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	<title>रामायण सत कोटि अपारा Archives - राष्ट्रीय शिक्षा : शिक्षा में समाज प्रबोधन rashtriyashiksha.com</title>
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	<description>सा विद्या या विमुक्तये</description>
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	<title>रामायण सत कोटि अपारा Archives - राष्ट्रीय शिक्षा : शिक्षा में समाज प्रबोधन rashtriyashiksha.com</title>
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		<title>रामायण सत कोटि अपारा-7 (जनजातीय क्षेत्रों में राम कथा)</title>
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		<dc:creator><![CDATA[राष्ट्रीय शिक्षा]]></dc:creator>
		<pubDate>Sat, 15 Aug 2026 04:58:12 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[नवीनतम]]></category>
		<category><![CDATA[रामायण सत कोटि अपारा]]></category>
		<category><![CDATA[श्री रवि कुमार जी]]></category>
		<category><![CDATA[Rashtriya shiksha]]></category>
		<category><![CDATA[भारतीय ज्ञान परम्परा]]></category>
		<category><![CDATA[रामकथा]]></category>
		<category><![CDATA[राष्ट्रीय शिक्षा]]></category>
		<category><![CDATA[श्रीराम]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>Ram katha in tribal area&#x270d; रवि कुमार “राम आव्या जंगल मां, लक्ष्मण संग चाल्या। शबरी माय बेर लई, प्रेम थी थाळ भराल्या॥” “मीठा बेर चाखी-चाखी, राम ने अर्पण काया। जात&#8230; </p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: right;">Ram katha in tribal area<img src="https://s.w.org/images/core/emoji/17.0.2/72x72/270d.png" alt="✍" class="wp-smiley" style="height: 1em; max-height: 1em;" /> रवि कुमार</p>
<p style="text-align: center;"><strong>“राम आव्या जंगल मां</strong><strong>, लक्ष्मण संग चाल्या। </strong></p>
<p style="text-align: center;"><strong>शबरी माय बेर लई, प्रेम थी थाळ भराल्या॥”</strong></p>
<p style="text-align: center;"><strong>“मीठा बेर चाखी-चाखी</strong><strong>, राम ने अर्पण काया। </strong></p>
<p style="text-align: center;"><strong>जात न पूछे रामजी, प्रेम देख राजी थाया॥”</strong></p>
<p style="text-align: justify;">उपरोक्त गीत भील जनजाति में गाया जाने वाला भीली लोकभाषा का गीत है जो वहाँ विवाह आदि प्रसंग पर गाया जाता है। इस प्रसंग में शबरी माता व श्रीराम का उल्लेख है।</p>
<p style="text-align: justify;">रामकथा भारत की सांस्कृतिक परम्परा का जनजातीय आधार भी है। जनजाति क्षेत्रों में रामकथा लिपिबद्ध नहीं है। उसका स्वरूप मौखिक है। रामकथा का यह मौखिक स्वरूप श्रुति-स्मृति के आधार पर पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ता रहा है। जनजाति समाज ने राम को वन का नायक माना है। अलग अलग जनजाति में रामकथा के अलग अलग प्रसंग प्रचलित है। सम्पूर्ण रामकथा किसी जनजाति में प्रचलित है, ऐसा कहना संभव नहीं होगा और इसे खोज पाना भी अत्यंत दुर्लभ है।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>भारत में जनजातीय क्षेत्र</strong></p>
<p style="text-align: justify;">भारत में लगभग 11 करोड़ जनजाति समाज है। ये 11 करोड़ लोग भारत के लगभग 1।5 लाख ग्रामों में बसते हैं। भारत की जनजातियाँ 800+ भाषाई रूपों से जुड़ी हैं और लगभग 90% जनजातियाँ ग्रामीण व वन्य क्षेत्रों में रहती हैं। भारत में जनजातियाँ मुख्यतः तीन बड़े भौगोलिक क्षेत्रों में केंद्रित हैं – 1. <strong>मध्य भारतीय जनजातीय पट्टी</strong> (राजस्थान, गुजरात, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, झारखंड, ओडिशा, महाराष्ट्र – यहाँ लगभग 55-60% जनजातियाँ) 2. <strong>पूर्वोत्तर जनजातीय क्षेत्र </strong>(असम, नागालैंड, मिजोरम, मेघालय, अरुणाचल, त्रिपुरा, मणिपुर &#8211; कई राज्यों में जनजातियाँ बहुसंख्यक) 3. <strong>दक्षिण भारतीय जनजातीय क्षेत्र (</strong>आंध्रप्रदेश, तेलंगाना, कर्नाटक, तमिलनाडु, केरल)। भारत में 705 जनजातियाँ मान्यता प्राप्त है। भारत की प्रमुख जनजातियों में भील, गोंड, संथाल, मीणा, मुंडा, उरांव, नागा समूह, खासी, बोडो, हो, कोय, गरासिया, टोडा, चेचु, अंडमानी जनजातियाँ है। सामान्यतः सभी जनजातियाँ अपनी आजीविका के लिए कृषि व वन उत्पाद पर निर्भर हैं। जनजातीय क्षेत्रों में शिक्षा का स्तर राष्ट्रीय औसत से कम है, परन्तु यहाँ की संस्कृति अत्यंत समृद्ध है और इनका प्रकृति से संबंध उच्च स्तर का है। दण्डकारण्य क्षेत्र (छत्तीसगढ़, ओड़िसा, महाराष्ट्र, आंध्रप्रदेश के हिस्सों में फैला हुआ) रामकथा व जनजातीय संस्कृति का प्रमुख क्षेत्र है।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>रामकथा की मौखिक-वाचिक परम्परा</strong></p>
<p style="text-align: justify;">मौखिक-वाचिक स्वरुप में रामकथा भारत के जनजाति समाज में व्याप्त होकर भारत की सांस्कृतिक परम्परा को आगे बढ़ाती है और वहाँ के समाज में जीवन मूल्यों को खड़ा करती है। रामकथा से उपजे व जनजाति समाज में व्याप्त हुए जीवन मूल्य सर्वदूर अभिव्यक्त हो रहे हैं। रामकथा का यह स्वरूप वहाँ की स्थानीय लोकभाषा/बोली में विभिन्न अवसरों पर गए जाने वाले गीतों, भजनों, नृत्य गीतों, कथा प्रसंगों, दन्त कथाओं, नाटकों, धार्मिक अनुष्ठानों आदि रूपों  में प्रकट होता है। मूलतः जनजाति समाज धर्म परायण है। मातृभूमि के प्रति उसके मन में गहरा लगाव है। भारत भक्ति उसके कण कण में व्याप्त है। वह प्रकृति का पूजक व संवर्धक है। यह धर्म परायणता, मातृभूमि प्रेम, भारत भक्ति, प्रकृति संवर्धन का स्रोत राम कथा ही है, ऐसा कहा जाए तो अतिशयोक्ति नहीं होगी।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>रामकथा की विविधता</strong></p>
<p style="text-align: justify;">जनजातीय क्षेत्रों में रामकथा ने स्थानीय जीवनशैली, संस्कृति, भाषा और संवेदना के अनुरूप स्वरूप ग्रहण किया है। इन क्षेत्रों में राम केवल एक ईश्वर नहीं, बल्कि मानव, वीर, बंधु, लोकनायक और कभी-कभी एक सहज ग्रामीण के रूप में भी प्रकट होते हैं।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>गोंड समाज</strong> में राम वीर पुरुष हैं। वे गोंड परंपरा के ‘संघर्षशील योद्धा’ के रूप में प्रतिष्ठित हैं। सीता को ‘धरती की पुत्री’ और राम को ‘वन का रक्षक’ कहा जाता है। <strong>उरांव समाज</strong> में राम न्यायप्रिय राजा हैं। यहाँ शबरी प्रसंग विशेष रूप से लोकप्रिय है, जिसमें शबरी को ‘माता’ के रूप में सम्मानित किया जाता है। राम वनवासी नहीं, ‘जनप्रिय अतिथि’ के रूप में आते हैं। <strong>रामकथा संथाल</strong> लोकगीतों में ‘सोहराय’ पर्व के समय गाई जाती है। <strong>भीलों की रामकथा</strong> में राम वन का अतिथि नहीं, बल्कि भील समाज का सदस्य है। <strong>निषादराज</strong> और <strong>शबरी प्रसंग</strong> को विशेष महत्व दिया गया है। <strong>कोलाम समाज</strong> राम को ‘रामा’ नाम से पुकारता है। उनकी कथा में सीता और लक्ष्मण के पात्र गौण हैं, जबकि राम का संघर्षपूर्ण जीवन केंद्रीय बिंदु होता है। <strong>कोया जनजातियों</strong> में राम और सीता की पूजा जंगल के देवता और देवी के रूप में की जाती है। राम को ईश्वर नहीं, बल्कि लोक रक्षक के रूप में माना जाता है। <strong>डांग समाज</strong> में रामलीला ‘डांग दरबार’ के समय होती है। यह केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि सामाजिक उत्सव होता है। <strong>बैगा जनजाति </strong>की रामकथा में <strong>लव-कुश</strong> की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण है। लव-कुश को स्वतंत्र योद्धा, लोकनायक और अपने माँ के रक्षक के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। <strong>राभा जनजाति</strong> समाज में भारीगान के नाट्य मंचन में ‘रावण वध’ और ‘लक्ष्मणार शक्तिसेल’ सम्मिलित हैं। इन दोनों कथाओं में राम की सामाजिक जिम्मेदारी अपने अनुगामियों के प्रति स्नेह और देशभक्ति को प्रस्तुत किया जाता है। <strong>मिजो रामकथा</strong> में अपनी अलग कथावस्तु है। जो वाल्मीकी रामायण का सारांश ग्रहण करती है, परंतु उसमें वन्य तत्व अधिक विद्यमान हैं।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>रामकथा इन नामों से प्रचलित</strong></p>
<p style="text-align: justify;">राजस्थान तथा गुजरात के भीलांचल में <strong>‘राम-सीतामानी वारता’</strong> के नाम से रामकथा की वाचिक परंपरा रही है। ‘भीलों के भारथ’ की ही तरह से इस कथा का संकलन भगवानदास पटेल ने किया है। इसमें कुल तीस सर्ग हैं। मुण्डारी रामायण पूर्वी भारत के मुंडा जनजाति में रामकथा का एक अनूठा रूपभेद है। यह मुंडारी साहित्य की मौखिक-वाचिक परंपरा को समृद्ध करता है। कार्बी समुदाय के लोग असम, अरुणाचल, मेघालय, मिजोरम एवं नागालैंड के कुछ हिस्सों में रहते हैं। कालांतर में वैष्णव प्रभाव स्वरूप इनकी मौखिक परंपरा में ‘कार्बी रामायण’ रामकथा का प्रवेश हुआ। बिरहोर रामायण के अनुसार राजा जनक के राज्य में भीषण अकाल पड़ा। गोंड समुदाय में प्रचलित राम कथा में राम की तुलना में सीता को महत्व दिया गया है और उसके बाद लक्ष्मण को। बंजारा (लंबाणी) रामायण में वाल्मीकि और तुलसी कृति राम-कथाओं का एक तरह से ‘जनजातिकरण’ हो गया है।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>रामकथा के जनजातीय पात्र</strong></p>
<p style="text-align: justify;">श्रीराम की वन गमन यात्रा में जनजातीय पात्र है। इन्हीं जनजातीय पात्रों से जुड़े प्रसंगों के कारण भी रामकथा जनजाति क्षेत्रों में प्रचलित है। ये पात्र है- निषादराज गुह, केवट, शबरी, गिद्धराज जटायु, सुग्रीव, हनुमान, जाम्बवन्त, अंगद।</p>
<p style="text-align: justify;">भीली–निषादी लोकगीत के रूप में प्रचलित है &#8211; “गुहा राजा घाट खड़ा, राम लियो अंग लाइ। वन औ नगर एक भए, मित्रता री छाँव छाई॥” केवट लोकभजन के रूप में पूर्वी भारत में गाया जाता है &#8211; “पहिले पाँव पखारब राम, तब नैया चढ़इब हो। मोरे घाट पधारे आज, भाग जगइब हो॥” भील शबरी गीत में राम के वन आगमन को बताया है &#8211; “शबरी रै बेर सजाया, राम आवे वनमां। मीठा-तीता परख परख, धर्या प्रेम थाल मां॥” गोंडी वीरगाथा में जटायु का वर्णन है &#8211; “जटायु पंख पसार उड़े, सीता राखन जाय। प्राण दिए वन धर्म खातिर, राम नाम सुनाय॥” गोंड जनजाति में राम-सुग्रीव मित्रता का उल्लेख आता है &#8211; “सुग्रीवा टोला बोलाया, राम संग हाथ मिलाया। जंगल जन सब साथ चले, रावन राज गिराया॥” गोंड–भील वीर गीत में हनुमान की वीरता को दर्शाया है &#8211; “हनुमंत जंगल रो वीर, राम दूत कहाय। डोंगर फांदी उड़ चल्यो, सीता खबर लाय॥” लोककथा गीत जाम्बवंत के बारे में बताया है &#8211; “जामवंत बूढ़ा ज्ञानी, वीरन राह बताय। भूल गयो बल हनुमंत, शक्ति याद दिलाय॥” युद्ध गीत के रूप में अंगद &#8211; “अंगद पांव जमाय खड़ा, लंका डोले सारी। वन के बालक शक्ति देख, डरी रावन सवारी॥”</p>
<p style="text-align: justify;">स्वामी विवेकानंद ने उदधृत किया &#8211; “भारत की आत्मा ग्रामों और वनों में निवास करती है; रामायण इसी जीवित भारत की कथा है।” आचार्य विनोबा भावे में ‘<em>गीता प्रवचन एवं रामायण चिंतन व्याख्यान’ </em>में कहा है- “रामायण भारत की लोक आत्मा है। इसे जनजातियों ने गाया, जिया और पीढ़ी-दर-पीढ़ी सुरक्षित रखा।” रामधारी सिंह दिनकर अपनी कृति ‘संस्कृति के चार अध्याय’ में कहते है &#8211; “राम केवल अयोध्या के नहीं, वन और पर्वतों के भी नायक हैं।”</p>
<p><span style="color: #0000ff;"><strong>और पढ़े: <a style="color: #0000ff;" href="https://rashtriyashiksha.com/shri-ram-van-gaaman-sthal/" target="_blank" rel="noopener">रामायण सत कोटि अपारा-6 (श्रीराम वन गमन स्थल)</a></strong></span></p>
<p style="text-align: justify;">(लेखक विद्या भारती जोधपुर प्रान्त के संगठन मंत्री है।)</p>
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		<title>रामायण सत कोटि अपारा-6 (श्रीराम वन गमन स्थल)</title>
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		<dc:creator><![CDATA[राष्ट्रीय शिक्षा]]></dc:creator>
		<pubDate>Thu, 27 Feb 2025 09:07:55 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[नवीनतम]]></category>
		<category><![CDATA[रामायण सत कोटि अपारा]]></category>
		<category><![CDATA[श्री रवि कुमार जी]]></category>
		<category><![CDATA[bhartiya shiksha]]></category>
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		<category><![CDATA[loard ram]]></category>
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		<category><![CDATA[Rashtriya shiksha]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>✍ रवि कुमार श्रीराम भारत की आत्मा है। श्रीराम भारत के प्राण है। श्रीराम भारत के जन जन के राम है। वे जन जन के राम तब बने, जब वन&#8230; </p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: right;"><img src="https://s.w.org/images/core/emoji/17.0.2/72x72/270d.png" alt="✍" class="wp-smiley" style="height: 1em; max-height: 1em;" /> रवि कुमार</p>
<p><img fetchpriority="high" decoding="async" class="alignnone wp-image-8368" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2025/02/22_07_2022-ald_ram_van_gaman_22914268-300x169.jpg" alt="" width="1424" height="802" srcset="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2025/02/22_07_2022-ald_ram_van_gaman_22914268-300x169.jpg 300w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2025/02/22_07_2022-ald_ram_van_gaman_22914268-1024x576.jpg 1024w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2025/02/22_07_2022-ald_ram_van_gaman_22914268-768x432.jpg 768w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2025/02/22_07_2022-ald_ram_van_gaman_22914268.jpg 1200w" sizes="(max-width: 1424px) 100vw, 1424px" /></p>
<p style="text-align: justify;">श्रीराम भारत की आत्मा है। श्रीराम भारत के प्राण है। श्रीराम भारत के जन जन के राम है। वे जन जन के राम तब बने, जब वन के राम बने! श्रीराम का चरित्र जो सर्व व्याप्त है, उसका अधिक भाग वनवासी राम का ही है। तुलसीदास जी ने लिखा है – ‘निसिचर हीन करउँ महि भुज उठाइ पन कीन्ह’ &#8211; राम ने दोनों हाथ उठाकर प्रतिज्ञा की थी कि इस पृथ्वी को राक्षस विहीन कर दूँगा। और राम ने यह प्रतिज्ञा पूर्ण की। वनवासी राम इस दौरान जहां जहां गए उसे श्रीराम वन गमन मार्ग कहा जाता है, जिसके अवशेष आज भी उपलब्ध है। आइए इनके बारे में जानने का प्रयास करते हैं।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>वाल्मीकि रामायण</strong></p>
<p style="text-align: justify;">वाल्मीकि रामायण के अयोध्या काण्ड में श्रीराम वन गमन का वर्णन आता है &#8211;</p>
<p style="text-align: center;"><strong>इयमद्य निशा पूर्वा सौमित्रे प्रहिता वनम्।</strong></p>
<p style="text-align: center;"><strong>वनवासस्य भद्रं ते न चोत्कण्ठितुमर्हसि॥ </strong>अयोध्या काण्ड -४६.२<strong> ॥</strong></p>
<p style="text-align: justify;">अर्थात ‘सुमित्रानन्दन! तुम्हारा कल्याण हो। हम लोग जो वन की ओर प्रस्थित हुए हैं, हमारे उस वनवास की आज यह पहली रात प्राप्त हुई है; अतः अब तुम्हें नगर के लिये उत्कण्ठित नहीं होना चाहिए।’</p>
<p style="text-align: justify;">इसी प्रकार युद्धकाण्ड में लंका विजय पश्चात अयोध्या आगमन का भी वर्णन है –</p>
<p style="text-align: center;"><strong>स्वागतं ते महाबाहो कौसल्यानन्दवर्धन। </strong></p>
<p style="text-align: center;"><strong>इति प्राञ्जलयः सर्वे नागरा राममब्रुवन्॥ </strong>युद्धकाण्ड- १२७.५२<strong> ॥</strong></p>
<p style="text-align: justify;">अर्थात उस समय अयोध्या के समस्त नागरिक हाथ जोड़कर श्रीरामचन्द्र जी से एक साथ बोल उठे- ‘माता कौसल्या का आनन्द बढ़ाने वाले महाबाहु श्रीराम! आपका स्वागत है, स्वागत है’।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>तुलसीदासकृत रामचरितमानस</strong></p>
<p style="text-align: justify;">तुलसीकृत रामचरितमानस के अयोध्या काण्ड में श्रीराम वनगमन का वर्णन आता है –</p>
<p style="text-align: center;"><strong>बालक बृद्ध बिहाइ गृहँ लगे लोग सब साथ।</strong></p>
<p style="text-align: center;"><strong>तमसा तीर निवासु किय प्रथम दिवस रघुनाथ ॥ </strong>अयोध्या काण्ड &#8211; दोहा ८४<strong> ॥</strong></p>
<p style="text-align: justify;">अर्थात ‘बच्चों और बूढ़ों को घरों में छोड़कर सब लोग साथ हो लिए। पहले दिन श्रीरघुनाथ जी ने तमसा नदी के तीर पर निवास किया।’</p>
<p style="text-align: justify;">रामचरितमानस के उत्तरकाण्ड में अयोध्या आगमन का वर्णन है –</p>
<p style="text-align: center;"><strong>प्रभु बिलोकि हरषे पुरबासी। </strong><strong>जनित बियोग बिपति सब नासी ।। </strong></p>
<p style="text-align: center;"><strong>प्रेमातुर सब लोग निहारी। कौतुक कीन्ह कृपाल खरारी ।। </strong>उत्तरकाण्ड &#8211; दोहा २<strong> ।।</strong></p>
<p style="text-align: justify;">अर्थात ‘प्रभु को देखकर अयोध्यावासी सब हर्षित हुए। वियोग से उत्पन्न सब दुःख नष्ट हो गए। सब लोगों को प्रेमविह्वल (और मिलने के लिये अत्यन्त आतुर) देखकर खर के शत्रु कृपालु श्रीराम जी ने एक चमत्कार किया।’</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>श्रीराम वन गमन मार्ग</strong></p>
<p style="text-align: justify;">श्रीराम वन में दो बार गए। एक बार विश्वामित्र जी के साथ गए, यह यात्रा अयोध्या से मिथिला तक की है। दूसरी बार चौदह वर्ष के वनवास के दौरान गए। दोनों मार्ग अलग अलग है। दोनों मार्ग आज की भौगोलिक रचना के अनुसार उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखण्ड, उड़ीसा, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र, आंध्रप्रदेश, तमिलनाडु और श्रीलंका इन क्षेत्रों से होकर निकलता है। यह इतना लंबा मार्ग है, जिसे चौदह वर्ष के दौरान श्रीराम, जानकी व लक्ष्मण ने पैदल ही पूर्ण किया था।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>श्रीराम वन गमन स्थल</strong></p>
<p style="text-align: justify;">श्रीराम की वन यात्रा के दौरान कुल कितने स्थान होंगे इसके लिए अलग अलग मत आते हैं। दिल्ली के शोधकर्त्ता डॉ. रामअवतार ने स्वयं जाकर उनके आज के अवशेषों आदि को खोजकर कुल २९० स्थानों के बारे में बताया है जोकि ज्ञात है। पहले वर्ग में ४१ स्थल है जो अयोध्या से मिथिला के मार्ग में है। और २४९ स्थल चौदह वर्ष के वनवास के दौरान अयोध्या से श्रीलंका मार्ग में है। चौदह वर्ष, इतना लंबा मार्ग और भी स्थान रहे होंगे जोकि अभी अज्ञात है।</p>
<p style="text-align: justify;">‘चित्रकूट के घाट पर, भई संतन की भीर, तुलसीदास चंदन घिसे, तिलक देत रघुवीर’। चित्रकूट वह स्थान है जहाँ पर तुलसीदास जी को प्रभु राम के दर्शन हुए थे। आज भी यह चौपाई मन्दाकिनी नदी तट पर स्थित घाट पर लिखी हुई मिलती है। श्रीराम वन यात्रा के दौरान भरत श्रीराम से मिलने चित्रकूट ही आए थे और उनकी पादुका लेकर गए थे। इन पादुकाओं को सिंहासन पर रखकर चौदह वर्षों तक साधुवेश में कुटिया में रहकर राम का राज्य मानकर शासन चलाया। इस प्रसंग का वाल्मीकि रामायण में बड़ा ही सुंदर वर्णन है &#8211;</p>
<p style="text-align: center;"><strong>अधिरोहार्य पादाभ्यां पादुके हेमभूषिते।</strong></p>
<p style="text-align: center;"><strong>एते हि सर्वलोकस्य योगक्षेमं विधास्यतः॥</strong> अयोध्याकाण्ड &#8211; ११२.२१॥</p>
<p style="text-align: justify;">अर्थात भरत श्रीराम से बोले – ‘आर्य! ये दो सुवर्णभूषित पादुकाएँ आपके चरणों में अर्पित हैं, आप इन पर अपने चरण रखें। ये ही सम्पूर्ण जगत् के योगक्षेम का निर्वाह करेंगी’।</p>
<p style="text-align: center;"><strong>सोऽधिरुह्य नरव्याघ्रः पादुके व्यवमुच्य च।</strong></p>
<p style="text-align: center;"><strong>प्रायच्छत् सुमहातेजा भरताय महात्मने॥ </strong>अयोध्याकाण्ड &#8211; ११२.२२ ॥</p>
<p style="text-align: justify;">अर्थात ‘तब महातेजस्वी पुरुषसिंह श्रीराम ने उन पादुकाओं पर चढ़कर उन्हें फिर अलग कर दिया और महात्मा भरत को सौंप दिया’।</p>
<p style="text-align: justify;">कर्नाटक में पंपा सरोवर के निकट शबरी आश्रम है। इस आश्रम में प्रभु श्रीराम व लक्ष्मण पधारे थे जिसका बड़ा भव्य वर्णन रामचरितमानस के आरण्यक काण्ड में किया गया है –</p>
<p style="text-align: center;"><strong>ताहि देइ गति राम उदारा। सबरी के आश्रम पगु धार ॥</strong></p>
<p style="text-align: center;"><strong>सबरी देखि राम गृहँ आए। मुनि के बचन समुझि जियँ भाए॥ </strong>आरण्यक काण्ड &#8211; दोहा – ३३.३॥</p>
<p style="text-align: justify;">अर्थात उदार श्रीरामजी जटायु गति देकर शबरी जी के आश्रम में पधारे। शबरी जी ने श्रीरामचन्द्र जी को घर में आये देखा, तब मुनि मतङ्ग जी के वचनों को याद करके उनका मन प्रसन्न हो गया॥</p>
<p style="text-align: center;"><strong>सरसिज लोचन बाहु बिसाला। जटा मुकुट सिर उर बनमाला॥</strong></p>
<p style="text-align: center;"><strong>स्याम गौर सुंदर दोउ भाई। सबरी परी चरन लपटाई॥ </strong>आरण्यक काण्ड &#8211; दोहा – ३३.४ ॥</p>
<p style="text-align: justify;">अर्थात कमल-सदृश नेत्र और विशाल भुजा वाले, सिर पर जटाओं का मुकुट और हृदय पर वनमाला धारण किये हुए सुन्दर साँवले और गोरे दोनों भाइयों के चरणों में शबरी जी लिपट पड़ीं ॥</p>
<p style="text-align: justify;">आज की भौगिलिक रचना अनुसार कुछ ज्ञात स्थानों की जानकारी निम्न है –</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>पहला वर्ग (अयोध्या से मिथिला व जनकपुर)</strong></p>
<p style="text-align: justify;">ताल सलोना (अजमगढ़), बारदुअरिया (मऊ), लखनेश्वरडीह (बलिया), भरोली (बलिया), परेव (पटना), त्रिगना घाट (पटना), रामचौरा मंदिर (वैशाली), गौतम आश्रम (दरभंगा), विश्वामित्र आश्रम (मधुबनी), गिरिजा मंदिर फुलहर (मधुबनी), जनकपुर (नेपाल), मणिमंडप (जनकपुर), सीताकुंड वेदीवन (पूर्वी चंपारण), डेरवां (गोरखपुर), दोहरीघाट (मऊ)।</p>
<p><img decoding="async" class="alignnone  wp-image-8372" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2025/02/wpid-wp-1421687430691-300x228.jpeg" alt="" width="1418" height="1078" srcset="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2025/02/wpid-wp-1421687430691-300x228.jpeg 300w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2025/02/wpid-wp-1421687430691.jpeg 480w" sizes="(max-width: 1418px) 100vw, 1418px" /></p>
<p style="text-align: justify;"><strong>दूसरा वर्ग (अयोध्या से श्रीलंका)</strong></p>
<p style="text-align: justify;"><strong>उत्तर प्रदेश</strong> &#8211; तमसा नदी तट पर मंडार गाँव, बेसुई नाला, गोमती नदी- सुल्तानपुर, सई नदी &#8211; भगवान कीनाराम आश्रम रायबरेली, शृंगवेरपुर (सिंगरौर) गंगा तट, कुराई घाट, खुरई गाँव टापू, प्रयाग वन, वाल्मीकि आश्रम लालापुर, चित्रकूट कामदगिरि- मंदाकिनी नदी, भरत कूप, राजपुर प्रभुघाट।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>मध्यप्रदेश</strong> &#8211; शरभंग आश्रम सतना, सुतीक्ष्णआश्रम, अत्रि ऋषि का आश्रम सतना, दंडकारण्य, शहडोल (अमरकंटक), रामवन (सतना), रक्सैलवा &#8211; रामशैल, नचना चौमुखनाथ धाम पन्ना, सिद्धाश्रम (जिला पन्ना), चरणतीर्थ (विदिशा), लक्ष्मण पहाड़ी।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>छत्तीसगढ़</strong> &#8211; दंडकारण्य का क्षेत्र, सीतामढ़ी गंधिया, सीतामढ़ी हरचौका, सीतामढ़ी, विश्रामपुर &#8211; अम्बिकापुर, लक्ष्मणगढ़, रायगढ़, दमाली गाँव (अंविकापुर), बन्दरकोट, राजिम &#8211; लोमस ऋषि आश्रम, सिहावा, कांकेर-नारायणपुर, राकसहाड़ा, गीदम दंतेवाड़ा, इंजरम।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>झारखण्ड</strong> – सिमडेगा-गुमला।</p>
<p style="text-align: justify;">उड़ीसा – कोरापुट, मलकानगिरी क्षेत्र।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>महाराष्ट्र</strong> &#8211; अगस्ती &#8211; मनमाड, पंचवटी (नासिक), सर्वतीर्थ, लक्ष्मण सरोवर मुम्बई सह्याद्रि, नांदेड़, उमरधा (होशंगाबाद)।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>गुजरात</strong> &#8211; सापुतारा जिला डांग।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>आंध्रप्रदेश</strong> &#8211; भद्राचलम, तुंगभद्रा व कावेरी नदी क्षेत्र, तिरुपति-कोदंड, कोनावरम।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>तेलंगाना</strong> &#8211;  खम्मम, पर्णशाला, इलेन्तु कोंटा करीम नगर, कंदकुर्ती (निजामाबाद), बासर।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>कर्नाटक</strong> &#8211; ऋष्यमूक पर्वत, बेलगाम, हम्पी, रामनाथपुरम, चुनचुन कट्टे (कृष्ण राजघाट), भुंभा-भुंभी मंदिर रामनगर (बैंगलुरु), शबरी आश्रम पम्पा सरोवर।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>तमिलनाडु </strong>&#8211; कोड़ीकरई, रामेश्वरम, धनुषकोटि, गंधमादन पर्वत, मंडपम।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>श्रीलंका</strong> – ‘नुवारा एलिया’ पर्वत शृंखला।</p>
<p style="text-align: justify;">श्रीराम वन गमन यात्रा के स्थलों का आज भी धार्मिक, सांस्कृतिक, ऐतिहासिक व धार्मिक महत्व है। हर स्थान का अपना एक कथा-प्रसंग है जो वहाँ के स्थानीय समाज को राम और इस भूमि के साथ जोड़े हुए है। किसी अज्ञात कवि ने कुछ पंक्तियों में इस भाव को प्रकट करते हुए कहा है &#8211; “चलो चलें उन पथों पर आज, जहाँ चले थे प्रभु रघुराज। वन-वन भटके, कण-कण में बसे, हर पग पावन, हर स्थल विराज॥” “वन गमन के पथ पर चलकर, समझें राम का त्याग महान। धर्म, कर्तव्य, मर्यादा का, करें सदैव हम सब सम्मान॥”</p>
<p style="text-align: justify;">तुलसीदास जी ने लिखा है – “राम वन गमन कथा अति पावन, करत चरित जग मंगल दावन। पिता वचन पालन की रीती, सिखवत सकल धरम की नीती॥” महात्मा गाँधी जी ने श्रीराम वन गमन के बारे कहा है – “श्रीराम का वनगमन त्याग और कर्तव्य का सर्वोच्च उदाहरण है। उन्होंने राजसी वैभव को त्यागकर पिता की आज्ञा का पालन किया, जो सच्चे नेतृत्व का आदर्श है।” स्वामी विवेकानंद जी ने कहा है – “श्रीराम का वनगमन केवल एक घटना नहीं, बल्कि त्याग, तपस्या और कर्तव्य का महान पाठ है। यह दर्शाता है कि जीवन में सुख-सुविधाओं से बड़ा धर्म का पालन है।”</p>
<p style="text-align: justify;">(लेखक विद्या भारती जोधपुर प्रान्त के संगठन मंत्री है।)</p>
<p><strong>और पढ़ें : <span style="color: #0000ff;"><a style="color: #0000ff;" href="https://rashtriyashiksha.com/rama-katha-in-sanskrit-literature/" target="_blank" rel="noopener">रामायण सत कोटि अपारा-5 (संस्कृत साहित्य में रामकथा)</a></span></strong></p>
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		<title>रामायण सत कोटि अपारा-5 (संस्कृत साहित्य में रामकथा)</title>
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		<dc:creator><![CDATA[राष्ट्रीय शिक्षा]]></dc:creator>
		<pubDate>Sat, 19 Oct 2024 06:12:50 +0000</pubDate>
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		<category><![CDATA[श्री रवि कुमार जी]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>✍ रवि कुमार रामकथा का आदि स्रोत ‘रामायण’ ही है। राष्ट्रकवि रवींद्रनाथ ठाकुर ‘रामायण’ के भारतीय जन-मानस में व्याप्ति पर लिखते हैं, “रामायण की कथा से भारतवर्ष के क्या बालक,&#8230; </p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: right;"><img src="https://s.w.org/images/core/emoji/17.0.2/72x72/270d.png" alt="✍" class="wp-smiley" style="height: 1em; max-height: 1em;" /> रवि कुमार</p>
<p><img decoding="async" class="alignnone  wp-image-8043" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2024/10/valmiki-ramayana-in-hindi-300x169.jpg" alt="" width="1367" height="770" srcset="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2024/10/valmiki-ramayana-in-hindi-300x169.jpg 300w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2024/10/valmiki-ramayana-in-hindi-1024x576.jpg 1024w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2024/10/valmiki-ramayana-in-hindi-768x432.jpg 768w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2024/10/valmiki-ramayana-in-hindi-1536x864.jpg 1536w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2024/10/valmiki-ramayana-in-hindi.jpg 1920w" sizes="(max-width: 1367px) 100vw, 1367px" /></p>
<p style="text-align: justify;">रामकथा का आदि स्रोत ‘रामायण’ ही है। राष्ट्रकवि रवींद्रनाथ ठाकुर ‘रामायण’ के भारतीय जन-मानस में व्याप्ति पर लिखते हैं, “रामायण की कथा से भारतवर्ष के क्या बालक, क्या वृद्ध, क्या स्त्रियां सब को केवल शिक्षा ही नहीं मिलती है, शिक्षा के साथ-साथ उन्हें आनन्द भी मिलता है। भारतवासियों ने रामायण को शिरोधार्य ही नहीं माना है, उन्होंने उसको अपने हृदय सिंहासन पर स्थापित किया है।”</p>
<p style="text-align: justify;">संस्कृत साहित्य में महर्षि वाल्मीकि आदिकवि हैं और उनकी कालजयी कृति ‘रामायण’ रामकथा की आदि रचना है। संस्कृत साहित्य में ‘रामायण’ को आदि काव्य का स्थान प्राप्त है। संस्कृत साहित्य के साथ दूसरी भारतीय भाषाओं में रचित रामकथा का आदि स्रोत रामायण ही है। प्रो. राधावल्लभ त्रिपाठी इस विषय मे लिखते हैं, “वाल्मीकि की रचना प्रथम उपलब्ध ‘रामायण’ है। आगे चलकर इससे प्रेरित होकर संस्कृत, प्राकृत तथा अन्य भारतीय भाषाओं में अनेक ‘रामायणों’ की रचना हुई। योगवशिष्ठ, अध्यात्मरामायण, आनन्दरामायण, अद्भुदरामायण, मंत्ररामायण, भुशुंडिरामायण आदि रामकाव्य वाल्मीकि रामायण की प्रत्यक्ष परंपरा से ही है। जैन परंपरा में विमलसूरि का पउमचरित्र (प्राकृत में) तथा रविषेण का पद्मचरित्र भी रामायण काव्य है।”</p>
<p style="text-align: center;"><strong>वाल्मीकि कृत </strong><strong>‘रामायण’</strong></p>
<p style="text-align: center;"><strong>चतुर्विंशत्सहस्राणि श्लोकामुक्तवानृषि:।</strong></p>
<p style="text-align: center;"><strong>तथा सर्गशतान् पञ्च षटकाण्डाणि तथोत्तरम्।।</strong></p>
<p style="text-align: justify;">&#8211; रामायण, बालकांड ४.२</p>
<p style="text-align: justify;">इस कालजयी रचना में 24000 श्लोक, पांच सौ सर्ग तथा सात काण्ड हैं। ‘रामायण’ के रचना काल के बारे में विभिन्न विद्वानों के अलग अलग मत है। वाल्मीकि ‘रामायण’ में चौबीस हजार श्लोक है, इसलिए इसे चतुर्विंशति साहस्री-संहिता’ भी कहा जाता है। गायत्री मंत्र भी 24 अक्षरों का ही है। वाल्मीकि रामायण का प्रत्येक हजारवाँ श्लोक इन्हीं मंत्राक्षरों से प्रारंभ होता है। इस आदिकाव्य को समस्त उत्तरवर्ती काव्यों का बीजरूप भी माना जाता है- ‘काव्यबीजं सनातनम्’। महाकवि भास से लेकर गोस्वामी तुलसीदास तक अनेक मूर्धन्य रचनाकार वाल्मीकीय ‘रामायण’ से उपकृत हुए है। ‘रामायण’ का प्रचार-प्रसार श्रीराम के दोनों पुत्रों कुश और लव द्वारा किया गया। महर्षि वाल्मीकि ने इन दोनों को महाकाव्य के श्लोकों का सस्वर अभ्यास करवाया और उन्होंने गायन कर जनमानस में रामकथा को प्रसारित किया।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>वैदिक युग में रामकथा</strong></p>
<p style="text-align: justify;">वैदिक युग से ही राम शब्द का उल्लेख मिलता है। ऋग्वेद में ‘राम’ शब्द का स्पष्ट उदाहरण मिलता है। ब्राह्मण ग्रंथों में ऐतरेय, शतपथ और उपनिषदों में प्रश्नोपनिषद में ‘रामायण’ के पात्रों का नामोल्लेख मिलता है। पुराणों में राम को भगवान विष्णु का अवतार माना गया है। पुराणों में रामकथा अलग अलग रूपों में व्याप्त है। मार्कण्डेय, ब्राह्मण, वायु, विष्णु, श्रीमद्भागवत, ब्रह्म, गरुड़, हरिवंश, नारदीय, स्कन्द, आदि, और कल्कि पुराण में रामकथा के अंश व्याप्त है। भारतीय इतिहास लेखन की परंपरा में ज्ञान और ग्रंथ की परंपरा व्यक्ति से अधिक प्रभावी रही है। वैदिकयुग, ब्राह्मण, आरण्यक, रामायण और महाभारत युग, सूत्र-युग, ग्रंथ के आधार पर किए गए नामकरण हैं। ‘रामायण’के बाद रामकथा की दृष्टि से सर्वाधिक प्रमुख आख्यान ‘महाभारत’ है। महाभारत के वनपर्व (अध्याय २७३-९३) में ‘रामोपाख्यान’ में ‘रामायण’ की कथा का सार है। इस ‘रामोपाख्यान’ में महाभारत युगीन परिवेश का प्रभाव है।</p>
<p style="text-align: justify;">स्वर्गीय श्री रामदास जी गौड़ ने हिन्दुत्व नामक पत्रिका में 18 रामायणों का उल्लेख किया है। 1. संवृत रामायण, 2. अगस्त्य रामायण, 3. लोमक्ष रामायण, 4. मंजुल रामायण, 5. सौपय रामायण, 6. महामाला रामायण, 7. सौहार्द रामायण, 8. मणिरत्न रामायण, 9. सौर रामायण, 10. चान्द्र रामायण, 11. मैंद रामायण, 12. स्वायं मुव रामायण, 13. मुब्रल रामायण, 14. सुवर्चस रामायण, 15. देव रामायण, 16. श्रावण रामायण, 17. दुरंत रामायण तथा चम्पू रामायण। इसके अतिरिक्त, ‘रामचरितम्’ शीर्षक से संस्कृत में आठ महाकाव्य उपलब्ध है जिनके रचयिता क्रमश: काशीनाथ, अभिनंद, संध्याकार, नंदिन, कामाक्षी, देवविजय, रामवर्मन तथा गो दवर्मन हैं।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>वाल्मीकि </strong><strong>‘रामायण’ का सृजनात्मक विकास</strong></p>
<p style="text-align: justify;">संस्कृत के लौकिक और ललित साहित्य में रूपांतरित हुआ। भास और कालिदास के  साथ रामचरितात्मक महाकाव्य, नाटक, खण्डकाव्य, चम्पूकाव्य और कथा-साहित्य में रामकथा का विस्तार हुआ। फादर कामिल बुल्के ने अपने प्रसिद्ध शोध ‘रामकथा’ में संस्कृत के ललित साहित्य में रामकथा के विस्तार का उल्लेख लिया है। उन्होंने अपने ग्रंथ में जिन महाकाव्यों में ‘रामकथा’ सर्जनात्मक उपस्थिति का उल्लेख किया है उनमें प्रमुख है &#8211; कालिदास का ‘रघुवंश’ (400 ई.), भट्टि का भट्टिकाव्य अथवा रावणवध (500 से 650 ई. के मध्य), कुमारदास का ‘जानकीहरण’ (800 ई.), अभिनन्द का ‘रामचरित’ (9वीं शताब्दी), साकल्यमल्ल का ‘उदासराघव’ (14वीं शताब्दी), वामन भट्टबाण का ‘रघुनाथ चरित’ (15वीं शताब्दी) चक्रकवि का ‘जानकी परिणय (17वीं शताब्दी), बनारस निवासी अद्वैत कवि का ‘रामलिंगामृत’ (17वीं शताब्दी) और मोहन स्वामी का ‘रामरहस्य’ (18वीं शताब्दी)। 20वीं शताब्दी में भी रामकथा पर आधारित संस्कृत महाकाव्य लिखे गए। प्रमुख महाकाव्यों में आचार्य रेवाप्रसाद द्विवेदी का ‘उत्तरसीताचरितम्’ और ‘अभिराज’ राजेन्द्र मिश्र का ‘जानकीजीवनम्’ विशेष प्रशंसित हुए।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>नाट्यलेखन में रामकथा</strong></p>
<p style="text-align: justify;">वाल्मीकि रामायण की कथा को संस्कृत-नाट्य साहित्य में रूपायित करने वाले नाटककारों में भास का नाम लिया जाता है। भास कालिदास के पूर्ववर्ती साहित्यकार हैं। ‘प्रतिमा’ और ‘अभिषेक’ दो नाटकों में उन्होंने रामकथा को संजोया है। ‘प्रतिमनाटक’ में कुल सात अंक है जिसमें अयोध्याकांड की कथावस्तु और सीताहरण का चित्रण किया गया है। ‘अभिषेकनाटक’ ‘प्रतिमा’ का पूरक नाटक है। अभिषेक नाटक में बाली वध से लेकर श्रीराम के अभिषेक तक की कथा का वर्णन है। दिंगनाग का ‘कुंदमाला’ नाटक भास के रूपकों की तरह रचा गया। ‘कुंदमाला’ के छह अंक है। नाट्यशिल्प और रंगमंचीय दृष्टि से यह उल्लेखनीय नाट्य रचना है।</p>
<p style="text-align: justify;">भवभूति का नाम संस्कृत के महत्वपूर्ण नाट्यकारों में लिया जाता है। उनके तीन नाटक हैं &#8211; ‘महावीरचरितम्’, ‘मालतीमाधवम्’ और ‘उत्तररामचरित्तम्’। ‘महावीरचरितम्’ और ‘उत्तररामचरितम’ रामकथा पर आधारित नाटक है। इनका रचना काल 8वीं शताब्दी का प्रारंभ है। दोनों में ही सात अंक है। ‘उत्तररामचरितम्’ भवभूति की प्रसिद्धि का आधार है। इस नाटक से भवभूति को वैश्विक नाटककार का स्थान प्राप्त हुआ। सात अंकों के इस नाटक में राम-राज्याभिषेक, सीता-परित्याग और राम-सीता मिलन की कथा है। नाटक का प्रधान रस ‘करुण-रस’है।</p>
<p style="text-align: justify;">अनंगहर्ष मायूराज का ‘उदात्तराघव’ (900 ई.), मुरारी का ‘अनर्घराघव’, राजशेखर का ‘बाल रामायण’ (10वीं शताब्दी), रामभक्त हनुमान द्वारा रचित ‘हनुमन्नाटक’, दक्षिण भारतीय नाटककार शक्तिभद्र का ‘आश्चर्यचूड़ामणि’ (9वीं शताब्दी), जयदेव का ‘प्रसन्नराघव’ (1200-1250 ई.) की गणना प्रमुख रामकथा नाटकों में होती है।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>स्फुट काव्य और कथा साहित्य</strong></p>
<p style="text-align: justify;">साहित्य-दर्पण के रचयिता विश्वनाथकृत ‘राघवविलास’, मुद्गलभट्ट कृत ‘रामार्यशतक’, कृष्णेन्द्र कृत ‘आर्यारामायण’ प्रसिद्ध स्फुट-काव्य है। कथा-साहित्य की सबसे प्राचीन रचना गुणाढ्यकृत ‘बृहत्कथा’ (प्रथम शतब्दी ई.पू.) में रामकथा भी वर्णित थी। इसके दो विस्तृत रूपांतर मिलते हैं &#8211; जैनियों का ‘वसुदेवहिण्डि’ (5वीं शताब्दी) तथा  सोमदेवकृत ‘कथा-सरित्सागर’। गुणाढ्य की रचना का संक्षेप क्षेमेन्द्र द्वारा ‘बृहत्कथा-मंजरी’ में किया गया है, जिसमें रामकथा अति संक्षिप्त रूप से वर्णित है।</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone  wp-image-8044" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2024/10/मराठी-वाल्मीकि-रामायण-Marathi-Valmiki-Ramayan-5-300x223.jpg" alt="" width="1417" height="1053" srcset="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2024/10/मराठी-वाल्मीकि-रामायण-Marathi-Valmiki-Ramayan-5-300x223.jpg 300w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2024/10/मराठी-वाल्मीकि-रामायण-Marathi-Valmiki-Ramayan-5.jpg 490w" sizes="auto, (max-width: 1417px) 100vw, 1417px" /></p>
<p style="text-align: justify;"><strong>रागकाव्य व चम्पूकाव्य</strong></p>
<p style="text-align: justify;">तीन प्रमुख रागकाव्य भी रचित हुए &#8211; १. रामपाणिवाद रचित ‘गीतारामम्’, २. विश्वनाथसिंह रचित ‘संगीतरघुनन्दनम्’ और ३. गंगाधरशास्त्री कृत ‘संगीतराघवम्’। काव्य व नाट्य के अतिरिक्त चम्पूविधा में भी रामकथा का वर्णन आता है। इनकी संख्या अधिक नहीं है। इसमें प्रमुख है- मालवेश्वर भोजदेव (1005-55 ई.) द्वारा प्रणीत ‘रामायणचम्पू’ जो किष्किंधाकाण्ड तक ही लिखा जा सका। इस चम्पू का युद्धकाण्ड बाद में अनेक कवियों ने लिखा &#8211; १. भारतचम्पू टीकाकार लक्ष्मणसूरि, २. राजचूड़ामणिदीक्षित, ३. घनश्याम कवि, ४. मुक्तिश्वर दीक्षित, ५. गरलपूरी शास्त्री। भोजदेव के अनन्तर वेंकटाध्वरी ने 17वीं शताब्दी में रामकथापरक दो चम्पूकाव्य लिखे &#8211; उत्तरामचरितचम्पू तथा यादवराघवीयचम्पू।</p>
<p style="text-align: justify;"><em>राष्ट्रकवि रविन्द्रनाथ ठाकुर ने अपने ‘रामायण’ शीर्षक लेख में यह उल्लेख किया है, “शताब्दियों पर शताब्दियाँ बीतती चली गईं, तथापि ‘रामायण</em><em>’ का स्रोत भारतवर्ष में तनिक नहीं सूखा है।</em> <em>आज भी प्रतिदिन गाँव-गाँव</em><em>, घर-घर में इसे पढ़ा-सुना जा रहा है” यह तथ्य ब्रह्मा के उसी वचन का सत्यापन करता है कि जब तक पृथ्वी लोक पर पर्वत नदियाँ रहेंगी, तब तक यहाँ रामायण-कथा प्रचारित होती रहेगी- </em></p>
<p style="text-align: center;"><strong>यावत् स्थास्यन्ति गिरयः सरितश्च महीतले।</strong></p>
<p style="text-align: center;"><strong>तावद् रामायणकथा लोकेषु प्रचरिष्यति ॥ वाल्मीकि रामयण १.२.३५ ॥</strong></p>
<p style="text-align: justify;">(लेखक विद्या भारती जोधपुर (राजस्थान) प्रान्त के संगठन मंत्री है।)</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>और पढ़ें : <span style="color: #0000ff;"><a style="color: #0000ff;" href="https://rashtriyashiksha.com/impact-of-ram-katha-in-foreign-countries/" target="_blank" rel="noopener">रामायण सत कोटि अपारा-4 (विदेशों में रामकथा का प्रभाव)</a></span></strong></p>
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		<title>रामायण सत कोटि अपारा-4 (विदेशों में रामकथा का प्रभाव)</title>
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		<dc:creator><![CDATA[राष्ट्रीय शिक्षा]]></dc:creator>
		<pubDate>Wed, 01 May 2024 11:51:13 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[<p>✍ रवि कुमार प्रसिद्ध भजन है &#8211; “हमारे साथ श्री रघुनाथ तो, किस बात की चिंता। शरण में रख दिया जब माथ तो, किस बात की चिंता।।” राम का नाम&#8230; </p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: right;"><img src="https://s.w.org/images/core/emoji/17.0.2/72x72/270d.png" alt="✍" class="wp-smiley" style="height: 1em; max-height: 1em;" /> रवि कुमार</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone wp-image-7580" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2024/05/Ram-300x169.jpg" alt="" width="1418" height="799" srcset="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2024/05/Ram-300x169.jpg 300w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2024/05/Ram-1024x576.jpg 1024w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2024/05/Ram-768x432.jpg 768w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2024/05/Ram.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 1418px) 100vw, 1418px" /></p>
<p style="text-align: justify;">प्रसिद्ध भजन है &#8211; “हमारे साथ श्री रघुनाथ तो, किस बात की चिंता। शरण में रख दिया जब माथ तो, किस बात की चिंता।।” राम का नाम ऐसा है कि एक बार राम नाम की शरण में चले गए तो प्राणी सब चिंताओं से मुक्त हो जाता है। इन्हीं चिंताओं से मुक्ति के लिए अयोध्या में रामलला के प्रत्यक्ष दर्शन के उमड़ पड़ा है भारत! और मात्र भारत ही नहीं तो विश्वभर की दृष्टि आज अयोध्या में विराजित रामलला पर है। रामनाम का विस्तार भारत में तो है ही, साथ में विश्वभर में भी फैला हुआ है राम का नाम!</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>इन देशों में है रामकथा का प्रभाव</strong></p>
<p style="text-align: justify;">विश्वभर के 60 से अधिक देशों में रामकथा का प्रभाव है। इन देशों में रामकथा कैसे पहुंची? सभी के बारे में जानकारी व तथ्य मिलना संभव नहीं है। शरद हेबालकर की दो पुस्तकें हैं – ‘भारतीय संस्कृति का विश्व संचार’ और ‘कृण्वन्तो विश्वमार्यम्’। इन दोनों पुस्तकों में ‘भारतीय संस्कृति दुनिया के कहां-कहां किस रूप में है’ का वर्णन है। भारत से लोग व्यापार करने विश्वभर में जाते रहे हैं। भारत के वैभव को सुनकर भारत दर्शन के लिए भी विश्व के अनेक देशों से लोग यहां आते रहे हैं। बौद्ध मत का विस्तार जब अनेक देशों में हुआ, तब यहां के अनेक बौद्ध भिक्षु वहां गए। यही सब माध्यम रहे होंगे, जिसके कारण रामकथा इतने देशों में पहुंची। जिन देशों में रामकथा का विस्तार हुआ, उनमें प्रमुख देश हैं &#8211; नेपाल, लाओस, कंपूचिया (कंबोडिया), मलेशिया, बाली, जावा, सुमात्रा, इंडोनेशिया, थाईलैंड, फिलीपींस, वियतनाम, बांग्लादेश, तिब्बत, भूटान, श्रीलंका, चीन, मंगोलिया, जापान, कोरिया, सूरीनाम, मॉरीशस, इराक, तुर्किस्तान, सीरिया, मध्य अमेरिका के होंडूरास, मिस्र, तुर्की। इन देशों में साहित्यिक ग्रंथ, शिलालेख, भित्ति चित्र, लोक संस्कृति श्रीराम नाम की विरासत को समेटे हुए है।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>शिलालेखों व शैल चित्रों में मिलते हैं राम</strong></p>
<p style="text-align: justify;">श्रीलंका में वह स्थान मिल गया है जहां रावण की सोने की लंका होती थी। जंगलों के बीच रानागिल की विशालकाय पहाड़ी पर रावण की गुफा है, जहां रावण ने तपस्या की थी। पुष्पक विमान के उतरने के स्थान को भी ढूंढ लिया गया है। श्रीलंका के इंटरनेशनल रामायण रिसर्च सेंटर व पर्यटन विभाग ने मिलकर रामायण से जुड़े पुरातात्विक व ऐतिहासिक महत्व के ५० स्थान ढूंढे हैं। जावा के प्रम्बनन का पुरावशेष चंडी सेवू (चंडी लाराजोंगरांग) है, इस परिसर में २३५ मंदिरों के भग्नावशेष हैं। मध्य भाग में स्थित तीन मंदिरों के मध्य शिव व ब्रह्मा मंदिर में रामकथा के शैल चित्र हैं। इन मंदिरों का निर्माण दक्ष नामक राजकुमार ने ९वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में करवाया गया था। शिव मंदिर में ४२ और ब्रह्मा मंदिर में ३० शैल चित्र हैं। पूर्वी जावा में स्थित चंडी पनातरान में रामकथा के १०६ शैलचित्र बने हुए हैं।</p>
<p style="text-align: justify;">कंपूचिया (कम्बोडिया) के अंकोरवाट मंदिर का निर्माण सम्राट सूर्यवर्मन द्वितीय (१११२-५३ ई.) के काल में हुआ। इस मंदिर में समुद्र मंथन, देव-दानव युद्ध, महाभारत व रामायण से सम्बंध अनेक शैलचित्र हैं। अंकोरवाट के शैलचित्रों में रामकथा अत्यंत विरत व संक्षिप्त है। थाईलैंड की राजधानी बैंकाक के राजभवन परिसर में जेतुवन विहार है। इसके दीक्षा कक्ष में संगमरमर के १५२ शिलापटों पर रामकथा के चित्र बने हुए हैं। लाओस के राजप्रसाद में थाई रामायण ‘रामकिएन’ और लाओ रामायण ‘फ्रलक-फ्रलाम’ की कथाएं अंकित हैं। लाओस का ‘उपमु’ बौद्ध विहार रामकथा-चित्रों के लिए विख्यात है। थाईलैंड के राजभवन परिसर में सरकत बुद्ध मंदिर की दीवारों पर सम्पूर्ण थाई रामायण ‘रामकिएन’ को चित्रित किया गया है।</p>
<p style="text-align: justify;">वियतनाम के बोचान से एक क्षतिग्रस्त शिलालेख मिला है, जिस पर संस्कृत में ‘लोकस्य गतागतिम्’ उकेरा हुआ है। दूसरी या तीसरी शताब्दी में उकेरा गया यह उद्धरण वाल्मीकि रामायण के एक श्लोक की अंतिम लाइन पंक्ति है। “क्रुद्धमाज्ञाय रामं तु वसिष्ठ: प्रत्युवाचह। जाबालिरपि जानीते लोकस्यास्यगतागतिम्।।”अयोध्या कांड ११०.१ ।। वियतनाम के त्रा-किउ से मिले एक और शिलालेख जिसे चंपा के राजा प्रकाशधर्म ने खुदवाया था, में महर्षि वाल्मीकि का स्पष्ट उल्लेख है- ‘कवेराधस्य महर्षे वाल्मीकि पूजा स्थानं पुनस्तस्यकृत’।</p>
<p style="text-align: justify;">ईरान-इराक की सीमा पर स्थित बेलुला में ४००० वर्ष पुराने गुफा चित्र मिलते हैं जिसमें श्रीराम का वर्णन है। मिस्र में १५०० वर्ष पूर्व राजाओं के नाम तथा कहानियां ‘राम’ के जैसी ही मिलती हुई हैं। इटली में ५वीं शताब्दी ईसा पूर्व रामायण से मिलते-जुलते चित्र दीवारों पर मिले हैं। प्राचीन इटली में ‘रावन्ना’ क्षेत्र में रावण की कथा की कलाकृतियाँ मिलती हैं। मध्य अमेरिका के देश होंडुरास के घने जंगलों में हनुमान जी की प्रतिमा है। चीन के उत्तर पश्चिम में स्थित मंगोलिया के लोगों को राम कथा की विस्तृत जानकारी है। वहां के लामाओं के निवास स्थल से वानर पूजा की अनेक पुस्तकें व प्रतिमाएं मिली हैं। मंगोलिया से रामकथा से संबंधित अनेक काष्ठचित्र प्राप्त हुए हैं। इराक में एक भित्ति चित्र में भगवान राम का चित्र मिला है। यह भित्ति चित्र २००० ईसा पूर्व का है, ऐसा कहा जाता है।</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone wp-image-7575" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2024/05/abhay-story5-300x168.png" alt="" width="1154" height="646" srcset="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2024/05/abhay-story5-300x168.png 300w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2024/05/abhay-story5.png 720w" sizes="auto, (max-width: 1154px) 100vw, 1154px" /></p>
<p style="text-align: justify;"><strong>विदेशी साहित्य में राम का नाम</strong></p>
<p style="text-align: justify;">इंडोनेशिया की रामायण ‘काकविन’ २६ अध्यायों का एक विशाल ग्रन्थ है। इंडोनेशिया के पहले राष्ट्रपति सुकर्णो ने पाकिस्तानी प्रतिनिधिमंडल के एक प्रश्न के उत्तर में कहा कि भले ही इस्लाम हमारा मजहब है, पर राम और रामायण हमारी संस्कृति है।</p>
<p style="text-align: justify;">लाओस की संस्कृति पर भारतीयता की गहरी छाप है। लाओस में रामकथा पर आधारित चार रचनाएँ उपलब्ध है- फ्रलक फ्रलाम (रामजातक), ख्वाय थोरफी, ब्रह्मचक्र और लंका नोई। थाईलैंड का रामकथा साहित्य बहुत समृद्ध है। यहां छह प्रकार की रामायण उपलब्ध हैं- १. तासकिन रामायण, २. सम्राट राम प्रथम की रामायण, ३. सम्राट राम द्वितीय की रामायण, ४. सम्राट राम चतुर्थ की रामायण (पद्यात्मक), ५. सम्राट रामचतुर्थ की रामायण (संवादात्मक), ६. सम्राट राम षष्ठ की रामायण (गीति-संवादात्मक)। बर्मा में रामकथा साहित्य की १६ रचनाओं की जानकारी है जिनमें रामवत्थु कृति प्राचीनतम है।</p>
<p style="text-align: justify;">मलयेशिया में रामकथा से सम्बंधित चार रचनाएँ उपलब्ध है- (१) हिकायत सेरीराम, (२) सेरी राम, (३) पातानी रामकथा और (४) हिकायत महाराज रावण। हिकायत सेरीराम हिन्दू रामायण महाकाव्य का मलय साहित्यिक रूपांतरण है। फिलिपींस की रचना महालादिया लावन का स्वरुप रामकथा से बहुत मिलता-जुलता है। चीन में रामकथा बौद्ध जातकों के माध्यम से पहुँची थीं। वहाँ अनामक जातक और दशरथ कथानम का क्रमश: तीसरी और पाँचवीं शताब्दी में अनुवाद किया गया था। तिब्बती रामायण की छह पांडुलिपियाँ तुन-हुआन नामक स्थल से प्राप्त हुई हैं। इनके अतिरिक्त दमर-स्टोन तथा संघ श्री विरचित दो अन्य रचनाएँ भी हैं।</p>
<p style="text-align: justify;">तुर्किस्तान के भाग पूर्वी खोतान की भाषा खोतानी है। खोतानी रामायण की प्रति पेरिस पांडुलिपि संग्रहालय से प्राप्त हुई है। इस पर तिब्बती रामायण का प्रभाव परिलक्षित होता है। मंगोलिया में राम कथा पर आधारित जीवक जातक नामक रचना है। इसके अतिरिक्त वहाँ तीन अन्य रचनाएँ भी हैं। जापान के एक लोकप्रिय कथा संग्रह होबुत्सुशु में संक्षिप्त रामकथा संकलित है। इसके अतिरिक्त वहाँ अंधमुनिपुत्रवध की कथा भी है। श्रीलंका में कुमार दास के द्वारा संस्कृत में जानकी हरण की रचना हुई थी। वहाँ सिंहली भाषा में भी एक रचना है, मलयराजकथाव। श्रीलंका के पर्वतीय क्षेत्र में कोहंवा देवता की पूजा होती है। इस अवसर पर यह कथा कहने का प्रचलन है। नेपाल में रामकथा पर आधारित अनेकानेक रचनाएँ हैं जिनमें भानुभक्तकृत रामायण सर्वाधिक लोकप्रिय है।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>कहां कहां होता है रामलीला मंचन </strong></p>
<p style="text-align: justify;">एशिया के विभिन्न देशों में रामलीला को प्रधानत: दो वर्गों में विभाजित किया जा सकता है &#8211; मुखौटा रामलीला और छाया रामलीला। मुखोटा रामलीला में इंडोनेशिया और मलेशिया के ‘लाखोन’, कंपूचिया के ‘ल्खोनखोल’ तथा बर्मा के ‘यामप्वे’ का प्रमुख स्थान है।</p>
<p style="text-align: justify;">कंपूचिया में रामलीला का अभिनय ल्खोनखोल (‘ल्खोन’ अर्थात नाटक) के माध्यम के होता है। इसके अभिनय में मुख्य रुप से ग्राम्य परिवेश के लोगो की भागीदारी होता है। कंपूचिया के राजभवन में रामायण के प्रमुख प्रसंगों का अभिनय होता था। मुखौटा रामलीला को थाईलैंड में ‘खौन’ कहा जाता है। इसमें संवाद के अतिरिक्त नृत्य, गीत एवं हाव-भाव प्रदर्शन की प्रधानता होती है। केवल विदूषक अपना संवाद स्वयं बोलता है। स्याम से आई बर्मा की मुखौटा रामलीला को यामप्वे कहा जाता है। इसलिए यामप्वे में विदूषक की प्रधानता होती है। हास्यरस के प्रेमी बर्मा के लोगों के लिए रामलीला आरंभ होने के पूर्व एक-दो घंटे तक हास-परिहास और नृत्य-गीत का कार्यक्रम चलता रहता है।</p>
<p style="text-align: justify;">जावा तथा मलेशिया के ‘वेयांग’ और थाईलैंड के ‘नंग’ नामक छाया रामलीला का विशिष्ट स्थान है। जापानी भाषा में ‘वेयांग’ का अर्थ छाया है। इसमें सफ़ेद पर्दे को प्रकाशित किया जाता है और उसके सामने चमड़े की पुतलियों की छाया पर्दे पर पड़ती है। छाया नाटक के माध्यम से रामलीला का प्रदर्शन पहले तिब्बत और मंगोलिया में भी होता था। थाईलैंड में छाया-रामलीला को ‘नंग’ (दो रुप- ‘नंगयाई’ और ‘नंगतुलुंग’) कहा जाता है। नंग का अर्थ चर्म या चमड़ा और याई का अर्थ बड़ा है। ‘नंगयाई’ का तात्पर्य चमड़े की बड़ी पुतलियों से है। ‘नंग तुलुंग’ दक्षिणि थाईलैंड में मनोरंजन का लोकप्रिय साधन है। इसकी चर्म पुतलियाँ नंगयाई की अपेक्षा बहुत छोटी होती हैं। थाईलैंड के ‘नंग तुलुंग’ और जावा तथा मलेशिया के ‘वेयांग कुलित’ में बहुत समानता है। वेयांग कुलित को वेयंग पूर्वा अथवा वेयांग जाव भी कहा जाता है।</p>
<p style="text-align: justify;">कंबोडिया में रामलीला तुलसीदास रचित रामचरितमानस के आधार पर होती है और इस पर कंबोडिया की कला का साफ प्रभाव दिखाई देता है। लाओस में वाल्मीकि रामायण का मंचन गीत-संगीत और नृत्&#x200d;य के साथ होता है। मॉरीशस में हर वर्ष रामलीला का आयोजन यहाँ का  कला और सांस्कृतिक मंत्रालय कराता है।</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone wp-image-7576" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2024/05/page-42-300x199.png" alt="" width="1277" height="847" srcset="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2024/05/page-42-300x199.png 300w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2024/05/page-42.png 633w" sizes="auto, (max-width: 1277px) 100vw, 1277px" /></p>
<p style="text-align: justify;"><strong>तुलसीकृत रामचरितमानस का विदेशों में प्रभाव</strong></p>
<p style="text-align: justify;">गोस्वामी तुलसीदास जी द्वारा रचित ‘रामचरितमानस’ विदेशों में काफी लोकप्रिय रही। भारत से बाहर जो लोग गए, वे इसे साथ ले गए। विदेशी विद्वान भी तुलसी साहित्य के प्रति आकर्षित हुए। तीन प्रमुख नाम ऐसे विदेशी विद्वानों के आते हैं। १. अमेरिका के ‘अब्राहम जॉर्ज ग्रियर्सन’, २. फ्रांस के ‘गार्सा द तासी’, ३. इंग्लैंड के ‘एफ.एस.ग्राउज’। ग्रियर्सन का लेख ‘द मॉडर्न वर्नाक्यूलर लिटरेचर ऑफ हिंदुस्थान’ शीर्षक से एशियाटिक सोसाइटी ऑफ बंगाल के ‘जर्नल’ में प्रकाशित हुआ जिसमें तुलसीदास के रचना संसार का विवेचनात्मक वर्णन है। १८९३ में उनकी दूसरी पुस्तक ‘नोट्स ऑफ तुलसीदास’ प्रकाशित हुई। इसके अलावा तुलसी साहित्य पर उनके और भी दो लेख प्रकाशित हुए। फ्रांसीसी विद्वान तासी ने रामचरितमानस के सुंदर कांड का फ्रेंच में अनुवाद किया जो काफी लोकप्रिय हुआ। इंग्लैंड के विद्वान ग्राउज ने रामचरितमानस का अंग्रेजी में अनुवाद किया जो ‘द रामायण ऑफ तुलसीदास’ शीर्षक से १८७१-७८ के मध्य अलग अलग भागों में छपा।</p>
<p style="text-align: justify;">१९११ में इटली के फ्लोरेंस विश्वविद्यालय में पी.एल.तेस्सी तोरी ने रामकथा के लिए तुलसीदास पर पहली पी.एच.डी. की। १९१८ में लंदन के जे.एन. कारपेंटर ने दूसरा शोध किया जिसे ऑक्सफ़ोर्ड विश्वविद्यालय ने प्रकाशित किया। रूसी साहित्यकार अलेक्सेई वरान्निकोव (१८९०-१९५२) ने डॉ. श्यामसुंदर द्वारा संपादित रामचरितमानस का रूसी भाषा में अनुवाद किया, जिसे १९४८ में सोवियत संघ की साहित्य अकादमी ने प्रकाशित करवाया। अमेरिकी विद्वान मीसो केवलैंड ने रामकथा को बाल साहित्य के रूप में रूपांतरित कर ‘एडवेंचर ऑफ रामा’ शीर्षक से प्रकाशित करवाया।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>ईसाई मिशनरी से </strong><strong>‘मानस मनीषी’</strong></p>
<p style="text-align: justify;">श्रीराम को विश्व मंच पर लोकप्रिय बनाने में ‘फादर कामिल बुल्के’ का योगदान भी महत्वपूर्ण है। वे ईसाई मिशनरी से मानस मनीषी बने। उन्होंने अपने शोध प्रबंध ‘रामकथा : उत्पत्ति और विकास’ में विश्व में श्रीराम की ऐतिहासिकता के ३०० से अधिक प्रमाण प्रस्तुत किए हैं। १९३४-३५ में बेल्जियम से भारत आए बुल्के ने रामकथा की उत्पत्ति और विकास पर बड़ा काम किया। उन्होंने सिद्ध किया कि रामकथा वियतनाम से कम्बोडिया तक फैली हुई है। इस संदर्भ में उन्होंने लिखा कि उनके एक इंडोनेशियाई मित्र डॉ. होयकास सायंकाल टहल रहे थे तो उन्होंने एक मौलाना को रामायण पढ़ते देखा। डॉ. होयकास ने उस मौलाना से पूछा कि आप मौलाना है, फिर आप रामायण क्यों पढ़ रहे है। मौलाना से उत्तर मिला &#8211; “और भी अच्छा मनुष्य बनने के लिए”। ‘रामकथा’के इस विस्तार को बुल्के भारतीय संस्कृति की ‘दिग्विजय’ कहते है।</p>
<p style="text-align: justify;">(लेखक विद्या भारती जोधपुर (राजस्थान) प्रान्त के संगठन मंत्री है और विद्या भारती प्रचार विभाग की केन्द्रीय टोली के सदस्य है।)</p>
<p><strong>और पढ़ें : <span style="color: #0000ff;"><a style="color: #0000ff;" href="https://rashtriyashiksha.com/name-of-rama-in-literary-world/" target="_blank" rel="noopener">रामायण सत कोटि अपारा-3 (साहित्य जगत में राम का नाम)</a></span></strong></p>
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		<title>रामायण सत कोटि अपारा-3 (साहित्य जगत में राम का नाम)</title>
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		<dc:creator><![CDATA[राष्ट्रीय शिक्षा]]></dc:creator>
		<pubDate>Thu, 28 Mar 2024 04:32:59 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[नवीनतम]]></category>
		<category><![CDATA[रामायण सत कोटि अपारा]]></category>
		<category><![CDATA[श्री रवि कुमार जी]]></category>
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		<category><![CDATA[Lok anayak shri ram]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>✍ रवि कुमार बाईस जनवरी को अयोध्या जी में रामलला की मूर्ति स्थापना व प्राण प्रतिष्ठा से सम्पूर्ण देश का जो वातावरण राममय हुआ, उसके बाद वहां दर्शनार्थ रामभक्तों की&#8230; </p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: right;"><img src="https://s.w.org/images/core/emoji/17.0.2/72x72/270d.png" alt="✍" class="wp-smiley" style="height: 1em; max-height: 1em;" /> रवि कुमार</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone wp-image-7469" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2024/03/4342b321-4d73-4b6d-8a20-31265e2784ff-e1711604106610-300x244.jpeg" alt="" width="1723" height="1401" srcset="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2024/03/4342b321-4d73-4b6d-8a20-31265e2784ff-e1711604106610-300x244.jpeg 300w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2024/03/4342b321-4d73-4b6d-8a20-31265e2784ff-e1711604106610.jpeg 644w" sizes="auto, (max-width: 1723px) 100vw, 1723px" /></p>
<p style="text-align: justify;">बाईस जनवरी को अयोध्या जी में रामलला की मूर्ति स्थापना व प्राण प्रतिष्ठा से सम्पूर्ण देश का जो वातावरण राममय हुआ, उसके बाद वहां दर्शनार्थ रामभक्तों की भीड़ उमड़ पड़ी है। रामभक्तों की श्रृंखला राममय वातावरण को और भव्य बनाती जा रही है। इस पर कबीर दास जी के भजन की एक पंक्ति स्मरण आती है &#8211; <strong>“राम नाम की लूट है</strong><strong>, लूट सके तो लूट। पाछे फिर पछतावेगा, जब प्राण जाएंगे छूट।।”</strong> राम नाम को साहित्य जगत में पर्याप्त स्थान मिला है। जिस प्रकार बाल्मीकि रामायण, तुलसीकृत रामचरितमानस व रामलीला मंचन से रामकथा का प्रसार हुआ, उसी प्रकार साहित्यकारों ने अपनी लेखनी से कथा, काव्य, दोहावली, श्लोक, गीत आदि के माध्यम से रामनाम को जन-जन तक पहुंचाया और चैतन्य रूप में स्थापित किया।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>राम काव्य धारा</strong></p>
<p style="text-align: justify;">साहित्य के काल को जब विभाजित करते है तो आदिकाल, भक्तिकाल, रीतिकाल व आधुनिक काल, उसमें भक्तिकाल (सन 1375 से 1700) का वर्णन आता है। इस भक्तिकाल में जिन भक्त कवियों ने विष्णु अवतार के रूप में श्रीराम की उपासना को अपना लक्ष्य बनाया उन्हें ‘राम काव्यधारा’ के कवि कहा जाता है। राम काव्यधारा के प्रमुख कवि है- रामानन्द, अग्रदास, ईश्वरदास, तुलसीदास, नाभादास, केशवदास व नरहरिदास।</p>
<p style="text-align: justify;">रामभक्ति काव्यधारा का प्रारम्भ रामानंद से माना जाता है। ये रामानंदी (रामावत) व श्री सम्प्रदाय के प्रवर्तक थे। इनकी प्रमुख रचनाएं रामार्चन पद्धति, वैष्णवमताब्ज, हनुमान जी की आरती (आरती कीजे हनुमान लला की), रामरक्षास्त्रोत है। अग्रदास  ने स्वयं को ‘अग्रकली’ (जानकी की सखी) मानकर काव्य रचना की। उनकी रचनाओं में प्रमुख है – ‘ध्यान मंजरी’, ‘अष्टयाम’, ‘रामभजन मंजरी’, ‘उपासना बावनी’, ‘हितोपदेशी भाषा’।</p>
<p style="text-align: justify;">गोस्वामी तुलसीदास जी की ‘रामचरितमानस’ रचना अद्भुत व सर्वाधिक प्रसिद्ध है। इसके अलावा उनकी कुछ प्रमुख रचनाएं है – ‘बरवैरामायण’, ‘रामाज्ञा प्रश्नावली’, ‘कलिकाल’, ‘हनुमानबाहुक’, ‘कवित रामायण’, ‘रामलला नहछु’, ‘जानकी-मंगल’, ‘विनय-पत्रिका’, ‘गीतावली’। राम काव्य धारा के कवियों में सर्वाधिक रचनाएं तुलसीदास जी की हैं। नाभादास तुलसीदास जी के समकालीन थे। इनकी प्रमुख रचना ‘भक्तमाल’ है जिसमें २०० कवियों का वर्णन है। केशवदास की प्रमुख रचनाओं में ‘रामचंद्रिका’ है। नरहरिदास की ‘पौरुषेय रामायण’ रचना है।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>प्राचीन ग्रंथों में राम</strong></p>
<p style="text-align: justify;">महाभारत में द्रोण पर्व, शांति पर्व और आरण्यक पर्व चार स्थलों पर रामकथा का वर्णन है। हरिवंश, वायु, विष्णु, भागवत, कूर्म, अग्नि, नारद, गरुड़, स्कंध, ब्रह्मवैवर्त, ब्रह्मांड आदि पुराणों में रामकथा का उल्लेख है। अगस्तय संहिता, कलि राघव और राघवीय संहिता में राम के प्रति दास्य भाव की भक्ति का वर्णन है। अनेक संहिता ग्रंथों में श्रीराम के मधुर रूप की उपासना का उल्लेख हुआ है।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>संस्कृत नाटकों में रामकथा</strong></p>
<p style="text-align: justify;">रामकथा को आधार मानकर संस्कृत में अनेक नाटक लिखे गए हैं। भास द्वारा रचित ‘प्रतिमा’ और ‘अभिषेक’, भवभूति रचित ‘महावीर चरितम्’ और ‘उत्तर रामचरितम्’, मुरारी रचित ‘अनंगराघव’, रामेश्वर रचित ‘बालरामायण’ व ‘हनुमन्नाटक’, आश्चर्य चूड़ामणि कृत ‘प्रसन्नराघव’ आदि नाटकों में रामकथा को कथानक बनाया है। कालिदासकृत ‘रघुवंश’ महाकाव्य में नवम् से षोडश सर्ग तक रामकथा का वर्णन है। कुमारदास रचित ‘जानकीहरण’, क्षेमेन्द्र कृत ‘रामायण मंजरी’ व ‘दशावतार चरित’ महाकाव्यों में रामकथा का ही वर्णन है।</p>
<p style="text-align: center;"><strong>कालीदासकृत रघुवंश</strong> में श्रीराम के अयोध्या आगमन के विषय में वर्णन है &#8211;</p>
<p style="text-align: center;"><strong>स मौलरक्षोहरिमिश्रसैन्यस्तूर्यस्वनानन्दितपौरवर्गः।</strong></p>
<p style="text-align: center;"><strong>विवेष सौधोद्गतलाजवर्षां उत्तोरणां अन्वयराजधानीं।। १४.१० ।।</strong></p>
<p style="text-align: justify;">अर्थात सेना सहित राम ने तुरही आदि बाजों से नागरिकों को आनन्द विभोर करते हुए पुराने मंत्रियों, राक्षसों और वानरों के साथ रघुवंश के राजाओं की उस राजधानी अयोध्या में प्रवेश किया, जो सब ओर बन्दनवारों से सजी थी, और जिसके चूने से पुते भवनों से धान का लावा बरस रहा था।</p>
<p style="text-align: justify;">मेहो जी कृत ‘रामायण’ में वर्णन है-</p>
<p style="text-align: center;"><strong>‘अठसठ तीरथ जो पुन न्हाया, सुणौ रामायण काने,</strong></p>
<p style="text-align: center;"><strong>पढियां नै मेहो समझावै</strong><strong>, धायो धर्म धियाने।’</strong></p>
<p style="text-align: justify;">मेहो जी ने रामायण की रचना 1575 में कई थी। 258 छंदों में रचित यह रामायण राजस्थानी भाषा में है। प्राणचंद चौहान ने संवत १६६७ में ‘रामायण महानाटक’ लिखा। हृदयरमा ने ‘हनुमन्न’ नाटक की रचना की।</p>
<p style="text-align: justify;">आधुनिक युग के रामकाव्यों में रामचरित उपाध्याय की ‘रामचरित चिंतामणि’, रामनाथ ज्योतिषी का ‘श्रीराम चंद्रोदय’, मैथिलीशरण गुप्त का ‘साकेत’, अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध का ‘वैदेही वनवास’, बालकृष्ण शर्मा नवीन का ‘उर्मिला’ आदि महाकाव्य है जिनमें आधुनिक युग के अनुसार नवीन विचारों का समावेश किया गया है। सूर्यकांत त्रिपाठी निराला द्वारा रचित ‘राम की शक्ति पूजा’, माया देवी द्वारा रचित ‘शबरी’, नरेश मेहता कृत ‘संशय की एक रात’ राम कथा पर आधारित काव्य रचनाएं हैं।</p>
<p style="text-align: justify;">मैथिलीशरण गुप्त ने अपनी रचना ‘साकेत’ में राम चरित की व्याख्या की है<strong> &#8211; </strong></p>
<p style="text-align: center;"><strong>राम</strong><strong>, तुम्हारा चरित स्वयं ही काव्य है।</strong></p>
<p style="text-align: center;"><strong>कोई कवि बन जाय</strong><strong>, सहज संभाव्य है।। </strong></p>
<p style="text-align: justify;">सूर्यकांत त्रिपाठी निराला अपनी रचना ‘राम की शक्ति पूजा’ में लिखते है &#8211;</p>
<p style="text-align: center;"><strong>आराधन का दृढ़ आराधन से दो उत्तर</strong><strong>,</strong></p>
<p style="text-align: center;"><strong>तुम वरो विजय संयत प्राणों से प्राणों पर</strong><strong>;</strong></p>
<p style="text-align: center;"><strong>रावण अशुद्ध होकर भी यदि कर सका त्रस्त</strong></p>
<p style="text-align: center;"><strong>तो निश्चय तुम हो सिद्ध करोगे उसे ध्वस्त</strong><strong>,</strong></p>
<p style="text-align: center;"><strong>शक्ति की करो मौलिक कल्पना</strong><strong>, करो पूजन,</strong></p>
<p style="text-align: center;"><strong>छोड़ दो समर जब तक न सिद्धि हो</strong><strong>, रघुनंदन!</strong></p>
<p style="text-align: center;"><strong>‘रामायण’ : सार्वकालिक लोकप्रिय धारावाहिक </strong></p>
<p style="text-align: justify;">हिंदी सिनेमा में अब तक रामायण पर ५० से अधिक फिल्मांकन है। वहीं, २० से अधिक टीवी धारावाहिक का भी निर्माण किया गया, लेकिन वर्ष १९८७ में रामानंद सागर द्वारा निर्देशित टीवी धारावाहिक ‘रामायण’ अब तक का सबसे लोकप्रिय रामायण धारावाहिक है, जिसके भजन लोगों को आज भी मंत्रमुग्ध कर देते हैं। ७८ धारावाहिकों में निर्मित २५ जनवरी १९८७ से ३१ जुलाई १९८८ तक टीवी पर पहली बार प्रसारित हुआ। उस समय इसकी दर्शक संख्या लगभग दस करोड़ थी। टेलीविजन पर सर्वाधिक देखा जाने वाला धारावाहिक का रिकार्ड इसी के नाम है।</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone wp-image-7467" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2024/03/2021_6image_13_51_011678058sriram-300x225.jpg" alt="" width="1724" height="1293" srcset="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2024/03/2021_6image_13_51_011678058sriram-300x225.jpg 300w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2024/03/2021_6image_13_51_011678058sriram-768x576.jpg 768w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2024/03/2021_6image_13_51_011678058sriram.jpg 800w" sizes="auto, (max-width: 1724px) 100vw, 1724px" /></p>
<p style="text-align: justify;"><strong>प्रसिद्ध राम भजन</strong></p>
<p style="text-align: justify;">वर्ष १९५२ में रिलीज हुई बैजू बावरा में मोहम्मद रफी ने ’ओ दुनिया के रखवाले’ राम भजन गाया था। वहीं, वर्ष १९६८ में आई फिल्म ‘नील कमल’ में आशा भोंसले ने ‘अरे रोम रोम में बसने वाले राम’ भजन गाया था। वर्ष १९७६ में लता मंगेशकर ने फिल्म ‘बजरंगबली’ में ‘हे राम तेरे राज में कैसे जियें सीताएं’ गाया था। किशोर कुमार ने भी वर्ष १९७७ में फिल्म ‘राम भरोसे’ में ‘राम से बड़ा राम का नाम, बनाये सबके बड़े काम’ गाया था। मोहम्मद रफी ने साल १९८१ में भी ‘महाबली हनुमान’ फिल्म में ‘मन की आंखों से मैं देखूं रूप सदा सियाराम का’ भजन गाया था।</p>
<p style="text-align: justify;">‘मंगल भवन अमंगल हारी’, रवीन्द्र जैन द्वारा रिकॉर्डिड एल्बम जय जय श्री राम का एक क्लासिक भजन है जो गायक सतीश देहरा, दीप माला और रचना के साथ गया गया है। ‘हम कथा सुनाते हैं&#8230;’ टेलीविजन श्रृंखला रामायण में प्रदर्शित इस भजन में लव-कुश को भगवान श्रीराम की स्तुति गाते हुए दिखाया गया है।</p>
<p style="text-align: justify;">‘हे राम हे राम’ सुदर्शन फ़ाकिर द्वारा रचित व जगजीत सिंह द्वारा भावपूर्ण प्रस्तुति की गई। ‘जय राम राम रामनाम शरणम’ &#8211; महान लता मंगेशकर द्वारा भक्ति के सार को दर्शाते हुए प्रस्तुत किया गया। कैलाश खेर द्वारा ‘राम का धाम’ गान &#8211; अनु मलिक द्वारा रचित अयोध्या धाम के राम मंदिर के लिए एक गीत प्रसिद्ध हुआ।</p>
<p style="text-align: justify;">‘राम सिया राम’ &#8211; फिल्म आदिपुरुष का एक दिल छू लेने वाला भजन। ‘जय रघुनन्दन जय सियाराम’ &#8211; १९६१ की फ़िल्म घराना का एक क्लासिक, जिसे मोहम्मद रफ़ी और आशा भोसले ने गाया था। ‘श्री राम चन्द्र कृपालु भजमन’ &#8211; केदार पंडित द्वारा रचित, अनुराधा पौडवाल द्वारा गाया गया, भगवान श्री राम की महिमा। ‘पल पल है भारी’ &#8211; जावेद अख्तर द्वारा लिखित, एआर रहमान द्वारा संगीतबद्ध और मधुश्री, विजय प्रकाश द्वारा गाया गया। ‘राम आयेंगे’ &#8211; गीतकार मनोज मुंतशिर की मार्मिक कहानी, पायल देव द्वारा रचित और विशाल मिश्रा द्वारा गाया गया।</p>
<p style="text-align: center;"><strong>एक श्लोकी रामायण</strong></p>
<p style="text-align: center;"><strong>आदौ राम तपोवनादि गमनं</strong><strong>, हत्वा मृगं कांचनम्।</strong></p>
<p style="text-align: center;"><strong>वैदीहीहरणं जटायुमरणं</strong><strong>, सुग्रीवसंभाषणम्।।</strong></p>
<p style="text-align: center;"><strong>बालीनिर्दलनं समुद्रतरणं</strong><strong>, लंकापुरीदाहनम्।</strong></p>
<p style="text-align: center;"><strong>पश्चाद् रावण कुम्भकर्ण हननम्</strong><strong>, एतद्धि रामायणम्।।</strong></p>
<p style="text-align: justify;">अर्थात श्रीराम वनवास गए, वहां उन्होने स्वर्ण मृग का वध किया। रावण ने सीताजी का हरण कर लिया, जटायु रावण के हाथों मारा गया। श्रीराम और सुग्रीव की मित्रता हुई। श्रीराम ने बालि का वध किया। समुद्र पार किया। लंका का दहन किया। इसके बाद रावण और कुंभकर्ण का वध किया। ये है रामायण।</p>
<p style="text-align: center;"><strong>राम रामेति रामेति रमे रामे मनोरमे।</strong></p>
<p style="text-align: center;"><strong>सहस्रनाम तत्तुल्यं रामनाम वरानने॥</strong></p>
<p style="text-align: justify;">– श्रीरामरक्षास्तोत्रम् (३८)</p>
<p style="text-align: justify;">अर्थात जो कोई भी राम राम कहता है, राम की आत्मा में रमता है। हजारों नामों के बराबर है, राम का यह नाम।</p>
<p style="text-align: justify;">(लेखक विद्या भारती जोधपुर (राजस्थान) प्रान्त के संगठन मंत्री है और विद्या भारती प्रचार विभाग की केन्द्रीय टोली के सदस्य है।)</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>और पढ़ें : <span style="color: #0000ff;"><a style="color: #0000ff;" href="https://rashtriyashiksha.com/loknayak-shriram-3/" target="_blank" rel="noopener">लोकनायक श्रीराम – ३</a></span></strong></p>
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		<title>रामायण सत कोटि अपारा-2 (‘रामलीला’ नाट्य मंचन का प्रभाव)</title>
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		<dc:creator><![CDATA[राष्ट्रीय शिक्षा]]></dc:creator>
		<pubDate>Mon, 29 Jan 2024 06:19:01 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[नवीनतम]]></category>
		<category><![CDATA[रामायण सत कोटि अपारा]]></category>
		<category><![CDATA[श्री रवि कुमार जी]]></category>
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		<category><![CDATA[Ram Leela]]></category>
		<category><![CDATA[Rashtriya shiksha]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>✍ रवि कुमार पौष शुक्ल द्वादशी, 22 जनवरी को श्रीराम जन्मभूमि अयोध्या में रामलला की प्राण प्रतिष्ठा से एक बार पुनः सारा देश राममय हो गया है। श्रीराम भारत देश&#8230; </p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: right;"><img src="https://s.w.org/images/core/emoji/17.0.2/72x72/270d.png" alt="✍" class="wp-smiley" style="height: 1em; max-height: 1em;" /> रवि कुमार</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone wp-image-7378" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2024/01/maxresdefault-1-e1706509043435-300x196.jpg" alt="" width="1476" height="964" srcset="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2024/01/maxresdefault-1-e1706509043435-300x196.jpg 300w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2024/01/maxresdefault-1-e1706509043435-1024x668.jpg 1024w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2024/01/maxresdefault-1-e1706509043435-768x501.jpg 768w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2024/01/maxresdefault-1-e1706509043435.jpg 1056w" sizes="auto, (max-width: 1476px) 100vw, 1476px" /></p>
<p style="text-align: justify;">पौष शुक्ल द्वादशी, 22 जनवरी को श्रीराम जन्मभूमि अयोध्या में रामलला की प्राण प्रतिष्ठा से एक बार पुनः सारा देश राममय हो गया है। श्रीराम भारत देश की आत्मा है, प्राण है। श्रीराम भारत के राष्ट्र पुरुष है। राम जन-जन के राम बने, तभी श्रीराम बने। वे जन-जन के राम नहीं बनते तो राजा राम ही कहलाते। श्रीराम को जनश्रुतियों में जीवित रखने का कार्य जितना रामकाव्य व रामकथा ग्रंथों ने किया, उतना ही बड़ा कार्य रामलीलाओं ने किया। रामलीला शब्द उत्तर भारत विशेषकर हिंदी भाषी प्रान्तों में श्रीराम के जीवन पर आधारित नाटक के रूप में प्रचलित है।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>कितनी पुरानी है रामलीला</strong></p>
<p style="text-align: justify;">रामलीला कब और कैसे प्रारम्भ हुई, इसका मंचन सबसे पहले किसने किया, इसका कोई प्रमाण उपलब्ध नहीं है। एक किवंदती है कि राम वन गमन के दौरान 14 वर्ष की वियोगावधि अयोध्यावासियों ने राम की बाल लीलाओं का अभिनय कर बिताई थी। एक अन्य जनश्रुति के अनुसार इसके आदि प्रवर्तक मेघा भगत (तुलसीदास के शिष्य) जो काशी के निवासी माने जाते हैं।</p>
<p style="text-align: justify;">गोस्वामी तुलसीदास जी ने रामचरितमानस के प्रचार-प्रसार के लिए रामलीला मंचन का प्रारम्भ किया। तुलसीदास जी ने हिंदी में नाटकों का अभाव पाकर इसका श्रीगणेश किया। इनकी प्रेरणा से अयोध्या व काशी के तुलसी घाट पर प्रथम बार रामलीला हुई थी। तुलसीदास के शिष्यों द्वारा काशी, चित्रकूट व अवध में रामलीला मंचन जारी रहा। इतिहासविदों के अनुसार इससे पूर्व रामबारात व रुक्मणि विवाह पर शास्त्र आधारित मंचन ही हुआ करते थे। सन 1783 में काशी नरेश उदित नारायण सिंह ने प्रतिवर्ष रामनगर में रामलीला कराने का संकल्प लिया।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>भारत की सबसे पुरानी रामलीलाएं</strong></p>
<p style="text-align: justify;">काशी में सबसे पहले रामलीला मंचन प्रारम्भ हुआ। काशी नगर में चार स्थानों पर रामलीला होती है। जिनमें सबसे पुरानी रामलीला श्रीचित्रकूट रामलीला समिति की है जिसका इस बार 483वां वर्ष है। इसके अतिरिक्त मौनी बाबा की रामलीला, लाट भैरव की रामलीला और अस्सी (घाट) की रामलीला का इतिहास चार सौ वर्ष से भी पुराना है। श्री चित्रकूट रामलीला समिति की रामलीला नगर में आठ स्थानों पर होती है। इसके पंच स्वरूप (राम, लक्षण, भरत, शत्रुघ्न व सीता) की भूमिका निभाने वाले किशोर 21 दिन तक घर नहीं जाते बल्कि लीला स्थल पर ही विश्राम करते हैं। और काशी नगर में चारों रामलीला 33 दिन तक चलती है। काशी के बाद चित्रकूट व अवध की रामलीलाओं का इतिहास भी 475 वर्ष पुराना है।</p>
<p style="text-align: justify;">इसके बाद दूसरे चरण में दारानगर, चेतगंज, जैतपुरा, काशीपुरा, मणिकर्णिका, लक्सा, सोहर कुआं, खोजवां, पांडेपुर क्षेत्र में रामलीलाओं का क्रमिक विकास हुआ। वहीं ग्रामीण क्षेत्रों में जाल्हूपुर, लोहता, चिरईगांव और कोरौता में रामलीला प्रारम्भ हुई। इन रामलीलाओं को प्रारम्भ करने के पीछे का उद्देश्य अंग्रेजों के विरुद्ध जनमानस को एकजुट करना था। उत्तर प्रदेश में ही ऐतिहासिक रामनगर की रामलीला, अयोध्या, चित्रकूट, अस्सी घाट (वाराणसी), प्रयागराज व लखनऊ की रामलीलाओं की अपनी शैली और विशेषता है। शायद इसलिए यह मुहावरा चला हो ‘अपनी-अपनी रामकहानी’।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>और कुछ पुरानी रामलीला</strong></p>
<p style="text-align: justify;">उत्तर प्रदेश में गाजीपुर की रामलीला खानाबदोश है। वहां रामलीला मंचन हर दिन अलग अलग स्थान पर होता है। गोरखपुर में रामलीला समिति बनाकर 1858 में प्रारम्भ हुई। कुमांयू की रामलीला का प्रारम्भ 1860 में अल्मोड़ा नगर के बद्रेश्वर मंदिर में हुआ। इसका श्रेय तत्कालीन डिप्टी कलैक्टर स्व.देवीदत्त जोशी को जाता है। बाद में नैनीताल (1880), बागेश्वर (1890) व पिथौरागढ़ (1902) में रामलीला मंचन प्रारम्भ हुआ। होशंगाबाद की रामलीला 1870 के आसपास सेठ नन्हेलाल रईस ने प्रारम्भ करवाई थी। 1885 से इसका नियमित मंचन होना प्रारम्भ हुआ। सोहागपुर ग्राम (होशंगाबाद) की रामलीला 1866 में प्रारम्भ हुई। पीलीभीत की रामलीला का इतिहास भी 150 वर्ष से अधिक पुराना है। इसका मंचन मैदान में होता है। फतेहगढ़ की रामलीला 150 वर्ष पुरानी है, इसे अंग्रेजों का भी सहयोग मिलता रहा।</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone wp-image-7379" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2024/01/652e2ad272486-300x199.jpg" alt="" width="1630" height="1081" srcset="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2024/01/652e2ad272486-300x199.jpg 300w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2024/01/652e2ad272486-768x510.jpg 768w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2024/01/652e2ad272486.jpg 939w" sizes="auto, (max-width: 1630px) 100vw, 1630px" /></p>
<p style="text-align: justify;"><strong>दिल्ली की रामलीला</strong></p>
<p style="text-align: justify;">दिल्ली की रामलीला का इतिहास काफी पुराना है। मुगल शासक औरंगजेब ने अपने शासन काल में इस पर प्रतिबंध लगा दिया था। सन 1719 के बाद दिल्ली स्थित सीताराम बाजार में रामलीला का आयोजन होता रहा। बहादुरशाह जफर ने भी अपने काल में रामलीला का मंचन करवाया। बाद में अंग्रेजों ने इसे रुकवा दिया। 1911 में महामना मदन मोहन मालवीय ने फिर से रामलीला को प्रारम्भ करवाया। आज चांदनी चौंक के गांधी मैदान, सुभाष मैदान व रामलीला मैदान की रामलीला प्रसिद्ध है।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>‘राधेश्याम रामायण’ की लोकप्रियता</strong></p>
<p style="text-align: justify;">प्रसिद्ध ‘राधेश्याम रामायण’ के रचयिता 1890 में बरेली में जन्मे कथावाचक राधेश्याम हैं। पंडित राधेश्याम बहुत कम आयु से ही अपने पिता बांकेलाल के साथ ‘रुक्मणि मंगल’ की कथा कहते हुए कथावाचक के नाते व पौराणिक आख्यानों पर रचे काव्य के जरिये अपनी पहचान बना चुके थे। 1910 में पंजाब के नानक चंद खत्री की न्यू अल्बर्ट कम्पनी बरेली आई। और नानक चंद ने अपनी कम्पनी के ‘रामायण’ नाटक में सुधार लाने के लिए राधेश्याम से आग्रह किया। जयपुर के महाराज सवाई सिंह के सचिव ने नानक चंद को यह नाटक राधेश्याम से सुधरवाने का सुझाव दिया था। पंडित राधेश्याम से कई बार कथा सुन चुके महाराज सवाई माधोसिंह उनकी प्रतिभा से बहुत प्रभावित थे। कंपनी का ‘रामायण’ नाटक तुलसीदास की चौपाइयों के साथ तालिब, उफ़क और रामेश्वर भट्ट की मिली जुली रचना थी। राधेश्याम ने उस रचना में संशोधन के साथ नारद की भूमिका भी जोड़ी। नाटक बहुत लोकप्रिय हुआ और साथ में पंडित राधेश्याम कथावाचक भी। यही सिलसिला ‘राधेश्याम रामायण’ तक गया।</p>
<p style="text-align: justify;">‘राधेश्याम रामायण’ ग्रन्थ में आठ काण्ड तथा 25 भाग हैं। इस ग्रन्थ में श्रीराम कथा का वर्णन इतना मनोहारी ढँग से किया गया है कि जब-जब इस रचना का रसपान करते हैं तब-तब रसपान करने वाले इसके प्रणेता के प्रति अपना आभार व्यक्त करते हैं। हिन्दी, उर्दू, अवधी और ब्रजभाषा के लोक शब्दों के अलावा एक विशेष गायन शैली में रचित राधेश्याम रामायण गाँव, कस्बा और शहरी क्षेत्र के धार्मिक लोगों में बहुत लोकप्रिय हुई। पंडित राधेश्याम कथावाचक के जीवनकाल में ही इस ग्रन्थ की हिन्दी व उर्दू में पौने दो करोड़ से अधिक प्रतियाँ प्रकाशित हुई और विक्रय हुई।</p>
<p style="text-align: justify;">अमेरिका स्थित यूनिवर्सिटी ऑफ नार्थ कैरोलिना की असिस्टेंट प्रोफेसर पामेला लोथस्पाइच ने पंडित राधेश्याम के काम पर लंबे समय तक शोध किया। अपने शोध ‘द राधेश्याम रामायण एण्ड संस्कृटाइज़ेशन ऑफ खड़ी बोली’ में वे 1939 से 1959 के बीच आए ‘राधेश्याम रामायण’ के संस्करणों में हिंदी-उर्दू भाषा को शुद्ध हिंदी की ओर खींचने के प्रयास का उल्लेख करती है।</p>
<p style="text-align: justify;">‘राधेश्याम रामायण’ (बाल काण्ड भाग-1-जन्म) का गीत &#8211;</p>
<p style="text-align: center;"><strong>अवध में है आनन्द छाया लाल कौशल्या ने जाया।</strong></p>
<p style="text-align: center;"><strong>देख अनूप रूप बालक का चकित हुआ रनिवास।।</strong></p>
<p style="text-align: center;"><strong>समाचार सर्वत्र सुनाने धाये दासी दास।</strong></p>
<p style="text-align: center;"><strong>संदेशा नृप को पहुंचाया लाल कौशल्या</strong><strong> ने जाया।।</strong></p>
<p style="text-align: center;"><strong>अनवरत चलने वाली अयोध्या की रामलीला</strong></p>
<p style="text-align: justify;">अनवरत चलने वाली अयोध्या शोध संस्थान, अयोध्या की रामलीला का प्रारम्भ सन 1988 में हुआ था। तब प्रत्येक मंगलवार को ये रामलीला होती थी। ये रामलीला लगभग एक वर्ष तक चली, फिर 19 मई 2004 से अनवरत चलने वाली रामलीला की शुरूआत हुई, जिसमें हर दिन शाम 6 बजे से रात 9 बजे तक रामलीला का मंचन होता था। यह रामलीला 23 नवंबर 2015 तक चली फिर बंद हो गई। उसके बाद 03 मई 2017 से फिर इस अनवरत चलने वाली रामलीला की शुरूआत हुई जो 21 मार्च 2020 तक चली फिर कोरोना के चलते इसे बंद कर दिया गया था। अयोध्या मंडली की रामलीला पूरे देश में प्रसिद्ध है। अयोध्या की रामलीला में एक विशाल मंच बनाकर पात्र संवादों को गीत के माध्यम से बोलते हैं। कथक के माध्यम से भी कलाकारों की ओर से रामकथा का वर्णन किया जाता है।</p>
<p style="text-align: justify;">सामान्यतः सभी स्थानों पर रामलीला मंचन विजयादशमी से पूर्व होता है और प्राय 10 दिन का होता है। चित्रकूट में रामलीला का मंचन फरवरी के अंतिम सप्ताह में किया जाता है और सिर्फ पांच दिनों के लिए ही रामलीला का मंचन होता है। इसका प्रारंभ महाशिवरात्रि से होता है। चित्रकूट की रामलीला भारत में इसलिए प्रसिद्ध है क्योंकि रामलीला के पात्र यहां प्रतिवर्ष तकनीक का उपयोग कर रामलीला को सजीव करते रहते हैं।</p>
<p style="text-align: justify;">देशभर में कुल कितनी रामलीलाओं का मंचन होता है, ये कहना कठिन है। जहाँ भी रामलीला मंचन होता है, वहां का आम जन इस मंचन से प्रभावित होता है। सभी स्थानों पर मंचन का मूल तो श्रीराम चरित ही है परन्तु सभी की शैली का अलग ही वैशिष्ट्य है। सभी रामलीला मंचन अद्भुत है और नियमित प्रभाव डालने वाले हैं। इन रामलीलाओं में अभिनय करने वाले, भाग लेने वाले कलाकारों के जीवन पर श्रीराम चरित का विशेष प्रभाव रहता है।</p>
<p style="text-align: justify;">(लेखक विद्या भारती जोधपुर (राजस्थान) प्रान्त के संगठन मंत्री है और विद्या भारती प्रचार विभाग की केन्द्रीय टोली के सदस्य है।)</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>ओर पढ़ें : <span style="color: #0000ff;"><a style="color: #0000ff;" href="https://rashtriyashiksha.com/ramayana-sat-koti-apara/" target="_blank" rel="noopener">रामायण सत कोटि अपारा</a></span></strong></p>
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		<title>रामायण सत कोटि अपारा</title>
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		<dc:creator><![CDATA[राष्ट्रीय शिक्षा]]></dc:creator>
		<pubDate>Mon, 01 Jan 2024 09:33:42 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[नवीनतम]]></category>
		<category><![CDATA[रामायण सत कोटि अपारा]]></category>
		<category><![CDATA[श्री रवि कुमार जी]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>✍ रवि कुमार सम्पूर्ण देश व जगत राममय है। जन-जन के मुख पर राम का नाम है। 22 जनवरी 2024 को श्रीराम जन्मभूमि पर रामलला की प्राण प्रतिष्ठा हो रही&#8230; </p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: right;"><img src="https://s.w.org/images/core/emoji/17.0.2/72x72/270d.png" alt="✍" class="wp-smiley" style="height: 1em; max-height: 1em;" /> रवि कुमार</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone wp-image-7299" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2023/12/main-qimg-de8938dac8e1fa3af8acef06ae29d4cd-lq-300x196.jpg" alt="" width="1632" height="1066" srcset="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2023/12/main-qimg-de8938dac8e1fa3af8acef06ae29d4cd-lq-300x196.jpg 300w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2023/12/main-qimg-de8938dac8e1fa3af8acef06ae29d4cd-lq.jpg 602w" sizes="auto, (max-width: 1632px) 100vw, 1632px" /></p>
<p style="text-align: justify;">सम्पूर्ण देश व जगत राममय है। जन-जन के मुख पर राम का नाम है। 22 जनवरी 2024 को श्रीराम जन्मभूमि पर रामलला की प्राण प्रतिष्ठा हो रही है। इतिहास बनने जा रहे इस विशेष घटनाक्रम के कारण मन में जो राम बसे है उसकी अभिव्यक्ति सर्वदूर मुख से हो रही है। तुलसी दास जी ने रामचरितमानस में कहा है- <strong>“राम नाम कर अमित प्रभावा</strong><strong>, वेद पुरान उपनिषद गावा।।” बालकाण्ड १.४६ ।।</strong> श्रीराम के काल से आज तक राम नाम का प्रभाव अमिट है। आगे तुलसीदास जी ने कहा है – <strong>“नाना भांति राम अवतारा। रामायन सत कोटि अपारा।।” बालकाण्ड १.१.३३ ।।</strong> अर्थात् राम के अनेकानेक अवतार हैं और सौ करोड़ तथा अपार रामायण हैं।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>वाल्मीकि रामायण</strong></p>
<p style="text-align: justify;">रामायण के बारे में दो बड़े ग्रन्थ जिनकी चर्चा सर्वाधिक है &#8211; वाल्मीकि रामायण व तुलसीदासकृत रामचरित मानस। वाल्मीकि रामायण तो राम के काल का ही है। और रामकथा के बारे में सबसे सटीक माना गया है। राम का काल कब का है, इसके बारे में विद्वानों के अनेक मत है, उसी प्रकार वाल्मीकि रामायण की रचना के बारे में भी विद्वान विभिन्न मत प्रकट करते हैं। वाल्मीकि नारद जी से प्रश्न (वाल्मीकि रामायण १/२-५) पूछते है कि इस संसार में श्रेष्ठ गुणवान मनुष्य कौन है? तो नारद जी इसका उत्तर देते है-</p>
<p style="text-align: center;"><strong>इक्ष्वाकुवंशप्रभवो रामो नाम जनैः श्रुतः।</strong></p>
<p style="text-align: center;"><strong>नियतात्मा महावीर्यो द्युतिमान् धृतिमान वशी॥</strong></p>
<p style="text-align: justify;">(वा० रा० बाल. – 1/8)</p>
<p style="text-align: justify;">वाल्मीकि किसी अवतारी पुरुष के विषय में नहीं पूछते हैं। आदर्श मनुष्य को जानना चाहते हैं, जिसमें ये सारे गुण हैं। उत्तर में देवर्षि नारद भी ‘इक्ष्वाकुवंशप्रभवो’ अर्थात् इक्ष्वाकु के वंश में उत्पन्न, साम्प्रतम् और अस्मिन् लोके का ही वर्णन करते हैं, अपने परमाराध्य वैकुण्ठवासी श्री विष्णु का नहीं। वाल्मीकिकृत रामायण महाकाव्य में वे मनुष्य रूप में ही वर्णित हुए हैं।</p>
<p style="text-align: justify;">संस्कृत में रचित वाल्मीकि रामायण में सात अध्याय- बाल काण्ड, अयोध्याकाण्ड, अरण्यकाण्ड, किष्किन्धाकांड, सुन्दरकाण्ड, लंकाकाण्ड और उत्तर काण्ड है एवं कुल २४००० श्लोक है। समग्र भारतीय वाङ्गमय एवं विश्व वाङ्गमय के सहस्राधिकों, ग्रन्थों, नाटकों, काव्यों व महाकाव्यों का यह आधारभूत ग्रंथ है।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>संस्कृत भाषा के अन्य ग्रन्थ </strong></p>
<p style="text-align: justify;">वाल्मीकि रामायण के अलावा भी संस्कृत भाषा के अनेक ग्रंथों का आधार रामकथा है। यथा- १. अध्यात्म रामायण (सन् १५००), २. योगवासिष्ठ (ग्यारहवीं शताब्दी), ३. अद्भुत रामायण (सन् १६००), ४. आनन्द रामायण (सन् १६००), ५. तत्त्व संग्रह रामायण (सन् १७००), ६. भुशुण्डिरामायण, ७. रामविजय, ८. रामलिंगामृत, ९. राघवोल्लास, ११. मन्त्ररामायण, ११. उदरराघव आदि रामकथा आधारित रामायण है।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>तुलसीदासकृत रामचरित मानस</strong></p>
<p style="text-align: justify;">तुलसीदास कृत रामचरित मानस 16वीं शताब्दी (सन् १५७४-७६) में रचा गया। विक्रमी संवत १६३१ रामनवमी (मंगलवार) से प्रारम्भ होकर विक्रमी सम्वत १६३३ मार्गशीर्ष शुक्ल पक्ष रामविवाह के दिन पूर्ण हुआ यह ग्रन्थ हिंदी की बोली अवधी में रचा गया। भारत में हिंदी भाषा का विस्तार काफी बड़ा है, इसलिए रामचरित मानस की व्याप्ति भी जनमानस पर अधिक हुई है। तुलसीदास जी की काव्य रचना स्वांत सुखाय है परंतु उसमें लोकमंगल और मानव के चारित्रिक उन्नयन की भावना सन्निहित है।</p>
<p style="text-align: justify;">गोस्वामी तुलसीदास जी ने स्वयं कहा है-</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>नाना पुराण निगमागम सम्मत यद्रामायणे निगदितं क्वचिदन्योऽपिस्वान्तः सुखाय तुलसी रघुनाथ भाषा निबंधमति मंजुलमातनोति॥ स्वान्तः सुखाय तुलसी रघुनाथ भाषा निबंधमति मंजुलमातनोति॥ बालकाण्ड १.७ ।।</strong></p>
<p style="text-align: justify;">अर्थात् यह ग्रन्थ नाना पुराण, निगमागम, रामायण तथा कुछ अन्य ग्रन्थों से लेकर रचा गया है और तुलसी ने अपने आंतरिक सुख के लिए रघुनाथ की गाथा कही है।</p>
<p style="text-align: justify;">गोस्वामी तुलसीदास के लिए लोक जागरण व लोक संस्कार का माध्यम रामचरित मानस है। तुलसी के राम शील, सौंदर्य और शक्ति का समन्वित रूप है। तुलसी के राम मर्यादा पुरुषोत्तम है और उनका आदर्श चरित्र है। वाल्मीकि रामायण की तरह ही इसमें भी सात अध्याय (सात काण्ड) है जिसमें श्रीराम कथा को दोहा, चौपाई, छंद में वर्णित किया गया है। सुंदर काण्ड का पाठ तो सर्वदूर शुभ आयोजनों का मुख्य विषय बना है।</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone wp-image-7300" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2024/01/1685950100647d8e9433a32-300x171.webp" alt="" width="1716" height="978" srcset="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2024/01/1685950100647d8e9433a32-300x171.webp 300w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2024/01/1685950100647d8e9433a32-1024x585.webp 1024w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2024/01/1685950100647d8e9433a32-768x439.webp 768w" sizes="auto, (max-width: 1716px) 100vw, 1716px" /></p>
<p style="text-align: justify;"><strong>भारतीय भाषाओं में रामकथा</strong></p>
<p style="text-align: justify;">संस्कृत में वाल्मीकि रामायण और हिंदी (अवधी) में रामचरित मानस के अलावा सभी भारतीय भाषाओं में रामकथा की रचना हुई। रामकथा के प्रभाव से विभिन्न भारतीय भाषाओं का साहित्य अछूता नहीं रहा। क्योंकि श्रीराम मात्र अयोध्या के राम नहीं है, वे तो जन जन के राम है। वे राष्ट्र पुरुष है।</p>
<p style="text-align: justify;">सभी भारतीय भाषाओं में रामकथा की रचना हुई है-</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>१. परम चरिउ &#8211;</strong> छठीं से बारहवीं शताब्दी तक उत्तर भारत में साहित्य व बोलचाल की भाषा अपभ्रंश (संस्कृत का रूप) कहलाई। अपभ्रंश के प्रबंधात्मक साहित्य के प्रमुख कवि हुए स्वयंभू (सत्यभूदेव)। स्वयंभू ने रामकथा पर आधारित १२००० पदों वाली कृति परम चरिउ की रचना की। जैन मत में राजा राम के लिए ‘पदम्’ शब्द का उपयोग होता है, इसलिए स्वयंभू की रामायण को ‘पद्म चरित’ (परम चरिउ) कहा गया। मूल रूप से इस रामायण में ९२ सर्ग थे, बाद में स्वयंभू के पुत्र त्रिभुवन ने अपनी ओर से १६ सर्ग और जोड़े।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>२. उड़िया रामायण &#8211;</strong> कवि सारलादास ने ‘विलंका रामायण’ की रचना की। अर्जुनदास ने ‘राम विभा’ और कवि बलरामदास ने उड़िया में ‘जगमोहन रामायण की कृति की। इस कृति को दक्षिणी रामायण भी कहा जाता है।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>३. बांग्ला रामायण &#8211;</strong> बांग्ला के संत कवि पंडित कृत्तिदास ओझा ने १५वीं शताब्दी में ‘रामायण पांचाली’ नामक रामायण की रचना की। नित्यानन्द आचार्य की आश्चर्य रामायण, कविचन्द्र कृत अंगद रायबार, रघुनन्दन गोस्वामी की राम रसायन तथा चंद्रावती की रामायण गाथा भी बांग्ला कृतियाँ है।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>४. पूर्वोत्तर में रामायण &#8211;</strong> असमिया साहित्य के सबसे बड़े कवि माधव कंदली ने कछारी राजा महामाणिक्य की प्रेरणा से १४वीं शताब्दी में वाल्मीकि रामायण का सरल अनुवाद असमिया में किया। एक कवि दुर्गावर ने १६वीं शताब्दी में गीति-रामायण की रचना की। प्रमुख कवि व साहित्यकार शंकरदेव ने उत्तर कांड को पुनः असमिया में अनुदित किया। मणिपुरी में कृत्तिवास रामायण का अनुवाद ‘बिरबहु तुबा’ नाम से हुआ। कवि लबंग सिंह कौन्थौजम्ब का ग्रन्थ ‘रामनोडगाबा’ मणिपुरी का उल्लेखनीय ग्रन्थ है।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>५. कश्मीरी रामायण &#8211;</strong> १७५० से १९०० के मध्य प्रेमाख्यान काल में प्रकाश राम ने रामायण की रचना की। १८वीं शताब्दी के अंत में दिवाकर प्रकाण भट्ट ने भी ‘कश्मीरी रामायण’ रचा।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>६.  पंजाबी रामायण &#8211;</strong> सिखों के दसवें गुरु गोविंद सिंह जी के द्वारा रचे गए ११ ग्रंथों में से एक ‘रामावतार’ को गोविंद रामायण कहा जाता है। सन् १६९६ में पूर्ण हुई इस ‘गोविंद रामायण’ में ८६४ छंद है।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>७. गुजराती रामायण &#8211;</strong> १४वीं शताब्दी में आशासत ने गुजराती में रामलीला विषयक पदावली की रचना की। १५वीं शताब्दी में भालण ने सीता स्वयंवर रामकाव्य प्रस्तुत किया। १९वीं शताब्दी में गिरधरदास ‘रामायण’ लोकप्रिय है।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>८. मराठी रामायण &#8211;</strong> संत एकनाथ जी ने ‘भावार्थ रामायण’ की रचना की, पर वे इस रचना को पूरा नहीं कर पाए और इसे उनके शिष्य गाववा ने पूर्ण किया।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>९. तमिल रामायण &#8211;</strong> १२०० वर्ष पूर्व हुए महाकवि कंबन ने ‘कंब रामायण’ काव्य की रचना की।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>१०. तेलुगू रामायण &#8211;</strong> तेलुगू साहित्य में १३वीं शताब्दी में रंगनाथ रामायण, १४वीं शताब्दी में भास्कर रामायण की रचना हुई। तेलुगू की चार महिला साहित्यकारों ने भी अपनी कृतियाँ &#8211; मधुरवाणी की ‘रघुनाथ रामायण’, शिरभु की ‘सुभद्रा रामायण’, चेबरोलु सरस्वती की ‘सरस्वती रामायण’ तथा मोल्ल की ‘मोल्ल रामायण’ प्रस्तुत की। मोल्ल रामायण का हिंदी अनुवाद भी उपलब्ध है।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>११. कन्नड़ पंप रामायण &#8211;</strong> कन्नड़ साहित्य के पंप युग (सन् ९५०-११५०) के प्रसिद्ध कवि नागचंद्र ने पंप रामायण की रचना की, इसे ‘रामचन्द्रचरित पुराण’ भी कहा जाता है। नरहरि नामक कवि ने ‘तोरवे रामायण’ की रचना की। १९वीं शताब्दी में देवचन्द्र नामक जैन कवि ने ‘रामकथावतार’ लिखा। इसी शताब्दी में मुद्दण नामक कवि ने अद्भुत रामायण की रचना की</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>१२. मलयालम रामायण &#8211; </strong>चौदहवीं शताब्दी में युद्ध काण्ड की कथा के आधार पर प्राचीन तिरुवनाकोर में राजा ने रामचरित नामक काव्य की रचना की। इसी शताब्दी में कवि राम पणिकर ने गेय छंदों में ‘कणिशश रामायण’ की रचना की। इसके बाद रामकथा-पाट्ट रचा गया और वाल्मीकि रामायण के अनुवाद के रूप में ‘केरल वर्मा रामायण’ की कृति हुई। सन् १६०० के लगभग एजुत्त चन द्वारा ‘अध्यात्म रामायण’ की प्रस्तुति हुई।</p>
<p style="text-align: justify;">‘रावणवहो’ महाराष्ट्री प्राकृत भाषा का महत्वपूर्ण ग्रंथ है, जिसकी कृति खमीर के राजा प्रवरसेन द्वितीय ने की थी, जिसे बाद में सेतुबंध ने संस्कृत में अनुवाद किया। १९वीं शताब्दी में कवि भानुभट्ट ने नेपाली में सम्पूर्ण रामायण लिखी, जिसका तुलसीकृत रामचरितमानस के समान नेपाल में स्थान है। बौद्ध मत में राम को ‘बोधिसत्त्व’ मानकर जातक कथाओं में स्थान दिया है। बौद्ध मत के थेरवाद व दशरथ जातक में रामकथा के वर्णन है। मणिपुरी में कृत्तिवास रामायण का अनुवाद ‘बिरबहु तुबा’ नाम से हुआ। कवि लबंग सिंह कौन्थौजम्ब का ग्रन्थ ‘रामनोडगाबा’ मणिपुरी का उल्लेखनीय ग्रन्थ है। मैथिली में महाकवि चंदा झा की ‘चन्द्र रामायण’ (सन् १८८६), महाकवि लालदास की ‘रमेश्वर चरित रामायण’ (सन् १९०९), ‘सीतायन’, ‘अंब चरित’ प्रमुख रामकथा ग्रन्थ है।</p>
<p style="text-align: justify;">उपरोक्त कुछ ही रामायण का वर्णन किया गया है। रामायण में राम चरित के साथ भारतीय जीवन मूल्यों को समाहित किया गया है। रामायण भारतीय संस्कृति का पर्याय है। समय-समय पर साहित्यकारों-कवियों ने समाज के बदलते परिवेश में रामायण को नए रूप में जीवंत किया है। रामायण के माध्यम से नूतन सामाजिक मूल्यों की प्रतिष्ठा हुई है।</p>
<p style="text-align: justify;">(लेखक विद्या भारती जोधपुर (राजस्थान) प्रान्त के संगठन मंत्री है और विद्या भारती प्रचार विभाग की केन्द्रीय टोली के सदस्य है।)</p>
<p><strong>और पढ़ें : <a href="https://rashtriyashiksha.com/hindi-litterateur-father-kamil-bulke/" target="_blank" rel="noopener">हिंदी साहित्यकार फादर कामिल बुल्के</a></strong></p>
<p>The post <a href="https://rashtriyashiksha.com/ramayana-sat-koti-apara/">रामायण सत कोटि अपारा</a> appeared first on <a href="https://rashtriyashiksha.com">राष्ट्रीय शिक्षा : शिक्षा में समाज प्रबोधन</a>.</p>
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