पकड़ कर गिड़गिड़ाने लगा “अब नहीं करूंगा, माँ कसम।”</p>
<p style="text-align: justify;">एक झन्नाटेदार थप्पड़ और पड़ा “माँ की कसम खाते हो? निभा पाओगे? माँ का महत्व समझते हो?” बात बढ़ती देख सुशांत जी ने उसे छुड़वाया “माफी मांगों सौम्या से और अब कभी मैदान में दिखना मत। समझे?”</p>
<p style="text-align: justify;">लक्षित ने सौम्या से क्षमा तो मांगी पर जाते-जाते धीरे से फुसफुसाता गया “देख लूँगा तुझे तो।”</p>
<p style="text-align: justify;">सौम्या डरी। उसकी तो कोई गलती ही न थी। प्रतियोगिता में चयन तो दूर एक नया ही बखेड़ा खड़ा हो गया था।</p>
<p style="text-align: justify;">वह आशंका और अनमनेपन के साथ वहाँ से चल पड़ी। एक एकांत कोने में खड़े बूढ़े पीपल के नीचे बने चबूतरे की धूल झाड़ कर बैठ गई। पतझर आरंभ हो चुका था। पीपल के सूखे पत्ते हवा से टूटकर गिर रहे थे। चारों ओर सूखे पत्ते बिखरे थे। सौम्या अपने ही विचारों में उलझी उन पर चलने लगी। चरमर चरमर की आवाज से उसके पैरों के नीचे आने वाले पत्ते चूरचूर हो रहे थे। उसने झुककर थोड़ा चूरा हथेली पर रखा और फूंक से उड़ाते हुए बोली “सौम्या”। उसे लगा उसका भविष्य भी इन सूखे पत्तों जैसा ही है। उसका यह विद्यालय में अंतिम वर्ष था। क्या उसे खाली हाथ ही विद्यालयीन जीवन को विदा देनी है? उसे खोजते हुए उसकी सहेली स्वरिता उधर आ गई। सौम्या का ध्यान नहीं था वह तो अपने विचारों के शोर में ऐसी खोई हुई थी कि उसे स्वरिता के आने की आहट भी न सुनाई दी।</p>
<p style="text-align: justify;">स्वरिता ने उसे पत्तों का चूरा उड़ाते देख लिया था। उसे मैदान वाली घटना भी पता लगी थी। वह सौम्या के कांधे पर हाथ रखे बोली “पतझर हमेशा नहीं रहता।” सौम्या चुपचाप रही। स्वरिता ने अपनी सहेली का हाथ हाथों में लिया और बोली “भगवान ने सबके हाथ में कोई न कोई रेखा बनाई है सौम्या! ऐसा कोई भी नहीं जिसके हाथ में कुछ भी नहीं।” तभी पेड़ पर कोई अनजानी-सी चिड़िया ने अलग-सी आवाज निकाली। पीपल की एक कोमल कोंपल टूटकर अपनी हथेली गिरी।</p>
<p style="text-align: justify;">“लो, ईश्वर ने संकेत भी दे दिया।” सौम्या की अंगुली उस तांबे जैसे रंग के रेशम जैसे सुकोमल कोमल पत्ते पर घूमने लगी।</p>
<p style="text-align: justify;">चिड़िया फिर बोली। स्वरिता ने कहा “यह कौनसी चिड़िया है?”</p>
<p style="text-align: justify;">“पता नहीं।” सौम्या का मौन टूटा। वह उस पत्ते को डंडी से पकड़ चुटकी में पकड़ घुमाते हुए बोली।</p>
<p style="text-align: justify;">स्वरिता कहने लगी “यह मैना नहीं, कोयल या बुलबुल नहीं, न ही गौरैया या श्यामा है। इसका नाम मुझे नहीं पता, तुम्हें नहीं पता, शायद इसे भी पता न हो, पर यह इस पतझड़ में इस पेड़ पर गाने चली आयी। कौन सुनेगा इसे यहाँ? पर इसे गाना है। कोई सुने तो शायद इसे गाना भी न माने क्योंकि यह कोयल, मैना या बुलबुल जैसी नहीं है।”</p>
<p style="text-align: justify;">“फिर कैसी है?” सौम्या के मुख से उदासी दूर जाती दिखी।</p>
<p style="text-align: justify;">“यह इसी के जैसी है। इसका नाम प्रसिद्ध नहीं। इसकी विशेषता यहाँ कोई नहीं जानता। इसकी योग्यता का अभी कोई नाम नहीं पर यह अपने को व्यक्त कर रही है। परमात्मा के प्रति इस विश्वास के साथ कि उसे भी खाली नहीं भेजा है उसने इस संसार में।”</p>
<p style="text-align: justify;">सौम्या मुस्कुराई। चिड़िया फिर बोली जैसे उसका समर्थन कर रही हो। दोनों सहेली अपने छात्रावास के कक्ष की ओर चल पड़ीं। पर मन का क्षोभ अभी पूरा हटा न था। उसने पानी की बोतल ली, अपनी साइकिल उठाई और स्वरिता को पीछे केरियर पर बिठाकर घूमने चल दी।</p>
<p style="text-align: justify;">छात्रावास से थोड़ी ही दूर चौराहे पर दाहिनी ओर मोटर साइकिल से कोई गिरा हुआ था तीन-चार लोग उसे घेरे खड़े थे। पास से गुजरते हुए इन सहेलियों ने उसे पहचान लिया तो साइकिल में ब्रेक जैसे अपने आप लग गए। यह तो लक्षित ही था। उसकी दशा बता रही थी कि न केवल वह दुर्घटनाग्रस्त था बल्कि उसकी धुनाई भी हुई थी। कोई संदेह नहीं कि यह महाशय ही किसी से भिड़े हों और बदले में अच्छी पूजापत्री हो गई हो। स्वरिता ने सुशांत जी को मोबाइल पर सूचना दी। वे तीन-चार विद्यार्थियों को लेकर पहुँचे तब तक स्वरिता ने उसे पानी की बोतल से पानी पिलाया। लक्षित के सिर से खून बह रहा था। सौम्या को कुछ उपाय न सूझा तो अपनी चुन्नी ही उसके सिर पर कसकर बांध दी। तमाशा देख रहे लोगों में से किसी लड़के ने जुमला कसा “ओऽऽहो”।</p>
<p style="text-align: justify;">अधलेटे लक्षित के दाएं हाथ का भरपूर वार उस लड़के के पैरों पर पड़ा वह लड़खड़ाकर घुटनों पर आ गया और एक भरपूर झन्नाटेदार थप्पड़ खाकर वह भौचक्का रह गया।</p>
<p style="text-align: justify;">सुशांत जी के साथ ही सुधीर जी भी आ चुके थे।</p>
<p style="text-align: justify;">सुधीर जी ने एंबुलेंस में चढ़ाते हुए लक्षित से पूछा “देख लिया सौम्या को?”</p>
<p style="text-align: justify;">“क्षमा कर दो सौम्या आज से तुम्हारी इज्जत मेरी पगड़ी है बहन!” उसने सिर पर बंधी सौम्या की चुन्नी को छूकर कहा। उसकी आँखें बरस पड़ी। एंबुलेंस उसे चिकित्सा के लिए ले जा रही थी पर उसकी सोच की चिकित्सा हो चुकी थी।</p>
<p style="text-align: justify;">मानव में प्रतिभा होना प्रशंसनीय है पर सकारात्मक और संवेदनशीलता मानव की सबसे उत्तम प्रतिभा है। जिनके बिना प्रत्येक विशेषता कांतिहीन है, फीकी है।</p>
<p style="text-align: justify;">विद्यालय के दीक्षांत समारोह में लक्षित अपने अनुभव कथन के लिए खड़ा हुआ तो साथियों ने सोचा अब यह कुछ ऊटपटांग हास्य-व्यंग्य भरी बातें कहेगा। लेकिन वह पूरी गंभीरता से यह घटना सुनाते हुए रो पड़ा। अपनी बात पूरी करते-करते वह सौम्या के पैरों छूकर क्षमा मांगने बढ़ा तो सौम्या ने उसे बीच में ही रोक लिया “नहीं भैया! तुमने मुझे मुझसे मिलने का अवसर दिया है। मैं कोई कलाकार या खिलाड़ी नहीं तो क्या अच्छी से अच्छी मानव बनने का प्रयास करूंगी।” तालियों की गड़गड़ाहट से सबने लक्षित और सौम्या का स्वागत किया।</p>
<p style="text-align: justify;">प्राचार्य जी के दीक्षांत उद्बोधन के भी अंतिम वाक्य थे “मानव में प्रतिभा होना प्रशंसनीय है पर सकारात्मक और संवेदनशीलता मानव की सबसे उत्तम प्रतिभा है। जिनके बिना प्रत्येक विशेषता कांतिहीन है, फीकी है। मैं शुभकामनाएं करता हूँ कि तुम सब अपनी-अपनी योग्यतानुसार कीर्ति अर्जित करो, जो चाहो सो बनो पर मानव अवश्य बने रहो।”</p>
<p style="text-align: justify;">जाने कहाँ से वह पीपल वाली चिड़िया आकर सौम्या के हाथ पर बैठ गयी। स्वरिता ने पूछा “पहचाना सौम्या कौन है यह?” सौम्या खिलखिलाकर हँसी और बोली “ मैं इसका नाम रख ही हूँ ‘सौम्या की सखी’।”</p>
<p style="text-align: justify;">दोनों सहेलियां हाथों पर ताली देकर हँस पड़ी। चिड़िया भी अपने नाम से प्रसन्न होकर पेड़ पर ऊँचे जा बैठी।</p>
<p><span style="color: #0000ff;"><strong>और पढ़े: <a style="color: #0000ff;" href="https://rashtriyashiksha.com/the-village-of-younger/" target="_blank" rel="noopener">छोटे का गांव</a></strong></span></p>
<p style="text-align: justify;">(लेखक इंदौर से प्रकाशित ‘देवपुत्र’ बाल मासिक पत्रिका के संपादक है।)</p>
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		<title>व्यक्तित्व विकास की भारतीय संकल्पना</title>
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		<dc:creator><![CDATA[राष्ट्रीय शिक्षा]]></dc:creator>
		<pubDate>Sat, 15 Aug 2026 03:23:22 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[दिलीप बेतकेकर]]></category>
		<category><![CDATA[नवीनतम]]></category>
		<category><![CDATA[हम सरस्वती पुत्र]]></category>
		<category><![CDATA[Personality development]]></category>
		<category><![CDATA[Rashtriya shiksha]]></category>
		<category><![CDATA[राष्ट्रीय शिक्षा]]></category>
		<category><![CDATA[व्यक्तित्व विकास]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>-दिलीप बेतकेकर गोवा के एक उच्चतर माध्यमिक विद्यालय के कक्षा ग्यारह में अध्ययनरत एक विद्यार्थी को प्राचार्य ने घर वापिस जाने को कहा। कारण क्या था? उस विद्यार्थी ने सिर&#8230; </p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: right;">-दिलीप बेतकेकर</p>
<p style="text-align: justify;">गोवा के एक उच्चतर माध्यमिक विद्यालय के कक्षा ग्यारह में अध्ययनरत एक विद्यार्थी को प्राचार्य ने घर वापिस जाने को कहा। कारण क्या था? उस विद्यार्थी ने सिर के ऊपर चोटी (शिखा) रखी हुई थी। मैं उस विद्यार्थी को माध्यमिक शाला में अध्ययन करते समय से जानता हूँ। जनेऊ संस्कार के पश्चात उसके सिर पर शिखा (चोटी) रखी गई थी। उसे इससे कोई अटपटा अनुभव नहीं होता था किन्तु प्राचार्य को वह अटपटा सा लगता था। प्राचार्य जी तो ग्रीष्म ट्टतु में भी गले में ‘टाई’ बांधकर आते हैं। उनकी इस प्रतिष्ठा में विद्यार्थी की चोटी बाधा बन रही थी।</p>
<p style="text-align: justify;">वर्तमान में प्रचलित रौबीले व्यक्तित्व की कल्पना में, उनकी दृष्टि में ‘चोटी’ अर्थात्, कालबाह्य, कालविसंगत, व्यक्तित्व में बाधा लाने वाली बात थी। जबकि ‘टाई’ अर्थात् व्यक्तित्व को उभारने वाली, सुशोभित करने वाली बात। किसी व्यक्ति के ‘व्यक्तित्व’ का मापन करने के लिये कौन-कौन सी बातें ध्यान में रखते हैं? उस व्यक्ति का रंग, ऊँचाई, पहनावा, इन्हीं बातों पर सामान्यतः निष्कर्ष निकाला जाता है कि ‘व्यक्तित्व’ कैसा है? आकर्षक, प्रभावी व्यक्तित्व, अर्थात ऊंचा, गोरा, ऐसी ही साधारणतः कल्पना की जाती है। ‘व्यक्तित्व विकास’ कार्यक्रमों में भी सामने वाले व्यक्ति पर किस प्रकार प्रभाव डाला जाए, इसी के संबंध में ‘टिप्स’ अधिकतर दिये जाते है। अपने पाल्य को ‘व्यक्तित्व विकास’ की कक्षाओं अथवा शिविरों में पालकगण इस अपेक्षा के साथ भेजते हैं कि आजकल के स्पर्धा युग में हमारा पाल्य पिछड़ न जाए, वह ‘गँवार’ न दिखते हुए एक ‘स्मार्ट’ व्यक्ति दिखे। अधिक महत्व ‘दिखने’ पर दिया जाता है।</p>
<p style="text-align: justify;">कुछ अंश तक ‘व्यक्तित्व’ दिखने पर आंका जाए, यह सही है, परन्तु ‘दिखने’ के साथ ‘होने’ पर अधिक प्रभावी होता है।</p>
<p style="text-align: justify;">अंग्रेजी में ‘पर्सनॉलिटी’ शब्द ग्रीक भाषा के ‘पर्सोना’ शब्द से आया है जहाँ ‘मुखौटा’ को ‘पर्सोना’ कहते हैं अर्थात् दूसरों को दिखने वाला चेहरा। डॉ. अशोक निरपफराके के अनुसार किसी व्यक्ति का ‘व्यक्तित्व’ उसके शारीरिक और मानसिक घटकों का अनन्य साधारण एकात्म संघटन होता है। व्यक्तित्व का गठन जन्म पूर्व से होता है। उसमें कुछ भाग आनुवंशिक और कुछ भाग परिवार, परिसर, विद्यालय, मित्र, समाज आदि के द्वारा गठित होता है।</p>
<blockquote>
<p style="text-align: justify;">व्यक्तित्व अर्थात् जिससे कुछ व्यक्त होता है। विविध कृतियों द्वारा विविध पहलू द्वारा जो व्यक्त होता है। भारतीय कल्पना के अनुसार मानव का व्यक्तित्व पांच कोशों से बना हैः- ‘अन्नमय’, ‘प्राणमय’, ‘मनोमय’, ‘विज्ञानमय’ और ‘आनंदमय’। इन पांचों कोशों का संतुलित विकास अर्थात् संतुलित व्यक्तित्व विकास।</p>
</blockquote>
<p style="text-align: justify;">आजकल अधिक महत्व अन्नमय कोश को दिया जा रहा है। अन्नमय कोश अर्थात् शारीरिक भाग। इस विषय में लोग अत्यंत जागरुक हैं, किन्तु शरीर के आरोग्य के विषय में जागरुक नहीं। संपूर्ण ध्यान शारीरिक सौंदर्य की ओर रहता है। इस हेतु पहनने के कपडे़, सौंदर्य प्रसाधन, ब्यूटी पार्लर, क्रीम, साबुन, शैम्पू आदि का अविवेकी उपयोग करने पर सारा ध्यान दिया जाता है। आजकल कुछ नई कहावतें, वाक्प्रचार चलन में दिखते हैं &#8211;</p>
<p style="text-align: justify;">(1) ‘खिसा फाटका, मोबाईल नेट का’- (जेब फटी हो फिर भी नेट वाला मोबाईल चाहिये।)</p>
<p style="text-align: justify;">(2) ‘खायला कोंडा, फिरायला होंडा’ (खाने को तो भूसा है फिर भी घूमने के लिये महंगी ‘होंडा’ हो।)</p>
<p style="text-align: justify;">(3) ‘रिकाम्या पर्सला झटके फार’ (पर्स खाली है फिर भी भरी होने जैसे झटके दिखाना।)</p>
<p style="text-align: justify;">ये कहावतें आजकल की मानसिकता की ओर इशारा करती हैं। व्यक्तित्व विकास के विषय में भी ऐसा ही देखने को मिलता है।</p>
<p style="text-align: justify;">‘शॉर्टकट’ से तुरत-फुरत कोई शॉर्टकोर्स करके व्यक्तित्व विकास का दिखावा करने की आजकल की परिपाटी बनी है। वास्तव में व्यक्तित्व विकास थोड़े समय में, कुछ ही घंटों, छुट्टियों की अवधि में होने वाला विषय नहीं है। यह एक दीर्घकालीन प्रक्रिया है। व्यक्तित्व विकास धीमे-धीमे प्रगत होता है।</p>
<p style="text-align: justify;">इस विकास में केवल शारीरिक विकास अभिप्रेत नहीं। मानव का अर्थ केवल शरीर नहीं। व्यक्तित्व के अंतर्गत प्राण, मन, बुद्धि, आत्मा घटकों का भी समावेश है। इन सभी घटकों का विकास होना आवश्यक है, वरना एकांगी वृद्धि होगी।</p>
<p style="text-align: justify;">शरीर व्यक्त होने वाला साधन होने के कारण उसका सुदृढ़, निरोगी, शक्तिशाली, होना आवश्यक है। शरीर संगोपन ठीक से हो इस हेतु पौष्टिक आहार और नियमित व्यायाम, ये दो बातें महत्पूर्ण हैं। आजकल विज्ञापनों का चलन बहुत अधिक है। उसमें बार बार खाद्य पदार्थों के विषय में विज्ञापित करने से खरीदने की जिद बच्चे करते हैं। प्रतिष्ठा रखने हेतु उन्हें खरीदना उचित और हितकर नहीं। व्यायाम के विषय में भी केवल स्नायु प्रदर्शन हेतु व्यायामशाला जाने वाले अनेक लोग हैं। उनमें निरंतरता कम ही होती है। अन्नमय कोश के विकास हेतु कुछ शारीरिक आदतों की ओर ध्यान देना चाहिये अन्यथा कभी-कभी व्यंग्य और अन्य समस्याएं निर्मित होती हैं। कभी कुछ व्यक्तियों में शरीर गठन अच्छा होने पर भी उनमें जोश, उमंग, उत्साह, चापल्य आदि गुणों की कमी दिखती है। चलने-फिरने में आत्मविश्वास में कमी, बोलने में अस्पष्टता, आवाज कमजोर। ये बातें अप्रभावी रहती है। चेहरा भावहीन, हास्यहीन, ऐसा क्यों? प्राणमय कोश का दुर्बल, कमजोर, उपेक्षित रहना। ज्ञान और जानकारी का भंडार होना ही पर्याप्त नहीं, उसका दर्शन, ‘प्रेजेंटेशन’ अच्छा होना भी जरूरी है।</p>
<p style="text-align: justify;">शरीर दृश्य है, स्थूल है, किन्तु मन, बुद्धि न दिखने वाले, अर्थात् सूक्ष्म कोश है। भारतीय दृष्टि केवल बाह्य दृश्य बातों को महत्वपूर्ण नहीं मानती। केवल बाह्य बातों पर ध्यान देने से धोखा हो जाता है। इस भ्रम के संबंध में संत चोखामेला कहते हैं – “ऊस डोंगा परि रस नेहि डोंगा, काय भुललासी वरलिया रंगा?” (गन्ना दिखने में ऊपर से अच्छा नहीं फिर भी अंदर से उसका रस मीठा होता है।) इस प्रकार ऊपर-ऊपर की भूलभुलैया से बहुत नुकसान चारों ओर दिखाई देता है।</p>
<p style="text-align: justify;">“नाही निर्मल मन, काय करील साबण”? (मन ही साफ नहीं तो साबुन क्या करेगा?) ऐसा संत लोग कहते हैं। शांत, स्वस्थ, संतुलित मन पर अनेक बातें निर्भर करती हैं। शरीर के लिये जैसे आहार, व्यायाम महत्वपूर्ण है, मन के लिये भी संस्कार, सुसंगति, स्वाध्याय, प्रार्थना आदि का अत्यंत महत्व है। शरीर को जैसे कपड़े, स्वर्ण अलंकार, आभूषण आदि से सुशोभित करते हैं वैसे ही अंतरंग को सुशोभित करने हेतु विवेक, विचार, संयम आदि है। समर्थ रामदास कहते हैं &#8211;</p>
<p style="text-align: center;"><strong>नानारत्ने आभूषणे</strong><strong>, शरीर श्रृंगारिले।</strong></p>
<p style="text-align: center;"><strong>विवेक</strong><strong>, विचारे, राजकारणे अंतर श्रृंगारिले।।</strong></p>
<p style="text-align: justify;">विज्ञानमय कोश का विकास, अर्थात् बौद्धिक विकास।</p>
<p style="text-align: justify;">ग्रहण शक्ति, स्मरणशक्ति, विचारशक्ति, कल्पनाशक्ति आदि क्षमताएँ विज्ञानमय कोश के अंतर्गत होती हैं। जितने अधिक गहराई में जायेंगे उतनी अधिक क्षमता ध्यान में आती है। प्रत्येक व्यक्ति के पास कम से कम आठ-दस क्षमताएं होती है। ये सभी एक समान मात्रा में नहीं होती। अपने स्वयं के पास ऐसी कौनसी क्षमताएं हैं जो अपने लिए बलस्थान हों और उनका विकास कैसे हो, इस संबंध में प्रथमतः पालक, तत्पश्चात् विद्यार्थी को ही तय करना पड़ेगा। उनके विकास हेतु कौन से मार्ग और अवसर उपलब्ध हैं इसको समझ लेना आवश्यक है। ये निश्चित होने पर एकलव्य, अर्जुन जैसी साधना करनी होगी। “असेल माझा हरि तर देईल खाटलयावरी”, (यदि परमेश्वर चाहेंगे, भाग्य में होगा तो बैठे ठाले अपने आप प्राप्त हो जायेगा।) ऐसा कहकर काम चलने वाला, या कुछ प्राप्त होने वाला नहीं है। ‘एकलव्य’ प्रवृत्ति आजकल कम ही दिखाई देती है।</p>
<p style="text-align: justify;">‘आनंदमय कोश’ अन्य की अपेक्षा अत्यंत सूक्ष्म है। अपना अहंभाव, अस्मिता, मैं ही सब कुछ, जो सब व्यक्तित्व के केंद्र बिंदु हैं, उनका समावेश आनंदमय कोश के अन्तर्गत आता है। मैं कौन? मेरे जीवन का उद्देश्य क्या है? मेरे आस पास की सृष्टि से मेरा क्या संबंध है? उनसे मेरा क्या रिश्ता है? परमेश्वर से क्या रिश्ता है? ऐसे सवालों के उत्तर खोजने में निरंतर कार्यरत रहते हुए इस कोश का विकास होता है। आद्य शंकराचार्य जी कहते हैं,- “मैं प्रत्यक्ष शिव हूँ, चैतन्य हूँ, इसकी अनुभूति होना, ये सारी यात्रा ही ‘आनंदमय कोश’ का विकास है।”</p>
<p style="text-align: justify;">व्यक्तित्व का विकास किसलिये? क्यों करें ये सब प्रयास? एक कवि ने सुंदर उत्तर दिया है- “सुंदर मी परि नच शोभेस्तव, जनहित हेतुक मम बलवैभव” (मैं केवल शोभा के लिये नहीं हूँ, मेरे जो भी वैभव हैं वे जनहित के लिये है। स्वयं को विकसित करते हुए समाज हित में, ईश्वर चरण में अर्पण करना है। वह विकसित हो और अर्पित हो।”)</p>
<p style="text-align: justify;">गोमंतकीय कवि बा.भ.बोरकर ने अपनी एक कविता द्वारा एक आदर्श सुंदर, व्यक्तित्व की सुंदर प्रस्तुति की है। कौनसा चेहरा सुंदर मानें? आंखें और होंठ का सौंदर्य किस पर निर्भर है, सुंदर हाथ, पैर और कंधे कौन से? इसका अप्रतिम वर्णन उन्होंने किया है :</p>
<p style="text-align: center;"><strong>देखणे ते चेहरे जे प्रांजलाचे आरसे</strong><strong>,</strong></p>
<p style="text-align: center;"><strong>गोरटे की सांवले याला मोल नाहीं फारसे।</strong></p>
<p style="text-align: center;"><strong>देखणा देहात तो जो सागरी सूर्यास्त सा</strong><strong>,</strong></p>
<p style="text-align: center;"><strong>अग्निचा पेरून जातो राज गर्भी वारसा।</strong></p>
<p style="text-align: justify;">(चमक चेहरे पर विराजे हृदय स्थित सत्य से। साँवला या गोरापन है अप्रभावित इस तथ्य से।। सागरोन्मुख सूर्य ज्यों द्विगुणित करे जल दीप्ति को तन समर्पित लक्ष्य को मुख प्राप्त अग्नि प्रदीप्ति को।)</p>
<p style="text-align: justify;">संपूर्ण मूल कविता पठनीय है। ऐसे व्यक्तित्व प्रत्येक घर में, शाला में, समाज में मिलें, यही प्रार्थना।</p>
<p><span style="color: #3366ff;"><strong>और पढ़े: <a style="color: #3366ff;" href="https://rashtriyashiksha.com/gyan-ki-baat-person-personality-and-development/" target="_blank" rel="noopener">भारतीय शिक्षा – ज्ञान की बात-26 – (व्यक्ति, व्यक्तित्व और विकास)</a></strong></span></p>
<p style="text-align: justify;">(लेखक शिक्षाविद, स्वतंत्र लेखक, चिन्तक व विचारक है।)</p>
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		<title>अथातो प्रश्न जिज्ञासा</title>
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		<dc:creator><![CDATA[राष्ट्रीय शिक्षा]]></dc:creator>
		<pubDate>Fri, 07 Aug 2026 13:13:32 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[दिलीप बेतकेकर]]></category>
		<category><![CDATA[नवीनतम]]></category>
		<category><![CDATA[लेख]]></category>
		<category><![CDATA[Rashtriya shiksha]]></category>
		<category><![CDATA[राष्ट्रीय शिक्षा]]></category>
		<category><![CDATA[विद्यार्थी प्रश्न पूछे]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>-लेख (मूल मराठी) दिलीप बसंत बेतकेकर -अनुवाद (हिन्दी) डॉ. रमेश चौगांवकर “समझे या नहीं?”, हैव् यू अण्डरस्टेण्ड? कक्षा में पढ़ाते समय ऐसे प्रश्न शिक्षक अपने विद्यार्थियों से अनेक बार पूछते&#8230; </p>
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]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: right;">-लेख (मूल मराठी) दिलीप बसंत बेतकेकर</p>
<p style="text-align: right;">-अनुवाद (हिन्दी) डॉ. रमेश चौगांवकर</p>
<p style="text-align: justify;">“समझे या नहीं?”, हैव् यू अण्डरस्टेण्ड? कक्षा में पढ़ाते समय ऐसे प्रश्न शिक्षक अपने विद्यार्थियों से अनेक बार पूछते रहते हैं। भिन्न-भिन्न प्रान्तों में भाषा अलग होने पर भी प्रश्न पूछते रहते हैं। ‘जी हां’, ‘यस सर’, ‘हो सर’&#8230;&#8230;&#8230; ऐसे ही निश्चित उत्तर विद्यार्थियों से मिलते हैं, और विद्यार्थियों से संयुक्त सुर में ‘हां’ उत्तर मिलने पर तो शिक्षक प्रसन्न होकर दूसरा प्रश्न उछालता हैं।</p>
<p style="text-align: justify;">‘कुछ आशंका?’ ‘कुछ कठिनाई?’, ‘एनी डिफिक्लटी?’&#8230;&#8230; जैसे प्रश्नों का उत्तर भी ‘नो सर’, ‘नहीं सर’ संयुक्त रूप से मिलते ही प्रसन्न शिक्षक आगे पढ़ाना जारी रखते है&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;.</p>
<p style="text-align: justify;">गहराई से परखने पर ध्यान में आता है कि कुछ विद्यार्थियों को कुछ भी समझ में नहीं आया होता है, और कुछ समझ में आने पर भी उत्तर नहीं दे पाते! इसका क्या कारण हो सकता है? गहन अध्ययन पश्चात् जो कारण समझ में आते हैं &#8211; ये हैं &#8211; विद्यार्थियों के मन में उभरते अनेक प्रकार के डर!</p>
<ol style="text-align: justify;">
<li>उत्तर गलत होने का डर: अनेक विद्यार्थियों के मन में एक अदृश्य डर बैठा बैठा रहता है कि गलत उत्तर बताने पर कक्षा में हंसी उड़ेगी, शिक्षक गुस्सा होंगे, डाटेंगे, ये डर भी उन्हें उत्तर देने से रोकता हैं।</li>
<li>परीक्षा केन्द्रित शिक्षा: हमारी शिक्षा पद्धति उत्तर-केन्द्रित अधिक हैं, प्रश्न-केन्द्रित विचारों पर नहीं, परिणामस्वरूप परीक्षा में जो पूछा जाना अपेक्षित नहीं उस सम्बन्ध में प्रश्न क्यों पूछें ऐसी मानसिकता बन जाती हैं।</li>
<li>शिक्षक केन्द्रित कक्षा: शिक्षक ही केवल निरन्तर बोलता जाए और विद्यार्थी केवल सुनते रहे, ऐसी कक्षा में विद्यार्थियों को बोलने-पूछने का अवसर और उनका अधिकार नहीं मिलता हैं।</li>
<li>प्रश्न पूछना भी एक कौशल्य है, जो प्रयास से ही प्राप्त होता है, जहां बाल्यकाल से ही प्रश्नों को दबा दिया जाता है वहां प्रश्न उभरते ही नहीं।</li>
</ol>
<p style="text-align: justify;">‘मुझे उत्तर ज्ञात नहीं, ऐसा कहने में विद्यार्थी शरमाता है, और ज्ञात न होना अर्थात् अपयश यह भावना मन में बैठी होती हैं।</p>
<p style="text-align: justify;">कभी-कभी शिक्षकों के प्रश्न पूछने का सुर विद्यार्थी को अरूचिकर लगता है। कभी शिक्षक उलझन भरे अथवा उपहास करने हेतु प्रश्न पूछते हैं। सदैव कुछ विशेष होशियार विद्यार्थियों को ही प्रश्न पूछे जाए तो अन्य विद्यार्थी मौन बैठने को विवश होते हैं।</p>
<p style="text-align: justify;">पाठ्य पुस्तक और परीक्षा-केन्द्रित अध्यापन के कारण उत्तर महत्वपूर्ण और प्रश्न गौण ऐसी मानसिकता बनती हैं। परिणाम स्वरूप विद्यार्थी की जिज्ञासा अनदेखी रह जाती है। “और कोई प्रश्न तो पूछना नहीं है”? ऐसा शिक्षक के बोलने पर उत्तर मौन होता हैं।</p>
<p style="text-align: justify;">वास्तविकता तो है कि इन्हीं बच्चों ने अपने बाल्यकाल में अपने माता-पिता को हजारों प्रश्न पूछे होते हैं, तो फिर कक्षा में मौन क्यों हो जाते हैं यह प्रश्न पालक गण और शिक्षकों को स्वयं से पूछना होगा। बच्चों द्वारा पूछे प्रश्नों के उत्तर अनेक बार पालकों के पास नहीं होते हैं, उनके प्रश्नों का महत्व और उसकी गंभीरता पालक समझ नहीं पाते हैं, उनके प्रश्न पालकों को उबाऊ, झंझट वाले लगते हैं। इसलिए पालक उन्हें ‘चुप बैठ’, ‘मूर्खो’ जैसे सवाल मत कर, कहते हुए बच्चों को निराश कर देते हैं। परिणाम स्वरूप नये पालकों से प्रश्न पूछना कम कर देते हैं, जैसे-जैसे बच्चे ऊँची कक्षाओं में जाते हैं, जैसे वे अधिक मौन हो जाते हैं &#8211; शिक्षक द्वारा प्रश्न पूछने पर कक्षा में बच्चे मौन रहते हैं, शिक्षक की नजर से हटने का प्रयास होता है, आँखे नीचे की ओर झुका लेते हैं बच्चे! कक्षा में प्रश्नों का अभाव अच्छे अनुशासन की श्रेणी में नहीं रखा जाता है, वह निःशब्दता है, शान्त, मौन कक्षा जीवित कक्षा नहीं कहलाती है।</p>
<p style="text-align: justify;">कक्षा में जब प्रश्न पूछे जाते हैं, तब कक्षा केवल सीखने की जगह न होकर विचारों की कार्यशाला हो जाती है &#8211; शैक्षणिक मानस शास्त्र के अनुसार प्रश्न पूछना उच्च स्तरीय वैचारिक कौशल्य है, विश्लेषण, मूल्यांकन और सृजनशीलता के स्तर पर प्रश्नों की भूमिका निर्णायक होती है, प्रश्नों द्वारा ही संकल्पनाएं स्पष्ट होती है, चिकित्सकीय विचारशक्ति विकसित होकर ज्ञान प्राप्ति की प्रेरणा जागृत होती है।</p>
<p style="text-align: justify;">कुशल प्रश्नोत्तर &#8211; अर्थात् &#8211; अच्छे अध्यापन शास्त्र का धड़कता दिल हैं। भारतीय ज्ञान परम्परा प्रश्नोतरों से ही प्रारम्भ होती है, उपनिषद् के संवाद प्रश्नोत्तरों के रूप में ही हैं।</p>
<p style="text-align: justify;">“कस्मिन्न भगवो विज्ञाते सर्व मिदं विज्ञानतं भवति?” यह मुंडकोपनिषद् का प्रश्न ही सम्पूर्ण मुंडकोपनिषद् का आधार है।</p>
<p style="text-align: justify;">“अथातो ब्रह्म जिज्ञासा, येन ज्ञानं सर्वमिदं ज्ञातं भवति, कोऽहं, तत्वमसि, नायमात्या प्रवचनेन लभ्यो, किम कर्म किमकर्मेति?” यह सब वचन चिंतन को प्रवृत करती हैं। इतनी विशाल ज्ञान परम्परा होते हुए भी आज हमारे विद्यार्थियों में प्रश्न क्यों उभरते नहीं, यह गहन विचारणीय समस्या हैं।</p>
<p style="text-align: justify;">बच्चे कक्षा में क्यों मौन रहते हैं, क्यों उत्तर नहीं देते, प्रश्न पूछते नहीं, यह है शिक्षकों की शिकायत, परन्तु शिकायत करना ही समस्या का हल नहीं। इस हेतु कोई ठोस प्रामाणिक विचार विमर्श आवश्यक हैं।</p>
<p style="text-align: justify;">प्रश्न न पूछने वाला विद्यार्थी समूह एक अनुशासित समूह हैं ऐसा मानना उचित नहीं, वास्तव में देखा जाए तो ऐसे विद्यार्थी विचार शून्य हो सकते हैं। प्रश्न पूछना केवल जिज्ञासा की अभिव्यक्ति नहीं, अपितु ज्ञान प्राप्ति का प्रारम्भ हैं। प्रश्न पूछना अध्ययन प्रक्रिया का प्रथम सोपान है &#8211; प्रश्न से ही ज्ञान निर्मिति और विचार प्रक्रिया प्रारम्भ होती है, जहां प्रश्नों का अभाव वहां विचारों का भी अभाव और विचारों के अभाव में वास्तविक शिक्षा अवरूद्ध होती है।</p>
<p style="text-align: justify;">चीनी भाषा में एक कहावत के अनुसार &#8211; यदि आप प्रश्न पूछते हैं, तो लोग आपको मूर्ख समझेंगे, आपकी हंसी उड़ायेंगे, परन्तु केवल पांच-दस मिनिट! परन्तु यदि आपने प्रश्न पूछा नहीं तो आप आजीवन मूर्ख रहने की सम्भावना हैं।</p>
<p style="text-align: justify;">एक अंगेज लेखक रूड़याई किपलिंग के अनुसार &#8211; “मैंने छह मित्रों को अपने पास जोड़ रखा है, वे मेरे हर कार्य में सहायक होते हैं ओर वे छह मित्र है &#8211; क्या, कौन, कहां, कैसे, कब, और, क्यों?”</p>
<p style="text-align: justify;">साक्रेटिस की प्रश्नोत्तर पद्धति एक प्रभावी प्रक्रिया मानी जाती हैं। जॉन हुई के मतानुसार शिक्षा एक समस्या निवारण की प्रक्रिया है, और समस्या प्रश्नों के अभाव में अस्तित्व में नहीं आती।</p>
<p style="text-align: justify;">अपनी अधिकतर कक्षाओं में मौन संस्कृति ही विद्यमान है &#8211; प्रश्न पूछने की आदत विद्यार्थी में अपने आप ही निर्मित नहीं होती, वरन उसे प्रयास पूर्वक ही विद्यार्थी में निर्माण करनी पड़ती हैं।</p>
<p style="text-align: justify;">इसलिए शिक्षकों से अपेक्षा की जाती है कि वे अध्यापन पद्धति में परिवर्तन लाकर, प्रश्नों को महत्वपूर्ण स्थान दें तभी कक्षा जीवित-संवादमय और विचार-समृद्ध हो सकेगी। प्रश्न पूछने वाला विद्यार्थी ही वास्तव में ज्ञान प्राप्त करने वाला विद्यार्थी होता है, यह शिक्षा का मूल मंत्र स्वीकार करना होगा। प्रश्न पूछने की आदत शिक्षा-प्रक्रिया में से ही विकसित होती है। प्रश्न केन्द्रित अध्यापन पद्धति स्वीकारने से ही विद्यार्थी का सहयोग, आकलन और चिकित्सकीय विचार शक्ति का लाक्षणिक विकास हो पायेगा।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>प्रश्न-संस्कृति निर्मिति</strong></p>
<ol style="text-align: justify;">
<li>सुरक्षित और मित्रता का वातावरण निर्मित कीजिये, प्रश्नों का स्वागत आवश्यक है, प्रश्न पूछना पुलिस अधिकारी जैसा न हो।</li>
<li>विद्यार्थी द्वारा पूछे प्रश्न की खिल्ली न उड़ाए ना ही उसे अनदेखा करें।</li>
<li>स्वयं को उत्तर ज्ञात ना हो तो प्रामाणिकता से स्वीकार कर कहें कि प्रश्न अच्छा है, हम अन्तर के लिए अध्ययन कर बताते हैं।</li>
<li>प्रश्न पूछने का मॉडल बनें, स्वयं मनन करें, स्वयं को प्रश्न पूछे, ऐसा क्यों? प्रश्न का अन्य पर्याय क्या हो सकता है? इस पर भी मंथन करें।</li>
<li>छोटे-छोटे समूहों में चर्चा करें, सम्पूर्ण कक्षा में चर्चा करने से दो-तीन समूहों में चर्चा करने से प्रश्न सहजता से उभरेंगे।</li>
<li>प्रश्न पूछने के लिए पर्याप्त समय दें, जल्दबाजी न करें, अध्यापन में शीघ्रता के कारण प्रश्न पूछने के लिए पर्याप्त समय नहीं दे पाते, विचार करने हेतु शान्ति और समय आवश्यक हैं।</li>
<li>प्रश्न पूछने के लिए भी प्रशिक्षण देना पड़ता है, कौशल्य का पाठ भी पढाएं, समूह चर्चा, प्रकल्प पद्धति, समस्या आधारित शिक्षा द्वारा प्रश्नों की संख्या में वृद्धि होती है, मूल्यांकन केवल उत्तरों का ही नहीं, प्रश्नों को भी महत्व देकर उनका मूल्यांकन करें।</li>
</ol>
<p style="text-align: justify;">अधिकतर विद्यार्थी कक्षा में बोलने में शरमाते है अथवा झिझकते है, या डरते हैं, इसलिए उन्हें उनके प्रश्न कागज पर लिखकर पश्चात् उन्हें पढ़ने को कहें, प्रश्न पूछने की आदत और कौशल्य विकसित करने हेतु अनेक खेल अथवा उपक्रम उपयोग में लाए जा सकते हैं।</p>
<p style="text-align: justify;">शिक्षक अपने एजेण्डा में ‘प्रश्न कोशल्य’ विषय रखें और इस पर क्या कर सकते हैं इसका विचार-विमर्श करें जिससे अनेक उपाय समक्ष आएंगे, परन्तु इस हेतु शिक्षकों के समक्ष ही यह प्रश्न उभरना चाहिये, तभी उत्तर कही अन्य स्थान से न आकर शिक्षक स्वयं से ही प्राप्त होगा। मार्ग प्रशस्त होगा। विद्यार्थी के मन में प्रश्न पूछने की क्षमता निर्मित होना इसी में शिक्षक का सुयश छुपा हुआ हैं।</p>
<p style="text-align: justify;">ब्रह्मसूत्र का सूत्र ‘अथातो जिज्ञासा’ पर आधारित ‘अथातो प्रश्न जिज्ञासा’ अर्थात् अब प्रश्न पूछने की जिज्ञासा जागृत करने का समय आ गया हैं।</p>
<p><span style="color: #0000ff;"><strong>और पढ़े : <a style="color: #0000ff;" href="https://rashtriyashiksha.com/21st-century-teacher-2/" target="_blank" rel="noopener">21वीं शताब्दी के शिक्षक</a></strong></span></p>
<p style="text-align: justify;">(लेखक शिक्षाविद, स्वतंत्र लेखक, चिन्तक व विचारक है।)</p>
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		<title>वन्देमातरम् का 150वां जयन्ती वर्ष – भाग एक</title>
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		<dc:creator><![CDATA[राष्ट्रीय शिक्षा]]></dc:creator>
		<pubDate>Thu, 21 May 2026 06:55:13 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[नवीनतम]]></category>
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		<category><![CDATA[वासुदेव प्रजापति]]></category>
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					<description><![CDATA[<p> &#8211; वासुदेव प्रजापति आज की नई पीढ़ी भारत के स्वतंत्रता संग्राम से अनभिज्ञ है। उसने न जवाहरलाल नेहरु को देखा है न उसे सुभाषचन्द्र बोस के दर्शन का सौभाग्य मिला&#8230; </p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: right;"> &#8211; वासुदेव प्रजापति</p>
<p><img fetchpriority="high" decoding="async" class="alignnone wp-image-9314" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2026/05/63254656-300x199.jpg" alt="" width="1538" height="1020" srcset="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2026/05/63254656-300x199.jpg 300w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2026/05/63254656-1024x680.jpg 1024w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2026/05/63254656-768x510.jpg 768w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2026/05/63254656.jpg 1198w" sizes="(max-width: 1538px) 100vw, 1538px" /></p>
<p style="text-align: justify;">आज की नई पीढ़ी भारत के स्वतंत्रता संग्राम से अनभिज्ञ है। उसने न जवाहरलाल नेहरु को देखा है न उसे सुभाषचन्द्र बोस के दर्शन का सौभाग्य मिला है। स्वाधीन भारत के शासकों ने देश की नई पीढ़ी को नेताजी सुभाषचंद्र बोस के विषय में कुछ भी नहीं बताया, फिर भी भारत की वर्तमान तरुण पीढ़ी को नेहरुजी व नेताजी में से किसी एक को चुनने के लिए कहा जाए तो निश्चय ही सुभाषचन्द्र बोस को ही वे सर्वप्रिय नेता के रूप में चुनेंगे। क्योंकि नेताजी का नाम लेने मात्र से आधुनिक भारत के तरुणों और किशोरों के हृदयों में जैसा विद्युत-संचार होता है, वैसा जवाहरलाल नेहरू का नाम लेने से नहीं होता। ठीक यही स्थिति हमारे देश के राष्ट्रगीत वंदे मातरम की है। स्वाधीन भारत ने कभी भी वंदे मातरम् का सत्य इतिहास नई पीढ़ी को नहीं बताया। “कोटि-कोटि हृदयों के प्राण स्पंदन और सहस्रों हुतात्माओं का चेतना मंत्र है, वंदे मातरम्।” वन्देमातरम् के उत्कर्ष और अपमान के इतिहास से आज की पीढ़ी पूर्णतया अनभिज्ञ है। जबकि जवाहरलाल नेहरू द्वारा लाया गया राष्ट्रगान, जन गण मन सबको याद है। अतः नई पीढ़ी को वन्देमातरम् का सत्य इतिहास बताना इस गोष्ठी का उद्देश्य है।</p>
<p style="text-align: justify;">हमारे देश की अनेक बातें हमसे छुपाई गई हैं। जैसे हमें बताया गया कि देश को आजादी बिना खड्ग और बिना ढाल के अहिंसात्मक आंदोलनों से मिली है। जबकि वास्तविकता यह है कि अनेक देशभक्तों ने देश को स्वतंत्र करवाने के लिए फाँसी के फंदों को चूमा था, अपना रक्त बहाया था, अपना बलिदान दिया था तब जाकर हमें आजादी मिली है। आजादी से पहले वन्देमातरम् ही देश के लिए उत्सर्ग का पवित्र भाव भरने वाला स्वदेश मंत्र था। इस पवित्र मंत्र से प्रेरणा लेकर ही देशभक्त जब मिलते थे, तब परस्पर वन्देमातरम् का सम्बोधन करते थे। प्रत्येक छोटे-बड़े समारोह में वन्देमातरम् गाया जाता था। सभी बड़े बड़े राजनेता वन्देमातरम् को ही देश का राष्ट्रगान मानते थे। स्वतंत्रता से पूर्व तक जन-गण-मन को गाया नहीं जाता था। “वन्देमातरम् की व्यथा-कथा” पुस्तक के लेखक श्री चतुर्भुज जी तोषनीवाल लिखते हैं कि मैं कलकत्ता में अनेक वर्ष रहा हूँ, अतः बंगाली भाषी हूँ। अनेक सामाजिक व राजनैतिक कार्यक्रमों में जाना होता था। वन्देमातरम् गान को असंख्य बार सुना, परन्तु जन-गण-मन केवल एक बार ही सुनने को मिला। फिर क्यों पहले वन्देमातरम् का अंगभंग किया और बाद में इसको पदच्युत् कर दिया? क्यों वन्देमातरम् के स्थान पर अचानक जन-गण-मन को राष्ट्रगान बना दिया गया? इस षड्यंत्र के पीछे कौन था? ऐसे सभी प्रश्नों के उत्तर इस लेख में आपको सुनने को मिलेंगे। यहाँ एक बात की ओर आप सबका ध्यान आकृष्ट करना चाहता हूँ कि मैं जन-गण-मन का विरोधी नहीं हूँ और न इसका अपमान करना चाहता हूँ। मैं तो केवल इतना चाहता हूँ कि वन्देमातरम् के साथ जो षडयंत्र किया गया है, उसे उजागर करूँ। अन्यथा आज भी मैं जन-गण-मन को राष्ट्रगान होने के नाते उसका श्रद्धापूर्वक गान करता हूँ और उसके सम्मान में खड़ा होता हूँ और चाहता हूँ कि सभी देशवासी जन-गण-मन को वैसा ही सम्मान दें।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>स्वदेश मंत्र वन्देमातरम् का अवतरण</strong></p>
<p style="text-align: justify;">वन्देमातरम् राजर्षि बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय की चेतना में अवतीर्ण हुआ पवित्र मंत्र है। हमारे देश में ऋषि मंत्र द्रष्टा होते हैं। मंत्र वह होता है जो ऋषियों की चेतना में स्वयं अवतीर्ण होता है। इस कसौटी पर वंदे मातरम् खरा उतरता है वन्देमातरम् शुद्ध रूप में भारतमाता के लिए गाया गया पवित्र गान है। वन्देमातरम् गाने से देशभक्तों के हृदयों में भारतमाता के लिए सर्वस्व न्यौछावर करने का भाव स्वत: स्फूर्त होता है।</p>
<p style="text-align: justify;">वन्देमातरम् का अर्थ है, मैं माता की वंदना करता हूँ, अर्थात मैं भारत माता को प्रणाम करता हूँ। हम वैदिक काल से पृथ्वी माता की वंदना करते आए हैं। पृथ्वी को माता मानकर उसकी वंदना करना हम भारतीयों की रग-रग में रचा-बसा है। वैदिक साहित्य में मातृ वंदना गायी गई है। ऋग्वेद में “बन्धुर्मेमाता पृथिवी महीयम्” कहा गया है। जिसका भाव है, यह विशाल पृथ्वी मेरी माता है। यजुर्वेद कहता है, “नवो मातरे पृथिव्यै” का भाव भी यही है कि पृथ्वी हमारी माता है। और अथर्ववेद का यह प्रसिद्ध सूक्त हम सबने सुना है, “माता भूमि: पुत्रोंsहं पृथिव्या:” भूमि मेरी माता है और मैं उसका पुत्र हूँ। वेदों के अतिरिक्त भी संस्कृत साहित्य में मातृभूमि की वंदना अनेक शास्त्रों में वर्णित हैं। जैसे हमने लक्ष्मण व राम का वह संवाद सुन रखा है कि लंका विजय के पश्चात् लक्ष्मण राम से कहते हैं कि भैया! अयोध्या में तो भरत राज्य कर ही रहे हैं। क्यों न हम अपने हाथों से विजित इस स्वर्णनगरी लंका में ही रह जायें। प्रत्युत्तर में श्रीराम कहते हैं –</p>
<p style="text-align: center;"><strong>“अपि स्वर्णमयी लंका न में लक्ष्मण रोचते।</strong></p>
<p style="text-align: center;"><strong>जननी  जन्मभूमिश्च  स्वर्गादपि  गरीयसी।।”</strong></p>
<p style="text-align: justify;">हे लक्ष्मण! यह सत्य है कि लंका सोने की है, परन्तु यह मुझे नहीं रुचती। क्योंकि जन्म देने वाली माँ और जन्मभूमि मेरे लिए स्वर्ग से भी बढ़कर है। स्पष्ट है कि जन्मभूमि की मातृरूप में वंदना करने की भारत में परंपरा रही है। इसी परंपरा में अनेक बंगाली लेखकों जैसे माइकेल मधुसूदन दत्त, भूदेव मुखोपाध्याय एवं बंकिम चन्द्र चट्टोपाध्याय ने अपनी-अपनी कृतियों में जन्मभूमि का मातृरूप में दर्शन किया है। बंकिम बाबू ने अपनी कृति ‘मेरा दुर्गोत्सव’ में अपनी दिव्य दृष्टि से सप्तमी पूजा के दिन जन्मभूमि का दशभुजा देवी दुर्गा के रूप में अपूर्व दर्शन किया था। कुछ समय के उपरान्त उनकी लेखनी से उसी दिव्य दृष्टि द्वारा आकारित दुर्गा माता का रूप सन् 1875 में ‘वन्देमातरम्’ गान के रूप में अवतरित हुआ। तब से लेकर अब तक 150 वर्ष पूर्ण हुए हैं, इसलिए 2026 में हम वन्देमातरम् का 150वाँ जयन्ती वर्ष मना रहे हैं। बंकिम बाबू ने 8 वर्ष बाद सन् 1883 में इस गान को अपने उपन्यास ‘आनन्द मठ’ में प्रकाशित किया था। तब वन्देमातरम् गान के सम्बन्ध में उन्होंने अपनी पुत्री से कहा था &#8211; “देखना! एक दिन ऐसा आएगा कि बंगभूमि इस गान को सुनकर नाचने लगेंगी, केवल बंगाल ही नहीं सारा भारतवर्ष इस गान से प्रेरणा ग्रहण करेगा।” इतना ही नहीं, वन्देमातरम् के व्याख्याकार श्री अरविन्द घोष ने अपने प्रबन्ध ‘ऋषि बंकिम चंद्र’ में तीन बातों पर विशेष बल दिया है। “पहली बंकिम बाबू की समस्त रचनाओं का श्रेष्ठ भाव है, स्वदेश धर्म। दूसरी, जिस नवीन प्रेरणा से ओत-प्रोत होकर हम स्वाधीनता की दिशा में अग्रसर हो रहे हैं, उसके प्रेरणादाता एवं राष्ट्रगुरु हैं, बंकिमचंद्र। और तीसरी बात, उनका सर्वोत्कृष्ट योगदान है, जननी जन्मभूमि का मातृरूप में दर्शन करना।”</p>
<p><img decoding="async" class="alignnone  wp-image-9318" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2026/05/Subhas-Chandra-Bose-Indian-National-Army-219x300.webp" alt="" width="1371" height="1878" srcset="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2026/05/Subhas-Chandra-Bose-Indian-National-Army-219x300.webp 219w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2026/05/Subhas-Chandra-Bose-Indian-National-Army-748x1024.webp 748w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2026/05/Subhas-Chandra-Bose-Indian-National-Army-768x1052.webp 768w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2026/05/Subhas-Chandra-Bose-Indian-National-Army-1121x1536.webp 1121w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2026/05/Subhas-Chandra-Bose-Indian-National-Army.webp 1168w" sizes="(max-width: 1371px) 100vw, 1371px" /></p>
<p style="text-align: justify;"><strong>बंगभंग आन्दोलन में वन्देमातरम्</strong></p>
<p style="text-align: justify;">अंग्रेजों ने देश के स्वाधीनता आन्दोलन को कमजोर करने के लिए पहले बंगाल का विभाजन किया था। उस समय बंगाल क्रान्तिकारी गतिविधियों का गढ़ था। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापक डॉ. हेडगेवार भी डाक्टरी की पढ़ाई करने कलकत्ता गए थे और पढ़ाई के साथ-साथ क्रान्तिकारी गतिविधियों में सक्रिय भाग लिया था। वे क्रान्तिकारी संस्था अनुशीलन समिति के सदस्य थे। उनका गुप्त नाम कोकेन था। ऐसे सभी क्रांतिकारियों की कमर तोड़ने के लिए उन्होंने सन् 1905 में बंग-भंग का निर्णय लिया था। 7 अगस्त 1905 के दिन कलकत्ता के टाउन हॉल में बंग-भंग के विरोध में एक बहुत बड़ी सभा हुई। उस सभा में पहली बार वन्देमातरम् का जयघोष लगा और उसी दिन से यह जयघोष देशभक्तों का स्वदेश मंत्र बन गया। उस दिन से लेकर आजादी पाने तक न जाने कितने ही हजारों आबाल-वृद्ध स्वतंत्रता के पुजारियों ने वन्देमातरम् के सात्त्विक बल के सहारे असंख्य व अमानुषिक अत्याचार सहते हुए फाँसी के फन्दों को चूमा था। अंग्रेजों के द्वारा साम-दाम-दण्ड-भेद रूपी सभी दाँव-पेच लगाने के बाद भी वे आन्दोलन को समाप्त नहीं कर पाए। अन्ततः विवश होकर उन्हें सन् 1911 में अपना बंग-भंग का निर्णय वापस लेना पड़ा। अर्थात् अंग्रेजों द्वारा किए गए बंगाल-विभाजन को देशभक्तों ने रोक दिया। अंग्रेजों की इस विफलता के मूल में देशभक्तों को मर मिटने की प्रेरणा देने वाला यह स्वदेश मंत्र, वन्देमातरम् ही प्रमुख शस्त्र था।</p>
<p style="text-align: justify;">स्वतन्त्रता संग्राम में वन्देमातरम् देशभक्तों का प्रमुख शस्त्र बन गया था। फलतः अंग्रेजों ने इस स्वदेश मंत्र से भयभीत होकर वन्देमातरम् बोलने पर ही प्रतिबन्ध लगा दिया। परन्तु देशभक्तों ने वंदे मातरम् जयघोष के प्रतिबन्ध को अमान्य कर दिया, हमें अपनी माता की जय बोलने से कोई नहीं रोक सकता। यहाँ मुझे पुनः डॉ.हेडगवार के विद्यार्थी काल का एक प्रसंग याद आता है। वे नागपुर की नीलसिटी हाईस्कूल में पढ़ रहे थे। उन्हें ज्ञात हुआ कि निरीक्षक महोदय निरीक्षण करने हेतु उनके स्कूल में आने वाले हैं। तब उन्होंने अपने विश्वस्त साथियों के साथ वन्देमातरम् जयघोष की योजना बनाई। इस योजना की कानोंकान किसी को भनक तक नहीं लगने दी। निर्धारित दिन निरीक्षक महोदय स्कूल में आए और उनकी कक्षा में ज्योंही पैर रखा त्योंही पूरी कक्षा ने खड़े होकर वन्देमातरम् से उनका स्वागत किया। निरीक्षक महोदय क्रोधित हुए और दूसरी कक्षा में चले गए। वहाँ भी उनका स्वागत वन्देमातरम् जयघोष से ही हुआ। अब तो निरीक्षक आग बबूला हो गए और प्रधानाध्यापक को तुरन्त अनुशासन हीनता के लिए कठोर कार्यवाही करने का आदेश देकर चले गए। प्रधानाचार्य ने सबसे पूछताछ की परन्तु किसी भी बालक ने कुछ भी नहीं बताया। जब उन्होंने निर्दोष बालकों को पीटना शुरु किया तब डाक्टर जी आगे आए और स्वीकार किया कि यह सारी योजना मेरी थी। प्रधानाचार्य ने डाक्टरजी को उसी समय स्कूल से निष्कासित कर दिया। यह सजा पाकर भी डाक्टरजी प्रसन्न थे क्योंकि भारतमाता की जय बोलने में उन्हें गौरव एवं स्वाभिमान की अनुभूति होती थी।</p>
<p style="text-align: justify;">ऐसा ही प्रसंग कलकत्ता के नेशनल कॉलेज के एक विद्यार्थी सुशील सेन का है। एक आन्दोलन में उसने अंग्रेज सार्जेंट के दुर्व्यवहार से क्रोधित होकर उसे जोर का घूँसा मार दिया। सिपाहियों ने उसे पकड़ लिया और जज के सामने पेश किया। जज किंग्सफोर्ड ने सुशीलसेन को पन्द्रह बेंतों की सजा सुनाई। ज्योंही उसकी नंगी पीठ पर बेंत पड़ती वह जोर से वन्देमातरम् जयघोष लगाता। पन्द्रह ही बेंतों पर वह बड़े गर्व से वन्देमातरम् जयघोष लगाता रहा। यह तो कुछ भी नहीं, अंग्रेज वन्देमातरम् घोष से इतने अधिक भयभीत थे कि अमानवीय अत्याचारों से कुछ क्रांतिकारियों की मृत्यु हो जाने पर भी भयभीत और आतंकित अंग्रेजों ने उनके शवों को गहरे समुद्र में डूबोया था। इसी तरह क्रांतिकारी सूर्यसेन जिन्हें फाँसी की सजा मिली थी, उन्हें वधस्थल ले जाते समय वे वंदेमातरम का जयघोष लगाते जा रहे थे, इसलिए उनको इतनी निर्दयतापूर्वक लाठियों से पीटा गया कि वे बेहोश हो गए और बेहोशी की हालत में ही उन्हें फाँसी दे दी गई। स्वदेश के लिए सर्वस्व बलिदान करने की प्रेरणा देने वाले शक्तिशाली स्वदेश मंत्र का स्वाधीनता प्राप्ति के पश्चात् तत्कालीन सत्ताधीशों ने तिरस्कार करके अपने मस्तक पर जो कलंक का टीका लगाया है, वह सदियों तक अमिट रहेगा।</p>
<p style="text-align: justify;">क्रमशः</p>
<p style="text-align: justify;">(लेखक शिक्षाविद् है, भारतीय शिक्षा ग्रन्थमाला के सह संपादक है और विद्या भारती संस्कृति शिक्षा संस्थान के पूर्व सचिव है।)</p>
<p><strong>और पढ़ें : <span style="color: #0000ff;"><a style="color: #0000ff;" href="https://rashtriyashiksha.com/national-song-vande-mataram/" target="_blank" rel="noopener">राष्ट्र गीत – वन्दे मातरम्</a></span></strong></p>
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