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	<title>विनाश पर्व Archives - राष्ट्रीय शिक्षा : शिक्षा में समाज प्रबोधन rashtriyashiksha.com</title>
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		<title>‘विनाशपर्व’ का अंत</title>
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		<dc:creator><![CDATA[राष्ट्रीय शिक्षा]]></dc:creator>
		<pubDate>Fri, 29 Apr 2022 06:56:55 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[नवीनतम]]></category>
		<category><![CDATA[विनाश पर्व]]></category>
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		<category><![CDATA[भारतीय ज्ञान का खज़ाना]]></category>
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					<description><![CDATA[<p> &#8211; प्रशांत पोळ गुरुवार, दिनांक २३ जून, १७५७ को अंग्रेजों ने बंगाल में प्लासी में युद्ध जीत लिया और पूरा बंगाल उनके कब्जे में आ गया। उस समय का ‘पूरा&#8230; </p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: right;"> &#8211; प्रशांत पोळ</p>
<p><img fetchpriority="high" decoding="async" class="alignnone wp-image-5215" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2022/04/WhatsApp-Image-2022-02-07-at-22.16.53-e1651214628320-264x300.jpeg" alt="" width="1033" height="1174" srcset="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2022/04/WhatsApp-Image-2022-02-07-at-22.16.53-e1651214628320-264x300.jpeg 264w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2022/04/WhatsApp-Image-2022-02-07-at-22.16.53-e1651214628320.jpeg 518w" sizes="(max-width: 1033px) 100vw, 1033px" /></p>
<p>गुरुवार, दिनांक २३ जून, १७५७ को अंग्रेजों ने बंगाल में प्लासी में युद्ध जीत लिया और पूरा बंगाल उनके कब्जे में आ गया। उस समय का ‘पूरा बंगाल’, अर्थात आज का बांग्ला देश, पश्चिम बंगाल और बिहार-ओडिशा का कुछ भाग। धीरे-धीरे अंग्रेज़ अपना राज्य बढ़ाते गए। ३ जून, १८१८ को पुणे के पेशवा ने हार मानने के बाद, पंजाब छोड़कर, लगभग समूचे हिन्दुस्तान पर अंग्रेजों का कब्जा हो गया।</p>
<p>२३ जून, १७५७ से १५ अगस्त १९४७, अर्थात् कुल १९० वर्ष अंग्रेजों ने भारत पर राज किया। इस पूरे कालखंड में अंग्रेजों ने भारत को जी भर कर लूटा। एक छोटे से बिन्दु के समान इंग्लैंड की एक छोटी सी व्यापार करने वाली कंपनी, ‘ईस्ट इंडिया कंपनी’ ने इस विशाल अखंड भारत को देखते-देखते निगल लिया और पचा भी लिया। भारत देश, अंग्रेजों के लिए सुख, वैभव, ऐश्वर्य, समृद्धि का खजाना था। ऐशो आराम, उपभोग, संपत्ति, रईसी… इन सभी शब्दों के लिए अंग्रेजों के पास पर्यायवाची शब्द ‘भारत’ था। इन १९० वर्षों के कालखंड में इंग्लैंड दिनों दिन समृद्ध होता गया और किसी समय विश्व में व्यापार और ज्ञान-कौशल के मामले में सर्वश्रेष्ठ भारत, कंगाल और गरीब होता गया।</p>
<p>जब अंग्रेजों ने भारत पर राज करना प्रारंभ किया तब, अर्थात १७५७ में वैश्विक व्यापार में भारत की हिस्सेदारी २२.८% थी, तो इंग्लैंड की मात्र ३% थी। किन्तु १९४७ में अंग्रेज़ जब भारत छोड़ कर गए, तब यह आंकड़े बिलकुल विपरीत थे। १९४७ में वैश्विक व्यापार में भारत की हिस्सेदारी मात्र ३% रह गई थी। लेकिन छोटे से इंग्लैंड का हिस्सा १७.६% तक बढ़ गया था!</p>
<p>ऐसा लगा कि १५ अगस्त, १९४७ को अंग्रेजों ने आरंभ किया हुआ ‘विनाशपर्व’ समाप्त हुआ। स्वतंत्रता मिलने के बाद, भारत के सामने एक बड़ी चुनौती थी – देश को फिर से स्वयंपूर्ण रूप से खड़ा करने की। भारत के पास अपने पुरखों की मजबूत धरोहर थी। इस्लामी, अंग्रेज़, पोर्तुगीज और फ्रेंच आक्रांताओं ने इस देश की समृद्ध व्यवस्था को ध्वस्त करने के भरसक प्रयास के बावजूद भी भारतीय ज्ञान-परंपरा में जबरदस्त जीवटता थी। उसका सहारा लेकर, विज्ञान और तकनीकी में प्रगति करते हुए, एक नया वैभवशाली भारत निर्माण करना संभव था। उस प्रकार की अनुकूलता भी देश में थी।</p>
<p>देश का विभाजन हुआ था। उस विभाजन के दाहक अंगारों को झेलते हुए आगे बढ़ना था। मुसलमानों को उनका अलग देश मिलने से हिन्दू-मुस्लिम समस्या समाप्त होनी चाहिए थी। आगे बढ़ने के रास्ते में कांटे बिछने का कोई कारण नहीं था।</p>
<p>किन्तु ऐसा हुआ नहीं। ऐसा होना भी नहीं था। अंग्रेजों का चलाया हुआ ‘विनाशपर्व’ अभी समाप्त नहीं हुआ था!</p>
<p>देश की स्वतंत्रता के बाद, इस विशाल देश को एकसाथ, एकजुट रखते हुए, नए भारत के निर्माण के लिए अनेक चीजें करने की आवश्यकता थी। किन्तु स्वतंत्रता मिलकर एक वर्ष भी नहीं हुआ था, कि महात्मा गांधी की हत्या के झूठे आरोप लगाकर हजारों देशभक्तों को जेल में भेज दिया गया। पैंसठ वर्ष के वीर सावरकर जी को भी स्वतंत्र भारत में कारावास झेलना पड़ा। नेताजी सुभाषचंद्र बोस का नाम तो मानो जैसे प्रतिबंधित ही हो गया था। देश को स्वतंत्रता दिलाने के लिए, अंडमान-निकोबार तक पहुंच कर, उस भूभाग को स्वतंत्र करने वाली, ‘आजाद हिन्द सेना’ का बहिष्कार हो रहा था।</p>
<p>नया भारत निर्माण करने में सहायक और आवश्यक ऐसे प्रेरणास्पद व्यक्तित्व और प्रतीकों को ही समाज से दूर रखा गया।</p>
<p>१९४८ में स्वतंत्र हुए इज़राइल के सामने, ‘देश की भाषा कौन सी होनी चाहिए’ यह समस्या थी। इज़राइल में पूरे दुनिया से अलग-अलग भाषा बोलने वाले अप्रवासी ज्यू (यहूदी) आए थे। उनकी स्वयं की भाषा ‘हिब्रू’, लगभग २००० वर्ष पहले की स्थिति में थी। बहुत कम ज्यू लोगों को यह भाषा आती थी। लेकिन इज़राइल ने अपनी ही हिब्रू भाषा में, सभी व्यवहार करने का निश्चय किया। केवल पांच वर्षों में, अर्थात १९५२-५३ तक इज़राइल के सभी ज्यू नागरिक हिब्रू भाषा में बोल रहे थे, लिख रहे थे। आज ‘सायबर सिक्योरिटी’, ऑप्टिक्स या खेती में नई तकनीकी संबंधी नवीनतम जानकारी चाहिए, तो हिब्रू भाषा आना/समझना आवश्यक है, कारण इन क्षेत्रों में नए शोध, हिब्रू भाषा में ही हो रहे हैं।</p>
<p>इज़राइल एक छोटा सा देश है, इसलिए उसे यह सब करना आसान हुआ, ऐसा कोई कह सकता है। किन्तु भारत जैसे विशालकाय देश को अलग प्रकार की रचना करके, नए भारत के विकास के लिए, ‘स्व’ पर आधारित, अनेक परियोजनाएं खड़ी करना संभव था।</p>
<p>किन्तु ऐसा हुआ नहीं।</p>
<p>क्योंकि हमने शासन की बागडोर सौंपी थी ऐसे लोगों के हाथों में, जिनकी रीढ़ की हड्डी ही गायब थी!</p>
<p>अंग्रेजों द्वारा बर्बाद की हुई सब व्यवस्थाएं फिर से खड़ी करनी थी। उन्होंने डेढ़ सौ से ज्यादा वर्षों से, भारतीय मानसिकता पर जो औपनिवेशिकता का आवरण चढ़ाया था, उसे कुरेदकर निकालना आवश्यक था। उसके लिए आवश्यकता थी, इस देश की मिट्टी से ‘कनैक्ट’ होने वाला शिक्षा विभाग और इस विभाग का नेतृत्व करने वाले, इस देश की सांस्कृतिक विरासत से जुड़े शिक्षा मंत्री।</p>
<p>स्वतंत्र भारत में हमारे पहले शिक्षा मंत्री कौन थे?</p>
<p>मौलाना अबुल कलाम आजाद।</p>
<p>मुस्लिम लीग के जिन्ना को टक्कर देने के लिए काँग्रेस द्वारा खड़ा किया हुआ ‘पोस्टर ब्वॉय’। पूर्ण रूप से मुस्लिम मानसिकता और मुस्लिम संस्कारों में विकसित हुआ नेतृत्व! असली नाम – मोहिउद्दीन अहमद। इनके पुरखे बाबर के साथ आक्रांता के रुप में भारत में आए थे। मूलतः अफगानिस्तान के हेरात प्रांत के। १८५७ के क्रांति युद्ध के दौरान, इनके पिता, भागकर मक्का पहुंचे। बाद में वहां की स्थानीय महिला से विवाह किया। मौलाना साहब का जन्म भी मक्का का। मुस्लिम पद्धति से मदरसों में इनकी शिक्षा हुई। अल-हिलाल और अल-बलाघ, इन दो उर्दू सप्ताहिकों के संस्थापक संपादक। खिलाफत आंदोलन के प्रमुख समर्थक। अलीगढ़ के ‘जामिया मिलिया इस्लामिया’ के संस्थापक सदस्य।</p>
<p>और स्वतंत्रता मिलने के बाद, ग्यारह वर्ष तक भारत के शिक्षा मंत्री!</p>
<p><img decoding="async" class="alignnone wp-image-5217" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2022/04/Resized-pictures-1-60-1-e1651215390921-300x178.jpg" alt="" width="1246" height="739" srcset="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2022/04/Resized-pictures-1-60-1-e1651215390921-300x178.jpg 300w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2022/04/Resized-pictures-1-60-1-e1651215390921-768x455.jpg 768w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2022/04/Resized-pictures-1-60-1-e1651215390921.jpg 800w" sizes="(max-width: 1246px) 100vw, 1246px" /></p>
<p>जिनका भारतीय संस्कृति से, आचार-विचारों से, इस धरोहर से कोई संबंध नहीं, और यदि है तो केवल ऊपरी, सतही संपर्क, ऐसे व्यक्ति के हाथों हमने स्वतंत्रता के पश्चात ग्यारह महत्वपूर्ण वर्षों तक शिक्षा मंत्रालय सौंपा!</p>
<p>इससे, अंग्रेजों ने जो उपनिवेशिक मानसिकता भारतीयों के मन में ठूंस-ठूंस कर भरी थी, उसे दूर करने के प्रयास हुए ही नहीं। साथ ही शिक्षा का प्रवाह इस देश की संस्कृति से, इस देश की ज्ञान परंपरा से, इस देश की धरोहर से जोड़ने का प्रयास भी नहीं हुआ।</p>
<p>इस देश के पहले वित्त मंत्री कौन थे?</p>
<p>१९४६ से १९४७, इस अंतरिम सरकार में वित्त मंत्री थे, मुस्लिम लीग के लियाकत अली खान, जो बाद में पाकिस्तान के प्रधानमंत्री बने। लेकिन स्वतंत्रता के बाद, प्रथम वित्त मंत्री बने, आर.के. षण्मुख चेट्टी। पूर्व में कोचीन रियासत के दीवान रह चुके चेट्टी, अत्यंत होशियार और कर्तव्य पारायण थे। जस्टिस पार्टी के माध्यम से सरकार में शामिल हुए थे। लेकिन उनके नेहरू के साथ मतभेद थे। जैसे तैसे एक वर्ष उन्होंने वित्त मंत्री के रूप में काम संभाला। और १७ अगस्त, १९४८ को उन्हें इस्तीफा देने के लिए विवश किया गया।</p>
<p>उनके बाद कमान संभाली जॉन मथाई ने। वे भी दो वर्ष से ज्यादा नहीं टिक पाये। इस्तीफा देकर वे टाटा सन्स में निदेशक पद पर वापस चले गए। उनके बाद आए चिंतामणराव देशमुख। अत्यंत प्रतिभाशाली देशमुख, अच्छी तरह से काम कर रहे थे। किन्तु ‘संयुक्त महाराष्ट्र’ के विषय में, नेहरू की मनमानी कार्यपद्धति और नीति के विरोध में उन्होंने त्यागपत्र दिया। उनकी जगह पर आए, नेहरू के प्रिय टी. टी. कृष्णम्माचारी। उन्हें एक ही वर्ष में, भ्रष्टाचार के आरोपों के कारण त्यागपत्र देना पड़ा। उनके बाद अगले डेढ़ वर्ष तक जवाहरलाल नेहरू ने ही वित्त मंत्री का पद संभाला।</p>
<p>देश की सशक्त पुनर्निर्मिती के लिए आवश्यकता थी, स्पष्ट और मजबूत वित्तीय नीति की। नेहरू ने उसका मज़ाक बनाया। सोवियत रशिया की आर्थिक नीति से प्रभावित नेहरू ने भारत की अर्थ व्यवस्था को चौपट करके रख दिया। एक भी वित्त मंत्री को स्वतंत्र रूप से काम नहीं करने दिया, उलटे उन पर अपनी राय थोपने का प्रयास किया।</p>
<p>देश पर होने वाले दूरगामी परिणाम, भविष्य के बारे में दूरदृष्टि, भविष्य की योजनाएं…। इन सब का नेहरू से कोई संबंध भी था? सारी दुनिया को स्वच्छ और साफ दृष्टि से दिख रहा था कि चीन, तिब्बत पर कब्जा करने वाला है। पर नेहरू को वह नहीं दिख सका। तिब्बत के बाद चीन, भारत पर आक्रमण करेगा, ऐसा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के तत्कालीन सरसंघचालक श्री गुरुजी और वीर सावरकर से लेकर तो सेना के वरिष्ठ अधिकारी भी बता रहे थे। परंतु तब भी नेहरू को वह नहीं दिख सका।। वह नेहरू द्रष्टा…?</p>
<p>स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात स्थापित प्रथम राष्ट्रीय मंत्रिमंडल में उद्योग मंत्री थे, डॉक्टर श्यामाप्रसाद मुखर्जी। वे हिन्दू महासभा से कोटे से मंत्रिमंडल में शामिल हुए थे। श्यामाप्रसाद जी स्वदेशी के प्रबल समर्थक थे। उनकी साफ और स्पष्ट राय थी कि भारत का नवनिर्माण करना है, तो सरकारी और गैर सरकारी, सभी संसाधनों का उपयोग किया जाना चाहिए। किन्तु नेहरू के दिमाग में सोवियत रशिया का सरकारी मॉडल बिलकुल फिट बैठा था। इसलिए डॉक्टर मुखर्जी के, नेहरू जी से मतभेद होने लगे। डॉ. मुखर्जी ने बिहार के सिंद्री में एक उर्वरक कारख़ाना निर्माण करने की योजना बनाई। बिहार में कोयले के अकूत भंडार को देखते हुए उन्होंने, यह उर्वरक कारख़ाना कोयला आधारित बनाने का निर्णय लिया। किन्तु पेट्रो-केमिकल आयात करने वाली एक खूब बड़ी लॉबी, नेहरू जी की मदद से, इस प्रस्ताव का विरोध कर रही थी। नेहरू जी स्वतः प्रधानमंत्री होने के कारण स्वाभाविकतः इस लॉबी की जीत हुई। अंततः डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी ने ६ अप्रैल, १९५० को मंत्रिमंडल से इस्तीफा दिया।</p>
<p>उर्वरक का वह कारख़ाना आज भी सिंद्री में खड़ा है। किन्तु यह चल रहा है, खाड़ी देशों से आयात किए गए पेट्रो-केमिकल्स पर। हमारा देश आज बड़ी मात्रा में इस परियोजना पर विदेशी मुद्रा खर्च कर रहा है।</p>
<p>डॉ. मुखर्जी और तमाम अन्य राष्ट्रीय नेताओं की सलाह को नजरंदाज करके नेहरू ने रशियन आर्थिक मॉडल अपनाया। इसके कारण, अत्यंत अनुकूल अवसर सामने होते हुए भी हम ज्यादा प्रगति/विकास नहीं कर सके। दूसरे विश्वयुद्ध में बेचिराख हुए जर्मनी, जापान, फ्रांस जैसे देश हमारे बहुत आगे निकाल गए। आखिरकार, जब देश को सोना गिरवी रखने की बारी आई, तब १९९२ में, पहले की आर्थिक नीति पर पूर्णतः यू टर्न मारते हुए हमने मुक्त अर्थव्यवस्था स्वीकार की।</p>
<p>हम सब का दुर्भाग्य था, कि हमने देश ऐसे लोगों के हाथों में सौंपा, जिनकी रीढ़ की हड्डी ही गायब थी!</p>
<p>लंदन से प्रकाशित ‘द गार्जियन’ दैनिक समाचार पत्र ने, वर्ष २०१४ में संपन्न हुए लोकसभा चुनाव पर संपादकीय लिखा है। रविवार, १८ मई, २०१४ को लिखे इस संपादकीय के वाक्य हैं, “Today, 18th May 2014, may well go down in history as the day when Britain finally left India.” इसी में आगे लिखा है, “India under the Congress party was in many ways a continuation of the British Raj by other means.”</p>
<p>संक्षेप में, अंग्रेजों का चलाया हुआ ‘विनाशपर्व’ समाप्त होने के लिए वर्ष २०१४ की प्रतीक्षा करनी पड़ी!</p>
<p>(‘विनाशपर्व’ पुस्तक का अंश)</p>
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		<title>जालियांवाला बाग का नरसंहार</title>
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		<dc:creator><![CDATA[राष्ट्रीय शिक्षा]]></dc:creator>
		<pubDate>Wed, 13 Apr 2022 08:46:29 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[नवीनतम]]></category>
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		<category><![CDATA[Bhartiya Education]]></category>
		<category><![CDATA[indian education]]></category>
		<category><![CDATA[Jaliawala Bagh]]></category>
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		<category><![CDATA[जलियांवाला बाघ]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>&#8211; प्रशांत पोळ कुछ गिने-चुने अंग्रेजों का अपवाद छोड़ दे, तो भारत पर राज करने आया हुआ हर एक अंग्रेज़, सत्ता के नशे में चूर रहता था। भारतीयों के प्रति&#8230; </p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: right;">&#8211; प्रशांत पोळ</p>
<p><img decoding="async" class="alignnone wp-image-5124" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2022/04/jallianwala-bagh-300x169.webp" alt="" width="966" height="544" srcset="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2022/04/jallianwala-bagh-300x169.webp 300w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2022/04/jallianwala-bagh-1024x576.webp 1024w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2022/04/jallianwala-bagh-768x432.webp 768w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2022/04/jallianwala-bagh.webp 1280w" sizes="(max-width: 966px) 100vw, 966px" /></p>
<p>कुछ गिने-चुने अंग्रेजों का अपवाद छोड़ दे, तो भारत पर राज करने आया हुआ हर एक अंग्रेज़, सत्ता के नशे में चूर रहता था। भारतीयों के प्रति कुत्ते-बिल्ली जैसा बर्ताव करना और जनता से कुछ भी वसूलना, यह उन्हें अपना अधिकार लगता था।</p>
<p>सन १९१९ में, अमृतसर के जालियांवाला बाग में जो कुछ हुआ, वह इसी मानसिकता का परिणाम था। जनरल डायर ने वहां निहत्थे और निर्दोष भारतीयों को कीड़े-मकौड़ों जैसा मारा। यह एक भयानक पाशवी नरसंहार था, जिसे ब्रिटिश शासन की अधिमान्यता थी।</p>
<p>१९१९ की १३ अप्रैल को बैसाखी थी। रविवार का दिन था। रौलेट एक्ट के विरोध में सारे देश में प्रदर्शन हो रहे थे। उसी शृंखला में जालियांवाला बाग में एक सभा आयोजित की गई थी। बैसाखी और छुट्टी के कारण, अमृतसर के आजू-बाजू के लोग भी जालियांवाला बाग पहुंच रहे थे। धीरे-धीरे यह संख्या पांच हजार तक पहुंच गई। मैदान में भाषण चल रहे थे, और लोग शांति से बैठ कर उन्हें सुन रहे थे। लोगों में बच्चे, बूढ़े, महिलाएं सभी थे। वातावरण में कही कोई उत्तेजना या असंतोष नहीं था।</p>
<p>तभी अचानक ब्रिटिश सेना का एक अधिकारी, ब्रिगेडियर जनरल एडवर्ड डायर (मूलतः वह कर्नल था। किन्तु अस्थायी रूप से उसे ब्रिगेडियर का पद दिया गया था), हथियारों से सुसज्जित अपनी फौज लेकर मैदान में घुस गया। उसने अपने साथ दो तोपें भी लाई थी। किन्तु जालियांवाला बाग के आसपास की गलियां सकरी होने के कारण वे तोपें मैदान में नहीं आ सकी।</p>
<p>सारे सैनिक मैदान के अंदर आते ही, बिना किसी सूचना दिए, बिना चेतावनी के, जनरल डायर ने शांति से भाषण सुन रहे उन निहत्थे लोगों पर गोलियां बरसाने के आदेश दिये। और सारा परिसर गोलियों की आवाज से, उन निरीह और मासूम नागरिकों की चीख-पुकार से थर्रा उठा!</p>
<p>यह इतिहास का शायद सबसे बड़ा हत्याकांड था। सबसे नृशंस, सबसे जघन्य और सबसे बीभत्स भी! हाथों में आग निकलती बंदुके लिए सैंकड़ों सैनिक और सामने निहत्थे, निरीह, निरपराध नागरिक। उन्हें गोलियों से निर्ममता पूर्वक भूना जा रहा था, मानो मच्छर-मक्खी मार रहे हो। मात्र १५० यार्ड से भी कम दूरी से, गोलियां खत्म होने तक गोलीबारी करने के आदेश थे। विश्व की सारी क्रूरता, सारी पाशवीकता, सारी नृशंसता यहां पर उतर आई थी।</p>
<p>शशि थरूर ने ‘एन इरा ऑफ डार्कनेस’ में लिखा हैं, “इस गोलीबारी के संबंध में कोई पूर्वसूचना नहीं दी गई। जमा हुई भीड़ को ‘यह गैरकानूनी हैं’ ऐसा भी नहीं बताया गया। उस भीड़ को शांतिपूर्ण ढंग से मैदान खाली करने के लिए भी नहीं कहा गया। जनरल डायर ने अपने सैनिकों को हवा में गोली चलाने अथवा लोगों के पैरों पर गोली मारने के लिए भी नहीं कहा था। सैनिकों को मिले आदेशानुसार, उन्होने उन निहत्थे और असहाय लोगों के छाती पर, चेहरे पर दनादन गोलियां दागी”!</p>
<p>जख्मी नागरिक तड़पते रहे। पर उन्हें कोई सहायता नहीं मिली। अमृतसर में २४ घंटों का कर्फ़्यू लगाया गया, ताकि कोई भी नागरिक इन जख्मी लोगों की सहायता के लिए आगे ना आ सके। इस कर्फ़्यू का कठोरता से पालन कराया गया। खून के तालाब में पड़े, कराहते जख्मी लोगों को तड़पने के लिए अंग्रेजों ने छोड़ दिया था!</p>
<p>कुल १६५० राउंड की फायरिंग हुई। अधिकृत आंकड़े बताते हैं की ३७९ लोगों की मौत हुई। अमृतसर के डिप्टी कमिश्नर कार्यालय में ४८४ हुतात्माओं की सूची हैं। किन्तु गैर सरकारी आकड़ों के अनुसार १,००० से भी ज्यादा लोग इस हत्याकांड में मारे गए. २००० से भी ज्यादा लोग गंभीर रूप से जख्मी हुए।</p>
<p>जिन्हे ‘न्यायप्रिय’ होने का तमगा दिया गया था, ऐसे अंग्रेजों ने इस जघन्य हत्याकांड का खुले आम समर्थन किया. जनरल डायर, रातोंरात इंग्लैंड में हीरो बन गया।</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone wp-image-5125" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2022/04/download.jpg" alt="" width="1150" height="699" /></p>
<p>जनरल डायर के इस करतूत पर इंग्लैंड के दोनों सदनों में चर्चा हुई। हाउस ऑफ लॉर्ड्स ने उसे पूर्णतः दोषमुक्त करार दिया। हाउस ऑफ कॉमन्स ने बस एक छोटी सी टिप्पणी कर के इतिश्री कर दी। जनरल डायर को मोटी पेंशन मंजूर की गई। जिस ‘मोगली’ के जनक, नोबल पुरस्कार विजेता, रुडयार्ड किपलिंग को हम सर पर उठाए रहते हैं, उस किपलिंग ने जनरल डायर का गौरव करते हुए उसे ‘भारत को बचाने वाला आदमी’ कहा!</p>
<p>मामला इतने पर नहीं रुका&#8230;.</p>
<p>भारत में रह रहे अंग्रेज़ अधिकारियों को, जनरल डायर का यह गौरव पर्याप्त नहीं लगा। उन्होने एक मुहिम छेड़कर, जनरल डायर की क्रूरता का सम्मान करने के लिए, निधि संकलन प्रारंभ किया। उन्होने भारी सी रकम इकठ्ठा की – २६३१७ पाउंड, १ शिलिंग, १० पेन्स। यह रकम उन दिनों चौकाने वाली थी। आज के हिसाब से वह ढाई लाख पाउंड (अर्थात ढाई करोड़ रुपये) होती हैं। इस मोटे रकम की थैली, बर्बरता के सरताज, जनरल डायर को, हीरे लगी हुई तलवार के साथ, ससम्मान भेंट की गई!</p>
<p>और अनेकों महीनों की न्यायिक लड़ाई लड़ने के बाद, जालियांवाला बाग हत्याकांड के मृत लोगों के परिजनों को, अंग्रेज़ सरकार ने, बड़ी दरियादिली दिखाते हुए, हर एक मृत व्यक्ति के लिए ३७ पाउंड दिये।</p>
<p>(विनाशपर्व &#8211; इस पुस्तक के अंश)</p>
<p><strong>और पढ़ें :</strong>  <strong><a href="https://rashtriyashiksha.com/unjust-rule-of-british-2/" target="_blank" rel="noopener">अंग्रेजों का न्यायपूर्ण शासन? – 2</a></strong></p>
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		<title>अंग्रेजों का न्यायपूर्ण शासन? – 2</title>
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		<dc:creator><![CDATA[राष्ट्रीय शिक्षा]]></dc:creator>
		<pubDate>Thu, 31 Mar 2022 09:43:26 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[<p>&#8211; प्रशांत पोळ १८५७ के क्रांति युद्ध में अंग्रेजों की निर्दयता एक ब्रिटिश आर्मी ऑफिसर ने ‘द टाइम्स’ में लिखा, “We have the power of life and death in our&#8230; </p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: right;">&#8211; प्रशांत पोळ</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone wp-image-5042" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2022/03/WhatsApp-Image-2021-12-26-at-07.38.03-300x169.jpeg" alt="" width="1163" height="655" srcset="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2022/03/WhatsApp-Image-2021-12-26-at-07.38.03-300x169.jpeg 300w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2022/03/WhatsApp-Image-2021-12-26-at-07.38.03-768x432.jpeg 768w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2022/03/WhatsApp-Image-2021-12-26-at-07.38.03.jpeg 795w" sizes="auto, (max-width: 1163px) 100vw, 1163px" /></p>
<p><strong>१८५७ के क्रांति युद्ध में अंग्रेजों की निर्दयता</strong></p>
<p>एक ब्रिटिश आर्मी ऑफिसर ने ‘द टाइम्स’ में लिखा, “We have the power of life and death in our hands, and I assure you, we spare not. A very summary trial is all that takes place.” (भारतीयों को जीवन या मृत्यु देने की ताकत हमारे हाथों में थी। और मैं आपको आश्वस्त करता हूं, हमने किसी को नहीं बख्शा। हम तत्काल निर्णय लेते थे।)</p>
<p>गंगा के मैदान में, क्रांति युद्ध में सम्मिलित सैनिकों को मारते हुए कमांडिंग ऑफिसर जेम्स नेल (James Neill) आगे बढ़ रहा था। उसकी आज्ञाएं अत्यंत साफ थीं, स्पष्ट थीं। ‘अलाहाबाद के आजूबाजू के संपूर्ण प्रदेश को ‘सेटल’ करने की उसकी आज्ञा थी।’ उसके शब्द थे, “All the men inhabiting them (certain named villages) were to be slaughtered”. (अर्थात, ‘उन तमाम गांवों के सभी पुरुषों को पूर्णतः खत्म करो, जिन गांवों में ‘विद्रोह’ के सिपाही थे’)</p>
<p>‘लंदन टाइम्स’ का पत्रकार विलियम हार्वर्ड रसेल, जो १८५८ में भारत में था, वह जेम्स नेल की रेजीमेंट के साथ चल रहा था। उसने लिखा है, “जो भी भारतीय पुरुष सामने दिखता था, अंग्रेज़ उसे मार डालते थे। बाद में तो, ‘गोली व्यर्थ क्यों गवाना’ ऐसा सोचकर अंग्रेज़ सिपाही रास्ते में पड़ने वाले सभी गावों के पुरुषों को पेड़ पर लटकाकर खत्म करते थे। रास्ते के सारे पेड़, झूलती हुई लाशों से पटे पड़े थे”।</p>
<p>जे। डब्लू। काये (J। W। Kaye) ने १८५७ के स्वतंत्रता युद्ध का इतिहास, ‘सेपॉय वॉर’ (Sepoy War) नाम से लिखा है। इस में काये लिखते हैं, “अंग्रेजों ने अनेक गांव, उस में रह रहे लोगों के साथ, जलाकर राख़ कर दिये। अनेक स्थानों पर की गई यह क्रूरता की पराकाष्ठा थी”।</p>
<p>इस स्वतंत्रता संग्राम को १५० वर्ष होने के उपलक्ष्य में, लंदन से प्रकाशित ‘द गार्जियन’ में, उनके दिल्ली के प्रतिनिधि रणदीप रमेश का आलेख छपा है, ‘India’s secret history : A holocaust, one where millions disappeared.’ दिनांक २४ अगस्त, २००७ को छपे इस आलेख में रणदीप रमेश ने लिखा है कि १८५७ के क्रांति युद्ध से बौखलाए अंग्रेजों ने लगभग १० वर्ष तक, क्रूरता से भरा एक जबरदस्त अभियान छेड़ा, जिसका उद्देश्य था, कि किसी भी भारतीय व्यक्ति में यह हिम्मत ही ना रहे, कि वो अंग्रेजों के विरोध में कुछ करने का सोच भी सके। इतनी भयंकर दहशत भारतीयों से मन-मस्तिष्क में भर देना।</p>
<p>मुंबई के इतिहासकार अमरेश मिश्रा को उद्धृत करते हुए रणदीप रमेश ने लिखा है कि १८५७ के बाद, अगले दस वर्ष तक अंग्रेजों ने लगभग एक करोड़ भारतीयों की नृशंसतापूर्वक हत्या की। इतिहास में उन एक लाख सैनिकों का उल्लेख आता है, जिनको अंग्रेजों ने ‘विद्रोह की सजा’ के रूप में मृत्युदंड दिया। किन्तु, उन सामान्य नागरिकों के बारे में इतिहास मौन है, जिन्हें बिना किसी कारण से, अंग्रेजों ने निर्दयतापूर्वक मौत के घाट उतारा। यह अंग्रेजों द्वारा सामान्य भारतीयों का किया हुआ नरसंहार था, जो जनता के सामने आना चाहिए।</p>
<p>अमरेश मिश्रा ने अनेक संसाधनों का अध्ययन कर एक करोड़ की हत्याओं का आंकड़ा निकाला है। इन संसाधनों में ‘ब्रिटिश लेबर फोर्स रिकॉर्ड्स’ प्रमुखता से है।</p>
<p>१८५७ के क्रांति युद्ध के लगभग २५ वर्ष बाद, मराठी में एक पुस्तक प्रकाशित हुई, ‘माझा प्रवास’। कोंकण क्षेत्र के गोडसे भटजी द्वारा लिखा हुआ यह यात्रा वृत्तांत है। १८५७ – ५८ के बीच, गोडसे भटजी अपने चाचा के साथ झांसी-ग्वालियर क्षेत्र में थे। उन्होंने अंग्रेजों के भयानक अत्याचारों का प्रत्यक्ष अनुभव किया था। उनके अनुसार, झांसी के आसपास के प्रदेश के लगभग सभी कुएं, स्थानीय लोगों की लाशों से पटे पड़े थे। अंग्रेज़ गांव-गांव जाकर, ६ वर्ष के बालक से लेकर तो ६० वर्ष के बुजुर्ग आदमी तक, सभी को मार डालते, और उनके शव कुएं में फेंक कर चले जाते थे। भारतीयों में दहशत बिठाने का उनका अपना यह तरीका था। पूरे बुंदेलखंड में अंग्रेजों के इस नरसंहार को ‘बीज्जन’ कहा जाता था। अंग्रेजों ने ऐसे अनेक गांवों का ‘बीज्जन किया’ था।</p>
<p><strong>जलियांवाला बाग का नरसंहार</strong></p>
<p>कुछ गिने-चुने अंग्रेजों का अपवाद छोड़ दें, तो भारत पर राज करने आया हुआ हर एक अंग्रेज़, सत्ता के नशे में चूर रहता था। भारतीयों के प्रति कुत्ते-बिल्ली जैसा बर्ताव करना और जनता से कुछ भी वसूलना, यह उन्हें अपना अधिकार लगता था।</p>
<p>सन् १९१९ में, अमृतसर के जलियांवाला बाग में जो कुछ हुआ, वह इसी मानसिकता का परिणाम था। जनरल डायर ने वहां निहत्थे और निर्दोष भारतीयों को कीड़े-मकौड़ों जैसा मारा। यह एक भयानक पाशवी नरसंहार था, जिसे ब्रिटिश शासन की अधिमान्यता थी।</p>
<p>१९१९ की १३ अप्रैल को बैसाखी थी। रविवार का दिन था। रौलेट एक्ट के विरोध में सारे देश में प्रदर्शन हो रहे थे। उसी श्रृंखला में जलियांवाला बाग में एक सभा आयोजित की गई थी। बैसाखी और छुट्टी के कारण, अमृतसर के आजू-बाजू के लोग भी जलियांवाला बाग पहुंच रहे थे। धीरे-धीरे यह संख्या पांच हजार तक पहुंच गई। मैदान में भाषण चल रहे थे, और लोग शांति से बैठ कर उन्हें सुन रहे थे। लोगों में बच्चे, बूढ़े, महिलाएं सभी थे। वातावरण में कहीं कोई उत्तेजना या असंतोष नहीं था।</p>
<p>तभी अचानक ब्रिटिश सेना का एक अधिकारी, ब्रिगेडियर जनरल एडवर्ड डायर (मूलतः वह कर्नल था, किन्तु अस्थायी रूप से उसे ब्रिगेडियर का पद दिया गया था), हथियारों से सुसज्जित अपनी फौज लेकर मैदान में घुस गया। उसने अपने साथ २ तोपें भी लाई थी। किन्तु जलियांवाला बाग के आसपास की गलियां सकरी होने के कारण वे तोपें मैदान में नहीं आ सकीं।</p>
<p>सारे सैनिक मैदान के अंदर आते ही, बिना किसी सूचना दिए, बिना चेतावनी के, जनरल डायर ने शांति से भाषण सुन रहे उन निहत्थे लोगों पर गोलियां बरसाने के आदेश दिये। और सारा परिसर गोलियों की आवाज से, उन निरीह और मासूम नागरिकों की चीख-पुकार से थर्रा उठा!</p>
<p>यह इतिहास का शायद सबसे बड़ा हत्याकांड था। सबसे नृशंस, सबसे जघन्य और सबसे विभत्स भी! हाथों में आग निकलती बंदुकें लिए सैकड़ों सैनिक और सामने निहत्थे, निरीह, निरपराध नागरिक। उन्हें गोलियों से निर्ममता पूर्वक भूना जा रहा था, मानो मच्छर-मख्खी मार रहे हों। मात्र १५० यार्ड से भी कम दूरी से, गोलियां खत्म होने तक गोलीबारी करने के आदेश थे। विश्व की सारी क्रूरता, सारी पाश्विकता, सारी नृशंसता यहां पर उतर आई थी।</p>
<p>शशि थरूर ने ‘An Era of Darkness’ में लिखा है, “इस गोलीबारी के संबंध में कोई पूर्व सूचना नहीं दी गई। जमा हुई भीड़ को ‘यह गैरकानूनी है’ ऐसा भी नहीं बताया गया। उस भीड़ को शांतिपूर्ण ढंग से मैदान खाली करने के लिए भी नहीं कहा गया। जनरल डायर ने अपने सैनिकों को हवा में गोली चलाने अथवा लोगों के पैरों पर गोली मारने के लिए भी नहीं कहा था। सैनिकों को मिले आदेशानुसार, उन्होंने उन निहत्थे और असहाय लोगों के छाती पर, चेहरे पर दनादन गोलियां दागीं!</p>
<p>जख्मी नागरिक तड़पते रहे। पर उन्हें कोई सहायता नहीं मिली। अमृतसर में २४ घंटों का कर्फ़्यू लगाया गया, ताकि कोई भी नागरिक इन जख्मी लोगों की सहायता के लिए आगे ना आ सके। इस कर्फ़्यू का कठोरता से पालन कराया गया। खून के तालाब में पड़े, कराहते जख्मी लोगों को तड़पने के लिए अंग्रेजों ने छोड़ दिया था!</p>
<p>कुल १६५० राउंड की फायरिंग हुई। अधिकृत आंकड़े बताते हैं कि ३७९ लोगों की मौत हुई। अमृतसर के डिप्टी कमिश्नर कार्यालय में ४८४ हुतात्माओं की सूची है। किन्तु गैर सरकारी आकड़ों के अनुसार १,००० से भी ज्यादा लोग इस हत्याकांड में मारे गए। २,००० से भी ज्यादा लोग गंभीर रूप से जख्मी हुए।</p>
<p>जिन्हें ‘न्यायप्रिय’ होने का तमगा दिया गया था, ऐसे अंग्रेजों ने इस जघन्य हत्याकांड का खुले आम समर्थन किया। जनरल डायर, रातों-रात इंग्लैंड में हीरो बन गया।</p>
<p>जनरल डायर के इस करतूत पर इंग्लैंड के दोनों सदनों में चर्चा हुई। हाउस ऑफ लॉर्ड्स ने उसे पूर्णतः दोषमुक्त करार दिया। हाउस ऑफ कॉमन्स ने बस एक छोटी-सी टिप्पणी करके इतिश्री कर दी। जनरल डायर को मोटी पेंशन मंजूर की गई। जिस ‘मोगली’ के जनक, नोबल पुरस्कार विजेता, रुडयार्ड किपलिंग को हम सर पर उठाए रहते हैं, उस किपलिंग ने जनरल डायर का गौरव करते हुए उसे ‘भारत को बचाने वाला आदमी’ कहा!</p>
<p>मामला इतने पर नहीं रुका…।</p>
<p>भारत में रह रहे अंग्रेज़ अधिकारियों को, जनरल डायर का यह गौरव पर्याप्त नहीं लगा। उन्होंने एक मुहिम छेड़कर, जनरल डायर की क्रूरता का सम्मान करने के लिए, निधि संकलन प्रारंभ किया। उन्होंने भारी सी रकम इकठ्ठा की – २६,३१७ पाउंड, १ शिलिंग, १० पेन्स। यह रकम उन दिनों चौंकाने वाली थी। आज के हिसाब से वह ढाई लाख पाउंड (अर्थात ढाई करोड़ रुपये) होती है। इस मोटी रकम की थैली, बर्बरता के सरताज, जनरल डायर को, हीरे लगी हुई तलवार के साथ, ससम्मान भेंट की गई!</p>
<p>और अनेकों महीनों की न्यायिक लड़ाई लड़ने के बाद, जालियांवाला बाग हत्याकांड के मृत लोगों के परिजनों को, अंग्रेज़ सरकार ने, बड़ी दरियादिली दिखाते हुए, हर एक मृत व्यक्ति के लिए ३७ पाउंड दिये!</p>
<p>अंग्रेजों की क्रूरता के कुछ उदाहरण मात्र हैं। काले पानी में भेजकर राजनीतिक बंदियों को भी अमानुष यातनाएं देना, अच्छे वस्त्र बुनने वाले बुनकरों के अंगूठे काट देना, राजनीतिक बंदियों को बर्फ की सिल्ली पर लिटाकर उनको कोड़े मारना, १८५७ के क्रांतियुद्ध में, दिल्ली के दरियागंज के पास, ‘कूचा चालान’ में १,४०० निहत्थे, निर्दोष नागरिकों की निर्मम हत्या करना ऐसे अनगिनत प्रसंग बताते हैं, कि अंग्रेजों ने बड़ी बर्बरता के साथ भारत पर राज किया।</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone wp-image-5044" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2022/03/Pipli-1-300x200.jpg" alt="" width="1049" height="699" srcset="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2022/03/Pipli-1-300x200.jpg 300w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2022/03/Pipli-1-1024x683.jpg 1024w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2022/03/Pipli-1-768x512.jpg 768w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2022/03/Pipli-1.jpg 1200w" sizes="auto, (max-width: 1049px) 100vw, 1049px" /></p>
<p><strong>धर्मांतरण का लक्ष्य</strong></p>
<p>भारत पर राज करने का अंग्रेजों का उद्देश्य मात्र व्यापार करना था या सत्ता का नियंत्रण अपने हाथों में लेना?</p>
<p>यह तो था ही। किन्तु इसी के साथ, अंग्रेज़ भारत को पूर्णतः ईसाई बनाना चाहते थे। बिलकुल वैसे ही, जैसे स्पेन ने लगभग समूचे दक्षिण अमेरिका को ईसाई बना डाला था। अंग्रेजों की सोच कुछ ऐसी थी।</p>
<p>१४ मई, २०१८ कोने स्टुअर्ट ब्राउन (Stewart J. Brown) का एक पेपर प्रकाशित किया है, जिसका शीर्षक है, ‘Providential Empire? The Established Church of England and the Nineteenth – Century British Empire in India’ (‘दैवी साम्राज्य? इंग्लैंड के प्रस्थापित चर्च और उन्नीसवीं शताब्दी में भारत में ब्रिटिश राज’)</p>
<p>इस पेपर में स्पष्ट तौर पर लिखा है –</p>
<p>In the early nineteenth century, many in Britain believed that their conquests in India had a providential purpose, and that imperial Britain had been called by God to Christianize India through an alliance of Church and empire. In 1813, parliament not only opened India to missionary activity, but also provided India with an established Church, which was largely supported by Indian taxation and formed part of the established Church of England.</p>
<p>(उन्नीसवीं शताब्दी के प्रारंभ में, इंग्लैंड को यह विश्वास था कि भारत पर उसकी सत्ता यह दैवी संकेत हैं, और इसका ईश्वरी प्रयोजन है। ब्रिटन को ईश्वर ने आदेश दिया है, चर्च और साम्राज्य की सत्ता की मदद से, भारत का ईसाईकरण करने का। १८१३ में इंग्लैंड की पार्लियामेंट ने भारत में मिशनरी गतिविधि बढ़ाने के लिए कहा।)</p>
<p>आगे चलकर, १८५७ के क्रांति युद्ध के आगे/पीछे विक्टोरिया रानी ने भारत से संबंधित अनेक पत्र लिखे हैं। युद्ध के बाद, रानी ने भारत का शासन, ईस्ट इंडिया कंपनी से निकालकर अपने हाथों में ले लिया। इस दौरान रानी ने, भारत को ईसाई बनाने के अपने उद्देश्य पर ज़ोर दिया। महाराजा दिलीप सिंह को लिखे एक पत्र में रानी ने यह मंशा स्पष्ट रूप से प्रकट की है। रानी के वाक्य हैं –</p>
<p>The progress of the railroad will make an immense difference in India and tend more than anything else to bring about civilization and will in the end facilitate to spread of Christianity, which hitherto has made but very slow progress.</p>
<p>(रेल लाइन की प्रगति से भारत में जबरदस्त बदलाव आएगा। विशेषतः सभ्यता और संस्कृति में। अंततः इसका उपयोग होगा ईसाईयत के प्रसार में, जो हुआ तो है, पर बहुत धीमी गति से!)</p>
<p>इसलिए अंग्रेजों ने सारे बड़े/छोटे शहरों में, ईसाई मिशनरियों को चर्च के लिए और स्कूल/कॉलेज खोलने के लिए बड़े-बड़े भूभाग दिये। ये सारे व्यवहार फोकट में थे और ये सारी ज़मीनें, मौके के स्थान पर थीं।</p>
<p><strong>अंग्रेजी शासन में पड़े प्रमुख अकाल</strong></p>
<p>क्र। अकाल का वर्ष | अकाल का क्षेत्र, मारे गए लोग</p>
<p>1। १७६९ | बंगाल और बिहार, १ करोड़</p>
<p>2। १८३७-३८ | आगरा, ८ लाख</p>
<p>3। १८६०–६१ |  आगरा, दिल्ली, पंजाब, हिसार; २० लाख</p>
<p>4। १८६५–६७ | उड़ीसा, बिहार; ४५ लाख</p>
<p>5। १८७६-७८ | मद्रास और बॉम्बे प्रेसीडेंसी, ५५ लाख</p>
<p>6। १८९६-९७ | मद्रास, बॉम्बे, संयुक्त प्रांत; १० लाख</p>
<p>7। १८९९–१९०० | बॉम्बे प्रेसीडेंसी, सीपी एंड बेरार; ४५ लाख</p>
<p>8। १९४३ | बंगाल, ३५ लाख</p>
<p><strong>और पढ़ें</strong> : <span style="color: #000080;"><strong><a style="color: #000080;" href="https://rashtriyashiksha.com/unjust-rule-of-british/" target="_blank" rel="noopener">अंग्रेजों का न्यायपूर्ण शासन? – 1</a></strong></span></p>
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		<title>अंग्रेजों का न्यायपूर्ण शासन? – 1</title>
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		<dc:creator><![CDATA[राष्ट्रीय शिक्षा]]></dc:creator>
		<pubDate>Tue, 29 Mar 2022 05:03:37 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[नवीनतम]]></category>
		<category><![CDATA[विनाश पर्व]]></category>
		<category><![CDATA[श्री रवि कुमार जी]]></category>
		<category><![CDATA[Bhartiya Education]]></category>
		<category><![CDATA[indian education]]></category>
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					<description><![CDATA[<p> &#8211; प्रशांत पोळ ज्ञात इतिहास में भारत पर आक्रांताओं के रूप में आने वालों में शक, हूण, कुषाण, मुसलमान, डच, पोर्तुगीज़, फ्रेंच, अंग्रेज़ आदि प्रमुख हैं। इनमें से सबसे ज्यादा&#8230; </p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: right;"> &#8211; प्रशांत पोळ</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone wp-image-5036" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2022/03/CB30CB1D-E782-4C9A-A4AE-B69CDCCCBA6D-300x95.jpeg" alt="" width="1026" height="325" srcset="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2022/03/CB30CB1D-E782-4C9A-A4AE-B69CDCCCBA6D-300x95.jpeg 300w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2022/03/CB30CB1D-E782-4C9A-A4AE-B69CDCCCBA6D.jpeg 756w" sizes="auto, (max-width: 1026px) 100vw, 1026px" /></p>
<p>ज्ञात इतिहास में भारत पर आक्रांताओं के रूप में आने वालों में शक, हूण, कुषाण, मुसलमान, डच, पोर्तुगीज़, फ्रेंच, अंग्रेज़ आदि प्रमुख हैं। इनमें से सबसे ज्यादा समय तक भारत के विभिन्न हिस्सों पर शासन किया, विभिन्न मुस्लिम वंशों ने। ये लोग अत्यंत क्रूर तथा विभत्स थे। इन्होंने भारतीयों को जो यातनाएं दी हैं, उसकी मिसाल कहीं अन्य मिलना कठिन है। विजयनगर के सम्राट राजा रामराय का सर काटकर उसे बहती नाली के मुहाने पर लगाने वाले यही हैं। छत्रपति संभाजी महाराज की आंखें फोड़कर, उनकी चमड़ी उधेड़कर, उनको बर्बरतापूर्वक मारने वाले भी यही हैं। भाई मतिदास जी को आरी से चीरकर मारने वाले और गुरु तेग बहादुर जी का सर कलम करने वाले भी यही हैं। गुरु गोविंद सिंह जी के पुत्रों को दीवार में चुनवाकर मारने वाले भी यही हैं।</p>
<p>इसलिए जब अंग्रेज़, व्यापारी के रूप में आए और शासक बन गए, तो भारतीयों को वह मुस्लिम शासकों की तुलना में अच्छे लगे। प्रारंभ में अंग्रेज़ शासकों ने मुस्लिम शासकों जैसी क्रूरता और पाश्विकता नहीं दिखाई, इसलिए ‘अंग्रेज़ अच्छे’ यह धारणा बनती गई। उस पर, अंग्रेजों ने जो शिक्षा व्यवस्था बनाई, उससे अंग्रेजों का गुणगान होता रहा। ‘भारत जैसे पिछड़े देश को सुधारकर अंग्रेज़ उसका भला ही कर रहे हैं’, यह धारणा निर्माण की गई। दुर्भाग्य से स्वतंत्रता के बाद भी जो पाठ्यक्रम बनाया गया, उसने इसी धारणा को बल दिया!</p>
<p>किन्तु, अंग्रेज़ क्या वास्तव में भारत को सुधारने का उच्चतम ध्येय लेकर आए थे? क्या अंग्रेज़ सच्चे लोकतंत्र को मानने वाले, न्याय के पुजारी थे?</p>
<p>क्या अंग्रेज़ न्यायप्रिय थे, शांतिप्रिय थे, सभ्य थे, सुसंस्कृत (कल्चर्ड) थे? ऐसा उनके बारे में लिखा गया है। अनेकों बार कहा गया है।</p>
<p>किन्तु सच क्या है?</p>
<p>अंग्रेजों का असली चेहरा कौन सा था?</p>
<p>अंग्रेजों की इस गढ़ी हुई प्रतिमा के बिलकुल विपरीत।</p>
<p>सन् १७५७ में प्लासी के युद्ध में जीत के बाद, अंग्रेजों का बंगाल पर राज करने का रास्ता खुल गया। १७६५ के बक्सर युद्ध के बाद अधिकृत रूप से, ईस्ट इंडिया कंपनी बंगाल से राजस्व वसूल करने लगी।</p>
<p>अगले चार वर्षों में ही बंगाल में भीषण अकाल पड़ा। उस समय की बंगाल की जनसंख्या का लगभग एक तिहाई हिस्सा, अर्थात् एक करोड़ भारतीय, इस अकाल में मारे गए। ये मृत्यु भुखमरी से और अंग्रेजों की ज़्यादतियों के कारण हुई थी। इस अकाल में जनता को बचाने या बाहर निकालने के कोई प्रयास अंग्रेजों ने नहीं किए। उलटे, जो गरीब किसान जीवित थे, उनके साथ बड़ी ही सख्ती से, राजस्व की वसूली की गई।</p>
<p>अमेरिका के एक लेखक हैं, माइक डेविस। लेखक के साथ ही वे राजनीतिक कार्यकर्ता भी हैं। अनेक सम्मान प्राप्त डेविस, यूनिवर्सिटी ऑफ केलिफोर्निया में क्रिएटिव राइटिंग विभाग में प्रोफेसर हैं। इनकी एक चर्चित पुस्तक है – ‘लेट विक्टोरियन होलोकॉस्ट : अल निनो फेमाइन्स एंड द मेकिंग ऑफ द थर्ड वर्ल्ड’। सन २००१ में प्रकाशित पुस्तक में उन्होंने भारत में पड़े अकाल के बारे में भी लिखा है। वे लिखते हैं, “सन १७७० से १८९० के बीच के एक सौ बीस वर्षों में भारत में ३१ बड़े अकाल पड़े। और उसके पहले, पूरे दो हजार वर्षों में, बड़े अकालों की संख्या है मात्र १७ !”</p>
<p>अर्थात अंग्रेजों ने अकाल से लड़ने के लिए प्रबंध तो किए ही नहीं थे, उलटे भारतीयों की परंपरागत पद्धतियों को नष्ट किया, जो प्रकृति पर आधारित थी, और अकाल पड़ने से बचाने का काम करती थी। ऊपर से ऐसी विषम परिस्थिति में भी अंग्रेजों की क्रूरता सामने आ रही थी। गरीबों से, किसानों से बड़ी ही बेरहमी के साथ राजस्व वसूला जा रहा था।</p>
<p>माइक डेविस के अनुसार १८७६ से १८७८, के तीन वर्षों में बॉम्बे और मद्रास प्रेसीडेंसी में पड़े अकाल में ६० से ८० लाख भारतीयों की मौत हुई। कुछ ही वर्षों बाद, १८९६-१८९७ में फिर बॉम्बे, मद्रास प्रेसीडेंसी के साथ संयुक्त प्रांत और बंगाल में भी अकाल पड़ा। उसमें पचास लाख से ज्यादा लोग मारे गए। यही कहानी १८९९-१९०० के बॉम्बे प्रेसीडेंसी और सी पी &#8211; बेरार के अकाल में दोहराई गई।</p>
<p>संक्षेप में, अंग्रेजी शासन में अकाल पड़ने का क्रम चलता रहा। किन्तु अंग्रेजों ने अपनी पाश्विक नीति में कोई बदलाव नहीं किया। ईस्ट इंडिया कंपनी से शासन की बागडोर सीधे रानी विक्टोरिया के हाथों में आ गई। लेकिन अंग्रेजों की क्रूरता कम होने के बजाय, बढ़ती ही गई।</p>
<p>१९४३ के आने तक परिदृश्य काफी बदल चुका था। द्वितीय विश्वयुद्ध अपने चरम पर था। तीस लाख से ज्यादा भारतीय सैनिक, अंग्रेजों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर दुनिया के विभिन्न स्थानों पर दुश्मनों से लड़ रहे थे। यह बंगाल के अकाल का वर्ष था। यह भीषण अकाल था। लोग दाने-दाने को मोहताज हो रहे थे। उन दिनों विंस्टन चर्चिल इंग्लैंड के प्रधानमंत्री थे। उन्होंने बंगाल का बचा-खुचा अनाज, जहाज भर-भर कर युगोस्लाविया पहुंचाया, अपने सैनिकों के लिए! इस अकाल में तीस लाख से ज्यादा भारतीयों की मृत्यु हुई थी। इस पर चर्चिल की ने कहा था, “मैं भारतीयों से घृणा करता हूँ। वे जानवरों जैसे लोग हैं, जिनका धर्म भी पशुओं जैसा ही है। अकाल उनकी अपनी गलती थी, क्योंकि वे खरगोशों की तरह जनसंख्या बढ़ाने का काम करते रहे।”</p>
<p>इंग्लैंड में पार्लियामेंट के सदस्य रहे, इतिहासकार विलियम टॉरेन (William Torren) ने एक पुस्तक लिखी है, ‘एम्पायर इन एशिया’ (Empire in Asia)। इस पुस्तक में अवध के नवाब शुजाऊद्दोला के मरने के बाद (अर्थात सन १७७५ के बाद), अंग्रेजों ने उसकी बेगमों को कितनी पाश्विकता से लूटा, उसका चित्रण है। (पृष्ठ १२६-१२८)। मजेदार बात यह, कि शुजाऊद्दोला ने अपनी इन बेगमों की व्यवस्था, बड़े ही विश्वास के साथ अंग्रेजों पर सौंपी थी। इसलिए इस लूट/डकैती को संवैधानिक चोला पहनाने के लिए, अंग्रेजों ने तत्कालीन प्रधान न्यायाधीश, सर एलाइजाह इंपे को भी इसमें शामिल किया। इन न्यायाधीश महोदय ने, कलकत्ता से आकर, फैजाबाद की विधवा बेगमों पर, काशी नरेश चेत सिंह के साथ मिलकर, अंग्रेजों के विरोध में युद्ध छेड़ने का झूठा आरोप लगाया। फिर फैजाबाद के महलों को अंग्रेजों ने घेर लिया। बेगमों से कहा गया, “आप कैदी हैं। अपने तमाम जेवर, सोना, चांदी, जवाहरात हमें दे दीजिये।” बेगमों के मना करने पर उनके नौकरों को तड़पा-तड़पाकर मारा गया और उन्हें भूखा रखा गया। भयंकर यातनाएं दी गई। बेगमों को पानी तक पीने की इजाजत नहीं थी।</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone wp-image-5037" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2022/03/WhatsApp-Image-2021-12-26-at-07.38.02-300x204.jpeg" alt="" width="965" height="656" srcset="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2022/03/WhatsApp-Image-2021-12-26-at-07.38.02-300x204.jpeg 300w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2022/03/WhatsApp-Image-2021-12-26-at-07.38.02.jpeg 670w" sizes="auto, (max-width: 965px) 100vw, 965px" /></p>
<p>अपने नौकरों की क्रूरतापूर्ण मृत्यु देखकर, फैजाबाद की बेगमों ने, पिटारे भर-भर कर रखा हुआ अपना सारा खजाना अंग्रेजों को सौंप दिया। उन दिनों उसकी कीमत एक करोड़ बीस लाख रुपयों से भी ज्यादा आंकी गई थी। पूरे भारत में, ऐसी सैंकड़ों घटनाएँ मिलती हैं, जिनमें अंग्रेजों की लूट और डकैती के प्रत्यक्ष प्रमाण उपलब्ध हैं। ये सारी घटनाएं अंग्रेजों की न्यायप्रियता की धज्जियां उड़ाती हैं।</p>
<p>ईस्ट इंडिया कंपनी के एक अफसर, हेनरी थॉमस कोलब्रुक (Henry Thomas Colebrook) ने २८ जुलाई, १७८८ को एक पत्र अपने इंग्लैंड में रहने वाले पिता को लिखा है। ‘भारत में अंग्रेजी राज’ यह पुस्तक लिखने वाले सुंदरलाल जी ने इस पत्र को, अपनी पुस्तक में उद्धृत किया है। कोलब्रुक लिखते हैं, – “मिस्टर हेस्टिंग (गवर्नर जनरल वॉरेन हेस्टिंग) ने इस देश को ऐसे कलेक्टर और जजों से भर दिया है, जिनके सामने एकमात्र लक्ष्य धन कमाना है। ज्यों ही ये गिद्ध मुल्क के ऊपर छोड़े गए, उन्होंने कहीं कोई बहाना बनाकर और कहीं बिना बहाने के, भारतवासियों को लूटना शुरू कर दिया।”</p>
<p>बाद में संस्कृत के विद्वान बने कोलब्रुक आगे लिखते हैं, “वॉरेन हेस्टिंग की कूटनीति और उसके निर्लज्ज विश्वासघात का प्रभाव केवल राजाओं और बड़े लोगों पर ही नहीं पड़ा। जमींदारों की जमींदारियां छिन लेना, बेगमों को लूटना, रूहेलों का निर्वंश कर डालना, ये सब तो एक बार भूले जा सकते हैं। पर जो अत्याचार उसने गोरखपुर में किए, वे सदा के लिए ब्रिटिश जाति के नाम पर कलंक रहेंगे।”</p>
<p>सुंदरलाल जी ने अपने ‘भारत में अंग्रेजी राज’ इस पुस्तक में, इस विषय पर विस्तार से लिखा है।</p>
<p>गोरखपुर के अत्याचारों के विषय में ‘हिस्ट्री ऑफ ब्रिटिश इंडिया’ पुस्तक में इतिहासकार जेम्स मिल लिखता है कि सन् १७७८ में वॉरेन हेस्टिंग ने, अपने एक अफसर, कर्नल हैनेवे (Col। Hanaway) को कंपनी की नौकरी से निकालकर अवध के नवाब के यहां भेज दिया। नवाब पर दबाव डालकर, बहराइच और गोरखपुर जिलों का दीवानी और फौजी शासन, कर्नल हैनेवे के आधीन कर दिया। जेम्स मिल आगे लिखता है, “यह पूरा क्षेत्र, नवाब के शासन में खूब खुशहाल था। किन्तु कर्नल हैनेवे के अत्याचारों के कारण तीन साल के अंदर यह पूरा क्षेत्र वीरान हो गया।”</p>
<p>इस घटना का विस्तार से वर्णन किया है, सैयद नजमूल रझा रिजवी ने, ‘Gorakhpur Civil Rebellion in Persian Historiography’ पुस्तक में। कर्नल हैनेवे के विरोध में गोरखपुर में बड़ा जनांदोलन खड़ा हुआ, जिसे अंग्रेजों ने ‘विद्रोह’ का नाम दिया और बाद में इसे बड़ी नृशंसता से कुचला गया।</p>
<p>गोरखपुर जिले का राजस्व, पूरा वसूलने पर, उन दिनों छह से आठ लाख रुपये वार्षिक होता था। किन्तु कर्नल हैनेवे ने सन् १७८० में, बड़ी निर्दयता से इस जिले से १४,५६,०८८ रुपये वसूले। अर्थात प्रतिवर्ष के राजस्व से लगभग दोगुना! किस बर्बरता के साथ, गरीब किसानों को यातनाएं देकर उसने इतने रुपये वसूले होंगे, यह हम समझ सकते हैं। जमींदारों को राजस्व का २०% मिलता था, अपने क्षेत्र में व्यवस्थाएं बनाए रखने के लिए। यह लगभग डेढ़ लाख रुपये होता था। किन्तु कर्नल हैनेवे ने साढ़े चौदह लाख वसूल कर, जमींदारों के हाथों टिकाये मात्र पचास हजार रुपये!</p>
<p>ये पूरा राजस्व ईस्ट इंडिया कंपनी के खाते में नहीं गया। इन अधिकारियों ने आपस में मिल बांट कर खा लिया।</p>
<p>गोरखपुर की यह घटना अपवाद नहीं है। पूरे देश में यही चित्र था। पहले बंगाल, और सन् १८१८ के बाद सारे देश में अंग्रेजों का प्रशासन कमोबेश ऐसा ही रहा। इस अन्याय पर कोई सुनवाई नहीं थी। और यदि बार-बार न्याय के लिए अर्जी लगाई, तो सुनवाई का नाटक होता था, और सारे अंग्रेज़ अफसरों को निर्दोष करार दिया जाता था।</p>
<p><strong>और पढ़ें</strong> : <span style="color: #000080;"><strong><a style="color: #000080;" href="https://rashtriyashiksha.com/how-the-british-destroyed-bhartiya-prosperous-clothing-industry-lets-know-2/" target="_blank" rel="noopener">कैसे अंग्रेजों ने भारतीय वस्त्र उद्योग को तार-तार किया – आओ जाने-2</a></strong></span></p>
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		<title>कैसे अंग्रेजों ने भारतीय वस्त्र उद्योग को तार-तार किया – आओ जाने-2</title>
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		<pubDate>Tue, 30 Nov 2021 05:17:15 +0000</pubDate>
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		<category><![CDATA[लेख]]></category>
		<category><![CDATA[विनाश पर्व]]></category>
		<category><![CDATA[angrej]]></category>
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					<description><![CDATA[<p> &#8211; प्रशांत पोळ अंग्रेजों ने तय करके भारतीय वस्त्र उद्योग को नष्ट किया। वे इस उद्योग की महत्ता और इसके कारण भारत के वैश्विक महत्व को समझते थे। इसलिए भारत&#8230; </p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: right;"> &#8211; प्रशांत पोळ</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone wp-image-4379" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2021/11/charkha_is_brand_jabalpur_news_201943_15524_03_04_2019-300x225.jpg" alt="" width="1041" height="781" srcset="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2021/11/charkha_is_brand_jabalpur_news_201943_15524_03_04_2019-300x225.jpg 300w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2021/11/charkha_is_brand_jabalpur_news_201943_15524_03_04_2019.jpg 640w" sizes="auto, (max-width: 1041px) 100vw, 1041px" /></p>
<p>अंग्रेजों ने तय करके भारतीय वस्त्र उद्योग को नष्ट किया। वे इस उद्योग की महत्ता और इसके कारण भारत के वैश्विक महत्व को समझते थे। इसलिए भारत में उनके आगमन के मात्र ५ वर्षों पश्चात, १६१३ में, उन्होंने अपनी पहली मिल (वस्त्रों का कारख़ाना) भारत के दक्षिणी छोर, तमिलनाडु के मछलीपट्टनम में लगाया। उन दिनों मछलीपट्टनम कलमकारी कपड़ों के लिए प्रसिद्ध था। यहां के वस्त्रों को विदेशों में भी अच्छी मांग थी।</p>
<p>अंग्रेजों के आने से पहले, भारतीय वस्त्रों का निर्माण मदुरै, पाटन, सूरत, महेश्वर (मालवा), वाराणसी आदि स्थानों पर होता था, किन्तु बंगाल यह भारतीय वस्त्रों के निर्माण का प्रमुख केंद्र था। दुनिया में सबसे ज्यादा मांग यहां के कपड़ों की होती थी। ‘ढांके की मलमल’ तो दुनिया भर में राजे, रजवाड़ों और अमीरों की पहली पसंद रहती थी। यूरोप में इसका निर्यात बड़े पैमाने पर होता था। किन्तु यह जापान से अमेरिका तक जाती थी। बंगाल में अंग्रेजों की हुकूमत आने से पहले तक (प्लासी के युद्ध के पहले तक), बंगाल का कपड़ा यह पश्चिम में तुर्कस्तान, ईरान, इजिप्त, इटली आदि देशों में जाता था। पूर्व में जावा, चीन और जापान इन देशों में भी बंगाल के मलमल की और अन्य प्रकार के सूती वस्त्रों की अच्छी खासी मांग थी।</p>
<p>शशि थरूर ने अपने पुस्तक ‘एन इरा ऑफ डार्कनेस’ में लिखा है कि १७५० के दशक में कपड़ों की यह निर्यात प्रतिवर्ष एक करोड़ साठ लाख से भी ज्यादा थी। (कल्पना करें, यह एक करोड़ साठ लाख रुपये, आज से पौने तीन सौ वर्ष पहले के हैं। आज के हिसाब से इसकी कीमत हम आंक सकते हैं।) इसके अतिरिक्त बंगाल से रेशम की होने वाली निर्यात यह प्रतिवर्ष ६५ लाख रुपयों की होती थी। लगभग २ करोड़ २५ लाख रुपयों के पूरे निर्यात में से, भारत में अपनी कंपनियां खोल कर बैठे विदेशी व्यापारी (अंग्रेज़, पोर्तुगीज, डच, फ्रेंच आदि) लगभग ६० लाख रुपयों की निर्यात यूरोप को करते थे। इसके कारण, सोलहवीं शताब्दी के मध्य से तो अठारहवीं शताब्दी के मध्य तक, बंगाल के सूती और रेशम के वस्त्र उद्योग में ३३% से ज्यादा की बढ़ोतरी हुई। किन्तु १७५७ में, अंग्रेजों द्वारा प्लासी की लड़ाई जीतने के साथ ही दृश्य बदला।</p>
<p>भारतीय वस्त्र उद्योग को समाप्त करने की शुरुआत अंग्रेजों ने बंगाल से की। वे वहां केवल व्यापारी नहीं, तो क्रूरतम शासक बन गए। १७५७ के पहले तक, अंग्रेज़ ‘ब्रिटिश पाउंड’ में भारतीय माल खरीदते थे। अर्थात हमें विदेशी मुद्रा मिलती थी, जिसके अलग फायदे थे। किन्तु प्लासी की लड़ाई जीतने के बाद, बंगाल की सत्ता पर काबिज होते ही, अंग्रेजों ने ब्रिटिश पाउंड में भारतीय माल खरीदना बंद किया। अब वे बंगाल से मिलने वाले राजस्व से भारतीय माल खरीदकर उसे यूरोप में बेचने लगे। इसलिए भारतीय उत्पादकों को कम कीमत मिलने लगी।</p>
<p>किन्तु इसके बाद भी वैश्विक बाजार में भारतीय कपड़े, स्पर्धा में थे। उनका लागत मूल्य ही कम था। इसलिए बाजार की कीमत भी कम थी। इंग्लैंड में वस्त्र उद्योग प्रारंभिक अवस्था में था। इसलिए वह भारतीय वस्त्र उद्योग से स्पर्धा करने की परिस्थिति में नहीं था। ‘कम कीमतें और अच्छी गुणवत्ता’ यह भारतीय कपड़ों की विशेषता थी, जो इंग्लैंड के उत्पादकों के लिए संभव नहीं थी।</p>
<p>लेकिन अंग्रेज़ व्यापारी, ब्रिटिश सरकार यह सब अपने माल के लिए बाजार चाहते थे। उन्हें भारतीय वस्त्र उद्योग से प्रेम या सहानुभूति रहने का कोई कारण नहीं था। इसलिए अंग्रेजों ने कपड़ा उद्योग में सिरमौर बनने के लिए सभी प्रकार की कुटिल चालें चलीं। गुणवत्ता में सुधार लाकर, भारतीय वस्त्रों की गुणवत्ता से आगे निकल जाना संभव नहीं, ये अंग्रेज़ अच्छे से जानते थे। इसलिए उन्होंने तमाम गलत और अनैतिक हथकंडे अपनाए। ईस्ट इंडिया कंपनी के सिपाहियों ने बंगाल के बुनकरों के करघे (looms) तोड़ दिये। अठारहवीं शताब्दी के अंग्रेज़ व्यापारी विलियम बोल्ट्स ने एक पुस्तक लिखी, ‘कन्सिड्रेशन ऑन इंडियन अफेयर्स’। वर्ष १७७२ में प्रकाशित इस पुस्तक में बोल्ट्स ने ईस्ट इंडिया कंपनी के तमाम गलत और अनैतिक कार्यों का कच्चा चिठ्ठा खोल कर रख दिया। इस पुस्तक के पृष्ठ क्रमांक १९४ पर बोल्ट्स ने लिखा है कि अंग्रेजों ने देश भर के, और विशेषतः बंगाल के, कुशल कारीगरों के अंगूठे काट दिये, ताकि वे हथकरघा चलाने के काबिल ही न रहें। अंग्रेजों की दुष्टता की और क्रूरता की यह पराकाष्ठा थी..!</p>
<p>इसी बीच अंग्रेजों ने वस्त्र बनाने की भारतीय तकनीक के आधार पर, वर्ष १७६५ के लगभग कुछ यंत्र बनाए। इन यंत्रों में कम समय में ज्यादा वस्त्र बनते थे। बाद में भारत में हुकूमत में आने के बाद, जब कुछ भारतीय व्यापारियों ने उन यंत्रों को भारत में लाने का प्रयास किया, तो अंग्रेजों ने उस यंत्र पर ८०% से ज्यादा आयात शुल्क (कर) लगाया। किन्तु उसी समय, इंग्लैंड में बने वस्त्र भारत में आयात करने पर शुल्क था मात्र ५%। १८१८ के बाद भारत के अधिकतम भूभाग पर अंग्रेजी सत्ता कायम हो गई थी। इसलिए इंग्लैंड से आने वाले माल पर कर या आयात शुल्क लगाने का अधिकार भारतीयों के पास नहीं था।</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone wp-image-4380" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2021/11/30_07_2021-oie_3014594tt4hg3l6_21879451-300x249.jpg" alt="" width="1116" height="926" srcset="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2021/11/30_07_2021-oie_3014594tt4hg3l6_21879451-300x249.jpg 300w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2021/11/30_07_2021-oie_3014594tt4hg3l6_21879451.jpg 650w" sizes="auto, (max-width: 1116px) 100vw, 1116px" /></p>
<p>इंग्लैंड में चल रहा औद्योगीकरण, वहां भांप पर चलने वाले कपड़ों के कारखाने, भारतीय वस्त्रों पर इंग्लैंड में लगा भारी भरकम आयात कर, अंग्रेजी वस्त्र भारत में लगभग करमुक्त, भारतीय हथकरघा उद्योग पर अंग्रेजों द्वारा किए गए क्रूरतापूर्ण हमले…। इन सब का परिणाम यह रहा कि अठारहवीं शताब्दी के प्रारंभ में, वैश्विक कपड़ा उद्योग में जिस भारत का हिस्सा २५% से ज्यादा था, वहां का कपड़ा उद्योग, उन्नीसवीं शताब्दी के प्रारंभ होते समय रास्ते पर आ गया था। भारतीय बाजार, सस्ते अंग्रेजी कपड़ों से पट जाने लगा। कपास की पैदावार तो अभी भी बंपर हो रही थी। किन्तु वो सारा कपास, इंग्लैंड जा रहा था।</p>
<p>किसी जमाने में भारत के मलमल का डंका दुनिया में बजता था। ढाका के मलमल के बारे में चीनी यात्री ह्वेन त्सांग (Yuan Chwang) ने ६२९ – ६४५ में, सम्राट हर्षवर्द्धन के राज्य में, लिखा है कि, “यह वस्त्र तो इतना महीन हैं, जैसे प्रातः की धुंध!” पहली शताब्दी के रोमन लेखक पेट्रोनीयस ने सटेरिकॉन (Satyricon) में भारत के मलमल से बने वस्त्रों की खूबियों के बारे में लिखा है।</p>
<p>जिस ‘ढांके की मलमल’ को पहनने के लिए यूरोप के अमीर, उमराव और दक्षिण एशिया के राजे, रजवाड़े लालायित रहते थे, ऐसे ‘ढाका’ के हालात बहुत दयनीय बन गए थे। अनेक कुशल बुनकर भिखारी बन गए थे। जिस ढाका की जनसंख्या १७६० में, जब यह ‘जहाँगीर नगर’ कहलाता था, कुछ लाख थी, उसी ढाका में १८२० के दशक में मात्र ५० हजार लोग बचे थे। (अर्थात बाद में, अन्य कारणों से ढाका फिर गुलजार हुआ।)</p>
<p>इधर इंग्लैंड से भारत को वस्त्रों का निर्यात बढ़ रहा था। वर्ष १८३० में वह ६ करोड़ यार्ड था, तो १८५७ के क्रांतियुद्ध के तुरंत बाद, अर्थात १८५८ के आंकड़े बताते हैं कि भारत ने इंग्लैंड से १०० करोड़ यार्ड से ज्यादा के वस्त्र आयात किए!</p>
<p>बीसवीं सदी के प्रारंभ में भारत के उद्योगपतियों ने भी कपड़ों के आधुनिक कारखाने खड़े किए। किन्तु फिर भी, पहले विश्व युद्ध से पहले, वर्ष १९१३ के आंकड़े बताते हैं कि भारतीय कारखाने, भारत में खपने वाले कपड़े का मात्र २०% ही उत्पादन कर रही थी। कहां विदेशों में, सभी दिशाओं के देशों को सूती, रेशमी कपड़ों का निर्यात कर के, विश्व के कपड़ा बाजार का एक तिहाई या एक चौथाई हिस्सा काबिज करने वाला भारत…निर्यात तो दूर की बात, अपने ही देश की आवश्यकताओं को पूरी करने में सक्षम नहीं रहा..!</p>
<p>वैदिक काल से चल रहे, सारी दुनिया को सूती वस्त्र पहनाने वाले, उच्च गुणवत्ता का रेशम / मलमल बनाने वाले इस भारतीय वस्त्र उद्योग को अंग्रेजों ने नष्ट होने के निकट पहुंचा दिया था…!</p>
<p>संदर्भ –</p>
<ol>
<li>Textile in Ancient India – Lallanji Gopal (Published in ‘Journal of the Economic and Social History of the Orient’ Vol 4। No। 1 – February 1961)</li>
<li>Our Oriental Heritage: India and Her Neighbors – Will Durant</li>
<li>Cotton as a World Power: Study in the Economic Interpretation of History – James A। B। Scherer</li>
<li>History of Cotton Manufacturers – Edward Baines (1835)</li>
<li>The Industrial Arts of India – Sir George Birdwood</li>
<li>भारतीय वस्त्र परंपरा में औद्योगिक हस्तक्षेप – प्रमोद भार्गव (हिन्दी विवेक)</li>
<li>Indian Textile Industry in 17th and 18th Centuries: Structure, Organization and Responses – Kanakalatha Mukund</li>
<li>How British destroyed Indian Textile Industry – Shubham Verma in indiafacts।org</li>
<li>Considerations of Indian Affairs – William Bolts (1772)</li>
<li>The Fabric of India – Rosemary Crill</li>
<li>The Story of Dhaka Muslin – Khademul Islam</li>
<li>Ancient Indias Development in Textiles – Stephan Knapp</li>
<li>An Era of Darkness – Shashi Tharoor</li>
<li>History of British India – James Mill</li>
<li>India and World Civilization – Prof D। P। Singhal</li>
<li>भारत में अंगरेजी राज – सुंदरलाल (१९२९ में प्रकाशित)</li>
</ol>
<p style="text-align: left;">और पढ़ें : <span style="color: #003366;"><strong><a style="color: #003366;" href="http://how-the-british-destroyed-bhartiya-prosperous-clothing-industry-lets-know/" target="_blank" rel="noopener">कैसे अंग्रेजों ने भारतीय वस्त्र उद्योग को तार-तार किया – आओ जाने-1</a></strong></span></p>
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		<title>कैसे अंग्रेजों ने भारतीय वस्त्र उद्योग को तार-तार किया – आओ जाने-1</title>
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		<pubDate>Sat, 27 Nov 2021 09:56:57 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[<p> &#8211; प्रशांत पोळ हजार-दो हजार वर्ष पहले, जब भारत विश्व व्यापार में सिरमौर था, तब उस व्यापार का एक बड़ा हिस्सा था – कपड़ा उद्योग। चाहे सूती वस्त्र हो, या&#8230; </p>
<p>The post <a href="https://rashtriyashiksha.com/how-the-british-destroyed-bhartiya-prosperous-clothing-industry-lets-know/">कैसे अंग्रेजों ने भारतीय वस्त्र उद्योग को तार-तार किया – आओ जाने-1</a> appeared first on <a href="https://rashtriyashiksha.com">राष्ट्रीय शिक्षा : शिक्षा में समाज प्रबोधन</a>.</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: right;"> &#8211; प्रशांत पोळ</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone wp-image-4371" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2021/11/image013MWB1-300x186.jpg" alt="" width="960" height="595" srcset="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2021/11/image013MWB1-300x186.jpg 300w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2021/11/image013MWB1.jpg 624w" sizes="auto, (max-width: 960px) 100vw, 960px" /></p>
<p>हजार-दो हजार वर्ष पहले, जब भारत विश्व व्यापार में सिरमौर था, तब उस व्यापार का एक बड़ा हिस्सा था – कपड़ा उद्योग। चाहे सूती वस्त्र हो, या रेशम-मलमल का, भारतीयों का डंका सारी दुनिया में बजता था। यूरोप को सूती वस्त्र पहनाए भारत ने..! उन्हें तो मात्र ऊनी वस्त्र ही मालूम थे। कपास की खेती वे जानते ही नहीं थे। पूर्व और पश्चिम, दोनों दिशाओं के देशभारतीय वस्त्रों के लिए पागल रहते थे।</p>
<p>वस्त्रोद्योग यह भारत का प्राचीन उद्योग है। ऋग्वेद में इसका उल्लेख आता है। ऋग्वेद के दूसरे मण्डल में वर्णन है कि सबसे पहले ऋषि गृत्स्मद ने कपास का बीज बोया, उससे बने पेड़ से कपास प्राप्त की और फिर उस कपास से सूत बनाया। इस सूत से कपड़ा बनाने के लिए उन्होंने लकड़ी की तकली बनाई। वैदिक भाषा में कच्चे धागे को ‘तन्तु’ कहा गया। यह तन्तु बनाते समय, कपास के बचे हुए हिस्से को ‘ओतु’ कहा गया। कौटिल्य के अर्थशास्त्र में भी कपड़ों और बुनकरों का उल्लेख है।</p>
<p>कुछ हजार वर्ष पहले, भारत में कपड़ा बनाने की प्रक्रिया ने एक बड़े उद्योग का स्वरूप धरण किया। कपड़ों को विभिन्न शैली में तैयार करना और उनको रंग लगाना, यह प्रक्रिया भारत में ५,००० वर्ष पहले से, सामान्य रूप से होती थी। डॉ. स्टेनले वोलपर्ट (Dr. Stanley Wolpert) अमरीका की यूनिवर्सिटी ऑफ केलिफोर्निया में इतिहास विषय के प्राध्यापक हैं। इन्होंने लिखा है कि “भारत सूती वस्त्रों का घर था। सूती वस्त्रों का प्रारंभ भारत से ही हुआ, तथा सूत कातना और उस की बुनाई, यह भारतीयों ने ही विश्व को सिखाया है” । प्रोफेसर डी.पी. सिंघल भी लिखते हैं कि ‘चरखा’ (Spinning Wheel) भारत की विश्व को देन है। मोहन-जो-दरो की खुदाई में, एक कपड़े का टुकड़ा और रस्सी मिली। दोनों का परीक्षण करने पर ध्यान में आता है कि उस हड़प्पा कालीन संस्कृति के समय (अर्थात् लगभग पांच से सात हजार वर्ष पूर्व) भारत में उन्नत किस्म के कपड़े बनते थे।</p>
<p>इंग्लैंड के ‘थ्रोप कॉलेज ऑफ टेक्नोलॉजी’ के अध्यक्ष रहे, प्रोफेसर जेम्स ऑगस्टीन ब्राउन स्केरर (Prof. James Augustin Brown Scherer : 1870 – 1944) ने एक पुस्तक लिखी है, ‘कॉटन एज ए वर्ल्ड पावर’। १९१६ में यह पुस्तक अमेरिका में प्रकाशित हुई। कपास के वैश्विक महत्व को लेकर उन दिनों यह पुस्तक प्रमाण मानी जाती थी। इस पुस्तक के दो भाग हैं। पहले भाग का शीर्षक है – ‘फ्रॉम इंडिया टू इंग्लैंड। इस भाग में प्रोफेसर जेम्स स्केरर ने एक पूरा अध्याय भारत में कपास और कपड़ों के निर्माण पर विस्तार से लिखा है। इस अध्याय का शीर्षक है – ‘हिन्दू स्किल’। इस अध्याय में भारत में कपास से बने कपड़ों का उद्योग कितना प्राचीन और परिपक्व है, इसके बारे में विस्तार से लिखा है। प्रोफेसर स्केरर इस पुस्तक में लिखते हैं कि ‘उस जमाने में हिन्दू कारीगरों द्वारा बनाए गए कपड़े, आज की हमारी उन्नत मशीनों पर बनाए गए कपड़ों से भी अच्छे थे’।Thousands of years before the invention of cotton machinery in Europe, Hindu gins were separating fibber from seed, Hindu wheels were spinning the lint in to yarn and frail Hindu looms weaving these yarns in to textiles. (यूरोप में सूती वस्त्र बनाने वाली मशीनों का आविष्कार होने के हजारों वर्ष पहले, हिन्दू तकलियों से कपास की बीजों से धागा निकाला जाता था। चरखे और कताई के उपकरणों से इन धागों से तागा बनाया जाता था और हिन्दू करघे, उन तागों का वस्त्र बनाते थे। पृष्ठ – १९)</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone wp-image-4373" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2021/11/c-d-kane-7-e1638007322276-300x228.jpg" alt="" width="908" height="690" srcset="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2021/11/c-d-kane-7-e1638007322276-300x228.jpg 300w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2021/11/c-d-kane-7-e1638007322276-768x584.jpg 768w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2021/11/c-d-kane-7-e1638007322276.jpg 788w" sizes="auto, (max-width: 908px) 100vw, 908px" /></p>
<p>प्रो. स्केरर ने अनेक विदेशी प्रवासियों के अनुभवों का भी उल्लेख किया है। वे आगे लिखते हैं, ‘अरब के दो प्रवासियों ने कुछ सौ वर्ष पहले लिखा है कि हिन्दू कारीगरों (जुलाहों) द्वारा बनाए गए वस्त्र इतने उत्तम प्रकार के एवं उच्च गुणवत्ता (extraordinary perfection) के होते हैं, कि ऐसे कहीं भी नहीं मिलते। वे इतने नाजुक होते हैं, कि एक छोटी सी अंगूठी में से भी निकाल सकते हैं’। प्रो. स्केरर ने जीन बैप्टिस्ट टैवर्नियर इस फ्रेंच प्रवासी का उद्धरण भी दिया है।</p>
<p>सत्रहवीं शताब्दी में जीन टैवर्नियर हीरे के व्यापारी ने अनेकों बार पर्शिया (आज का ईरान) और भारत की यात्राएं कीं। १६६० में उसने भारतीय वस्त्रों की गुणवत्ता के बारे में लिखा कि ‘कुछ वस्त्र इतने तलम और मुलायम थे कि हाथों को उनके अस्तित्व का अनुभव ही नहीं होता। कुछ वस्त्र तो इतने पारदर्शक थे कि पहनने पर भी, कपड़े पहने हैं, ऐसा लगता ही नहीं था।</p>
<p>टेवर्नियर ने भारतीय वस्त्रों के बारे में एक अनुभव साझा किया है – ‘एक पर्शियन राजदूत जब अपने देश वापस गया, तब उसने अपने सुलतान को एक नारियल भेंट दिया। दरबारियों को अचरज लगा, कि अपने सुलतान को इस राजदूत ने मात्र एक नारियल दिया? किन्तु उनके आश्चर्य कि कोई सीमा नहीं रही, जब उन्होंने देखा कि उस नारियल में २३० यार्ड (अर्थात २१० मीटर) का मलमल का तलम और अत्यंत मुलायम कपड़ा, बड़े ही संजो कर रखा है..!’</p>
<p>ईस्ट इंडिया कंपनी के एक अधिकारी विल्किंस जब वापस इंग्लैंड गए, तो उन्होंने सर जोसेफ बेक को भारत से लाया मलमल का कपड़ा भेंट दिया। सर जोसेफ बेक ने इस कपड़े के बारे में आश्चर्य व्यक्त करते हुए लिखा है, “मेरे मित्र विल्किंस ने मुझे दिया हुआ भारतीय कपड़ा अत्यंत तलम, मुलायम और आकर्षक है। इस ५ यार्ड ७ इंच (अर्थात १५ फीट ७ इंच) लंबे कपड़े का वजन है मात्र ३४.३ ग्रेन (१५.५ ग्रेन का १ ग्राम होता है। अर्थात उस कपड़े का वजन था मात्र २ ग्राम) !</p>
<p>इस मलमल की गुणवत्ता कि एक और बानगी –</p>
<p>सर जोसेफ बेक ने जिस मलमल के कपड़े के बारे में लिख रखा है, उस का थ्रेड काउंट था २४२५. (थ्रेड काउंट का अर्थ होता है, १ वर्ग इंच / सेंटीमीटर में कितने थ्रेड, यानि धागे होते हैं। ज्यादा थ्रेड अर्थात वो धागे ज्यादा महीन, ज्यादा मुलायम और ज्यादा शान-शौकत वाले होते हैं)। आज के अत्याधुनिक मशीन्स पर बने कपड़ों के थ्रेड काउंट ६०० के ऊपर नहीं होते। अर्थात आज की अत्याधुनिक मशीनरी भी, उन दिनों के भारतीयों के हाथों से बुने वस्त्रों की गुणवत्ता नहीं ले सकती!</p>
<p>उन्नीसवीं सदी के एक अंग्रेज़ विद्वान, सर जॉर्ज बर्डवुड (१८३२ – १९१७) ने भारत पर अनेक पुस्तकें लिखी हैं। इनका अधिकतम समय भारत में बीता। ८ दिसंबर १८३२ में, उस समय के ‘बॉम्बे प्रेसीडेंसी’ के बेलगांव (वर्तमान में कर्नाटक का ‘बेलगावी’ शहर) में इनका जन्म हुआ था। वे डॉक्टर बने, पर्शियन युद्ध में हिस्सा लिया, ग्रांट मेडिकल कॉलेज में प्रोफेसर रहे और बाद में बॉम्बे के शेरिफ़ भी बने। १८६८ में वे इंग्लैंड गए। वहां भारत संबंधी कार्यालय में वरिष्ठ अधिकारी के रूप में काम किया। इनके द्वारा लिखी कुछ प्रसिद्ध पुस्तकों में से एक है, ‘द इंडस्ट्रियल आर्ट्स ऑफ इंडिया’। यह पुस्तक इन्होंने ‘सेक्रेटरी ऑफ स्टेट – इंडिया अफेयर्स’ के अनुरोध पर लिखी। इस पुस्तक में पृष्ठ ७३ पर वे लिखते हैं, ‘बताया जाता है कि जहाँगीर के काल में पंद्रह गज लंबी और एक गज चौड़ी ढाका की मलमल का वजन मात्र १० ग्रेन (१ ग्राम से भी कम) होता था’।</p>
<p>इसी पुस्तक के पृष्ठ ९५ पर इन्होंने लिखा है, “अंग्रेज़ और अन्य युरोपियन लेखकों ने तो यहां के मलमल, सूती और रेशमी वस्त्रों को ‘बुलबुल की आँख’, ‘मयूर कंठ’, ‘चांद सितारे’, ‘पवन के तारे’, ‘बहता पानी’, ‘संध्या की ओस’ जैसी अनेक काव्यमय उपमाएं दे डाली हैं।”</p>
<p>सर एडवर्ड बैंस (Sir Edward Baines : 1800 – 1890) इंग्लैंड के एक समाचारपत्र के संपादक थे और ब्रिटिश पार्लियामेंट के सदस्य भी रहे। वर्ष १८३५ में उन्होंने एक पुस्तक लिखी – ‘हिस्ट्री ऑफ कॉटन मैनुफेक्चरर’। इसमें सर बैंस लिखते हैं – “अपने वस्त्र उद्योग में भारतीयों ने प्रत्येक युग के अतुलनीय, सर्वोत्तम और सर्वश्रेष्ठ मानदंडों को बनाए रखा। उनके कुछ मलमल के वस्त्र तो मानो मानवों के नहीं, अपितु परियों और तितलियों द्वारा तैयार किए हुए लगते हैं।”</p>
<p>यही कारण था कि इस्लामी आक्रांताओं की ज़्यादतियों के बाद भी अंग्रेजों का शासन आने से पहले तक, भारतीय वस्त्र उद्योग का प्रदर्शन अच्छा था। वर्ष १८११-१२ में (अर्थात अंग्रेजों के हाथ में पूरे भारत की सत्ता आने के थोड़े पहले), भारत से होने वाले निर्यात में सूती वस्त्रों का हिस्सा ३३% था। दुर्भाग्य से अंग्रेजों की नीतियों के कारण, वर्ष १८५०-५१ तक, वह मात्र ३% रह गया था।</p>
<p>और पढ़ें : <span style="color: #000080;"><strong><a style="color: #000080;" href="https://rashtriyashiksha.com/how-the-british-destroyed-indias-prosperous-sailing-industry-lets-know-2/" target="_blank" rel="noopener">कैसे अंग्रेजों ने ध्वस्त किया भारत का समृद्ध नौकायन उद्योग : आओ जाने – 2</a></strong></span></p>
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		<title>कैसे अंग्रेजों ने ध्वस्त किया भारत का समृद्ध नौकायन उद्योग : आओ जाने – 2</title>
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		<dc:creator><![CDATA[राष्ट्रीय शिक्षा]]></dc:creator>
		<pubDate>Sat, 30 Oct 2021 09:02:09 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[<p> &#8211; प्रशांत पोळ रॉबर्ट बेरोन वोन हेन गेल्डर्न (१८८५-१९६८), इस लंबे चौड़े नाम वाले एक जाने-माने ऑस्ट्रियन एंथ्रोपोलॉजिस्ट हुए हैं। इनकी शिक्षा-दीक्षा विएना विश्वविद्यालय में हुई। आगे चलकर १९१० में&#8230; </p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: right;"> &#8211; प्रशांत पोळ</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone wp-image-4211" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2021/10/6-3-300x203.jpg" alt="" width="1295" height="876" srcset="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2021/10/6-3-300x203.jpg 300w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2021/10/6-3.jpg 500w" sizes="auto, (max-width: 1295px) 100vw, 1295px" /></p>
<p>रॉबर्ट बेरोन वोन हेन गेल्डर्न (१८८५-१९६८), इस लंबे चौड़े नाम वाले एक जाने-माने ऑस्ट्रियन एंथ्रोपोलॉजिस्ट हुए हैं। इनकी शिक्षा-दीक्षा विएना विश्वविद्यालय में हुई। आगे चलकर १९१० में ये भारत और बर्मा देशों के दौरे पर आए। भारतीयों के उन्नत वैज्ञानिक ज्ञान के प्रति इनके मन में अत्यंत कौतूहल निर्माण हुआ और उन्होंने यहाँ पर अपना शोध आरम्भ किया। इस वैज्ञानिक ने दक्षिण-पूर्वी देशों में अच्छा-ख़ासा शोध कार्य किया। अपने शोध के अंत में रॉबर्ट ने मजबूती से इस बात को रेखांकित किया कि कोलंबस से कई वर्षों पूर्व बड़े-बड़े भारतीय जहाज मैक्सिको और पेरू देशों के दौरे किया करते थे। अब इससे अधिक और कौन सा सबूत चाहिए कि भारतीय नौकाओं/जहाज़ों का प्रवास पूरी दुनिया में सबसे पहले किया जाता रहा है। लेकिन फिर भी हमारे कथित बुद्धिजीवी कहते हैं कि अमेरिका की खोज कोलंबस ने और भारत की खोज (??) वास्को द गामा ने की..!</p>
<p>वास्तविकता ये है कि मूलतः वास्को द गामा स्वयं ही भारतीय जहाज़ों की सहायता से भारत तक पहुँचा। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सह-सरकार्यवाह सुरेश सोनी ने डॉक्टर वाकणकर का सन्दर्भ देते हुए बहुत ही सटीक वर्णन किया है। डॉक्टर हरिभाऊ (विष्णु श्रीधर) वाकणकर, उज्जैन के एक प्रसिद्ध पुरातत्व विद्वान थे। भारत की सबसे प्राचीन नागरिक बस्ती के सबूत के रूप में जिन ‘भीमबेटका’ गुफाओं का उल्लेख किया जाता है, उन गुफाओं की खोज वाकणकर जी ने ही की है। अपने शोध के सन्दर्भ में डॉक्टर वाकणकर इंग्लैण्ड गए हुए थे। वहाँ पर एक संग्रहालय में उन्हें वास्को द गामा की हस्तलिखित डायरी दिखाई दी। उन्होंने वह डायरी देखी और उसका अनुवाद पढ़ा। उसमें वास्को द गामा ने स्वयं वर्णन किया है कि वह भारत में कैसे-कैसे पहुँचा।</p>
<p>उस डायरी के अनुसार जब वास्को द गामा का जहाज अफ्रीका के जंजीबार में पहुंचा, तब उसने वहां अपने जहाज से तीन गुना बड़े जहाज़ों को देखा, जो भारतीय थे। एक अफ्रीकी दुभाषिये की मदद से वास्को द गामा इन भारतीय जहाज़ों के मालिक से भेंट करने गया। ‘चन्दन’ नामक वह भारतीय व्यापारी अत्यंत सादे कपड़ों में खटिया पर बैठा हुआ था। जब वास्को द गामा ने उससे आग्रह किया कि उसे भी भारत आने की इच्छा है। तब उस व्यापारी ने सहजता से उत्तर दिया कि, ‘मैं कल ही वापस भारत जाने वाला हूँ, तुम अपना जहाज मेरे पीछे-पीछे लेकर चले आओ…’। इस तरह वास्को द गामा भारत के समुद्र किनारे पर पहुँचा।</p>
<p>परन्तु दुर्भाग्य से आज भी स्कूलों में यही पढ़ाया जाता है कि वास्को द गामा ने भारत की खोज की…!!</p>
<p>मार्को पोलो (१२५४-१३२४) को एक अत्यंत साहसी समुद्री यात्री माना जाता है। इटली के इस व्यापारी ने भारत होते हुए चीन तक की समुद्री यात्राएं की थीं। यह तेरहवीं शताब्दी में भारत आया था। मार्को पोलो ने अपनी उस यात्रा के अनुभवों पर आधारित एक पुस्तक लिखी है – मार्वल्स ऑफ द वर्ल्ड। इस पुस्तक का अंग्रेजी अनुवाद भी उपलब्ध है। इस पुस्तक में मार्को पोलो ने भारतीय जहाज़ों का बड़ा ही सुन्दर वर्णन किया है। वह लिखता है कि, भारत में विशालतम जहाज़ों का निर्माण किया जाता है। लकड़ियों की दो परतों को जोड़कर उसमें लोहे की कीलों से उसे मजबूत किया जाता है। और बाद में कीलों के उन सभी छोटे-बड़े छेदों को बन्द करने के लिए एक विशेष पद्धति का गोंद उसमें भरा जाता है, जिससे पानी को पूर्णरूप से रोक दिया जाता है।</p>
<p>मार्को पोलो ने भारत में लगभग तीन सौ नाविकों के जहाज़ों का अध्ययन किया। उसने लिखा है कि, ‘एक-एक जहाज में तीन से चार हजार बोरी का सामान रखा जा सकता है और इसमें नाविकों/यात्रियों के रहने के लिए कमरे भी होते हैं। लकड़ी का सबसे निचला हिस्सा खराब होने लगता है, तो तत्काल उस पर लकड़ी की दूसरी परत चढ़ाई जाती है।’ भारतीय जहाज़ों की गति इतनी बढ़िया थी कि ईरान से कोचीन तक की यात्रा केवल आठ दिनों में पूरी हो जाती थी।</p>
<p>आगे चलकर निकोली कांटी नामक एक और समुद्री यात्री पंद्रहवीं शताब्दी में भारत आया। इसने तो भारतीय जहाज़ों की भव्यता और विशालता के बारे में बहुत कुछ लिखा है। डॉक्टर राधा कुमुद मुखर्जी ने अपनी पुस्तक ‘इन्डियन शिपिंग’ में तत्कालीन भारतीय जहाज़ों का सप्रमाण एवं विस्तारपूर्वक वर्णन किया हुआ है।</p>
<p>जे. एल. रेड (J. L. Reid) यह ‘Institute of Naval Architect and Shipbuilders in England’ के सदस्य थे। इन्होंने मुंबई (तत्कालीन Bombay) के गजेटियर में लिखा है कि डेढ़ – दो हजार वर्ष पूर्व, विश्व में भारतीय नाविक, दिशादर्शक यंत्र (मरीन कंपास) का प्रयोग करते थे। इन भारतीय नाविकों ने ही विश्व में सर्वप्रथम इस दिशादर्शक यंत्र का उपयोग प्रारंभ किया। एक छोटे से, चपटे डिब्बे में तेल रहता था। इसमें मछली के आकार का चुंबक होता था। इसे भारतीय नाविक ‘मच्छ यंत्र’ कहते थे। (J. L. Reid – Bombay Gazetteer Vol. XIII Part II, Appedix A).</p>
<p>किसी भी नाविक के लिए अत्यंत आवश्यक यंत्र होता है – सेक्सटैंट (Sextant)। यह सबसे सरल और सुगठित यंत्र है जो किन्हीं दो बिंदुओं द्वारा बना कोण पर्याप्त यथार्थता से नापने में काम आता है। इस यंत्र की खोज वर्ष १७३० में जान हैडले (John Hadley) और टॉमस गोडफ्रे (Thomas Godfrey) नामक वैज्ञानिकों ने अलग-अलग, स्वतंत्र रूप से की थी। किन्तु, भारतीय नाविकों के पास इस प्रकार का यंत्र अत्यंत प्राचीन काल से पाया जाता रहा है। इसे ‘वृत्तशंख भाग’ कहा जाता था। अनेक प्राचीन ग्रन्थों में इसका वर्णन आता है। ईसा पूर्व ३०० – ४०० वर्ष लिखी गई ‘जातक कथाओं’ में भी इस यंत्र का उल्लेख है।</p>
<p>भारत में उत्तर दिशा से इस्लामिक आक्रमण आरम्भ होने के कालखंड में, अर्थात ग्यारहवीं शताब्दी में मालवा के राजा भोज ने ज्ञान-विज्ञान से सम्बन्धित अनेक ग्रन्थ लिखे, अथवा विद्वानों से लिखवाए। इन्हीं ग्रंथों में से एक प्रमुख ग्रन्थ है ‘युक्ति कल्पतरु’। यह ग्रन्थ जहाज निर्माण के सन्दर्भ में है। छोटी यात्राओं एवं लंबी यात्राओं के लिए छोटे और बड़े, अलग-अलग क्षमताओं वाले जहाज़ों का निर्माण कैसे किया जाता है, इसका वर्णन इस ग्रन्थ में है। जहाज निर्माण के विषय पर इस ग्रन्थ को प्रामाणिक माना जाता है। अलग-अलग प्रकार के जहाज़ों के लिए भिन्न-भिन्न प्रकार की लकड़ियों का चयन कैसे किया जाए, इससे शुरुआत करते हुए विशिष्ट क्षमताओं वाले जहाज एवं उनका पूरा ढाँचा कैसे निर्मित किया जाए, इसका पूरा गणित इस ग्रन्थ से प्राप्त होता है। इसमें, जहाज बांधते समय उसमें लोहे की कीलों का उपयोग नहीं करने के बारे में लिखा है। समुद्र के लोहाचुंबकीय पत्थर, इन कीलों के कारण जहाज को अपनी ओर खिचते हैं, ऐसा उसका कारण भी दिया है।</p>
<p>‘युक्तिकल्पतरु’ के अनुसार, जहाज तीन प्रकार के होते थे –</p>
<ol>
<li>सर्वमंदिर जहाज – भव्य एवं बड़े कक्ष (केबिन), एक छोर से दूसरे छोर तक। प्रमुखता से राजघराने का खजाना ले कर जाने के लिए।</li>
<li>मध्य मंदिर जहाज – इनमें वर्षा ऋतु की आवश्यकता के अनुसार कक्ष (केबिन) होते थे।</li>
<li>अग्रमंदिर जहाज – कक्ष (केबिन) सामने होता था। मुख्यतः यह साफ मौसम में उपयोग में लाया जाता था।</li>
</ol>
<p>इस ग्रन्थ के लिखे जाने से भी हजार-डेढ़ हजार वर्ष पहले ही भारतीय जहाज समूचे विश्व में भ्रमण कर रहे थे। अर्थात यह ‘युक्ति कल्पतरु’ ग्रन्थ कुछ नया शोध नहीं करता, परन्तु जो ज्ञान पहले से भारतीयों के पास था, उसे लिपिबद्ध करता है। क्योंकि भारतीयों को नौकाशास्त्र का ज्ञान पुरातन काल से ही था।</p>
<p>परन्तु ग्यारहवीं शताब्दी में जो नौकायन शास्त्र चरम पर था, वह धीरे-धीरे मद्धम पड़ता चला गया। मुगलों ने उन्हें मुफ्त में मिले जहाज़ों को ठीक से तो रखा, परन्तु उनमें कोई वृद्धि नहीं की। दो सौ वर्षों का विजयनगर साम्राज्य अपवाद रहा। उन्होंने जहाज निर्माण के कारखाने भारत के पूर्वी एवं पश्चिमी, दोनों समुद्र किनारों पर आरम्भ किये और अस्सी से अधिक बंदरगाहों को ऊर्जित अवस्था में बनाए रखा। आगे चलकर छत्रपति शिवाजी महाराज ने अपनी नौसेना स्थापित की और सरदार आंग्रे ने उसे मजबूत किया।</p>
<p>अंग्रेजों के भारत आगमन से पहले तक भारत में जहाज निर्माण की प्राचीन विद्या जीवित थी। सत्रहवीं शताब्दी तक यूरोपियन देशों की अधिकतम क्षमता ६०० टन जहाज के निर्माण की थी। जबकि उसी कालखंड में भारत में ‘गोधा’ (संभवतः इसका नाम ‘गोदा’ होगा, जो स्पेनिश अपभ्रंश के कारण गोधा कहलाया होगा) नामक जहाज का निर्माण किया गया, जो १५०० टन से भी अधिक बड़ा था। उन दिनों भारत में मछलीपट्टन, सूरत, कालीकट, हुगली, क्विलॉन आदि स्थानों पर जहाज बनाने के कारखाने थे। ये जहाज, विश्व के विभिन्न हिस्सों में संचार करते थे। अरब महासागर और बंगाल की खाड़ी में तो इनका चलना नियमित था।</p>
<p>भारत में अपनी दुकानें खोलकर बैठी कंपनियों – अर्थात डच, पुर्तगाली, अंग्रेजी, फ्रेंच इत्यादि ने भारतीय जहाज़ों का उपयोग करना शुरू कर दिया और भारतीयों को ही खलासी के रूप में नौकरी पर रखा। सन १८११ विलियम बोल्ट्स द्वारा लिखी पुस्तक, Considerations on India Affairs  में पृष्ठ ३१६ पर, ब्रिटिश अधिकारी लेफ्टिनेंट कर्नल ए। वॉकर को उद्धृत करते हुए लिखा गया है, ‘ब्रिटिश जहाज़ों को प्रत्येक दस-बारह वर्षों में बड़ी मरम्मत करनी पड़ती है, जबकि सागौन की लकड़ी से बने भारतीय जहाज पिछले पचास वर्षों से बिना किसी रिपेयरिंग के उत्तम कार्य कर रहे हैं…’।</p>
<p>भारतीय जहाज़ों की गुणवत्ता को देखते हुए ‘ईस्ट इण्डिया कम्पनी’ ने ‘दरिया दौलत’ नामक एक भारतीय जहाज खरीदा था, जो ८७ वर्ष तक लगातार बिना किसी मरम्मत के उत्तम काम करता रहा।</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone wp-image-4212" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2021/10/9-3-300x224.jpg" alt="" width="1296" height="968" srcset="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2021/10/9-3-300x224.jpg 300w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2021/10/9-3-768x575.jpg 768w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2021/10/9-3.jpg 1024w" sizes="auto, (max-width: 1296px) 100vw, 1296px" /></p>
<p>मराठों को हराकर भारत की सत्ता हासिल करने से कुछ वर्ष पहले अर्थात १८११ में एक फ्रांसीसी यात्री बाल्त्जर साल्विंस (F. Baltazar Solvyns) ने ‘ले हिन्दू’ (Les Hindous) नामक एक पुस्तक लिखी थी। उस पुस्तक में वह लिखते हैं, ‘।।प्राचीन काल में नौकायन क्षेत्र में हिन्दू सबसे अग्रणी थे, और आज भी (१८११ में भी) इस क्षेत्र में वे यूरोपियन देशों को बहुत कुछ सिखा सकते हैं…’ उनके शब्द हैं – ‘In ancient times the Indians excelled in the art of constructing vessels, and the present Hindus can in this respect still offer models to Europe – so much so that the English, attentive to everything, which relates to naval architecture, have borrowed from the Hindus many improvements which they have adopted with success to their own shipping… The Indian vessels unite elegance and utility, and are models of patience and fine workmanship.’</p>
<p>अंग्रेज़ उद्योगपतियों ने, भारतीय जहाजों के बढ़ते प्रभाव के कारण ब्रिटिश संसद में एक अर्जी पेश की। यह अर्जी, भारतीय जहाज बनाने के उद्योग पर पाबंदी डालने के संदर्भ में थी। मजेदार बात यह, कि तब तक अंग्रेजों का भारत में एकाधिकार नहीं हुआ था। बंगाल और भारत के कुछ हिस्सों पर ही उनका शासन चलता था। किन्तु उनकी महत्वाकांक्षा जबरदस्त थी। इसलिए अंग्रेज़ उद्योगपतियों की मांग के अनुसार, ब्रिटिश संसद ने वर्ष १८१३ में एक कानून बनाया, जिसमें जहाज निर्माण से संबंधित बिन्दु शामिल थे। यह कानून ‘चार्टर एक्ट 1813’ के नाम से जाना जाता है। इसके तहत ३५० टन से कम वजन वाले जहाजों को भारतीय उपनिवेश क्षेत्र और इंग्लैंड के बीच आवागमन करने के लिए मनाई की गई थी। इसके कारण बंगाल के कारखानों में बने ४०% से ज्यादा जहाज, इस लाभदायक मार्ग से हटाने पड़े।</p>
<p>अगले ही वर्ष, अर्थात १८१४ में ब्रिटिश संसद ने एक और कानून पारित किया, जिसके तहत भारत में बने जहाजों को ‘ब्रिटेन में पंजीकृत जहाज’ कहलाने का हक छिना गया। अर्थात भारत में बने जहाज, इंग्लैंड में पंजीकृत नहीं हो सकते थे।</p>
<p>प्रारंभ से ही अंग्रेजों ने भारतीय जहाजों की संख्या कम करने के सारे प्रयास किए थे। १७५७ में प्लासी का युद्ध जीतने के तुरंत बाद, अंग्रेजों ने बंगाल के सारे समुद्री मार्गों पर ‘ईस्ट इंडिया कंपनी’ के सभी जहाजों को मुक्त व्यापार का अधिकार दिया। साथ ही, सभी भारतीय जहाजों पर कर लगाए। केवल विदेशों से आने वाले जहाज ही नहीं, अपितु भारत के एक बंदरगाह से दूसरे बंदरगाह पर व्यापारी माल लेकर जाने वाले जहाजों को भी यह कर देना होता था। इससे भारतीय व्यापारियों की वस्तुएं महंगी होने लगी।</p>
<p>इन अवरोधों के बाद भी भारत में जहाज का निर्माण जारी रहा। भारत का व्यापार, इंग्लैंड के साथ ज्यादा नहीं था। किन्तु अन्य देशों के साथ था। साथ ही, अन्य देश भारत से जहाज खरीदते थे। वर्ष १८४२ में हाँगकाँग, ब्रिटेन को जिस समझौते के अनुसार मिला, वह समझौता भारत में बने जहाज, ‘एच एम एस (हिज मेजेस्टीज सर्विस) कॉर्नवालिस’ विशाल जहाज पर लिखा गया था। भारत में बने अनेक जहाज अंग्रेजों के लिए गर्व का विषय रहते थे। इनमें प्रमुख था, ‘एच एम एस त्रिंकोमाली’। १९ अक्तूबर, १८१७ के दिन जलावतरण हुए, १०६५ टन के इस जहाज पर ४६ तोपें थीं।</p>
<p>हुगली (कोलकाता) में निर्मित जहाजों का टिप्पण (नोटिंग) उपलब्ध है। इस Register of Ships built on the Hugli from 1781 – 1839 (including Calcutta, Howrah, Sulkea, Cosipore, Tittaghar, Kidderpore) में उल्लेख है कि (१७८१ से १८३९) कालखंड में ३७६ जहाजों का निर्माण हुआ। इसमें १७८१ से १८००, तक उन्नीस वर्षों में ३५ जहाज हुगली (कोलकाता) में निर्मित हुए, जिनका कुल टनेज १७,०२० था। अर्थात अगर औसत निकाली जाए तो प्रत्येक जहाज ४८६ टन का था। १८०१, इस एक वर्ष में हुगली में ही १९ जहाजों की निर्मिति हुई, जो औसत ५३० टन के थे।</p>
<p>अंग्रेजों के भारत में आने के समय, अर्थात सत्रहवीं शताब्दी के प्रारंभ में, बंगाल में ४०० टन से ५०० टन के, ४००० से ५००० जहाज थे। ये सभी बंगाल में ही बनाए गए थे। ये जहाज, बाकी देशों को भी बेचे जाते थे। पूरे विश्व में इनका संचार होता था। ‘जहाजों का निर्माण करने वाला देश’ ऐसी भारत की पहचान थी। और यह उन्नीसवीं शताब्दी के मध्य तक चलता रहा।</p>
<p>अंग्रेजों द्वारा दिए आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार १७३३ से १८६३ के बीच अकेले मुम्बई के एक कारखाने में लगभग ३०० से अधिक जहाज़ों का निर्माण हुआ, जिनमें से अधिकतम जहाज ब्रिटेन की महारानी की शाही नौसेना में शामिल किए गए। इनमें से ‘एशिया’ नामक जहाज  २२८९ टन का था और यह जहाज ८४ तोपों से सज्जित था। बंगाल में चटगाँव, हुगली (कोलकाता), सिलहट और ढाका में भी जहाज बनाने के कारखाने थे। अर्थात विचार करें कि जब भारतीय जहाज निर्माण के पतनकाल में भी यह परिस्थिति थी, तो ग्यारहवीं शताब्दी से पहले भारत का जहाज निर्माण उद्योग कितना समृद्ध होगा, इसका सामान्य अंदाज तो लग ही जाता है।</p>
<p>अलबत्ता ऐसे उत्तम गुणवत्ता वाले जहाज़ों को देखकर इंग्लैण्ड में, अंग्रेज, ईस्ट इण्डिया कंपनी पर दबाव बनाने लगे कि भारतीय जहाज न खरीदे जाएं, वर्ना वहां के जहाज उद्योग बर्बाद हो जाएंगे। सन १८८१ में कर्नल वॉकर ने बाकायदा आँकड़े देकर सिद्ध किया कि, ‘भारतीय जहाज़ों को अधिक देखरेख की आवश्यकता नहीं पड़ती और उनका मेंटेनेंस भी कम खर्च में हो जाता है।’ (यह सभी पत्र ब्रिटिश संग्रहालय के ईस्ट इण्डिया कम्पनी के अभिलेखागार में उपलब्ध हैं)।</p>
<p>परन्तु इंग्लैण्ड के जहाज निर्माता व्यापारियों को इस बात का बहुत बुरा लगा। इंग्लैंड के डॉक्टर टेलर लिखते हैं कि, भारतीय माल से लदा हुआ भारतीय जहाज जब इंग्लैण्ड के समुद्र किनारे पर पहुंचा तब अंग्रेज व्यापारियों में ऐसी अफरातफरी मची, मानो शत्रु ने आक्रमण कर दिया हो। लन्दन के बंदरगाह पर स्थित जहाज निर्माण करने वाले कारीगरों ने ईस्ट इण्डिया कंपनी के डायरेक्टर बोर्ड को पत्र लिखा कि, ‘…यदि आप भारतीय जहाज़ों का ही उपयोग करने लगेंगे, तो हम पर भुखमरी और बेरोजगारी का खतरा मंडराने लगेगा… हमारी दशा बहुत विकट हो जाएगी…’ ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने उन कारीगरों तथा इंग्लैण्ड के व्यापारियों की बात पर अधिक ध्यान नहीं दिया, क्योंकि भारतीय जहाज़ों का उपयोग करने में उनका व्यापारिक फायदा था।</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone wp-image-4215" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2021/10/main-qimg-107d544683735c0083c4d372f4e73022-300x169.jpg" alt="" width="1047" height="590" srcset="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2021/10/main-qimg-107d544683735c0083c4d372f4e73022-300x169.jpg 300w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2021/10/main-qimg-107d544683735c0083c4d372f4e73022.jpg 686w" sizes="auto, (max-width: 1047px) 100vw, 1047px" /></p>
<p>स्थिति और कठिन हुई, वर्ष १८५७ के स्वातंत्र्य युद्ध के बाद, जब भारत का पूरा शासन सीधे इंग्लैण्ड की रानी के हाथ में आ गया। तब रानी ने एक विशेष अध्यादेश निकालकर भारतीय जहाज़ों के निर्माण पर प्रतिबन्ध लगा दिया। वर्ष १८६३ से यह प्रतिबन्ध लागू हुआ और एक अत्यंत वैभवशाली, समृद्ध एवं तकनीकी रूप से अत्यधिक उन्नत भारतीय नौकायन शास्त्र की मृत्यु हो गई।</p>
<p>इस सन्दर्भ में सर विलियम डिग्बी ने लिखा है कि, ‘पश्चिमी देशों की एक सामर्थ्यवान महारानी ने, सागर की महारानी का खून कर दिया…!’ (The Mistress of the Western World has killed the Mistress of the Seas of the East) और इस प्रकार दुनिया को ‘नेविगेशन’ जैसा शब्द देने से लेकर आधुनिक नौकायन शास्त्र सिखाने वाले भारतीय नाविक शास्त्र का एवं उन्नत-समृद्ध जहाज निर्माण उद्योग का असमय अंत हो गया…!</p>
<p>संदर्भ –</p>
<ol>
<li>Trade and Subsistence at the Roman Port of Berenike, Red Sea Coast, Egypt – Rene Cappers</li>
<li>An Era of Darkness (Inglorious Empire) – Shashi Tharoor</li>
<li>Indian Shipping – Radha Kumud Mookerji (वर्ष १९१२ में प्रकाशित पुस्तक)</li>
<li>India Conquered: Britain’s Raj and the Chaos of Empire – John Wilson</li>
<li>India’s Ancient and Great Maritime History – Stephen Knapp (Blog published on 3rd November, 2015)</li>
<li>भारतीय नौकानयनाचा इतिहास – डॉ. द. ग. केतकर</li>
<li>Foreign Trade and Commerce in Ancient India – Prakash Charan Prasad</li>
<li>The Art of Southeast Asia – Phillip Rawson (1933)</li>
<li>Advancements of Ancient India’s Vedic Culture – Stephen Knapp</li>
<li>The Ocean of Churn: How the Indian Ocean Shaped Human History – Sanjeev Sanyal</li>
<li>Considerations on India Affairs – Willam Bolts</li>
<li>British Rule in India – Pandit Sunderlal</li>
<li>The British in India – David Gilmour</li>
<li>The British Raj: The History and Legacy of Great Britain’s Imperialism in India and the Indian Subcontinent – Charles River Editors</li>
<li>Raj: The Making and Unmaking of British India – Lawrence James</li>
</ol>
<p>और पढ़ें : <strong><span style="color: #000080;"><a style="color: #000080;" href="https://rashtriyashiksha.com/how-the-british-destroyed-indias-prosperous-sailing-industry-lets-know-1/" target="_blank" rel="noopener">कैसे अंग्रेजों ने ध्वस्त की भारत का समृद्ध नौकायन उद्योग : आओ जाने – 1</a></span></strong></p>
<p>&nbsp;</p>
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		<title>कैसे अंग्रेजों ने ध्वस्त किया भारत का समृद्ध नौकायन उद्योग : आओ जाने – 1</title>
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		<dc:creator><![CDATA[राष्ट्रीय शिक्षा]]></dc:creator>
		<pubDate>Thu, 28 Oct 2021 10:39:37 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[नवीनतम]]></category>
		<category><![CDATA[लेख]]></category>
		<category><![CDATA[विनाश पर्व]]></category>
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		<category><![CDATA[Children Education]]></category>
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		<category><![CDATA[indian education]]></category>
		<category><![CDATA[Rashtriya shiksha]]></category>
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					<description><![CDATA[<p> &#8211; प्रशांत पोळ प्रख्यात अर्थशास्त्री प्रो. अंगस मेडिसन ने अपने ग्रंथ ‘द हिस्ट्री ऑफ वर्ल्ड इकॉनोमिक्स’ में विश्व के व्यापार की परिस्थिति भिन्न-भिन्न कालखण्डों में क्या थी, इसका प्रत्यक्ष प्रमाणों&#8230; </p>
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]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: right;"> &#8211; प्रशांत पोळ</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone wp-image-4204" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2021/10/England-300x179.jpg" alt="" width="928" height="554" srcset="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2021/10/England-300x179.jpg 300w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2021/10/England.jpg 640w" sizes="auto, (max-width: 928px) 100vw, 928px" /></p>
<p>प्रख्यात अर्थशास्त्री प्रो. अंगस मेडिसन ने अपने ग्रंथ ‘द हिस्ट्री ऑफ वर्ल्ड इकॉनोमिक्स’ में विश्व के व्यापार की परिस्थिति भिन्न-भिन्न कालखण्डों में क्या थी, इसका प्रत्यक्ष प्रमाणों के साथ वर्णन किया है। इनके अनुसार, आज से २,००० हजार वर्ष पहले, अर्थात पहली शताब्दी में विश्व व्यापार में भारत का हिस्सा ३२% था, जो वर्ष १००० में, अर्थात ग्यारहवीं शताब्दी के प्रारंभ में २८% था। उन दिनों, भारत विश्व का सबसे बड़ा निर्यातक देश था। जाहिर है, भारतीय व्यापारी कपड़े, मसाले, रेशम आदि माल को जहाजों में लाद कर विश्व के कोने-कोने में जाते थे।</p>
<p>भारत में, समुद्री जहाज से किए हुए प्रवास को ‘नौकानयन’, ‘नौकायन’ या प्राचीन काल से ‘नवगति’ कहा जाता है। ‘नवगति’ संस्कृत शब्द है। इसी शब्द के आधार पर अंग्रेजी समानार्थी शब्द ‘नेविगेशन’ तैयार हुआ, ऐसा माना जाता है। भारत में प्राचीन समय में नौकायन शास्त्र अत्यंत उन्नत स्वरूप में था।</p>
<p>इसके अनेक प्रमाण भी मिलते हैं।</p>
<p>विश्व के सबसे प्राचीन ग्रंथ ऋग्वेद में, भारतीयों द्वारा समुद्री यात्रा किए जाने के अनेक उल्लेख मिलते हैं। इसमें वरुण को समुद्र का देवता कहा गया है। ऋग्वेद के सूक्त कहते है कि जहाजों (पोतों) द्वारा प्रयोग किए जाने वाले महासागरीय मार्गों का वरुण को अच्छा ज्ञान था। ऋग्वेद में इस बात का भी उल्लेख है कि व्यापार और धन की खोज में व्यापारी, महासागर के रास्ते, दूसरे देशों में जाया करते थे।</p>
<p><strong><span style="color: #800000;">यह भी पढ़ें :</span></strong> <strong><span style="color: #000080;"><em><a style="color: #000080;" href="https://rashtriyashiksha.com/how-britishers-demolished-developed-education-system-of-bharat-lets-know-1/" target="_blank" rel="noopener">कैसे अंग्रेजों ने ध्वस्त की भारत की विकसित शिक्षा प्रणाली : आओ जाने – 1</a></em></span></strong></p>
<p><strong>वेद॑. यः. वी॒नाम्. प॒दम्. अ॒न्तरि॑क्षेण. पत॑ताम्. वेद॑. ना॒वः. स॒मु॒द्रियः॑॥ </strong><strong>1</strong><strong>.</strong><strong>25</strong><strong>.</strong><strong>7</strong></p>
<p>अर्थ – (यः) जो (समुद्रियः) समुद्र अर्थात् अन्तरिक्ष वा जलमय प्रसिद्ध समुद्र में अपने पुरुषार्थ से युक्त विद्वान् मनुष्य (अन्तरिक्षेण) आकाश मार्ग से (पतताम्) जाने आने वाले (वीनाम्) विमान सब लोक वा पक्षियों के और समुद्र में जाने वाली (नावः) नौकाओं के (पदम्) रचन चालन ज्ञान और मार्ग को (वेद) जानता है, वह शिल्पविद्या की सिद्धि के करने को समर्थ हो सकता है अन्य नहीं।</p>
<p>रामगोविंद त्रिवेदी ने ‘सायण भाष्य’ के आधार पर इसका अर्थ लगाया है – जो वरुण अन्तरिक्ष-चारी चिड़ियों का मार्ग और समुद्र की नौकाओं का मार्ग जानते हैं।</p>
<p>Ralph Thomas Hotchkin Griffith ने इसका अंग्रेजी में अनुवाद किया है – He knows the path of birds that fly through heaven, and, Sovran of the sea, He knows the ships that are thereon.</p>
<p>विश्व का सबसे प्राचीन ‘टाइडल डॉक’ (Tidel Dock – ज्वार की गोदी), लगभग ५,००० वर्ष पहले गुजरात के ‘मांगरोल’ में बांधा गया था। तब मांगरोल समृद्ध बंदरगाह था। आज वह जूनागढ़ जिले की छोटी से गोदी (बंदर) है।</p>
<p>भारत की विश्व व्यापार में हिस्सेदारी जब चरम पर थी, अर्थात पहली शताब्दी में, वर्ष २३ से ७९ के बीच, ‘गेअस प्लिनस सिकंदस’ जिसे ‘प्लिनी द एल्डर’ कहा जाता है, ने भारत के बारे में बहुत कुछ लिख रखा है। अपनी मृत्यु के दो वर्ष पहले, अर्थात वर्ष ७७ में (पहली शताब्दी में), उसने भारत के रोमन साम्राज्य से होने वाले व्यापार के बारे में विस्तृत लिख रखा है।</p>
<p>‘प्लिनी द एल्डर’ ने भारत, रोमन साम्राज्य को जो वस्तुएं निर्यात करता था, उसकी सूची भी दी है। यह मुख्यतः रोमन लेखक, इतिहासकार, चिंतक, विचारक, सेनानी और निसर्ग प्रेमी व्यक्ति था। इसकी Naturalis Historia (नेचरल हिस्ट्री) पुस्तक प्रसिद्ध है, जो मूलतः एक विश्वकोश है। इसकी एक और पुस्तक चर्चा में रहती है, जो जर्मनी के प्रवास पर आधारित है – De Origine et situ Germanorum (On the Origin and Situation of Germans). ‘प्लिनी द एल्ड़र’ ने रोमन साम्राज्य की नौसेना में काम किया है। इसी के आधार पर उसने भारतीय जहाजों की भव्यता के बारे में लिखा है।</p>
<p>पहली शताब्दी में ही एक ग्रीक नाविक कप्तान ने अपनी डायरी लिखी है, जो ‘पेरिप्लस ऑफ ईरिथ्रायीयन सी’ (Periplus of the Erythraean Sea) नाम से प्रसिद्ध है। वर्ष ४० से ५० के बीच में यह डायरी लिखी गई है। इसमें कराची के पास, सिंधु नदी के मुहाने से लेकर तो सुदूर पूर्व में, कोलकाता के पास, गंगा के मुहाने तक, सभी प्रमुख बंदरगांहों की सूची दी गई है। भडोच (भरुच) का, उन दिनों यूरोप के प्रमुख शहरों से व्यापार होता था, उसका भी वर्णन है। इस में उज्जैन, पैठन आदि समृद्ध शहरों के भी उल्लेख मिलते हैं।</p>
<p>चंद्रगुप्त मौर्य के कालखंड में भारत के जहाज विश्वप्रसिद्ध थे। इन जहाज़ों द्वारा विश्व भर में भारत का व्यापार चलता था। इस बारे में कई ताम्रपत्र और शिलालेख प्राप्त हुए हैं। बौद्ध प्रभाव वाले कालखंड में, छठी शताब्दी में, बंगाल में सिंहला (या सिंहबाहु ?) नामक राजा के शासनकाल में सात सौ यात्रियों को लेकर चले एक जहाज का, राजवालिया (Rajavalliya) में, श्रीलंका के प्रवास पर जाने का उल्लेख मिलता है। इस जहाज में राजा ने अपने पुत्र, राजकुमार विजय को श्रीलंका में भेजा था। जब विवाह करके ये जहाज वापस आया, तो उसमें, राजकुमार विजय की पत्नी, जो पाण्ड्य राजवंश की कन्या थी, के साथ ८०० यात्री थे। कुषाण काल एवं हर्षवर्धन काल में भी समुद्री व्यापार की समृद्ध परंपरा का उल्लेख मिलता है।</p>
<p>भारतीय नौकायन के तथा भारतीय जहाजों के विश्वव्यापी और मजबूत पदचिन्ह यदि देखने हों तो बेरेनिके (Berenike) परियोजना का अभ्यास करना आवश्यक हो जाता है। बेरेनिके, इजिप्त का सर्वाधिक प्राचीन बंदरगाह है। स्वेज नहर के दक्षिण में ८०० किमी दूर स्थित यह बंदरगाह समुद्र के पश्चिमी तट पर है।</p>
<p>बेरेनिके परियोजना, पुरातत्त्व उत्खनन के कई प्रकल्पों में से एक, बहुत बड़ा प्रकल्प है। इस पर १९९४ में कार्य प्रारम्भ हुआ और आज भी खुदाई जारी है। नीदरलैंड फॉर साइंटिफिक रिसर्च, नेशनल जियोग्राफी, नीदरलैंड विदेश मंत्रालय, यूनिवर्सिटी ऑफ डेलावर एवं अमेरिकन फिलोसोफिकल सोसायटी इन सभी ने संयुक्त रूप से इस परियोजना में अपना पैसा लगाया है।</p>
<p>ईसा पूर्व २७५ में टोलेमी-द्वितीय (Ptolemy-II) नामक इजिप्त के राजा ने लाल समुद्र के किनारे इस बंदरगाह का निर्माण किया था और उसे अपनी माता का नाम दिया – बेरेनिके। स्वाभाविक रूप से बेरेनिके एक उत्तम बंदरगाह तो था ही, परन्तु जलवायु की दृष्टि से भी व्यापारिक माल के लिए अनुकूल था। इस बंदरगाह से ऊंटों के माध्यम से माल की आवाजाही इजिप्त और अन्य पड़ोसी देशों में सहजता से होती है।</p>
<p>भारत की दृष्टि से इस परियोजना का महत्त्व यह है कि यहाँ पर खुदाई में अत्यधिक प्राचीन भारतीय वैश्विक व्यापार के ठोस सबूत प्राप्त हुए हैं। इस पुरातत्त्व उत्खनन में लगभग आठ किलो कालीमिर्च प्राप्त हुई है, जो निर्विवाद रूप से दक्षिण भारत में ही उगाई जाती थी। इसके अलावा भारत से निर्यात किए हुए कुछ कपड़े, चटाईयाँ और थैलियाँ भी मिली हैं। कार्बन डेटिंग में यह सारा सामान ईस्वी सन ३० से ईस्वी सन ७० तक के बीच का निकला है। इस उत्खनन में शोधकों को एक रोमन पेटी भी मिली, जिसमें भारत के ‘बटिक प्रिंट’ वाले कपड़े एवं भारतीय शैली में चित्रित कुछ कपड़े भी मिले।</p>
<p>इन सभी उत्खननों से सभी शोध वैज्ञानिकों ने यह निष्कर्ष निकाला है कि ईसापूर्व से दो-तीन हजार वर्ष पहले हिन्दू अपनी समृद्ध एवं सम्पन्न संस्कृति लेकर विश्व भर में प्रवास करते थे, व्यापार करते थे एवं अपने ज्ञान-विज्ञान की विरासत संसार को देते रहते थे। विश्व के अनेक स्थानों पर सबसे पहले पहुँचने वाले यदि कोई थे, तो वे हिन्दू नाविक एवं हिन्दू व्यापारी थे।</p>
<p>दुर्भाग्य से हमने अपने इतिहास को सही तरीके से संजोकर, संभालकर नहीं रखा, इसीलिए कोलंबस, वास्को-दि-गामा, मार्को पोलो, ह्वेन सांग जैसे नाम विश्वप्रसिद्ध हुए लेकिन भारत के अनेक पराक्रमी नाविकों / व्यापारियों एवं राजाओं के नाम इतिहास की कालकोठरी में गुम हो गए।</p>
<p>डॉक्टर विष्णु श्रीधर वाकणकर, एक नामचीन पुरातत्ववेत्ता हैं। मध्यप्रदेश में आदिम युग के चिन्हों से युक्त ‘भीमबेटका’ गुफाओं की खोज की। डॉक्टर शरद हेबालकर की पुस्तक में प्रस्तावना लिखते समय वाकणकर जी ने उनके वर्ष १९८४ के अमेरिका और मैक्सिको प्रवास का अनुभव लिखा है। इस प्रस्तावना में उन्होंने अमेरिका स्थित सैन दिएगो के पुरातत्व संग्रहालय के अध्यक्ष बेरीफेल का उल्लेख किया है। बेरीफेल महोदय ने मैक्सिको के उत्तर-पश्चिम में स्थित युकाटन राज्य के तावसुको नामक स्थान पर, माया संस्कृति के मंदिरों से प्राप्त ‘वासुलून” नाम के भारतीय महानाविक की भाषा एवं लिपि में लिखे गए सन्देश का उल्लेख किया है। और इसी तथ्य के माध्यम से बेरीफेल ने निर्विवाद रूप से सिद्ध किया है कि आठवीं और नौंवी शताब्दी में वहाँ भारतीय आते-जाते रहे हैं।</p>
<p>मौर्य, पल्लव, चोल आदि राजवंशों के काल में भारतीय नौकायन शास्त्र अपने चरम पर था। उन्नत किस्म के विशाल जहाज भारत में बनते थे।</p>
<p>१९५५ और १९६१ में गुजरात के ‘लोथल’ में पुरातत्व विभाग द्वारा उत्खनन किया गया था। लोथल भले ही एकदम समुद्र के किनारे पर स्थित नहीं है, परन्तु समुद्र की एक छोटी पट्टी लोथल तक आई हुई है। साबरमती नदी के मुहाने पर है। पुरातत्व विभाग के उत्खनन में यह सामने आया कि लगभग साढ़े तीन हजार वर्ष पहले लोथल एक वैभवशाली बंदरगाह था। इस स्थान पर अत्यंत उन्नत एवं साफ़-सुथरी उत्तम नगर संरचना स्थित थी। परन्तु उत्खनन से प्राप्त अवशेषों में इससे भी अधिक महत्त्वपूर्ण बात यह निकलकर आई कि लोथल में जहाज़ों के निर्माण का कारखाना था। लोथल से अरब देशों एवं इजिप्त देश में बड़े पैमाने पर व्यापारिक गतिविधियों के भी प्रमाण मिले।</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone wp-image-4206" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2021/10/Hotpot-300x292.png" alt="" width="1226" height="1193" srcset="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2021/10/Hotpot-300x292.png 300w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2021/10/Hotpot.png 692w" sizes="auto, (max-width: 1226px) 100vw, 1226px" /></p>
<p>लगभग सन १९५५ तक लोथल अथवा पश्चिमी भारत के नौकायन शास्त्र सम्बन्धित अधिक तथ्य हमारे पास नहीं थे। परन्तु लोथल में किए उत्खनन के कारण इस ज्ञान के दरवाजे दुनिया के सामने खुल गए। इस खुदाई से पता चला कि समुद्र किनारे पर स्थित नहीं होने के बावजूद लोथल में नौकायन विज्ञान इतना समृद्ध था, और वहाँ नौकायन से सम्बन्धित इतनी गतिविधियाँ लगातार चलती रहती थीं, तो गुजरात, महाराष्ट्र, कर्नाटक और केरल जैसे दूसरे पश्चिमी राज्यों के समुद्र किनारों पर, इस बंदरगाह से भी अधिक कितनी ही सरस एवं समृद्ध संरचनाएं रही होंगी।</p>
<p>आज हम जिसे मुंबई में ‘नालासोपारा’ कहते हैं, वहाँ पर लगभग हजार/डेढ़ हजार वर्ष पहले ‘शुर्पारक’ नामक वैभवशाली बंदरगाह था। इस स्थान पर भारत के जहाज़ों के अलावा अनेक देशों के जहाज व्यापार करने आते थे। इसी प्रकार दाभोल&#8230; इसी प्रकार सूरत&#8230;</p>
<p>आगे चलकर विजयनगर साम्राज्य स्थापित होने के बाद उस राज्य ने दक्षिण भारत में अनेक विशाल और सुन्दर बंदरगाहों का निर्माण किया तथा पूर्व एवं पश्चिम दोनों ही दिशाओं में व्यापार आरम्भ किया।</p>
<p>जावा, सुमात्रा, मलय, सिंहपुर, सयाम, यवद्वीप इत्यादि सभी तत्कालीन देश, जो वर्तमान में इंडोनेशिया, मलेशिया, सिंगापुर, थाईलैंड, कम्बोडिया, विएतनाम वगैरह नामों से जाने जाते हैं, इन सभी देशों पर हिन्दू संस्कृति की जबरदस्त छाप आज भी मौजूद है। दो-ढाई हजार वर्ष पूर्व दक्षिण भारत के हिन्दू राजा इन प्रदेशों में गए थे। ऐसा कोई भी तथ्य नहीं मिलता कि भारत से गए राजाओं ने वहाँ भीषण युद्ध किया हो। इसकी बजाय शांतिपूर्ण तरीके से, अपनी समृद्ध संस्कृति के बल पर समूचा दक्षिण-पूर्व एशिया धीरे-धीरे हिन्दू विचारों को अपना मानने लगा था।</p>
<p>अब एक स्वाभाविक प्रश्न उठता है कि जब बड़े पैमाने पर हिन्दू राजा आंध्र, तमिलनाडु इत्यादि राज्यों से दक्षिण-पूर्व एशिया के देशों में गए, तो वे कैसे गए होंगे? ज़ाहिर है कि समुद्री मार्ग से ही गए होंगे। अर्थात उस कालखंड में भारत में नौकायन शास्त्र अत्यंत उन्नत स्थिति में मौजूद था। उस कालखंड के भारतीय नौकाओं एवं नाविकों के अनेक चित्र एवं मूर्तियाँ कम्बोडिया, जावा, सुमात्रा, बाली जैसे स्थानों पर दिखाई देती हैं। उस काल में भी कम से कम सात सौ यात्रियों को ले जाने की क्षमता वाली नौकाओं का निर्माण भारत में होता था।</p>
<p>सुमात्रा द्वीप समूह, वर्तमान में इंडोनेशिया का एक हिस्सा है। इस द्वीप समूह में, एक पहाड़ पर ‘बोरबूदूर’ नाम का एक देवस्थान (मंदिर) है। मंदिर की दीवार पर अनेक चित्र उकेरे गए हैं, जिनमें भारतीय जहाजों के चित्र बहुतायत हैं। इन चित्रों में तत्कालीन भव्य और विशाल जहाज मिलते हैं।</p>
<p>उस काल में समुद्री यात्राओं की स्थिति को देखते हुए, यह निश्चित कहा जा सकता है कि भारतीयों के पास उत्तम दिशाज्ञान एवं समुद्री वातावरण की पूरी समझ थी, अन्यथा उस समय उफनते समुद्र में, आज जैसे आधुनिक मौसम यंत्र एवं यात्राओं संबंधी विभिन्न साधनों के नहीं होने के बावजूद, इतनी दूर के देशों तक पहुंचना, उन देशों से सम्बन्ध बनाना, वहां पर व्यापार करना, भारत जैसे देश के ‘एक्सटेंशन’ की तरह उन देशों से संपर्क लगातार बनाए रखना। इससे सिद्ध होता है कि भारतीयों का नौकायन शास्त्र उन दिनों अत्यधिक उन्नत रहा ही होगा।</p>
<p>अजंता की गुफाओं में जो चित्र बने हैं, उनमें एक चित्र ईसा के ५४३ वर्ष पहले, श्रीलंका में जहाज लेकर गए हुए विजयसिंह का है। भोपाल के पास स्थित ‘सांची’ के स्तूप में भी अनेक प्राचीन चित्र बनाए/उकेरे गए हैं। इन चित्रों में उस जमाने के एक विलासी जहाज का चित्र भी है। केरल के कड़क्करापल्ली में एक नाव (छोटा जहाज) के साबुत अवशेष मिले हैं। यह नाव वर्ष ९०० से वर्ष १२०० के बीच की होने की संभवना है। १४.५ मीटर लंबी और ४ मीटर चौड़ी यह नाव, किसी भी मानकों पर मजबूत श्रेणी में आती है।</p>
<p>और पढ़ें : <span style="color: #000080;"><strong><a style="color: #000080;" href="https://rashtriyashiksha.com/how-britishers-demolished-developed-medical-system-of-bharat-lets-know-1/" target="_blank" rel="noopener">कैसे अंग्रेजो ने ध्वस्त की भारत की विकसित चिकित्सा प्रणाली : आओ जाने – 1</a></strong></span></p>
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		<title>कैसे अंग्रेजो ने ध्वस्त की भारत की विकसित चिकित्सा प्रणाली : आओ जाने – 4</title>
		<link>https://rashtriyashiksha.com/how-britishers-demolished-developed-medical-system-of-bharat-lets-know-4/</link>
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		<dc:creator><![CDATA[राष्ट्रीय शिक्षा]]></dc:creator>
		<pubDate>Thu, 30 Sep 2021 04:47:59 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[लेख]]></category>
		<category><![CDATA[विनाश पर्व]]></category>
		<category><![CDATA[Bhartiya Edcation]]></category>
		<category><![CDATA[Bhartiya Education]]></category>
		<category><![CDATA[Chikan Pox]]></category>
		<category><![CDATA[indian education]]></category>
		<category><![CDATA[Medical Systmb]]></category>
		<category><![CDATA[Rashtriya shiksha]]></category>
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					<description><![CDATA[<p> &#8211;   प्रशांत पोळ आरंभ से आयुर्वेद के प्रचार-प्रसार में विकेन्द्रीकरण का बड़ा महत्व रखा गया था जो आधुनिक केन्द्रीकरण और अस्पताल व्यवस्था के बिल्कुल भिन्न है। आयुर्वेद के विभिन्न सिद्धान्तों&#8230; </p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: right;"> &#8211;   प्रशांत पोळ</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone wp-image-4078" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2021/09/Presentation1-3-300x169.jpg" alt="" width="1022" height="576" srcset="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2021/09/Presentation1-3-300x169.jpg 300w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2021/09/Presentation1-3-1024x576.jpg 1024w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2021/09/Presentation1-3-768x432.jpg 768w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2021/09/Presentation1-3.jpg 1280w" sizes="auto, (max-width: 1022px) 100vw, 1022px" /></p>
<p>आरंभ से आयुर्वेद के प्रचार-प्रसार में विकेन्द्रीकरण का बड़ा महत्व रखा गया था जो आधुनिक केन्द्रीकरण और अस्पताल व्यवस्था के बिल्कुल भिन्न है। आयुर्वेद के विभिन्न सिद्धान्तों को अत्यन्त छोटे छोटे कर्मकाण्डों और रीति रिवाजों में बाँटकर घर-घर तक पहुँचाया गया था। उन सिद्धान्तों के अनुपालन में परिवार की महिला सदस्यों का विशेष स्थान था। इसलिए आयुर्वेद का ज्ञान महिलाओं के पास सुरक्षित रहता था और प्रायः उन्हीं के द्वारा उपयोग में लाया जाता। औरतों को परिवार में सम्मान का स्थान मिलने के जो कई कारण थे उसमें स्वास्थ्य रक्षा भी एक महत्वपूर्ण कारण था। यह आयुर्वेद का ज्ञान औरतों द्वारा परिवार के पास पड़ोस की सेवा के लिये लगाया जाता। यदि कोई परिवार आर्थिक अडचन में आए तभी यह ज्ञान परिवार के पुरुषों के माध्यम से आर्थिक आय जुटाने के काम में प्रयुक्त किया जाता। परिवार में औरतों का सम्मान घटने का एक कारण यह भी रहा है कि आयुर्वेद के माध्यम से स्वास्थ्य रक्षा का जो ज्ञान उनके पास था वह अब छिन चुका है।</p>
<p>चेचक या मसूरिका रोगों के विषय में चरक या सुश्रुत संहिता में अत्यन्त कम वर्णन पाया जाता है जिससे प्रतीत होता है कि पांचवीं सदी में इस रोग की भयावहता अधिक नहीं थी। किन्तु आठवीं सदी के प्रसिद्ध आयुर्वेदिक ग्रन्थ ‘माधव निदान’ में इसका विस्तृत वर्णन है। एक बार रोग हो जाये तो इसकी कोई दवा नहीं थी, केवल परहेज पर ही ज़ोर दिया जाता था। माँस-मछली, दूध, तेल, घी और मसाले कुपथ्य माने जाते थे। केला, गन्ना, पके हुए चावल, भंग, तरबूजे आदि पथ्यकर थे। बीमारी की पहचान के बाद वैद्य, ब्राह्मणों या कविराज की कोई जरूरत नहीं रहती क्योंकि दवाई तो कोई होती नहीं थी। शीतला माता के मंदिरों के पुजारी प्रायः माली समाज से या बंगाल में मालाकार समाज से होते थे। बीमारों की परिचर्या के लिए उन्हीं को बुलाया जाता था ‘माली’ आने के बाद वह घर में सारे माँसाहारी खाने बंद करवाता था। घी, तेल व मसाले भी बंद करवाये जाते। मरीज की कलाई में कुछ कौडियाँ, कुछ हल्दी के टुकडे और सोने का कोई गहना बांधा जाता था। उसे केले के पत्ते पर सुलाया जाता और केवल दूध का आहार दिया जाता। उसे नीम के पत्तों से हवा की जाती। उसके कमरे में प्रवेश करने वाले को नहा धोकर आना पड़ता। शीतला माता की पंचधातु की मूर्ति का अभिषेक कर वही चरणोदक बीमार को पिलाया जाता।</p>
<p>रात भर शीतला माता के गीत गाये जाते। लेखक ओर्नोल्ड ने एक पूरे गीत का अंग्रेजी अनुवाद भी किया है, जो माता की प्रार्थना के लिये गाया जाता था। दानों की जलन कम करने के लिए शरीर पर पिसी हुई हल्दी, मसूर दाल का आटा या शंख भस्म का लेप किया जाता। सात दिनों तक कलश पूजा भी होती जिसमें चावल की खीर, नारियल, नीम के पत्ते इत्यादि का भोग लगता। चेचक के दाने पक चुकने के बाद, जलन को कम करने की आवश्यकता होने पर किसी तेज कांटे से उन्हें फोड़कर मवाद निकाल दिया जाता। इसके बाद के एक सप्ताह तक बीमार व्यक्ति की हर इच्छा को माता की इच्छा मानकर पूरा किया जाता और माता को ससम्मान विदा किया जाता।</p>
<p>लेखक के अनुसार शीतला माता का एक बड़ा मंदिर गुडगाँव (आज का गुरुग्राम) में था जिसमें बड़ी यात्रा लगती थी। लेकिन पूरे उत्तरी भारत, राजस्थान, बिहार, बंगाल व उड़ीसा में छोटे-छोटे मंदिर थे, जहाँ चैत्र मास में शीतला माता के पर्व के लिये यात्राएं और मेले लगते थे। बंगाल और पंजाब के कई मुस्लिम परिवारों में भी शीतला माता की पूजा का रिवाज था जिसे समाप्त करनेके लिए फराइजी मुस्लिम संगठन के कार्यकर्ता कोशिश किया करते।</p>
<p>लेखक के अनुसार बीमारी न होनेका उपाय करना ब्राह्मणों के जिम्मे था जो कि गांव गांव जाकर टीके लगवाते थे। बंगाल व उड़ीसा में आज भी टीकाकार नाम के कई परिवार हैं। इस विधि का भारत में काफी प्रचार था। लेकिन बीमारी हो जाने पर रोगी की व्यवस्था देखने का काम मालियों के जिम्मे था।</p>
<p>इस प्रकार हम देखते हैं कि इम्युनाझेशन के लिये बीमार व्यक्ति को ही साधन बनाने का सिद्धान्त और चेचक जैसी बीमारी में टीका लगाने का विधान भारत में उपजा था। तेरहवीं से अठारवीं सदी तक यह उत्तरी भारत के सभी हिस्सों में प्रचलित था। 1767 में डॉ हॉलवेल ने भारतीय टीके की पद्धति का विस्तृत ब्यौरा लंदन के कॉलेज ऑफ फिजिक्स में प्रस्तुत किया था और इसकी भारी प्रशंसा की थी। यह पद्धति इंग्लैंड में नई-नई आई थी और हॉलवेल उन्हें इसके विषय में आश्वस्त कराना चाहता था। हॉलवेल ने बताया कि टीका लगाने के लिये भारतीय टीकाकार पिछले वर्ष के मवाद का उपयोग करते थे, नये का नहीं। साथ ही यह मवाद उसी बच्चे से लिया जाता, जिसे टीके के द्वारा शीतला के दाने दिलवाये गये हों अर्थात जिसका कण्ट्रोल्ड एनवायर्नमेंट रहा हो। टीका लगाने से पहले रुई में स्थित दवाई को गंगाजल छिड़क कर पवित्र किया जाता था। बच्चों के घर और पास पड़ोस के पर्यावरण का विशेष ध्यान रखा जाता था। बूढ़े व्यक्ति या गर्भवती महिलाओं को अलग घरों में रखा जाता ताकि उन तक बीमारी का संसर्ग न फैले। हॉलवेल के मुताबिक इस पूरे कार्यक्रम में न तो किसी बच्चे को तीव्र बीमारी होती और न ही उसका संसर्ग अन्य व्यक्तियों तक पहुँचता &#8211; यह पूर्णतया सुरक्षित कार्यक्रम था।</p>
<p>सन्‌ 1839 में राधाकान्त देव (1783 – 1867) ने भी इस टीके की पद्धति का विस्तृत ब्यौरा देने वाली पुस्तक लिखी है। आरनॉल्ड कहता है – “हालॉकि हॉलवेल या डॉ देव यह नहीं लिख पाये कि टीका देने की यह पद्धति समाज में कितनी गहराई तक उतरी थी, लेकिन 1848 से 1867 के दौरान बंगाल के सभी जेलों के आँकड़े बताते हैं कि करीब अस्सी प्रतिशत कैदी भारतीय विधान से टीका लगवा चुके थे। असम, बंगाल, बिहार और उड़ीसा में कम से कम साठ प्रतिशत लोक टीके लगवाते थे। आरनॉल्ड ने वर्णन किया है कि बंगाल प्रेसिडेन्सी में 1870 के दशक में चेचक से संबंधित कई जनगणनाएँ कराई गईं। ऐसी ही एक गणना 1872 में हुई। उसमें 17697 लोगों की गणना में पाया गया कि करीब 66 प्रतिशत लोग देसी विधान के टीके लगवा चुके थे, 5 प्रतिशत का Vaccination कराया गया था, 18 प्रतिशत को चेचक निकल चुका था और अन्य 11 प्रतिशत को अभी तक कोई सुरक्षा बहाल नहीं की गई थी।</p>
<p>बंगाल प्रेसिडेन्सी के बाहर काशी, कुमाँऊ, पंजाब, रावल पिण्डी, राजस्थान, सिंध, कच्छ, गुजरात और महाराष्ट्र के कोंकण प्रान्त में भी यह विधान प्रचलित था। लेकिन दिल्ली, अवध, नेपाल, हैदराबाद और मेसूर में इसके चलन का कोई संकेत लेखक को नहीं मिल पाया। मद्रास प्रेसिडेन्सी के कुछ इलाकों में ओरिया ब्राह्मणों द्वारा टीके लगवाये जाते थे। टीके लगवाने के लिये अच्छी खासी फीस मिल जाती। लेकिन कई इलाकों में औरतों को टीका लगाने पर केवल आधी फीस मिलती थी।</p>
<p><span style="color: #000080;"><em><strong>यह भी पढ़ें : </strong></em><span style="color: #000080;"><strong><a style="color: #000080;" href="https://rashtriyashiksha.com/how-britishers-demolished-developed-medical-system-of-bharat-lets-know-2/" target="_blank" rel="noopener">कैसे अंग्रेजो ने ध्वस्त की भारत की विकसित चिकित्सा प्रणाली : आओ जाने – 2</a></strong></span></span></p>
<p>राधाकान्त देव के अनुसार टीका लगाने का काम ब्राह्मणों के अलावा, आचार्य, देबांग (ज्योतिषी), कुम्हार, सांकरिया (शंख वाले) तथा नाई जमात के लोग भी करते थे। बंगाल में माली समाज के लोग और बालासोर में मस्तान समाज के, तो बिहार में पछानिया समाज के लोग, मुस्लिमों में बुनकर और सिंदूरिये वर्ग के लोग टीका लगाते थे। कोंकण में कुनबी समाज तो गोवा में कॅथोलिक चर्चों के पादरी भी टीका लगाते थे। टीका लगाने के महीनों में, अर्थात्‌ फाल्गुन, चैत्र, बैसाख में हर महीने सौ-सवा सौ रुपये की कमाई हो जाती, जो उस जमाने में अच्छी खासी सम्पत्ति थी। कई गाँवों का अपना खास टीका लगवाने वाला होता था और कई परिवारों में यह पुश्तैनी कला चली आई थी। लेखक के मुताबिक ‘चूँकि टीका लगवाने की यह विधि ब्रिटेन में भी धीरे-धीरे मान्य हो रही थी, अतः बंगाल के कई अंग्रेज परिवार भी टीके लगवाने लगे थे। लेकिन सन्‌ 1798 में सर जेनर ने गाय के थन पर निकले चेचक के दानों से Vaccine बनाने की विधि ढूँढ़ी तो इंग्लैंड में उसका भारी स्वागत हुआ। ‘अब उस जादू टोने वाले देश के टीके की बजाय हम अपने डॉक्टर की विधिका प्रयोग करेंगे’। जैसे ही जेनर की विधि हाथ में आई, अंग्रेजों ने मान लिया कि इसके सिवा जो भी विधि जहाँ भी हो, वह बकवास है और उसे रोकना पड़ेगा।</p>
<p>जेनर की विधि सबसे पहले 1802 में मुंबई में लाई गई और 1804 में बंगाल में। इसके बाद ब्रिटिश शासन ने हर तरह से प्रयास किया कि भारतीयों की टीका लगाने की विधि अर्थात्‌ Variolation को समाप्त किया जाए। इसका सबसे अच्छा उपाय यह था कि Variolation के द्वारा टीका लगवाने को गुनाह करार दिया गया और टीका लगवा ने वालों को जेल भेजा गया। करीब 1830 के बाद चेचक के विषय में अंग्रेजों के द्वारा लिखित जितने भी ब्यौरे मिलेंगे उनमें Variolation की विधि को बकवास बताया गया है और भारतीयों की तथा उनकी अंध श्रद्धा की भरपूर निन्दा की गई। ‘वे (भारतीय) जेनर साहब के Vaccination जैसे अनमोल रत्न को ठुकरा रहे थे, जो उन्हें अंग्रेज डॉक्टरों की दया से मिल रहा था और जिसके प्रति कृतज्ञता दर्शाना भारतीयों का कर्तव्य था।’  भारतीयों द्वारा देसी पद्धति से टीका लगवाने को ‘मृत्यु का व्यापार’ या ‘Mrderous trade’ कहा गया।</p>
<p>“वैक्सीनेशन को भारतीयों ने शीघ्रता से सर आँखों पर नहीं लिया इससे कई अंग्रेज अफसर रुष्ट थे। शूलब्रेडने उन्हें मूर्ख, अज्ञानी और हर नये अविष्कार का शत्रु कहा (1804) तो डंकन स्टेवार्टने अकृतज्ञ और मूढ कहा (1840) जबकि 1878 में कलकत्ता के सॅनिटरी कमिश्नर ने उन्हें अंधविश्वासी, रूढ़िवादी और जातीयवादी कहा। भारतीयों की टीका पद्धति को ही इस व्यवहार का कारण माना गया और कहा गया कि सारे भारतीय टीकाकार अपनी रोजी रोटी छिन जाने के डर से वॅक्सिनेशन के बारे में गलत बातें फैला रहे थे, जबकि भारतीय पद्धति में ही अधिक लोग मरते हैं।” &#8211; आरनॉल्ड</p>
<p>“खुद नियति ने यह विधान किया कि हम इस देश पर राज करें और यहाँ लाखों करोड़ों मूढ़ और अज्ञानी प्रजाजनों को उस आत्मक्लेश से बचायें जिसके कारण वे भारतीय टीका लगवाते हैं &#8211; शूलब्रेड।”</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class=" wp-image-4079" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2021/09/Cream-is-the-right-solution-for-smallpox-732x549-thumbnail-732x549-1-300x225.jpg" alt="" width="944" height="708" srcset="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2021/09/Cream-is-the-right-solution-for-smallpox-732x549-thumbnail-732x549-1-300x225.jpg 300w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2021/09/Cream-is-the-right-solution-for-smallpox-732x549-thumbnail-732x549-1.jpg 732w" sizes="auto, (max-width: 944px) 100vw, 944px" /></p>
<p>लेकिन शूलब्रेड के ही समकालीन बुचानन ने इस पद्धति में कई अच्छाइयों का वर्णन किया है और 1860 में कलकत्ता के वॅक्सीनेशन के सुपरिटेंडेंट जनरल चार्लस्‌ ने लिखा है – “यदि सारे विधि विधानों का ठीक से पालन हो तो भारतीय पद्धति में चेचक की महामारी फैलने की कोई संभावना नहीं है। हालाँकि मैं स्वयं वॅक्सिनेशन को बेहतर समझता हूँ फिर भी मेरा सुझाव है कि भारतीय टीकादारों पर पाबन्दी लगाने के बजाय उनका रजिस्ट्रेशन करके उन्हें उनकी अपनी प्रणाली से टीके लगाने दिये जायें।” जाहिर है कि यह सुझाव अंग्रेजी हुकूमत को पसंद नहीं आया।</p>
<p>अंग्रेजी पद्धति के लोकप्रिय न होने का एक कारण यह भी था कि काफी वर्षों तक अंग्रेजी पद्धति में कई कठिनाईयाँ रही थीं। उन्नींसवीं सदी के अंत तक यह पद्धति काफी क्लेशकारक भी थी। भारतवर्ष में गायों को चेचक की बीमारी नहीं होती थी। अतः गाय के चेचक का मवाद (जिसे वॅक्सिन कहा गया) इंग्लैंड से लाया जाता था। फिर बगदाद से बंबई तक इसे बच्चों की श्रृखंला के द्वारा लाया जाता था &#8211; अर्थात्‌ किसी बच्चे को गाय के वॅक्सीन से टीका लगा कर उसे होने वाली जख्म के पकने पर उसमें से मवाद निकालकर अगले बच्चे को टीका लगाया जाता था।</p>
<p>बादमें गाय के वॅक्सिन को शीशी में बन्द करके भेजा जाने लगा। परंतु गर्मी से या देर से पहुँचने पर उसका प्रभाव नष्ट हो जाता था। उसके कारण बड़े बड़े नासूर भी पैदा होते थे। गर्मियों में दिये जाने वाले टीके कारगर नहीं थे, अतएव छह महीनों के बाद टीके बंद करने पड़ते थे और अगले वर्ष फिर से बच्चों की श्रृखंला बनाकर ही टीके का वॅक्सिन भारत में लाया जा सकता था। यूरोप और भारत में कुछ लोगों ने इसे बच्चों के प्रति अन्याय बताया और यह भी माना जाता था कि इसी पद्धति के कारण सिफिलस या कुष्ठ रोग भी फैलते हैं।</p>
<p>सन्‌ 1850 में बम्बई में वॅक्सिनेशन डिविजन ने गाय के बछड़ों में वॅक्सिनेशन कर उनके मवाद से टीके बनाने का प्रयास किया परंतु यह खर्चीला उपाय था।</p>
<p>सन्‌ 1893 में बंगालके सॅनिटरी कमिश्नर डायसन ने लिखा है &#8211; अंग्रेजी पद्धति में एक वर्ष से कम आयु के बच्चों को टीका दिया जाता था। जिस बच्चे का घाव पक गया हो उसे दूसरे गाँवों में ले जाकर उसके घावों का मवाद निकालकर अन्य बच्चों को टीका लगाया जाता। कई बार घाव को जोर से दबा-दबाकर मवाद निकाला जाता ताकि अधिक बच्चों को टीका लगाया जा सके। बच्चे, उनकी माएं और अन्य परिवार वाले रोते तड़पते थे। टीका लगवाने वाले परिवार भी रोते क्योंकि उनके बच्चों को भी आगे इसी तरह से प्रयुक्त किया जाता था। गांव वाले मानते थे कि इन अंग्रेज टीकादारों से बचने का एक ही रास्ता था &#8211; कि उन्हें चाँदी के सिक्के दिये जायें। यह सही है कि इस विधि में बच्चे को कोई बीमारी नहीं होती थी या उसे चेचक के दाने नहीं निकलते थे, जबकि भारतीय पद्धति में पचास से सौ तक दाने निकल आते थे। फिर भी कुल मिलाकर भारतीय पद्धति में तकलीफें कम थीं। जो भी थीं उन्हे शीतला माता की इच्छा मानकर स्वीकार कर लिया जाता था।</p>
<p>इस सारे विवरण को विस्तार से पढ़ने के बाद कुछ प्रश्न खड़े होते हैं। सबसे पहला प्रश्न यह आता है कि जब अर्नोल्ड जैसा ब्रिटिश व्यक्ति, भारतीय चिकित्सा पद्धति पर इतना अध्ययन करके यह पुस्तक लिखता हैं, तो अंग्रेजों ने उस पर विचार क्यों नहीं किया&#8230;? इसका दूसरा अर्थ यह भी निकलता हैं कि अंग्रेजों का महिमा मंडन करने के लिए उन्हे ‘गुणग्राहक’ जैसे विशेषणों से नवाजा जाता हैं, जो गलत हैं। अंग्रेज़ तो पक्के व्यापारी थे। उन्हें प्राचीन भारतीय चिकित्सा पद्धति के गुण-दोषों से कुछ लेना देना नहीं था। उन्हें तो मात्र उनके द्वारा बनाई गई वैक्सीन, उनके द्वारा बनाई गई औषधियां, भारत के घर घर तक पहुंचानी थी। इसीलिए अंग्रेजों ने एक अत्यंत सुव्यवस्थित चिकित्सा पद्धति को, ज़ोर-ज़बरदस्ती कर के समाप्त किया।</p>
<p>अंग्रेजों के भारत से निकालने के समय, बहुत कम आयुर्वेदिक दवाखाने और वैद्य बचे थे। अंग्रेजों ने सारे देश में अंग्रेजी चिकित्सा पद्धति के दवाखाने, अस्पताल और डॉक्टर्स बनाकर, इस देश की प्राचीन और उन्नत चिकित्सा पद्धति को नष्ट करने का पूरा प्रयास किया!</p>
<p>संदर्भ –</p>
<ol>
<li>1. Colonizing the Body: State Medicine and Epidemic Disease in Nineteenth Century India – David Arnold (August 1993)</li>
<li>2. Medical History of British India</li>
<li>3. Public Health in British India: A Brief Account of the History of Medical Services and Disease Prevention in Colonial India – Muhammad Umair Mushtaq (January 2009)</li>
<li>4. War Against Smallpox – Michael Bennet</li>
<li>5. The Anarchy – William Darymple</li>
<li>6. An Era of Darkness – Shashi Tharoor</li>
<li>7. 18वीं शताब्दी में भारत में विज्ञान एवं तंत्रज्ञान – धरमपाल</li>
<li>8. Medical Encounters in British India – Deepak Kumar and Raj Sekhar Basu</li>
<li>9. The British in India – David Gilmour</li>
<li>10. The Social History of Health and Medicine in Colonial India – Biswamoy Pati and Mark Harrison</li>
</ol>
<p>और पढ़ें : <span style="color: #000080;"><strong><a style="color: #000080;" href="https://rashtriyashiksha.com/how-britishers-demolished-developed-medical-system-of-bharat-lets-know-3/" target="_blank" rel="noopener">कैसे अंग्रेजो ने ध्वस्त की भारत की विकसित चिकित्सा प्रणाली : आओ जाने – 3</a></strong></span></p>
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		<title>कैसे अंग्रेजो ने ध्वस्त की भारत की विकसित चिकित्सा प्रणाली : आओ जाने – 3</title>
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		<dc:creator><![CDATA[राष्ट्रीय शिक्षा]]></dc:creator>
		<pubDate>Tue, 28 Sep 2021 06:05:09 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[नवीनतम]]></category>
		<category><![CDATA[लेख]]></category>
		<category><![CDATA[विनाश पर्व]]></category>
		<category><![CDATA[Bhartiya Education]]></category>
		<category><![CDATA[how britishers demolished developed education system of bharat lets know]]></category>
		<category><![CDATA[indian education]]></category>
		<category><![CDATA[Rashtriya shiksha]]></category>
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					<description><![CDATA[<p> &#8211;   प्रशांत पोळ पिछले एक वर्ष से पूरा विश्व ‘कोरोना’ की महामारी से जूझ रहा हैं। इस महामारी पर वैक्सिन बनाना कितना कठीन हैं, यह हम सब देख रहे हैं।&#8230; </p>
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]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: right;"> &#8211;   प्रशांत पोळ</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone wp-image-4065" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2021/09/Presentation1-1-300x169.jpg" alt="" width="1106" height="623" srcset="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2021/09/Presentation1-1-300x169.jpg 300w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2021/09/Presentation1-1-1024x576.jpg 1024w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2021/09/Presentation1-1-768x432.jpg 768w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2021/09/Presentation1-1.jpg 1280w" sizes="auto, (max-width: 1106px) 100vw, 1106px" /></p>
<p>पिछले एक वर्ष से पूरा विश्व ‘कोरोना’ की महामारी से जूझ रहा हैं। इस महामारी पर वैक्सिन बनाना कितना कठीन हैं, यह हम सब देख रहे हैं। पश्चिमी जगत ने तो अभी 200 वर्ष पहले ही महामारी पर वैक्सिन का इलाज खोजा हैं। किन्तु हमारी भारतीय चिकित्सा पद्धति में यह सैकड़ों वर्षों से हैं। अंग्रेजों के यहां आने से पहले, हम ऐसी अनेक महामारियों का सफलता पूर्वक सामना कर चुके हैं।</p>
<p>भारतीय पुराणों में ‘शीतला माता’ का अलग महत्व हैं। स्कंद पुराण में शीतला माता का उल्लेख हैं। माता के अर्चना का का स्तोत्र, ‘शीतलाष्टक’ के रूप में दिया गया हैं। इसमें एक मंत्र हैं –</p>
<p style="text-align: center;"><strong>वन्देऽहं शीतलांदेवीं रासभस्थांदिगम्बराम्।</strong></p>
<p style="text-align: center;"><strong>मार्जनीकलशोपेतां सूर्पालंकृतमस्तकाम्।।</strong></p>
<p>इसमे कहा गया हैं, कि देवी का वाहन गदर्भ हैं और ये दोनों हाथों में कलश, सूप, मार्जन (झाड़ू) तथा नीम के पत्ते धारण करती हैं। अर्थात इस वंदना मंत्र से यह पूर्णतः स्पष्ट हो जाता हैं कि ये स्वच्छता की अधिष्ठात्री देवी हैं। हजारों वर्षों से भारतीय जनमानस की धारणा हैं कि यह महामारी को नष्ट करने वाली देवी हैं। प्राचीन काल से, हमारे समाज के पुरोधाओं ने इस देवी के व्रत को, महामारी से निपटने के लिए टीकाकरण के रुप में प्रस्थापित किया था। संसर्गजन्य रोग, महामारी आदि से बचने का एक पूरा पारतंत्र (इको सिस्टम) ‘शीतला माता व्रत’ के रुप में निर्माण की गई थी। गांव-गांव शीतला माता के मंदिर स्थापित किए गए और महामारियों से बचने के लिए इस देवी के व्रत से जोड़कर, जिसमें नीम के पत्ते से स्नान करने से लेकर सब कुछ हैं, एक पूरी व्यवस्था बनाई गई।</p>
<p>दसवीं शताब्दी के आयुर्वेद के ‘साक्तीय ग्रंथम’ में इस टीकाकरण विधि का उल्लेख हैं। खुद अंग्रेजों ने ही इस संपूर्ण पारतंत्र की खूबियों का वर्णन किया हैं। प्रख्यात गांधीवादी चिंतक, धरमपाल जी ने अपने ‘18 वीं शताब्दी में भारत में विज्ञान एवं तंत्रज्ञान’ इस पुस्तक में अंग्रेजों के दो उद्धरण दिये हैं। इन में से पहला हैं, ‘आर। कोल्ट का ओलिवर कोल्ट को, 10 फरवरी 1731 को लिखा पत्र’। इस पत्र में कोल्ट महाशय ने बंगाल में चेचक के टीकाकरण का विवरण दिया हैं।</p>
<p>दूसरा उल्लेख एक विस्तृत भाषण का हैं। यह भाषण डॉ. जॉन झेड। हालवेल ने, लंदन के कॉलेज ऑफ फिजीशियन के पदाधिकारी और सदस्यों के सम्मुख, वर्ष 1767 में दिया हैं। भाषण का विषय हैं, ‘भारत में चेचक की परंपरागत टीकाकरण पध्दति’।</p>
<p>(संयोग से डॉ. जॉन हॉलवेल यह 1756 की कुप्रसिध्द ‘ब्लैक होल घटना’ में जीवित अत्यंत कम भाग्यशाली लोगों में से एक थे। प्लासी के युद्ध के एक वर्ष पहले, अर्थात 1756 में बंगाल के नवाब सिराजुद्दौल्ला ने कलकत्ता में अंग्रेजों के किला नुमा गढ़ी पर धावा बोल दिया था और 146 अंग्रेज़ बंदियों को, जिनमे स्त्रियाँ और बच्चे भी शामिल थे, एक 18 फीट X 14 फीट के कमरे में बंद कर दिया। 20 जून, 1756 की रात को उन्हे बंद किया और 23 जून की प्रातः जब कोठरी को खोला गया, तब उस में मात्र 23 व्यक्ति ही जीवित बचे थे। इन में से जॉन हॉलवेल भी एक थे। हालांकि जे। एच। लिटल जैसे आधुनिक इतिहासकारों ने इस घटना को झूठ और मनगढ़ंत बताया हैं। उनके अनुसार, अगले वर्ष 1757 में अंग्रेजों ने बंगाल के नवाब के विरोध में आक्रामक युद्ध छेडने के लिए इस झूठी घटना का कारण दिया।)</p>
<p>इसके अलावा भी इस परंपरागत, और इसीलिए प्रभावी, टीकाकरण पद्धति पर अनेक ने पुस्तकें लिखी हैं। इनमें डेविड अर्नोल्ड की ‘कोलोनाइजिंग द बॉडी’ यह पुस्तक प्रमुख हैं। अर्थात यह स्पष्ट हैं कि विश्व में टीकाकरण की कल्पना और पद्धति, हम भारतीयों ने ही हजारों वर्ष पहले खोज निकाली। उस पद्धति को पौराणिक श्रद्धा से जोड़ा गया, जिसके कारण वह सहज स्वीकार्य और प्रभावी बन गई।</p>
<p>किन्तु दुर्भाग्य से टीकाकरण (वैक्सीनेशन) का श्रेय दिया जाता हैं एडवर्ड जेनर को, जिन्होने बहुत बाद, अर्थात वर्ष 1796 में टीके (वैक्सीन) की खोज की!</p>
<p>श्रीमति लीना मेहंदले यह वरिष्ठ आई एस एस अफसर रह चुकी हैं। महाराष्ट्र सरकार में ‘अतिरिक्त प्रमुख सचिव’ इस पद से उन्होने सेवा निवृत्ति ली थी। बाद में वे गोवा में सूचना आयुक्त रही और सेंट्रल ट्रिब्यूनल में सदस्य भी रही हैं। उन्होने एक सुंदर लेख लिखा हैं, जिसमें चेचक जैसी महामारी से लड़ने की हमारी व्यवस्था क्या थी और अंग्रेजों ने उसे कैसे ध्वस्त किया, यह विस्तार से बताया गया हैं।</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone wp-image-4066" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2021/09/chickenpox-300x250.jpg" alt="" width="1018" height="848" srcset="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2021/09/chickenpox-300x250.jpg 300w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2021/09/chickenpox-1024x853.jpg 1024w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2021/09/chickenpox-768x640.jpg 768w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2021/09/chickenpox.jpg 1200w" sizes="auto, (max-width: 1018px) 100vw, 1018px" /></p>
<p>उन्हीं की लेखनी से –</p>
<p>सन्‌ 1802 में इंग्लैण्ड के श्री एडवर्ड जेनर (Edward Jenner)  ने चेचक के लिए वैक्सीनेशन खोजा। यह गाय पर आए चेचक के दानों से बनाया जाता था। लेकिन इससे दो सौ वर्ष पहले भी भारत में बच्चों पर आए चेचक के दानों से वैक्सीन बनाकर दूसरे बच्चों का बचाव करने की विधि थी। इस संदर्भ में ब्रिटन के ही प्रोफे। ओर्नोल्ड ने काफी काम किया हैं।</p>
<p>कुछ वर्षों पहले मुझे पुणे से डॉ देवधर जी का फोन आया, यह बताने के लिए कि वे American Journal for Health Sciences के लिए एक पुस्तक की समीक्षा कर रहे हैं। पुस्तक थी लंदन यूनिवर्सिटीके प्रोफेसर आरनॉल्ड लिखित Colonizing Body। पुस्तक का विषय है, प्लासी की लड़ाई अर्थात्‌ 1756 से लेकर भारत की स्वतन्त्रता, अर्थात 1947 तक, अपने शासन काल में अंग्रेजी शासकों ने भारत में प्रचलित कतिपय महामारियों को रोकने के लिए क्या-क्या किया। इसे लिखने के लिए ओर्नोल्ड ने अंग्रेजी अफसरों के द्वारा दो सौ वर्षों के दौरान लिखे गये कई सौ डिस्ट्रिक्ट गझेटियर और सरकारी फाइलों की पढ़ाई की और जो जो पढ़ा उसे ईमानदारी से इस पुस्तक में लिखा। पुस्तक के तीन अध्यायों में चेचक, प्लेग और कॉलरा जैसी तीन महामारियों के विषय में विस्तार से लिखा गया है। अन्य अध्याय विश्लेषणात्मक हैं।</p>
<p>सत्रहवीं, अठारवीं और उन्नीसवीं सदी में, या शायद उससे कुछ सदियों पहले भी, चेचक की महामारी से बचनेके लिए हमारे समाज में एक खास व्यवस्था थी। उसका विवरण देते हुए ओर्नोल्ड ने काशी और बंगाल की सामाजिक व्यवस्थाओं के विषय में अधिक जानकारी दी है। चेचक को शीतला माता के नाम से जाना जाता था और यह माना जाता था कि शीतला माता का प्रकोप होने से बीमारी होती है। लेकिन इससे जूझने के लिए जो समाज व्यवस्था बनाई गई थी उसमें धार्मिक भावनाओं का अच्छा खासा उपयोग किया गया था। शीतला माता को प्रेम और सम्मान से आमंत्रित किया जाता था, उसकी पूजा का विधि विधान भी किया गया था। चैत्र के महीने में शीतला उत्सव भी मनाया जाता था। यही महीना है जब नई कोंपलें और फूल खिलते हैं, और यही महीना है जब शीतला बीमारी अर्थात्‌ चेचक का प्रकोप शुरू होने लगता है। शीतला माता को बंगाल में बसन्ती-चण्डी के नाम से भी जाना जाता है।</p>
<p>इन्हीं दिनों काशी के गुरूकुलों से गुरू का आशीर्वाद लेकर शिष्य निकलते थे और अपने-अपने सौंपे गये गाँवों में इस पूजा विधान के लिये जाते थे। चार-पांच शिष्यों की टोली बनाकर उन्हें तीस-चालीस गांव सौंपे जाते थे। गुरू के आशीर्वाद के साथ-साथ वे अन्य कुछ वस्तुएं भी ले जाते थे &#8211; चाँदी या लोहे के धारदार ब्लेड और सुईयाँ, और रुई के फाहों में लिपटी हुई ‘कोई वस्तु’।</p>
<p>इन शिष्यों का गांव में अच्छा सम्मान होता था और उनकी बातें ध्यान से सुनी व मानी जाती थीं। वे तीन से पन्द्रह वर्ष की आयु के उन सभी बच्चों और बच्चियों को इकट्ठा करते थे, जिन्हें तब तक शीतला माता का आशीर्वाद न मिला हो (यानि चेचक की बीमारी न हुई हो)। उनके हाथ में अपने ब्लेड से धीमे धीमे कुरेद कर रक्त की मात्र एकाध बूंद निकलने जितना एक छोटा-सा जख्म करते थे। फिर रूई का फाहा खोलकर उसमें लिपटी वस्तु को जख्म पर रगड़ते थे। थोड़ी ही देर में दर्द खतम होने पर बच्चा खेलने कूदने को तैयार हो जाता। फिर उन बच्चों पर निगरानी रखी जाती। उनके माँ-बाप के साथ अलग मीटिंग करके उन्हें समझाया जाता कि बच्चे के शरीर में शीतला माता आने वाली है, उनकी आवभगत के लिये बच्चे को क्या क्या खिलाया जाए। यह वास्तव में पथ्य विचार के आधार पर तय किया जाता होगा।</p>
<p>एक दो दिनों में बच्चों को चेचक के दाने निकलते थे और थोड़ा बुखार भी चढ़ता था। इस समय बच्चे को प्यार से रखा जाता और इच्छाएं पूरी की जाती। ब्राह्मण शिष्यों की जिम्मेदारी होती थी कि वह पूजा पाठ करता रहे ताकि जो देवी आशीर्वाद के रूप में पधारी हैं, वह प्रकोप में न बदल पाये। दाने बड़े होकर पकते थे और फिर सूख जाते थे &#8211; यह सारा चक्र आठ-दस दिनों में सम्पन्न होता था। फिर हर बच्चे को नीम के पत्तों से नहलाकर उसकी पूजा की जाती और उसे मिष्ठान दिये जाते। इस प्रकार दसेक दिनों के निवास के बाद शीतला माता उस बच्चे के शरीर से विदा होती थीं और बच्चे को &#8216;आशीर्वाद&#8217; मिल जाता कि जीवन पर्यंत उस पर शीतला का प्रकोप कभी नहीं होगा।</p>
<p>उन्हीं आठ-दस दिनों में ब्राह्मण शिष्य चेचक के दानों की परीक्षा करके उनमें से कुछ मोटे-मोटे, पके दाने चुनता था। उन्हें सुई चुभाकर फोड़ता था और निकलने वाले मवाद को साफ रुई के छोटे-छोटे फाहों में भरकर रख लेता था। बाद में काशी जाने पर ऐसे सारे फाहे गुरू के पास जमा करवाये जाते। वे अगले वर्ष काम में लाये जाते थे।</p>
<p>यह सारा वर्णन पढ़कर मैं दंग रह गई। थोड़े शब्दों में कहा जाय तो यह सारा ‘पल्स इम्युनाइजेशन प्रोग्राम’ था जो बगैर अस्पतालों के एक सामाजिक व्यवस्था के रूप में चलाया जा रहा था। ब्राह्मणों के द्वारा किये जाने वाले विधि विधान या पथ्य एक तरह से कण्ट्रोल के ही साधन थे। हालांकि पुस्तक में सारा ब्यौरा बंगाल व काशी का है, लेकिन मैं जानती हूँ कि महाराष्ट्र में और देश के अन्य कई भागों में ‘शीतला सप्तमी’ का व्रत मनाया जाता है और हर गांव के छोर पर कहीं एक शीतला माता का मंदिर भी होता है।</p>
<p>इससे अधिक चौंकाने वाली दो बातें इस अध्याय में लेखक अर्नोल्ड ने आगे लिखी हैं।</p>
<p>अंग्रेज जब यहाँ आये तो अंग्रेज अफसरों और सोल्जरों को देसी बीमारियों से बचाये रखने के लिए अलग से कैण्टोनमेंट बने जो शहर से थोड़ी दूर हटकर थे। लेकिन यदि महामारी फैली तो अलग कैण्टोंमेंट में रहने वाले सोल्जरों को भी खतरा होगा। अतः महामारी के साथ सख्ती से निपटने की नीति थी। महामारी के मरीजों को बस्तियों से अलग अस्पतालों में रखना पड़ता था। उन्हें वह दवाईयाँ देनी पड़ती थीं जो अंग्रेजी फार्मोकोपिया में लिखी हैं, क्योंकि देसी लोगों की दवाईयों का ज्ञान तो अंग्रेजों को था नहीं, और उन पर विश्वास भी नहीं था। अंग्रेजों के लिये यह भी जरूरी था कि कैन्टोंमेंट के चारों ओर भी एक बफर जोन हो &#8211; अर्थात्‌ वहाँ रहने वाले भारतीय (प्रायः नौकर चाकर, धोबी, कर्मचारी इत्यादि) विदेशी टीके द्वारा संरक्षित हों।</p>
<p>वैसे देखा जाय तो ब्रिटानिका इनसाइक्लोपीडिया में जिक्र है कि अठारहवीं सदी के आरंभ में चेचक से बचने के लिए टीका लगवाने की एक प्रथा भारत से आरंभ कर अफगानिस्तान व तुर्किस्तान के रास्ते यूरोप में &#8211; खासकर इंग्लैंड में पहुँची थी। जिसे Variolation का नाम दिया गया था। अक्सर डॉक्टर लोग इसे ढकोसला मानते थे फिर भी ऐसे कई गणमान्य लोग इसके प्रचार में जुटे थे जिन्हें इंग्लैंड के समाज में अच्छा सम्मान प्राप्त था। सन्‌ 1767 में हॉलवेलने एक विस्तृत विवरण लिखकर इंग्लैण्ड की जनता को Variolation के संबंध में आश्वस्त कराने का प्रयास किया। स्मरण रहे कि तब तक ‘जेनर विधी’ जैसी कोई बात नही थी।</p>
<p>सन्‌ 1796 में डॉ. एडवर्ड जेनर (1749 – 1823) ने गाय के चेचक के दानों से चेचक का वॅक्सिन बनाने की खोज की। चूंकि यह एक अंग्रेज डॉक्टर का खोजा हुआ तरीका था, अतः इस पर तत्काल विश्वास किया गया और भारत में उसे तत्काल लागू किये जाने की सिफारिश की गई ताकि अंग्रेज सिपाहियों की स्वास्थ्य रक्षा हो सके। इन वॅक्सिन को बर्फ के बक्सों में रखकर भारत लाया जाता था। फिर उससे भारतीयों को चेचक के टीके लगवाये जाते थे। टीका लगाने का तरीका ठीक वही था जो हमारे लोग इस्तेमाल करते थे। लेकिन इस पद्धति का नाम पडा वॅक्सिनेशन। इसके लिये बड़ी सख्ती करनी पड़ती थी क्योंकि यदि किसी भारतीय ने अंग्रेजी टीका नहीं लगवाया तो अंग्रेज डॉक्टरों का डर था कि आगे उसे चेचक निकलेंगे और वह महामारी फैलाने का एक माध्यम बनेगा। आरंभ काल में अंग्रेजी टीका लगाने के तरीके काफी दुखद होते थे। उनकी जख्में बड़ी होती थीं और बच्चे या बूढ़े उन्हें लगवाने से डरते और रोते पीटते थे। ‘जेनर विधि’ के अर्न्तगत वैक्सिनेशन का टीका लगवाने पर उस जगह घाव हो जाता था और बुखार भी निकलता था, लेकिन चेचक के दाने नहीं उभरते थे, जैसा कि देसी वेरीओलेशन की प्रणाली में निकलते थे। कई बार टीके का बुखार तीव्र होकर मृत्यु भी हो जाती जिस कारण भारतीयों का विरोध अधिक था।</p>
<p>अंग्रेजों को यह लग रहा था कि जब तक काशी के ब्राह्मणोंके शिष्य अपना वेरिओलेशन (टीकाकरण) का कार्यक्रम कर रहे हैं, तब तक उनके लिये चुनौती कायम रहेगी। उसे रोकने के लिए देशी तरीके को अशास्त्रीय करार दिया गया और ‘शीतला माता’ का टीका लगाने वाले ब्राह्मणों को जेल भिजवाया जाने लगा। तब ब्राह्मणों ने अपनी विद्या गांव-गांव के सुनार और नाइयों को सिखाई। इस प्रकार उनके माध्यम से भी यह देसी पद्धति से टीके लगाने का काम कुछ वर्षों तक चलता रहा। जिन सुनार या नाइयों को यह विद्या सिखाई गई उनका नाम पडा ‘टीकाकार’ और आज भी बंगाल व उड़ीसा में ‘टीकाकार’ नाम से कई परिवार पाये जाते हैं, जो मूलतः सुनार या नाई, दोनों जातियों से हो सकते हैं। शायद उनके वंशज नहीं जानते थे कि यह नाम उनके हिस्से में कहाँ से आया।</p>
<p>हमारे पुराने सारे कर्मकाण्डों में यह पाया जाता है कि एक छोटी सी शास्त्रीय घटना को केन्द्र में रखकर ऊपर से उत्सवों का और कर्मकाण्डों का भारी भरकम चोला पहनाया जाता था। वह चोला दिखाई पड़ता था, उसमें चमक-दमक होती थी। लोग उसे देखते, उन कर्मकाण्डों को करते और सदियों तक याद रखते। आज भी रखते हैं। लेकिन प्रायः उनकी आत्मा अर्थात्‌ वह छोटा-सा शास्त्रीय काम जिसके लिए यह सारा ताम झाम किया गया, काल के बहाव में लुप्त हो जाता, क्योंकि उसके जानकार लोग कम रह जाते थे। आज भी महाराष्ट्र, कर्नाटक और आन्ध्र में रिवाज है कि चैत्र मास में छोटे-छोटे बच्चे, सिर पर तांबे का कलश लेकर नदी में नहाने जाते हैं। कलश को नीम के पत्तों से सजाया जाता है। गीले बदन नदी से देवीके मंदिर तक आकर कलश का पानी कुछ शीतला देवी पर चढ़ाते हैं और कुछ अपने सिर पर उंडेलते हैं। इसी प्रकार शीतला सप्तमी का व्रत भी प्रसिद्ध है जो श्रावण मास में किया जाता है।</p>
<p>संदर्भ –</p>
<ol>
<li>1. Colonizing the Body: State Medicine and Epidemic Disease in Nineteenth Century India – David Arnold (August 1993)</li>
<li>2. Medical History of British India</li>
<li>3. Public Health in British India: A Brief Account of the History of Medical Services and Disease Prevention in Colonial India – Muhammad Umair Mushtaq (January 2009)</li>
<li>4. War Against Smallpox – Michael Bennet</li>
<li>5. The Anarchy – William Darymple</li>
<li>6. An Era of Darkness – Shashi Tharoor</li>
<li>7. 18वीं शताब्दी में भारत में विज्ञान एवं तंत्रज्ञान – धरमपाल</li>
<li>8. Medical Encounters in British India – Deepak Kumar and Raj Sekhar Basu</li>
<li>9. The British in India – David Gilmour</li>
<li>10. The Social History of Health and Medicine in Colonial India – Biswamoy Pati and Mark Harrison</li>
</ol>
<p>और पढ़ें : <span style="color: #000080;"><strong><a style="color: #000080;" href="https://rashtriyashiksha.com/how-britishers-demolished-developed-education-system-of-bharat-lets-know-2/" target="_blank" rel="noopener">कैसे अंग्रेजों ने ध्वस्त की भारत की विकसित शिक्षा प्रणाली : आओ जाने – 2</a></strong></span></p>
<p>The post <a href="https://rashtriyashiksha.com/how-britishers-demolished-developed-medical-system-of-bharat-lets-know-3/">कैसे अंग्रेजो ने ध्वस्त की भारत की विकसित चिकित्सा प्रणाली : आओ जाने – 3</a> appeared first on <a href="https://rashtriyashiksha.com">राष्ट्रीय शिक्षा : शिक्षा में समाज प्रबोधन</a>.</p>
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