कैसे अंग्रेजो ने ध्वस्त की भारत की विकसित चिकित्सा प्रणाली : आओ जाने – 2

 – प्रशांत पोळ

भारतीय चिकित्सा प्रणाली, एक अत्यंत विकसित पद्धति थी। इन पश्चिम के डॉक्टर्स को जिसका अंदाज भी नहीं था, ऐसी ‘प्लास्टिक सर्जरी’ जैसी कठिन समझी जाने वाली शल्यक्रिया, भारतीय सैकड़ों वर्षों से करते आ रहे थे। अंग्रेजों ने भारत में यह चिकित्सा देखी, तो उसे वे इंग्लैंड ले गए। वहां से यह चिकित्सा पद्धति सारे यूरोप में और बाद में अमेरिका में भी फैली। अंग्रेजों को इस प्लास्टिक सर्जरी की जानकारी मिलने का किस्सा बड़ा मजेदार है –

सन् 1757 में अंग्रेजों ने प्लासी की लड़ाई जीत कर बंगाल और उड़ीसा के बड़े भूभाग पर सत्ता कायम की थी। किन्तु भारत जैसे विशाल देश में यह बहुत छोटा सा हिस्सा था। 1818 में अंग्रेजों का कब्जा लगभग पूरे देश पर हो गया। इस बीच के 61 वर्ष अंग्रेजों की कुटिल राजनीति के और उन्होंने लड़े हुए युद्धों के हैं। इन दिनों अंग्रेज़ दक्षिण में हैदर-टीपू सुल्तान से, मराठों से और उत्तर में मराठों के सरदार शिंदे और होलकर से लड़ रहे थे।

भारत में हैदर-टीपू के साथ हुई लड़ाईयों में अंग्रेजों को दो नए आविष्कारों की जानकारी हुई। (अंग्रेजों ने ही यह लिख रखा है) 1. युद्ध में उपयोग किया हुआ रॉकेट और 2. प्लास्टिक सर्जरी।

सन् 1769 से 1799 तक तीस वर्षों में, हैदर अली-टीपू सुलतान इन बाप-बेटे और अंग्रेजों में 4 बड़े युद्ध हुए। इनमें से एक युद्ध में अंग्रेजों की ओर से लड़ने वाला ‘कावसजी’ नाम का मराठा सैनिक और 4 तेलगु भाषी लोगों को टीपू सुलतान की फ़ौज ने पकड़ लिया। बाद में इन पाचों लोगों की नाक काटकर टीपू के सैनिकों ने, उनको अंग्रेजों के पास भेज दिया।

इस घटना के कुछ दिनों के बाद एक अंग्रेज कमांडर को एक भारतीय व्यापारी के नाक पर कुछ निशान दिखे। कमांडर ने उनको पूछा तो पता चला कि उस व्यापारी ने कुछ ‘चरित्र के मामले में गलती’ की थी, इसलिए उसको नाक काटने की सजा मिली थी। लेकिन नाक कटने के बाद, उस व्यापारी ने एक वैद्य जी के पास जाकर अपना नाक पहले जैसा करवा लिया था। अंग्रेज कमांडर को यह सुनकर आश्चर्य लगा। कमांडर ने उस कुम्हार जाति के वैद्य को बुलाया और कावसजी व उसके साथ के चार लोगों का नाक पहले जैसा करने के लिए कहा।

कमांडर की आज्ञा से, पुणे के पास के एक गांव में यह ऑपरेशन हुआ। इस ऑपरेशन के समय दो अंग्रेज डॉक्टर्स भी उपस्थित थे। उनके नाम थे – थॉमस क्रूसो और जेम्स फिंडले। इन दोनों डॉक्टरों ने, उस अज्ञात मराठी वैद्य द्वारा किए इस ऑपरेशन का विस्तृत समाचार ‘मद्रास गजेट’ में प्रकाशन के लिए भेजा। वह छपकर भी आया। विषय की नवीनता एवं रोचकता देखते हुए यह समाचार इंग्लैंड पहुंचा। लन्दन से प्रकाशित होने वाले ‘जेंटलमैन’ नामक पत्रिका ने इस समाचार को अगस्त 1794 के अंक में पुनः प्रकाशित किया। इस समाचार के साथ ऑपरेशन के कुछ छायाचित्र भी दिए गए थे।

जेंटलमैन में प्रकाशित ‘स्टोरी’ से प्रेरणा लेकर इंग्लैंड के जे. सी. कॉर्प नाम के सर्जन ने इसी पद्धति से दो ऑपरेशन किये। दोनों सफल रहे। फिर अंग्रेजों को और पश्चिम की ‘विकसित’ संस्कृति को प्लास्टिक सर्जरी की जानकारी मिली। पहले विश्व युद्ध में इसी पद्धति से ऐसे ऑपरेशन्स बड़े पैमाने पर हुए और वह सफल भी रहे।

असल में प्लास्टिक सर्जरी से पश्चिमी जगत का परिचय इससे भी पुराना है, वह भी भारत की प्रेरणा से। ‘एडविन स्मिथ पापिरस’ ने पश्चिमी लोगों के बीच प्लास्टिक सर्जरी के बारे में सबसे पहले लिखा, ऐसा माना जाता है। लेकिन रोमन ग्रंथों में इस प्रकार के ऑपरेशन का जिक्र एक हजार वर्ष पूर्व से मिलता है। अर्थात भारत में यह ऑपरेशन्स इससे बहुत पहले हुए थे। आज से पौने तीन हजार वर्ष पहले, ‘सुश्रुत’ नाम के शस्त्र-वैद्य (आयुर्वेदिक सर्जन) ने इसकी पूरी जानकारी दी है। नाक के इस ऑपरेशन की पूरी विधि सुश्रुत के ग्रंथ में मिलती है।

किसी विशिष्ट वृक्ष का एक पत्ता लेकर उसे मरीज के नाक पर रखा जाता है। उस पत्ते को नाक के आकार का काटा जाता है। उसी नाप से गाल, माथा या फिर हाथ/पैर, जहां से भी सहजता से मिले, वहां से चमड़ी निकाली जाती है। उस चमड़ी पर विशेष प्रकार की दवाइयों का लेपन किया जाता है। फिर उस चमड़ी को जहां लगाना है, वहां बांधा जाता है। जहां से निकाली हुई है, वहां की चमड़ी और जहां लगाना है, वहां पर विशिष्ट दवाइयों का लेपन किया जाता है। साधारणतः तीन हफ्ते बाद दोनों जगहों पर नई चमड़ी आती है और इस प्रकार से चमड़ी का प्रत्यारोपण सफल हो जाता है। इसी प्रकार से उस अज्ञात वैद्य ने कावसजी पर नाक के प्रत्यारोपण का सफल ऑपरेशन किया था।

नाक, कान और होंठों को व्यवस्थित करने का तंत्र भारत में बहुत पहले से चलता आ रहा है। बीसवीं शताब्दी के मध्य तक छेदे हुए कान में भारी गहने पहनने की रीति थी। उसके वजन के कारण छेदी हुई जगह फटती थी। उसको ठीक करने के लिए गाल की चमड़ी निकाल कर वहां लगाई जाती थी। उन्नीसवीं शताब्दी के अंत तक इस प्रकार के ऑपरेशन्स भारत में होते थे। हिमाचल प्रदेश का ‘कांगड़ा’ जिला तो इस प्रकार के ऑपरेशन्स के लिए प्रसिद्ध था। कांगड़ा यह शब्द ही ‘कान+गढ़ा’ ऐसे उच्चारण से तैयार हुआ है। डॉ. एस. सी. अलमस्त ने इस ‘कांगड़ा मॉडल’ पर बहुत कुछ लिखा है। वे कांगड़ा के ‘दीनानाथ कानगढ़िया’ नाम के नाक, कान के ऑपरेशन्स करने वाले वैद्य से स्वयं जाकर मिले। इन वैद्य के अनुभव डॉ. अलमस्त जी ने लिख कर रखे है। सन् 1404 तक की पीढ़ी की जानकारी रखने वाले ये ‘कान-गढ़िया’, नाक और कान की प्लास्टिक सर्जरी करने वाले कुशल वैद्य माने जाते हैं। ब्रिटिश शोधकर्ता सर अलेक्जेंडर कनिंघम (1814–1893) ने कांगड़ा की प्लास्टिक सर्जरी को बड़े विस्तार से लिखा है। अकबर के कार्यकाल में ‘बिधा’ नाम का वैद्य कांगड़ा में इस प्रकार के ऑपरेशन्स करता था, ऐसा फारसी इतिहासकारों ने लिख रखा है।

‘सुश्रुत’ की मृत्यु के लगभग ग्यारह सौ (1100) वर्षों के बाद ‘सुश्रुत संहिता’ और ‘चरक संहिता’ का अरबी भाषा में अनुवाद हुआ। यह कालखंड आठवीं शताब्दी का है। ‘किताब-ई-सुसरुद’ इस नाम से सुश्रुत संहिता मध्यपूर्व में पढ़ी जाती थी। आगे जाकर, जिस प्रकार से भारत की गणित और खगोलशास्त्र जैसी विज्ञान की अन्य शाखाएं, अरबी (फारसी) के माध्यम से यूरोप पहुंची, उसी प्रकार ‘किताब-ई-सुसरुद’ के माध्यम से सुश्रुत संहिता यूरोप पहुच गई। चौदहवीं-पंद्रहवीं शताब्दी में इस ऑपरेशन की जानकारी अरब-पर्शिया (ईरान)-इजिप्त होते हुए इटली पहुंची। इसी जानकारी के आधार पर इटली के सिसिली आयलैंड के ‘ब्रांका परिवार’ और ‘गास्परे टाग्लीया-कोसी’ ने कर्णबंध और नाक के ऑपरेशन्स करना प्रारंभ किया। किन्तु चर्च के भारी विरोध के कारण उन्हें ऑपरेशन्स बंद करने पड़े। और इसी कारण उन्नीसवीं शताब्दी तक यूरोपियन्स को प्लास्टिक सर्जरी की जानकारी नहीं थी।

ऋग्वेद का ‘आत्रेय (ऐतरेय) उपनिषद’ अति प्राचीन उपनिषदों में से एक है। इस उपनिषद में (1-1-4) ‘मां के उदर में बच्चा कैसे तैयार होता है’, इसका विवरण है। इसमें कहा गया है कि गर्भावस्था में सर्वप्रथम बच्चे के मुंह का कुछ भाग तैयार होता है। फिर नाक, आँख, कान, ह्रदय (दिल) आदि अंग विकसित होते हैं। आज के आधुनिक विज्ञान का सहारा लेकर, सोनोग्राफी के माध्यम से अगर हम देखते हैं, तो इसी क्रम से, इसी अवस्था से बच्चा विकसित होता है।

भागवत में लिखा है (2-10-22 और 3-26-55) की मनुष्य में दिशा पहचानने की क्षमता कान के कारण होती है। सन 1935 में डॉक्टर रोंस और टेट ने एक प्रयोग किया। इस प्रयोग से यह साबित हुआ कि मनुष्य के कान में जो वेस्टीब्यूलर (vestibular apparatus) होता है, उसी से मनुष्य को दिशा पहचानना संभव होता है।

अब यह ज्ञान हजारों वर्ष पहले हमारे पुरखों को कहां से मिला होगा..?

संक्षेप में, प्लास्टिक सर्जरी का भारत में ढाई से तीन हजार वर्ष पूर्व से अस्तित्व था। इसके पक्के सबूत भी मिले हैं। शरीर विज्ञान का ज्ञान और शरीर के उपचार यह हमारे भारत की सदियों से विशेषतः रही है। लेकिन ‘पश्चिम के देशों में जो खोज हुई है, वही आधुनिकता है और हमारा पुरातन ज्ञान यानि दकियानूसी है’, ऐसी गलत धारणाओं के कारण हम हमारी समृद्ध विरासत को नकारते रहे। इसी का फायदा अंग्रेजों ने उठाया और उन्होंने समृद्ध भारतीय चिकित्सा पद्धति को बदनाम और नष्ट करने के भरपूर प्रयास किए।

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