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	<title>अमृत महोत्सव - राष्ट्रीय शिक्षा : शिक्षा में समाज प्रबोधन rashtriyashiksha.com</title>
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	<title>अमृत महोत्सव - राष्ट्रीय शिक्षा : शिक्षा में समाज प्रबोधन rashtriyashiksha.com</title>
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		<title>राष्ट्र गौरव का अमृत पर्व</title>
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		<dc:creator><![CDATA[राष्ट्रीय शिक्षा]]></dc:creator>
		<pubDate>Tue, 16 Aug 2022 05:38:04 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[<p>&#160; &#160; कई दशकों के संघर्ष और तमाम क्रांतिकारियों के साहस के परिणामस्वरूप 15 अगस्त, 1947 को हम अपने देश के बड़े भू-भाग पर अपनी इच्छानुसार शासन और अन्य व्यवस्था&#8230; </p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p>&nbsp;</p>
<p>&nbsp;</p>
<p>कई दशकों के संघर्ष और तमाम क्रांतिकारियों के साहस के परिणामस्वरूप 15 अगस्त, 1947 को हम अपने देश के बड़े भू-भाग पर अपनी इच्छानुसार शासन और अन्य व्यवस्था को स्थापित करने का अधिकार प्राप्त कर सके। इसलिए स्वतंत्रता के 75 वर्ष पूर्ण होने के उपलक्ष्य में हम सबमें दिखने वाला उत्साह, देश में उत्सव जैसा वातावरण, अत्यंत स्वाभाविक व उचित ही है। स्वतंत्रता के इस अमृत महोत्सव पर अत्यंत आनंद और गौरव की भावना से ओतप्रोत डा. मोहनराव भागवत का आलेख&#8230;</p>
<p>कल (15 अगस्त) भारत की स्वतंत्रता के 75 वर्ष पूर्ण होंगे, स्वतंत्रता के अमृत महोत्सव के निमित्त समारंभ पहले ही शुरू हुए हैं, आगे वर्षभर भी चलते रहेंगे। जितना लंबा गुलामी का यह कालखंड था, उतना ही लंबा और कठिन संघर्ष भारतीयों ने स्वतंत्रता प्राप्ति हेतु किया। भारतीय जनता का विदेशी सत्ता के विरुद्ध यह संघर्ष भौगोलिक दृष्टि से सर्वव्यापी था। समाज के सब वर्गों में जिसकी जैसी शक्ति रही, उसने वैसा योगदान दिया। स्वतंत्रता प्राप्ति के सशस्त्र व नि:शस्त्र प्रयासों के साथ समाज जागृति व परिष्कार के अन्य कार्य भी समाज के व्यापक स्वतंत्रता संघर्ष के ही भाग बनकर चलते रहे। इन सब प्रयासों के चलते 15 अगस्त, 1947 को हम लोग भारत को अपनी इच्छानुसार, अपने लोगों के द्वारा चलाने की स्थिति में आ गए। ब्रिटिश राज्यकर्ताओं को यहां से विदाई देकर अपने देश के संचालन के सूत्र अपने हाथ में लिए। इस अवसर पर हमें, इस प्रदीर्घ संघर्ष में अपने त्याग तथा कठोर परिश्रम द्वारा, जिन वीरों ने इस स्वतंत्रता को हमारे लिए अर्जित किया, जिन्होंने सर्वस्व को होम कर दिया, प्राणों को भी हंसते-हंसते अर्पित कर दिया, (अपने इस विशाल देश में हर जगह, देश के प्रत्येक छोटे-छोटे भू-भाग में भी ऐसे वीर पराक्रम दिखा गए) उनका पता लगाकर उनके त्याग व बलिदान की कथा संपूर्ण समाज के सामने लाना चाहिए। मातृभूमि तथा देशबांधवों के प्रति उनकी आत्मीयता, उनके हित के लिए सर्वस्व त्याग करने की उनकी प्रेरणा तथा उनका तेजस्वी त्यागमय चरित्र आदर्श के रूप में हम सबको स्मरण करना चाहिए, वरण करना चाहिए।</p>
<p><strong>स्वतंत्रता प्रथम शर्त </strong></p>
<p>इस अवसर पर हमें अपने प्रयोजन, संकल्प तथा कर्तव्य का भी स्मरण करते हुए उनको पूरा करने के लिए पुन: एक बार कटिबद्ध व सक्रिय होना चाहिए। देश को स्वराज्य की आवश्यकता क्यों है? मात्र सुराज्य से, फिर वह किसी परकीय सत्ता से ही संचालित क्यों न हों, देश और देशवासियों के प्रयोजन सिद्ध क्या हो नहीं सकते? हम सब नि:संदिग्ध रूप से यह जानते हैं कि यह नहीं हो सकता। स्व की अभिव्यक्ति, जो प्रत्येक व्यक्ति व समाज की स्वाभाविक आकांक्षा है, स्वतंत्रता की प्रेरणा है। मनुष्य स्वतंत्रता में ही सुराज्य का अनुभव कर सकते हैं अन्यथा नहीं। स्वामी विवेकानंद ने ये कहा है कि प्रत्येक राष्ट्र का उदय विश्व में कुछ योगदान करने के लिए होता है। किसी भी राष्ट्र को विश्व जीवन में योगदान कर सकने के लिए स्वतंत्र होना पड़ता है। विश्व में अपने जीवन में स्व की अभिव्यक्ति द्वारा वह राष्ट्र विश्व जीवन में योगदान के कर्तव्य का निर्वाह करता है। इसलिए योगदान करने वाले राष्ट्र का स्वतंत्र होना, समर्थ होना यह उसके योगदान की पूर्व शर्त है।</p>
<p><strong>समझें इसका सही प्रयोजन</strong></p>
<p>देश की स्वतंत्रता के लिए भारतीय जनमन की जागृति करने वाले, स्वतंत्रता संग्राम में प्रत्यक्ष सशस्त्र अथवा निशस्त्र आंदोलन का मार्ग पकड़कर सक्रिय रहने वाले, भारतीय समाज को स्वतंत्रता प्राप्ति के व उस स्वतंत्रता की सम्हाल के लिए योग्य बनाने का प्रयास करने वाले सभी महापुरुषों ने भारत की स्वतंत्रता का प्रयोजन अन्यान्य शब्दों में बताया है। कवि रवींद्रनाथ ठाकुर ने अपनी प्रसिद्ध कविता “चित्त जेथा भयशून्य उन्नत जतो शिर” में स्वतंत्र भारत के अपेक्षित वातावरण का ही वर्णन किया है। स्वातंत्र्यवीर विनायक दामोदर सावरकर ने अपनी प्रसिद्ध स्वतंत्रता देवी की आरती में स्वतंत्रता देवी के आगमन पर सहचारी भाव से उत्तमता, उदात्तता, उन्नति आदि का अवतरण भारत में अपने आप होगा, ऐसी आशा व्यक्त की है। महात्मा गांधी ने उनके हिंद स्वराज में उनकी कल्पना के स्वतंत्र भारत का चित्र वर्णित किया है तथा डा. बाबासाहेब आंबेडकर ने देश की संसद में संविधान को रखते समय दिए दो भाषणों में भारत की इस स्वतंत्रता का प्रयोजन तथा वह सफल हो इसके लिए हमारे कर्तव्यों का नि:संदिग्ध उल्लेख किया है।</p>
<p><strong>चिंतन से जानें स्व की परिभाषा</strong></p>
<p>हमारी स्वतंत्रता के अमृत महोत्सव के इस आनंद और उत्साह से भरे पुण्य पर्व पर, हर्षोल्लासपूर्वक विभिन्न आयोजनों को संपन्न करने के साथ ही हमको अंतर्मुख होकर यह विचार भी करना चाहिए कि हमारी स्वतंत्रता का प्रयोजन यदि भारत के जीवन में स्व की अभिव्यक्ति से होने वाला है, तो वह भारत का स्व क्या है? विश्व जीवन में भारत के योगदान के उस प्रयोजन को सिद्ध करने के लिए हमको भारत को किस प्रकार शक्तिशाली बनाना होगा? इन कार्यों को संपन्न करने के लिए हमारे कर्तव्य क्या हैं?  उसका निर्वाह करने के लिए समाज को कैसे तैयार किया जाए? 1947 में हमने खुद को प्राणप्रिय भारतवर्ष का जो युगादर्श व तदनुरूप उसका युगस्वरूप खड़ा करने के लिए महत्प्रयासपूर्वक स्वाधीन कर लिया, वह कार्य पूर्ण करने हेतु यह चिंतन तथा हम सबके कर्तव्य के दिशा की स्पष्टता आवश्यक है।</p>
<p><strong>विविधता में है एकता</strong></p>
<p>भारतवर्ष की सनातन दृष्टि, चिंतन, संस्कृति तथा विश्व में अपने आचरण द्वारा प्रेषित संदेश की यह विशेषता है कि वह प्रत्यक्षानुभूत विज्ञानसिद्ध सत्य पर आधारित समग्र, एकात्म वह स्वाभाविक ही सर्वसमावेशी है। विविधता को वह अलगाव नहीं, एकात्मता की अभिव्यक्ति मात्र मानती है। वहां एक होने के लिए एक सा होना अविहित है। सबको एक जैसा रंग देना, उसकी अपनी जड़ों से दूर करना कलह व बंटवारे को जन्म देता है, अपनापन अपनी विशिष्टता पर पक्का रहकर भी अन्यों की विशिष्टताओं का आदर करते हुए सबको एक सूत्र में पिरोकर संगठित एक समाज के रूप में खड़ा करता है। मां भारती की भक्ति हम सबको उसके पुत्रों के नाते जोड़ती है। हमारी सनातन संस्कृति हमें सुसंस्कृत, सद्भावना व आत्मीयतापूर्ण आचरण का ज्ञान देती है। मन की पवित्रता से लेकर पर्यावरण की शुद्धता तक को बनाने बढ़ाने का ज्ञान देती है। प्राचीन काल से हमारी स्मृति में चलते आए हमारे सबके समान पराक्रमी शीलसंपन्न पूर्वजों के आदर्श हमारा पथनिर्देश कर ही रहे हैं। हम अपनी इस समान थाती को अपनाकर, अपनी विशिष्टताओं के सहित, परन्तु उनके संकुचित स्वार्थ व भेदभावों को संपूर्ण रूप से त्याग कर, स्वयं केवल देशहित को ही समस्त क्रियाकलापों का आधार बनाएं। संपूर्ण समाज को हम इसी रूप में खड़ा करें, यह समय की अनिवार्यता है, समाज की स्वाभाविक अवस्था भी!</p>
<p><img fetchpriority="high" decoding="async" class="alignnone wp-image-5712" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2022/08/images-1-300x150.jpeg" alt="राष्ट्र गौरव का अमृत पर्व" width="1722" height="861" srcset="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2022/08/images-1-300x150.jpeg 300w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2022/08/images-1.jpeg 640w" sizes="(max-width: 1722px) 100vw, 1722px" /></p>
<p><strong>करें स्वाधीनता की सुरक्षा</strong></p>
<p>काल के प्रवाह में प्राचीन समय से चलते आए समाज में रूढि़-कुरीतियों की बीमारी, जाति, पंथ, भाषा, प्रांत आदि के भेदभाव, लोकेषणा, वित्तेषणा के चलते खड़े होने वाले क्षुद्र स्वार्थ इत्यादि का मन-वचन-कर्म से संपूर्ण उच्चाटन करने के लिए, प्रबोधन के साथ-साथ स्वयं को आचरण के उदाहरण के रूप में ढालना होगा। अपनी स्वाधीनता की सुरक्षा करने का बल केवल वही समाज धारण करता है जो समतायुक्त व शोषण मुक्त हो। समाज को भ्रमित कर अथवा भड़काकर अथवा आपस में लड़ाकर स्वार्थ का उल्लू सीधा करना चाहने वालों अथवा द्वेष की आग को ठंडा करना चाहने वाली षडयंत्रकारी मंडलियां देश में व देश के बाहर से भी सक्रिय हैं। उन्हें यत्किंचित भी अवसर अथवा प्रश्रय न मिल पाए, ऐसा सजग, सुसंगठित, सामर्थ्यवान समाज ही स्वस्थ समाज होता है। आपस में सद्भावना के साथ समाज का नित्य परस्पर संपर्क तथा नित्य परस्पर संवाद फिर से स्थापित करने होंगे।</p>
<p><strong>बनाएं कानून व आचरण की मर्यादा</strong></p>
<p>स्वतंत्र व प्रजातांत्रिक देश में नागरिकों को अपने प्रतिनिधि चुनकर देने होते हैं। देश का समग्र हित, प्रत्याशी की योग्यता, तथा दलों की विचारधारा का समन्वय करने का विवेक, कानून, संविधान तथा नागरिक अनुशासन की सामान्य जानकारी व उनके आस्थापूर्वक पालन का स्वभाव, यह प्रजातांत्रिक रचना के सफलता की अत्यावश्यक पूर्वशर्त है। राजनीतिक हथकंडों के चलते इसमें आया क्षरण हम सबके सामने है। आपस के विवादों में अपनी वीरता को सिद्ध करने के लिए बरता जाने वाला वाणी असंयम (जो अब समाज माध्यमों में शिष्टाचार बनते जा रहा है) भी एक प्रमुख कारण है। नेतृवर्ग सहित हम सभी को ऐसे आचरण से दूर होकर नागरिकता का अनुशासन व कानून की मर्यादा की पालना व सन्मान का वातावरण बनाना पड़ेगा। खुद को तथा संपूर्ण समाज को इस प्रकार योग्य बनाए बिना विश्व में कहीं भी किसी भी प्रकार का परिवर्तन न आया, न यशस्वी हुआ। स्व के आधार पर स्वतंत्र देश का युगानुकुल तंत्र, प्रचलित तंत्र की उपयोगी बातों को देशानुकूल बनाकर स्वीकार करते हुए करना है तो समाज में स्व का स्पष्ट ज्ञान, विशुद्ध देशभक्ति, व्यक्तिगत तथा राष्ट्रीय अनुशासन तथा एकात्मता का चतुरंग सामर्थ्य चाहिए। तभी भौतिक ज्ञान, कौशल व गुणवत्ता, प्रशासन व शासन की अनुकूलता इत्यादि सहायक होते हैं।</p>
<p>स्वतंत्रता का अमृत महोत्सव हम सभी के लिए कठोर तथा सतत परिश्रम से पाई उस स्थिति का उत्सव है, जिसमें संकल्पबद्ध होकर उतने ही त्याग व परिश्रम से, हमें स्व आधारित युगानुकुल तंत्र के निर्माण द्वारा भारत को परम वैभव संपन्न बनाना है। आइए, उस तपोपथ पर हर्षोल्लासपूर्वक संगठित, स्पष्ट तथा दृढ़भाव से हम अपनी गति बढ़ाएं।</p>
<p>(लेखक राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक हैं।)</p>
<p>और पढ़ें : <span style="color: #000080;"><strong><a style="color: #000080;" href="https://rashtriyashiksha.com/amrit-parv-of-rashtra-gaurav/" target="_blank" rel="noopener">AMRIT PARV OF RASHTRA GAURAV</a></strong></span></p>
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		<title>AMRIT PARV OF RASHTRA GAURAV</title>
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		<dc:creator><![CDATA[राष्ट्रीय शिक्षा]]></dc:creator>
		<pubDate>Tue, 16 Aug 2022 05:17:19 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[अमृत महोत्सव]]></category>
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		<category><![CDATA[75th indipence day]]></category>
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					<description><![CDATA[<p> &#8211; Dr Mohan Bhagawat, Sarsanghchalak, RSS On 15th August’22, Bharat will complete 75 years of Independence. To celebrate this Amrit Mahotsav of Freedom, various programs and events have already begun and&#8230; </p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: right;"> &#8211; Dr Mohan Bhagawat, Sarsanghchalak, RSS</p>
<p><img decoding="async" class="alignnone wp-image-5705" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2022/08/Untitled-1-300x188.jpg" alt="" width="1699" height="1065" /></p>
<p>On 15<sup>th</sup> August’22, Bharat will complete 75 years of Independence. To celebrate this Amrit Mahotsav of Freedom, various programs and events have already begun and will continue throughout the year.</p>
<p>We are in a festive mood, but that does not mean that we don’t have any challenges or issues in front of us. Though some issues were resolved, some new issues have also emerged. Despite all obstacles, the happiness and joy of this Amrit Mahotsava is obvious and natural.</p>
<p>On 15th August 1947, after many centuries, we were able to establish self-governance and organize an arrangement of self-rule as per our wishes; under our system, under our flag, over a large area of the Bharat.</p>
<p>This independence also reminds us of the elongated period of slavery, hardships, and constant battles that Bharatiya fought without deviating from the sole goal of complete Independence.  From a geographical view, this struggle of the Bharatiya people against foreign powers was broad-based, widespread, and all-encompassing. All sections of society contributed to the freedom movement as per their ability, power, and strength. Society slowly grew aware of those components that were posing obstacles in the way of our freedom.</p>
<p>While the various armed and unarmed struggles for freedom kept strengthening, efforts were also undertaken to cleanse the society of social evils and to awaken the society to get organized to work with collective interest.</p>
<p>Thanks to these relentless efforts, on 15th August 1947, we arrived at a position to self-govern our land as per our will, as per our wish, as per our choice, by our very own people. From here on, we bid adieu to the British rulers and took control of running, operating, and administering our nation.</p>
<p>So, it is only appropriate and obvious, we relish this festive mood with enthusiasm and an atmosphere of celebrations as our motherland completes 75 years of independence.</p>
<p>During this extended &amp; protracted freedom battle, a significant number of people, who are real heroes, sacrificed everything including their lives. Their stories should be brought out and spread across society for the society to imbibe, adopt and be inspired by their character, sense of patriotism and their devotion towards motherland. (There were many small and big incidents, small and big events, small and big acts that left an everlasting impact on our vast nation)</p>
<p>The purpose, resolutions and the duties they worked for should be remembered and such focus rejuvenation ought to be dedicated to them.</p>
<p><strong>Why does the country need Swarajya?</strong></p>
<p><strong>Why can’t a county be controlled by an alien nation that does good for the citizens of the country and for the well-being of the nation?</strong></p>
<p>Self-rule and natural expression are fundamental for any society. Thus, the need for freedom provides instinctive inspiration. A country can be governed well only when it’s free and can decide for itself.</p>
<p>Swami Vivekananda once said, “Every nation takes birth and then it rises to contribute something meaningful to the life of the world.” To contribute to anything, the nation must be both free and capable at the same time. These are basic and thus essential.</p>
<p>Like Swami Vivekananda, several great people, who worked for the awakening the people of India and inspired the armed and unarmed revolution for the freedom movement, have described in their own ways why it is not only essential to achieve freedom but also how to handle and preserve it.</p>
<p>The revered RabindraNath Tagore, through his famous poem “चित्त जेथा भयशून्य, उन्नत जतो शिर” and Mahatma Gandhi, through his ‘Hind-Swaraj’ quotes elaborated on concepts about free Bharat. Freedom fighter Veer Savarkar in his famous Swatantra Devi Aarti spoke about collective well-being and sublime excellence. We also can’t miss out on the contribution and two famous speeches of Dr. B. R Ambedkar, where he spoke of the meaning, purpose, and reasoning of freedom and the duties every bharatiya should follow and pursue to build a great nation.</p>
<p>In line with the celebrations of Amrit Mahotsava, we should also introspect that if the very purpose of freedom was to achieve self–reliance, then, in 75 years, is Bharat completely self-reliant as yet?</p>
<p>If Bharat has to contribute meaningfully to the world, does it first need to stand on its own feet wholesomely, and has Bharat attained self-dependence across all spheres?</p>
<p>In 1947, we took an oath of making Bharat the greatest and bringing an era where Bharat will show the light, the path, and lead the rest of the world. But, for that, we need clarity, specificity, and a sense of direction in both our thoughts and actions.</p>
<p>The greatest characteristic of Bharat’s eternal vision, its thoughts, and its culture is oneness, wholesomeness, sampoorna.  This is the message it sends to the world by its conduct. Oneness is natural, free of conflict, all-inclusive, based on experienced,logical and scientific truth and  harmony that can sustain forever.</p>
<p>Diversity is a mere expression of unity and not an expression of differences. For being one, one need not be the same. If one forces it, then it leads to discord and disharmony. We need to understand and respect each other’s differences and take them all along to build a unified society.</p>
<p>We are all dedicated sons of MaaBharati. It is what connects us. Our eternal culture of being kind, friendly, loving with affinity gives rise to knowledge in our hearts. From the holiness of one’s heart to the cleanliness of nature, this purity gives rise to knowledge and wisdom. From ancient and historic times, our forefathers have been guiding us to progress, proceed and move ahead on this path of knowledge.</p>
<p><img decoding="async" class="alignnone wp-image-5704" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2022/08/Presentation12-e1660626563727-300x183.jpg" alt="" width="1720" height="1049" srcset="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2022/08/Presentation12-e1660626563727-300x183.jpg 300w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2022/08/Presentation12-e1660626563727-1024x625.jpg 1024w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2022/08/Presentation12-e1660626563727-768x468.jpg 768w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2022/08/Presentation12-e1660626563727.jpg 1174w" sizes="(max-width: 1720px) 100vw, 1720px" /></p>
<p>Understanding our commonality of being sons of the same soil, respecting the differences, leaving selfish attitudes behind, avoiding any discrimination and nation first approach in every context is the need of the hour. The entire society should come together and stand up with such beliefs.</p>
<p>Due to the passage of time, certain evils continue to plague our society &#8211; discrimination, petty selfishness, etc. These arise from the desire for worldly benefits, for wealth, and for materialistic gratification, etc., and complicit our mind, words, and deeds.</p>
<p>To be free from these entanglements, one has to lead an exemplary life of good conduct. Such enlightened souls (examples) help in building equitable societies. And such societies that are equitable and free from exploitation create an inner force that protects freedom.</p>
<p>There are enough agencies, powers, and people who are working in their selfish interests to divide society by confusing, provoking, or creating conflicts amongst various sections of the society. These groups operate not only within the country but also from outside the country. Only when the society is alert, well-organized and strong it can win over such forces that are bent to break it or divide it.</p>
<p>We must develop and establish constant and transparent communication channels within every single stratum of society.  In a free and democratic country, citizens have the right to choose and elect their representatives for themselves. Such representatives should pursue the work in the overall interest of the country to the best of their ability and discretion and should prefer national interest above the ideology of the parties. They must maintain general knowledge of the law, constitution, civil discipline and its faithful observance is most essential for a successful democracy<strong>.</strong> However, in recent times, some of these virtues have deteriorated. The erosion caused by it is due to the gimmicks of politics that are present in front of all of us.</p>
<p>During disputes among people, speech incontinence (which is now a general rule in social media) to prove bravery is also one of the major reasons why politics is moving away from the nation to parties; and from parties to just degrading others. Every one of us, including the leadership, should get away from such conduct and maintain the discipline of citizenship. The rule of law has to be followed and an atmosphere of respect has to be created.</p>
<p>Any kind of change anywhere in the world can only be brought about when society itself is capable, competent and effective. No change can exist over a long time if society is weak, vulnerable or fragile.</p>
<p>For the society to develop a system based on ‘Swa” by taking the good things in both the age-old system and the prevailing system it has to have four basic qualities – clear knowledge of ‘Swa’, patriotism, individual and societal discipline and a sense of unity.</p>
<p>Superior materialistic knowledge, high quality skills, good governance, administration etc., will only help that society and country which stands united.</p>
<p>At this time of celebrating ‘Azadika Amrit Mahotsava’, which we have achieved though great sacrifices and hardships, we have to continue to work hard with the same amount of dedication to take India to the pinnacle of its glory.</p>
<p>Let us accelerate on this journey with enthusiasm, clarity, and determination.</p>
<p><strong>Read More :</strong> <span style="color: #000080;"><strong><a style="color: #000080;" href="https://rashtriyashiksha.com/elixir-of-independence/" target="_blank" rel="noopener">स्वाधीनता का अमृत महोत्सव</a></strong></span></p>
<p>The post <a href="https://rashtriyashiksha.com/amrit-parv-of-rashtra-gaurav/">AMRIT PARV OF RASHTRA GAURAV</a> appeared first on <a href="https://rashtriyashiksha.com">राष्ट्रीय शिक्षा : शिक्षा में समाज प्रबोधन</a>.</p>
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		<title>स्वाधीनता का अमृत महोत्सव</title>
		<link>https://rashtriyashiksha.com/amrit-mahotsav-of-independence/</link>
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		<dc:creator><![CDATA[राष्ट्रीय शिक्षा]]></dc:creator>
		<pubDate>Tue, 16 Aug 2022 04:57:58 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[<p> &#8211; दत्तात्रेय होसबाले आज जब देश की स्वाधीनता को ७५ वर्ष हो रहे हैं तो इस अवसर पर देश का हर नागरिक उल्लासित है। हमारे देश ने तमाम व्यवधानों और&#8230; </p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: right;"> &#8211; दत्तात्रेय होसबाले</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone  wp-image-5707" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2022/08/Untitled-112-300x188.jpg" alt="" width="1615" height="1012" srcset="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2022/08/Untitled-112-300x188.jpg 300w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2022/08/Untitled-112-768x480.jpg 768w" sizes="auto, (max-width: 1615px) 100vw, 1615px" /></p>
<p>आज जब देश की स्वाधीनता को ७५ वर्ष हो रहे हैं तो इस अवसर पर देश का हर नागरिक उल्लासित है। हमारे देश ने तमाम व्यवधानों और संकटों को पार करते हुए इन ७५ वर्षों की यात्रा तय की है। यह यात्रा अपने आप में रोमांचित करने वाली है। आज जब हमारे देश की स्वाधीनता को ७५ वर्ष हो रहे हैं तो देश की उपलब्धियां, चुनौतियाँ सभी हमारे सामने हैं। कैसे एक राष्ट्र ने स्वतंत्र होते ही विभाजन जैसी त्रासदी का सामना किया और विभाजन के कारण हुई हिंसा का दंश झेला। इसके तुरंत बाद सीमा पर आक्रमण का सामना किया, परन्तु ये चुनौतियाँ हमारे राष्ट्र के सामर्थ्य को हरा नहीं पायीं। हमारा राष्ट्र इन चुनौतियों का सामना करते हुए अपने लोकतंत्र की बुनियाद को मजबूत करता रहा। आज हम केवल कल्पना कर सकते हैं कि कैसे हमारे देश के नागरिकों ने विभाजन और आक्रमण के दुःख झेलने के बाद १९५२ में लोकतंत्र के सबसे बड़े पर्व को मनाया और भारत में लोकतान्त्रिक सरकार की स्थापना की।</p>
<p>यह भारतवासियों का सामर्थ्य और इच्छाशक्ति ही थी, जिसने १९४७ के बाद लगातार भारत के छूटे हुए हिस्से गोवा, दादरा एवं नगर हवेली, हैदराबाद और पुड्डुचेरी को फिर भारत भूमि में मिलाने का प्रयास जारी रखा और अंत में नागरिक प्रयासों से लक्ष्य की प्राप्ति की। कई बार यह प्रश्न आता है कि एक राष्ट्र जिसको राजनीतिक स्वतंत्रता केवल कुछ वर्षों पूर्व मिली हो, इतना जल्दी कैसे कर सकता है? इसको समझने के लिए हमें भारत के समाज को समझना होगा। भारत का समाज सभी प्रकार के आक्रमण और संकट को सहते हुए भी अपने एकता के सूत्र को नहीं भूला। यदि भारत के स्वतंत्रता संग्राम को समझने का प्रयास करेंगे तो पाएंगे कि संघर्ष के पदचिन्ह नगरों, ग्रामों, जंगलों, पहाड़ों व तटीय क्षेत्रों हर जगह मिलते हैं। चाहे संथाल का विद्रोह हो या दक्षिण के वीरों का सशस्त्र संघर्ष, आपको सभी संघर्षों में एक ही भाव मिलेगा। सभी लोग किसी भी कीमत पर स्वाधीनता चाहते थे और वो यह स्वाधीनता केवल अपने लिए ही नहीं, अपितु अपने समाज और सम्पूर्ण राष्ट्र के लिए चाहते थे।</p>
<p>स्वाधीनता के लिए भारतीय समाज की व्याकुलता इतनी थी कि वह इसके लिए हर प्रकार के त्याग और हर प्रकार के मार्ग पर चलने को इच्छुक थे। यही कारण है कि भारत की स्वतंत्रता के लिए लन्दन, यूएस, जापान हर जगह से प्रयास हुए। लन्दन स्थित इंडिया हाउस तो भारतीय स्वाधीनता का एक प्रमुख केंद्र बन गया था।</p>
<p>भारत का स्वाधीनता आन्दोलन इतना व्यापक था कि उसने भौगोलिक, आर्थिक और सामाजिक सभी विभाजनों के परे जाकर भारत के जनमानस को एक किया। इसके लिए किसी एक का नाम लेना बेमानी होगा क्योंकि भारत के स्वाधीनता आन्दोलन में अनेकों लोगों ने अपने प्राणों की आहुति दी। इनमें से कुछ का नाम हम जानते हैं और कुछ का नाम नहीं जानते हैं। यह एक आन्दोलन था, जिसके असंख्य नायक थे। मगर हर नायक का मकसद एक ही था।</p>
<p>यही कारण है कि स्वाधीनता के बाद देश को परम वैभव की ओर ले जाने का भाव देश की जनता के मन में था और यह इसके लिए राजनीतिक नेतृत्व पर निर्भर नहीं था। इसी कारण जब देश की लोकतान्त्रिक व्यवस्था पर हमले का प्रयास, आपातकाल के रूप में हुआ तो देश की जनता ने उसकी सम्हाल की और स्वयं ही संघर्ष किया।</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone wp-image-5701" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2022/08/Presentation1-300x169.jpg" alt="" width="1725" height="972" srcset="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2022/08/Presentation1-300x169.jpg 300w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2022/08/Presentation1-1024x576.jpg 1024w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2022/08/Presentation1-768x432.jpg 768w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2022/08/Presentation1.jpg 1280w" sizes="auto, (max-width: 1725px) 100vw, 1725px" /></p>
<p>आज जब हमारी स्वाधीनता को ७५ वर्ष हो रहे हैं तो हमें यह भी विचार करना होगा कि स्वाधीनता के शताब्दी वर्ष तक हमारे लक्ष्य क्या होंगे? आज जब सम्पूर्ण विश्व कोरोना और वैश्विक अस्थिरता के दौर से गुजर रहा है तो एक राष्ट्र के रूप में हमारे क्या लक्ष्य होने चाहियें? इसमें कोई संदेह नहीं कि पिछला दशक भारत के लिए अनेकों उपलब्धियों से भरपूर रहा है। चाहे वह भारत के नागरिकों को मूलभूत सुविधाएँ उपलब्ध करने का विषय हो, जिसमें स्वास्थ्य, आवास और वित्तीय समावेशन का विषय हो, यह सब यही परिलक्षित करता है कि भारत का समाज और नागरिक सशक्त हो रहा है। यह भारत की मेधा शक्ति ही है, जिसने कोरोना के समय, सबसे कम समय में सबसे सस्ती और सबसे सुरक्षित वैक्सीन का निर्माण किया। जिसने पूरे विश्व की सहायता की और करोड़ों जीवन की रक्षा की।</p>
<p>इन सभी बातों के बाद भी, भारतीय समाज और एक राष्ट्र के रूप में हमें कई आंतरिक और बाह्य संकटों का न केवल सामना करना है, अपितु उसका समाधान भी ढूँढना है। भारत को अभी भी समरसता के लिए और प्रयास करने होंगे क्योंकि समाज जितना समरस होगा, उतना सशक्त होगा। इसलिए इस पर और भी कार्य करने की आवश्यकता है। आज भारतीय अर्थव्यवस्था तमाम संकटों के बाद भी आगे बढ़ रही है, मगर भारत की बढ़ी आबादी की आकांक्षाओं को पूरा करने के लिए इसे और तेजी से प्रगति करनी होगी। इसके लिए आवश्यक है कि हम भारतीय उद्योगों और उपक्रमों को बढ़ावा दें। इसके बिना हम भारत की रोजगार की अपेक्षा को पूरा नहीं कर पाएंगे। भारत सही मायने में तभी सशक्त होगा, जब भारत स्वावलंबी होगा।</p>
<p>भारत की स्वाधीनता को जब आज ७५ वर्ष पूरे हो रहे हैं तो यह आवश्यक है कि हम विचार करें कि क्या भारत के नीति प्रतिष्ठान, वर्तमान के भारत की आकांक्षाओं और अपेक्षाओं के अनुरूप हैं। अगर वह नहीं हैं तो उसमे परिवर्तन कैसे हो सकता है, इस पर भी विचार की आवश्यकता है। आज हम बहुत सी ऐसी व्यवस्था देखते हैं, जिसमें एक साधारण आदमी अपने को असहज और असमर्थ पाता है, चाहे वह आज की न्यायिक व्यवस्था हो या राजनीतिक व्यवस्था। ये एक साधारण आदमी की पहुंच में सहजता और सुलभता से कैसे पहुंचे, इस पर विचार करने की आवश्यकता है।</p>
<p>भारत वैश्विक चुनौतियों का सामना तभी कर सकता है, जब उसकी आंतरिक व्यवस्था मजबूत हो और आंतरिक व्यवस्था न केवल आर्थिक या न केवल सामाजिक सशक्तिकरण पर निर्भर है। भारत की आंतरिक व्यवस्था का समाधान आर्थिक और सामाजिक दोनों चुनौतियों के समाधान में निहित है।</p>
<p>(लेखक राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरकार्यवाह है।)</p>
<p><strong>और पढ़े</strong> : <span style="color: #000080;"><strong><a style="color: #000080;" href="https://rashtriyashiksha.com/freedom-of-education-on-the-amrit-mahotsav-of-independence/" target="_blank" rel="noopener">स्वतंत्रता के अमृत महोत्सव पर शिक्षा की स्वतंत्रता</a></strong></span></p>
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		<title>स्वतंत्रता के अमृत महोत्सव पर शिक्षा की स्वतंत्रता</title>
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		<dc:creator><![CDATA[राष्ट्रीय शिक्षा]]></dc:creator>
		<pubDate>Mon, 15 Aug 2022 05:31:12 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[अमृत महोत्सव]]></category>
		<category><![CDATA[कुलदीप मेहंदीरत्ता]]></category>
		<category><![CDATA[नवीनतम]]></category>
		<category><![CDATA[Aazadi Ka Amrit Mahotsav]]></category>
		<category><![CDATA[Bhartiya Education]]></category>
		<category><![CDATA[education]]></category>
		<category><![CDATA[indian education]]></category>
		<category><![CDATA[Rashtriya Shikaha]]></category>
		<category><![CDATA[आजादी का अमृत महोत्सव]]></category>
		<category><![CDATA[राष्ट्रीय शिक्षा]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>-डॉ. कुलदीप मेहंदीरत्ता यह एक सर्वमान्य तथा सर्वस्वीकृत तथ्य है कि भारत 15 अगस्त 1947 को स्वतंत्र हुआ था। 1757 में प्लासी के युद्ध से लेकर 1947 तक भारतीयों ने&#8230; </p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: right;">-डॉ. कुलदीप मेहंदीरत्ता</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="wp-image-5687 aligncenter" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2022/08/Photo_-9-300x225.jpg" alt="भारतीय भाषा" width="559" height="419" srcset="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2022/08/Photo_-9-300x225.jpg 300w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2022/08/Photo_-9-1024x768.jpg 1024w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2022/08/Photo_-9-768x576.jpg 768w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2022/08/Photo_-9.jpg 1280w" sizes="auto, (max-width: 559px) 100vw, 559px" /></p>
<p>यह एक सर्वमान्य तथा सर्वस्वीकृत तथ्य है कि भारत 15 अगस्त 1947 को स्वतंत्र हुआ था। 1757 में प्लासी के युद्ध से लेकर 1947 तक भारतीयों ने अंग्रेजों की गुलामी से छुटकारा पाने के लिए हर संभव उपाय किए। इन लगभग 200 वर्षों में साम्राज्यवादी तथा उपनिवेशवादी ब्रिटिश शासन के दौरान भारत की सामाजिक और सांस्कृतिक जड़ों को निर्मूल करने के लिए प्रयास निरंतर किया गया। ऐसा कहा जाता है कि अगर किसी देश को पूरी तरह से जीतना है तो वहां के नागरिकों के सामाजिक और सांस्कृतिक मनोविज्ञान को बदलना होगा। अंग्रेजों ने भारत में अपने साम्राज्य को स्थाई बनाने के लिए भारत में तत्कालीन प्रचलित शिक्षा प्रणाली को बदल दिया। 1835 के मैकाले मिनट्स की अनुपालना में लागू की गई शिक्षा प्रणाली भारतीय समाज की अनुकूल नहीं थी, क्योंकि इसने तात्कालिक समाज को राष्ट्रीय चेतना की जड़ों से काट दिया।</p>
<p>स्वतंत्रता अथवा स्वतंत्र शब्द अत्यंत व्यापक शब्द है जहां आजादी शब्द एक सामान्य अर्थ का द्योतक है वही स्वतंत्र शब्द आजादी से अगले चरण का अनुभव करने वाला शब्द है क्योंकि आजादी का सामान्य अर्थ हुआ कि हमने किसी बंधन से मुक्ति पा ली जैसे कि 1947 में भारत ने ब्रिटिश साम्राज्य से। लेकिन स्वतंत्र शब्द का अर्थ इसलिए व्यापक है कि इसमें हमने ‘स्व’ अर्थात अपने तंत्र की स्थापना का उद्देश्य भी सम्मिलित है जो कि राजनीतिक मुक्ति से आगे की बात है और साथ ही साथ यह अत्यंत महत्वपूर्ण और अपेक्षित है।</p>
<blockquote><p><span style="font-family: georgia, palatino, serif;"><strong>जब हम ‘स्वतंत्र’ की बात करते हैं तो शिक्षा के संदर्भ में स्वतंत्र शब्द का अर्थ होना चाहिए था कि “अपनी संस्कृति, अपने विचार, अपनी आवश्यकता, अपने समाज</strong><strong>, </strong><strong>और अपनी जनसंख्या के अनुसार अपनी शिक्षा प्रणाली का तंत्र खड़ा करना”, अर्थात “भारत की</strong><strong>,</strong><strong> भारतीयों द्वारा, भारतीय भाषा में तथा भारतीयों के लिए शिक्षा” व्यवस्था की स्थापना।</strong></span></p></blockquote>
<p>शिक्षा में ‘स्वतंत्र’ अर्थात भारतीय दृष्टि से, भारतीय वातावरण के अनुसार, भारतीय जनमानस के लिए भारतोपयोगी शिक्षा का तंत्र हम नहीं खड़ा कर पाए। हमने अंग्रेजों द्वारा प्रतिपादित शिक्षा प्रणाली का न केवल अनुसरण जारी रखा बल्कि आधुनिकता और वैज्ञानिक दृष्टिकोण के नाम पर पाश्चात्य शिक्षा प्रणाली को और अधिक समृद्ध और पालित-पोषित किया। यह विधि की विडम्बना ही कही जा सकती है कि मुग़ल शासन के बाद आए ब्रिटिश शासन ने पुरातन भारतीय शिक्षा प्रणाली को ध्वस्त कर दिया। इस विध्वंस से पहले भारतीय शिक्षा के विकसित होने के  प्रमाण १९३८ में पंडित सुन्दरलाल की प्रकाशित पुस्तक ‘भारत में अंग्रेजी राज’, सईद नुरुल्ला तथा जे.पी. नायक की १९४३ में प्रकाशित पुस्तक ‘हिस्ट्री ऑफ़ एजुकेशन इन इंडिया ड्यूरिंग द ब्रिटिश पीरियड’, एस. एम्. जाफ़र की १९३६ में प्रकाशित पुस्तक ‘एजुकेशन इन मुस्लिम इण्डिया’, विलियम एडम की ‘रिपोर्ट्स ऑन द स्टेट ऑफ़ एजुकेशन इन बंगाल (१८३५ व १८३८) आदि में देखे जा सकते हैं।</p>
<p>आजादी के बाद के कालखंड में हम इसका एक बड़ा कारण तो यह है तत्कालीन परिस्थितियों में राजनीतिक स्वतंत्रता सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण लक्ष्य था, और फिर लगभग ५६५ रियासतों और रजवाड़ों को एक भारत के रूप में आकार दे पाना एक बहुत बड़ी चुनौती थी। इसके अलावा आर्थिक दृष्टि से भी भारत के समक्ष पुनर्निर्माण की एक बहुत बड़ी चुनौती हमारे सामने थी। प्रशासनिक दृष्टि से हम अंग्रेजी संसदीय प्रणाली को अपना चुके थे और शिक्षा के क्षेत्र में भी अंग्रेज बहुत अधिक परिवर्तन कर चुके थे। ब्रिटिश शासन ने प्राचीन शिक्षा प्रणाली से हमारे समाज को बिलकुल काट दिया था और स्वतन्त्रता संघर्ष में भाग लेने वाली पीढ़ी का एक बड़ा भाग तात्कालिक शिक्षा प्रणाली से जुड़ा हुआ था इसके अतिरिक्त कहीं ना कहीं अंग्रेजों की श्रेष्ठता और प्रभुत्व का हम भारतीयों पर अत्यधिक प्रभाव था जिसके कारण सम्भवत: हम भारतीय भी अधिक परिवर्तनों के आकांक्षी नहीं थे। ऐसे वातावरण में जहां राजनीतिक एकीकरण और आर्थिक पुनर्निर्माण का बहुत बड़ा लक्ष्य सामने हो ऐसे में शिक्षा व्यवस्था के परिष्कार पर उतना ध्यान नहीं दिया जा सका जितना दिया जाना चाहिए था।</p>
<p>राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के शिक्षा के ‘स्वतंत्र’ की स्थापना के बारे में विचार अत्यंत महत्त्वपूर्ण हैं। महात्मा गाँधी ने २० अक्तूबर १९३१ को लन्दन में रॉयल इंस्टिट्यूट ऑफ़ इंटरनेशनल अफेयर्स’ में श्रोताओं को सम्बोधित करते हुए कहा कि पिछले पचास सौ वर्षों में भारत की शिक्षा और साक्षरता में जो कमी आई है उसके लिए ब्रिटिश सरकार जिम्मेदार है। महात्मा गाँधी भारत की परिस्थितियों और भारतीयों की आवश्यकताओं को भली भांति समझते थे। उनकी बुनियादी शिक्षा वास्तव में भारत के पुनर्निर्माण की प्रस्तावना थी जिसमें उन्होंने बल दिया कि विद्यार्थियों की मातृभाषा में शिक्षा हो, भारत की विशाल जनसंख्या को ध्यान में कहते हुए हस्त कौशल द्वारा प्रत्येक हाथ को काम अर्थात प्रत्येक भारतीय आत्म-निर्भर हो, श्रम की गरिमा की स्थापना हो। परन्तु यह विडम्बना ही कही जा सकती है कि उनकी राष्ट्र-निर्माण की व्यावहारिक और मूलभूत बात को हम भारतवासी ही भुला बैठे।</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="wp-image-5689 aligncenter" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2022/08/IMG-20170722-WA0027-300x169.jpg" alt="भारतीय खेलकूद" width="570" height="321" srcset="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2022/08/IMG-20170722-WA0027-300x169.jpg 300w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2022/08/IMG-20170722-WA0027-1024x576.jpg 1024w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2022/08/IMG-20170722-WA0027-768x432.jpg 768w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2022/08/IMG-20170722-WA0027.jpg 1032w" sizes="auto, (max-width: 570px) 100vw, 570px" /></p>
<p>१९४७ के बाद शिक्षा के स्वतंत्र को खड़ा करने के कई प्रयास किये गये थे, जिन्हें विभिन्न शिक्षा नीतियों, शिक्षा आयोगों तथा समितियों के प्रतिवेदनों आदि के सन्दर्भ में देखा और समझा जा सकता है। परन्तु इनमें भी आधुनिकता, वैश्विक प्रतियोगिता, रोजगार के अंतरराष्ट्रीय अवसरों, अंग्रेजी भाषा की विश्व व्यापकता और स्वीकार्यता, वैज्ञानिक दृष्टिकोण विकसित करने के नाम पर पाश्चात्य शिक्षा का अनुसरण और विकास ही जारी रखा गया। इस प्रकार हम भारतीय नागरिक, विकास तथा तथाकथित वैज्ञानिक शिक्षा के नाम पर भारत और भारतीय मूल्यों से दूर होते चले गए। हालांकि यह कहना अनुचित होगा कि शिक्षा के भारतीयकरण अथवा ‘स्वतंत्र’ विकसित करने के कोई प्रयास नहीं किए गए, कारण भले ही कुछ भी रहे हों, लेकिन जिस गति और इच्छा-शक्ति से ये किया जाना चाहिए था, वैसा किया नही जा सका।</p>
<p>रोजगार के क्षेत्र में, विद्यार्थी वर्ग के चरित्र निर्माण का महान लक्ष्य, प्रत्येक विद्यार्थी के व्यक्तित्व में नैतिक मूल्यों के समावेश, स्वदेशी शिक्षा और उत्पादन प्रणाली का अधिकाधिक प्रसार, मातृभाषा में शिक्षा की व्यवस्था, प्रत्येक हाथ को काम अर्थात सभी आत्म-निर्भर हों, सभी के पास कोई न कोई कौशल हो, मातृभाषा में सभी को शिक्षा मिले, अपने राष्ट्र, अतीत और संस्कृति के प्रति गौरव का भाव हो, समानता आधारित तथा भेदभाव रहित सर्व-समावेशी समाज का विकास हो। <em>इस प्रकार भारत के देश</em><em>,</em><em> काल और वातावरण के आधार पर विद्यार्थी के समग्र विकास अर्थात उसके चरित्र निर्माण</em><em>,</em><em> व्यक्तित्व विकास के साथ आदर्श और आत्म-निर्भर नागरिक के रूप में विकसित करने के ध्येय लेकर चलने वाली शिक्षा का विकास ही शिक्षा में ‘स्वतंत्र</em><em>’</em><em> की स्थापना करना है।</em></p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>ये भी पढ़े</strong></span><span style="color: #0000ff;"><strong> <a style="color: #0000ff;" href="https://rashtriyashiksha.com/the-great-festival-of-removal-of-misconceptions-amrit-mahotsav-of-freedom/" target="_blank" rel="noopener">भ्रान्तियों के निवारण का महापर्व : आजादी का अमृत महोत्सव – 1</a></strong></span></p>
<p>(लेखक विद्या भारती विद्वत परिषद के अखिल भारतीय संयोजक है एवं कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय, कुरुक्षेत्र-हरियाणा में राजनीति शास्त्र के प्रोफेसर है।)</p>
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		<title>कारगिल युद्ध में भारतीय सेना का कीर्तिमान</title>
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		<dc:creator><![CDATA[राष्ट्रीय शिक्षा]]></dc:creator>
		<pubDate>Fri, 12 Aug 2022 11:17:08 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[अमृत महोत्सव]]></category>
		<category><![CDATA[india vs pakistan]]></category>
		<category><![CDATA[Indian]]></category>
		<category><![CDATA[Indian Army]]></category>
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					<description><![CDATA[<p> &#8211; देवेंद्र सैनी भारत की स्वतंत्रता के समय से ही भारत और पाकिस्तान के संबंध अच्छे नहीं रहे। उसका मुख्य कारण है कश्मीर घाटी. जनसंख्या के आधार पर 1947 में&#8230; </p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: right;"> &#8211; देवेंद्र सैनी</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone wp-image-5667" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2022/08/Indian-Army-Memorial-300x169.jpg" alt="" width="1725" height="972" srcset="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2022/08/Indian-Army-Memorial-300x169.jpg 300w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2022/08/Indian-Army-Memorial-1024x576.jpg 1024w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2022/08/Indian-Army-Memorial-768x432.jpg 768w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2022/08/Indian-Army-Memorial.jpg 1200w" sizes="auto, (max-width: 1725px) 100vw, 1725px" /></p>
<p>भारत की स्वतंत्रता के समय से ही भारत और पाकिस्तान के संबंध अच्छे नहीं रहे। उसका मुख्य कारण है कश्मीर घाटी. जनसंख्या के आधार पर 1947 में देश बंटवारा हुआ था। जिस जगह ज्यादा मुसलमान आबादी थी वह पाकिस्तान बना और जहां ज्यादा हिंदू रहते थे वह हिंदुस्तान या भारत बना। पाकिस्तान चाहता था कि कश्मीर उसका हिस्सा बने क्योंकि कश्मीर घाटी की ज्यादा जनसंख्या मुसलमान थी परंतु कश्मीर घाटी के अलावा जम्मू और लद्दाख में मुसलमान की संख्या बिल्कुल नहीं थी या कम थी इसलिए वहां के राजा चाहते थे कि वह एक स्वतंत्र राष्ट्र की तरह से रहें।</p>
<p>जैसे ही देश आजाद हुआ पाकिस्तान ने 1947-48 में कश्मीर पर आक्रमण कर दिया और अंतरराष्ट्रीय जगत को कहा कि यह पाकिस्तान सेना नहीं है। यह कबायली लोग हैं जिन्होंने विद्रोह किया है। कश्मीर के राजा ने जब भारत की सेना से मदद मांगी तो भारत की सेना ने कहा कि आप अभी तक भारत का हिस्सा नहीं बने हैं इसलिए हम अपनी सेना को आप की भूमि पर लड़ाई करने के लिए नहीं भेज सकते क्योंकि यह अंतरराष्ट्रीय नियमों के विरुद्ध है। फिर कश्मीर के राजा के निर्णय के अनुसार कश्मीर का विधिवत भारत में विलय हो गया। भारत ने अपनी सेना भेजी और पाकिस्तान की सेना को हमने बुरी तरह से हरा दिया।</p>
<p>इसी तरह की एक घटना 1965 में हुई जब पाकिस्तान ने भारत पर आक्रमण किया तो भारत की सेनाओं ने मुंह तोड़ जवाब दिया। भारत की बहादुर सेना ने लाहौर तक जीत लिया था। अंतरराष्ट्रीय दबाव में समझौता हुआ और उस समझौते में भारत ने जीता हुआ हिस्सा पाकिस्तान को वापस लौटा दिया। फिर 1971 में भारत ने तत्कालीन <strong>पूर्वी पाकिस्तान</strong> को आजाद कराया और <strong>बांग्लादेश</strong> का निर्माण किया। इस युद्ध में भारत की बहादुर सेना ने पाकिस्तानी कायर सेना को आत्मसमर्पण करने के लिए मजबूर कर दिया। और इस तरह से लगभग 90000 पाकिस्तानी सैनिकों ने भारत के सामने आत्मसमर्पण कर दिया।</p>
<p>बार-बार युद्ध हार कर और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी बेइज्जती कराने के बाद पाकिस्तान को यह अच्छी तरह से पता लग चुका है कि वह प्रत्यक्ष रूप में भारत के साथ किसी भी युद्ध में जीत नहीं सकता इसलिए पाकिस्तान ने छद्म युद्ध को बढ़ावा दिया। भारत में उसने धार्मिक आतंकवाद पनपाया और समय-समय पर भारत की सीमाओं पर बमबारी करके और आतंकवादी भेजकर भारत को अस्थिर करने का प्रयास करता रहा है।</p>
<p>यह सत्य है कि हम अपने पड़ोसी नहीं बदल सकते। अपने पड़ोसी देशों के साथ अच्छे रिश्ते होने चाहिए इसलिए भारत की ओर से शांति के अनेक प्रयास हुए। शांति प्रयासों के क्रम में 1999 के प्रारंभ में तत्कालीन प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी वाजपेई जी जब स्वयं शांति प्रयासों को आगे बढ़ाने के लिए लाहौर बस यात्रा कर रहे थे, ठीक उसी समय पाकिस्तान की सेना भारत की पीठ में छुरा घोपने की तैयारी में लगी हुई थी और उसने भारत के कारगिल क्षेत्र के द्रास सेक्टर की पहाड़ियों पर पीछे से अपने सैनिकों को भेजकर पहाड़ियों पर अवैध कब्जा कर लिया और वहां पर बंकर बना लिए।</p>
<p>सामरिक दृष्टि से यह क्षेत्र भारत के लिए बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि कश्मीर को लेह लद्दाख से जोड़ने के लिए तथा चीन और पाकिस्तान की सीमा तक जाने के लिए एकमात्र मुख्य मार्ग इन्हीं पहाड़ियों के नीचे से जाता है।</p>
<p>पाकिस्तान की सेना मुजाहिदीन के भेष में अवैध रूप से इन पहाड़ियों पर उपस्थित थी और भारत के इस मुख्य मार्ग को सीधे-सीधे नियंत्रित कर सकती थी।</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone wp-image-5668" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2022/08/987123-915403-kargil1-300x169.jpg" alt="" width="1727" height="973" srcset="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2022/08/987123-915403-kargil1-300x169.jpg 300w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2022/08/987123-915403-kargil1-1024x576.jpg 1024w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2022/08/987123-915403-kargil1-768x432.jpg 768w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2022/08/987123-915403-kargil1.jpg 1280w" sizes="auto, (max-width: 1727px) 100vw, 1727px" /></p>
<p>भारत की सेना के सामने बहुत बड़ी चुनौती थी। दोनों देश परमाणु क्षमता संपन्न देश है. थोड़ी भी चूक होती तो दोनों देशों के बीच परमाणु युद्ध छिड़ सकता था। एक कठिन चुनौती यह भी थी कि यह स्थान लगभग 18000 फीट की ऊंचाई पर स्थित है, जहां पर ऑक्सीजन की बहुत कमी रहती है और सांस लेने में बेहद कठिनाई होती है। अगर सीधे-सीधे हवाई हमला करें तो हो सकता था कि हमारे युद्धक विमान पाकिस्तान की सीमा में गलती से प्रवेश कर जाए क्योंकि आसानी से हवाई जहाज को कम दूरी में नियंत्रित नहीं किया जा सकता. एक चुनौती यह भी थी कि हम नीचे थे और शत्रु ऊपर था। हमारे सैनिक जब भी पहाड़ पर चढ़ने का प्रयास करते तो शत्रु हमें बहुत आसानी से देख लेता था और हमारे सैनिकों को शहीद कर देता था। शत्रु एक से अधिक चोटियों पर कब्जा जमाए हुए बैठे थे यदि हम बायीं चोटी पर चढ़ते तो हम पर दायीं चोटी से हमला हो जाता था और यदि हमारे सैनिक दायीं चोटी पर चढ़ते तो बायीं चोटी से हमला हो जाता था। गोला बारूद, बंदूकें और युद्ध का सामान लेकर पहाड़ पर चढ़ना अपने आप में एक बड़ी चुनौती था। अपनी जान भी बचानी थी और शत्रुओं पर आक्रमण भी करना था. इन चुनौतियों में एक चुनौती यह भी थी कि शत्रु को अपनी सीमाओं से कैसे हटाया जाए अपने कबजाए हुए क्षेत्र को कैसे वापस लाया जाए।</p>
<p>इस पूरे युद्ध में कोई भी परिस्थिति हमारे पक्ष में नहीं थी। सभी परिस्थिति और सभी पहलू हमारे विरुद्ध थे। अनेक चुनौतियां सामने होते हुए भी भारत की सेना ने <strong>ऑपरेशन विजय</strong> चलाया। कारगिल का युद्ध लगभग 60 दिनों तक चला और अंत में <strong>ऑपरेशन विजय</strong> सफल रहा। 26 जुलाई 1999 को भारतीय सेना ने अपने अदम्य साहस और अभूतपूर्व शौर्य का प्रदर्शन करते हुए द्रास सेक्टर की सारी चोटियों को पाकिस्तान के सैनिकों के कब्जे से आजाद करा लिया। पाकिस्तान की सेना इतनी कायर निकली कि उन्होंने अपने मरे हुए सैनिकों के शव भी स्वीकार करने से मना कर दिया। ऐसे में हमारी सेना ने दुश्मन की सेना के मृत शरीरों को पूरे सम्मान के साथ दफनाया।</p>
<p>उस समय पाकिस्तान की सेना के प्रमुख जनरल मुशर्रफ थे। बाद में जनरल मुशर्रफ के वक्तव्यों से यह सिद्ध हुआ कि पाकिस्तान की ओर से लगभग 5000 घुसपैठिए इस युद्ध में सम्मिलित थे। इस युद्ध में भारत की ओर लगभग 527 सैनिक शहीद हुए और लगभग 1363 सैनिक घायल हुए।</p>
<p>इस युद्ध में बड़ी संख्या में रॉकेट और बमों का प्रयोग किया गया। इस दौरान करीब 2,50,000 गोले दागे गए वहीं लगभग 5000 बम फायर किए गए। 300 से अधिक तोपों और राकेट का आक्रमण किया गया। बाद में इस युद्ध में भारत की ओर से MIG-27 और MIG-29 प्रयोग हुआ। इस युद्ध में बोफोर्स तोपों का भी भरपूर प्रयोग किया गया।</p>
<p>पाकिस्तान की सेना से बरामद वस्तुएं, जैसे &#8211; पाकिस्तान के सैनिकों के घर से आई चिट्ठियां और उनके अन्य सामान, लेह लद्दाख संग्रहालय में रखें हैं जिन्हें जाकर एक बार जरूर देखना चाहिए।</p>
<p>इस युद्ध में जिन पहाड़ियों को आजाद कराया गया उनके नीचे भारतीय सेना ने एक शहीद स्मारक बनाया है। कारगिल युद्ध में जितने भी सैनिक बलिदान हुए उन सभी के नाम की पट्टियां उस शहीद स्मारक में लगी हुई है। जिन तोपों का युद्ध में उपयोग किया गया, वह भी रखी गई है। हम सबको एक बार उस क्षेत्र में जाकर यह अनुभव लेना चाहिए कि किन किन कठिन परिस्थितियों में हमारे शूरवीर सैनिकों ने युद्ध किया होगा। कारगिल युद्ध आमने सामने का युद्ध नहीं था। यह अपने आप में अनूठा युद्ध था। <strong>ऑपरेशन विजय </strong>के रूप में भारतीय सेना की उपलब्धियां अद्वितीय हैं।</p>
<p>(लेखक सुप्रीम कोर्ट दिल्ली में अधिवक्ता है और सीमा जागरण मंच में थल सीमा संयोजक है।)</p>
<p>और पढ़ें : <span style="color: #000080;"><strong><a style="color: #000080;" href="https://rashtriyashiksha.com/tell-the-stories-of-hero-of-kargil-war-to-children/" target="_blank" rel="noopener">बच्चों को सुनाएँ ‘कारगिल के हीरो’ की कहानियां</a></strong></span></p>
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		<title>समृद्धि, शांति और पराक्रम को दर्शाता धर्मचक्रांकित तिरंगा हमारा राष्ट्रीय ध्वज</title>
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		<dc:creator><![CDATA[राष्ट्रीय शिक्षा]]></dc:creator>
		<pubDate>Wed, 10 Aug 2022 05:28:22 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[अमृत महोत्सव]]></category>
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					<description><![CDATA[<p> &#8211; डॉ. मनमोहन वैद्य भारत के सिवा दुनिया में शायद ही ऐसा कोई देश होगा जहां के समाज के मन में “हम कौन हैं? हमारे पुरख़े कौन थे? हमारा इतिहास&#8230; </p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: right;"> &#8211; डॉ. मनमोहन वैद्य</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone wp-image-5663" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2022/08/2-300x169.jpeg" alt="" width="1725" height="972" srcset="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2022/08/2-300x169.jpeg 300w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2022/08/2-1024x576.jpeg 1024w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2022/08/2-768x432.jpeg 768w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2022/08/2.jpeg 1280w" sizes="auto, (max-width: 1725px) 100vw, 1725px" /></p>
<p>भारत के सिवा दुनिया में शायद ही ऐसा कोई देश होगा जहां के समाज के मन में “हम कौन हैं? हमारे पुरख़े कौन थे? हमारा इतिहास क्या रहा है?” इसके बारे में कोई सम्भ्रम या भिन्न भिन्न मत होंगे। पर भारत में, जो दुनिया का सबसे प्राचीन राष्ट्र है और जहां सब से समृद्ध समाज रहने के बावजूद हमारी इस विषय पर सहमति नहीं है। इसका एकमात्र कारण यही दिखता है कि हम एक समाज और एक राष्ट्र के नाते अपने ‘स्व’ को पहचानना और उसे आत्मसात् करना नहीं चाहते। कुछ उदाहरण देखें।</p>
<p>द्वितीय विश्वयुद्ध के विनाश के उपरांत (1945) ब्रिटेन, जर्मनी और जापान ने नई शुरूआत की थी। सैकडों वर्षों के संघर्ष के बाद -1948 में इज़्राएल ने भी अपने राष्ट्र को पुनः प्राप्त किया था। भारत ने भी शतकों की ग़ुलामी और शोषण के उपरांत और देश विभाजन के बाद 1947 में  स्वाधीनता प्राप्त की थी। लगभग एक साथ नए सिरे से शुरुआत करने वाले इन देशों को आज हम देखते हैं तो भारत की तुलना में इन चारों देशों की स्थिति बहुत अच्छी दिखती है। क्या कारण रहा होगा?</p>
<p>एक सामाजिक चिंतक के अनुसार “जब तक एक समाज के नाते हम कौन है यह हम तय नहीं करते, हम अपनी दिशा और  प्राथमिकताएँ तय नहीं कर सकते।” यही अंतर हैं भारत और इन देशों की विकास यात्रा में, जो कि क़रीब एक साथ ही शुरू हुई थी।</p>
<p>अपने ‘स्वदेशी समाज’ इस ऐतिहासिक निबंध में गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर लिखते हैं कि “हमें सबसे पहले हम जो है वह बनना पड़ेगा।” यह अद्भुत संयोग ही है कि आज जब हमारा देश स्वतंत्रता का अमृत महोत्सव मनाने जा रहा है तब एक ऐसा कालखंड आया है जब एक राष्ट्र के नाते भारत अपने ‘स्व’ के आधार पर अपनी एक नई पहचान बनाने के लिए प्रयासरत है &#8211; परंतु इसका भी विरोध क्यों होता है इस पर विचार होना चाहिए।</p>
<p>भारत के आधुनिक इतिहास में हमें दिखता हैं कि भारत की यह पहचान, भारत का यह ‘स्व’ जो सदियों पुराना है, सर्वविदित है, सुस्पष्ट है उसे ही नकारा गया। इसे नकारने को लिबरल, intellectual और progressive कहलाने का फ़ैशन चल पड़ा। स्पष्ट दिखता है कि भारत ने चूँकि अपनी विकास यात्रा की दिशा अपने ‘स्व’ के आलोक में तय नहीं की इसलिए भारत का उसकी क्षमता (potential) के आधार पर जितना विकास अब तक होना चाहिए था वह हम नहीं कर सके। भारत के इस ‘स्व’ के प्रकट होने के कई अवसर आए परंतु दुर्भाग्य से उन्हें लगातार नकारा गया।</p>
<p>हम जानते हैं कि 1905 में बंगाल के विभाजन के विरुद्ध हुए जन आंदोलन का उदघोष ‘वन्दे मातरम्’ गीत बना था। ‘वन्देमातरम्’ ने हज़ारों युवकों को, क्रांतिकारियों को स्वाधीनता के आंदोलन में कूदने की, देश पर मर मिटने की प्रेरणा दी। ‘वन्दे मातरम्’ भारत के ‘स्व’ का सहज प्रस्फुटन था। कांग्रेस के अखिल भारतीय अधिवेशनों में इसका गौरवपूर्ण गान होता था। पंडित ओंकारनाथ ठाकुर, पंडित विष्णु दिगम्बर पलुस्कर जैसे दिग्गज गायक इसे स्वरबद्ध कर कांग्रेस के अधिवेशनों में गाते थे। हिंदू-मुसलमान सभी इससे समान रूप से प्रेरणा पाते थे। फिर अचानक 1921 से यह केवल हिंदुओं का गीत और साम्प्रदायिक (communal) कैसे हो गया? इसके पीछे की मानसिकता को समझना आवश्यक है। 1905 से 15 वर्षों तक जो देशभक्ति का स्वाभाविक प्रस्फुटन था वह अचानक साम्प्रदायिक कहकर कैसे और क्यों नकारा गया, यह समझना आवश्यक है।</p>
<p>एक और उदाहरण देखें। स्वतंत्र भारत के ध्वज का सर्वप्रथम नमूना विवेकानंद शिष्या भगिनी निवेदिता ने 1905 में बनाया। दधीचि ऋषि के तपस्वी देहत्याग से बना वज्र चिह्न अंकित ध्वज उन्होंने बनाया। पर आगे वे लिखती हैं, “unfortunately we had a Chinese war flag as model in front of us, so we made it black on red. But it doesn’t appeal to Indians. So, next one will be yellow on saffron.” 1906 के कांग्रेस अधिवेशन में भगवे कपड़े पर पीला वज्रचिह्न ऐसा ध्वज प्रदर्शित हुआ था।</p>
<p>इसके पश्चात विविध ध्वजों के विभिन्न नमूने प्रस्तावित हुए। 1921 में भारत के सभी समुदायों का प्रतिनिधिक चरखांकित &#8211; तिरंगा ध्वज बनाया गया। 1929 में मास्टर तारासिंह के नेतृत्व में एक सिख प्रतिनिधि मण्डल महात्मा गांधी जी से मिला और उन्हों ने अलग-अलग समुदायों के प्रातिनिधिक ध्वज की कल्पना का विरोध किया और सभी के बीच रही एकता को दर्शाने वाला राष्ट्रीय (National) ध्वज बनाने पर ज़ोर दिया और कहा-  यदि अलग-अलग समुदाय के प्रतिनिधित्व का ही विचार करना है तो सिख समुदाय का पीला रंग ध्वज में जोड़ा जाए।  इस पर समग्र विचार कर सुझाव देने के लिए  कांग्रेस कार्यकारी समिति ने एक ध्वज समिति का गठन किया। इसमें पंडित जवाहरलाल नेहरू, सरदार पटेल, मौलाना अबुल कलाम आज़ाद, मास्टर तारासिंह, पट्टाभि सीतारामैय्या (संयोजक), काका कालेलकर और डॉक्टर हार्डीकर थे। ध्वज समिति ने राज्य कांग्रेस समिति और सामान्य व्यक्तियों से प्रचलित राष्ट्रीय ध्वज के लिए आपत्ति और सुझाव माँगे।</p>
<p>सब की बातें सुनकर ध्वज समिति का सर्वसम्मत निर्णय रहा कि “भारत का ध्वज विशिष्ट (distinct), कलात्मक (artistic) और non-communal हो। यह सर्वानुमति से तय किया गया कि वह एक ही रंग का हो। और यदि कोई एक रंग जो सबसे विशिष्ट है, जो सभी भारतवासियों को समान रूप से स्वीकार्य है और जो भारत जैसे प्राचीन राष्ट्र के साथ दीर्घकाल से जुड़ा है वह भगवा या केसरी रंग है। इसलिए आयताकृति भगवे कपड़े पर नीले रंग में चरखा यह भारत का ध्वज होगा यह निर्णय ध्वज समिति ने सर्वानुमति से लिया। यह निर्णय क्यों नहीं स्वीकार हुआ? वह कौन सी मानसिकता थी जिसने भारत का यह स्वाभाविक और सुविचारित ‘स्व’ नकारा? यह तथ्य भी विचार करने योग्य है।</p>
<p>1947 में स्वाधीनता के पश्चात संविधान द्वारा समृद्धि, शांति और पराक्रम को दर्शाता धर्मचक्रांकित तिरंगा हमारा राष्ट्रध्वज स्वीकारा गया। यह हमारा राष्ट्रध्वज है। उसका सम्मान तथा संरक्षण करना और अपने कर्तृत्व से उसका गौरव बढ़ाना हम सभी भारतीयों का कर्तव्य है। यह निर्विवाद सत्य है।</p>
<p>इसी तरह स्वाधीनता के पश्चात भारत की शिक्षा में जो मूलभूत सुधार अपेक्षित था वह भी नहीं किया गया। 1948 में डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन की अध्यक्षता में बने शिक्षा आयोग की रिपोर्ट में “शिक्षा के अभारतीय चरित्र” (The Un-Indian Character of Education) के बारे में वे स्पष्ट कहते है कि-</p>
<p>“One of the serious complaints against the system of education which has prevailed in this country for over a century is that it neglected India&#8217;s past, that it did not provide the Indian students with a knowledge of their own culture. It has produced in some cases the feeling that we are without roots, in others, what is worse, that our roots bind us to a world very different from that which surrounds us.”</p>
<p>“The chief source of spiritual nourishment for any people must be its own past perpetually rediscovered and renewed. A society without a knowledge of the past which has made it would be lacking in depth and dignity.”</p>
<p>“It was assumed that education should not stop with the development of intellectual powers but must provide the student, for the regulation of his personal and social life, a code of behavior based on fundamental principles of ethics and religion. Where conscious purpose is lacking, personal integrity and consistent behavior are not possible.”</p>
<p>इससे सिद्ध होता है कि आध्यात्मिकता यही भारतीय चिंतन का आधार है। उसी के प्रकाश में शिक्षा की व्यवस्था होनी चाहिए। परंतु कांग्रेस के शासन काल में, उन्हीं के द्वारा नियुक्त शिक्षा आयोगों की अनुशंसाओं (recommendations) को लागू नहीं किया गया। शिक्षा आयोग का गठन करने वाले कांग्रेस के ही नेता थे। फिर भी उस आयोग की अनुशंसा को लागू करने से रोकने वाले कौन लोग थे, कौनसी मानसिकता थी? आज भी उस दिशा में जब प्रयास होते हैं तो उसे शिक्षा का भगवाकरण के नाम पर विरोध किया जाता है। इसके पीछे की मानसिकता क्या है &#8211; इसका विश्लेषण होना आवश्यक है।</p>
<p>भारत की सभी भाषाओं की जननी संस्कृत है यह निर्विवाद तथ्य है और संस्कृत ही है जो सभी भारतीय भाषा-भाषियों को सरलता से समझ में आती है। जैसे, मलेशिया में तमिल भाषी भारतीय बड़ी संख्या में हैं। वहाँ के हिंदू स्वयंसेवक संघ के प्रचारक श्री रामचन्द्रन तमिल भाषी है। संघ शिक्षा वर्ग के दोनों वर्षों का उनका प्रशिक्षण तमिलनाडु प्रांत में हुआ। तृतीय वर्ष के लिए (25 दिन) वे नागपुर गए। वहाँ सभी बौद्धिक हिंदी में ही होते थे जो उन्हें कुछ भी समझ में नहीं आते थे। बाद में जब तमिल भाषी शिक्षार्थियों के लिए तमिल में उनका अनुवाद होता था तभी वे उसे समझते थे। उन्होंने मुझे बताया कि 25 में से केवल एक ही  बौद्धिक उद्बोधन वे सीधा(बिना अनुवाद के) समझ सके क्यों कि वह संस्कृत में हुआ था। संस्कृत भाषा सभी भाषाओं से नज़दीक है इसका यह ज्वलंत प्रमाण है। भारत रत्न डॉक्टर बाबासाहेब अम्बेडकर समेत तत्कालीन अनेक नेताओं का यह स्पष्ट मत था कि भारत में सभी को संस्कृत की शिक्षा दी जाए। भारत के ज्ञान का सारा खजाना संस्कृत में है और सभी भारतीय भाषाएँ संस्कृत से नज़दीक है, संस्कृत से ही निकली है। भारतीय एकात्मकता के बोध के लिए भी यह उपयुक्त है। परंतु किस मानसिकता के कारण इस महती सुझाव को नहीं स्वीकारा गया?</p>
<p>दुनिया के सभी शिक्षाविद मानते हैं कि बालक की प्राथमिक शिक्षा मातृभाषा में होनी चाहिए। नए विषय समझने के लिए और बालक के मानसिक, बौद्धिक विकास के लिए शिक्षा मातृभाषा में होना आवश्यक है। अच्छी अंग्रेज़ी भाषा सीखने के लिए सभी विषय अंग्रेज़ी में सीखना आवश्यक नहीं है। दुनिया के केवल 9% लोग ही अपनी मातृभाषा से अलग अन्य भाषा में शिक्षा प्राप्त करते हैं। भारत ऐसे कुछ देशों में आता हैं। सभी विषयों की शिक्षा अंग्रेज़ी में देने के नाम पर अपने यहाँ अंग्रेज़ी का वर्चस्व इतना बढ़ा दिया गया कि मातृभाषा में शिक्षा प्राप्त करने वालों के मन में एक हीनता का भाव निर्माण होता दिखता है। यह भारत के ‘स्व’ भाव के विपरीत है। महात्मा गांधी जी समेत अनेक चिंतकों द्वारा मातृभाषा में ही प्राथमिक शिक्षा पर बल देने के बावजूद ऐसा क्या हुआ कि इस बात की अनदेखी की गयी?</p>
<p>बहुत दीर्घकाल तक भारत सम्पन्न था, विश्व व्यापार में भारत का सहभाग सर्वाधिक था। हम अनाज नहीं बेचते थे। चमड़ा, धातु, लकड़ी, पत्थर की बनी वस्तुएँ, कपड़ा, मसाले, हीरे आदि के व्यापार के लिए भारतीय दुनिया भर में जाते रहे हैं। इसलिए भारत कृषि प्रधान देश था ऐसा कहने के स्थान पर भारत उद्योग प्रधान देश था यह कहना अधिक उचित होगा। ये सारे उद्योग घर-परिवार में होते थे और ये परिवार ग्रामीण भारत में रहते थे। भारत के ग्राम समृद्ध होते थे। लेकिन यूरोप के प्रभाव के कारण भारत ने स्वाधीनता के पश्चात् शहर केंद्रित विकास की दिशा पकड़ ली। शहरों में भीड़, स्पर्धा, अपराध और आपसी सम्बन्धों का बिखराव बढ़ता गया और ग्राम उपेक्षित, पिछड़े, सुविधा विहीन होने लगे। शहर में बसना प्रतिष्ठा का और ग्रामीण भाग में बसना पिछड़ेपन का लक्षण माना गया। यांत्रिक युग के कारण अधिकाधिक लाभ कमाने के मोह के मकड़जाल में मनुष्य फँसता चला गया।</p>
<p>भारतीय जीवन की विशेषता यह रही है कि भारत ने भौतिक समृद्धि और आध्यात्मिक विकास दोनों को समान महत्व दिया है, किसी एक को नहीं। ईशावास्य उपनिषद में एक श्लोक में स्पष्ट कहा है कि जो केवल भौतिक समृद्धि के पीछे दौड़ता है वह गहरे अंधकार में प्रवेश करता है। उसी श्लोक में आगे कहा है कि जो केवल आध्यात्मिक साधना में रत रहता है वह और गहरे अंधकार में प्रवेश करता है। उपनिषद आगे कहता है कि भौतिक समृद्धि और आध्यात्मिक उन्नति दोनों को साथ साथ साधना ही जीवन है। इन दोनों को एकसाथ साधने का योग्य परिवेष ग्रामीण जीवन में है। ग्राम में आय कम है पर व्यय भी कम है। इसलिए अच्छा जीवन जीने तथा कमाने के लिए बहुत दौड़ भाग नहीं करनी पड़ती है। कमाने के साथ साथ आध्यात्मिक साधना के लिए पर्याप्त समय और योग्य परिवेष, वातावरण ग्रामीण जीवन में हैं। इसलिए स्वाधीन भारत की विकास यात्रा की दिशा ग्रामीण विकास की हो यह महात्मा गांधी भी चाहते थे। उनका ‘हिंद स्वराज’ मुख्यतः इसी पर केंद्रित है। संविधान को स्वीकार करते समय भी &#8211; 19 से 22 नवंबर 1948 की चर्चा में संविधान सभा ने यही अपेक्षा व्यक्त की थी कि जल्द ही हम ग्राम स्वराज के पथ पर अग्रसर होंगे। परंतु पश्चिम के समाजवाद और पूंजीवाद के द्वंद्व में फसकर हम अपना समावेशी और पर्यावरण पूरक विकास का रास्ता भूल गए।ग्रामीण भारत में शहरों की सभी सुविधाएँ दिए जाने का आग्रह पूर्व राष्ट्रपति डॉक्टर अब्दुल कलाम का भी था। समृद्ध, सुखी, निरामय और आध्यात्मिक साधना में रत ऐसा जीवन जीना यही जीवन है यह भारत का विशिष्ट विचार रहा है और भारत की पहचान भी। यही भारत के ‘स्व’ की अभिव्यक्ति है। यह दिशा हम ने क्यों नहीं ली?</p>
<p>स्वदेशी समाज में गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर कहते हैं कि “welfare state यह पश्चिम की कल्पना है, भारतीय नहीं। परम्परा से भारतीय समाज राज्यशक्ति पर कभी अवलम्बित नहीं था। वह समाज जो अपनी आवश्यकताओं के लिए राज्य पर कम से कम अवलम्बित है वह स्वदेशी समाज है।” परम्परा से केवल न्याय, विदेश सम्बंध और सुरक्षा ये विषय ही राज्य के अधीन होते थे। बाक़ी सभी विषय शिक्षा, स्वास्थ्य, व्यापार, अर्थोत्पादन, संगीत, कला, मंदिर, कथा, मेले आदि सभी समाज के अधीन रहते थे”।</p>
<p>विवेकानंद की शिष्या भगिनी निवेदिता ने कहा कि “जिस समाज में लोग अपने परिश्रम का पारिश्रमिक अपने ही पास न रखकर समाज को देते हैं, उस समाज में, ऐसे एकत्रित पारिश्रमिक की पूँजी के आधार पर समाज सम्पन्न-समृद्ध बनता है और समाज सम्पन्न-समृद्ध बना तो समाज का हर एक व्यक्ति सम्पन्न-समृद्ध बनता है। परंतु जिस समाज में लोग अपने परिश्रम का पारिश्रमिक समाज को न दे कर अपने ही पास रखते हैं, उस समाज में कुछ व्यक्ति तो सम्पन्न-समृद्ध बनते हैं पर समाज दरिद्र रहता है”।</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone wp-image-5664" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2022/08/1-300x300.jpeg" alt="" width="1722" height="1722" srcset="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2022/08/1-300x300.jpeg 300w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2022/08/1-1024x1024.jpeg 1024w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2022/08/1-150x150.jpeg 150w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2022/08/1-768x768.jpeg 768w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2022/08/1.jpeg 1280w" sizes="auto, (max-width: 1722px) 100vw, 1722px" /></p>
<p>समाज को अपनेपन के भाव से देना, यह समाज का ही है, उसे लौटाना माने जीवन सार्थक होना ऐसा माना गया है। इसीलिए विवेकानंद केंद्र की प्रार्थना में कहा गया है &#8211;</p>
<p><strong>जीवने यावदादानं स्यात् प्रदानं ततोSधिकम्।</strong></p>
<p><strong>इत्येषा प्रार्थनास्माकं भगवन् परिपूर्यताम् ।।</strong></p>
<p>(अर्थ-जीवन में हम जितना स्वीकार करते हैं उससे अधिक लौटा सकें यह हमारी प्रार्थना हे भगवन! आप पूर्ण करो।)</p>
<p>समाज से हमें बहुत मिलता है उसे वापस लौटाना इसे ही धर्म कहा है। religion या उपासना इससे अलग है। उपासना धर्म के लिए होती है। धर्म का अर्थ है, प्रत्यक्ष आचरण करना, समाज को लौटाना। समाज को देना यह charity है और समाज को लौटाना यह धर्म है। भगिनी निवेदिता के अनुसार सामाजिक पूँजी को समृद्ध करना यही धर्म है। और धर्म भेदभाव नहीं करता है, वह सभी को जोड़े रखता है, सहायता करता है, साथ बाँधे रखता है। यही स्वदेशी समाज का आधार है।</p>
<p>स्वाधीनता के समय भारत के निर्माताओं के मन में यह ‘धर्म’ भाव स्पष्ट रहा होगा। इसीलिए भारत की लोकसभा में ‘धर्मचक्र प्रवर्तनाय’ लिखा है। राज्य सभा में ‘सत्यं वद धर्मं चर’, उच्चतम न्यायालय का बोधवाक्य ‘यतो धर्मस्ततो जयः’ और भारत के राष्ट्रध्वज पर जो चक्र अंकित है वह ‘धर्मचक्र’ है। चक्र घूमने के लिए ही होता है। समाज को लौटाने का प्रत्येक छोटासा प्रयास धर्म कार्य है और ऐसे छोटे छोटे प्रयासों से धर्मचक्र चलता है, गतिमान होता है, प्रवर्तमान रहता है।</p>
<p>लोकसभा, राज्यसत्ता, उच्चतम न्यायालय, राष्ट्रध्वज जैसे प्रमुख स्थानों पर जिस ‘धर्म’ का स्पष्ट महत्वपूर्ण उल्लेख है उस ‘धर्म’ की कहीं कोई चर्चा नहीं है। बल्कि धर्म की बात करना साम्प्रदायिक (कम्यूनल) माना जाने लगा है। और जिस secularism को चर्चा करने के पश्चात भारतीय संविधान में स्थान नहीं देने का सर्वानुमति से निर्णय लिया गया फिर भी उसे चुपके से किसी भी प्रकार की चर्चा-बहस किए बिना संविधान के preamble में (जो कि अपरिवर्तनीय है ऐसा संविधान ही कहता है) ज़बरदस्ती से समाविष्ट किया गया।  उस secularism जैसे अभारतीय शब्द के अर्थ को परिभाषित किए बिना ही उसका धड़ल्ले से उपयोग किया जा रहा है।</p>
<p>ये सब किस मानसिकता की उपज है? इसका विचार करना होगा। उस अभारतीय मानसिकता से उबरकर शुद्ध भारतीय विचार को प्रतिष्ठित करने से ही अबतक नकारा गया भारत का ‘स्व’ पूर्णार्थ से, अपने पुरुषार्थ से पूर्ण प्रकाशमान होगा तभी भारत अपने स्व-गौरव के साथ मज़बूती से अपना वैश्विक कर्तव्य पूर्ण करने के लिए तत्पर होगा।</p>
<p>(लेखक राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सह सरकार्यवाह है।)</p>
<p>और पढ़ें :</p>
<p>&nbsp;</p>
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		<title>ब्रिटिश राज के विरुद्ध स्वदेशी एक रणनीतिक संघर्ष</title>
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		<dc:creator><![CDATA[राष्ट्रीय शिक्षा]]></dc:creator>
		<pubDate>Mon, 08 Aug 2022 11:34:05 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[अमृत महोत्सव]]></category>
		<category><![CDATA[नवीनतम]]></category>
		<category><![CDATA[bhartiya shiksha]]></category>
		<category><![CDATA[indian education]]></category>
		<category><![CDATA[Rashtriya shiksha]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>&#8211; डॉ. प्रवेश कुमार हिंदुस्थान में अंग्रेज़ी प्रशासनिक राज और भारत की आर्थिक लूट जिसने देश में जहा बाबू गेनु जैसे नवयुवक को भी अंग्रेज़ी राज के ख़िलाफ़ बड़ी बुलंदी&#8230; </p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: right;"><strong>&#8211;</strong> डॉ. प्रवेश कुमार</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone  wp-image-5659" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2022/08/swadeshi-e1659958400447-300x182.jpg" alt="" width="1662" height="1008" srcset="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2022/08/swadeshi-e1659958400447-300x182.jpg 300w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2022/08/swadeshi-e1659958400447-1024x622.jpg 1024w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2022/08/swadeshi-e1659958400447-768x466.jpg 768w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2022/08/swadeshi-e1659958400447.jpg 1028w" sizes="auto, (max-width: 1662px) 100vw, 1662px" /></p>
<p>हिंदुस्थान में अंग्रेज़ी प्रशासनिक राज और भारत की आर्थिक लूट जिसने देश में जहा बाबू गेनु जैसे नवयुवक को भी अंग्रेज़ी राज के ख़िलाफ़ बड़ी बुलंदी से स्वर उठाने की प्रेरणा दी तो वही भारत के सम्पूर्ण स्वतंत्रता आंदोलन में स्वदेशी का विचार एक टूल का काम करता रहा है। हम देखे कि हिंदुस्तान में अंग्रेजो के आने के बाद और उनका तेज़ी से हमारे काम-धंधो पर एकाधिकार इसने जहाँ भारत में शोषण को बढ़ाया वही भारत के जन-मानस में अंग्रेज़ी शासन के प्रति विरोध के स्वर भी उठे, धीरे-धीरे ही सही पर सम्पूर्ण भारत में जन मानस को अपने हाथों से जाते रोज़गार के अवसर और अपनी आर्थिक बदहाली के विरोध में समाज जागरण के माध्यम से आंदोलन भी खड़े किए गए जिसमें <strong>‘स्वदेशी’</strong> का आंदोलन बड़ा कारगर आंदोलन था जिसने हिंदुस्तान के सामान्य और विशेष दोनों ही प्रकार के नागरिकों में जागरण का कार्य किया।</p>
<p>इस स्वदेशी आंदोलन में महत्वपूर्ण शस्त्र दैनिक जीवन में प्रयोग होने वाली वस्तुएँ थी जिसमें भारत में कपड़ा उद्योग विशेष रूप से था। इस शस्त्र ने भारत के ज़न-मानस को प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित किया क्यूँकि ये उद्योग जहाँ भारत की अधिकांश जनसंख्या को रोज़गार उपलब्ध कराता था, वहीं प्रत्येक व्यक्ति के मानस में स्वाबलंबी होने के विचार को भी जागृत करता था। इसलिए कपड़ों की होली और स्वदेशी हस्तनिर्मित वस्तुओं के प्रयोग का आग्रह स्वतंत्रता संघर्ष में महत्वपूर्ण टूल रहा जिसे लेकर बड़े अभियान चले। लोकमान्य तिलक, डॉ. हेड्गेवार, बाबू गेनु, महात्मा गांधी, वीर सावरकर, बहन निवेदिता आदि ने इस आंदोलन को जन-जन तक पहुँचाने का कार्य किया।</p>
<p>आज भारत में स्वदेशी आधारित आंदोलन को समझते हैं। ब्रिटिश काल में ब्रिटिश सरकार ने अपने हितों के लिए कई ऐसी नीति और कानून बनाएं जिसके अंतर्गत हमारे अपने स्वदेशी उद्योग से जुड़े लोगों के हितों पर बहुत प्रतिकूल असर पड़ा। इसमें 1813 एक्ट के तहत भारत में ‘मुक्त व्यापार की नीति’ लागू की गई इस नीति के अंतर्गत अब न सिर्फ ईस्ट इंडिया कंपनी बल्कि अन्य बाहरी कंपनियां भी भारत में व्यापार कर सकती थी, पहले ये व्यापार ईस्ट इंडिया कंपनी तक ही सीमित था अब सब बे-रोकटोक हो गया।</p>
<p>अब भारतीयों से कम कीमत पर कच्चा माल<strong> </strong>(raw material) ख़रीदा जाने लगा वही विदेशी बना माल महँगे दामों पर भारत में बेचे जाने लगा, मशीनों से बना कपड़ा भारत की मंडियों में बड़ी तेज़ी से प्रचलन में आ गया जिसने हमारे लाखों लोगों का रोज़गार छीन लिया। हमारे बुनकर, रगने वाले जुलाहे, धोने वाले धोबी समाज एवं कटाई सिलाई करने वाले दर्ज़ी आदि का रोज़गार छीन गया। कच्चा माल हमारे ही देश का और हम ही सबसे बड़े ख़रीदार भी, बड़ी अजीब सी बात थी।</p>
<p>आज भी हम ही दुनिया में सबसे बड़े उपभोक्ता है इसीलिए दुनिया के देश भारत में अपना माल बेचना चाहते हैं, लेकिन 90 के दशक में दत्तोपंत ठेंगडी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रचारक द्वारा प्रारंभ किया स्वदेशी का आंदोलन इन कंपनियों के भारत में अपनी शर्तों पर व्यापार करने की मंशा में बड़ी बाधा बन कर खड़ा है और देश के हस्त एवं छोटे उद्योगों का जिसके कारण बचाव भी हुआ है।</p>
<p>भारत में अंग्रेज़ी व्यापार नीति ने के कारण न सिर्फ भारत गरीब होता गया बल्कि भारतीय बुनकरों और कपडा व्यवसाय से जुड़े लोगों का भी जबरदस्त शोषण हुआ, इसका सबसे अधिक प्रभाव दलित समुदाय पर पड़ा जो कि परम्परागत कपड़े और चमड़े के व्यवसाय से जुड़े थे। भारतीय बुनकरों के अंगूठे तक काट दिए गए ताकि वे बुनकारी का कार्य न कर सके। ये सब अंग्रेज़ क्यों  कर रहे थे? उसके पीछे का कारण था अंग्रेजों को अपने नील के बागान में खेती के लिए भारतीय किसानों के साथ मजदूरों की आवश्यकता, इसके लिए बागान मालिक रैयतों के साथ समझौता करते, इसके लिए वे अनुबंध पर किसानों के जबरदस्ती हस्ताक्षर कराकर खेती करवाते थे।</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone  wp-image-5660" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2022/08/capture-31626683160_1628236039-300x225.jpg" alt="" width="1731" height="1298" srcset="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2022/08/capture-31626683160_1628236039-300x225.jpg 300w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2022/08/capture-31626683160_1628236039.jpg 540w" sizes="auto, (max-width: 1731px) 100vw, 1731px" /></p>
<p>इस सारी व्यवस्था का सबसे ज्यादा विरोध 1905- 06 के बंग-भंग के दौरान देखने को मिला जब लार्ड कर्जन ने बंगाल का विभाजन किया। इस दौरान विदेशी कपड़ों की होली जलाई गई और स्वदेशी को अपनाने पर अधिक ज़ोर दिया गया। इस आन्दोलन का प्रभाव पूरे भारतवर्ष में था लेकिन बंगाल-महाराष्ट्र के क्षेत्र में बहुत अधिक था, अनेक सामाजिक और राजनीतिक संगठनों ने इस आन्दोलन में भाग लिया जिसमें अनुशीलन समिति, रामकृष्ण मिशन शामिल थे। <strong>सुरेन्द्रनाथ बेनर्जी, अरविन्द घोष</strong><strong>, रवीन्द्रनाथ ठाकुर, वीर सावरकर, लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक, बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय, </strong><strong>भगिनी निवेदिता </strong><strong>और लाला लाजपत राय ने भी इस स्वदेशी आन्दोलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई</strong><strong>। </strong>इसी आन्दोलन के दौरान विदेशी वस्त्रों की दुकानों पर ‘पिकेटिंग’ शुरू हुई। अनुशीलन समितियाँ बनीं जो दबाये जाने के कारण क्रान्तिकारी समितियों में परिणत हो गयीं। भारत में बंग-भंग के विरोध में सभाएँ तो हो ही रही थीं। अब विदेशी वस्तु बहिष्कार आन्दोलन ने भी बल पकड़ा। <strong>अश्विनी कुमार दत्त, रजनी</strong> <strong>पामदत और दादा भाई नोरोजी ने अपनी रचनाओ में बताया कि किस प्रकार अंग्रेज भारत से धन निकासी कर रहे है जिसके कारण भारत और अधिक गरीब होता जा रहा है एवं ब्रिटेन और अधिक धनी होता जा रहा है</strong><strong>। </strong><strong>तिलक व गणेश श्रीकृष्ण खापर्डे भी कलकत्ता पहुँचे और महाराष्ट्र के बाद बंगाल में भी शिवाजी उत्सव का प्रवर्तन किया गया। </strong>रवीन्द्र नाथ ठाकुर ने भी इस आन्दोलन का समर्थन किया और इसी अवसर पर ‘शिवाजी’ शीर्षक से प्रसिद्ध कविता लिखी। इसका प्रभाव 1905 के कांग्रेस के बनारस अधिवेशन में देखने को मिला, जिसमें स्वदेशी और आर्थिक बहिष्कार के प्रस्तावों को स्वीकार कर लिया गया। इसके बाद यह आन्दोलन निम्नलिखित तीन मुद्दों पर केन्द्रित हो गया-</p>
<p><strong>(1) विदेशी वस्तु और कपड़ों का बहिष्कार </strong></p>
<p><strong>(2) अंग्रेजी में बातचीत करना बंद और स्थानीय भाषा में बातचीत को प्रोत्साहन </strong></p>
<p><strong>(3) सरकारी पदों और कौंसिल की सीटों से त्यागपत्र</strong></p>
<p>संक्षेप में देशप्रेम और राष्ट्रीयता का तीव्र प्रसार करने में स्वदेशी आंदोलन को अपार सफलता मिली। यह आंदोलन विदेशी शासन के विरुद्ध जनता की भावनाओं को जागृत करने का अत्यंत शक्तिशाली साधन सिद्ध हुआ। स्वतंत्रता आंदोलन में अब राजनीति से पृथक रहने वाले अनेक वर्गों यथा- छात्रों, महिलाओं तथा कुछ ग्रामीण व शहरी जनसंख्या ने भी सक्रिय रूप से भाग लिया। आंदोलन का प्रभाव-क्षेत्र राजनीतिक जगत तक ही सीमित नहीं रहा अपितु साहित्य, विज्ञान एवं उद्योग जगत पर भी इसका प्रभाव पड़ा। इसके अलावा स्वदेशी आंदोलन ने उपनिवेशवादी विचारों एवं संस्थाओं की वास्तविक मंशा को लोगों के समक्ष अनावृत कर दिया जिससे लोगों में चेतना आई  तथा वे साहसिक राजनीतिक भागीदारी एवं राजनीतिक कार्यों में एकता की महत्ता से परिचित हुए। साथ ही स्वतंत्रता आंदोलन के सभी प्रमुख माध्यमों जैसे- उदारवाद से राजनीतिक अतिवाद, क्रांतिकारी आतंकवाद से प्रारंभिक समाजवाद तथा याचिका एवं प्रार्थना-पत्रों से असहयोग एवं सत्याग्रह का अस्तित्व इस आंदोलन से उभरकर सामने आया।</p>
<p>आन्दोलन का प्रभाव दिल्ली दरबार (1911) में देखने को मिला जिसमें बंग-भंग रद्द कर दिया गया, पर स्वदेशी आन्दोलन नहीं रुका। अपितु वह स्वतन्त्रता आन्दोलन में परिणत हो गया। यह आन्दोलन 1905 से 1911 तक चला और महात्मा गांधी  जी के भारत में पदार्पण के पूर्व सभी सफल आन्दोलनों में से एक था तथा आगे चलकर यही स्वदेशी आन्दोलन महात्मा गांधी के स्वतन्त्रता आन्दोलन का भी केन्द्र-बिन्दु बन गया तथा स्वदेशी व बहिष्कार आंदोलन से जो राजनीतिक चेतना एवं राष्ट्रवादी लहर पैदा हुई कालांतर में उसने भारत की स्वतंत्रता की रूपरेखा तैयार की। स्वदेशी आन्दोलन ज़न सरोकार के साथ जुड़ा था और प्रत्येक व्यक्ति को प्रभावित करता था इस लिये स्वतंत्रता आंदोलन में अंग्रेज़ी सरकार के विरुद्ध ये महत्वपूर्ण रणनीति बनी। अंग्रेज़ी सरकार को आर्थिक रूप से प्रभावित किए बिना उनकी कमर नहीं तोड़ी जा सकती इसलिए जितने भी विरोध प्रदर्शन हुए उनमें विदेशी वस्त्रों की होली जलाना एक महत्वपूर्ण कार्यक्रम था। गाँधी जी का खादी के लिए आग्रह भी इस स्वदेशी विचार को जन-जन तक पहुचाने का माध्यम था।</p>
<p>(लेखक जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय दिल्ली में सहायक प्रोफेसर है।)</p>
<p><strong>और पढ़ें</strong> : <span style="color: #000080;"><strong><a style="color: #000080;" href="http://A indigenous strategic struggle against the British Raj" target="_blank" rel="noopener">1857 के स्वातंत्र्य समर पर साहित्य रचना</a></strong></span></p>
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		<title>1857 के स्वातंत्र्य समर पर साहित्य रचना</title>
		<link>https://rashtriyashiksha.com/literary-composition-on-the-freedom-war-of-1857/</link>
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		<dc:creator><![CDATA[राष्ट्रीय शिक्षा]]></dc:creator>
		<pubDate>Thu, 28 Jul 2022 11:14:18 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[अमृत महोत्सव]]></category>
		<category><![CDATA[नवीनतम]]></category>
		<category><![CDATA[श्री रवि कुमार जी]]></category>
		<category><![CDATA[1857]]></category>
		<category><![CDATA[1857 War]]></category>
		<category><![CDATA[1857 की लड़ाई]]></category>
		<category><![CDATA[indian education]]></category>
		<category><![CDATA[Rashtriya shiksha]]></category>
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					<description><![CDATA[<p> &#8211; रवि कुमार 1857 के स्वातंत्र्य समर के बारे में जिन्होंने अध्ययन किया है उनके सामने इस महान समर का उल्लेख आता है तो मन-मस्तिष्क में उस समय की घटनाएं&#8230; </p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: right;"> &#8211; रवि कुमार</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone  wp-image-5629" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2022/07/Swtantrta-Samar-300x169.jpg" alt="" width="1244" height="701" srcset="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2022/07/Swtantrta-Samar-300x169.jpg 300w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2022/07/Swtantrta-Samar-1024x576.jpg 1024w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2022/07/Swtantrta-Samar-768x432.jpg 768w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2022/07/Swtantrta-Samar.jpg 1280w" sizes="auto, (max-width: 1244px) 100vw, 1244px" /></p>
<p>1857 के स्वातंत्र्य समर के बारे में जिन्होंने अध्ययन किया है उनके सामने इस महान समर का उल्लेख आता है तो मन-मस्तिष्क में उस समय की घटनाएं दृश्यमान होने लगती हैं। वे सभी हुतात्मा सामने आ जाते हैं जिन्होंने इस राष्ट्र की स्वतंत्रता के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया। वे सभी वृक्ष जिन पर बंधे फांसी के फंदों पर हमारे पूर्वज झूम गए, सामने आ जाते हैं। वे सभी ग्राम जिन्हें अंग्रेजों ने जला दिया, अग्नि की लपटों के साथ दिखने लगते हैं। ये सब उनके साथ होता है, जिन्होंने इस स्वातंत्र्य समर के बारे में प्रकाशित साहित्य सागर में डुबकी लगाई हो। आइए जानने का प्रयास करते हैं इस साहित्य सागर को&#8230;</p>
<p>1857 के स्वातंत्र्य समर के विषय में सबसे महत्वपूर्ण एवं सर्वाधिक प्रचलित ग्रंथ वीर सावरकर कृत <strong>‘1857 प्रथम स्वातंत्र्य समर’</strong> है। 1909 में अंग्रेजी भाषा में इसकी प्रथम प्रति प्रकाशित हुई थी जिसका शीर्षक था- <strong>‘1857</strong><strong> The Indian war of independence of 1857’ </strong>और लेखक का नाम छपा था- An Indian Nationalist. यह ग्रंथ मात्र इतिहास की पुस्तक नहीं है बल्कि स्वयं में इतिहास है। प्रकाशन पूर्व प्रतिबंधित हुई एवं लगभग सभी भारतीय भाषाओं में प्रकाशित यह पुस्तक 1947 स्वतंत्रता प्राप्ति तक के राष्ट्रीय स्वतंत्रता आंदोलन में स्वाहा हुए सभी क्रांतिकारियों और स्वतंत्रता सेनानियों की प्रेरणा स्रोत रही हैं। इस प्रथम पुस्तक में सन्दर्भ ग्रन्थ सूची में वर्णित 33 पुस्तकें जो ब्रिटिश लेखकों द्वारा लिखी गई थी, उन्हें पढ़कर और लंदन के दो पुस्तकालयों (इंडिया ऑफिस लाइब्रेरी व नेशनल म्यूजियम लाइब्रेरी) के दस्तावेजों को दो वर्ष खंगालकर वीर सावरकर ने यह ग्रन्थ लिखा। ये सभी ब्रिटिश पुस्तकें व दस्तावेज पूर्वाग्रह से ग्रसित होकर ब्रिटिशों के गुणगान का उल्लेख करते हैं। परंतु इन्हें पढ़ते हुए स्वराज के लिए भारतीयों ने जो जो किया उसका वर्णन इस विशेष कृति में सावरकर ने संजोया है। राष्ट्र की स्वतंत्रता के लिए इस महासंग्राम को जो मात्र एक सैनिक विद्रोह का नाम देते हैं इस ग्रन्थ की झलक मात्र पाकर अपनी धारणा बदलने के लिए विवश हो जाते हैं।</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone  wp-image-5630" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2022/07/IMG_0001-1-179x300.jpg" alt="" width="1247" height="2090" /></p>
<p>1857 के महासंग्राम पर दो पुस्तकें प्रसिद्ध इतिहासकार श्री सतीश मित्तल द्वारा रचित हैं। एक है- <strong>‘1857 की महान क्रांति का विश्व पर प्रभाव’</strong>। विश्व में अनेक क्रांतियाँ हुई। उन क्रांतियों में और 1857 की क्रांति में तुलनात्मक विश्लेषण को इस पुस्तक में लेखक ने रोचकता से उल्लेखित किया गया है। भारत में 1857 की घटना के कारण विश्व में अमेरिका, यूरोप और एशिया में जो उथल-पुथल हुई और इन महाद्वीपों के देशों में जो घटनाक्रम हुआ, लेखक द्वारा उसका सारगर्भित वर्णन इस पुस्तक का वैशिष्ट्य है। श्री सतीश मित्तल की दूसरी पुस्तक है- <strong>‘1857 का स्वातंत्र्य समर : एक पुनरवलोकन’</strong>। इस पुस्तक में सम्पूर्ण समर को कम परंतु सारगर्भित शब्दों में सतीश मित्तल जी ने समेटा है। इस लघु ग्रन्थ में 1857 के सन्दर्भ में कुछ इतिहासकारों द्वारा फैलाई गई भ्रांतियों का निराकरण तथ्यों के आधार पर किया गया है। साथ ही लेखक द्वारा तथ्यों व सन्दर्भों को सही परिवेश में रखने का प्रयास किया गया है।</p>
<p>1857 के स्वातंत्र्य समर के पश्चात क्या हुआ होगा, एक ही वाक्य साहित्य जगत में घूमता है कि क्रांति विफल रही और अंग्रेजों का आधिपत्य सम्पूर्ण भारत पर हो गया। इसका उल्लेख साहित्य जगत में नहीं आता कि इस महासंग्राम से प्रेरणा प्राप्त कर राष्ट्र में स्वराज लाने के लिए प्रेरणा का केंद्र बिंदु यह महासंग्राम बना रहा। <strong>‘1857 की क्रांति के प्रतिसाद’</strong> श्रीधर पराधकर द्वारा लिखित इस पुस्तक में महासंग्राम से प्रेरणा प्राप्त कर देशभर में राष्ट्रीय स्वतंत्रता के लिए क्या-क्या हुआ&#8230;इसका वर्णन है। महाराष्ट्र में वासुदेव बलवंत फड़के, पंजाब में रामसिंह कूका, क्रांतिकारियों एवं आजाद हिंद फौज के सैनिकों द्वारा चलाए गए स्वतंत्रता आंदोलन की प्रेरणा इस महासंग्राम को बताते हुए रोचक व सारगर्भित वर्णन इस पुस्तक का वैशिष्ट्य है।</p>
<p>दिल्ली इस स्वातंत्र्य समर का बड़ा केंद्र रहा। देशभर में सबसे अधिक बलिदान इस एक नगर में हुए। दिल्ली में जिसकी संख्या कुल एक लाख 53 हजार थी, 27000 लोग मारे गए थे। सबसे लंबा युद्ध इस नगर ने किया। <strong>‘स्वतंत्र दिल्ली’</strong> नाम से पुस्तक जो कि डॉ.सैयद अतहर अब्बास रिजवी द्वारा लिखित एवं उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान द्वारा प्रकाशित है। यह पुस्तक उस समय के उर्दू समाचार पत्रों में प्रकाशित समाचारों के आधार पर दिल्ली के संघर्ष को व्याख्यायित करती है।</p>
<p>स्वतंत्र भारत में 1857 की क्रांति का इतिहास लिखने के लिए रमेश चन्द्र (आर.सी.) मजूमदार को भारत सरकार द्वारा नियुक्त किया गया था परन्तु सरकारी समिति से अनबन होने के कारण वे इस कार्य से अलग हो गए और स्वतंत्र रूप से इस लेखन को पूर्ण किया। <strong>‘सिपोय म्युनिटी एंड द रिवोल्ट ऑफ़ 1857’</strong> इस नाम से अपनी पुस्तक को 1957 में प्रकाशित करवाया। उनके स्थान पर भारत सरकार ने एस.एस.सेन को नियुक्त किया और उन्होंने &#8216;एट्टीन फिफ्टिन सेवन&#8217; के नाम से पुस्तक लिखी। मजूमदार द्वारा लिखित पुस्तक से 1857 की घटना के स्वरूप के बारे में मजूमदार एवं उनके शिष्य एस.बी.चौधरी में बौद्धिक बहस छिड़ गई, जिसका समापन करने के लिए 1965 में एस.बी.चौधरी ने <strong>‘थ्योरी ऑफ इंडियन म्युटिनी’</strong> नामक पुस्तक प्रकाशित की। इस पुस्तक में 1857 से 1965 तक इस महासमर के विषय में जितने मत प्रकट हुए थे और जितने नामकरण हुए थे, उन सभी की समीक्षा की गई है। इस पुस्तक के अंत में सावरकर द्वारा प्रस्तुत चित्रण और नामकरण को ही तथ्यों की कसौटी पर सही ठहराया है।</p>
<p>उपरोक्त वर्णित सात पुस्तकें ही 1857 के स्वातंत्र्य समर का वर्णन करने के लिए रची गई, ऐसा नहीं है। और भी अनेक रचनाएँ है जिनका वर्णन शब्द सीमा के कारण यहाँ नहीं हो सका। एक जानकारी के अनुसार, विनायक दामोदर सावरकर ने जब ‘1857 प्रथम स्वतंत्रता समर’ ग्रन्थ की रचना की उस समय उनके सामने मात्र दो हजार दस्तावेज उपलब्ध थे। आज इस महासंग्राम पर लगभग पच्चीस हजार दस्तावेज उपलब्ध है। कबीर जी ने कहा है- “जिन खोजा तिन पाइया,<strong> </strong><strong>गहरे पानी पैठ”</strong>। हम भी इस साहित्य सागर में डुबकी लगाने का विचार करें।</p>
<p>(लेखक विद्या भारती दिल्ली प्रान्त के संगठन मंत्री है और विद्या भारती प्रचार विभाग की केन्द्रीय टोली के सदस्य है।)</p>
<p><strong>और पढ़ें</strong> : <span style="color: #000080;"><strong><a style="color: #000080;" href="https://rashtriyashiksha.com/indian-freedom-struggle-and-revolutionaries-of-assam/" target="_blank" rel="noopener">भारतीय स्वाधीनता संग्राम और असम के क्रान्तिकारी</a></strong></span></p>
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		<title>भारतीय स्वाधीनता संग्राम और असम के क्रान्तिकारी</title>
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		<dc:creator><![CDATA[राष्ट्रीय शिक्षा]]></dc:creator>
		<pubDate>Thu, 07 Jul 2022 05:38:03 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[अमृत महोत्सव]]></category>
		<category><![CDATA[नवीनतम]]></category>
		<category><![CDATA[1857]]></category>
		<category><![CDATA[Amrit Mahotsav]]></category>
		<category><![CDATA[Bhartiya Education]]></category>
		<category><![CDATA[indian education]]></category>
		<category><![CDATA[Rashtriya shiksha]]></category>
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					<description><![CDATA[<p> &#8211; डॉ० पवन तिवारी श्रीमन्त शंकरदेव की पावन धरा भारतीय संस्कृति के ख्यात उद्घोष ‘वीरभोग्या वसुन्धरा’ को चरितार्थ करती है। पूर्वोत्तर के द्वार कहे जाने वाले असम प्रदेश के क्रान्तिकारियों&#8230; </p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: right;"> &#8211; डॉ० पवन तिवारी</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone  wp-image-5558" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2022/07/Untitled-1-300x200.jpg" alt="" width="1034" height="689" srcset="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2022/07/Untitled-1-300x200.jpg 300w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2022/07/Untitled-1-1024x683.jpg 1024w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2022/07/Untitled-1-768x512.jpg 768w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2022/07/Untitled-1-1536x1024.jpg 1536w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2022/07/Untitled-1-2048x1365.jpg 2048w" sizes="auto, (max-width: 1034px) 100vw, 1034px" /></p>
<p>श्रीमन्त शंकरदेव की पावन धरा भारतीय संस्कृति के ख्यात उद्घोष ‘वीरभोग्या वसुन्धरा’ को चरितार्थ करती है। पूर्वोत्तर के द्वार कहे जाने वाले असम प्रदेश के क्रान्तिकारियों ने अपने द्वार पर ही ब्रिटिश सरकार से लोहा लिया था। दुर्भाग्य से एकपक्षीय ऐतिहासिक लेखन ने उनके नामों को भारतीय आम जनमानस तक नहीं जाने दिया और उन्हें विस्मृत कर दिया गया, किन्तु साम्प्रतिक ऐतिहासिक पुनर्लेखन में उन भूले हुए क्रान्तिकारियों को याद करना अब हम सभी की जिम्मेदारी बन जाती है। असम की इस धरा पर ब्रिटिश सरकार के खिलाफ विरोध का बिगुल बजाने वाले कनकलता बरुआ, भोगेश्वरी फुकनानी, पुष्पलता दास, चन्द्रप्रभा सैकियानी, मणिराम दीवान, कुशल कोंवर, शंभुधन फुंगलो, भोगोई देवी, बोधुरा कोच, हरि डेका, धनदेव सरमा आदि जैसे अप्रतिम क्रान्तिकारी हुए हैं।</p>
<p><strong>कनकलता बरुआ</strong> का जन्म 1924 में असम प्रान्त में हुआ और बालपन से ही वे राष्ट्रीय स्वाधीनता संग्राम में सम्मिलित हो गईं। मात्र 7 वर्ष की छोटी आयु में ही उन्होने 1931 के वर्ष में ब्रिटिश विरोधी रैलियों में भाग लिया। 1942 के भारत छोडो आन्दोलन में उन्होने असम की ओर से क्रान्तिकारियों का नेतृत्व किया। ब्रिटिश फौज के समक्ष वे हाथ में तिरंगा लेकर अपने सहयोगियों के आत्मबल में वृद्धि करते हुए आगे आईं और ब्रिटिश गोलीबारी में उन्होने अपनी जान भारतमाता के चरणों में न्यौछावर कर दी। किन्तु, आज वही तिरंगा लिये हुए असम की दीवारों पर उभरे और चित्रांकित दृश्य उनके बलिदान की गाथा गा रहे हैं।</p>
<p><strong>भोगेश्वरी फुकनानी</strong> (1872-1942) एक जिजीविषा वाली क्रान्तिकारी महिला थीं। असम के नौगांव जिले के बहरामपुर कस्बे में उन्होने 70 वर्ष की आयु में ब्रिटिश विरोधी आन्दोलन का नेतृत्व किया। इन्होने व्यक्तिगत प्रयास से स्थानीय महिलाओं का एक संगठन बनाकर उन्हें भारतीय स्वाधीनता संग्राम में सहभागिता हेतु प्रेरित किया। भारत छोडो आन्दोलन (1942) के दौरान ब्रिटिश कैप्टन फिंस के द्वारा चलाई गई गोली से इन्हें वीरगति प्राप्त हुई। पुष्पलता दास (जन्म – 27 मार्च, 1915) का सम्बन्ध असम के उत्तर लखीमपुर से रहा है। यह एक प्रतिष्ठित समाजसेवी और सक्रिय आन्दोलनकारी महिला थीं। मात्र 11 वर्ष की आयु में इन्होने ‘मुक्ति संघ’ नामक संगठन बनाकर राष्ट्रवादी गतिविधियों में भाग लिया। उन्होंने भगत सिंह की फांसी का पुरजोर विरोध किया था। वे राष्ट्रीय स्वाधीनता हेतु संघर्षरत ‘राष्ट्रीय योजना समिति’ (1940-42) की सक्रिय कार्यकर्त्री रहीं और भारत छोडो आन्दोलन में अपने सफल नेतृत्व का परिचय दिया। स्वातन्त्र्योत्तर भारतीय राजव्यवस्था में इन्होने सांसद के उत्तरदायित्त्व का निर्वहन भी किया था।</p>
<p><strong>चन्द्रप्रभा सैकियानी</strong> (जन्म – 24 दिसम्बर, 1901) का सम्बन्ध असम के कामरूप जिले से है। युवावस्था में वह एक अध्यापिका और बाद में प्रधानाध्यापिका भी बनी। उन्होने गांधी जी के स्वदेशी आन्दोलन में भाग लिया और प्रधानाध्यापिका के दायित्व से त्यागपत्र देकर एक ‘महिला मोर्चा’ बनाया और अपना जीवन भारतमाता के चरणों में समर्पित कर दिया। असम में ब्रिटिशर्स के विरोध के अतिरिक्त, इन्होने शिक्षा के लिए प्राथमिक विद्यालय खोला, किशोरों को नशे की लत से मुक्त कराने हेतु ‘अफीम निषेध आन्दोलन’ में भी सहभागिता की। भारतीय परिप्रेक्ष्य में दिये जा रहे नारे ‘स्वदेशी अपनाओ’ का इन्होने घर-घर जाकर प्रचार किया और अंग्रेजी सामान के बहिष्कार की बात की। भारत छोडो आन्दोलन में कामरूप जिले का इन्होने नेतृत्व किया और अपनी आँखों के सामने इन्होने भारतीय स्वाधीनता प्राप्त होते हुए भी देखी।</p>
<p>ऐसे ही क्रान्तिकारी थे – <strong>मणिराम दीवान</strong>। 24 दिसम्बर, 1806 में जन्मे दीवान ने जोरहाट में अपना पहला स्वदेशी चायबागान लगाया। वे 1857 की क्रान्ति से प्रभावित थे और इसीलिए उन्होने अपने जीवन का अधिकांश समय ब्रिटिश विरोधी आन्दोलन में लगाया। एक अन्य क्रान्तिकारी कुशल कोंवर (जन्म – 1905) भी हुए, जिनका सम्बन्ध असम प्रदेश के गोलाघाट जिले से रहा है। इन्होने भारतीय स्वाधीनता हेतु आयोजित असहयोग आन्दोलन, सत्याग्रह आन्दोलन और भारत छोडो आन्दोलन – इन तीनों आन्दोलनों में महती भूमिका निभाई। वर्ष 1942 में इन्हें अंग्रेजों ने जेल में डाल दिया और बिना उनका सही से पक्ष जाने, 15 जून, 1943 को सुबह फांसी लगा दी। ऐसे वीर को आज पूरा असम याद करता है और इनकी गाथा अब भारत का आम जनमानस भी जानेगा। शंभुधन फुंगलो (1850-1883) ने असम के कछारी क्षेत्र में ब्रिटिशर्स के खिलाफ विद्रोह का नेतृत्व किया। इन्होने अंग्रेजों द्वारा विभक्त किये गए कछारी क्षेत्र के युवाओं को सैन्य-प्रशिक्षण देकर सशस्त्र विद्रोह हेतु एक बृहद् सैन्य-क्षमता अर्जित की और ब्रिटिशर्स के खिलाफ आवाज बुलन्द की।</p>
<p>इसके अतिरिक्त भी असम के ऐसे अनगिनत क्रान्तिकारी हुए हैं, जिन्होने भारतमाता के श्रीचरणों में हंसते-हंसते अपना जीवन न्यौछावर कर दिया। आज आजादी के अमृत महोत्सव में हम सभी का कर्त्तव्य है कि हमारी स्वाधीनता हेतु प्राण न्यौछावर करने वाली इन हुतात्माओं को नमन करें।</p>
<p>(लेखक विद्या भारती पूर्वोत्तर क्षेत्र के संगठन मन्त्री है।)</p>
<p><strong>और पढ़ें</strong> : <span style="color: #000080;"><strong><a style="color: #000080;" href="https://rashtriyashiksha.com/delhi-fights-in-the-war-of-independence-of-1857-part-3/" target="_blank" rel="noopener">1857 के स्वातंत्र्य समर में दिल्ली लड़ती है – 3</a></strong></span></p>
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		<title>1857 के स्वातंत्र्य समर में दिल्ली लड़ती है &#8211; 3</title>
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		<dc:creator><![CDATA[राष्ट्रीय शिक्षा]]></dc:creator>
		<pubDate>Sat, 25 Jun 2022 10:44:44 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[अमृत महोत्सव]]></category>
		<category><![CDATA[नवीनतम]]></category>
		<category><![CDATA[श्री रवि कुमार जी]]></category>
		<category><![CDATA[1857]]></category>
		<category><![CDATA[1857 War Delhi]]></category>
		<category><![CDATA[Delhi War]]></category>
		<category><![CDATA[Rashtriya shiksha]]></category>
		<category><![CDATA[दिल्ली युद्ध]]></category>
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					<description><![CDATA[<p> &#8211; रवि कुमार महेश्वर दयाल द्वारा लिखित ‘दिल्ली मेरी दिल्ली’ पुस्तक में वर्णित है कि इंद्रप्रस्थ यानी दिल्ली अपने जीवन काल में लगभग 300 बार उजड़ी और बसी है। भारत&#8230; </p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: right;"> &#8211; रवि कुमार</p>
<p>महेश्वर दयाल द्वारा लिखित ‘दिल्ली मेरी दिल्ली’ पुस्तक में वर्णित है कि इंद्रप्रस्थ यानी दिल्ली अपने जीवन काल में लगभग 300 बार उजड़ी और बसी है। भारत में शायद ही ऐसा कोई नगर होगा जिसके साथ ऐसा हुआ हो। मन में प्रश्न आता है कि दिल्ली के साथ ही ऐसा क्यों हुआ? खोजने पर ध्यान में आया कि भारत में अधिकांश आक्रमण खैबर दर्रे से हुए। इस मार्ग से लाहौर के बार पहला बड़ा नगर दिल्ली ही होता था। 21 सितम्बर 1857 यानी दिल्ली पर पुनः अंग्रेजों के अधिकार होने के बाद जो हुआ, वह दिल्ली ने शायद ही पहले देखा हो। क्या हुआ होगा उससे पहले व बाद में&#8230;?</p>
<p>ब्रिटिश सेना का घेरा बढ़ता चला गया और क्रांतिकारियों की ओर से घेरा कमजोर पड़ने लगा। दिल्ली का तीन चौथाई भाग अंग्रेजों के हाथ में चला जाने के बाद दिल्ली में क्रांतिकारियों के सेनापति बख्तर खां ने दिल्ली छोड़ने का निश्चय किया। बख्तर खां बादशाह से मिले और बोले, “दिल्ली तो अपने हाथ से चली गई है, परंतु इससे विजय की सारी संभावना अपने हाथ से निकल गई, ऐसा नहीं है। बंद स्थान से लड़ाई लड़ने की अपेक्षा खुले प्रदेश से शत्रु को परेशान करने का दाँव अभी भी निश्चित विजयी होने वाला है।”</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone wp-image-5519" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2022/06/WhatsApp-Image-2022-06-25-at-4.25.11-PM-233x300.jpeg" alt="" width="1243" height="1600" /></p>
<p>बहादुरशाह जफर को भी बख्तर खां ने सुझाव दिया, “शत्रु की शरण में जाने की अपेक्षा लड़ाई करते हुए बाहर निकल जाना ही हमें इष्ट लगता है। ऐसे समय आप भी हमारे साथ चलें और अपने झंडे के नीचे हम स्वराज्य के लिए ऐसे ही लड़ते रहें।” परन्तु बादशाह ने ऐसा नहीं किया और दिल्ली न छोड़ने का निश्चय किया। अंतिम समय तक बादशाह ने अपनी अनिश्चितता और चंचलता बनाए रखी। बख्तर खां का निमंत्रण अस्वीकार कर इलाही बख़्श मिर्जा के उपदेश के अनुसार अंग्रेजों की शरण में जाने लगा। इलाही बख़्श ने विश्वासघात किया। उसने यह समाचार अंग्रेजों को दे दिया। अंग्रेजों ने तत्काल कैप्टन हडसन को उधर भेजा। जीवनदान का वचन लेकर बादशाह ने समर्पण किया और अंग्रेजों ने उसे महल में लाकर कैद में डाल दिया। बादशाह के शहजादों को हडसन ने गोली मारकर मृत्युदंड दिया। विलियम हडसन ने अपनी बहन को पत्र में लिखा, “मैं स्वभाव से निर्दयी नहीं हूँ लेकिन मैं मानता हूँ इन कमबख्त लोगों को धरती से छुटकारा दिला कर मुझे बहुत आनंद की अनुभूति हुई।” यह हडसन की क्रूरता और दिल्ली को हथियाने में मारी गई अंग्रेजी सेना के बदले के रूप में दर्शाता है।</p>
<p>इसके बाद दिल्ली में भयंकर विनाश हुआ। लार्ड एलफिंस्टन जॉन लारेंस को लिखता है- “दिल्ली का घेरा समाप्त हो जाने पर अपनी सेना ने दिल्ली का जो हाल किया वह हृदयद्रावक है। शत्रु और मित्र का भेद न करते हुए सरेआम बदला लिया जा रहा है। लूट में तो हमने नादिरशाह को भी मात दे दी।” जनरल आउट्रम कहता है- “दिल्ली जला दो।”</p>
<p>जो कोई अंग्रेजी सेना के सामने आता उसे गोली मार दी जाती, उनके घरों में आग लगा दी जाती। दिल्ली के अधिकांश मनुष्य घर छोड़कर चले गए। नगर खाली हो गया। वृद्ध, लंगड़े, रुग्ण लोग फांसी पर लटका दिए गए। झज्जर के अब्दुर्रहमान खां, बल्ल्भगढ़ के राजा नाहर सिंह, फरुखनगर के अहमद अली खां को विभिन्न तिथियों में फांसी दे दी गई। कोतवाली और त्रिपुलिया के मध्य में जो हौज था उसके तीनों ओर फांसियाँ खड़ी की गई थीं। उनमें एक बार में 10-12 व्यक्तियों को फाँसी लग सकती थीं। नगर में तीन दिन तक खुली लूटमार होती रही। इसके उपरांत प्राइज एजेंसी का विभाग स्थापित हुआ। इसका कार्य था कि हर प्रकार का लूट-मार का माल एक स्थान पर एकत्र करे और बड़े सस्ते मूल्य पर नीलाम हो। दिल्ली के धार्मिक स्थलों की बड़ी दुर्दशा की गई। पुनः जब दिल्ली में हिन्दू बसाएं गए उन्हें सभी मंदिरों को पवित्र कराना पड़ा। सितम्बर और दिसम्बर 1857 तक दिल्ली में अंग्रेजी सेना का राज्य था और लूट-मार की पूरी स्वतंत्रता थी। संभवतः दिल्ली अपने पूरे इतिहास में इतनी बुरी तरह कभी नहीं लूटी गई होगी।</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone wp-image-5515" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2022/06/afraid-british-conspiracy-to-declare-revolution-unsuccessful-24-300x168.jpg" alt="" width="1198" height="671" srcset="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2022/06/afraid-british-conspiracy-to-declare-revolution-unsuccessful-24-300x168.jpg 300w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2022/06/afraid-british-conspiracy-to-declare-revolution-unsuccessful-24.jpg 460w" sizes="auto, (max-width: 1198px) 100vw, 1198px" /></p>
<p><strong>यह भी पढ़ें</strong> : <strong><em><span style="color: #000080;"><a style="color: #000080;" href="https://rashtriyashiksha.com/delhi-fights-in-the-war-of-independence-of-1857/" target="_blank" rel="noopener">1857 के स्वातंत्र्य समर में दिल्ली लड़ती है – 1</a></span></em></strong></p>
<p>यूरोपियन और नेटिव (स्थानीय) सिपाहियों सहित दिल्ली के घेरे में लगी दस हजार की अंग्रेजी सेना में से चार हजार लोग इस युद्ध में हताहत हुए। क्रांतिकारियों की जो जनहानि हुई होगी उसका विश्वसनीय आंकड़ा मिलना असम्भव है। फिर भी कम से कम पांच से छह हजार तक क्रांतिकारियों की जनहानि हुई ही होगी।</p>
<p>यह इतिहास प्रसिद्ध नगर ‘स्व’ (स्वदेश, स्वतंत्रता और स्वधर्म) के लिए संघर्ष रत रहा। एक सौ चौंतीस दिनों (11 मई से 21 सितम्बर) तक अंग्रेजों जैसे सबल शत्रु की युद्ध कुशलता को धिक्कारता रहा दिल्ली! अपनी दीवार से फिरंगी निशान उखाड़कर अपने निशान की जिस दिन घोषणा हुई, उस दिन से लेकर राजमहल में अंग्रेजी तलवार द्वारा अंतिम स्वदेशी रक्त बिंदु गिरने तक इस नगर ने स्वदेश स्वतंत्रता के कार्य को अलंकृत किया। नेता न होने की स्थिति में समाज अनाथता का अनुभव करता है। संगठन न होने का सेना भी बिखर जाती हैं। अंग्रेजों जैसे बड़े शत्रु का सामना करना पड़े तो वह असह्यता (मजबूरी) होती है। और विशेषकर असली फिरंगी तलवारों की तुलना में अपनों की कम असल देशजों की तलवारें अपने ही प्राण लेने के लिए टूट पड़ती – ऐसी स्थिति में व्याकुलता उत्पन्न होती है। इन चारों बातों की परवाह न करते हुए सारे हिंदुस्तान के नाम पर स्वधर्म प्रतिष्ठा का राष्ट्रीय ध्वज गाड़कर रणभूमि पर वीरों की भांति अचल, मृत्यु का वरण करते हुए लोग दिल्ली के घेरे का इतिहास निष्फल नहीं होने देंगे।</p>
<p>वीर सावरकर लिखते हैं- “हे दिल्ली नगरी! तू गिरी, उसमें कोई लज्जा नहीं। क्योंकि तू स्वराज्य के लिए, स्वधर्म के लिए, स्वदेश के लिए लड़ी थी! अतः ‘दन्तछेदो हि नगानां श्लाघ्यो गिरीविदारणे!’ पर्वत से जूझते हुए चूर्ण हुआ दांत ही गजश्रेष्ठ के लिए होता है।”</p>
<p>(लेखक विद्या भारती दिल्ली प्रान्त के संगठन मंत्री है और विद्या भारती प्रचार विभाग की केन्द्रीय टोली के सदस्य है।)</p>
<p><strong>और पढ़ें</strong> :<strong><span style="color: #000080;"><a style="color: #000080;" href="https://rashtriyashiksha.com/https-rashtriyashiksha-com-delhi-fights-in-the-war-of-independence-of-1857-2/" target="_blank" rel="noopener">1857 के स्वातंत्र्य समर में दिल्ली लड़ती है – 2</a></span> </strong></p>
<p>The post <a href="https://rashtriyashiksha.com/delhi-fights-in-the-war-of-independence-of-1857-part-3/">1857 के स्वातंत्र्य समर में दिल्ली लड़ती है &#8211; 3</a> appeared first on <a href="https://rashtriyashiksha.com">राष्ट्रीय शिक्षा : शिक्षा में समाज प्रबोधन</a>.</p>
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